रामचं गुहा अनुवाद सुशांत झा भारत नेह के बाद दुिनया के िवशालतम लोकतं का इितहास अनु म लेखक के बारे म अनुवादक प रचय समपण तावनाः एक अ वाभािवक रा पग भाग एकः लोकवाद का उदय 1. नेह के बाद उथल-पुथल का दौर 2. वाम क तरफ झुकाव 3. िवजय क तैयारी 4. ित ं ी 5. संकट म लौह मिहला 6. कां ेसी साये से बाहर 7. संकट म लोकतं 8. यह बेटा भी कम नह भाग दोः घटना का इितहास 9. हक क लड़ाई 10. दंगे 11. राजनैितक वग 12. मृि का दौर 13. मनोरं जन उपसंहार आभार िच संदभ पगुइन को फॉलो कर सवािधकार पगुइन बु स भारतः नेह के बाद रामचं गुहा का ज म सन् 1958 म देहरादून म आ, आपने द ली और कलक ा म अपनी पढ़ाई पूरी क । साथ ही आपने ओ लो, टडफोड, येल िव िव ालय और भारतीय िव ान सं थान (इं िडयन इं टी ूट आॅफ साइं स) म अ यापन कया। आप िवसेनचेफकोलेज जु ब लन म फे लो रहे ह और कै लीफो नया यूनीव सटी, बकले म इं डोअमे रकन क युिनटी चेयर िविज टंग ोफे सर भी रहे ह। दस साल के दर यान तीन महा ीप म पांच अकादिमक पद पर रहने और इस तरह कई िव िव ालय म पढ़ाने के बाद आप एक पूणकािलक लेखक बन गए और बंगलौर को अपना थायी ठकाना बना िलया। आपने िविवध िवषय पर अपनी कलम चलाई है िजसम पयावरणवाद का वैि क इितहास, एक मानवशा ाी- आंदोलनकारी क जीवनी, भारतीय के ट का सामािजक इितहास और िहमालयी कसान का सामािजक इितहास आ द शािमल है। आप कहते ह क ऐसा लगता है क आपका संपूण कै रयर गांधी के बाद का भारत िलखने क एक वृहत (और तकलीफदेह) तैयारी रही है। आपके ारा िलखी गई कताब और लेख का अनुवाद बीस से भी यादा भाषा म हो चुका है। आपके पु तक और लेख को जो पुर कार िमले ह उनम यूके के ट सोसाइटी िलटरे री अवाॅड और अमे रकन सोसाइटी आॅफ इनवायरमटल िह ी का िलयोपो ड-िहडी ाइज शािमल है। अनुवादक प रचय सुशांत झा मूलतः मधुबनी से ह, आपने आईआईएमसी (भारतीय जनसंचार सं थान) नई द ली से प का रता म िड लोमा हािसल कया है। आप दूरदशन, इं िडया यूज और नेह प रवार से संबंिधत एक वेबसाइट के साथ जुड़े रहे ह। आपका हंदी म ‘आ पाली’ और अं ेजी म ‘सुशांत झा’ के नाम से लाॅग भी है, आप वेब जगत के स य लेखक म से एक ह और आप राजनीितक-सामािजक िवषय पर िलखते रहे ह। फलहाल अखबार , पि का और वेबसाइट के िलए वतं लेखन कर रहे ह। मेरे जीवन के तट पर काशपुंज क तरह इरा, साशा और सुजा को सम पत भारत एक ब लतावादी समाज है जो लोकतं , कानून का शासन, िनजी वतं ता, सामुदाियक संबंध और सां कृ ितक िविवधता के साथ जादुई अहसास पैदा करता है। एक बुि जीवी होने के िलए कतनी बेहतरीन जगह है यह! ...म भारत को फर से खोजने के िलए यहां दिसय बार ज म लेना चा ग ं ा। राॅबट लैकिवल, भारत म अमे रका के सेवािनवृत हो रहे राजदूत, 2003 जो भी ि समकालीन भारत क वा तिवकता क पुनख ज करना चाहता है उसके राह म आनेवाली मुि कल के िवषय म मुझसे यादा जाग क और कोई नह हो सकता। नीरद चौधरी द आॅटोबायो ाफ आॅफ एन अननाॅन इं िडयन (1950) शहरां◌े के नाम पर एक ट पणी हाल के साल म भारत के कई शहर और महानगर के नाम या तो संशोिधत कर दए गए ह या उसे बदल दया गया है। इस तरह बंबई, मुंबई हो गया, म ास, चै ई हो गया और कलक ा, कोलकाता हो गया है। बंगलादेश क राजधानी अब ढाका हो गई है जो पहले डाका या ड ा के नाम से जानी जाती थी। इस कताब म उस अविध का िज करते समय उसके इसी नाम का योग कया गया है। चीन क राजधानी का नाम पीक ग से बदलकर अब बी जंग कर दया गया है जो क सन् अ सी के दशक तक पीक ग ही थी। इस पु तक म भाषायी शु ता क बजाय ऐितहािसक परं परा का िनवाह कया गया है। उदाहरण के िलए महारा क राजधानी को तब तक बंबई ही िलखा गया है जब तक क इसे आिधका रक तौर पर बदलकर मुंबई नह कर दया गया। तावना एक अ वाभािवक रा I चूं क सं या म वे इतने यादा ह और इतने अलग-अलग कार के ह क हंद ु तान के लोग वाभािवक तौर पर बंटे ए ह। लगता है क ऐसा हमेशा से रहा है। सन् 1827 के वसंत म मश र शायर िमजा असदु ला खान गािलब, द ली से कलक ा क या ा पर रवाना ए। छह महीने के बाद वह हंद ु के पिव शहर बनारस प च ं ।े यहां उ ह ने िचराग-ए-दैर के नाम से शायरी िलखी िजसक कालजयी पंि यां कु छ इस तरह क ह मने एक रात एक प च ं े ए संत से पूछा (जो इस कालच का रह य जानता था) बाबा, तुम जानते हो क अ छाई और िव ास, नैितकता और ेम इस अभागे देश से पलायन कर चुका है, बाप और बेटे एक दूसरे का गला काटने पर उता ह, भाई और भाई लड़ रहे ह, एकता और संघ क भावना ख म हो गई है, इन अशुभ संकेत के बावजूद अभी तक कयामत का दन य नह आया? अंितम घड़ी क िवजय विन य नह सुनाई देती? अंितम िवनाश का सू कसके हाथ म है...?1 गािलब का शेर मुगल सा ा य के पतन क पृ भूिम म िलखा गया था। गंगा- संधु क घाटी का उनका अपना इलाका जो कभी एक बादशाह के अधीन था, अब आपस म लड़ते-कटते कई सरदार और सेना म बंट चुका था। भाई से भाई लड़ रहे थे, एकता और संघ क भावना कह नह थी। ले कन जब वह इन पंि य को िलख रहे थे उसी व अं ेज क श ल म एक नई (और िवदेशी) ताकत हंद ु तान क सरजमीन पर अपना पंजा फै ला रही थी। वे धीरे -धीरे उपमहा ीप के बड़े िह से पर अपना िनयं ण थािपत करते जा रहे थे। उसके बाद सन् 1857 म देश क आबादी का एक बड़ा िह सा अं ेज के िखलाफ उठ खड़ा आ िजसे सा ा यवा दय ने िसपाही िव ोह कहा तो रा वा दय ने थम वतं ता सं ाम का नाम दया। उस दौर क कु छ सबसे यादा र रं िजत लड़ाइयां गािलब के अपने शहर द ली म ही ई थी जो अभी भी नाममा के िलए मुगल क राजधानी थी और आनेवाले व म अं ेज क राजधानी होनेवाली थी। गािलब क अपनी सहानुभूित भी खंिडत अव था म थी। वे नए शासक से वजीफा पा रहे थे, हालां क वे मुगल सं कृ ित और उसक शानो-शौकत के वा रस थे। जैसा उस व ि टश सा ा यवा दय ने या बाद म भारतीय रा वा दय ने महसूस कया उस तुलना म गािलब ने यादा साफतौर पर देखा क सही को गलत से अलग करने का फक िमट चुका था और दोन ही प ारा भयानक अ याचार कया जा रहा था। अपने ही मु क म अलग-थलग हो चुके गािलब ने बड़े दुख के साथ इन पंि य को िलखा हंद ु तान, बल झंझावत और आग क लपट से िघरा आ है। यहां के लोग कस नई व था क तरफ उ मीद और खुिशय से देख?2 ले कन इस सवाल का एक जवाब सामने आ रहा था। सन् 1857 क घटना के बाद ि टश स ाट ने ई ट इं िडया कं पनी के हाथ से स ा छीन ली। पुरानी ई ट इं िडया कं पनी क अ थायी और लुंज-पुंज नौकरशाही क जगह एक प र कृ त नौकरशाही ने ले ली। नए िजले और सूब का गठन कया गया। अब रा य का शासन सं ांत माने जाने वाले इं िडयन िसिवल स वस के अफसर ारा चलाया जाने लगा िज ह कामकाज म पुिलस, जंगल, संचाई आ द िवभाग सहायता दे रहे थे। पूरे देश म रे लवे का जाल िबछाने के िलए काफ ऊजा (और संसाधन) खच क गई। इसने ि टश भारत को काफ हद तक एकता और थािय व दान कया य क अब शासक वग तेजी से देश के कसी भी इलाके म ज रत पड़ने पर सेना भेज सकता था और 1857 के दोहराव को रोक सकता था। II सन् 1888 तक हंद ु तान म ि टश राज इतनी मजबूती से जम चुका था क अगर हजार साल नह तो कम से कम वे इतनी उ मीद तो कर ही सकते थे क उनके अपने जीवनकाल से यादा ही यह राज चलेगा। उसी साल एक ि ने, िजसने भारत म ि टश राज क जड़ जमाने म काफ मदद क थी, कै ि ज म कई ा यान दए जो बाद म इं िडया नाम क पु तक के प म कािशत कए गए। उस ि का नाम था सर जाॅन ेची। ेची ने भारतीय उपमहा ीप म कई साल िबताए थे और आिखर म गवनर-जनरल के काउं िसल का सद य तक बना था। अब वह सेवािनवृत होकर इं लड म रह रहा था और उसने अपने भारतीय अनुभव का यूरोप म हाल म घटी घटना के प र े य म िव ेषण कया। ेची क पु तक के बड़े िह से को ि टश राज के शासिनक इितहास के तौर पर िलया जाता है। इसम ि टश राज क सेना, नौकरशाही, भूराज व नीित और देशी ‘रजवाड़ क खास ि थित’ का वणन कया गया है। यह कताब उन लोगां◌े के िलए ज री शु आती कताब थी जो कै ि ज म पढ़ाई करने के बाद अिधका रय के प म भारत आने वाले थे। ले कन इस कताब म एक बड़ा सै ांितक तक भी दया गया है क ‘ हंद ु तान’ महज एक सुिवधाजनक नाम था, ”यह एक िवशाल े का नाम था िजसम कई सारे रा साथ-साथ रह रहे थे।“ ेची क राय म यूरोप के देश म आपसी फक इतना यादा नह था उससे यादा फक हंद ु तान के ‘इलाक ’ के बीच था। उसने कहा ‘पंजाब और बंगाल क तुलना म काॅटलड और पेन यादा नजदीक ह।’ भारत म भाषा, न ल और धम क िविवधता ब त यादा थी। यूरोप के िवपरीत भारत के ये ‘ े ’ कोई अलग रा नह ह, न ही उनम कोई अलग राजनीितक और सामािजक पहचान क चेतना ह। ेची ने अपने कै ि ज के ोता से कहा क हंद ु तान के बारे म यह सबसे ज री सीखने लायक बात है क एक भारतीय रा का कभी भी अि त व नह था, न ही यूरोपीय िवचार के मुतािबक कोई ऐसी भौितक, राजनीितक, सामािजक या धा मक प से एक कृ त अवधारणा ही मौजूद थी। ेची ने कहा क अतीत म भारतीय रा नाम क कोई चीज नह थी, न ही भिव य म उसके ऐसा होने क संभावना है। ेची ने सोचा क हो सकता है क ‘देश के कु छ िह स म रा के ित सहानुभूित क भावना जग जाए’ ले कन ये सोचना क यह भावना पूरे देश म ा हो जाएगी और पंजाब, बंगाल, उ र-पि मी ांत और म ास के लोग कभी ऐसा महसूस भी करगे क वे एक भारत के िनवासी ह, असंभव बात है। हालां क काफ तक और संभावना के आधार पर ज र कसी ऐसे व क क पना क जा सकती है जब कई यूरोपीय रा क जगह एक संयु यूरोपीय रा ले लेगा।’3 ेची क ट पिणयां एक ऐितहािसक िन कष िनकालने क कोिशश भर थी। उस व यूरोप म अपनी साझी भाषा और साझा े के आधार पर कई नए रा अपनी पहचान को कायम करने के िलए बेचैन हो रहे थे ले कन भारत म िजन े के बारे म ेची जानता था, उनम से कसी ने भी उस तरह क रा ीय जागृित नह दखाई थी। ले कन हम उसके इस बयान म राजनीितक िनिहताथ भी खोज सकते ह जो उसके ोता क इ छाशि को मजबूत करने के िलए दया गया था िज ह ि टश राज के अिधका रय के तौर पर हंद ु तान म कू मत करना था। य क हंद ु तान म येक नए ‘रा ’ के उदय का मतलब होता, ि टश सा ा य क शि और उसक ित ा म रण। िवडंबना यह थी क जब ेची अपना भाषण दे रहा था उसी समय उसके िन कष को कु छ भारतीय ारा चुनौती दी जा रही थी। इन भारतीय ने भारतीय रा ीय कां ेस नाम के एक ितिनिध संगठन क थापना क और शासन के मामल म भारतीय को यादा अिधकार देने क मांग क । जैसा क इसके नाम से ही प था इस संगठन ने भारतीय के बीच सं कृ ित, े , धम, और भाषा क िविभ ता को पाटने का संक प िलया और एक एक कृ त भारतीय रा के िनमाण क दशा म कदम रखा िजसे सा ा यवादी असंभव मानते थे। भारतीय रा ीय कां ेस के िवकास पर कई सारी अ छी कताब िलखी गई ह क कै से यह एक वाद-िववाद के क ब से जनांदोलन म त दील हो गया और कै से गोखले, ितलक और सबसे यादा गांधी ने मशः इसम अपनी अहम भूिमका िनभाई। िविभ भाषाभाषी समुदाय , धा मक समूह और जाितय के बीच पुल बनाने पर यादा यान दया गया। हालां क ये कोिशश कभी भी पूरी तरह कामयाब नह हो पा य क िनचली जाितयां और खासकर मुसलमान कभी भी कां ेस के इस दावे से पूरी तरह सहमत नह हो सके क कां ेस ही सही मायन म एक ‘रा ीय’ पाट है। इस तरह सन् 1947 म जब देश को राजनीितक आजादी िमली तो यह एक देश को नह िमली बि क दो देश भारत और पा क तान को िमली। हालां क भारतीय रा वाद को फर से याद करने का यह उपयु थान नह है।4 म िसफ एक ही बात को रे खां कत करना चाहता ं क कां ेस के ज म से लेकर भारत क आजादी और इसके बंटवारे तक ऐसे कई शंकालू लोग थे िज ह ने कहा था क भारतीय रा वाद एक वाभािवक घटना नह है। कु छ ऐसे ि टश राजनीित और िवचारक ज र थे िज ह ने भारतीय के वशासन का समथन कया था और अपने तरीके से इस या म मददगार भी बने।(भारतीय रा ीय कां ेस के कई योजनाकार म से एक ए.ओ. यूम ऐसे ही अं ेज थे जो काॅट माता-िपता क संतान थे)। ले कन फर भी ऐसे ब त से लोग थे िज ह ने तक दया क ांस, जमनी या इटली क तरह हंद ु तान म कोई रा ीय चेतना नह थी, ऐसा कोई बंधन नह था जो लोग को एक सू म बांध सके और उ ह उ े यपरक ढंग से भिव य क तरफ ले जा सके । इस दृि कोण ने उस दावे को ज म दया क यह ि टश शासन ही था िजसने भारत और भारत क जनता को एकता के सू म बांधा। िजन लोग ने जाॅन ेची के इस िवचार का समथन कया क एक वाधीन भारतीय रा का ज म असंभव है, उसम कई मश र और अनाम लेखक भी थे। इसम सबसे अहम थे डयाड कप लंग िज ह ने भारतीय उपमहा ीप म ही अपना होश संभाला था और बाद म इसके बारे म कु छ बेहतरीन कहािनयां भी िलख । सन् 1891 म कप लंग ने आॅ ेिलया क या ा क जहां एक प कार ने उनसे भारत म ‘ वशासन क संभावना ’ के बारे म पूछा। कप लंग ने कहा क - ‘ओह नह ... वे चार हजार साल पुराने लोग ह। वे इतने पुराने ह क इस णाली को सीख नह सकते। उ ह कानून और व था ही चािहए न...। हम उ ह ये देने को तैयार ह और हम उ ह ये सीधे तौर पर दे रहे ह।’5 जहां कप लंग ने भारतीय स यता क ाचीनता क बात क तो दूसरी तरफ अ य सा ा यवा दय ने उसी िन कष को िनकालने म भारतीय मानस क अप रप ता पर जोर दया। उनका मानना था क भारत के लोग शासन करने के िलए अयो य ह। भारत म चालीस साल िबताने के बाद एक के टर और बगान-मािलक ने इस बात पर जोर दया क अगर हमने कभी भारतीय को उनका शासन चलाने क छू ट दान क तो यहां अराजकता छा जाएगी। या खुदा... कस तरह क म, अ व था, उलझन और बुरी ि थित यहां छा जाएगी! अगर हंद ु तान हमारे अधीन रहा तो यहां के महान लोग कह भी जा सकते ह और कसी भी ल य को ा कर सकते ह। ले कन अगर उनको अपने पर छोड़ दया जाए तो शासन या राजनय के मामले म वे अभी भी ब त बचकाने क म के लोग ह और उनके तथाकिथत नेता घ टया क म के ह।6 इस तरह के िवचार भारत और इं लड म रहने वाले अं ेज के मन म बुरी तरह छाए ए थे। राजनीितक प से कहा जाए तो इस तरह के ािचयन िवचारधारा के सबसे बड़े पैरोकार वं टन च चल थे। सन् 1940 के दशक म जब भारतीय वतं ता का िवचार ापक प से अपनी मंिजल के काफ करीब प च ं चुका था, च चल ने कहा क उ ह ने ि टश स ाट के पहले मं ी का पद इसिलए नह संभाला है क वे सा ा य के िवखंडन म भागीदार बन। इसके एक दशक पहले उ ह ने भारतीय के िलए वशासन के िवरोध को आधार बनाते ए अपने िगरते ए राजनीितक भिव य को फर से मजबूत करने क कोिशश क थी। सन् 1930 म गांधी के नमक स या ह के बाद, जो नमक पर कर लगाने के िखलाफ शु कया गया था, अं ेजी सरकार ने भारतीय रा वा दय के साथ इस उपिनवेश को डोिमिनयन का दजा देने क संभावना पर िवचार-िवमश शु कया था। उस समय भी च चल ने ‘इस िवचार को अपने आपम शानदार ले कन इसके नतीज के िहसाब से इसे आपरािधक व प का कहा था।’ उनके मुतािबक चूं क भारत के लोग वशासन के िलए अयो य थे इसिलए यह ज री था क ‘ि टश सा ा य क शालीन और दृढ़ शि य को’ इस तरह क कसी भी संभावना को रोकने के िलए इ तेमाल कया जाए। सन् 1930 और 31 म च चल ने भारतीय वतं ता के िवचार के िखलाफ बड़े अशालीन ढंग से कई ा यान दए ता क इसके समथन म ठोस योजनाएं बनाई जा सक। दसंबर, 1930 म लंदन म अपने ोता के सामने बोलते ए च चल ने कहा क अगर अं ेज इस उपमहा ीप को छोड़कर जाते ह तो ज रत पड़ने पर जमनी से ेत जानुसेरी सैिनक और अिधका रय क सेवा लेकर यह सुिनि त कया जाएगा क हंद ु का सश भु व न कया जा सके । तीन महीने के बाद अ बट हाॅल म अपने र तेदार ूक आॅफ मोलबरो क अ य ता म चल रहे ‘अवर ूटी टू इं िडया’ - नाम के ा यान म च चल ने तक दया क ‘भारत का अं ेज ारा छोड़ दया जाना और उसे ा ण क स ा म जाने दया जाना (जो उनके िवचार म कां ेस पाट म भु व थािपत कए ए थे) एक ू र और धूत ापूण नजरअंदाजी होगी।’ उसने भिव यवाणी क क ‘अगर ि टश भारत से चले जाते ह तो उनके ारा िन मत यायपािलका, वा य सेवाएं, रे लवे और लोक िनमाण क सं था का पूरा तं ख म हो जाएगा और हंद ु तान ब त तेजी से शताि दय पहले क बबरता और म ययुगीन लूट-खसोट के दौर म वापस चला जाएगा।’7 III जब च चल इस तरह क चेताविनयां जारी कर रहे थे उसके डेढ़ दशक बाद अं ेज ने भारत छोड़ दया। उसके बाद बबरता और अराजकता का एक दौर ज र आया ले कन उसके िलए कौन िज मेदार था यह आज भी िववाद का िवषय है। ले कन उसके बाद कु छ व था भी ज र बहाल ई। शांित क थापना के िलए कसी भी जमन क ज रत महसूस नह ई। हंद ू वच व क बात, जो इस देश म पहले भी एक हद तक थी, बहाल तो ई ले कन इसके िलए कसी हिथयार क ज रत नह पड़ी बि क यह सावभौम वय क मतािधकार के आधार पर लगातार चुनाव के ारा आ। ले कन फर भी हंद ु तान क आजादी के साठ साल के दौरान यह सवाल बार-बार उठाया जाता रहा क यह मु क कतने दन तक एक रह पाएगा या यहां लोकतं क या या सं थाएं कतने दन तक काम कर पाएंगी? हरे क धानमं ी क मृ यु के बाद ये आशंका जताई जाती रही क अब लोकतांि क शासन क जगह सैिनक शासन ले लेगा, हरे क बार मानसून के धोखा दे देने के बाद अकाल क आशंका जताई जाती रही और हरे क अलगाववादी आंदोलन के ज म लेने के बाद यह आशंका क जाती रही क हंद ु तान एक एक कृ त रा के प म दुिनया के न शे से गायब हो जाएगा। िवनाश के इन भिव यवे ा म से कई सारे पि मी लेखक थे जो सन् 1947 के बाद से भारत के िवघटन क भिव यवाणी करते आ रहे थे। उनम से कई वाभािवक प से अमे रक या ि टश लेखक थे। खास बात यह थी क िसफ मौसमी पयवे क या समा यबुि वाले प कार के िलए ही भारत का वजूद एक पहेली नह था, बि क अकादिमक राजनीित िव ािनय के िलए भी यह एक पहेली ही था िजनके मुतािबक सां कृ ितक िविवधता और भयानक गरीबी कसी देश को एक रा के प म त दील नह कर सकती, कम से कम लोकतांि क रा के प म तो िब कु ल ही नह । मश र राजनीित िव ानी राॅबट डल ने िलखा क ‘ हंद ु तान क ि थित को देखते ए ये कहना िब कु ल असंभव लगता है क यह देश लोकतांि क सं था को आगे बढ़ा पाएगा। यहां कसी तरह क अनुकूल प रि थितयां नह ह।’ एक दूसरे अमे रक िव ान ने िलखा क ‘यूं तो भारत, समाज िव ान से संबंिधत अवधारणा को तोड़ने के िलए मश र रहा है ले कन इस लेख के त य इस शक क ओर इशारा करते ह क भारत म लोकतं संभव हो पाएगा या नह ।’8 इस पु तक के प े भारत के त काल िवखंडन या इसके अराजक ि थित म प च ं जाने या कसी तानाशाह के चंगुल म फं स जाने क भिव यवािणय से भरे पड़े ह। एक ऐसे ही सहानुभूित दखानेवाले ि के बयान का हवाला देना यहां उिचत होगा। वह ि ि टश प कार डाॅन टेलर था। सन् 1969 म िलखते ए, जब क हंद ु तान दो दशक से एक एक कृ त मु क के प म रह चुका था और जहां चार आम चुनाव करवाए जा चुके थे, टेलर क राय थी क - अहम यह है क या हंद ु तान एक मु क के प म रह पाएगा या यह िबखर जाएगा? ...अगर इस िवशाल देश और इसके करीब 52 करोड़ लोग को देखा जाए, यहां क पं ह मुख भाषा , आपस म लड़ते ए धम और ब त सारी न ल को देखा जाए तो ऐसा नह लगता क कभी यहां पर एक रा क भावना का उदय भी हो पाएगा। यह देश इतना िवशाल और इतनी िविवधता िलए ए है क इसे दमाग म समेटना भी मुि कल है। यहां महान िहमालय जैसी पवत शृंखलाएं ह, गंगा- संधु का िवशाल मैदान है जो कभी सूरज क गम से झुलसता है तो कभी मानसून क वषा से सराबोर रहता है, पूरब म ह रयाली से आ छा दत डे टा देश है तो कलक ा, बंबई और म ास जैसे महानगर भी यहां ह। यह देश अ सर एक देश जैसा नह लगता। ले कन फर भी भारत के ित एक अंत निहत भावना है जो इसके अि त व का सबसे बड़ा आ ासन है। कु छ ऐसा ज र है िजसे िसफ भारतीय इ छाशि के प म प रभािषत कया जा सकता है। म इस कथन को अितरं िजत नह मानता क एिशया का भिव य इसके अि त व के साथ जुड़ा आ है।9 दल ने कहा क भारत का अि त व बचा रहेगा ले कन दमाग इस बारे म शक जािहर कर रहा था। जािहर है, यह देश ब त ही ज टल और ब त ही ामक था। एक ऐसा देश िजसके बारे म कहा जा सकता था क यह एक अ वाभािवक रा है। सचाई तो यह थी क जबसे देश को आजादी िमली थी तबसे ब त सारे भारतीय ने इसके अि त व को वाभािवक तौर पर देखा था तो कु छ ने (रा वा दय ने) इसके बारे म भय के साथ िलखा या बयान दए थे। ब त सारे लोग (अलगाववादी या ांितकारी) ने इसे उ मीद के साथ देखा था। अपने िवदेशी समक क ही तरह वे भी यह मानने लगे थे क यहां क जमीन एक रा के अि त व म बने रहने के िहसाब से यादा ही िविवधता िलए ए है और एक लोकतं के फलने-फू लने के िहसाब से ब त ही गरीब। IV िपछली सदी के आखरी दशक म म गािलब के शहर का बा शंदा हो गया। हालां क म कले क दीवार से िघरे पुरानी द ली म नह रहा जहां गािलब क हवेली अभी भी खड़ी है, बि क म नई द ली म रह रहा था िजसे अं ेज ने भारत म अपने सा ा य क राजधानी बनाया था। जैसा क शायर के जमाने म हंद ु तान का हाल था, उसी तरह भारतीय अब भी आपस म लड़ रहे थे। अपने काम के िसलिसले म मुझे राजपथ से होकर गुजरना पड़ता (पूव का कं सवे) िजसका नाम और िजसक भौगोिलक ि थत राजस ा क तीक है। करीब एक मील तक राजपथ समतल जमीन पर ि थत है िजसके दोन तरफ खुले हवादार मैदान ह िजसम गणतं दवस समारोह को देखने आनेवाले हजार लोग के बैठने क व था क जाती है। उसके बाद यह सड़क ऊंचाई क ओर उठती है और प थर क भ इमारत तक प च ं ती है िजसे नाॅथ लाॅक और साउथ लाॅक के नाम से जाना जाता है। इ ह इमारत म भारत सरकार का कायालय है। वह सड़क उस महान भवन तक जाकर ख म हो जाती है जहां कभी भारत के वायसराय रहा करते थे। ले कन िजस व म द ली म रहने के िलए आया उस समय से ब त पहले अं ेज भारत छोड़ चुके थे। भारत अब एक आजाद और सं भु गणतं था। ले कन ऐसा लगा क यह अंदर से एक संतु देश नह था। असंतोष के संकेत हर जगह िबखरे पड़े थे। खासतौर पर राजपथ पर जहां समारोह के अित र अ य दन अमूमन खालीपन पसरा रहता है, वहां तंबु का गांव बन गया था और तरह-तरह के बैनर और झंडे लगे ए थे। एक कनात िहमालयी इलाके उ राखंड के कसान का था जो अपने िलए एक अलग रा य क मांग कर रहे थे तो दूसरा महारा के कसान का था जो अपनी उपज के िलए यादा मू य क मांग कर रहे थे। एक तीसरा तंबू क कण तट के दि णी इलाके के लोग का था जो अपनी भाषा को संिवधान क आठव सूची म शािमल कर आिधका रक भाषा का दजा देने क मांग कर रहे थे। इन तंबु के भीतर रहनेवाले लोग और उनके ारा उठाए गए मु े हमेशा बदलते रहते थे। पहाड़ी कसान क जगह औ ोिगक मजदूर आ जाते जो अपनी छंटनी के िखलाफ आवाज उठाते, महारा के कसान क जगह ित बत के शरणाथ आ जाते जो भारतीय नाग रकता क मांग करते और कां◌ेकणी भाषा-भािषय क जगह हंद ू साधुसंत आ जाते जो गौह या पर ितबंध क मांग करते। न बे के दशक क शु आत म सरकार ारा इन तंबु को वहां से हटा दया गया जो इस बात से चंितत थी क असंतोष के इस खुले दशन से िवदेिशय पर गलत भाव पड़ेगा। राजपथ को अित मण से हटा दया गया और वहां के मैदान को उसका पूव गौरव दान कर दया गया। ले कन िवरोध दशन करने वाले फर से इक ा हो गए और कसी और जगह पर िवरोध- दशन करने लगे। अब वे वहां से एक मील उ रपि म कनाॅट लेस म जंतर-मंतर वेधशाला के सामने दशन करने लगे। यहां वे राजस ा क दृि से तो दूर थे, ले कन जनता क िनगाह के सामने थे जो इस त कारोबारी इलाके से होकर ित दन गुजरती थी। सन् 1998 म पुिलस ने तय कया क वहां भी वह धरना- दशन करनेवाल को नह रहने देगी। एक बार फर से तंबु को ख म कर दया गया, ले कन जैसा क एक अखबार क रपोट ने िलखा - ‘जहां तक अिधका रय का सवाल है, िसफ धरना- दशन क इन जगह म प रवतन हो गया है, सम या जस क तस है। इन िवरोध दशन करनेवाल को मं दर माग - शंकर रोड चौराहे के पास क एक खाली जमीन पर थानांत रत कया जाएगा जहां संभवतः उन पर कम लोग क िनगाह जा पाएगी।’10 जब म 90 के दशक म द ली म रहता था तो मेरी इ छा होती थी क म पहली जनवरी से लेकर इकतीस दसंबर तक हरे क दन राजपथ पर घूम सकूं । इस तरह म वहां तंबु और धरना दे रहे लोग क उपि थित और उनके वहां से हट जाने क घटना को अपनी आंख से देखना चाहता था। कसी एक साल म कसी एकमा सड़क से कही गई वह भारत क अ भुत कहानी होती। यह पु तक जो आपके हाथ म है, उसे िलखने म एक अलग तरीके का पालन कया गया है। इसक क सागोई छह दशक म फै ली ई है। यह सन् 1947 से लेकर अब तक क कहानी कहती है। हालां क उसी कताब क तरह जो म राजपथ पर सालभर िबताने के बाद िलखना चाहता था यह कताब भी एक क सागोई है, क सागोई है उन सामािजक संघष क क कै से वे पैदा होते ह, कै से होते ह और कस तरह उनका समाधान खोजने क कोशश क जाती है। ये संघष कई मु पर चलते रहते ह िजसम हम उदाहरण के िलए चार मु को ितिनिध के तौर पर चुन सकते ह। इसम से पहला मु ा जाित है जो ब त सारे भारतीय के िलए एक मु य पहचान का िवषय है। यह तय करता है क वे कससे शादी करगे, कससे दो ती करगे और कससे लड़ाई करगे। अं ेजी श द ‘का ट’ पुतगाली भाषा से िलया गया है जो दो भारतीय श द जाित और वण का िमि त प है। जाित का मतलब ऐसे लोग का समूह है िजसम कसी ि का ज म होता है जब क वण का मतलब सामािजक वग करण का वो पायदान है जो हंद ू शा और पुराण के िहसाब से तय कया गया है। हंद ू धम म चार वण है और पूव के अछू त को जोड़कर इसम पांच वण हो जाते ह जो सबसे िनचले तर पर भी ह। इ ही वण म 3000 या उससे भी अिधक जाितयां ह। इसम से हरे क जाित अपने इलाके म अपने से ऊपर क जाितय को चुनौती देती है और इस या म अपने से नीचे क जाितय से चुनौती भी पाती है। उसके बाद दूसरा मु ा है भाषा। भारत का संिवधान बाइस भाषा को ‘आिधका रक’ भाषा का दजा देता है। इसम सबसे यादा मह वपूण हंदी है जो एक या एकािधक प म करीब चालीस करोड़ लोग ारा बोली जाती है। अ य मह वपूण भाषाएं ह तेलुगु, क ड़, तिमल, मलयालम, मराठी, गुजराती, उि़डया, पंजाबी, बंगाली और असमी। इसम से हरे क भाषा एक खास िलिप म िलखी जाती है और ऐसा दावा कया जाता है क उसके बोलने वाल क सं या लाख -करोड़ म है। वाभािवक तौर पर रा ीय एकता और भाषायी िविवधता हमेशा एक दूसरे क पूरक नह रही है। भाषा के आधार पर भारतीय आपस म लड़ते-झगड़ते रहे ह। संघष का तीसरा कोण धम से संबंिधत है। एक अरब से यादा आबादी वाले इस देश म एक िवशाल ब सं या हंद ु क है। ले कन दुिनया म मुसलमान क दूसरी सबसे बड़ी आबादी यानी करीब चौदह करोड़ मुसलमान भी भारत म रहते ह (िसफ इं डोनेिशया म ही भारत से यादा मुसलमान रहते ह)। इसके अलावा इस देश म ईसाई, बौ , जैन और िसख क भी खासी आबादी है। चूं क आ था भी भाषा क तरह ही मानवीय पहचान क एक मौिलक िवशेषता है तो इसम कोई ता ुब नह क हंद ु तान के लोग कभी-कभी धम के आधार पर आपस म एक दूसरे से लड़ते रहे ह। संघष का चौथा मु य कारण वग है। भारत बेिमसाल सां कृ ितक िविवधता का देश है, ले कन यह उतना ही भीषण सामािजक िवषमता का देश भी है। भारत म ऐसे-ऐसे उ ोगपित ह जो ब त ही अमीर ह और िजनके पास लंदन और यूयाॅक म अपनी िवशाल को ठयां ह। ले कन फर भी देश क 26 फ सदी आबादी यानी करीब 30 करोड़ लोग गरीबी रे खा से नीचे बताए जाते ह। देश के अंद नी िह स म भू वािम व म भीषण िवषमता है और शहर म लोग क आमदनी के बीच गहरी खाई है। इसिलए यह ता ुब क बात नह क इन सारी िवषमता ने ब त सारे िवरोध के आंदोलन को ज म दया है। संघष के ये बंद ु कई बार एक साथ तो कई बार अलग-अलग भी काम करते ह। कई बार एक ही आ था को मानने वाले लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते ह। अ सर िन जाितयां दिमत भी होती ह। संघष के इन चार क ीय बंद ु म एक पांचवां बंद ु भी जोड़ा जा सकता है जो इन चार को एक साथ भािवत करता है। वह पांचवां बंद ु है लंग का। यहां फर से भारत एक गजब का िवरोधाभास दखाता है। इस देश म एक मिहला पूरे पं ह साल तक धानमं ी क कु स पर रही है ले कन फर भी भारत के कु छ िह स म अभी भी क या ूणह या का मामला काफ सामा य है। पूरे देश म भूिमहीन मजदूर को ब त कम वेतन दया जाता है और उनम मिहला को तो सबसे कम। िन जाित के लोग को सामािजक भेदभाव का िशकार होना पड़ता है, उनक मिहला को ये भेदभाव सबसे यादा झेलना पड़ता है। हरे क धम के साधुसंत अपनी मिहला को इस ज म और दूसरे ज म म हीन दजा दान करते ह। भेदभाव के एक बंद ु के प म लंग दूसरे अ य बंद ु से यादा िवकृ त है हालां क सामूिहक और खुले प म अ सर इसक अिभ ि नह हो पाई है। सामािजक संघष क योगशाला के प म एक इितहासकार के िलए 20व सदी का भारत उतना ही दलच प है िजतना 19व सदी का यूरोप। दोन ही मामल म दो सही सामािजक प रवतनकारी या के मेल से संघष का ज म आ। ये याएं थ औ ोगीकरण और आधुिनक रा रा य का उदय। वैसे भी भारत म धम, जाित, वग और भाषा पर आधा रत ित पध समूह क िविवधता को देखते ए इन संघष क संभावना यादा थी। भारतीय उपमहा ीप म ये संघष 19व सदी के यूरोप क तुलना म इसिलए भी यादा साफतौर पर देखने को िमलते ह य क भारत म जो कु छ आ वह एक लोकतांि क ढांचे के तहत आ जहां सावभौम वय क मतािधकार के आधार पर चुनाव करवाने क व था थी, एक वतं ेस था और वतं यायपािलका थी। मानवजाित के इितहास म कह भी और कभी भी इस तरह क िविवधता िलए ए सामािजक संघष देखने को नह िमला है जो इतना ती था और कला और सािह य म िजसक अिभ ि इतनी तीखे और जोरदार ढंग से ई थी। साथ ही ये ऐसे संघष थे िजसका देश के राजनीितक तं और मीिडया ने सीधे तौर पर समाधान खोजने क कोिशश क थी, ऐसा पहले कभी नह देखा गया। आजाद भारत के इितहास और इस पु तक क िवषयव तु के संि ीकरण करने का एक तरीका ‘संघष के मानिच ’ का दशन भी हो सकता है। हरे क दशक के िहसाब से अलग-अलग तरीके से भारत का न शा दखाया जा सकता है िजसम ए संघष को उनक ती ता के िहसाब से अलग-अलग रं ग से रं गा जा सकता है। उदाहरण के िलए कसी खास समूह ारा लोकतांि क गित म दलच पी लेने को नीले रं ग से, अ हंसक ले कन आ ामक प से प रवतन क मांग करने वाल को लाल रं ग से और भारतीय रा य को सश िव ोह के ारा न करने क कोिशश करनेवाल को काले रं ग से रं गा जा सकता है। अगर इस न शे का िसलिसलेवार ढंग से अ ययन कया जाए तो कई दशक म फै ले इन संघष म कई ापक िविवधता देखने को िमलेगी। ऐसा लगेगा क लाल रं ग से रं गे इलाके काले म त दील हो रहे ह, काले रं ग से रं गे इलाके लाल म बदल रहे ह और नीले और लाल इलाके सफे द इलाके म बदल रहे ह। सफे द रं ग उन इलाक का ितिनिध व कर सकता है जहां कोई बड़ा संघष मौजूद नह है। ये न शे सतत बदलते ए रं ग का एक िविवध रे खािच तुत करगे। ले कन इन तमाम प रवतन के बावजूद एक सजग पयवे क ये ज र महसूस करे गा क दो बात सदा ि थर रही ह। पहला देश के न शे का व प इन तमाम आंत रक प रवतन के बावजूद नह बदला है। ऐसा इसिलए क हंद ु तान िपछले दशक म लगातार एक रहा है और इसका कोई भी इलाका इसे छोड़कर अलग नह हो पाया है। दूसरी बात ये क कसी भी एक व म एक साथ नीले, काले और लाल इलाके िमलकर इतने बड़े नह ए ह क वे सफे द इलाके से बड़े हो सक। िजन दशक को एक जमाने म ‘खतरनाक दशक’ के नाम से जाना जाता था, उस व भी पचास फ सदी से यादा भारत का िह सा शांितपूवक देश क व था के अधीन काम करता रहा। आज का ेस चाहे वो ोडशीट हो या टेबुलाॅयड, सनसनीखेज हो या गंभीर, भारतीय हो या पि मी, सारे के सारे भारत क आ थक तर क खबर से अंटे पड़े ह। ये खबर अतीत क गरीबी और वंचना के िब कु ल उलट त वीर पेश करती ह। ले कन आधुिनक भारत के कामयाबी क कहानी अथ व था के े म नह , बि क राजनीितक े म छु पी ई है। भारत के ‘साॅ टवेयर चम कार’ को सलाम करना एकबारगी थोड़ी ज दबाजी क बात होगी। हम अभी ये नह जानते क ये चम कार आम जनता तक समृि ले जा पाएगा या नह । ले कन आजादी के साठ इ तेहानी साल के बाद भी हंद ु तान एक एक कृ त और ब त हद तक एक लोकतांि क मु क है यह बात ज र हमारे यान को गहराई से आक षत करनी चािहए। हाल ही म 135 देश म िवकास और लोकतं के बारे म कया गया एक सांि यक य िव ेषण बताता है क ‘ हंद ु तान म लोकतं के िखलाफ अ यिधक िवषम हालात’ थे। हंद ु तान के लोग म िन आय और सा रता का तर और उ तरीय सामािजक संघष क वजह से यह देश इस अ ययन क पूरी अविध (1950-1990) के दर यान अिधनायकवादी शासन व था के िलए सवथा उपयु था। ले कन हक कत म उस पूरी अविध के दर यान चूं क भारत ावहा रक प से लोकतांि क बना रहा इसिलए भारत को िसफ एक ही तरीके से रे खां कत कया जा सकता था और वो ये था क भारत एक ‘ मुख अपवाद’ है।11 इन िवरोधाभास और अिनयिमतता से बचने के िलए हम समाज िव ान के सांि यक य तौर-तरीक से शायद बचना होगा िजसके िहसाब से हंद ु तान हमेशा िनयम का अपवाद ही सािबत होगा। इसके उलट हम ऐितहािसक क सागोई का पुराना तरीका ही अि तयार करना होगा, जो हम हंद ु तान को समझाने म यादा मददगार सािबत होगा। हंद ु तान को जो शि यां बांटती ह वे िविवध कार क ह। इस पु तक म उन सारी शि य और वृि य पर खासा यान दया गया है। ले कन यहां ऐसी भी कई शि यां ह जो हंद ु तान को एक रखने म सहायक ई ह जो वग और सं कृ ित क उन टकराहट को समेटने म सहायक ई ह िज ह ने कम से कम अब तक उन भिव यवािणय को झूठा सािबत कया है क हंद ु तान ब त ज द ही िवखंिडत हो जाएगा या अिधनायकवाद के चंगुल म फं स जाएगा। हालां क इस तरह के ए यकारी भाव ब त कम दृि गोचर रहे ह और इस कताब का एक ल य ये भी है क उन भाव को सामने लाया जाए। मुझे लगता है क उन भाव के बारे म बात करना अभी सही नह होगा, जैसे-जैसे ये क सागोई आगे बढ़ती जाएगी ये भाव साफतौर पर सामने आते जाएंगे। यहां इतना कहना ही लाजमी होगा क ऐसे भाव म ि और सं थान दोन क काफ भूिमका रही है। V राजनीितक िस ांतकार सुनील िखलनानी िलखते ह, ‘भारतीय इितहास म सन् 1947 से लेकर अब तक का समय लोकतं नाम के एक राजनीितक िवचार को साहसपूवक आगे बढ़ाते रहने का समय है।’ इस तरह से देखा जाए तो ऐसा लगता है क ‘महान लोकतांि क योग क कड़ी म आजाद भारत तीसरा सबसे मह वपूण ऐितहािसक ण है िजसे 18व सदी के आिखर म अमे रक और ांसीसी ांितका रय ारा शु कया गया था।’ इसम से ‘हरे क योग ने असीिमत ऊजा छोड़ी है, हरे क ने िवशाल आकां ाएं पैदा क ह और हरे क ने दुखद िनराशा को ज म दया है।’ िखलनानी कहते ह क ‘हालां क भारतीय योग इनम सबसे नया है ले कन इसके नतीजे इन सारे योग म सबसे यादा अहम सािबत ह गे। इसक एक वजह तो ये है क इसम िवराट जनसमुदाय क भागीदारी होगी और दूसरी वजह इसक भौगोिलक ि थित होगी य क यह एिशया महादेश म शा त वतं ता का एक योितपुंज बनकर खड़ा रहेगा।’12 एक भारतीय के तौर पर म सोचता ं क पि म क तुलना म भारत म लोकतं का योग ‘ यादा मह वपूण’ सािबत होगा। एक इितहासकार के तौर पर म िसफ इतना जानता ं क इसका ब त ही कम अ ययन कया गया है। ांसीसी और अमे रकन ांित पर सैकड़ या शायद हजार क सं या म कताब िलखी गई ह। उनके मश र और गुमनाम नेता क जीविनयां, उन आंदोलन म भाग लेनेवाले लोग क सामािजक पृ भूिम का अ ययन और आनेवाले दशक और स दय म उन ांितय के भाव क गहराई या उनके रण का िवशद अ ययन उपल ध है। इसके उलट भारतीय लोकतं के िविवध प पर उं गिलय पर िगनने लायक काम ए ह। िश ािवद कृ णकु मार िलखते ह क ‘भारतीय ब के िलए इितहास भारत क आजादी और बंटवारे पर जाकर ख म हो जाता है। समाजशा के एक िवषय के प म और बाद म एक वतं िवषय के प म इितहास क अ ययन साम ी सन् 1947 के बाद ख म हो जाती है... और िपछले 55 साल म जो भी कु छ आ है वह संि नाग रक शा के पा म , लोकि य िसनेमा और टेलीिवजन के ारा ही जाना जा सकता है, एक औपचा रक ान के िवषय के प म इितहास उसको दज नह करता।’13 अगर भारतीय ब के िलए इितहास आजादी और बंटवारे पर जाकर ख म हो जाता है तो इसक वजह ये है क भारतीय वय क और बुजुग ने ऐसा ही सोच रखा है। अकादिमक जगत म इितहास िसफ अतीत के बारे म पढ़ाता है जब क राजनीित िव ान और समाजशा वतमान के बारे म बात करते ह। यह एक पारं प रक और कई मायन म ता कक िवभाजन है। ले कन द त यह है क भारतीय अकादिमक जगत म अतीत को एकमा और अचल तारीख के प म प रभािषत कया गया है और वो तारीख है 15 अग त 1947। इस तरह से जब घड़ी ने उस ितिथ के म यराि के आगमन क सूचना दी और भारत आजाद आ, हमारा इितहास वह ख म हो गया और राजनीित िव ान और समाजशा शु हो गया। ले कन सन् 1947 से लेकर आजतक इन कई दशक म वतमान का पिहया काफ आगे बढ़ चुका है। राजनीित िव ािनय ने सन् 1952 म ए पहले आम चुनाव का अ ययन कया और उसके पांच साल बाद ए दूसरे चुनाव का भी अ ययन कया। सामािजक मानवशाि ाय ने सन् पचास के दशक के भारतीय गांव का िववरण िलखा, फर उ ह ने उससे भी यादा साठ के दशक का िलखा। हालां क अतीत अपनी जगह पूववत कायम रहा। ले कन अपने पेशेवर िश ण और िमजाज क वजह से इितहासकार ने अपने आपको आजादी से पहले क अविध तक ही बांधकर रख िलया। ि टश सा ा यवाद के सामािजक, आ थक, राजनैितक और सां कृ ितक प रणाम पर एक वृहद सािह य िलखा गया है और अभी भी िलखा ही जा रहा है। उससे भी िवशाल सािह य सा ा यवादी शासन के िवरोध, उसके व प, उसके याकलाप , उ े य और नतीज के बारे म िलखा गया है या िलखा जा रहा है, िजस िवरोध क अगुआई समाज सुधारक, आ याि मक गु , आम लोग के बीच मसीहा और राजनीितक आंदोलनकारी महा मा गांधी कर रहे थे। कु छ लोग गांधी क काफ तारीफ करते ह तो उसी तरह कु छ उनको नापसंद भी करते ह। उसी तरह क बात उस भीमकाय सं था के बारे म भी क जाती है िजसे ि टश राज के नाम से जाना जाता है। आिखरकार अं ेज ने अग त 1947 म हंद ु तान छोड़ दया और उसके महज साढ़े पांच महीन के बाद गांधी क ह या कर दी गई। ि टश राज के खा मे के बाद उसके सबसे मश र िवरोधी क मृ यु इतनी ज दी हो गई क इसने इितहास के लेखन पर अपना एक िनि त भाव डाला। इस बारे म िनि त तौर पर नह कहा जा सकता क अगर गांधी यादा दन तक जीिवत रहते तो या इितहासकार ने आजाद भारत के इितहास को िलखने म यादा दलच पी दखाई होती? ले कन ऐसा देखने को िमला क रवाज और परं परा के मुतािबक भारतीय इितहास 15 अग त 1947 को ‘ख म’ मान िलया गया, हालां क महा मा के जीवनीकार को छह महीने यादा तक क घटना को िलखने क छू ट ज र िमली। इस तरह ब त सारी बेहतरीन और िववादा पद कताब ि टश भारत के अंितम गहन संघषमय साल के बारे म िलखी ग । ि टश राज जैसी महान सं था और महा मा गांधी जैसे महान ि व अभी भी इितहासकार के िलए ब त दलच पी का िवषय ह। ले कन आजाद भारत का इितहास ब त मायन म अभी भी एक अछू त इलाका है िजसे पूरी तरह खंगाला नह गया है। अगर इितहास का मतलब ‘अतीत के ान का औपचा रक सं ह’ है तो ये मानकर चलना चािहए क सन् 1947 के बाद क समयाविध का लेखा-जोखा वजूद म ही नह है। और हां, जैसा क यह पु तक बताती है क आजादी के बाद का पहला साल उतना ही नाटक य था िजतना क ि टश राज का आखरी साल। अं ेज ने औपचा रक प से स ा का ह तांतरण कर दया था ले कन नई व था अभी कायम होनी बाक थी। बंटवारे ने हंद-ू मुि लम संघष को ख म नह कया था, न ही आजादी ने वग या जाित के तनाव को। अभी भी देश का बड़ा िह सा देशी रजवाड़ के अधीन था। इ ह समझाबुझाकर या धमकाकर भारतीय संघ का िह सा बनाना ज री था। एक न होते सा ा य के मलव से एक नए मु क का ज म और िनमाण हो रहा था। हाल म िलखे गए यूरोप के यु ो रकालीन इितहास म टोनी जुट ने िलखा है क ‘पहली िनगाह म इस तरह क कताब दूसरी इसी तरह क कताब के कं ध पर खड़ी होती है।’ वे िलखते ह क ‘ि तीय िव यु के बाद के साठ साल के संि इितहास के िलए अं ेजी म जो िछटपुट लेखन कया गया है वो इतना यादा है क उसका इ तेमाल नह हो सकता।’14 जब क भारत म ि थित िब कु ल उलट है। यहां हमारे ान म काफ िवशाल अंतर है। भारतीय गणरा य 28 रा य का संघ है िजसम से कई तो ांस से भी बड़े ह। ले कन फर भी यहां बड़े या मह वपूण रा य का िलिखत इितहास उपल ध नह है। पचास और साठ के दशक म भारत ने िवदेश नीित, आ थक नीित और योजनागत िवकास के संदभ म नई नीितय को अपनाया था। इन नीितय का आिधका रक या पया लेखा-जोखा िलखा जाना अभी तक बाक है। भारत ने महान दूरदश और कमशील उ िमय को पैदा कया है, ले कन उनके ारा बनाई गई सं था और उनके ारा अ जत क गई दौलत क कहानी अभी तक यादातर अिलिखत ही है। हमारे आधुिनक इितहास क कु छ मु य हि तय क जीविनयां तक नह िलखी गई ह। ऐसी हि तय म शेख अ दु ला, मा टर तारा संह और एम.जी. रामचं न का नाम अहम है। ये ऐसे ‘ ांतीय’ नेता थे िजनके ांत का आकार कसी बड़े यूरोपीय देश के बराबर था। यु ो रकालीन यूरोप के िवपरीत यु ो रकालीन भारत का इितहास महज अ य िवशेष िवषय क कताब के सहारे नह िलखा जा सकता। कई छोटी और बड़ी बात के िलए इसक कड़ी हम ऐसी सामि य और सूचना से बुननी होगी िजसे लेखक ने खुद ही मेहनत से चुना हो। एक बुजुग और जानकार नौकरशाह सी.एस. वकटाचार जो क मेरे पहले ेरणा ोत थे, उ ह ने एक बार कहा था क इितहास के बारे म कया गया हरे क काम ‘अंत रम’ ही होता है िजसे प रव धत, संशोिधत या चुनौती दी जा सकती है और इसके बाद कए गए काम के ारा इसे अलग-थलग भी कया जा सकता है। िजतने िवषय को इस पु तक ने छु आ है उसके बावजूद हम यह उ मीद नह कर सकते क कसी भी िवषय को ापक प से यहां िव ेिषत कया गया है। कई पाठक को कई बात से आपि हो सकती है। उदाहरण के िलए कु छ लोग इस बात पर उठा सकते ह क मने आ दवािसय के बारे म ब त नह िलखा है। कई लोग कह सकते ह क मुझे क मीर के बारे म कु छ और प े िलखने चािहए थे। इस कताब से मेरी अपनी उ मीद माक लाॅक के श द म बेहतर तरीके से ई ह जो कसी दूसरे काल म कसी दूसरे देश के बारे म िलख रहे थे - म अपने आपको एक खोजकता के प म देखना पसंद क ं गा जो जंगल और झाि़डय म जाने क बजाय ि ितज का सव ण करे । य क वहां से चीज साफ-साफ नजर आती ह। मेरे िववरण म जो फक या अंतर दखता है वह वाभािवक तौर पर िवशाल है। मने कसी भी तरह क किमय को छु पाने क कोिशश नह क है चाहे वह मेरे ान का मामला हो या फर मेरे िववरण का... अगर ऐसा कोई व आता है क मेरा अपना लेखन कसी और गंभीर लेखन के सामने कमतर पड़ जाता है... तो मुझे ब त खुशी होगी क मेरे अस य त य ने इितहास को अपने बारे म स य जानने के िलए े रत कया।15 VI कै ि ज के महान इितहासकार एफ.ड यू. मीटलड अपने छा को याद दलाते रहते थे क ‘जो कु छ भी अब अतीत है, वह भी कभी भिव य क बात होगी।’ कसी इितहासकार के िलए इससे अ छी नजीर नह हो सकती, खासकर उस इितहासकार के िलए जो हाल क घटना के बारे म कहना चाहता है और जो एक ऐसे पाठक या ोता से बात कर रहा है िजसक उस िवषय पर एक तयशुदा राय है। उदाहरण के िलए िवयतनाम यु के बारे म एक अमे रक इितहासकार क कताब उन लोग ारा पढ़ी जाती है जो पहले से ही मान चुके होते ह क यु सही था या गलत। उनके मन म इसका खाका पहले से ही मौजूद होता है। सन् 1968 के छा आंदोलन के बारे म एक ांसीसी इितहासकार जानता है क उसके पाठक के मन म उस खास आंदोलन के बारे म मजबूत और पर पर िवरोधी धारणाएं ह गी। जो लोग समकालीन इितहास िलखते ह वे जानते ह क उनका पाठक सूचना को हण करनेवाला महज एक िनज व वाहन नह है क उसके सामने मनमज लेखन परोस दया जाए। पाठक एक नाग रक भी होता है, एक आलोचक पाठक... िजसका अपना एक िनजी राजनीितक और वैचा रक झुकाव होता है। ये झुकाव उसके अपने अतीत, राजनेता और खासतौर पर कानून िनमाता के बारे म एक दृि कोण िवकिसत करते ह। हम समकालीन राजनेता के ारा िलए गए फै सल के नतीज के साथ अपनी जंदगी जीते ह और अ सर सोचते ह क कोई दूसरा वैकि पक राजनेता जो क हमारे ही तरह सोचता - बेहतर और बुि म ापूण फै सला लेता। इितहास लेखन म हम अतीत म िजतना ही पीछे जाते ह उतनी ही कम सम या आती है। अठारहव सदी के इितहासकार उस व को िव ेिषत करने क और समझने क कोिशश करते ह। वैसा ही उनका पाठक भी करता है। जेफरसन या नेपोिलयन का जीवनीकार अपने िव ासी पाठक पर भरोसा कर सकता है य क वे नह जानते क उन लोग ने या कया था या वे यह इ छा नह करगे क काश उन नेता ने ऐसा कया होता। यहां अमूमन पाठक कसी िवशेष ारा िनदिशत कए जाने म स ता का अनुभव करता है। ले कन जाॅन एफ. के नेडी या चा स द गाॅल के जीवनीकार उतने खुशनसीब नह ह। या कह क ब त सारे संभािवत पाठक पहले से ही इन लोग के बारे म सारी सचाइयां जानते रहते ह और कसी भी तरह के वैकि पक िवचार को सुनने के ित ब त कम इ छु क होते ह भले ही उसके समथन म मोटे-मोटे सबूत य न पेश कए जाएं। इस तरह से देखा जाए तो समकालीन इितहास लेखक को अपने पाठक से यादा चुनौती िमलती है जो क उसके सहयोिगय को नह झेलनी पड़ती, जो सुदरू इितहास का लेखन कर रहे होते ह। ले कन इितहासकार के सामने एक दूसरी भी चुनौती है िजस पर शायद कम लोग का यान गया है। वो चुनौती ये है क इितहासकार खुद भी एक नाग रक होता है। जो िव ान िवयतनाम यु के बारे म िलखने का फै सला करता है, उसका उस पर पहले से ही एक मजबूत िवचार होता है। जब क एक लेखक जो अमे रकन गृहयु या ांितकारी यु के बारे म िलखने का फै सला करता है उसका उस पर उतना मजबूत िवचार नह होता। इसिलए एक इितहासकार के िलए भी और एक पाठक के िलए भी जो कोई वतमान के िजतना ही नजदीक जाता है वह उतना ही एक तरफ सोच से त होने क दशा म बढ़ जाता है। यह एक अलग तरह क चुनौती है। इस कताब को िलखते व मने मीटलड क नजीर को हमेशा अपने सामने रखने क कोिशश क है। म एक िनि त मत क बजाय िवषय को जानने क उ सुकता से े रत रहा ं और अपना मत थोपने क बजाय िवषय को समझने क इ छा करता रहा ।ं मने कसी िवषय पर कए गए अ ययन के बदले उसके ाथिमक ोत पर यादा िनभर रहने का फै सला कया है। उदाहरण के िलए सन् 1957 क घटना को 1957 क तरह ही जानना चािहए न क सन् 2007 म उस पर कए गए अ ययन क िनगाह से। पहली िनगाह म यह कताब मानवता के छठे िह से क कहानी कहने का एक यास भर है। यह आजाद भारत के मुख पा , िववाद , मु , और या का एक लेखाजोखा और िव ेषण है। हालां क इस कताब क क सागोई का तरीका दो मूल मह वाकां ा से े रत रहा है। पहला, भारत क सामािजक और राजनीितक िविवधता को उिचत स मान देना और दूसरा ब त दन से देशी-िवदेशी िव ान और नाग रक के सामने रही इस पहेली को सुलझाना क आिखर एक हंद ु तान अि त व म य है? भागः एक लोकवाद का उदय 1 नेह के बाद उथल-पुथल का दौर ऐसा िब कु ल ही नह लगता क पंिडत नेह प रवारवाद को आगे बढ़ाएंगे; यह उनके च र और उनके पूरे क रयर को देखते ए कह से फट नह बैठता। ऱक मो रस, राजनीितक तंभकार, 1960 I 27 मई, 1964 क सुबह पंिडत जवाहरलाल नेह क मृ यु हो गई। आॅल इं िडया रे िडयो के 2 बजे के बुले टन से ये खबर आग क तरह पूरी दुिनया म फै ल गई। इसके 2 घंटे बाद त कालीन गृहमं ी गुलजारी लाल नंदा को कायवाहक धानमं ी घोिषत कर दया गया। इसके साथ ही पंिडत नेह के उ रािधकारी क खोज भी शु कर दी गई। नेह के उ रािधकारी क खोज म जो श स सबसे अहम रोल िनभा रहा था उसका नाम था, के . कामराज। कामराज, उस व कां ेस पाट के अ य थे। कामराज का ज म सन् 1903 म तिमलनाडु म आ था और वे एक िनचली जाित से ता लुक रखते थे। आजादी क लड़ाई म शरीक होने के िलए उ ह ने अपनी कू ली पढ़ाई बीच म ही छोड़ दी थी। वतं ता आंदोलन म अपनी दो दशक क भागीदारी के दौरान कामराज ने करीब आठ साल जेल म काटे थे। उ ह अं ेजी अदालत ने छह मामल म सजाएं सुनाई थ । आमलोग के बीच म कामराज का कद और उनक छिव काफ मजबूत थी। इसक बड़ी वजह उनक सादगी भरी जीवन शैली थी। उ ह ने ता ़जंदगी शादी नह क । कां ेस के रा ीय अ य बनने से पहले उ ह ने त कालीन म ास सूबे म मु यमं ी और तिमलनाडु कां ेस के अ य का पद भी संभाला था।1 उ ह ने धीरे -धीरे कां ेस पाट के तं म अपनी जगह बनाई थी और एक मजबूत राजनीितक मुकाम हािसल कया था। कामराज तगड़े डीलडौल के वामी थे, और उनक मूंछ सफे द थ । एक प कार के मुतािबक वे ‘मश र बाॅ सर सनी िल टन और वालरस (आक टक सागर म पाए जाने वाले ऊदिबलाव जैसा एक जानवर) क ‘ ाॅस ीड’ जैसे दखते थे!’ एक मु े बाज क तरह ही वे श द के इ तेमाल म ब त ही कं जूस क म के थे। कसी अखबार ने िलखा था क कामराज को पूछे गए सारे सवाल का एक ही जवाब होता है - पर कालम...। तिमल के इस श द का मतलब था क - ‘हम देखते ह क या हो सकता है!’ कम बोलने क उनक आदत उनके िलए खासी फायदे वाली सािबत ई खासकर तब, जब पंिडत नेह क मौत के बाद उ ह पंिडतजी का उ रािधकारी खोजने क िज मेवारी उठानी पड़ी। उ ह अब पाट के लोग क राय लेनी थी और उनक ित या का अ ययन करना था। जवाहरलाल नेह क मौत के ठीक अगले ही दन यानी 28 मई से कामराज अपने िमशन पर लग गए। उ ह ने कां ेस पाट के मु यमंि य और संिडके ट के नाम से मश र दूसरे क ावर नेता से गहन राय-मशिवरा कया क पंिडतजी का यो य उ रािधकारी कौन हो सकता है। सबसे पहला नाम उभरकर जो सामने आ रहा था वो था मोरारजी देसाई का। देसाई, गुजरात से आते थे और सरकार म अपनी बेहतरीन शासक य ितभा का लोहा मनवा चुके थे। मोरारजी देसाई ने धानमं ी पद के िलए अपनी उ मीदवारी का खुलकर इजहार भी कया था। चार दन के दर यान कामराज, करीब दजन भर मु यमंि य से िमले और लगभग 200 सांसद से बातचीत क । इतने नेता से बातचीत के बाद जो बात सामने आ रही थी वो ये क मोरारजी देसाई एक िववादा पद पसंद हो सकते थे। उनके नाम पर आमसहमित नह बन पा रही थी। उनके आ ामक प से काम करने और मनमज फै सला लेने क शैली को लेकर पाट नेता म आपि यां थ । यादातर सांसद ने िजस नेता पर अपनी सहमित क थी वे थे लालबहादुर शा ी। शा ी भी एक कािबल शासक थे और पाट नेता के िलए आसानी से उपल ध भी थे। वे हंदी प ी से आते थे, ये बात भी उनके प म जाती थी। जीवन के अंितम दन म पंिडत नेह उन पर यादा से यादा िनभर रहने लगे थे, इस बात का भी पाट नेता म अपना अलग असर था। इन तमाम वजह ने कामराज के फै सले को भािवत कया जो खुद भी चाहते थे क नेतृ व प रवतन म एक िनरं तरता दखनी चािहए। पलड़ा, शा ी के प म झुक चुका था। मोरारजी देसाई को इस बात के िलए मनाया गया क वे धानमं ी पद के िलए अपनी दावेदारी वापस ले ल। 31 मई, 1964 को कां ेस कायसिमित ने लालबहादुर शा ी के नाम पर अपनी मुहर लगा दी। उसके अगले ही दन कां ेस संसदीय पाट ने शा ी को अपना नेता मान िलया और उसके एक दन बाद लालबहादुर शा ी को धानमं ी पद क शपथ दला दी गई। धानमं ी बनने के कु छ ही दन बाद शा ी ने अपनी धमक दखानी शु कर दी। मोरारजी देसाई को कै िबनेट से हटा दया गया य क वे नंबर-2 क पोजीशन के िलए दबाव दे रहे थे। पंिडत नेह क बेटी, इं दरा गांधी को कै िबनेट म लाने क मांग उठने लगी। लालबहादुर शा ी ने राजनीितक प रप ता और दूरद शता दखाते ए इं दरा गांधी को कै िबनेट म तो शािमल कर िलया, ले कन उ ह अपे ाकृ त कम मह व वाला सूचना और सारण मं लय ही दया गया। इसके जवाब म इं दरा गांधी ने शा ी के तीनमू त भवन म अपना िनवास थान बनाने क कोिशश म अड़ंगा डालना शु कर दया। तीनमू त भवन म पंिडत नेह बतौर धानमं ी रहा करते थे। इस जगह का अपना एक तीका मक मह व भी था। इं दरा गांधी ने ताव कया क उनके िपता के िनवास थल को मारक घोिषत कर दया जाए।2 लालबहादुर शा ी को धानमं ी पद के िलए चुन िलए जाने के बाद, कामराज ने ेस वाल से कहा क शा ी, सामूिहक नेतृ व के तहत शासन चलाएंगे। पंिडतजी के एकछ शासन क जगह अब सामूिहक नेतृ व ले लेगी। ले कन शा ी कु छ और ही सोच रहे थे, उ ह सामूिहक नेतृ व का िवचार मंजूर नह था। कु छ ही दन म धानमं ी सिचवालय नाम का एक नया कायालय बनाया गया, िजसम बड़े करीने से चुने ए भरोसेमंद अफसर को बहाल कया गया। इस कायालय का काम नीितगत मामल पर सरकार को सलाह देना था। ऊपर से तो ऐसा धानमं ी को शासन के बारीक मसल पर सलाह देने के िलए कया गया जो क अब नेह के कायकाल से यादा ज टल हो चुका था। ले कन इस कायालय ने धानमं ी को अपने मंि मंडल पर अ यिधक िनभरता से करीब-करीब मु कर दया।3 अब एक भरोसेमंद अफसर क टीम तैयार थी जो वतं और िन प थी। शा ी ने इस नए योग को अमली जामा पहनाकर सामूिहक नेतृ व क बात को एक हद तक भावहीन कर दया। भारत ने पंिडत नेह का उ रािधकारी खोज िलया था, ले कन कु छ इसी तरह का राजनीितक ामा नेह क मौत से ठीक पहले इं लड म खेला जा रहा था। वहां क कं जरवे टव पाट इस बात पर बुरी तरह बंटी ई थी क वहां के त कालीन धानमं ी मैि मलन का उ रािधकारी कसे चुना जाए। वामपंथी झान रखने वाले अखबार गा जयन ने मुखता से छापा क ि टेन क तुलना म भारत म लाख अिनि तता के बावजूद धानमं ी का चुनाव यादा पारदश और ग रमापूण ढंग से आ है।4 गा जयन के नई द ली संवाददाता ने द ली म लालबहादुर शा ी से मुलाकात क और उ ह ‘आ मिव ास से भरपूर, मजबूत नेता’ के तौर पर पाया जो ‘कम, पर ज री और मतलब क बात’ बोलता था, िजसका कोई भी श द ‘फालतू’ नह था।5 हालां क अभी भी स ातं म अं ेज के जमाने के पुराने लोग शा ी को लेकर उतने आशाि वत नह थे। एक आईसीएस अफसर ने दूसरे को प िलखा था क नेह क मौत ने मु क के भिव य को अिनि तता से भर दया है। उसने आगे िलखा - ‘मुझे नह लगता क शा ी चीज को संभाल पाएंगे। चीन और पा क तान क बात छोड़ भी दी जाए तो क मीर से लेकर क याकु मारी तक िनिहत वाथ त व सर उठा लगे िजसे शायद ही शा ी संभाल पाएं। तो या बड़े पैमाने पर हंद ु तान का हाल साइ स जैसा हो जाएगा...? हम कस तरह के अराजक व म रह रहे ह!’6 II पंिडत नेह क मृ यु के साथ ही क मीर मसले को सुलझाने के िलए उठाए गए उनके तमाम कदम भी बेमौत मर गए। हालां क देश के दूसरे छोर पर नगा िव ोिहय और भारत सरकार के बीच बातचीत क शु आत ज र हो गई। करीब एक दशक के खूनखराबे से िथत नागालड के बैप ट ट चच ने एक पीस िमशन क थापना क , िजसम भारत सरकार और भूिमगत िव ोिहय के भरोसे के लोग शािमल थे। िजन तीन लोग के नाम पर दोन प ने सहमित जािहर क , वे थे - असम के मु यमं ी बी.पी. चािलहा, याित ा सव दयी नेता जय काश नारायण और एंि लकन पादरी माइकल काॅट। ये माइकल काॅट वही पादरी थे िज ह ने नगा िव ोिहय के नेता ए.जेड. फजो को लंदन म शरण दलवाई थी। सन् 1964 क ग मय म ‘पीस िमशन’ ने नगा इलाक का दौरा कया। इस दौरान िमशन ने रा य सरकार और फे डरल रपि लक आॅफ नागालड’ के नुमांइद से गहन बातचीत क । आिखरकार दोन प ने यु िवराम के एक समझौते पर द तखत कए िजसे 6 िसतंबर, 1964 क सुबह, चच के घंटे क पहली आवाज के साथ लागू मान िलया गया। इसके ठीक दो स ाह बाद भारत सरकार और नगा िव ोिहय के बीच बातचीत क शु आत हो गई।7 कोिहमा से अपने एक िम को िलखे प म जय काश नारायण ने हालात का वणन कु छ इस तरह कया। उ ह ने कहा क ‘यूं तो नागालड म हालात बड़े ही अिनि त लगते ह ले कन यहां के लोग म एक थायी शांित क चाहत बल दखती है। यहां के लोग अब फर से खून-खराबे क वापसी नह चाहते।’ हालां क उ ह ने सरकार और िव ोिहय के बीच हो रही वाता क गित पर िनराशा जािहर क ।8 नगा िव ोिहय और सरकार के बीच ई बातचीत का रकाॅड ये दखाता है क दोन ही प एक दूसरे के सामने नामुम कन क म क शत के साथ खड़े थे। एनएनसी के नेता आइजेक वू ने वाता क शु आत ही ये कहते ए क क दोन ही प एक दूसरे के सामने दो सावभौम देश के प म बैठे ह। भारत सरकार के ितिनिध ने तुरंत इस बात का खंडन कया। भारत के िवदेश सिचव वाई.डी. गुंडिे वया ने कहा वे एक दूसरे से दो मु क के प म बातचीत नह कर रहे, बि क इितहास गवाह है क नागालड भारत का िह सा रहा है। इन दो पर पर िवपरीत तक के बीच जय काश नारायण और बी.पी. चािलहा ने वाता क गित के िलए साझा जमीन तलाशने क कोिशश क । चािलहा ने नगा क ये कहकर तारीफ क क ‘नागालड के िनवासी, दुलभ और उ यो यता ’ वाले लोग ह। उ ह ने उ मीद जािहर क क दोन ही प आपसी खाई को पाटने के िलए कोई न कोई रा ता ज र खोज लगे। जय काश नारायण ने कहा क समझौता िब कु ल संभव है य क दोन ही प के पास सचाई का कु छ न कु छ अंश मौजूद है। उ ह ने आगे कहा क अगर एक प सौ फ सदी सही हो या दूसरा िब कु ल ही सौ फ सदी गलत हो तो फर समझौता मुम कन नह है।9 नगा ारा आजादी क मांग ने इस मु क के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती पेश क वे ये थी क इसने एक एक कृ त भारत क प रक पना पर ही सवाल खड़ा कर दया। दूसरी तरफ चीन ारा सन् 1964 म परमाणु परी ण कर िलए जाने के बाद भारत के सामने एक दूसरी तरह क चुनौती पेश आ गई। चीन के परमाणु शि बन जाने पर देशभर म सुर ा को लेकर चंता क लहर दौड़ गई। सरकार पर यह दबाव बढ़ गया क भारत को भी परमाणु हिथयार हािसल करने चािहए। 24 अ टू बर, 1964 को परमाणु ऊजा आयोग के िनदेशक होमी जहांगीर भाभा ने आॅल इं िडया रे िडयो क एक वाता म बोलते ए दुिनया भर से एटमी हिथयार के खा मे क बात क । ले कन उ ह ने यह भी संकेत दया क अगर ज रत पड़ी तो भारत, आ मर ा के िलए एटमी हिथयार हािसल कर सकता है। डाॅ. भाभा ने कहा क दुिनया म ऐसी कोई भी तकनीक ईजाद नह ई है जो परमाणु हमले क सूरत म इस तरह के हिथयार को हवा म मारकर िगरा सके । इ ह रोकने का एक ही तरीका है क आप खुद परमाणु शि संप ह और पलटवार करने क मता रखते ह । इसके अलावा परमाणु हिथयार अपने से बड़े ताकतवर देश के हमले से बचाने का भी एक उपाय है। वाता म आगे डाॅ. भाभा ने एटमी हिथयार क लागत पर भी काश डाला। उ ह ने कहा क आज के हालात म 50 एटम बम बनाने के िलए तकरीबन 10 करोड़ पए खच ह गे जो कई मु क के र ा बजट क तुलना म काफ कम ह।10 डाॅ. भाभा क इस रे िडयो वाता ने देश म परमाणु हिथयार के प म माहौल तैयार करने का काम कया। खासकर उन राजनीित क मांग को इससे और भी बढ़ावा िमला जो देश म परमाणु अ िवकिसत करने क मांग कर रहे थे। ऐसे नेता म िवप ी जनसंघ के सांसद क तादाद सबसे यादा थी। देवास से चुनकर आए सांसद मचंद कछवाई ने लोकसभा म इस बावत एक ताव पेश कया। अपने भावशाली भाषण म कछवाई ने चीन को दु मन नंबर-1 घोिषत करते ए सरकार से मांग क क भारत को वे सारे हिथयार हािसल करने चािहए जो दु मन देश के पास ह। सन् 62 के लड़ाई क याद दलाते ए उ ह ने कहा क भारत को तब तक चैन से नह बैठना चािहए जब तक हम चीन ारा हड़पी गई एक-एक इं च जमीन वापस नह ले लेत।े कछवाई ने आगे कहा क भारत ारा परमाणु हिथयार हािसल कर लेने से दुिनया भर म मु क क ित ा म भी इजाफा होगा। इस मु े पर संसद म गमागम बहस ई। कु छ सांसद ने कछवाई का समथन कया तो कु छ ने ये कहकर िवरोध कया क इससे भारत क एक शांिति य देश के प म छिव भािवत होगी। धानमं ी लालबहादुर शा ी ने बहस म िह सा लेते ए कहा क एटम बम के पैरोकार ने डाॅ. भाभा क बात का सही मतलब नह िनकाला है। धानमं ी ने कहा क डाॅ. भाभा ने परमाणु िनश ीकरण के बारे म बात क थी जब क इसक लागत के बारे म दया गया उनका बयान अमे रका के संदभ म था। उ ह ने कहा क अमे रक परमाणु काय म का बुिनयादी ढांचा ब त ही मजबूत है, इसिलए वहां कम खच पर अित र बम बनाए जा सकते ह। शा ी ने कहा क अभी भारत के िलए परमाणु हिथयार बनाना आ थक दृि से उिचत नह है और ऐसा करके हम गांधी और नेह क परं परा से िवमुख भी हो जाएंगे। सबसे अहम बात थी क लालबहादुर शा ी ने ऐसी संक ण बात रा वादी दृि कोण से नह , बि क मानवजाित के ापक िहत के संदभ म कही थी। उ ह ने कहा क एटम बम दुिनया के वजूद के िलए खतरा ह और मनु यता के सामने एक सवाल है। जािहर तौर पर संसद म परमाणु हिथयार के मसले पर िवप ी सांसद यादा आ ामक थे और सरकार र ा मक। ले कन लोकसभा म कां ेसी सांसद के ब मत क वजह से िवप का ये ताव िगर गया क भारत को त काल परमाणु हिथयार हािसल करने चािहए।11 III नई द ली म राजपथ पर हरे क साल गणतं दवस का सरकारी आयोजन होता है। इस समारोह म हरे क ांत क अलग-अलग झांक िनकाली जाती ह, जो तोप और ब तरबंद गाि़डय से होड़ लेती ई जनता का आकषण ख चती ह। ले कन सन् 65 का गणतं दवस समारोह कु छ अलग क म का होना था। यह समारोह िसफ रा ीय गौरव का तीक भर नह था, बि क रा ीय एकता को मजबूत तरीके से पेश करने का ण भी था। (मामला हंदी को संघ क एकमा राजभाषा घोिषत करने से संबंिधत था।) दरअसल, देश क संिवधान सभा ने सन् 1949 म हंदी को देश क राजभाषा का दजा दान कया था। देश का संिवधान 26 जनवरी, 1950 को लागू आ और हंदी को भी उसी दन से लागू हो जाना था। ले कन पहले से अं ेजी म चल रहे तमाम कामकाज को 15 साल के िलए ेस पी रयड दान कया गया। इसके मुतािबक 26 जनवरी, 1965 तक क और रा य के बीच होने वाले प चार म हंदी के साथ-साथ अं ेजी के योग क छू ट दी गई थी। अब सन् 65 के गणतं दवस के दन वो िमयाद पूरी होने वाली थी, और हंदी एकमा राजभाषा बनने वाली थी। इस ावधान का ब त से लोग, खासकर दि ण भारत के राजनीित , एक अरसे से िवरोध करते आ रहे थे। साल 1965 म एके डमी आॅफ तिमल क चर ने एक ताव पास कया िजसम मांग क गई क क और रा य के बीच और एक रा य से दूसरे रा य के बीच होने वाले प चार म अं ेजी के इ तेमाल को जारी रखना चािहए। इस ताव पर द तखत करने वाल म शािमल थे - सी.एन. अ ादुरई, ई.वी. रामा वामी पे रयार और सी. राजगोपालाचारी। इस अिभयान के चार का िज मा मु य प से डीएमके ने संभाला था िजसने हंदी को गैर- हंदी भाषी रा य म थोपने के िवरोध म कई सभाएं क ।12 हालां क सन् 1962 के भारत-चीन यु के म ेनजर, डीएमके ने अपनी अलगाववादी नीित का प र याग कर दया था। अब उसे एक अलग मु क नह चािहए था, बि क वो तिमल सं कृ ित और भाषा क सुर ा क गारं टी चाहती थी। सी.एन. अ ादुरई डीएमके के सव नेता थे। अ ा (बड़े भाई) के नाम से मश र अ ादुरई ज मजात व ा थे, िज ह ने अपनी पाट को तिमलनाडु म एक मजबूत राजनीितक ताकत के प म थािपत कर दया था। अ ा क राय म हंदी, कसी भी दूसरी भारतीय भाषा क तरह ही एक े ीय भाषा थी। इसक कोई खास िवशेषता नह थी बि क यह कई भारतीय भाषा से भी िपछड़ी ई थी। उनक राय म हंदी, िव ान और तकनीक क पल-पल बदलती दुिनया म फट होने के लायक नह थी। हंदी के सवािधक लोग ारा बोले और समझे जाने के तक पर अ ा ने मजाक उड़ाते ए कहा था क अगर सं या बल ही पैमाना है तो मोर क जगह कौए को देश का रा ीय प ी बना लेना चािहए।13 हालां क देश के पहले धानमं ी जवाहरलाल नेह भाषा के पर काफ संवेदनशील थे। वे दि णी रा य और कु छ पूव और उ र-पूव रा य क भाषा संबंधी चंता से सहानुभूित रखते थे। सन् 1963 म नेह क सरकार ने संसद से आॅ फिशयल लै वज ए ट पास करवाया था िजसके मुतािबक 1965 के बाद भी अं ेजी का योग हंदी के साथ-साथ कया जा सकता था। हालां क सम या इससे भी ख म नह ई। धानमं ी ने साफ-साफ कहा था क ‘सकना’ श द का मतलब अं ेजी क िनरं तरता के संदभ म है जब क कु छ नेता ने इसका मतलब ये िनकाल िलया क अं ेजी के िबना भी काम चल सकता है।14 ऐसे माहौल म य - य 26 जनवरी, 1965 क तारीख नजदीक आने लगी हंदी िवरोधी आंदोलन जोर पकड़ने लगा। गणतं दवस से ठीक 10 दन पहले अ ादुरई ने धानमं ी शा ी को प िलखा िजसम कहा गया क उनक पाट हंदी को लागू कए जाने का दन शोक दवस के प म मनाएगी। ले कन मजे क बात ये थी क उ ह ने धानमं ी से ये भी आ ह कया क अगर हंदी को लागू करने क ितिथ एक स ाह के िलए बढ़ा दी जाए तो उनक पाट खुशी-खुशी गणतं दवस समारोह मनाएगी। लालबहादुर शा ी और उनक सरकार इस बात के िलए अिडग थी क 26 जनवरी, 1965 को हंदी लागू कर दी जाएगी। इसके जवाब म डीएमके ने तिमलनाडु म रा य ापी बंद का आ नान कर दया। तिमलनाडु के सैकड़ गांव म हंदी के पुतले जलाए गए और हंदी कताब क होली जलाई गई। हंदी से संबंिधत संिवधान के प तक को आग के हवाले कर दया गया। यही नह , रे लवे टेशन और डाकघर से भी हंदी के िच या तो हटा दए गए या उस पर कािलख पोत दी गई। तिमलनाडु के शहर और क ब म पुिलस और गु साए छा के बीच भीषण झड़प ।15 हंदी िवरोधी आंदोलन म आमतौर पर लोग क काफ भागीदारी रही। िवरोध के सभी तरीक , बंद, जुलूस, हड़ताल, धरना आ द का इ तेमाल कया गया। हं द ू अखबार ने इस आंदोलन पर कु छ इस तरह क सु खयां छापी कोय बटू र म पूण बंद वक ल अपने काम पर नह आए छा ने ज थ म भूख हड़ताल क मदुरई म शांितपूण बंद िव लूपुरम म लाठीचाज उतमापालयम म पुिलस ने आंसू गैस छोड़ी हंदी िवरोधी आंदोलन म िवरोध के कु छ ऐसे भी तरीके अपनाए गए जो िनजी क म के थे और िजसम कु छेक लोग ने बड़ी ही तकलीफदेह ढंग से अपनी जान तक दे दी। गणतं दवस के दन ही म ास म दो लोग ने अपने शरीर म आग लगाकर आ मह या कर ली। मरने वाल म से एक ने िलख छोड़ा क उसने तिमल भाषा के िलए अपने आपको कु बान कया है। उसके तीन दन बाद ित ची म एक बीस साल के युवक ने क टनाशक खाकर जान दे दी। उसने भी मरने से पहले िलखा क वो तिमल भाषा क र ा के िलए जान दे रहा है। इन शहादत से पूरे सूबे म लोग म उ ेजना फै ल गई और दजन हड़ताल और बिह कार के काय म कए गए। एक पुिलस अिधकारी ने बड़े ही िव तृत ढंग से इस आंदोलन का वणन कया, िजसने आंदोलन को दबाने से इं कार कर दया था। उसने िलखा क जब पुिलस कां टेबल क एक टीम ित पुर नामक क बे म आंदोलन को दबाने के िलए गई तो उसने पाया क तोड़फोड़ ख म हो चुक थी, ले कन उप व करने वाली भीड़ वह थी। भीड़ कु छ-कु छ उ सुक और कु छ-कु छ शांत सी थी। पुिलस के वाहन और जीप, गिलय म और तालुका कायालय के प रसर म जले पड़े ए थे। पुिलस टेशन पूरी तरह से ित त था, ांसमीटर उ टे पड़े थे, शीशे टू टे ए थे और बरामदे क घेरेबंदी टू टी ई थी। पुिलस थाने के भीतर कई िसपाही घायल पड़े ए थे और इं पे टर पीठ के बल लेटा आ था। उसे पेट म चोट आई थी। तोड़फोड़ करने आई भीड़ म से कु छेक क लाश यहां-वहां िबखरी पड़ी थी। एक ि क लाश पुिलस टेशन क सीि़ढय पर पड़ी थी तो दूसरी लाश पीछे क गली म पाई गई। एक तीसरी लाश बगल से बहती नदी के कनारे पाई गई, िजसे उसक नािभ के पास गोली मारी गई थी। उ मादी भीड़ उस लाश के पास नारे लगा रही थी िजसे पुिलस क एक राइफल पाट ने रोक रखा था। उस पुिलस अिधकारी ने िलखा है क असली गलती तब ई जब हंदी को जबद ती लागू करने के िखलाफ लोग के गु से को सही ढंग से समझा नह गया। नई द ली म सरकार म बैठे लोग ने इसे महज एक पुरातन क रपंथी भावना समझा, जब क सही मायन म यह एक े ीय उप-रा वादी आंदोलन था।16 हंदी िवरोधी आंदोलन क ती ता और ापकता से क क सरकार सकते म आ गई। ब त ज द ये साफ हो गया क स ाधारी कां ेस पाट इस मु े पर नीचे तक बंटी ई है। जनवरी के आिखर म कां ेस नेता के एक समूह क बंगलौर म एक बैठक ई िजसम हंदी ेमी लोग से अपील क गई क वे गैर- हंदी भाषी इलाक पर हंदी को थोपने क मांग छोड़ द। उ ह ने कहा क हड़बड़ी म हंदी को लागू करने से देश क अखंडता को खतरा हो सकता है। इस अपील पर द तखत करने वाल म से थे - एस. िनज लंग पा (मैसूर के त कालीन मु यमं ी), पि म बंगाल कां ेस कमेटी के अ य अतु य घोष, व र क ीय मं ी संजीवा रे ी और खुद कां ेस अ य के . कामराज। ठीक उसी दन, कां ेस के क ावर नेता मोरारजी देसाई ने इन नेता क अपील का जवाब दया। ित पित म एक ेसवाता को संबोिधत करते ए मोरारजी देसाई ने कहा क हंदी सीखकर तिमलभाषी लोग पूरे हंद ु तान म अपना भाव बढ़ा सकते ह। उ ह ने कहा क तिमलनाडु के कां ेसी नेता को लोग से हंदी िवरोध क अपनी गलती सुधारने क अपील करनी चािहए और उ ह अपने साथ लेना चािहए। मोरारजी देसाई ने खेद जािहर कया क हंदी को पचास के दशक म ही य नह राजभाषा का दजा दे दया गया। उ ह ने कहा क अगर ऐसा होता तो हंदी िवरोधी आंदोलन इतनी मजबूत श ल अि तयार नह कर पाता। देसाई ने कहा क िसफ हंदी ही भारत म संपक भाषा का काम कर सकती है, य क अं ेजी हमारी अपनी भाषा नह है। देसाई ने इस बात पर जोर दया क रा ीय एकता को मजबूत करने वाले इस कदम के रा ते म कोई भी े ीय भावना नह आनी चािहए।17 अब फै सला लेने क घड़ी आ चुक थी और खुद धानमं ी लालबहादुर शा ी को इस अहम िवषय पर फै सला लेना था। उनका दल हंदी के िलए धड़कता था ले कन उनके दमाग ने कहा क दूसरे प क बात भी सुननी चािहए। 11 फरवरी को म ास से दो क ीय मंि य के इ तीफे ने उनके हाथ बांध दए। उसी शाम आॅल इं िडया रे िडयो पर अपने संबोधन म धानमं ी ने उस समय घट रही घटना पर अपना दुख और िनराशा कट क । लोग के मन से गलतफहमी और म को दूर करने के िलए उ ह ने घोषणा क क पंिडत नेह के उस वादे का वो स मान करते ह िजसम उ ह ने अं ेजी क िनरं तरता क बात कही थी। उ ह ने कहा क अं ेजी तब तक जारी रहेगी जब तक लोग ऐसा चाहगे। इसके बाद धानमं ी शा ी ने देश के लोग को भाषा संबंधी चार आ ासन दए। पहला, हरे क ांत को ये पूरा अिधकार होगा क वो अपनी पसंद क कसी े ीय भाषा म या अं ेजी म कामकाज कर सकता है। दूसरा, एक रा य से दूसरे रा य के बीच होने वाला प चार या तो अं ेजी म होगा या फर कसी े ीय भाषा के साथ उसका मािणक अं ेजी अनुवाद दया जाएगा। तीसरा, गैर- हंदीभाषी रा य इस मामले म वतं ह गे क वे क के साथ अपना प चार अं ेजी म कर। इस संबंध म तब तक कोई प रवतन नह कया जाएगा जब तक गैर- हंदी भाषी रा य से सहमित नह ले ली जाएगी। चौथा, क सरकार के तर पर कामकाज क भाषा के प म अं ेजी का योग जारी रहेगा। अंत म शा ी ने पांचव ले कन सबसे मह वपूण घोषणा क क अिखल भारतीय तर पर िसिवल सेवा परी ाएं िसफ हंदी म न होकर अं ेजी म भी होती रहगी। ये घोषणा हंदी के पैरोकार क इस मांग से िब कु ल उलट थी, िजसम वे मांग कर रहे थे क अिखल भारतीय िसिवल सेवा परी ाएं िसफ हंदी म आयोिजत क जाएं।18 धानमं ी के रे िडयो संबोधन के एक स ाह बाद संसद म तिमलनाडु म ए हंदी िवरोधी आंदोलन पर ब त ही गमागम बहस ई। हंदी के समथक का कहना था क िज ह ने हंदी का िवरोध कया है वे संिवधान के िवरोधी ह और वा तव म देश के िवरोधी ह। उ ह ने कहा क हंसा के सामने सरकार के घुटने टेक देने क वजह से इस तरह क कई मांग सामने आएंगी और हंसा को बढ़ावा िमलेगा। तिमल सांसद ने इसके जवाब म कहा क वे लोग ‘ हंदी दै य’ के सामने पहले ही ब त सी कु बािनयां दे चुके ह। तिमल सांसद क बात का बंगाल के िजन दो क ावर नेता ने समथन कया उनम से एक थे, क युिन ट नेता हीरे न मुखज और दूसरे थे दि णपंथी नेता एन.सी. चटज । हीरे न मुखज ने कहा क हंदी के पैरोकार के मन म उन लोग के िलए गहरी नफरत और अवमानना का भाव है, जो हंदी नह बोलते ह। दूसरी तरफ एन.सी. चटज ने कहा क चूं क इस देश का सव यायालय और रा य के उ यायालय अं ेजी म अपना काम करते ह, इसिलए आज क तारीख म देश क याय णाली और याियक एक पता इस देश म सबसे बड़ी एक करण क शि है। एं लो इं िडयन सद य ऱक एंटोनी ने हंदी के पैरोकार क इस बात के िलए आलोचना क क वे असिह णुता, ह ला-हंगामा और हंदी थोपने क मानिसकता दशा रहे ह। जे.बी. कृ पलानी ने बहस म िह सा लेते ए बड़े ही िवनोदि य ढंग से कहा क हंदी के पैरोकार के िलए अब उ मीद क कोई करण नह है। उ ह ने कहा क अब तो भारतीय ब े भी अ मा या अ पा क जगह म मी और पापा ही बोलते ह! यहां तक क हम अपने कु से भी अं ेजी म ही बात करते ह! कृ पलानी ने ऱक एंटोनी के बयान पर ट पणी करते ए कहा क एंटोनी साहब गैरज री तरीके से अपनी मातृभाषा को लेकर चंितत ह। उ ह ने कहा क याद रिखये, इं लड म अं ेजी ख म हो सकती है, ले कन हंद ु तान म यह कभी ख म नह होगी!19 पचास के दशक म भाषा के संबंध म इस तरह क राजनीितक असमानताएं वाकई अ भुत ह! उस व भी एक लोकि य सामािजक आंदोलन क वजह से त कालीन धानमं ी को अपने घोिषत राजनीितक िवचार और पसंद से समझौता करना पड़ा था। पंिडत नेह भाषा के आधार पर रा य के गठन के िखलाफ थे जब क शा ी इस बात के कायल थे क संघ क एकमा राजभाषा हंदी हो। ले कन जब बड़े पैमाने पर इसका िवरोध शु आ और लोग अपनी जान देने पर उता हो गए तो दोन धानमं ी पुन वचार करने पर मजबूर हो गए। सन् 1953 म पो ी ीरामलू और 1965 म करीब दजनभर तिमल युवा के जान देने क घटना कु छ ऐसी ही बात थ । ता ुब क बात ये थी क दोन ही मामल म कां ेस संगठन, अपने सरकार क तुलना म िवप के साथ यादा खड़ा दख रहा था। पंिडत नेह क तरह ही लालबहादुर शा ी ने भी लचीला ख अपनाते ए ता कािलक ज रत के िहसाब से फै सला िलया। यह फै सला कां ेस पाट और देश क एकता को बचाए रखने के दृि कोण से े रत था। IV दि ण भारत क चचा को यहां थोड़ा सा िवराम देकर उ र के रा य क मीर क चचा कर, जो आजाद भारत के इितहास म शु से ही िववाद म रहा है। 1965 के माच महीने म शेख अ दु ला धा मक या ा के उ े य से म ा को रवाना ए। शेख अ दु ला, लंदन के रा ते म ा गए जो अपे ाकृ त लंबा रा ता था। लंदन म उनका एक बेटा रहता था। शेख अ दु ला को धानमं ी शा ी ने सुधीर घोष से कहलवाया था क क मीर घाटी के िलए सबसे बेहतर उपाय यही है क वो भारतीय संघ के दायरे म वाय ता ले ले। सुधीर घोष रा यसभा सांसद थे और कभी गांधीजी के सहयोगी रहे थे। घोष को ऐसा लगा क शेर-ए-क मीर शेख अ दु ला धीरे -धीरे इस ताव के कायल हो रहे ह। उ ह ने भारत के पुराने िम और सोसाइटी आॅफ स के सद य होरे स अले जडर को खत िलखा क लंदन म शेख अ दु ला क गितिविधय पर िनगाह रख। घोष को लगा क लंदन म अित उ साही ि टश अखबार के दबाव म अगर शेख ने कु छ आ ामक बयान दे दए तो क मीर सम या के समाधान क ूण ह या हो जाएगी। सुधीर घोष मानते थे क शेख क एकाध गलत ट पणी, कां ेस के उन त व को भड़काने के िलए काफ होगी जो क मीर सम या के िलए शेख को िज मेदार मानते थे और उ ह ठकाने लगाने क बात करते थे।20 ऐसा लगता है क शेख अ दु ला ने अपने इं लड दौरे के दौरान ऐसा कु छ भी नह कहा जो भारत के िहसाब से अि य हो। वे वहां से सीधे म ा क ओर रवाना ए और वापसी के समय अि जयस म के । यहां उ ह ने एक भारी गलती क । यहां उ ह ने वो काम कया, जो उनके कसी ि टश अखबार म कु छ भी बयान दे देने से यादा खतरनाक था। अि जयस म शेख ने चीन के धानमं ी चाउ एन-लाई से मुलाकात कर ली, जो उस व अि जयस म ही थे। दोन के बीच या बातचीत ई ये कभी पता नह चल पाया, ले कन ये साफ था क उ ह ने दु मन देश के धानमं ी के साथ बैठक क है। ऐसा माना गया क शेख अ दु ला ने चीनी धानमं ी के साथ एक वतं क मीर के मसले पर बातचीत क । (ये मामला कु छ वैसा ही था जब 1953 म उ ह ने अडलाई टीवसन के साथ मुलाकात क थी)। उस व महज चार महीन के अंदर शेख को िगर तार कर जेल भेज दया गया था। इस बार वे य ही हंद ु तान लौटे, द ली के पालम हवाईअ े पर ही उ ह िगर तार कर िलया गया। उ ह द ली के एक सरकारी बंगले म लाया गया और फर दि ण के पहाड़ी शहर कोडईकनाल भेज दया गया। वहां शेख अ दु ला को एक बि़ढया से काॅटेज म रखा गया, जहां से पहाड़ का दृ य बड़ा ही साफ दखता था। यूं, ये वैसे बड़े पहाड़ भी नह थे जैसे क क मीर म आ करते थे और ये उतने नजदीक भी नह थे। अ दु ला के शहर क यूिनिसपैिलटी क सीमा से बाहर जाने पर पाबंदी थी और न ही वे िबना आिधका रक इजाजत के कसी से िमल ही सकते थे। शेख अ दु ला क िगर तारी क खबर का संसद के दोन सदन ने जोरदार वागत कया। ऐसा माना गया क शेख ने देश से ग ारी क है। शेख का कसूर िसफ इतना ही नह था क उ ह ने चीनी धानमं ी से मुलाकात क थी, बि क एक ऐसे व जब पा क तान फर से सीमा पर उप व करने क तैयारी कर रहा था, शेख ने वाकई अ छा नह कया। जब शेख अपनी धा मक या ा पर म ा जा रहे थे, उसी समय क छ के रण म भारत और पा क तान म िभड़ंत हो गई। ये िभड़ंत एक नमक पाए जाने वाले दलदली े (सा ट मास) के मु े पर ई थी, िजस पर दोन देश ने दावा कया था। अ ैल के पहले स ाह म दोन ही तरफ से गोलाबारी ई। पा क तािनय ने सफलतापूवक अमे रक तोप का इ तेमाल कया और भारत को करीब चालीस मील तक सूखी जमीन क तरफ पीछे हटना पड़ा। दोन तरफ से काफ तीखे प चार के बाद आिखरकार दोन ही प ि टश म य थता अधीन अंतरा ीय समझौते के िलए तैयार हो गए।21 यु ो माद के ऐसे माहौल म जो श स सबसे यादा दुखी था, उसका नाम था होरे स अले जडर। उ ह ने इं दरा गांधी से इस मु े पर प चार कया। जवाब म इं दरा गांधी ने होरे स अले जडर को िबगड़ते अंतरा ीय हालात के म ेनजर क मीर के बारे म कु छ यूं िलखा। इं दरा गांधी ने िलखा क शेख साहब िजस बात को नह समझ रहे ह वो ये है क भारत पर चीनी हमले के बाद और सीमा पार पा क तान क संदह े ा पद गितिविधय के बाद क मीर क ि थित िब कु ल बदल गई है। चूं क सूबे क सीमाएं चीन, सोिवयत संघ, पा क तान और भारत से िमली ई है, इसिलए मौजूदा अंतरा ीय माहौल म आजाद क मीर का मतलब होगा एक नए संघष और कलह का क बनाना। इं दरा गांधी ने आगे िलखा क ऊपर िजन देश का नाम आया है, उनके अलावा एक आजाद क मीर अमे रका और इं लड क भी जासूसी गितिविधय का अ ा बन जाएगा।22 अ दु ला क िगर तारी और क छ म भारत-पा क तान संघष से पा क तान के रा पित अयूब खान कु छ यादा ही उ सािहत हो गए। उ ह ने योजना बनाई क क मीर म आंत रक िव ोह करवाकर और भारत के िखलाफ लड़ाई छेड़कर क मीर को पा क तान म िमला िलया जाए। उनक योजना म ये भी शािमल था क क मीर म आंत रक िव ोह क सूरत म भारत अंतरा ीय म य थता मानने को मजबूर हो जाएगा और उसे क मीर छोड़ना पड़ेगा। सन् 65 क ग मय के आिखर तक पा क तानी सेना ने आॅपरे शन ‘िज ा टर’ क तैयारी शु कर दी, िजसका नामकरण म यकालीन पेन पर उ र-पि मी अ का के मुसलमान क िवजय के उपल य म कया गया था। पा क तानी सेना ने बड़े पैमाने पर क मीरी आतंकवा दय को छोटे हिथयार चलाने क े नंग दी और उनका नामकरण इ लामी इितहास के महान यो ा मसलन सुलेमान, सलाउ ीन आ द के तौर पर कया गया।23 अग त के पहले स ाह म पाक सेना के कु छ अिनयिमत लड़ाका ने क मीर म यु िवराम क सीमारे खा को पार कर िलया। उनका इरादा पुल और सरकारी इमारत को उड़ाना था और घाटी के आमलोग म म क ि थित पैदा कर उ ह बगावत के िलए उकसाना था। रे िडयो पा क तान चार कर रहा था क क मीर घाटी म बड़े पैमाने पर िव ोह शु हो गया है। जब क हक कत ये थी क घाटी के आमलोग म इन घुसपै ठय को लेकर कोई उ साह नह था, बि क लोग ने कु छ घुसपै ठय को पकड़कर पुिलस के हवाले कर दया।24 घाटी म जब उ मीद के उलट बगावत क कोई हलचल नह दखाई दी, तो पा क तान ने आॅपरे शन ‘ ांड लैम’ के नाम से अपना रजव लान शु कर दया। पा क तानी सेना ज मू से टर म िनयं ण रे खा पार कर गई और तेजी से आगे बढ़ी। उसने भारतीय ठकान पर मोटार और तोप से भारी गोलाबारी क । भारत ने पा क तानी हमले का करारा जवाब दया और उड़ी से टर म हाजी पीर के दर पर क जा करने म कामयाब हो गया। हाजी पीर, रणनीितक प से काफ मह वपूण था, य क यहां से घुसपै ठय पर िनगाह रखी जा सकती थी।25 िसतंबर क पहली तारीख को पा क तान ने छा ब म भारी हमला कया। अमे रक पैटन टक के दो रे िजमट के साथ एक पूरा का पूरा इं फ ी िडिवजन भारतीय सीमा म घुस आया। पा क तािनय का हमला इतना तेज था क भारतीय सेना भौच रह गई। पा क तािनय ने अगले चौबीस घंट म लगभग तीस वगमील जमीन पर क जा कर िलया। उनका इरादा अखनूर के पुल पर क जा करने का था ता क ज मू-क मीर और पंजाब के बीच संपक को काटा जा सके । आिखरकार भारत ने वायुसेना से पलटवार कया और भारतीय वायुसेना के तीस बमवषक जहाज दु मन पर आग बरसाने लगे। भारतीय वायुसेना ने वै पायर यु क िवमान का इ तेमाल कया, िजसके जवाब म पा क तान ने सेबर जेट का इ तेमाल कया। 5 िसतंबर तक भारतीय प क हालत खराब होने लगी य क पा क तान ने अखनूर पर भारी दबाव बना रखा था। इस दबाव से छु टकारा पाने के िलए भारत ने लड़ाई का नया मोचा खोल दया। 6 िसतंबर क सुबह भारतीय सेना के कई रे िजमट भारी तोप के साथ पंजाब क तरफ से पा क तानी सीमा म घुस गए। भारतीय सेना बड़ी तेजी से लाहौर क तरफ बढ़ी। पा क तान क सरकार सकते म आ गई। बड़ी हड़बड़ी म पा क तान ने सेना क टु कि़डय और तोप को क मीर सीमा से हटाकर पंजाब क सीमा पर तैनात कया। पंजाब के खेत म भारत और पा क तान के बीच भीषण लड़ाई ई। कु छ जानकार क राय म ि तीय िव यु के बाद तोप क ऐसी लड़ाई शायद कह नह ई थी। दोन देश एक-एक इं च जमीन के िलए लड़े। कई बार ये लड़ाई बंजर जमीन पर ई तो कई बार ग े के खेत यु के मैदान म त दील हो गए। भारतीय सेना ने असल उटर के आसपास पा क तानी सेना का पूरी तरह सफाया कर दया ले कन खेमकरण पर फर से क जा करने क उनक कोिशश बुरी तरह नाकाम ई। ि तीय िव यु म भाग ले चुके भारतीय सेना के कमांडर ने कहा क उसने इतनी तादाद म तोप को न होते ए नह देखा था। तोप लड़ाई के मैदान म ऐसी पड़ी थ जैसे ब ारा छोड़े गए िखलौने 26 ह। बमवषक यु क िवमान आसमान से दु मन के ऊपर गोले बरसा रहे थे। दोन प क तरफ से सैकड़ -हजार टन बा द एक दूसरे के ऊपर िगराए गए। ले कन उनम से कु छ बम तो फटे भी नह । एक भारतीय शोधकता ने िलखा क सौभा य से या दुभा य से कु छ बम इसिलए नह फटे य क वे पुराने हो चुके थे और दोन ही प को कसी एक ही ोत से स लाई कए गए थे!27 जैसे-जैसे लड़ाई उ होती गई चीन ने पा क तान के समथन म बयान देना शु कर दया। 4 िसतंबर को चीनी माशल चेन यी ने कराची का दौरा कया और भारत ारा िनयं ण रे खा पार कर सा ा यवादी नीित अपनाने क आलोचना क । चीनी माशल ने पा क तान सरकार ारा भारतीय हमल को रोकने के िलए क गई कारवाई को भी सही ठहराया। इसके ठीक तीन दन बाद चीन ने एक बयान जारी कया क भारत अभी भी चीन के बड़े िह से पर क जा कए बैठा है। इसके अगले ही दन चाउ एन-लाई ने कहा क भारत का आ ामक ख एिशया के इस े म शांित के िलए एक बड़ा खतरा है।28 इधर द ली म लोग के मन म रा भि क भावना िहलोर मार रही थी। हर रोज होने वाली ेसवाता म प कार सरकारी व ा से सवाल करते क या लाहौर हवाईअ े का पतन हो गया? या वहां का रे िडयो टेशन हमारे क जे म आ गया है? सचाई यह थी क लाहौर पर क जा नह हो पाया और य नह आ ये अभी तक िववाद का िवषय है। भारतीय प का कहना था क लाहौर शहर पर क जा कभी भी भारत के एजडे म नह था। शहर पर क जे का मतलब होता... एक पूरी क पूरी दु मन आबादी वाले शहर म घर-घर तलाशी अिभयान चलाना, जो वाकई जोिखम भरा था। दूसरी तरफ पा क तािनय ने कहा क पा क तान के बहादुर िसपािहय ने भारतीय सेना य के उस मंसूबे पर पानी फे र दया िजसम उ ह ने कहा था क वे लाहौर के िजमखाना लब म शाम को जाम से जाम टकराएंगे।29 भारत और पा क तान के बीच हो रहे यु ने दुिनया क महाशि य को चंितत कर दया और 6 िसतंबर को संयु रा सुर ा प रषद इस मु े पर िवचार करने के िलए बैठी। संयु रा महासिचव यू थांट ने दोन देश का दौरा कया और उ ह एक यु िवराम के समझौते पर ह ता र करने के िलए राजी कर िलया। समझौता करना थोड़ा आसान इसिलए भी लग रहा था य क पंजाब े म दोन ही प बराबरी क लड़ाई लड़ रहे थे। 22 िसतंबर, 1965 को आिखरकार लड़ाई ख म हो गई। 1965 का भारत-पाक यु मु यतः उ र-पि मी भारत के दो े , क मीर और पंजाब म लड़ा गया था। कु छ िछटपुट झड़प संध म भी ई थ ले कन पूव सीमा पर शांित बनी रही जो बंगाल को दो िह स म बांटती थी। अ य दूसरी लड़ाइय क तरह ही, दोन ही प ने अपनी-अपनी जीत का दावा कया। दोन ही प ने दु मन क ित के बारे म बढ़ा-चढ़ाकर कहा जब क अपनी ित को कम करके बताया। सचाई ये थी क ये लड़ाई एक बराबरी क लड़ाई जैसी थी। एक वतं जानकार क राय म पा क तान ने करीब 3000 से 5000 जवान खोए, उसके लगभग 250 टक और 50 बमवषक जहाज न ए। दूसरी तरफ भारत ने करीब 4000-6000 जवान खोए, जब क भारत के करीब 300 टक न ए और उसे भी करीब 50 बमवषक जहाज से हाथ धोना पड़ा। चूं क भारत क आबादी और सेना काफ बड़ी थी, इसिलए भारत के िलए इस ित को बदा त करना यादा आसान था।30 पि मी देश म यादा पढ़ी जाने वाली पि का रीडस डाइजे ट ने इस यु का बड़ा ही मम पश िच ण ि या। रीडस डाइडे ट ने िलखा क भारतीय और पा क तानी िसपािहय के खून पंजाब के खेत और क मीर; क पहाि़डय पर िबखरे पड़े ह। डयाड कप लंग के उप यास कम; के अमर हाइवे ांड ंक रोड पर िसपािहय क लाश पड़ी ई ह और आसमान म िग के झुंड च र काट रहे ह। भयभीत िव थािपत लोग का झुंड एक घेरा बनाकर अपने घर क ओर धीरे -धीरे बैलगाड़ी के साथ चल रहा है।31 V 1965 के भारत-पाक यु से पहले लालबहादुर शा ी और अयूब खान क कराची म एक बार मुलाकात हो चुक थी। ये मुलाकात सन् 1964 म ई थी जब शा ी, कािहरा से भारत लौटते व कराची म के थे। दोन नेता क एक त वीर उपल ध है िजसम फौजी पृ भूिम के अयूब खान सूट म नजर आते ह और लंबाई म थोड़े छोटे, गांधीवादी लालबहादुर शा ी धोती म। उस मुलाकात म अयूब खान, लालबहादुर शा ी से िब कु ल ही भािवत नह ए थे। उ ह ने अपने एक सहयोगी से कहा था, ‘अ छा, यही आदमी है, जो नेह का उ रािधकारी बना है!’32 इस बात म कोई संदह े नह क पा क तानी नेतृ व ने भारत के पलटवार करने क मता को ब त ही कम करके आंका था। दरअसल, पा क तानी मरान ने ब त ही हड़बड़ी म आॅपरे शन िज ा टर क तैयारी क थी। इसक वजह ये थी क वे क छ के रण म ई िभड़ंत से ब त ही उ सािहत हो गए थे िजसम भारतीय ितरोध ब त आ ामक नह था।33 जून, 1965 म पा क तानी अखबार डाॅन ने वहां के एक आला अिधकारी का लेख छ न◌ाम से छापा था िजसम भारतीय सैिनक टु कि़डय क तैनाती क रणनीितक ा या क गई थी। इस लेख म ये कहा गया क पा क तान क रणनीित, िस बाॅ सर मोह मद अली के नाॅकआउट टाइल क तरह होनी चािहए, िजसम दु मन पर ताबड़तोड़ हार कर जीत हािसल क जाती है।34 पा क तानी सेना के एक गु िनदश म ये कहा गया क अगर सही व और सही जगह पर घातक हार कया जाए तो सामा यतया हंद ू आ मिव ास ब त ज द टू ट जाएगा।35 दरअसल सन् 65 क लड़ाई, पा क तानी मुसलमान ारा काफ सोच-समझकर चलाया जाने वाला धा मक दृि कोण का एक अिभयान था, जो अपने क मीरी िबरादरान के िलए चलाया गया था। दिसय शता दी पहले क लड़ाइयां, उसक जीत और हार क याद को उभारा जा रहा था। पा क तान के क रपंथी सोच रहे थे क इ लामी जुनून और अमे रक हिथयार क बदौलत का फर का सफाया कया जा सकता है।36 उ ह ये पूरी उ मीद थी क क मीर के लोग बड़े पैमाने पर बगावत करगे और दु मन के सारे संपक सू काट डालगे। क रपंिथय को ये भी उ मीद थी क इसके बाद पा क तानी सेना और टक, ांड ंक रोड होते ए सीधे द ली तक प च ं जाएंगे और 37 भारतीय को एक िज लत भरी हार नसीब होगी। पा क तानी िसपािहय क जुबान पर ‘हंस के िलया है पा क तान, लड़कर लगे हंद ु तान’ जैसे गीत िथरक रहे थे। ले कन जैसे ही भारत पर पा क तान का हमला आ, भारतीय म एकता क भावना और भी मजबूत हो गई। क मीर के ब त सारे लोग पा क तानी घुसपै ठय के िखलाफ भारतीय सेना के साथ खड़े हो गए। के रल से ता लुक रखने वाले एक भारतीय मुि लम िसपाही को भारत के सव सैिनक स मान परमवीर च से नवाजा गया। राज थान से आने वाले एक दूसरे मुसलमान िसपाही, िजसका नाम भी संयोग से अयूब खान ही था, ने उस लड़ाई म कई पा क तानी टक को व त कया। हंद ु तान भर म मुसलमान बुि जीिवय और धमगु ने मु क पर ए हमले के िलए पा क तान क आलोचना क और मादरे वतन के नाम पर कु बान हो जाने क वािहश जािहर क ।38 दरअसल, पा क तान के सैिनक शासक अयूब खान और उनके सहयोगी सन् 62 म भारत क चीन के हाथ ई हार से खासे उ सािहत थे। ले कन वो लड़ाई िहमालय क बफ ली और फसलन भरी घा टय म ई थी, जब क पा क तान के साथ ई लड़ाई ऐसे इलाके म हो रही थी, िजससे भारतीय सेना ब त अ छी तरीके से वा कफ थी। सन् 65 क लड़ाई क कमान ऐसे सैिनक कमांडर के हाथ थी, िज ह ने अपनी पहली तर ि तीय िव यु म सपाट जमीन पर तोप क लड़ाई म ही पाई थी। इसके अलावा भारतीय ने चीन के हाथ 62 क लड़ाई म ई करारी हार से भी सबक सीखा था। अब भारतीय सेना पहले क तुलना म यादा बि़ढया हिथयार से लैस थी। भारत के नए र ा मं ी वाई.वी. च नान ने सन् 1964 म भारतीय सुर ातं को मजबूत बनाने के िलए पि मी देश और पूव सोिवयत गुट के देश का तूफानी दौरा कया था। भारत ने इन देश से बड़े पैमाने पर टक, हवाई जहाज, बंदक ू और पनडु ि बयां खरीदी थ ।39 कृ ण मेनन क तुलना म (जो 1962 म चीन से यु के व र ामं ी थे) र ामं ी वाई.वी. च नान क भारतीय सेना म खासी इ त थी। च नान, कृ ण मेनन नह थे, और जब यु संचालन क बारी आई तो लालबहादुर शा ी, पंिडत नेह से यादा भावी सािबत ए। हालां क, िनि त तौर पर शा ी भी शांित के बड़े पैरोकार म से थे जैसा क उ ह ने क छ के रण म ए भारत-पाक संघष के बाद अपने एक दो त को िलखा भी था। उनका कहना था क भारत और पा क तान के बीच जो भी सम याएं ह उसे एक-एक कर आपसी सहमित से बातचीत के ारा सुलझाया जा सकता ह। उ ह ने उ मीद जािहर क थी क हमारे िववाद और हमारी लड़ाइयां इस तर तक न प च ं े क 40 यु आव यक हो जाए। ले कन जब यु दरवाजे पर द तक देने लगा तो उ ह ने फै सला लेने म देरी नह क । उ ह ने अपने कमांडर के साथ व रत सलाह-मशिवरा कया और सेना को पंजाब सीमा क तरफ से पा क तान म घुसने क इजाजत दे दी। (जब क कु छ ऐसे ही हालात म सन् 62 म जब नेह से कहा गया क जमीन पर चीन के दबाव को कम करने के िलए एयरफोस के इ तेमाल क इजाजत दी जाए तो नेह ने साफ मना कर दया था।) और जब लड़ाई ख म हो गई, तो क जा कए गए पा क तानी पटन टक के ऊपर धोती और कु त म त वीर खंचवाने म भी उ ह कोई िहचक नह ई। उ ह ने खुशी-खुशी वो त वीर खंचवाई। ये हावभाव का एक ऐसा दशन था जो पंिडत नेह शायद ही कर पाते। ले कन इसके बावजूद कम से कम एक मामले म लालबहादुर शा ी िब कु ल नेह क ही तरह थे। वे भी राजनीित और धम को अलगअलग रखने के बड़े िहमायती थे। यु िवराम के कु छ ही दन बाद जब देश म रा भि क भावना उफान पर थी, शा ी ने द ली के रामलीला मैदान म एक भाषण दया। अपने इस भाषण म धानमं ी ने बीबीसी क एक रपोट को आड़े हाथ िलया िजसम कहा गया था क चूं क लालबहादुर शा ी हंद ू ह, इसिलए वे पा क तान के साथ लड़ाई के िलए तैयार रहते ह। शा ी ने इसके जवाब म कहा क ये सही है क वे हंद ू ह, ले कन इस सभा क अ य ता करने वाले मीर मु ताक मुसलमान ह और क एंटोनी िज ह ने इससे पहले लोग को संबोिधत कया है, ईसाई है। इस सभा म कई िसख और पारसी भी मौजूद ह। हमारे मु क के बारे म सबसे खास बात ये है क हमारे यहां हंद,ू मुसलमान, िसख, ईसाई, पारसी और दूसरे कई अ य धम के लोग रहते ह। हमारे देश म हजार क तादाद म मं दर, मि जद, गु ारा और चच ह। ले कन हम इसे कभी भी िसयासत म नह लाते... और यही भारत और पा क तान के बीच असली अंतर है। पा क तान, अपने आपको इ लामी रा य मानता है और मजहब को एक िसयासी हिथयार के प म इ तेमाल करता है, हम हंद ु तानी कसी भी मजहब को मानने और उसक उपासना करने क आजादी रखते ह। जहां तक राजनीित का संबंध है, हमम से हरे क उतना ही हंद ु तानी है िजतना क कोई दूसरा।41 VI सन् 65 क लड़ाई के व धानमं ी लालबहादुर शा ी ने ‘जय जवान, जय कसान’ का नारा दया था। गांधीवादी अ हंसा और शांित के साए म आजादी पाए एक मु क के िलए सेना के जवान को सलाम करना ज र खास बात थी। उसी तरह क खास बात थी कसान को सलामी देना, खासकर एक ऐसे मु क म िजसे आजादी के बाद ला ट फनस और पन िबजली प रयोजना को पूजा करने क नसीहत दी गई थी। धानमं ी बनने के बाद शा ी ने जो पहला काम कया वो ये था क उ ह ने बजट म कृ िष के िलए यादा रािश का आवंटन कया। वे िपछले कु छ साल से देश म अनाज उ पादन म कमी को लेकर काफ चंितत थे। हाल ही म अनाज उ पादन क वृि दर, आबादी क वृि दर के करीब प च ं ी थी। ऐसे म अगर बा रश धोखा दे देती, तो पूरे देश म अफरा-तफरी मच जाती थी और अनाज क जमाखोरी बढ़ जाती थी। सरकार को अनाज क कमी वाले इलाक म अनाज क आपू त करनी पड़ती। भारत 1964 और 65 म सूखे का सामना कर चुका था। इस सम या के थायी िनदान के िलए लालबहादुर शा ी ने सी. सु यम को खा और कृ िष मं लय का िज मा स पा। सन् 1910 म सु यम का ज म एक कसान प रवार म आ था और उ ह ने साइं स और कानून म िड ी हािसल क थी। वे आजादी क लड़ाई म भी शरीक ए थे और उससे पहले वकालत के पेशे म थे। वे संिवधान सभा के सद य भी रहे थे और क ीय मंि प रषद म शािमल होने से पहले वे म ास ांत म स मािनत मं ी रह चुके थे। सु यम को ती ण बुि का और आ ामक कायशैली का माना जाता था। यही वजह थी क पंिडत नेह ने उ ह िति त माने जाने वाले इ पात और खनन मं लय का िज मा स पा था। वाकई इ पात मं लय से कृ िष मं लय म उनका आना एक बड़े प रवतन का सूचक था।42 सु यम बड़े ही जोशो-खरोश के साथ अपने नए काम म जुट गए। उ ह ने कृ िष िव ान के पुनसगठन, कृ िष वै ानक के काम क ि थित म सुधार और उनके वेतनमान को तकसंगत बनाने पर यान क त कया। इसके साथ ही उ ह ने वै ािनक के काम म नौकरशाह क दखलअंदाजी को भी कम करने क कोिशश क । उनके कायकाल म सुसु सं था मानी जाने वाली भारतीय कृ िष अनुसंधान प रषद को नई जंदगी और पहचान िमली। आईसीएआर (इं िडयन काउं िसल आॅफ ए ीक चर रसच) को स य करने के अलावा सु यम ने रा य सरकार को कृ िष िव िव ालय खोलने के िलए ो सािहत कया ता क े िवशेष के िहसाब से अलग-अलग फसल पर शोध कया जा सके । उ ह ने ायोिगक खेती भी शु क और उ त क म के बीज के उ पादन के िलए भारतीय बीज िनगम क थापना क । भारतीय बीज िनगम का काम बड़े पैमाने पर उ त क म के बीज का उ पादन करना था, िजसका इ तेमाल सरकार ारा तािवत सघन कृ िष म होना था। कृ िष सुधार के इस ापक और अहम काम म सु यम के जो दो मु य सहयोगी थे वे भी तिमल ही थे। एक थे कृ िष सिचव बी. िशवरामन और दूसरे थे वै ािनक एम.एस. वामीनाथन। एम.एस. वामीनाथन, शोधकता क उस टीम का िनदशन कर रहे थे जो मैि सकन गे ं को भारतीय प रि थय म उगाने का यास कर रही थी। इसी शोध के इद-िगद कृ िष सुधार क नई योजनाएं काम कर रही थ । दलच प बात ये थी क गे ,ं मु यतः देश के उ री िह स म उगाया जाता है जब क भारत क कृ िष सुधार नीित के तीन सू धार सुदरू दि णी सूबे से ता लुक रखते थे!43 फर भी, जब तक देश खा उ पादन म स म नह हो जाता तब तक सरकार के िलए खा सुर ा क गारं टी करना ज री था। भारत के िलए खा सहायता ा करने के िलए सु यम ने अमे रका का दौरा कया। उ ह ने अमे रका के रा पित लंडन जाॅनसन से मुलाकात क और उ ह भािवत करने म कामयाब रहे। सु यम ने अमे रका के कृ िष मं ी ओरिवल मैन से नजदी कयां बढ़ा और साल 1965 म मैन और सु यम ने रोम म एक कृ िष संबंधी समझौते पर द तखत कए। इस समझौते के मुतािबक भारत, कृ िष म िनवेश बढ़ाने, ामीण ऋण व था म सुधार लाने और उवरक के उ पादन और उपभोग को बढ़ाने पर राजी हो गया। बदले म अमे रका ने भारत को लंबी अविध व कम याज दर के कई कज दए और गे ं क आपू त करने पर राजी हो गया। अमे रका ारा गे ं क आपू त से भारत को खा ा सम या से ता कािलक राहत िमली।44 इधर सु यम, अमे रका के साथ कृ िष और खा ा से संबंिधत, रोम क संिध कर रहे थे तो दूसरी तरफ उनके धानमं ी माॅ को जाने क तैयारी कर रहे थे, जहां उ ह एक समझौते पर द तखत करना था। ये समझौता उनके पा क तानी समक अयूब खान के साथ होने वाला था। भारत-पा क तान के बीच ई जंग के बाद सोिवयत संघ ने दोन देश के बीच शांित समझौता करवाने का ताव कया था। सन् 66 क जनवरी के पहले स ाह ताशकं द म लालबहादुर शा ी और अयूब खान क मुलाकात ई। इस शांित वाता म सोिवयत संघ के धानमं ी अले सी कोसीिगन म य थता कर रहे थे। एक स ाह क कड़ी सौदेबाजी के बाद दोन ही प समझौते के नजदीक आए ले कन दोन ही प को अपनी उस मांग से हटना पड़ा, िजसके िलए वे सबसे यादा अड़े ए थे। पा क तान को क मीर मसले के अंतरा ीय समाधान क मांग छोड़नी पड़ी, जब क भारत को यु म जीते गए कु छ रणनीितक प से मह वपूण ठकान से पीछे हटने के िलए राजी होना पड़ा। इनम वो हाजी पीर का दरा भी शािमल था, जहां से घुसपै ठय पर िनगाह रखी जा सकती थी। ताशकं द समझौते से यह तय आ क दोन ही प अपने सैिनक को 5 अग त, 1965 क ि थित तक पीछे हटा लगे। इसके अलावा इस समझौते म यु बं दय क अदला-बदली, राजनियक संबंध क पुनबहाली और भिव य के कसी भी िववाद म ताकत के इ तेमाल न करने क बात वीकार क गई।45 ताशकं द समझौते पर 10 जनवरी, 1966 क दोपहर को द तखत कया गया, और उसी रात लालबहादुर शा ी क सोते व दय गित कने से मृ यु हो गई। 11 जनवरी को उनका शव एक सोिवयत िवमान से नई द ली लाया गया। उसके अगले दन उनका शरीर एक तोप गाड़ी म रखा गया और उनक शवया ा यमुना के कनारे ख म ई, जहां उ ह पंचत व म िवलीन हो जाना था। ये जगह महा मा गांधी और पंिडत नेह क समािध से ब त दूर नह थी। मश र पि का लाइफ ने लालबहादुर शा ी के अंितम सं कार को अपनी कवर टोरी के प म छापा था। इसी पि का ने तबसे ठीक बीस महीने पहले शा ी के पूववत नेह के अंितम सं कार को भी अपनी कवर टोरी बनाया था। शा ी क मृ यु से पूरा देश शोक के आलम म डू ब गया। लाइफ पि का क त वीर बताती ह क करीब 10 लाख से यादा लोग अपने ि य नेता के अंितम सं कार म शरीक होने आए थे, िजसे वे कई मामल म पंिडत नेह से भी यादा अपने नजदीक पाते थे। लाइफ ने िलखा क हंद ु तान के िलए लालबहादुर शा ी का अहम योगदान ये था क उ ह ने मु क को एक च ानी मानिसकता दान क और रा ीय एकता क एक मजबूत भावना दी। चीन से ई लड़ाई के व मु क एक तरह से टू ट गया था, ले कन इस व जब जंग ई तो सारी चीज सही जगह पर थ । रे लगाि़डयां सही समय पर चल रही थ , सेना ने उपवास रखा और कोई सां दाियक दंगा नह आ। तमाम पुराने नैितक दखावे, म, आल य, भय और हताशा ख म हो चुक थी।46 वाकई यह एक शानदार ांजिल थी, ले कन इससे भी यादा अहम ांजिल उन लोग क थी, जो पहले ब त ही भावशाली थे, ले कन शा ी के धानमं ी बनने पर खुद को अलग-थलग मान रहे थे। लालबहादुर शा ी को धानमं ी बने ए महीने दन भी नह ए थे क इं दरा गांधी ने आरोप लगाया था क शा ी उनके िपता के पदिच से दूर होते जा रहे ह। ले कन साल भर बाद ही वह ये कहने पर मजबूर हो गई क शा ी अब अपने आपको यादा मजबूत और यादा आ मिव ास से भरा आ पाते ह।47 पंिडत नेह क बहन िवजयल मी पंिडत भी ऐसी ही मिहला थ , जो अपने भाई के ारा कए गए काय के ित कु छ यादा ही संवेदनशील थ । जुलाई 1964 म, जब शा ी धानमं ी बन चुके थे, उ ह ने कहा था क भारत सरकार का मनोबल अिव सनीय प से ब त ही कमजोर दखता है और अब देश म कोई जवाहरलाल नेह नह है, जो उठ खड़ा हो और जनता के मन म आ मिव ास का संचार करे । ले कन शा ी क मृ यु पर उ ह ने ‘शोक’ जािहर करते ए कहा क शा ी धीरे -धीरे प रप हो रहे थे हम ऐसा लगता था क वे हंद ु तान को सही रा ते पर ले जाएंगे।48 हालां क ऐसे मौके पर ऐसी बात वाभािवक सी लगती है ले कन जब हम इस बात पर िवचार करते ह क कौन सा ि इसे कस मौके पर कह रहा है तो वाकई ये ब त ही उ तरीय ांजिल थ । लालबहादुर शा ी और जवाहरलाल नेह क तुलना शायद वैसी ही है जैसे अमे रक रा पित हेनरी ईमैन और किलन डेिलनो जवे ट क । नेह और जवे ट दोन ही उ वग य प रवार से ता लुक रखते थे और दोन लंबे समय तक स ा म रहे थे। दोन ने ही अपने देश और समाज-सुधार के मौिलक उपाय शु कए थे और इसके िलए दोन क काफ तारीफ भी ई। दूसरी तरफ हेनरी ईमैन क तरह ही लालबहादुर शा ी एक छोटे से शहर के िन -म यवग य प रवार से आए थे। उन दोन ने ही अपने क र माई शि सयत क कमी को अपने दृढ़िन यी वभाव और खुले दमाग क सोच से पाटने क कोिशश क थी। जैसे क ईमैन क शि सयत थी, अपनी िवपरीत पृ भूिम क वजह से उनम एक ती ण ावहा रक कौशल का िवकास आ था, जो क उनके पूववत जवे ट के वैचा रक तो नह ले कन बौि क शि सयत से िब कु ल ही उलट था। हां, शा ी और ईमैन के बीच म िजस िब दु पर तुलना नह हो सकती है वो है दोन के स ा म रहने क समयाविध। जहां हेनरी ईमैन सात साल तक अमे रका के रा पित रहे, वह शा ी के धानमं ी बनने के महज दो साल के भीतर मृ यु हो गई। VII शा ी क मृ यु के बाद एक बार फर से गुलजारी लाल नंदा को कायवाहक धानमं ी बनाया गया और एक बार फर कामराज, धानमं ी के उ रािधकारी क खोज म िनकल पड़े। इस बार फर मोरारजी देसाई ने अपना दावा पेश कया और इस बार भी कामराज ने उनका दावा एक यादा वीकाय उ मीदवार के प म खा रज कर दया। कामराज का मन िजस उ मीदवार के प म झुक रहा था, वो थी ीमती इं दरा गांधी। वह युवा थ , महज अड़तालीस साल क , उनका ि व आकषक था, दुिनया भर के नेता उ ह जानते थे और सबसे बड़ी बात ये थी क वे उस पंिडत जवाहरलाल नेह क बेटी थी, िजसे जनता ने बतौर धानमं ी सबसे यादा इ त और यार ब शा था। मु क ब त कम व म दो बड़े नेता को खो चुका था, ऐसे हालात म साफतौर पर वह सबसे यादा पसंदीदा िवक प के प म सामने थ । ये बात सही है क ीमती गांधी म शासिनक अनुभव क कमी थी ले कन कां ेस संिडके ट ने ये सोचा क उ ह धानमं ी बनाकर वे सामूिहक नेतृ व के अधीन सरकार चला पाने म कामयाब हो पाएंगे। कामराज ने कां ेसी मु यमंि य से मशिवरा कया और सभी ने इं दरा गांधी के नाम पर मुहर लगा दी। अभी तक सभी कु छ सही चल रहा था िसवाय इसके क मोरारजी देसाई ने धानमं ी पद के िलए चुनाव लड़ने का फै सला कर िलया। उनके इस फै सले से नई द ली मानो राजनीितक खरीद-फरो त और बड़े पैमाने पर पद के पीछे जुगाड़ का अ ा बन गया। बड़े पैमाने पर ायोिजत क म के मान-मनो वल कए गए। ीमती गांधी और मोरारजी देसाई, दोन ने ही कां ेस के तमाम बड़े नेता से मुलाकात क जब क उनके सहयोगी, पाट संगठन म अपने नेता के प म माहौल बनाने म जुट गए।49 जहां तक यो यता और अनुभव क बात थी मोरारजी देसाई को कां ेस क पसंद होना चािहए था। जवाहरलाल नेह ने एक बार मोरारजी के बारे म िलखा था क ब त कम ऐसे लोग ह िजनका म उनक कािबिलयत, स मता, िन प ता और ठोस नैितकता क वजह से स मान करता ।ं 50 अब यह शोध का िवषय है क या वे वाकई ऐसा अपनी बेटी के बारे म भी िलख पाते? शायद पंिडत नेह ने कभी सोचा ही नह क उनके बाद कभी उनक बेटी भी धानमं ी बनेगी। हालां क जो श द यहां उ धृत कए जा रहे ह वे एक िनजी प से िलए गए ह, िजसके बारे म न तो देसाई और न ही उनके समथक को कु छ मालूम था। हालां क, अगर उ ह इस प के बारे म मालूम भी होता तो ऐसा नह कहा जा सकता क इससे उ ह ब त स िलयत होती। कामराज और कां ेस संिडके ट इं दरा गांधी के प म था और कां ेस संगठन म ब त से लोग को देसाई क कायशैली से भारी एतराज था। ऐसी ि थित म नेह क बेटी कां ेस संसदीय दल का चुनाव भारी ब मत से जीत गई। जब धानमं ी पद के िलए 19 जनवरी, 1966 को कां ेस संसदीय दल म चुनाव आ तो इं दरा गांधी 169 क तुलना म 355 मत से जीत गई। द ली क एक पि का ने बड़े ही िनराशा भरे आलोचना मक श द म िलखा क इं दरा गांधी इसिलए जीत ग , य क कामराज ने उनके पीछे सूबाई ाप क लाइन लगा दी थी। पि का क राय म इं दरा क जीत इसिलए भी ई य क कां ेस के सूबाई नेता कसी नौिसिखए को ही धानमं ी के तौर पर वीकार कर सकते थे, जो उनके ऊपर हावी नह हो सकता हो।51 VIII ीमती गांधी कसी आजाद मु क क ऐसी दूसरी मिहला थ (पहली मिहला िसरमावो भंडारनायके थ , जो त कालीन िसलोन और अभी ीलंका क रा पित बनी थ ) िज ह ने अपने मु क के कू मत क बागडोर संभाली थी। इसके अलावा वह अपने प रवार क दूसरी सद य थी, जो धानमं ी बनी थ । बतौर धानमं ी उनके कायकाल का पहला महीना उनके िपता के कायकाल क तरह ही चुनौितय से भरा पड़ा था। फरवरी महीने म कु छ खास नह आ ले कन माच म िमजो पहाि़डय म बड़ा िव ोह आ। पूव पा क तान को छू ते ए और पहाि़डय से िघरे आ दवासी िजले क आबादी महज तीन लाख थी। ले कन नागालड क तरह ही वहां भी कु छ जुनूनी नौजवान थे, जो अपने िलए एक अलग देश क मांग कर रहे थे। िमजो संघष क कहानी सन् 1959 के अकाल से शु होती है जब बांस के जंगल म बड़े पैमाने पर फू ल िखले थे और इसक वजह से चूह क आबादी बेतहाशा बढ़ गई थी। इन चूह ने खेत और गांव के गोदाम से अनाज चट कर िलया, िजससे लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। ऐसे ही व म कु छ लोग ने एक िमजो रा ीय अकाल ं ट (िमजो नेशनल फे िमन ं ट) का गठन कया, िजसने अकाल और लोग क तकलीफ को लेकर सरकार के रवैये को बेहद िनराशाजनक ठहराया। उसके बाद उस संगठन से पहला ‘एफ’ श द हटा दया गया और संगठन का नाम िमजो नेशनल ं ट हो गया। शु म इस संगठन ने भारतीय संघ के अंदर ही अलग रा य क मांग क ले कन बाद म वह अलग देश क मांग करने लगा। एमएनएफ (िमजो नेशनल ं ट) के नेता का नाम लालडगा था, जो कभी अकांउटट का काम करता था। अकाल से बुरी तरह िथत उसने इसके िनदान का उपाय कताब म खोजना शु कया। शु -शु म पीटर चेनी क कहािनयां पढ़ , फर वं टन च चल को पढ़ने लगा और आिखरकार वो छापामार लड़ाई से संबंिधत पढ़ने लगा। सन् 196364 क स दय म लालडगा पूव पा क तान क सैिनक सरकार के संपक म आया, िजसने उसे हिथयार और धन देने का आ ासन दया। पूव पा क तान क सरकार ने उसे सुरि त ठकाने देने का भी आ ासन दया, जहां से वह भारतीय इलाक पर हमला कर सकता था। पा क तान से हािसल हिथयार सरहद के पास के जंगल म छु पा दए गए।52 बरस के योजनाब िश ण के बाद लालडगा ने सैकड़ िमजो युवक को आधुिनक हिथयार के संचालन म द बना दया। फरवरी, 1966 के आखरी दन म लालडगा के इशारे पर िमजोरम म गड़बड़ी क शु आत हो गई। एमएनएफ लड़ाक के द त ने सरकारी कायालय , ित ान और संचार के मा यम पर हमला कया। बक को लूटा गया और सड़क को जाम कर दया गया ता क इलाके म सेना के आगमन को रोका जा सके । माच क शु आत म एमएनएफ ने ऐलान कया क यह े अब भारतीय संघ का िह सा नह है, और एक आजाद मु क बन चुका है।53 एमएनएफ ने िमजोरम के मु य शहर लुंगलेह पर क जा कर िलया और िजला मु यालय आईजोल पर दबाव बढ़ाने लगी। सरकार ने िव ोह को दबाने के िलए सेना और एयरफोस को बुला िलया। िव ोिहय को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। आजाद भारत के इितहास म ये पहला वाके या था, जब सरकार को अपनी ही जनता के िखलाफ वायुसेना के इ तेमाल को मजबूर होना पड़ा था। नागालड क तरह ही िव ोिहय को जंगल म शरण लेनी पड़ी और वे रात म ही गांव का दौरा करते। करीब एक पखवाड़े क घमासान लड़ाई के बाद उस इलाके म काम कर रहे एक वे स िमशनरी ने इं लड म अपने एक दो त को गु प से एक रपोट भेजी। वह रपोट कु छ इस तरह क थी शिनवार क सुबह हम लोग ने एक बड़े ब से म, िजतना समान भर सकते थे, भरा। फर हम जंगल के रा ते डु रलंग को रवाना ए। पांच िमनट बाद हमने देखा क ऊपर आसमान से हवाई जहाज ारा हमारे ऊपर गोली चलाई जा रही है। वे लोग हवा म फाय रं ग नह कर रहे थे, बि क िव ोिहय के छु पने के िनशाने पर गोली चला रहे थे। हम लोग वहां दनभर रहे और छु पने के िलए ग ा खोदते रहे। जब भी कोई हवाई जहाज हमारे ऊपर से गुजरता हम ग े म छु प जाते। पखलीरा ने देखा क उसके घर से आग क लपट उठ रही ह। हमने एक छोटे से घर म खाना बनाया ले कन साथ ही ये सोचा क वहां सोना ठीक नह है। हम जंगल म एक सुरि त ठकाना खोजकर एक चबूतरे पर सो गए। हम ठीक से सो नह पाए। हमारी न द रात म ही टू ट गई और हमने देखा क पूरा का पूरा दाउ पी धू-धूकर जल रहा है। वहां रपि लक रोड से लेकर उसके दूसरे छोर तक आग क लपट दख रही थ । लोग का कहना है क ये लालडगा के लोग का काम है और वे असम राइफ स को शहर के बाहर जलाकर मार डालना चाहते ह। इस प से पता चलता है आम िमजो जनता कस तरह सेना और िव ोिहय के बीच होने वाली लड़ाई म च म घुन क तरह िपस रही थी। इस प म आगे इस लड़ाई से े क जनता को होने वाली ित और बबादी का लेखा-जोखा कु छ यूं पेश कया गया है। इस लड़ाई से देश को काफ नुकसान होगा... सरकार को सेना इसिलए भेजनी पड़ी य क अगर वो ऐसा न करती, तो यहां के हालात भी नगा इलाक क तरह ही बेकाबू हो जाते। हम यही उ मीद कर सकते ह क िजतनी ज दी हो िव ोही आ मसमपण कर और हालात सामा य हो। ले कन यहां क िश ा व था कु छ समय के िलए पूरी तरह अ त- त हो गई है। अगले स ाह से दसव क परी ा शु होने वाली है। ऐसे हालात के िलए लालडगा और सखलाि लआना जैसे िव ोही नेता पूरी तरह िज मेवार ह।54 ले कन आ मसमपण क बजाय िव ोही लड़ते रहे और संघष कई साल तक चलता रहा। इस बीच नागालड म पीस िमशन िबखर चुका था। जय काश नारायण ने पीस िमशन से ये कहते ए इ तीफा दे दया क वे नगा का िव ास खो चुके ह। जेपी ने भूिमगत नगा िव ोिहय से कहा था क भारत-पा क तान यु के बाद नगा िव ोिहय को अपनी आजादी क मांग छोड़ देनी चािहए और इसके बदले भारतीय संघ के अंदर वाय ता वीकार कर लेनी चािहए। भारत के संघीय ढांचे म िवदेशी मामले और सुर ा क िज मेवारी क के हाथ थी जब क कई मह वपूण िज मेदारी मसलन, िश ा, वा य, सं कृ ित और आ थक िवकास रा य के िनयं ण म थे। इसिलए जेपी ने फजो के लोग को हिथयार छोड़ने क सलाह दी और अपील क क वे चुनाव म िह सा लेकर शांितपूवक शासन को िनयंि त कर।55 इधर जेपी िव ोिहय का भरोसा खो रहे थे, उधर माइकल काॅट भारत सरकार का। सरकार ने काॅट पर आरोप लगाया क वे संयु रा संघ से अपील कर नगा मु े का अंतरा ीयकरण कर रहे ह। काॅट ने सरकार को सलाह दी क नागालड के िलए िस म या भूटान क तरह व था क जा सकती है, िज ह अपने झंडा, मु ा और अपने शासक चुनने क नाममा क वतं ता हािसल है ले कन सैिनक दृि कोण से वे भारत पर िनभर एक अधीन थ रा य जैसे ह। मई, 1966 म भारत सरकार ने काॅट को भारत छोड़ने का आदेश दे दया और ये साफ कर दया क अब उ ह फर से लौटने क कोई आव यकता नह है।56 इसम कोई शक नह क माइकल काॅट नगा सम या को लेकर काफ ितब थे। 1962 से 66 के बीच उ ह ने फजो क तरफ से करीब दजन बार भारत का दौरा कया था। ले कन दुभा य से वो ये नह समझ पाए क भारतीय संघ से नागालड क आजादी सरकार के िलए िब कु ल ही वीकाय नह थी। भारत सरकार, फजो को माफ देने को और नागालड म उसक सुरि त वापसी के िलए भी तैयार थी। सरकार यहां तक तैयार थी, अगर फजो चाहे तो उसे नागालड का मु यमं ी भी बनाया जा सकता है। ले कन वो पुराना िव ोही अपनी िजद पर अड़ा रहा और हर बार यादा मांगता रहा। काॅट उसे समथन देते रहे। भारत का िवशद अनुभव रखने वाले एक ि टश प कार वाई वंट ने माइकल काॅट के बारे म कु छ इस तरह क त ख ट पणी क । वंट ने कहा नगा इलाके म शांित क राह म सबसे बड़ी बाधा माइकल काॅट और डेिवड अ टर जैसे धमाध लोग ह, िज ह फजो ने इ तेमाल कया है। दोन म से कसी को इस बात का अहसास नह है क नागालड को भारत से आजाद करने के या प रणाम िनकलगे।57 भारत सरकार और नगा िव ोिहय क वाता टू ट जाने से नगा िव ोिहय ने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और बम िव फोट कए। 20 अ ैल को ऊपरी असम म एक ेन म बम धमाका आ, िजसम 55 लोग मारे गए। तीन दन बाद इसी तरह के एक धमाके म 40 लोग क ह या कर दी गई। अब नगा िव ोही, चीन के साथ संपक बना रहे थे, िजसक मदद से वे इस लड़ाई को और भी यादा घातक बनाना चाहते थे।58 इस तरह देखा जाए तो सरहदी सूब म और देश क दय थली यानी क ीय भारत म भी आ दवासी समुदाय अपनी मांग को लेकर बेचैन हो रहा था। म य भारत के ब तर िजला म खा ा क कमी से वहां के अपद थ राजा वीरचं भंज देव के नेतृ व म आ दवािसय का एक बड़ा आंदोलन उठ खड़ा आ। वीरचं और उसके समथक का कहना था क उनके इलाके म खुशहाली तभी आएगी जब अपद थ राजा को फर से उसका उिचत हक देते ए उसके पद पर बहाल कया जाएगा! वहां के आ दवािसय म ऐसी मा यता थी क महाराजा एक दैवीय पु ष है जो ई र और आम जनता के बीच क कड़ी है। सरकार ने वीरचं और उसके भाई को मानिसक िवि ता के आधार पर पद से हटाया था जब क वहां क जनता उसक दीवानी थी। वीरचं को हटाने के िवरोध म दशन क झड़ी लग गई और 25 माच को कई हजार लोग का ज था नारा लगाते ए पुरानी राजधानी जगदलपुर क ओर चल पड़ा। पुिलस और आ दवािसय के बीच लड़ाई िछड़ गई। आ दवािसय के हाथ म तीर-धनुष थे, जब क पुिलस बंदक ू और आंसू गैस का योग कर रही थी। लड़ाई के बाद जब धुएं का गुबार छंटा, तो पाया गया क इस संघष म चालीस लोग मारे गए थे। उनम एक पुिलस का जवान था, जब क बाक आ दवासी थे। मरने वाल म ब तर का पूव महाराज वीरचं भंज देव भी था। म य देश के मु यमं ी ने क ीय गृहमं ी को िलखा क यह एक ‘दुखदायी’ घटना थी, जो काफ ‘तकलीफदेह’ और ‘खेदजनक’ थी।59 इन िव ोह को सुलझाने क कोिशश के बीच धानमं ी ने िसख के िलए एक अलग ांत बनाने क घोषणा क । पा क तान के साथ ई लड़ाई म िसख कमांडर और जवान ने बड़ी तादाद म अपनी कु बानी दी थी और अपनी एक अलग छिव बनाई थी। ऐसा ही पंजाब के आम लोग ने भी कया था। पंजाब के कसान ने िसपािहय को िखलाने के िलए सड़क के कनारे अपने अनाज के भंडार खोल दए थे और उ ह लजीज खाना िखलाया था। दूसरे कई लोग ने िसपािहय को रहने के िलए अपने घर दे दए थे, तो कइय ने घायल िसपािहय क सेवा क थी। सेना के े ीय मु यालय म भारतीय सेना के जनरल ने कहा क पूरा का पूरा पंजाब मानो एक इं सान म त दील हो गया था। इस महान उ े य के िलए सेवा देने म लोग म होड़ सी लग गई थी।60 िसख क इस बहादुरी ने भारत सरकार को उनक पुरानी मांग को वीकार करने के िलए मजबूर कर दया। माच, 1966 म संसद सद य क एक सिमित ने पंजाब को तीन िह स म िवभािजत करने का अनुमोदन कया। पहाड़ी िजल को िमलाकर बने रा य का नाम िहमाचल देश रखा गया, जब क पूव और हंद ू बा य इलाक से बने रा य का नाम ह रयाणा रखा गया। इन दोन िह स को अलग कर देने के बाद जो इलाका बचता था वो पंजाबी भाषी और िसख बा य रा य पंजाब बना।61 IX उसी साल माच महीने म धानमं ी इं दरा गांधी अपनी पहली िवदेश या ा पर रवाना । वो पे रस और लंदन म क ले कन उनक या ा का मु य ल य अमे रका था, िजसका सहयोग और खा ा क सहायता भारत के िलए ब त ज री थी। इसक वजह ये थी क अभी कृ िष म कए जा रहे नए सुधार और नए योग के नतीजे आने बाक थे। कृ िष मं ी सी. सु यम ने द ली म अपने सरकारी बंगले के लाॅन को जुतवाकर उसम नए उ त क म वाले गे ं बो दए थे ता क थानीय प रि थितय म इसके कामयाबी क जांच क जा सके । तब तक भारत को अमे रका से ही खा ा सहायता क उ मीद थी।62 अ बामा के एक अखबार ने ीमती गांधी क अमे रक या ा पर हेडलाइन छापी भारत क नई धानमं ी खा ा क भीख मांगने अमे रका आ रही है। ले कन ीमती गांधी अपने वहार और हाव-भाव से अमे रकन को भािवत करने म कामयाब रह । उनके पहनावे, उनके अंदाज और सलीके से अमे रका के लोग भािवत हो गए। यहां तक क अमे रका के रा पित लंडन जाॅनसन भी इं दरा गांधी से खासे भािवत दखे।63 ले कन उनके भारत लौटने के बाद जाॅनसन ने भारत क मांग को पूरा करने म शत रख द । जहां भारत ने सालभर के िलए एक ही बार खा ा सहायता क मांग क थी, वह जाॅनसन ने उसे महीने दर महीने के िहसाब से जारी करने का फै सला कर कया। नई द ली म एक िनजी बातचीत म अमे रक राजदूत ने जाॅनसन के इस रवैये को एक ‘ ू र फै सला’ बताया। जाॅनसन क राय म भारतीय को अभी दुिनया के तौर-तरीके मालूम नह थे, उनम ब त अकड़ थी और उनक अकड़ को तोड़ना ज री था। भारतीय म एकजुट होकर काम करने क मता पर िनराशा जािहर करते ए जाॅनसन ने यहां तक कहा था क उ ह खेती का काम िसखाने के िलए 1000 िमक को अमे रका से भेजा जाना चािहए। द ली म अमे रक राजदूत, अपने रा पित के इस तरह के बयान से िवि मत रह गए। अमे रक राजदूत क राय म ये अमे रक , एिशया म खेती के तौर-तरीक के बारे म कु छ भी नह जानते थे। उनके िलए भारतीय को कृ िष काय िसखाने आने का मतलब था क वे अपने साथ 950 पि यां, 2500 ब ,े 3000 एयरकं डीशन, 1000 जीप, 1000 रे ि़ जरे टर (िजसम से ब त काम ही नह कर पाते), 800 या 900 कु े और 3,000 िबि लयां लाते।64 1965 और 1966 म भारत ने अमे रका से पि लक लोन क म के तहत डेढ़ करोड़ टन गे ं का आयात कया, िजसे पीएल-480 के नाम से जाना जाता है। इस अनाज से करीब 4 करोड़ भूखे हंद ु तािनय के पेट क भूख िमटाई जा सक । अमे रका के कृ िष िवभाग ने अपनी एक रपोट म बड़े ही हा या पद ढंग से भारत के बारे म िलखा क हंद ु तान िभखा रय और िनराि त का मु क है। जब 1966 म मानसून ने फर से दगा दी तो भारत को फर से अकाल का सामना करना पड़ा और एक बार फर पीएल-480 के तहत अमे रका पर खा ा के िलए िनभर होना पड़ा। मु क को फर से पूरी दुिनया के सामने नंगा होने पर मजबूर होना पड़ा।65 वाॅ शंगटन के सरकारी हलक म ये बात कही जाने लगी क भारतीय बड़े ही दखावटी च र के लोग ह। एक तरफ वे सहायता क मांग करते ह, तो दूसरी तरफ अमे रक िवदेश नीित क खुलेआम आलोचना करते ह। भारत ारा िवयतनाम यु म अमे रका क आलोचना कए जाने से अमे रक खासे नाराज थे। लंडन जाॅनसन इस बात से खुश नह थे क भारत के रा पित एस. राधाकृ णन ने उ ह प िलखकर उ री िवयतनाम पर क जा रही बमबारी को एकतरफा और िबना शत रोकने क मांग क थी। राधाकृ णन ने कहा था क अगर अमे रका ऐसा कर देता है तो फर दुिनया के दूसरे देश समझौते क शु आत करा सकते ह।66 X िवदेश से हिथयार और अनाज क खरीद के साथ-साथ मशीनरी और औ ोिगक कलपुज क खरीद ने भारत के िवदेशी मु ा भंडार को काफ ध ा प च ं ाया। यह माच, 1966 तक िगरकर महज 62.5 करोड़ डाॅलर रह गया। इससे उबरने के िलए सरकार ने जून, 1966 म पए का अवमू यन करने का फै सला िलया। पहले एक अमे रक डाॅलर 4.76 पए के बराबर था, जो अब 7.50 पए के बराबर हो गया।67 िव बक और अंतरा ीय मु ा कोष ने भी भारत को मु ा के अवमू यन क सलाह दी थी ले कन सरकार ने उनक उ मीद से भी यादा अवमू यन करने का फै सला कर िलया। भारत म वामपंथी पा टय ने इस फै सले क कड़ी आलोचना क और िवरोध म आंदोलन कए। क युिन ट पाट के सांसद हीरे न मुखज ने कहा क अमे रक ष ं के तहत भारत पर मु ा का अवमू यन थोपा गया है। एक क युिन ट ेड यूिनयन ने इसे देश से ग ारी करने का ‘शमनाक काम’ बताया। ीमती गांधी के अपने ही पाट के लोग बड़ी सं या म मु ा अवमू यन का िवरोध कर रहे थे। कामराज क राय म मु ा अवमू यन रा ीय आ मिनभरता क तरफ बढ़ने क नीित से पीछे हटने के बराबर था। ले कन इस नीित का समथन खुले बाजार क नीित क समथक वतं पाट ने कया। संसद म इसके नेता मीनू मसानी थे। मसानी ने कहा क अगर मु ा का अवमू यन, कां ेस ारा चलाई जा रही कठोर आ थक नीितय के जगह पर आ थक वा तिवकता क दशा म एक कोिशश है, तब तो िनयात को बढ़ावा िमल सकता है और हम िवदेशी िनवेश भी आक षत कर सकते ह। अपने एक िम को िलखे प म धानमं ी ने कहा क मु ा का अवमू यन एक ब त ही क ठन और तकलीफदेह फै सला था। यह फै सला तभी िलया गया जब दो साल से दूसरे सारे उपाय नाकामयाब हो रहे थे और कोई सुकूनदेह नतीजा सामने नह आ रहा था।68 द ली क उदारवादी पि का थाॅट ने िलखा क आजादी के बाद यह भारत सरकार ारा िलया गया सबसे क ठन फै सला था। पि का ने उ मीद जािहर क क इससे अथ व था को नई दशा देने म कामयाबी िमलेगी। पि का ने ये भी िलखा क इससे देश के िनयात को बढ़ाया जा सके गा और हंद ु तान क कारोबारी ि थित मजबूत होगी। आगे थाॅट ने िलखा क मु ा के अवमू यन से हम ये समझ लेनी चािहए क बड़ेबड़े उ ोग या बड़ी प रयोजना को लगाकर देश को तर क राह पर ले जाने क हमारी कोिशश का अब अंत हो गया है।69 हालां क, मु ा के अवमू यन से वािणि यक िनयम म कोई ढील नह दी गई। िवदेशी मु ा िनवेश पर िनयं ण बना रहा और िनयात बढ़ाने क भी कोई कोिशश नह क गई। ऐसा लगता है क अपनी पाट के भीतर और िवप क तरफ से भी अवमू यन के कड़े िवरोध से ीमती गांधी आ थक सुधार क तरफ बढ़ने म िहचक ग । वतं पाट के समथन ने भी इं दरा गांधी क ब त मदद नह क , बि क इसने नेह क बेटी को क युिन ट के नजदीक ही यादा ला दया। XI 1966 म साल भर कोई जगह असामा य प से शांत रही, तो वो था क मीर। 1965 क लड़ाई ने घाटी म अलगाववा दय को कदम पीछे करने पर मजबूर कर दया था। ब शी गुलाम मुह मद क तुलना म जी.एम. सा दक साफतौर पर अ छी और स म सरकार चला रहे थे। पयटन उ ोग और क मीरी ह तिश प का बाजार उफान पर था। 1966 क ग मय के आिखर म जय काश नारायण ने इं दरा गांधी को एक प िलखा िजसम क मीर सम या के थायी समाधान करने क बात क गई थी। जेपी ने कहा क इस सम या ने मु क को 19 साल से जकड़ रखा है और हंद ु तान क अंतरा ीय छिव िजतनी इस सम या क वजह से खराब ई है, उतनी कसी से नह । उ ह ने िलखा क हालां क घाटी म अभी शांित है ले कन सतह के नीचे लोग म एक गहरा असंतोष है। जेपी के मुतािबक क मीर का एक ही समाधान है और वो ये है क शेख अ दु ला को जेल से रहा करके क मीर को पूण आंत रक वाय ता दे दी जाए। जेपी के पूण आंत रक वाय ता का मतलब था क मीर के भारत म िवलय क वा तिवक शत पर क मीर को वाय ता देना। उनक राय म शेख के साथ समझौता, हम क मीर सम या को सुलझाने म मदद करे गा य क घाटी म शेख अ दु ला ही ऐसे नेता ह, जो मुसलमान क राय को अपने प म मोड़ सकते ह। चाऊ एन लाई के साथ शेख क बातचीत से शेख क छिव ग ार वाली बन गई थी, ले कन जेपी क राय म, हालां क वो कदम ठीक नह था, ले कन िन य ही देश ोह नह था। अब तो शेख अपने िवरोिधय के सवाल का जवाब देने हंद ु तान भी आ गए थे। जेपी के सहयोगी नारायण देसाई, शेख से कोडईकनाल के जेल म जाकर िमले, जहां शेख ने वाय ता के मसले पर सकारा मक ख दखाया। पा क तान के साथ भारत क लड़ाई के बाद शेख, साफ-साफ देख रहे थे क एक आजाद क मीर अब संभव नह है। इसिलए जय काश नारायण ने सरकार को सलाह दी क शेख अ दु ला को जेल से रहा कर दया जाए और 1967 के आम चुनाव म भाग लेने क इजाजत दी जाए। जेपी ने आगे कहा क ऐसा करने से क मीर क जनता आ त हो पाएगी क अब उ ह भारतीय पुिलस के साये म नह रहना पड़ेगा और अपनी मज से वे आजादी क जंदगी जी पाएंग।े अगर शेख, चुनाव लड़ते ह और जीत जाते ह और अगर ये दखाया जा सके क क मी रय ने अपनी मज से सही नेता को चुनकर भेजा है तो पा क तान के पास इस मामले म दखल देने क कोई वजह नह रह जाएगी। जय काश नारायण ने ट पणी क क शेख अ दु ला को जेल म रखकर क मीर म चुनाव करवाना उसी तरह है मानो ि टश सरकार नेह को जेल म रखकर भारत म चुनाव क इजाजत दे रही हो। कोई भी िन प दमाग का आदमी इसे िन प चुनाव नह कहेगा। यह ऐसा तक था िजस पर इं दरा गांधी को िवचार करना चािहए था ले कन इसे न मानने क सूरत म जेपी ने बड़ी िनराशाजनक भिव यवाणी क अगर हम अगले आम चुनाव म क मीर के लोग का भरोसा जीतने का मौका गंवा देते ह, तो मुझे नह लगता क क मीर को सुलझाने के िलए हमारे पास कोई उपाय रह जाएगा। ये सोचना क हम उ ह कसी तरह मना लगे या ताकत के बल पर भारतीय संघ म रहने के िलए मजबूर कर दगे, अपने आपको धोखा देने के बराबर होगा। ऐसा तभी मुम कन हो पाता अगर क मीर वहां नह होता, जहां वो भौगोिलक प से वजूद म है। इसक मौजूदा भौगोिलक ि थित और वहां क जनता म असंतोष को देखते ए पा क तान यहां कभी भी शांित नह होने देगा।70 धानमं ी ने जेपी को संि जवाब भेजा िजसम उ ह क मीर और शेख साहब के बारे म अपनी राय देने के िलए ‘ध यवाद’ दया गया।71 उनके प पर कोई कारवाई नह क गई और शेख अ दु ला जेल म ही रहे। हालां क धानमं ी, 1966 के अ टू बर म पद संभालने के बाद पहली बार क मीर दौरे पर ज र ग । ीनगर के पो स टेिडयम म ेस को संबोिधत करते ए उ ह ने क मीर और क मीरी लोग से अपने ‘िवशेष लगाव’ क बात क । उ ह सुनने के िलए लोग क बड़ी भारी भीड़ उमड़ी। वा तव म ीमती गांधी क मीर घाटी म जहां कह भी ग , लोग उ ह देखने को सड़क पर उमड़ आए।72 XII फलहाल क मीर शांत दख रहा था, लोग म कोई हलचल नह थी। ले कन दि णी रा य आं देश म एक आंदोलन तेजी से आकार ले रहा था। इस आंदोलन क अगुआई छा के हाथ म थी, जो मांग कर रहे थे क िवशाखाप नम म योजना आयोग ारा तािवत इ पात के कारखाने को तुरंत शु कया जाए। टील लांट क घोषणा कई साल पहले क जा चुक थी ले कन सरकार क नाजुक िव ीय ि थित क वजह से इसे लागू नह कया जा सका था। टील लांट को लगाने म देरी क वजह से आं देश म भारी हंगामा आ। युवा म टील लांट को लेकर भारी उ साह था और उसके लगने से रोजगार क भी उ मीद थी। िवरोध दशन करने वाल ने सड़क को जाम कर दया, रे लगाि़डय को रोक दया और दुकान व कायालय पर हमला कया। िवरोध दशन पूरे आं देश म फै ल गया। एक रपोट के मुतािबक गुंटूर का पूरा छा समुदाय सड़क पर उतर आया। कई शहर म पुिलस का भारी बंदोब त कया गया और िवशाखाप नम म भारतीय नौसेना को मु य थल क सुर ा क िज मेवारी लेनी पड़ी। एक रे लवे टेशन को आग लगा दी गई और दूसरी जगह भीड़ पर पुिलस को गोली चलानी पड़ी। छा ने िवशाखाप नम म काश तंभ को तोड़ डाला और रे िडयो टेशन के सारण म बाधा डाली। रा य से गुजरने वाली सभी रे लगाि़डय को र कर दया गया।73 इसी बीच उ री रा य िबहार म सूखा पड़ गया। आ दवासी िजले सबसे यादा भािवत ए। मुंगेर म आ दवासी जंगली पौध क जड़ को खाकर जीने को मजबूर हो गए। पानी और चारे क भारी कमी हो गई। गरीब ने अनाज लूटना शु कर दया और उ वग के लोग को बड़े पैमाने पर उप व का डर सताने लगा।74 िवरोध कर रहे छा और कसान के साथ एक और समूह जुड़ गया। यह समूह साधु का था। हंद ू क रपंथी पहले से ही गौ-ह या पर पाबंदी क मांग कर रहे थे। अब जनसंघ के समथन से उनका ये िवरोध सामािजक आंदोलन म बदल गया। 6 नवंबर राजधानी क सड़क पर एक िवशाल जुलूस िनकाला गया। जुलूस म एक लाख के करीब लोग थे, िजनम यादातर सं या साधु क थी। उनके हाथ म ि शूल और कु हाि़डयां थ । यह जुलूस, संसद भवन के सामने एक सभा म त दील हो गया। इस सभा के मु य व ा हंद ू कोड िबल के समय मश र ए वामी करपा ी थे। इस सभा म हाल ही म अपने असंसदीय वहार क वजह से संसद से िनलंिबत ए जनसंघ के सांसद वामी रामे रानंद आ जुड़।े उ ह ने साधु से संसद भवन के घेराव क अपील कर दी। उ मादी भीड़ ‘ वामी रामे रानंद क जय’ का नारा लगाते ए संसद भवन क ओर बढ़ चली। जनसंघ के नेता अटल िबहारी वाजपेयी ने वामीजी से अपील क क वे अपनी अपील वापस ले ल। ले कन तब तक देर हो चुक थी। जैसे ही भीड़ संसद भवन के ार क तरफ बढ़ी, पुिलस के घुड़सवार द त ने उनका रा ता रोक िलया। संसद भवन के समाने घमासान लड़ाई िछड़ गई। पुिलस आंसू गैस और रबड़ क गोिलयां चला रही थी, तो भीड़ लाठी और प थर से मुकाबला कर रही थी। जैसे ही संसद भवन के सामने धुएं का गुबार उठा, भीड़ पीछे हटने लगी। पीछे हटती ई भीड़ के सामने जो भी पड़ा उसे तहस-नहस कर दया गया। भीड़ ने आॅल इं िडया रे िडयो के सुर ा बाड़े को ित त कर दया और कां ेस अ य के . कामराज के घर म आग लगा दी। इस हंसा म करीब 250 कार, 100 कू टर और 10 बस को ित त कर दया गया। शाम होते-होते द ली क सड़क पर सेना बुला ली गई। ऐसा आजादी के बाद पहली बार कया गया था। एक पि का ने तीखे वर म इस हंसा क नंदा करते ए िलखा क साधु के नेतृ व म कया गया आंदोलन जंगली हंसा, तोड़फोड़ और हंगामे म बदल गया। अटल िबहारी वाजपेयी ने इस हंसा क आलोचना करते ए बयान जारी कया क गौ-ह या के िवरोध म कए जा रहे आंदोलन म अवांिछत त व ने हंसा फै लाई, िजसने इस पिव उ े य को बड़ी ित प च ं ाई है।75 XIII पि मी देश म ब त सारे लोग क राय म जवाहरलाल क शि सयत और उनके काय क वजह से ही भारत क एकता और इसका लोकतं सुरि त रह पाया था। कई सारे वाकये ऐसे िवचार को सही ठहराते ए लगते थे। उनम अहम घटनाएं थ - नेह क मृ यु के बाद ब त ज दी-ज दी नेतृ व प रवतन, साल-दर-साल पड़ रहे अकाल, अनिगनत छोटे-छोटे आंदोलन और पा क तान के साथ ई एक बड़ी लड़ाई। दसंबर, 1965 म िसडनी माॅ नग हेरा ड ने भारत म लोकतं के भिव य पर चंता जािहर क । अखबार क राय म ‘भारत म रा वादी भावनाएं उफान’ पर थ , जो कभी भी अंधदेशभि का प ले सकती थ । इस अंध-देशभि म पि मी शि य के िखलाफ कटु ता क संभावनाएं हो सकती थ । अखबार के मुतािबक क रता क यह भावना देश क उदारवादी व था और माहौल को भी भािवत कर सकती थी। कई िवदेशी पयवे क क राय म, भारत म उदार िवचार क अिभ ि पर खतर के बादल मंडरा रहे थे।76 उसी साल, 1965 म ही रोना ड सीगल नाम के एक लेखक ने ाइिसस आॅफ इं िडया नाम से एक पु तक िलखी। अपने भारत दौरे के दौरान उसने पाया क भारत बड़े ‘आ थक संकट’ म फं स चुका है और देश क व था व त हो जाने क कगार पर है। दूसरी तरफ भारत क अंतरा ीय छिव और इसक ित ा भी लगातार िगरती जा रही थी। गरीबी, अभाव, े ीय संघष और हर तरफ ाचार क वजह से हंद ु तान म अराजकता जैसा माहौल था। सीगल ने इसक तुलना वेमर-कालीन जमनी या फर कु ओिमतांग कालीन चीन से क । उसे भारत म लोकतं के बचे रहने क कोई उ मीद नह दखाई दी। मु क धीरे -धीरे तानाशाही िवक प क ओर बढ़ रहा था। जो दो िवक प सामने दख रहे थे, वो थे क युिन ट क तानाशाही या फर सां दाियक पा टय ारा स ा पर क जा। सीगल ने राय जािहर क अगर कु छ साल क भी देरी ई तो िन य ही इन दोन म से कोई न कोई पाट स ा पर क जा कर लेगी।77 भारत के भिव य के बारे म रवरड माइकल काॅट को भी अब कोई उ मीद नह दख रही थी। साल 1966 म उनसे िमलने प च ं े उनके एक िम ने उ ह - गहन िनराशा क ि थित म पाया। काॅट नागालड क सम या को न सुलझा पाने क वजह से दुखी नह था बि क वह पूरे हंद ु तान के हालात को लेकर उदास था। उसक राय म हंद ु तान क पुरानी और कािबल पीढ़ी ख म हो रही थी और और िनक मे क म के लोग शासन व था म आते जा रहे थे। उसे पूरा यक न था क आज नह तो कल हंद ु तान ज र िबखर जाएगा और हालात िवयतनाम जैसे ामक हो जाएंग,े िजसम अमे रका और इं लड को शरीक होना पड़ेगा।78 ले कन जब सन् 1966 म बा रश एक बार फर दगा दे गई, तो लोकतं के खा मे या मु क के िबखरने क बजाय, देश म बड़े पैमाने पर भूखमरी का खतरा बढ़ गया। ब त से पि मी पयावरणिवद क राय म भारत मालथस क उस भिव यवाणी को सच करता लग रहा था, िजसम कहा गया था क एक दन मानव आबादी क वृि , खा ा उपल धता को पार कर जाएगी। टडफोड के यात जीव िव ानी पाॅल एरिलच ने िलखा क उ ह ने भारत के जनसं या िव फोट को ब त पहले ही भांप िलया था, जब कु छ साल पहले उ ह दुगध से भरी द ली क एक रात का अनुभव आ था। एरिलच ने आगे िलखा क जैसे ही उनक टै सी शहर क गिलय से गुजरी उ ह ने अपने चार ओर लोग का समंदर देखा। लोग खा रहे थे, लोग हाथ धो रहे थे, लोग सो रहे थे, लोग एक दूसरे से िमल रहे थे, लोग लड़ रहे थे और िच ला रहे थे। द ली क सड़क पर िभखारी टै सी क िखड़ कय म झांककर भीख मांग रहे थे। कह वे मल-मू िवसजन कर रहे थे, कह बस म चढ़ रहे थे तो कह जानवर को हांक रहे थे। लोग ही लोग... लोग ही लोग... चार तरफ लोग ही लोग...!79 िजस साल एरिलच ये िलख रहे थे उसी साल दो अ य अमे रक जीविव ानी भी एक कताब िलख रहे थे। उस कताब म उ ह ने िलखा क आज हंद ु तान, अकाल और आपदा झेलते ए भूखे देश क कतार म पहले नंबर पर है, ले कन आने वाले दन म यहां के हालात और भी भयावह ह गे। आगे जब अकाल आएगा तो भूख क वजह से बड़े पैमाने पर दंगे और उप व ह गे िजसे क ीय सरकार रोक नह पाएगी। उ ह ने भिव यवाणी क क साल 1975 तक अराजकता, उप व, सैिनक तानाशाही, अिनयंि त मु ा फ ित, यातायात म कावट आम घटना हो जाएगी।80 सचाई तो यह थी क कु छ जानकार भारतीय भी अपने देश के हालात को लेकर चंितत होने लगे थे। नवंबर, 1966 के पहले स ाह म पारं प रक प से कां ेस पाट के समथक एक अखबार ने एक लेख छापा िजसका शीषक था - 19 साल म सबसे चंताजनक ि थित। अखबार ने माना क छा के आंदोलन और खा ा क कमी से ऐसा लगता है क देश पर सरकार क पकड़ ढीली होती जा रही है। अखबार ने आगे चंता जािहर क क यही हाल रहा तो हंसा क घटनाएं िवकराल प ले लगी और मु क के दूसरे िह स के हालात भी िबहार क तरह हो जाएंग।े हंद ु तान टाइ स ने िलखा क ‘देश का भिव य कई वजह से अंधकार म लगता है, िजसके िलए कां ेस के 19 साल का शासन सीधे तौर पर िज मेवार है।’81 2 वाम क तरफ झुकाव कसी नेता के टके रहने क मता को कभी कम करके मत आंकना... म ये गलती नह क ं गा, खासकर उस क मीरी के बारे म जो संयोग से पंिडत नेह क बेटी भी है! एक अनाम भारतीय तंभकार, मई 1966 I 1967 म होने वाला भारत का आम चुनाव आजादी के बाद देश का चौथा आम चुनाव था। यह पहला आम चुनाव था, जो जवाहरलाल नेह क मृ यु के बाद हो रहा था। 1966 के आिखर म एक अमे रकन पि का ने अपने रपोटर को चुनाव का जायजा लेने भारत भेजा। वह भारत म े ीय तनाव, धा मक क रता और भाषायी िविभ ता देखकर भौच ा रह गया। इन सब चीज से बढ़कर जो सम या थी, वो थी खा ा क कमी, मु ा फ ित क दर और िवकराल होती आबादी क , जो सारी तर को कु तरती जा रही थी। इन सम या के बीच ये कयास लगाया जा रहा था क शायद 1967 का आम चुनाव, कराया ही न जाए। उस रपोटर को ऐसा लगा क कानून- व था क ि थित इतनी िबगड़ जाएगी क शायद पड़ोसी देश पा क तान और बमा क तरह यहां भी सेना, स ा पर क जा कर लेगी। ऐसी आशंका क जा रही थी क भारत म मौजूदा व था के असफल हो जाने का मतलब होगा, अमे रका ारा िवयतनाम म चलाए जा रहे अिभयान को ध ा लगना, जो वह एिशया म ि थरता और आ थक खुशहाली लाने के िलए कर रहा था।1 एक औसत पि मी या ी के िलए हंद ु तान एक िविच , बि क अितशय िविभ ता का देश था। वह प कार अपने पहले भारत दौरे पर या यूं कह क आखरी भारत दौरे पर आया था। ले कन ऐसा नह था क भारत उसी को ऐसा लगा था, बि क एक दूसरा प कार, जो भारत म लगातार 6 साल तक रह चुका था और देश को बेहतर जानता था, उसक भी भारत के बारे म यही राय थी। उस प कार का नाम नेिवले मै सवेल था, जो लंदन टाइ स म काम करता था। 1967 के शु आती स ाह म उसने ‘भारत के िबखरते ए लोकतं पर लेख क एक शृंखला’ िलखी। जैसे मै सवेल ने अनुभव कया क अकाल का खतरा मंडरा रहा था और सरकार कु छ भी कर पाने म नाकाम हो रही थी। जनता आमतौर पर सरकार को मानने लगी थी। सरकार और सरकारी पाट जनता का भरोसा खो चुक थ , बि क उनका खुद म भी भरोसा ख म हो चुका था। मै सवेल के मुतािबक इन तमाम सम या ने ‘संसदीय लोकतं के िखलाफ आमलोग को मानिसक प से तैयार करना’ शु कर दया था। मै सवेल ने राजनीितक प से जाग क भारतीय से बातचीत के आधार पर पाया, ‘वे हारे ए इं सान क तरह लग रहे थे। वे अित र प से सतक थे और उ ह अपना भिव य िसफ अंधकारमय ही नह , बि क अिनि त भी लग रहा था।’ मै सवेल क िनजी राय ये थी क ‘पूरे भारत के ऊपर खतरा मंडरा रहा था।’ उसके मुतािबक देश ‘अंदर से खौल’ रहा था और ‘ ांत ने पहले ही उप-रा क तरह वहार करना’ शु कर दया था। उसका िन कष साफ था क भले ही भारतीय अपने चौथे और संभवतः अंितम चुनाव के िलए मतदान कर रहे ह , ले कन लोकतं के दायरे म भारत को िवकिसत करने का एक महान योग नाकामयाब हो चुका था। मै सवेल क राय म इतनी ज दी लोकतं के चरमराने से देश त काल दूसरा उपाय ढू ंढ़ेगा। उसे लगा क हालात अगर ऐसे ही रहे और अनाज क आपू त और आबादी के िव फोट को रोका नह गया, तो एक वि थत सरकार काम नह कर पाएगी। ऐसी सूरत म सेना ही वो एकमा संगठन होगी, जो देश को बचा पाएगी। सेना का स ा म आ जाना तय लग रहा था। ले कन कह न कह यह संदह े कायम था क या वाकई ऐसा हो पाएगा? मै सवेल को लगा क खा ा क कमी और जनता म बढ़ते ए असंतोष क वजह से हो सकता है क रा पित क ताकत बढ़ा दी जाए, जो देश म ि थरता लाने के िलए क और रा य पर यादा िनयं ण रख सके । रा पित को सेना का समथन ा होगा, जो शासन म यादा भूिमका अदा कर पाएगी। ऐसी सूरत म रा पित स ा का वा तिवक क बन जाएगा या नह तो सैिनक अिधका रय और राजनीित के कसी गुट का नाममा धान होगा।2 II 1967 के आम चुनाव के कु छ बेहतरीन जनांकक य शोध और अ ययन उपल ध ह, जो अलग-अलग लोकसभा े म उन िव ान ने कए ह, िज ह वहां क सं कृ ित और सामािजक संरचना का ान था। ये शोध बताते ह क ये चुनाव कोई जनता के ऊपर थोपा गया चुनाव नह था, न ही ये कोई अजनबी योग जैसा था। अब तक चुनाव का पूरी तरह से भारतीयकरण हो चुका था और ये भारतीय जीवन का िह सा बन चुके थे। यह एक ऐसा उ सव था, िजसके अपने िनयम-कायदे थे और यह हरे क पांच साल पर दोहराया जाता था। लोग िजस उ साह और ऊजा से इन चुनाव म िह सा लेते थे, वो नेता क रै िलय और उनके भाषण के दौरान साफ देखा जा सकता था। रं ग-िबरं गे पो टर और आकषक नार से पूरा माहौल रं गीन हो उठता था, िजसम अपने नेता क तारीफ और िवपि य क आलोचना होती थी। लोकसभा और िवधानसभा दोन ही चुनाव म जबद त घमासान होता था। कां ेस का िवरोध करने वाल म कई वामपंथी िमजाज क पा टयां थ , तो कई दि णपंथी भी थी। वामपंिथय म क युिन ट पाट और समाजवादी प रवार क पा टयां थ , तो दूसरी तरफ दि णपंिथय म जनसंघ और वतं पा टय जैसे राजनीितक दल थे। कु छ रा य मं◌े कां ेस को े ीय पा टय से चुनौती िमली, जैसे पंजाब म अकाली दल से और म ास म डीएमके से। सामािजक-आ थक बदलाव पर ए शोध बताते ह क बीस साल से चल रही आ थक िवकास क या ने राजनीितक ित पधा को ज टल बना दया था। अ सर चुनाव मैदान म उतरने वाले उ मीदवार पहले ही कसी न कसी कू ल, काॅलेज, कोआॅपरे टव सोसाइटी या सं था को चला रहे होते थे। ये सं थाएं उनक ित ा म इजाफा करती थ और मतदाता का समथन जुटाने म उनक मदद करती थ ।3 1967 का चुनाव पहला चुनाव था, िजसक थोड़ी सी याद मेरे जेहन म ताजी है। िहमालय क घा टय म बसे मेरे छोटे से शहर म, मुझे उस समय का एक राजनीितक नारा जो याद आ रहा है वो ये है - जनसंघ को वोट दो... बीड़ी पीना छोड़ दो। बीड़ी म तंबाकू है, कां ेस वाला डाकू है...! ये नारे बड़े ही जोशो-खरोश के साथ चुनाव चार के दौरान गाए जाते थे। उस नारे का संदश े ये था क कां ेस पाट चोर से भरी पड़ी है और चु ट म खतरनाक क म का पदाथ तंबाकू है। दोन का ही याग कर और जनसंघ को अपनाकर जनता अपने आपको और सरकार को शु कर लेगी! इस नारे म ऐसा संदश े था, िजससे कई लोग अपना जुड़ाव महसूस करते थे। इं िडयन इं टी ूट आॅफ पि लक ओिपिनयन के याित ा चुनाव सव णकता ई.पी.ड यू. डा को टा ने 13 ांत म चुनाव से ठीक पहले ए अपने सव ण म पाया क कां ेस आम लोग म अपना बड़ा समथन खो चुक थी। वह एक िवजेता के प म नह बि क एक हारी ई पाट के तौर पर चुनाव लड़ रही थी। सव ण ने दावा कया क कां ेस, क म अपनी स ा बचा सकती है ले कन उसके मत ितशत म 2 से 3 फ सदी क िगरावट होगी और पाट को लोकसभा म करीब 50 सीट का नुकसान उठाना पड़ेगा। सव ने आगे दावा कया क इससे भी बुरी गत पाट क रा य म होगी। डा को टा के मुतािबक के रल, म य देश, राज थान, पि म बंगाल, िबहार, उ र देश, पंजाब और शायद उड़ीसा म भी गैर-कां ेसी सरकार बन सकती ह। सवाल ये है क कां ेस का समथन य कम हो रहा था? सव ण ने दावा कया क एक समय कां ेस के वफादार रहे अ पसं यक समुदाय के लोग कां ेस से नाखुश थे और युवा क एक बड़ी तादाद और कम पढ़े-िलखे लोग भी कां ेस से मोहभंग महसूस कर रहे थे। टेबल - 19.1 भारतीय चुनाव म कां ेस का दशन (1952 - 67) दूसरी तरफ िवप पहले से यादा संग ठत था। अिधकांश रा य म गैर-कां ेसी पा टय ने चुनाव म सीट का तालमेल कर िलया था, िजसका मतलब था क पहले क तरह कां ेस को िवप ी मत के दोतरफा या चौतरफा बंटवारे का फायदा नह िमलने वाला था। डा को टा के चुनाव िव ेषण के मुतािबक भारत का चौथा आम चुनाव आधुिनक भारत के इितहास म दूसरी अ हंसक ांित सािबत होने वाला था। पहली ांित 1919 म महा मा गांधी ारा शु क गई थी, िजसक प रणित 1947 म देश क आजादी म ई थी। तबसे क सरकार और कु छ समय तक के रल को छोड़कर सभी रा य क स ा पर कां ेस का ही क जा रहा था। अब इस चुनाव से ये संदश े जाना था क देश क स ा पर कां ेस क च ानी पकड़ ढीली होने वाली है। डा को टा का िन कष यहां यान देने यो य है। उसने कहा क ‘एक राजनीितक दल के उ मीदवार के िलए ये चुनाव, महज एक चुनाव हो सकता, िजसम स ा क लड़ाई हो, ले कन एक राजनीित शा के िव ाथ के िलए यह अतीत से अलगाव का एक नायाब ण है। यह वैसा ही ण है जैसा करीब आधी शता दी पहले(1919) आया था। इसे आप िनि त तौर पर िव ोह क ेणी म नह रख सकते, ले कन इसम कोई दो मत नह क इस चुनाव के नतीजे कसी ांित से कम नह ह गे।’4 चुनाव नतीज क भिव यवािणयां अ सर गलत और ामक िनकलती ह। ऐसा पूरी दुिनया म होता है, और भारत म शायद इसका रकाॅड कु छ यादा ही खराब है। ले कन चुनाव के नतीजे सामने आए, तो डा को टा पूरी तरह सच सािबत ए। उनके अनुमान पूरी तरह सही िनकले। लोकसभा म कां ेस के सीट क सं या 361 से घटकर 283 रह गई, जब क ांत म इसे और भी बुरी हार का सामना करना पड़ा। पाट के िगरावट क ि थित तािलका 19.1 से प है। III कां ेस को िजस सूबे म सबसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा, वो दि णी रा य म ास था। यहां डीएमके ( िवड़ मुने ा कड़गम) ने चुनाव म भारी जीत दज क और पाट ने िवधानसभा क 234 सीट म से 138 पर क जा कर िलया। कां ेस महज 50 सीट पर िसमट गई। डीएमके के नेता सी.एन. अ ादुरई को मु यमं ी पद क शपथ दलाई गई। म ास ब त पहले से कां ेस का गढ़ रहा था और अतीत और वतमान म भी पाट के बड़े-बड़े नेता वहां से आए थे। ले कन बदले हालात म के . कामराज जैसे क ावर नेता भी डीएमके क आंधी म ितनके क तरह उड़ गए। उ ह उनके ही गृह े िव धुनगर म एक 28 साल के छा नेता पी. ीिनवासन ने हरा दया। जब ये खबर म ास प च ं ी तो ज म डू बे ए डीएमके कायकता ने ीिनवासन नाम के एक दूसरे नौजवान को खोजकर घोड़े पर िबठाया और पूरे शहर म िवजय जुलूस िनकाला। कां ेस अ य क हार के बारे म एक स मािनत सा ािहक ने िलखा क ‘देश और िवदेश म भी, राजनीितक ित ा क अगर बात क जाए तो कामराज क हार, देश क आजादी के बाद कां ेस के िलए सबसे बड़ा झटका है।’5 कां ेस सरकार का रा य म अ छा रकाॅड था। उसका शासन साफ-सुथरा माना जाता था। कु छ जानकार क राय म डीएमके ने 1965 क हंदी-िवरोधी लहर के आधार पर चुनाव जीत िलया। ले कन यान देने क बात ये है क हंदी-िवरोधी आंदोलन डीएमके ारा दशक के सांगठिनक काय के बदौलत ही संभव हो पाया था। डीएमके ने क ब और गांव तक म अपने संगठन का िव तार कर िलया था और वहां उसके े ीय कायालय बन चुके थे। इन इलाक म पैठ बनाने म लोकि य तिमल फ म उ ोग ने उसक बड़ी मदद क । इसके बड़े नेता म से एक एम. क णािनिध तिमल फ म के कामयाब पटकथा लेखक थे। सबसे अहम बात ये थी क अपने जमाने के महान तिमल अिभनेता एम.जी. रामचं न (एमजीआर) डीएमके को नैितक और आ थक प से मदद कर रहे थे। एमजीआर, मूल प से के रल के रहने वाले थे ले कन उनका ज म मलाया म एक बागान िमक के घर आ था। तिमलनाडु क जनता, खासकर गांव और क ब म दीवानगी क हद तक उ ह चाहती थी। पद पर उनक छिव एक ऐसे नायक क थी, जो शैतानी और शोषण करने वाली ताकत से लड़ता था। ऐसी ताकत अ सर पुिलस अिधकारी, जम दार, िवदेशी लुटेरे और रा य क दमनकारी नीितयां आ करती थ , िजसके िखलाफ एमजीआर िजहाद करते नजर आते थे। उनक फ म बाॅ स आॅ फस पर जबद त कामयाब होती थ और लोग बार-बार उनक फ म देखते। मिहला म वे खासतौर पर लोकि य थे। पूरे म ास ांत म एमजीआर मनरम (फै न लब) थािपत थे। इन लब म उनक फ म और उनक राजनीित के बारे म बहस होती थी। एमजीआर, लंबे समय से डीएमके के समथक थे। उ ह ने पाट को काफ आ थक सहायता भी दी थी और हमेशा उसक रै िलय और समारोह म भाषण देने को तैयार रहते थे। 1967 के चुनाव से ठीक एक महीना पहले एमजीआर पर गोली चलाई गई और वे घायल हो गए। उन पर ये हमला उनके ित ं ी फ म टार एम.आर. राधा ने करवाया था। (जािहर तौर पर हमले क वजह वही थी िजसके िलए पु ष, आमतौर पर फसल जाते ह और फ मवाले खासतौर पर) उस चुनाव के चार म गांव और क ब म घायल एमजीआर क त वीर िचपका दी ग और वोट मांगे गए। अपने नायक क पाट को िजताने के िलए लोग बड़ी तादाद म मतदान क पर प च ं गए। एमजीआर ने खुद भी चुनाव लड़ा और बड़े अंतर से जीत दज क , वह उनक पाट डीएमके पूरे सूबे म छा गई।6 स ा म आने के बाद डीएमके ने धमाके दार पारी शु क । एक राजनीितक टीकाकार क राय म इसने अपनी नीितय को जोरदार ढंग से लागू करने क कोिशश क और लोकलुभावन योजना पर अमल करना शु कया। जहां कां ेस ने रा य म बड़ी औ ोिगक प रयोजना को लाने का काम कया था, वह डीएमके ने ऐसी योजना पर काम शु कया, जो पाट को त काल फायदा दे सके । उसने नौक रय म िनचली जाितय के िलए आर ण क सीमा बढ़ाने का काम कया, जो इसके समथन के मु य आधार थे। अनाज के कारोबार पर कड़ा िनयं ण रखा गया और शहरी गरीब के िलए भी कम दाम पर खा ा क व था क गई। इस बीच े ीय गौरव क भावना को उजागर करने के िलए तिमल सं कृ ित और भाषा पर अंतरा ीय समारोह आयोिजत कया गया, िजसम 20 देश के िव ान ने िह सा िलया। इस समारोह म मु यमं ी ने उ मीद जािहर क क एक दन तिमल, पूरे भारत के िलए संपक भाषा बन जाएगी।7 IV कां ेस के रल म भी हार गई। वहां वाम पा टय के गठबंधन ने इसे हरा दया। 1963 म भारतीय क युिन ट पाट म िवभाजन हो गया और नई पाट का नाम, क युिन ट पाट आॅफ इं िडया (मा सवादी) या मा सवादी क युिन ट पाट (सीपीएम) रखा गया। सीपीएम म यादा ऊजावान नेता थे, िजनम ई.एम.एस. न बूदरीपाद जैसे नेता भी थे। के रल िवधानसभा क 133 सीट पर ए चुनाव म सीपीएम के 52 िवधायक जीतकर प च ं ,े सीपीआई के 19, जब क कां ेस के महज 30 ही जीत पाए। वामदल के गठबंधन क सरकार बनी और ई.एम.एस. न बूदरीपाद को दूसरी बार मु यमं ी पद क शपथ दलाई गई। कां ेस, के रल म पहले भी हारी थी, ले कन इसे बड़ा ध ा तब लगा जब यह पि म बंगाल म हार गई। यहां पाट 1947 के बाद कभी नह हारी थी। बंगाल म संयु मोचा - वाम मोचा गठबंधन, चुनाव म िवजयी रहा िजसके घटक थे बंगला कां ेस (जैसा क नाम से ही साफ है, ये मूल कां ेस से ही अलग ई पाट थी) और सीपीएम। 280 सद य वाली िवधानसभा म कां ेस को 127 सीट िमल जब क सीपीएम और बंगला कां ेस को मशः 43 और 34 सीट िमली। दूसरी कई छोटी वाम पा टय क सहायता से ये गठबंधन कसी तरह ब मत जुटाने म कामयाब रहा। बंगला कां ेस के नेता अजय मुखज बंगाल के नए मु यमं ी बनाए गए। इस सरकार म लंदन से पढ़कर आए शहरी छिव के योित बसु को उप-मु यमं ी बनाया गया, जो काफ समय से बंगाली वामपंथ का स य चेहरा थे। बसु और उनके कु छ सािथय ने सोचा क उनक पाट सरकार म रहकर सरकार क नीितय को भािवत कर सकती है। जब क पाट के दूसरे नेता, खासकर पाट के मु य संगठनकता, मोद दास गु ा का मानना था क पाट को कभी भी सरकार म शािमल नह होना चािहए था।8 भारत म क युिन ट आंदोलन के अंद नी सै ांितक िववाद पर एक पूरी क पूरी कताब िलखी गई है। ले कन हम यहां िसफ यही जानना है क 1963 म क युिन ट पाट के िवभाजन क दो अहम वजह या थ ? एक का संबंध देश से बाहर से था, जब क दूसरे का संबंध पाट के भीतर ही था। ले कन दोन ही मामले एक दूसरे से जुड़े ए थे। मूल पाट सीपीआई, सोिवयत संघ क क युिन ट पाट से पूरी तरह जुड़ी ई थी। इसी वजह से इसने भारत म सश ांित का िवचार छोड़ दया था ता क भारत और सोिवयत संघ के बीच संबंध खराब न ह । जब क अलग आ धड़ा सीपीएम सोिवयत और चीनी क युिन ट पाट दोन से ही बराबरी के भाईचारे का संबंध रखना चाहती थी। इसका मानना था क भारतीय स ातं बुजुआ - जम दार वग ारा संचािलत है। सीपीएम का ये भी मानना था क संसदीय लोकतं महज एक दखावा है और इसका इ तेमाल अपनी सुिवधा के िहसाब से कया जाता है।9 सीपीएम के सरकार म शािमल होने को लेकर पाट म भारी बहस ई। योित बसु इसके समथन म थे जब क मोद दास गु ा इसके िवरोध म। आिखरकार पाट सरकार म शािमल ई और इससे पाट काडर क उ मीद ब त बढ़ ग । इसका शु आती संकेत तभी िमल गया, जब स ा म आते ही ह रं गटन रोड का नाम बदलकर सा यवादी आंदोलन के एक अंतरा ीय नेता हो ची िम ह के नाम पर रख दया गया। इससे िवयतनाम यु के चरम पर अमे रका के वािण य दूतावास का पता 7, हो ची िम सरणी, कलक ा हो गया! यहां तक तो ठीक था, ले कन इसके बाद कई अहम फै सले लेना क ठन होता चला गया। 1967 के वसंत म दा ज लंग िजले के न सलबाड़ी गांव म एक भूिम िववाद शु आ। न सलबाड़ी भौगोिलक प से ऐसे थान पर था जहां पि म म नेपाल क सीमा लगती थी, तो पूरब म पा क तान क । ित बत, भूटान और िस म भी वहां से ब त दूर नह था। िहमालय के ढलान वाले इन इलाक क अथ व था का मु य आधार चाय क खेती थी, जो मु यतः ि टश कं पिनय ारा क जाती थी। इस इलाके म जमीन क कमी और उसके िववाद का एक इितहास रहा था। जहां बागान िमक अपनी खुद क जमीन चाहते थे, वह थानीय बटाईदार, सूदखोर जम दार से छु टकारा पाना चाहते थे। न सलबाड़ी इलाके म सीपीएम से ता लुक रखने वाली कृ षक सिमित ने गांव के गरीब को संग ठत कया। इसके नेता कानू सा याल थे, जो म यवग य प रवार से आने वाले एक ांितकारी थे। कानू ने ामीण इलाक म काम करके अपने समथक का एक बड़ा वग तैयार कया था। माच, 1967 के अंत से सिमित ने रै यत क जमीन खाली करवाने वाले और अ क जमाखोरी करने वाले जम दार के िखलाफ िवरोध दशन क एक शृंखला शु कर दी। यह आंदोलन यादा हंसक होता गया। कई बार इसक पुिलस से भी झड़प ई, जो हंसा पर उता थी। इन हंसक घटना म एक िसपाही क मौत हो गई और पुिलस ने भीड़ पर गोली चला दी। अब कसान नेता ने हिथयार उठाने का फै सला कर िलया और जम दार के िसर कलम कए जाने लगे। उ र बंगाल म इस िवरोध क जड़ भूिम के असमान िवतरण म छु पी थ । अगर सीपीएम स ा म नह आई होती तो ये िवरोध नह हो पाता। कु छ कायकता और कसान ऐसा सोचने लगे थे क जब उनक पाट स ा मे आ गई है तो ये उनके िलए माकू ल व है क वे सामंती व था से अपने िहसाब से िनपट। ले कन उ ह ता ुब तब आ, जब पाट ने कानून और व था का प ले िलया। 1967 क ग मय के अंत तक न सलबाड़ी म करीब 1500 पुिलस के जवान तैनात कर दए गए। कानू सा याल और उनके सहयोिगय को जेल म डाल दया गया जब क दूसरे आंदोलनकारी जंगल म छु प गए।10 अचानक न सलबाड़ी, भारतीय ांितका रय के िलए एक िमसाल बन गया। उस गांव के नाम पर इलाके को न सलबाड़ी कहा जाने लगा और उसके बाद देश म कह भी िजस कसी ने शोिषत और वंिचत के हक म भारतीय रा य से संघष कया, उसे न सलाइट के नाम से जाना जाने लगा। ांितकारी के बदले न सलाइट एक ऐसा श द था, जो एक वग के िलए लगाव और जुनून पैदा करता था तो दूसरे वग के िलए घृणा और उपहास।11 चीन क क युिन ट पाट ने न सलाइट आंदोलन के ित समथन जािहर कया। जून, 1967 के आखरी स ाह म पीक ग रे िडयो ने घोषणा क क भारत के पि म बंगाल म दा ज लंग िजले म भारतीय क युिन ट पाट क अगुआई म कसान क एक सश संघषवािहनी का गठन कया गया है। यह सश ांित का अि म द ता है जो भारत के लोग ारा माओ से तुंग क िश ा के मुतािबक शु क गई है। यह संघष मौजूदा व म भारतीय ांित के सामा य झान क नुमांइदगी करता है। हंद ु तान, चीन और दुिनया भर के लोग इस ांितकारी सश संघष का वागत करते ह।12 हालां क ांित क पहली चंगारी न सलबाड़ी से उठी थी, ले कन आं देश म भी माओवा दय के दूसरे गुट ांित क तैयारी कर रहे थे। आं देश के न सलाइट दो इलाक म स य थे। पहला इलाका था तेलंगाना जब क दूसरा था ीकाकु लम। तेलंगाना पहले भी 1946 से 49 के दौरान क युिन ट िव ोह का गवाह रह चुका था, जब क ीकाकु लम, उड़ीसा से सटा आ िजला था। इन दोन ही इलाक म मु य झगड़ा जमीन और जंगल पर अिधकार को लेकर था। इन दोन ही मामल म मु य शोषणकता रा य सरकार और जम दार वग था जब क शोिषत होने वाल म कसान और खासतौर पर आ दवासी थे। दोन ही जगह क युिन ट आंदोलन का मु य उ े य जमीन का समान िवतरण, जंगल के उ पाद पर हक और उिचत मजदूरी जैसे मु पर जोर देना था। ीकाकु लम म संघष क कमान एक कू ल िश क वेमपटापू स यनारायण के हाथ म थी। उसके नेतृ व म आ दवािसय ने कई मजदूर हड़ताल क । जम दार के खेत को लूट िलया गया और अनाज को ज रतमंद म बांट दया गया। 1967 के अंत तक जम दार ने पुिलस क सहायता ली और पुिलस ने सैकड़ शनका रय को िगर तार कर िलया। स यनारायण और उसके सािथय ने हिथयार उठा िलया। जम दार और सूदखोर के घर पर हमला कया गया और उनके कागजात को आग लगा दी गई। इसके जवाब म रा य सरकार ने और भी पुिसल के जवान भेज।े 1969 क शु आत तक िजले म िवशेष हिथयारबंद पुिलस के कम से कम 9 लाटू न तैनात कर दए गए। तेलंगाना म संघष का नेतृ व तरीमाला नागी रे ी के हाथ म था। वह क युिन ट आंदोलन का पुराना और व र नेता था। उसने कसान को साल तक संग ठत कया था और रा य क िवधानसभा के िलए भी कई बार चुना गया था। उसने संसदीय लोकतं को बेकार मानकर उसे ितलांजिल दे दी थी। उसने सीपीएम से भी इ तीफा दे दया था और एक बार फर से ांित क अलख जगाने गांव क ओर िनकल पड़ा था। रे ी ने क युिन ट पाट के जमीनी कायकता क सहायता से कसान -मजदूर को संग ठत कया। उसने मजदूरी म बढ़ोतरी और सरकारी कायालय से ाचार के खा मे क मांग क । युवा ांितका रय को हिथयार चलाने का िश ण दया गया। िजला को कई े म बांटा गया और हरे क े क िज मेवारी दलम या सम पत ांितका रय के समूह को स पी गई।13 उधर पि म बंगाल म गठबंधन सरकार एक साल के भीतर ही िगर गई। रा य म रा पित शासन लगा दया गया। उसके बाद ए चुनाव म सीपीएम क सीट क सं या बढ़कर 80 हो गई। अब नए गठबंधन म, िजसम बंगला कां ेस भी शािमल थी, सीपीएम सबसे बड़ा घटक थी। अजय मुखज एक बार फर से मु यमं ी बनाए गए जब क गृह िवभाग सीपीएम ने अपने पास रखा। इस तरह सीपीएम, बंगाल म गठबंधन सरकार म बड़े भाई क हैिसयत म आ गई। वो दौर बंगाल के िलए भारी उथल-पुथल का दौर था। उस दौर पर द एगोनी आॅफ वे ट बंगाल और द िडसइनहे रटेड टेट जैसी कई पु तक िलखी ग । इस उथल-पुथल भरे माहौल क एक वजह रा य और क का संबंध भी था। भारत सरकार रा य म कानून- व था को लेकर चंितत थी जब क स ाधारी कां ेस पाट खुद बंगाल म ई हार से अभी तक उबर नह पाई थी। रा य के रा यपाल इसम क के मोहरे बने ए थे। वे क और कां ेस क तरफ से थानीय राजनीित के साथ िनरं तर संवाद म थे। रा य िवधानसभा म अ सर हंगामा और शोरशराबा होता था। एक बार तो खुद रा यपाल को ही िवधानसभा म औपचा रक भाषण देने से जबद ती रोक दया गया। उ ह पुिलस सुर ा म वहां से िनकलना पड़ा।14 झगड़े क दूसरी वजह थी सरकार म शािमल दोन अहम पा टय का आपसी संबंध। जहां अजय मुखज और उनक बंगला कां ेस सरकार क मशीनरी को सुचा प से चलाना चाहते थे, वह सीपीएम धरना, दशन और हंसा से दबाव डालकर काम िनकालना चाह रही थी। कलक ा और इसके आसपास के कारखान म मजदूर अ सर घेराव करने लगे। वे कारखान म मैनेजर को घेरकर और धमकाकर अपना वेतन बढ़ाना चाहते थे। वो जमाना बीत चुका था जब बंधन पुिलस को बुला लेता था, ले कन अब ऐसा िनयम बना दया गया क इस तरह के मामले पहले म मं ी (सीपीएम का नुमाइं दा) के पास िवचार के िलए जाएंगे। यह मजदूर को हड़ताल करने के िलए खुलेआम िनमं ण देने जैसा था। एक अनुमान के मुतािबक संयु मोचा-वाम मोचा सरकार के पहले छह महीने म करीब 1200 घेराव क घटनाएं ।15 कलक ा म हो रही इन घटना पर ि टश ेस ने काफ हायतौबा मचाया। इसक कु छ वजह तो ये थी क वहां क ब त सारी कं पिनय के मािलक अं ेज थे और दूसरी वजह ये थी क कभी कलक ा ि टश भारत क राजधानी रहा था। ि टश अखबार क सु खयां कु छ यूं होती थी - ‘पि म बंगाल म अभी और हंसा क आशंका’ या फर ‘तोड़फोड़ क आशंका से बंगाल िवधानसभा बंद’। ब त सारे भारतीय और अं ेज कारखाना मािलक ने फै ि यां बंद कर द । ब त ने अपने कारखाने दूसरी जगह थानांत रत कर िलए। इस तरह पूंजी पलायन क एक या शु हो गई और कलक ा हंद ु तान के मुख औ ोिगक शहर का दजा खोता चला गया।16 बंगाल क इस दशा से िसफ पूंजीपित ही चंितत नह थे, बि क इस अराजक माहौल ने बंगाल के मु यमं ी को भी चंितत कर दया था। उ ह ने पाया क ये सब उप व सीपीएम के इशारे पर हो रहा था, िजसके अधीन भूिम, म और गृह जैसे मं लय थे। भूिम और म वे मं लय थे जहां से सम या शु होती थी और गृह वो मं लय था, जो इसका िनदान कर सकता था, ले कन वा तव म करता नह था। पुराने गांधीवादी रहे बंगाल के मु यमं ी अजय मुखज ने इस सम या के समाधान के िलए अलग ही उपाय अपनाने का फै सला कया। उ ह ने रा य म चल रहे िवरोध दशन के िवरोध म स या ह करने का फै सला कया। उ ह ने िजल का दौरा कया और अपने भाषण म सीपीएम क समाज म िवभेदकारी नीित के िलए आलोचना क । 1 दसंबर को उ ह ने दि ण कलक ा के कजन पाक म 72 घंटे के उपवास का फै सला कया। कजन पाक, कलक ा का मुख सावजिनक थल था। भारतीय स या ह के समृ इितहास म यह स या ह वाकई िविच क म का था, जहां एक मु यमं ी अपनी ही सरकार क नाकामयाबी के िखलाफ स या ह कर रहा था।17 संघष क तीसरी वजह थीः सीपीएम और न सलाइट के बीच का संबंध। अब न सिलय ने अपनी पाट बना ली थी, िजसका नाम था क युिन ट पाट आॅफ इं िडया (मा सवादी-लेिननवादी) यानी सीपीआई-माले। िजला-दर-िजला, पाट के काडर मूल पाट छोड़कर थोक के भाव म माले म शािमल होते जा रहे थे। कु छ ऐसा ही हो रहा था जैसे 1963-64 म सीपीआई से नाता तोड़कर सीपीएम बना था। दोन पा टय के बीच जबद त ित िं ता थी, जो अ सर हंसक भी हो जाती थी। सीपीआई (माले) के नेता चा मजूमदार ने जम दार और सीपीएम काडर के खा मे क अपील क । जम दार के खा मे क अपील इसिलए क गई य क वे वग श ु थे, जब क सीपीएम के लोग उनक िनगाह म अपे ाकृ त दि णपंथी झुकाव वाले लोग थे। इसके जवाब म सीपीएम ने एक िनजी सेना का गठन कया (लोग को िमत करने के िलए इसका नाम वयंसेवी सेना रखा गया)। इस सेना का गठन इसिलए कया गया ता क लोकतांि क जन ांित को आगे बढ़ाया जा सके ।18 ि टश भारत क तरह ही खु फया यूरो क उस व क कु छ रपोट उपल ध ह, िजनम इन राजनीितक उथल-पुथल को बेहतरीन तरीके से दज कया गया है। आईबी (खु फया यूरो) क एक रपोट के मुतािबक 19 माच से लेकर 4 मई, 1970 तक यानी महज छह स ाह के अंतराल म तोड़फोड़ और धरना- दशन क 137 बड़ी घटनाएं ई थ । ये रपोट कई दूसरे शीषक के अधीन वग कृ त ह। कु छ रपोट के शीषक ह - सीपीएम बनाम सीपीआई, सीपीएम बनाम कां ेस। आंदोलनका रय ने रा य के िखलाफ भी काफ तोड़फोड़ क थी। ऐसी एक रपोट का शीषक था - सीपीएम बनाम पुिलस दल या फर चरमपंथी बनाम पुिलस कां टेबल। यह रपोट मालदा म न सिलय ारा पुिलस टेशन पर हमले क घटना पर बनाई गई थी, िजसम न सिलय ने एक पुिलस के िसपाही को कु हाि़डय से मार डाला था और हिथयार लूट िलए। एक रपोट को ‘चरमपंथी छा बनाम उपकु लपित’ के शीषक से िलखा गया है, िजसम जादवपुर यूनीव सटी क घटना का िज है। इस घटना म माओवाद से सहानुभूित रखने वाले छा ने कई घंटे तक वाइस चांसलर को उसके आॅ फस म बंद करके रखा और फन चर को तोड़ डाला। जाते-जाते उ ह ने वाइस चांसलर के कायालय क दीवार पर माओवादी नारे भी िलख डाले।19 न सिलय ने सोचा था क गांव म वे जम दार का िसर कलम करके अपने उ े य क पू त कर सकते ह जब क शहर म पुिलस टेशन पर हमला करके ऐसा कया जा सकता है। कभी कप लंग ने कलक ा को भयानक रात वाला शहर कहा था, ले कन अब कलक ा म दन भी भयानक होने लगे थे। कलक ा म शाम होने से पहले दुकान बंद हो जाया करत और सूया त के समय तक गिलयां वीरान हो जात ।20 एक अखबार के संवाददाता ने िलखा क इस उथल-पुथल भरे और सताए ए शहर म कोई भी दन ऐसा नह बीतता था, जब कह कसी पुिलस टेशन या पुिलस के ग ती दल पर बम न फका गया हो। पुिलस लोग के घर पर और काॅलेज हो टल म छापा मारती। एक ऐसे ही छापे म पुिलस को इतने िव फोटक िमले, िजससे 3000 बम बनाए जा सकते थे।21 V एक तरफ दि ण भारत म तिमल गौरव क भावना उफान पर थी तो देश के पूव रा य म वग संघष क बात क जा रही थी। ले कन एक और ांत से कां ेस का वच व ख म हो रहा था। उड़ीसा म वतं पाट और जमीन के मािलक थानीय उ वग के गठबंधन ने कां ेस का सफाया कर दया। उनके चुनाव चार म कां ेस के दो क ावर नेता बीजू पटनायक और बीरे न िम पर आचरण और उनक शाही जीवनशैली को लेकर िनशाना साधा गया था। यह आरोप लगाया गया क स ा म रहते व बीजू पटनायक और बीरे न िम ने ापा रय से घूस ली और अपने दो त और संबंिधय को मलाईदार सरकारी ठे के दए।22 उड़ीसा से ब त दूर देहरादून म वहां क थानीय भाषा म एक लोकि य राजनीितक नारा गूंज रहा था - बीजू, बीरे न कौथी... माडा बोतल जौठी (यानी, जहां कह भी शराब क दो बोतल िमल जाएं, तो समझना क बीजू और बीरे न यह कह ह!) स ा म आते ही वतं पाट और जन-कां ेस क गठबंधन सरकार ने एक जांच आयोग का गठन कया ता क पुरानी सरकार के ाचार का पदाफाश 23 कया जा सके । एक तरफ वाम और दि णपंथी पा टयां कां ेस को तगड़ी चुनौती दे रही थ , दूसरी तरफ कां ेस का खुद का अंद नी संकट भी िवकराल होने लगा। उ र भारत के यादातर रा य म पाट को मामूली ब मत िमला था। यहां मह वाकां ी नेता के मु यमं ी बनने क चाहत ने पाट म िसरफु टौ वल क ि थित पैदा कर दी। पाट के अंदर खेम-े दर-खेमे बनने लगे। उ र देश, म य देश, ह रयाणा और िबहार म कां ेस क सरकार बन ले कन य ही कु छ असंतु ने पाला बदलना शु कया सरकार धे मुंह िगरती गई। राजनीितक श दकोश म एक नये श द ‘संिवद’(संयु िवधायक दल) का ज म आ, िजसे अलग-अलग श द के शु आती अ र को जोड़कर बनाया गया था। नाम से ही साफ था क यह कह क ट, कह का रोड़ा... भानुमित ने कु नबा जोड़ा जैसी व था थी िजसका एकमा उ े य स ा पर क जा करना था। इसम वाम, दि ण और म यममाग सभी तरह क पा टयां शािमल थ ! इन संिवद सरकार म जनसंघ, सोशिल ट पाट , वतं पाट , े ीय पा टयां और कां ेस से आए ए दलबदलू नेता शािमल थे। अ सर ऐसा देखा गया क कां ेस से आए दलबदलु क बदौलत ही इन सरकार ने ब मत ा कया। एक तर पर देखा जाए तो संिवद सरकार के िनमाण ने िनचली जाितय के राजनीितक सशि करण क तरफ इशारा कया था। इन जाितय को भूिम सुधार के कई कानून से फायदा आ था ले कन अभी तक वे राजनीितक शि से वंिचत थे। उ र भारत म ये जाितयां थ - ह रयाणा और उ र देश म जाट, िबहार म कु म और कोईरी, म य देश म लोध और इन सारे रा य म यादव। दि ण भारत म जो जाितयां स ा के िलए अपना दावा पेश कर रही थ , उनम महारा के मराठे , मैसूर के वो ा लंगा, म ास के वेलाल और आं देश म रे ी जैसी जाितयां थ । हंद ू समाज के सामािजक पदानु म म ये जाितयां ा ण से नीचे और अछू त से ऊपर यानी बीच क मानी जाती थ । कई इलाक म ये दबंग जाितय के तौर पर िगनी जाती थ , जो सं या बल म काफ मह वपूण थ और संग ठत भी। एक ही मामले म वे पीछे थ क उनके पास राजनीितक स ा नह थी। तिमलनाडु क डीएमके और उ र भारत म सोशिल ट पाट को मु य तौर पर इ ह जाितय का समथन ा था। सोशिल ट पाट ने उ र भारत म अपना मत ितशत काफ बढ़ा िलया था। मह वपूण बात ये है क कां ेस के कई बागी नेता इ ह जाितय से ता लुक रखते थे। दूसरे तर पर देख तो संिवद सरकार िनजी मह वाकां ा को पूरा करने का नतीजा थ । उदाहरण के िलए म य देश क बात अगर क जाए, तो सम या तब शु ई जब चुनाव से ठीक पहले वािलयर क राजमाता (िवजयराजे संिधया) ने कां ेस छोड़ दी। इसक वजह ये थी क टकट िवतरण म उनसे कोई राय नह ली गई। अपने बेटे माधवराव के साथ उ ह ने कां ेस के िखलाफ पूरे जोर-शोर से चार कया। एक खु फया रपोट ने दावा कया राजमाता ने उस चुनाव म 30 लाख पए खच कए। हालां क कां ेस फर से स ा म आ गई ले कन वािलयर े म कां ेस का सफाया हो गया। खु फया रपोट ने फर दावा कया क अब राजमाता चुनाव चार से भी यादा पैसा खच करने को तैयार थ ता क कां ेस के कु छ सम पत नेता को तोड़ा जा सके और नई सरकार को िगराया जा सके ।24 म य देश के मु यमं ी डी.पी. िम ( ा रका साद िम ) एक घाघ राजनेता माने जाते थे। उ ह राजमाता क इस योजना का पूरा अनुमान था। उ ह ने इससे िनपटने क पूरी तैयारी कर रखी थी। वे खुद भी दूसरी पा टय के दलबदलु के संपक म थे। उ ह ने कां ेस अ य को प भी िलखा था क दूसरी पाट के दलबदलु के िलए उ ह कां ेस का दरवाजा खोलकर रखना पड़ रहा है।25 हालां क इस खेल म राजमाता कामयाब रह और उ ह कां ेस के एक मुख नेता गो वंद नारायण संह को तोड़ने म सफलता िमल गई, जो अपने साथ 28 दूसरे िवधायक को लाने म कामयाब रहे। िवधानसभा म िव ासमत के पहले तक संह ने उन तमाम नेता को अपने घर म कै द कर रखा था। वे खुद राइफल लेकर उनक पहरे दारी करते रहे क कह दूसरी पाट उन िवधायक को तोड़ न ले या उनका अपहरण न कर ले! संिवद सरकार शु से ही अपने कायकाल के बारे म अिन य का िशकार थी। उसके िलए एक-एक दन जीवनदान के बराबर था। ऐसी ि थित म मंि य ने ांसफर और पो टंग को कारोबार म बदल दया। हरे क ांसफर और पो टंग के िलए तयशुदा रकम बांध दी गई। इस तरह सरकार के आदेश, खासकर ांसफर के आदेश िजतनी तेजी से जारी कए जाते उतनी ही तेजी से उसे खा रज भी कर दया जाता। जनसंघ, खासतौर पर िश ा मं लय लेना चाहती थी ता क ाइमरी कू ल म अपना एजडा लागू कर वो एक थाई वोटबक बना सके । हालां क उसे गृह िवभाग से संतोष करना पड़ा, जहां उसने अपने समथक पर लगाम लगाकर कानून व था क ि थित को तो िनयं ण म रखा ले कन ये ज र सुिनि त कया क िवभाग के अहम पद पर कोई मुसलमान न बैठे।26 दलबदल और इसम ए ाचार के बावजूद 1967 का चुनाव आधुिनक भारत के इितहास म दूसरी अ हंसक ांित था। ऐसा ही ई.पी.ड यू. डा को टा ने भी अपने चुनाव सव ण म कहा था। अब अगर कोई ि द ली से कलक ा तक 1000 मील का सफर ेन से तय करता तो वह देश के दय थल से ज र गुजरता, ले कन िन य ही उसे कसी कां ेस शािसत रा य के दशन न होते। कां ेस का वहां सफाया हो गया था, िजस देश म (िजन रा य से होकर) गंगा बहती थी...! VI साठ के दशक के आिखर म े ीयता क भावना उफान पर थी। पुराने हैदराबाद रयासत के िह से, िज ह 1956 म आं देश म िमला दया गया था, ने अलग रा य क मांग क । यह आंदोलन उ मािनया यूनीव सटी के छा क अगुआई म शु आ, िज ह ने आरोप लगाया क आं देश के सारे मलाई तटीय इलाक को उ वग खा रहा है। उनके ारा मांगा जा रहा नया रा य उपेि त अंद नी िजल को क म रखकर काम करने वाला था। इसका नाम तेलंगाना होने वाला था, िजसक राजधानी हैदराबाद होती। नए रा य क मांग करने के िलए हड़ताल और जुलूस िनकाले गए और रे लगाि़डयां रोक ग । दशनका रय ने ‘आं ारा उपिनवेशीकरण’ और पुिलिसया 27 जु म के नारे भी लगाए। हालां क जहां तक पूरे देश क बात थी तो असम के आ दवासी िजल को िमलाकर एक नए रा य क थापना ज र क गई थी। ले कन इस आंदोलन का एक लंबा इितहास था। 1955 म खासी, जयंितया और गारो क पहाि़डय के मूल िनवािसय के िहत क नुमाइं दगी के िलए एक ई टन इं िडयन ाइबल यूिनयन क थापना क गई थी। पांच साल के बाद इसका नाम आॅल पाट िहल लीडस काॅ स (एपीएचएलसी) कर दया गया। 1967 के चुनाव म इन पहाि़डय म एपीएचएलसी ने कां ेस का सफाया कर दया। नगा या िमजो आतंकवाद क तरह यहां भी आतंकवाद न पनप जाए इस भय ने क सरकार को नए रा य बनाने के िलए े रत कर दया। यह दसंबर, 1969 का वाके या है। नए रा य का नाम मेघालय रखा गया, िजसका मतलब होता है बादल का घर।28 इस बीच पंजाब क िवडंबना ये थी क एक पहले से काम कर रहा रा य अपनी राजधानी क तलाश म भटक रहा था। सन् 1966 म रा य के बंटवारे के बाद चंडीगढ़ पंजाब और ह रयाणा दोन क ही राजधानी के तौर पर काम कर रहा था। िसख के अपने तक थे, उनका मानना था क चंडीगढ़ उ ह िमलना चािहए जैसा क क ने इशारा भी कया था। अब पंजाबी सरकार से अपना वादा पूरा करने क मांग कर रहे थे। 1968 और 69 म इस मांग को लेकर भारी दशन ए। अ टू बर, 1969 म व र वाधीनता सेनानी दशन संह फे मल ने चंडीगढ़ क मांग म अनशन करते ए अपनी जान दे दी। धानमं ी ने उनक मृ यु पर अपना संवेदनशील संदश े भेजा। उ ह ने उ मीद जािहर क क फे मल क शहादत पंजाब-ह रयाणा के लोग को करीब लाएगी और सामंज य का कोई न कोई रा ता िनकल आएगा।29 िजस तरह िसख समुदाय के लोग चंडीगढ़ को खासतौर पर अपने िलए चाहते थे उसी तरह महारा के लोग क राय बंबई के बारे म थी। अब शहर म एक नई पाट ज म ले चुक थी। इसका नाम िशवसेना था, िजसे म यकाल के महान मराठा यो ा िशवाजी के नाम पर रखा गया था। कई मायन म यह पाट पुरानी महारा संयु सिमित का ही प थी ले कन अपने नए अवतार म यह उससे भी यादा क र थी। ‘बंबई महारा के िलए’ क जगह इसने ‘बंबई मरा ठय के िलए’ का नारा दया। िशवसेना क थापना बाल ठाकरे नाम के एक काटू िन ट ने क थी, िजसके िनशाने पर दि ण भारत के लोग थे। ठाकरे का मानना था क दि ण भारत के लोग थानीय लोग से नौक रयां छीन रहे ह। ठाकरे ने धोती पहनने वाले म ािसय का अपने लेखन और िच म मजाक उड़ाया और उनके समथक ने उडु पी रे तरां और तिमल-तेलुगु भाषी लोग के घर पर हमला करना शु कर दया। िशवसेना के िनशाने पर क युिन ट भी थे, िजनका शहर क सूती िमल के ेड यूिनयन पर क जा था। सेना ने िमल बंधन से सौदेबाजी कर क युिन ट को खदेड़ना शु कया। बंबई भारत का सबसे बड़ा शहर था। यह देश क िव ीय और औ ोिगक राजधानी तो थी ही, देश का मनोरं जन उ ोग भी यह था। ता ुब क बात ये थी क हंद ु तान के इस सबसे यादा वैि क च र वाले शहर म थानीयता का मु ा कामयाब हो रहा था। इसे कामयाब बनाने वाला तबका था शहरी बेरोजगार का िजसने 1968 के िनगम चुनाव म सेना को 42 सीट पर िवजयी बना दया था। अब बंबई नगर िनगम म िशवसेना, कां ेस के बाद दूसरे नंबर क पाट थी।30 इधर देश क दय थली कहे जाने वाले इलाक म अिधक वाय ता क मांग उठ रही थी, दूसरी तरफ देश क प रिध पर रहने वाले समुदाय और नेता म भी हलचल शु हो रही थी। ये ऐसे लोग और नेता थे, िज ह शु म कभी भी भारत का िह सा मानकर उनके साथ पूरी तरह सामंज यपूवक बताव नह कया गया। माच 1968 म शेख अ दु ला को कोडईकनाल म नजरबंदी से रहा कर दया गया और उ ह घाटी लौटने क इजाजत दे दी गई। यह 1967 के चुनाव के एक साल बाद क घटना है िजसे क मीर म कसी भी तरह वतं और िन प नह कहा जा सकता। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है क 75 िवधानसभा े म 22 सीट पर कां ेस के उ मीदवार िन वरोध चुनाव जीत गए। ऐसा इसिलए आ य क िवप ी उ मीदवार का नामांकन ही र हो गया था!31 अब ीमती गांधी के सलाहकार ही उन पर अ दु ला को रहा करने का दबाव डालने लगे। उ ह ऐसी सूचना िमल रही थी क शेख धीरे -धीरे इस िवचार के िहमायती होते जा रहे ह क भारत म क मीर का िवलय अंितम और अप रवतनीय है।32 1964 क ही तरह शेर-ए-क मीर एक नायक क तरह क मीर लौटे। उ ह ने घाटी म एक खुली जीप म या ा क , लोग म उनको देखने और फू लमाला पहनाने क होड़ लग गई। एक अनुमान के मुतािबक अपने नेता क एक झलक पाने को घाटी म करीब पांच लाख लोग सड़क के कनारे खड़े थे। शेख ने अपने िचर-प रिचत अंदाज म कई अथ वाले बयान जारी कए। कभी उ ह ने कहा क वे क मीर के बारे म भारत सरकार के साथ सारी संभावना पर बात करगे तो कभी उ ह ने कहा क वे क मी रय के वशासन के अिधकार से कोई समझौता नह करगे। एक ि टश अखबार से बातचीत म उ ह ने क मीर सम या के समाधान के तीन-तरफा िवभाजन का फामूला पेश कया। उ ह ने कहा क ज मू भारत के पास रहे और आजाद क मीर पा क तान के पास रहे। क मीर घाटी िजस पर सबसे यादा िववाद था, उसके बारे म उ ह ने कहा क वो 5 साल तक संयु रा के अधीन रहे और उसके बाद वहां जनमत सं ह कराया जाए क वो भारत म िमलना चाहता है या पा क तान म या आजाद रहना चाहता है। शेख क राजनीित पर पर िवरोधी िवचार से भी सामंज य करके चलने क थी ले कन धमिनरपे ता के सवाल पर उनका ख साफ था। जब एक बार छा के बीच का आपसी झगड़ा हंद-ू मुि लम रं ग लेने लगा तो वे ीनगर क गिलय म गए और लोग से शांित क अपील क । उ ह अपने सहयोिगय को शपथ लेने को कहा क वे घाटी म अ पसं यक क जानोमाल और इ त बचाने के िलए अपना खून तक बहाने को तैयार रहगे।33 इस बीच नागालड के िव ोही नई योजनाएं बना रहे थे। फजो लंदन म रह रहे थे जब क आंदोलन क कमान नई पीढ़ी के नेता के हाथां◌े म थी। इजहाक वू और टी मोइबा ऐसे ही युवा नेता थे। इ ह क रपंथी माना जाता था। जहां एक तरफ फजो ईसाइयत के िखलाफ होने क वजह से क युिन ट चीन से मदद लेने के िहमायती नह थे, वह नए नेता को इसम कोई आपि नह थी। ऐसी सूचनाएं आ रही थ करीब 1000 नगा नौजवान बमा के रा ते चीन के यूनान ांत म भेजे गए, जहां उ ह चीनी मशीनगन, मोटार और राॅकेट लांचर चलाने का िश ण दया गया। इधर नागालड म भारतीय सेना और िव ोिहय के बीच भारी झड़प ।34 नागालड क आजादी के समथक आॅ जवर के डेिवड ए टर ने नगा का चीन के साथ तालमेल का खुलकर समथन कया। ए टर ने भिव यवाणी क क नागालड, आयरलड क राह जा रहा है, जहां एक उपिनवेशवादी सरकार को बड़ी अिन छापूवक ीप के दि णी िह से को आजादी देनी पड़ी। चूं क नगा समुदाय के लोग भी आयरलड वाल क तरह ही हठीले थे इसिलए ए टर ने सोचा क अब वे अपने चीनी समथन का बेहतर उपयोग कर सकते ह और अपना वतं वजूद हािसल कर सकते ह। ए टर ने ये भी उ मीद जािहर क क ‘नागालड के समथन म उठनेवाली ि टश आवाज से नई द ली को उस दद का अंदाजा लग जाएगा, जो हम आयरलड म झेलना पड़ा था।’35 VII ले कन देश के िलए परे शानी क बात यह थी क हंद ू और मुसलमान के बीच झगड़े बढ़ने लगे थे। ये बात साठ के दशक के आिखर क है। रा ीय एकता प रषद ारा जारी कए गए आंकड़ां◌ के मुतािबक सन् 1966 म 132, 1967 म 220 और 1968 म 346 सा दाियक घटनाएं (इसम बढ़ोतरी का म 69 और 70 म भी जारी रहा)। अ सर इन घटना क वजह छोटी-छोटी बात ए आ करती थ । कसी मि जद के सामने संगीत बजाने या कसी मं दर के पास गाय काटने जैसी घटना पर दंगे होने लगे थे। कभी-कभी कसी मिहला पर हमला या फर संपि िववाद क वजह से भी दंगा हो जाता था। दंगे क सबसे यादा घटनाएं उ र देश और िबहार म रकाॅड क ग ।36 सा दाियक हंसा म अचानक बढ़ोतरी क एक वजह थी रा य सरकार का ढु लमुल रवैया। खासकर संिवद सरकार इन दंग के ित लगभग आंख मूंदे ए थी और दंगाइय के िखलाफ बल योग से िहचकती थी। दूसरी वजह ये थी क 1965 म लड़ाई के बाद पा क तान िवरोधी भावनाएं उफान पर थ , िजसे आसानी से मुसलमान के िखलाफ मोड़ा जा सकता था। देश म एक वग ऐसा बन गया था, िजसने गलत तरीके से मुसलमान पर दु मन से सहानुभूित रखने का आरोप लगाना शु कर दया। जनसंघ से े रत हंद ु ने मुसलमान पर ऐसा आरोप लगाना शु कर दया। अब जब भी कभी दंगे होते नए क म के नारे गढ़े जाने लगे। ‘हर हर महादेव’ और ‘अ लाहो अकबर’ क जगह ‘पा क तान या कि तान’ जैसे नारे लगने शु हो गए।37 इन दंग म सबसे भयानक दंगा अहमदाबाद का था िजसे गांधीजी ने कभी अपना घर कहा था। दुभा य क बात ये थी यह दंगा गांधीजी क ज म शता दी के ठीक पहले शु आ, जो सरकार के िलए बड़ी शमसार कर देने वाली घटना थी। इस अवसर पर एक बड़ा समारोह आयोिजत कया जाने वाला था, िजसम दुिनया भर क कई गणमा य हि तयां शािमल होने वाली थ । दरअसल आ यह क 12 िसतंबर को एक मुसलमान संत क याद म एक जुलूस िनकाला गया था, िजसम से कु छ िसर फरे लोग साधु क एक टोली म जा घुस।े ये साधु अपनी गाय के साथ मं दर क ओर लौट रहे थे। दोन म भारी बहस ई और इसी बीच कु छ नौजवान मं दर म जा घुसे और मू तय को तोड़ डाला। तब तक कु छ समझदार लोग को ि थित क गंभीरता का अहसास हो गया था। आनन-फानन म एक मुसलमान वक ल क अगुआई म एक ितिनिधमंडल मं दर गया और घटना क नंदा करते ए इसके िलए माफ मांग ली। ले कन मं दर के पुजा रय का गु सा शांत नह आ। जैसे ही लोग को इस घटना के बारे म पता चला, शहर म सनसनी फै ल गई। झुंड के झुंड हंद ू जमा होने लगे और बदला लेने के िलए बेताब हो उठे । कु रान क ितयां जला दी ग और मुसलमान दुकानदार क दुकान लूटी जाने लग । मुसलमान ने य ही इसका िवरोध करना शु कया, पूरे शहर म दंगा फै ल गया। दंगे क लपट अहमदाबाद और उसके आसपास तक फै ल ग । पुिलस मूकदशक बनी रही और दंगाइय के िगरोह पुराने शहर क गिलय म मारकाट मचाने लगे। एक स ाह क मारकाट के बाद शहर म सेना बुला ली गई। इस दंगे म एक हजार से यादा लोग क जान ग और तीस हजार से यादा लोग बेघरबार हो गए। इसम कोई शक नह क इनम यादातर लोग मुसलमान समुदाय से ता लुक रखते थे।38 1967 क ग मय म िबहार के रांची शहर म भयानक दंगा हो गया। इसके तीन साल बाद महारा के जलगांव म भी ऐसा ही आ। इस बीच उ र और पि म भारत के कई शहर म सा दाियक झड़प । लेखक खुशवंत संह ने िलखा भारत के मासूम लोग अब दंग के मा यम से अपने देश का भूगोल जान रहे थे। अलीगढ़, रांची और अहमदाबाद अब भारतीय ानिव ान, सं कृ ित और उ ोग के क नह रहे थे, बि क ऐसी जगह म त दील हो गए थे, जहां हंद ु तानी धम के नाम पर एक दूसरे का खून बहाते थे। जैसा क खुशवंत संह ने िलखा क उन दंग म मारे जाने वाले हरे क दस लोग म से नौ मुसलमान थे। हरे क उजाड़े और लूटे गए दस घर और दुकान म नौ मुसलमान के थे। इसके अलावा बेघर ए और पुिलस ारा सताए गए हरे क दस लोग म से भी नौ मुसलमान थे। संह ने सवाल कया या अब भी इसम कोई शक है क मुसलमान एक से यूलर हंद ु तान म अपने आपको सुरि त महसूस कर? मुसलमान खुद को छला आ महसूस करते थे, अपने आपको एक दोयम दज का नाग रक मानने लगे थे।39 1967-68 म जब फरकापर ती बढ़ने लगी थी, उस व हंद ु तान के रा पित (डाॅ. जा कर सैन) और सु ीम कोट के मु य यायाधीश (एम. िहदायतु ला) एक मुसलमान थे। इतने पर भी, जैसा क द ली के एक अखबार ने िलखा, वे लोग हंद ु तान म मुसलमान के आम हालात क नुमाइं दगी नह करते थे। जीवन के कई े म मुसलमान का ितिनिध व नग य था। इं जीिनय रं ग, िच क सा, उ ोगजगत, कारोबार और सेना म उनक नुमाइं दगी न के बराबर थी। इसक कु छ वजह ये भी थी क मु क के बंटवारे के व मुसलमान का उ और म यवग पा क तान चला गया था, ले कन मुसलमान के िखलाफ सामािजक भेदभाव भी इसक वजह थी। मुसलमान, लंबे समय से कां ेस के पीछे च ान क तरह खड़े थे ले कन 1967 के चुनाव म उ ह ने अपना िवरोध दखाने के िलए दूसरी पा टय को बड़े पैमाने पर समथन दया। मुसलमान क इस दशा के िलए जहां एक तरफ हंद ू समाज क सा दाियक और धमाध नीित िज मेदार थी, तो दूसरी तरफ उनका क रपंथी नेतृ व भी िज मेवार था।40 VIII कु छ इितहासकार क राय म साठ और चालीस के दशक का उ राध कई मायन म एक जैसा था। दोन ही दौर म सम याएं और संघष समान थे। वग, धम, न ल और े के आधार पर लोग एक-दूसरे से लड़ रहे थे, िजसे संभालने म क सरकार नाकाम लग रही थी। पता नह इसका अहसास स ा म रहने वाले लोग और धानमं ी को आ या नह , जो दोन ही दौर के गवाह रहे थे। ये सम याएं िसफ रा ीय या सामािजक तर पर ही एक जैसी नह थ बि क प रवार के तर पर भी एक जैसी थ । ि टश राज के जाने क वेला म जवाहरलाल नेह सन् 1946 म अंत रम सरकार के धानमं ी बने थे। उसके अगले साल हंद ु तान आजाद हो गया और उ मीद के अनु प ही नेह देश के पहले धानमं ी बने। दूसरी तरफ उनक बेटी इं दरा गांधी साल 1966 म अनपेि त प से धानमं ी चुनी ग , ले कन अगले ही साल बतौर धानमं ी उ ह ने चुनाव जीतकर अपनी पकड़ मजबूत बना ली। नेह क ही तरह ही इं दरा गांधी क भी क ीय सरकार पर पूरी पकड़ थी, ले कन ठीक उ ह क तरह वो भी नह जानती थी क उनक स ा द ली से बाहर कतनी मजबूत है। दोन को क युिन ट िव ोह और सा दाियक सम या से जूझना पड़ा। इसके अित र नेह को देशी रजवाड़ क सम या का सामना करना पड़ा, जब क इं दरा गांधी को दजनभर गैर-कां ेसी सरकार का। यह पर आकर दोन के बीच समानताएं ख म हो जाती ह। िविभ ता से भरे और एक बंटे ए भारत को एक करने के िलए नेह ने िजस िवचारधारा को बढ़ावा दया, वो चार तंभ पर टका आ था। पहला, देश म एक लोकतांि क व था कायम क गई, िजसका मतलब था क कोई भी ि अपने मज से अपना दो त चुन सकता था या िवचार क अिभ ि कर सकता था। कोई भी ि कसी भी भाषा म अपनी भावनाएं कर सकता था और वय क मतािधकार के तहत होने वाले िनयिमत चुनाव म अपने मज का नेता चुन सकता था। दूसरा तंभ था धमिनरपे ता यानी धा मक मामल म रा य तट थ भूिमका िनभाएगा और सामािजक स ाव को कायम रखेगा। तीसरा, देश म समाजवादी व था पर जोर दया गया, िजसम उ पादकता बढ़ाने पर जोर दया गया और आय और सामािजक अवसर के समान िवतरण क बात कही गई। नेह क िवचारधारा का चौथा तंभ था गुटिनरपे ता यानी भारत, िवदेशनीित के मामल म महाशि य क गुटबंदी से अलग रहेगा। नेह क इस िव दृि म एक और चीज जो मह वपूण थी वो ये क उ ह ने भारत म संसदीय बहस के ारा ब दलीय णाली को लगातार बढ़ावा दया। नेह ने इसके अलावा यायपािलका और कायपािलका क वाय ता पर भी जोर दया। हालां क, एक आजाद और नवो दत भारत के संदभ म इन िस ांत को संशोिधत कया गया था, ले कन ये तमाम िव ास िपछले 20 साल से िवकिसत हो रहे थे। नेह एक ब त ही पढ़े-िलखे इं सान थे और उ ह ने पूरी दुिनया क या ा क थी। अपने अ ययन और अपनी या ा से वे इस िन कष पर प च ं े थे क भारत के िलए समाजवाद और उदारवाद ही व क मांग है। दूसरे श द म, िजन राजनीितक िव ास को वे मानते थे और भारतीय जनता के साथ साझा करना चाहते थे, वे उनके िनतांत अपने थे, मौिलक थे। ले कन ीमती गांधी के बारे म ऐसा िनि त प से नह कहा जा सकता था। न तो उ ह ने िवशद अ ययन कया था, न ही बड़े पैमाने पर दुिनया क या ा ही क थी। हां, इसम कोई शक नह क वे एक रा भ मिहला थ और दुिनया के मंच पर भारत के िहत क र ा करने के िलए ितब थ । हालां क इस ल य को कै से ा कया जाए, ये तय नह था। जबसे वे राजनीित म थ , उनके मूल िव ास के बारे म न तो पाट को, न ही जनता को यादा पता था। लोग नह जानते थे क वे बाजार अथ व था के बारे म या सोचती ह या शीतयु के बारे म उनक या राय है। न ही लोग ये जानते थे क वे िविभ मजहब के बीच के संबंध के बारे म या सं थान और लोकतांि क या के बारे म या सोचती ह। नेह क चु नंदा रचना म िविवध िवषय पर उनके िवचार के बारे म साफ झलक िमलती है, ले कन उ ह िवषय पर 1967 से पहले ीमती गांधी ने शायद ही एक भी श द कहा हो। इस तरह देखा जाए तो कई मु पर ीमती गांधी ने चु पी साध रखी थी, हालां क उनके सलाहकार ने इस बात को वीकार नह कया। पी.एन. ह सर इनम सबसे मुख थे। इलाहाबाद म वकालत शु करने से पहले ह सर ने लंदन कू ल आॅफ इकोनाॅिम स म पढ़ाई क थी और उ ह इं लड के यायालय म वकालत का मौका िमला था। आजादी के बाद वे भारतीय िवदेश सेवा म शािमल हो गए और आॅि या म भारत के राजदूत रहे। वे नाइजी रया म भारत के पहले उ ायु भी रहे। 1967 म इं दरा गांधी ने उ ह अपने सिचवालय म िनयु कया। उस समय वे लंदन म भारत के उपउ ायु थे। ह सर और ीमती गांधी दोन ही क मीरी पंिडत थे और दोन एक ही शहर से ता लुक रखते थे। इसके अलावा दोन के कई साझा िम भी थे। ह सर ब मुखी ितभा के ि थे। वे गिणत के िव ाथ थे और इितहास, खासकर कू टनीितक और सै य इितहास म गहरी दलच पी रखते थे। इसके अलावा, मानव िव ान और पाककला म उनक गहरी िच थी। उ ह ने लंदन कू ल आॅफ इकोनाॅिम स म ोिनसलाॅ मेिलनोव क सेिमनार म िह सा िलया था और बेहतरीन खाना बनाना जानते थे। अपने िविवध िवषय के ान और िवचार क ती णता क बदौलत ह सर अपने दो त और सहयोिगय पर अ सर हावी होने का यास करते। हालां क इस मामले म उनक बौि क ती णता कह यादा अहम थी, उनके बौि क ान से उसक तुलना नह क जा सकती। उनके राजनीितक िवचार 1945 के ि टश लेबर पाट के वाम झान वाले िवचार से िमलते थे। वे आ थक मामल म सरकारी करण के समथक और बाजार अथ व था के िवरोधी थे जब क िवदेशनीित के मामल म वे सोिवयत समथक और अमे रका िवरोधी िवचार रखते थे। सबसे अहम बात ये क पी.एन. ह सर उसूल के प े इं सान थे।41 पी.एन. ह सर के लेख और पच क सं या पांच सौ के करीब है। यह पु तक इस बात के िलए पी.एन. ह सर क ब त ऋणी है य क उस समय के इितहास म झांकने के िलए उनके ारा िलखे गए कई लेख इस कताब के िलए ब त ही उपयोगी सािबत ए ह। ले कन ह सर, त कालीन धानमं ी ीमती गांधी के िलए और भी यादा उपयोगी सािबत ए। कै थरीन क के मुतािबक ीमती गांधी ह सर क ती ण बुि और उनके फै सले पर पूरा भरोसा करती थ । 1967 से लेकर 1973 तक ह सर शायद भारत सरकार म सबसे ताकतवर ि थे।42 ह सर के साथ जो दूसरे अिधकारी काम करते थे उनम अहम थे - कू टनियक टी.एन. कौल, राजनीित से कू टनीित बने डी.पी. धर और पुिलस सेवा से आने वाले सुर ा िवशेष आर.एन. काव। पीठ पीछे इन लोग को पांच पांडव कहा जाता था। संयोग से सारे के सारे क मीरी ा ण थे। इसके अलावा ीमती गांधी के बाहरी दायरे म भी सलाहकार का एक समूह था, िजनम राजनेता क तुलना म अिधका रय और बुि जीिवय को यादा तरजीह दी गई थी। और ऐसा महज संयोग नह था। ीमती गांधी को लालबहादुर शा ी क तरह ही बि क उनसे से भी यादा, कां ेस संिडके ट से वतं अपनी स ा थािपत करनी थी, िजसने उ ह धानमं ी बनवाया था। सामािजक तौर पर भी वह अपने पाट के आलानेता से अपनी राय कम ही साझा करती थ । उनका अपने खास िम और सहयोिगय का एक गुट था। वे अपनी स ा क ि थरता को लेकर हमेशा अपने पाट नेता के ित शंकालु बनी रह । इसिलए वे अपने आसपास रहने वाले अपने सहयोिगय क राय पर यादा िनभर रहती थ य क उन लोग क कोई राजनीितक मह वाकां ा नह थी। ले कन िनि त तौर पर उनके इन सहयोिगय का अपना एक राजनीितक िवचार होता था िजसका अ सर कई वजह से ीमती गांधी पर अपना भाव होता था। IX 1967 के चुनाव के बाद मोरारजी देसाई ने एक बार फर से धानमं ी पद पर अपना दावा ठोका। ले कन एक समझौते के तहत मोरारजी को िव मं ी और उप- धानमं ी के पद से संतोष करना पड़ा। ऐसा पहली बार हो रहा था क व लभभाई पटेल क मृ यु के बाद कसी को उप- धानमं ी बनाया गया था। एक तरफ कां ेस संिडके ट (संगठन) और दूसरी तरफ मोरारजी से लगातार िमल रही चुनौती से ीमती गांधी ने अब िनपटने का फै सला कर िलया। अपने आपको एक समाजवादी के प म पेश कर उ ह ने अपनी अलग पहचान बनाने का फै सला कया। ऐसा उ ह ने पी.एन. ह सर क सलाह से कया। जनवरी, 1968 म ह सर ने एक रपोट स पी, िजसके मुतािबक दो अ य उप- धानमंि य क िनयुि कर मोरारजी के पर कतरने क बात क गई। इस रपोट के मुतािबक, चूं क अपने िव ासपा मंि य को चुनते व धानमं ी को अपने भावशाली नेतृ व म एक ापक गितशील मंि मंडल भी चलाना था, इसिलए पाट और पाट के नेता से भी यादा उ ह, खासकर धानमं ी को, जनता म अपनी वैचा रक छिव को और भी मजबूती से थािपत करना था।43 समाजवाद पंिडत नेह के राजनीितक दशन के चार मुख तंभ म से एक अहम तंभ था। ले कन 1967 के चुनाव से पहले यह श द शायद ही कभी ीमती गांधी क जुबान पर आया हो। खास बात तो यह थी क उनके सलाहकार ने बड़े जोरशोर से इसे सामने रखा। हालां क कु छ अंश म यह आ ह नकारा मक भी था, जो ापार और ापा रय के ित ा णवादी अ िच से े रत था। ले कन समाजवाद के िवचार के साथ एक सकारा मक पहचान भी जुड़ी थी। अथ व था म रा य क एक बड़ी भूिमका, सामािजक-आ थक समानता और रा ीय एक करण के िलए ज री थी। उनके एक सलाहकार ने िलखा क भारत म सावजिनक े , देश के एक करण का एक ‘लघु प’ है। िनजी े म पंजाबी उ ोगपित, पंजािबय को और मारवाड़ी, मारवाि़डय को यादा तरजीह देता था जब क भारतीय रे लवे और बड़े इ पात के कारखान म तिमलनाडु के लोग िबहा रय के साथ, हंद ू मुसलमान के साथ और ा ण ह रजन के साथ, एकसाथ काम करते थे। समाजवाद िसफ आ थक प से ही संभव नह था, बि क यह एक सामािजक आव यकता थी। य क समाजवाद और बड़े सरकारी उप म, देश के एक करण और एकता क भावना को बढ़ावा देने के भावशाली हिथयार थे।44 पी.एन. ह सर और उनके सहयोिगय के समाजवाद का एक मजबूत नैितक आधार था ले कन ीमती गांधी के िलए यह एक ावहा रक उपकरण था। उ ह अपने आपको कां ेस पाट पर पकड़ रखने वाले पुराने नेता से अलग दखाना था। मई, 1967 म उ ह ने पाट म सुधार के िलए एक दस सू ी योजना पेश क , िजसम बको के रा ीयकरण, राजा को िमल रहे ि वी पस क समाि और ामीण और औ ोिगक िमक को एक यूनतम और तयशुदा मजदूरी क बात क गई। इस योजना के ित संिडके ट के नेता उतने उ सािहत नह थे ले कन इसने पाट के युवा नेता को आक षत कया, िजनक राय म हाल म ई पाट क हार इस वजह से ई थी क इसने अपने वादे पूरे नह कए थे।45 चुनाव म अपनी जीत के बाद ीमती गांधी ने खुलकर गरीब और वंिचत क तरफदारी करने क कोिशश क । अपने भाषण म उ ह ने अपने आपको उनके नजदीक दखाने का यास कया। फरवरी, 1968 म लोकसभा म बोलते ए उ ह ने भूिमहीन मजदूर के सम या क बात क और देश म रहने वाले सभी अ पसं यक के बारे म चंता जािहर क । उ ह ने सावजिनक े क आलोचना का ये कहकर बचाव कया क उनका उ े य मुनाफा कमाना नह है, बि क वे देश के िवकास के िलए आधार तैयार कर रहे ह। उसी साल अग त महीने म रा यसभा म बोलते ए उ ह ने दबे-कु चले लोग खासकर अनुसूिचत जाित और जनजाितय के िलए नई योजना क बात क और इस उ े य को पाने के िलए पूरी सहायता देने का वादा कया। कु छ ही दन के बाद लाल कले क ाचीर से दए गए अपने वतं ता दवस के भाषण म उ ह ने उ ोगपितय और बड़े ापा रय को आड़े हाथ लेते ए कहा क वे िमक क अनुशासनहीनता क बात तो करते ह ले कन खुद को बड़े मुनाफे और मोटी तन वाह लेने से नह रोक पाते।46 ीमती गांधी के ये िवचार, पाट के किथत युवा तुक के िवचार से िमलते-जुलते थे, िज ह ने पाट के अंदर ही एक समाजवादी खेमा बना िलया था। युवा तुक के नेता संसद के मंच का उपयोग पुराने और ि़ढवादी नेता से तकलीफदेह सवाल पूछने के िलए कया करते। युवा तुक चं शेखर ने मोरारजी देसाई के बेटे कांित देसाई पर ाचार का आरोप लगाया। चं शेखर ने ये भी आरोप लगाया क िव मं ी ने िनयम क अवहेलना करके एक बड़े औ ोिगक घराने को लाइसं◌ेस बांटा है। ये माना गया क चं शेखर, धानमं ी के इशारे पर आरोप लगा रहे ह, हालां क धानमं ी ने कभी भी उन पर लगाम लगाने क कोिशश नह क ।47 ीमती गांधी के एक जीवनीकार के मुतािबक 1968 से लेकर 1969 तक वे पूरी तरह एक कुं ठा त मिहला थ । उस समय तक वह इतनी मजबूत नह थ क कां ेस संगठन ( संिडके ट) के नेता से िव ोह कर सके , न ही इतनी उतावली थ क वे खुद ही ग ी छोड़ सक।48 ले कन 1969 म इं दरा गांधी को एक मौका हाथ लग गया, जब देश के रा पित डाॅ. जा कर सैन क उनके पद पर रहते ही मृ यु हो गई। संिडके ट के नेता ने अपने म से एक एन. संजीवा रे ी को रा पित बनवाना चाहा, जो लोकसभा को पूव अ य और आं देश के पूव मु यमं ी रह चुके थे। जब क ीमती गांधी ने उपरा पित वी.वी. िगरी को तरजीह दी, जो एक मजदूर नेता रह चुके थे और िजनके इं दरा गांधी से अ छे संबंध थे। 1969 के पहले स ाह म अिखल भारतीय कां ेस सिमती क बंगलौर म बैठक ई। इस बैठक के िलए रवाना होने से पहले ह सर ने उनसे साफ कहा क संिडके ट को परािजत करने का सबसे अ छा उपाय यह है क इस लड़ाई को ि गत लड़ाई से वैचा रक लड़ाई म बदल दया जाए।49 बंगलौर म ीमती गांधी ने युवा तुक क बात का समथन करते ए मुख बक के रा ीयकरण का ऐलान कर दया। उ ह ने संजीव रे ी के रा पित पद क उ मीदवारी का भी िवरोध कया ले कन कां ेस काय सिमित ने उनके िवरोध को खा रज कर दया। द ली लौटते ही ीमती गांधी ने मोरारजी देसाई को िव मं ी के पद से हटा दया। देसाई, बकां◌े के रा ीयकरण के घोिषत िवरोधी थे। उ ह ने एक बार संसद म कहा था क बक के रा ीयकरण से देश क शासक य मता पर दबाव बढ़ जाएगा और मूलभूत मु े पीछे छू ट जाएंग।े देसाई क राय म बक पर सरकार के िनयं ण से आ थक िवकास के िलए उपल ध संसाधन पर असर पड़ेगा और नौकरशाही और लालफ ताशाही का बोलबाला हो जाएगा।50 देसाई को पद से हटाने के बाद ीमती गांधी ने एक अ यादेश जारी करवाया, िजसम कहा गया क सरकार ने 14 िनजी बक का रा ीयकरण कर दया है। आॅल इं िडया रे िडयो पर अपने इस फै सले क ा या करते ए उ ह ने कहा क हंद ु तान एक ाचीन स यता है ले कन साथ ही एक युवा लोकतं भी है। इस लोकतं को हमेशा इस बात के िलए सतक रहना पड़ेगा ता क कु छ लोग इसके सामािजक, आ थक और राजनीितक तं पर क जा न कर ल। इसी वजह से सरकार ने ये फै सला िलया क बड़े बक पर िसफ सामािजक िनयं ण ही नह होना चािहए, बि क उ ह सरकार के अधीन होना चािहए। उ ह ने आगे कहा क ऐसा इसिलए ज री था ता क ये बक िसफ बड़े उ ोग को ही नह बि क छोटे कसान , द तकार और वरोजगार म लगे लाख लोग को भी कज दे सक।51 धानमं ी ने दावा कया क बक के रा ीयकरण के ित देश क जनता म जबद त उ साह है और करीब 95 फ सदी लोग ने इसका समथन कया है। उ ह ने आगे कहा क िसफ कु छेक बड़े अखबार जो उ ोगपितय के िहत क नुमाइं दगी कर रहे ह, सरकार के इस फै सले का िवरोध कर रहे ह। हालां क वतं प से संचािलत एक छोटे से सा ािहक अखबार ने दावा कया क ीमती गांधी का ये कदम उनक िनजी राजनीितक लड़ाई है, िजसे वे वैचा रकता का जामा पहनाकर लोग के सामने पेश कर रही ह। सा ािहक थाॅट ने िलखा क कां ेस पाट के अंदर वच व थािपत करने क लड़ाई म ीमती गांधी ने एक रे िडकल टड चुनने का फै सला कया था। थाॅट ने आगे िलखा क वे अब अपने आपको एक रा ीय नेता के तौर पर थािपत करना चाहती थ , िजसे पाट क उतनी ज रत नह थी िजतनी पाट को उनक थी।52 बक के रा ीयकरण को सु ीम कोट म चुनौती दी गई और कोट ने इसे वीकार भी कर िलया। ले कन सरकार ने रा पित ारा ह ता रत एक दूसरा अ यादेश लाकर कोट के फै सले को भावहीन कर दया। सरकार के िनयं ण म आने के छह महीने के अंदर, बक का ापक िव तार आ। करीब 1100 नई शाखाएं खोल ग , िजनम से यादातर ामीण इलाक म थ । उन इलाक ने इितहास म कभी भी इस बात का अनुभव नह कया था क सरकार, बकां◌े के मा यम से कज कै से देती है।53 X अब पूरे देश का सारा यान रा पित के चुनाव पर क त हो गया, िजसके िलए संसद और रा य क िवधानसभा को मतदान करना था। कां ेस के आिधका रक उ मीदवार एन. संजीवा रे ी थे। वी.वी. िगरी ने िनदलीय चुनाव लड़ने का फै सला कया जब क िवप के उ मीदवार थे, के . सु बाराव जो सु ीम कोट के सेवािनवृत मु य यायाधीश थे। पाट क परं परा और अनुशासन का उ लंघन करते ए धानमं ी ने तय कया क वे वी.वी. िगरी का समथन करगी। हालां क इस फै सले को सावजिनक नह कया गया ले कन अपने समथक तक यह संदश े फै ला दया गया, िज ह ने देश के युवा सांसद को इस बात के िलए राजी करना शु कर दया क वे िगरी का समथन कर। कां ेस अ य एस. िनज लंग पा ने धानमं ी पर दबाव डाला क वे खुलकर रे ी क उ मीदवारी का समथन कर। ले कन धानमं ी ने ऐसा नह कया। अब िनज लंग पा ने जनसंघ और वतं पाट से अपील क क वे सु बाराव के बदले रे ी का समथन कर। िनज लंग पा के इस कदम को ीमती गांधी के खेमे ने अपने िहत म इ तेमाल कर िलया। ये चा रत कया गया क िनज लंग पा, िवप ी पा टय के साथ हाथ िमला रहे ह। उ ह ने इस मु े पर अिखल भारतीय कां ेस कमेटी क बैठक बुलाने क मांग क , िजसे खा रज कर दया गया। रा पित का चुनाव 20 अग त, 1969 को होने वाला था। इससे ठीक चार दन पहले यानी 16 अग त को आिखरकार ीमती गांधी इस मु े पर अपना बयान देने के िलए सामने आ । उ ह ने पाट सांसद और िवधायक से अंतरा मा के आधार पर वोट देने क अपील क । उनका यह बयान कां ेस नेता को पाट संगठन के िखलाफ िव ोह कर ित ं ी उ मीदवार को समथन देने का खुला आ नान था। और ऐसा ही आ। बड़ी सं या म कां ेसी सांसद और िवधायक ने वी.वी. िगरी को अपना समथन दया। ब त सारे बुजुग कां ेसी नेता ने रे ी को भी समथन दया ले कन मतगणना के दूसरे च म वी.वी. िगरी को जीत िमल गई। अब कां ेस अ य और धानमं ी के बीच तीखे प चार का आदान- दान शु हो गया। आिखरकार 12 नवंबर को अनुशासनहीनता के आरोप म ीमती गांधी को पाट से िन कािसत कर दया गया। ले कन तब तक पाट के ब त सारे सांसद उनके साथ आ चुके थे। दसंबर महीने म ित ं ी कां ेसी खेमे क बैठक ई। मूल पाट क बैठक अहमदाबाद म ई जब क इं दरा गांधी का खेमा बंबई म एकि त आ। मूल पाट को कां ेस(ओ) यानी कां ेस आॅरगेनाइजेशन(संगठन) कहा जाने लगा जब क इं दरा गांधी के गुट को कां ेस(आर) यानी र जनी ट(सुधारवादी) कहा गया। कु छ लोग ने इसे कां ेस(ओ) यानी ओ ड (पुरानी) कहा और कां ेस (आर) यानी रफाॅम(सुधार) कहा।54 इं दरा गांधी को पाट से िन कािसत करते ए िनज लंग पा ने उन पर ि वादी होने का आरोप लगाया और ये भी कहा क वे अपने आपको पाट और रा से ऊपर थािपत करने म लग ह। उ ह ने इस तरफ इशारा कया क बीसव सदी का इितहास ऐसी ास दय से भरा पड़ा है, जब कोई नेता लोकि य जनमत या लोकतांि क सं था क बदौलत स ा म आकर लोकतं पर हावी हो जाता है और िनिहत वाथ चमच से िघरकर आ ममोह का िशकार हो जाता है। ऐसी हालत म ये वाथ त व, ाचार और आतंक का सहारा लेकर जनता और िवप क आवाज को खामोश करने का यास करते ह और तानाशाही थोपने क कोिशश करते ह। लोकतं और समाजवाद के ित सम पत कां ेस पाट को इन वृि य से लड़ाई लड़नी है।55 िनज लंग पा आज म कां ेसी रहे थे। वे कसान पृ भूिम से आते थे और आजादी क लड़ाई के समय ही काफ कमउ म कां ेस से जुड़ गए थे। उ ह ने मैसूर ांत म पाट का आधार तैयार कया था। बाद म वे वहां तीन बार मु यमं ी भी रहे।56 अपनी पाट और लोकतं के ित उनक ितब ता पर कभी सवाल नह खड़ा कया गया। ले कन समाजवाद दूसरा िवषय था। बक के रा ीयकरण ने उनके ित ं ी का दावा यादा मजबूत कर दया, जब क जनसंघ और वतं पाट को मनाने क उनक कोिशश ने उनका दावा कमजोर कर दया। ीमती गांधी ारा या उनके नाम पर तमाम प और भाषण के मा यम से इस िवषय को हवा देने क कोिशश क गई क समाजवाद के यादा नजदीक कौन है। ीमती गांधी को िनज लंग पा से यादा समाजवादी बताने क बड़ी बारीक कोिशश क गई। ये सारा काम पी.एन. ह सर और उनके सहयोगी अंजाम देते थे। ऐसा दखाने क कोिशश क गई क आ थक मामल म धानमं ी समाजवादी नीितय पर चल रही ह जब क धा मक मालम म वे धमिनरपे ता क िहमायती ह। उनके गरीब िहतैषी और रा के िवकास के िलए ितब होने क छिव को चा रत कया गया। दूसरी तरफ ये चार कया गया क कां ेस पाट के अ य , पूंजीवाद और सा दाियक राजनीित के समथक ह।57 इं दरा गांधी का शि दशन कामयाब रहा। अिखल भारतीय कां ेस कमेटी के 705 सद य म से 446 ने इं दरा गांधी खेमे यानी कां ेस(आर) के अिधवेशन म िह सा िलया जब क दोन सदन के 429 सांसद म से 310 धानमं ी के गुट म शािमल हो गए। इनम से 220 लोकसभा के सांसद थे। यानी कां ेस(आर) को लोकसभा म ब मत सािबत करने के िलए करीब 45 सांसद कम पड़ रहे थे। ले कन इसे पूरा करने के िलए ीमती गांधी ने कु छ िनदलीय और क युिन ट सांसद से समथन मांगा। ीमती गांधी का वाम झान देखकर क युिन ट पाट समथन देने को खुशी-खुशी राजी हो गई। उसे ये उ मीद थी क शायद ऐसा करके वो अपना भाव बढ़ा पाएगी। अग त, 1969 म कां ेस के अंदर चल रहे संघष पर िलखते ए सीपीआई के नजदीक एक प कार ने िलखा क ‘ संिडके ट नेता क उ मीद धूल म िमल गई ह। देश म एक आंधी आई ई है और इसम कोई शक नह क वह आंधी इं दरा गांधी क है। इस तूफान को उन अलग-अलग तरह के लोग क भीड़ से जाना जा सकता है जो येक दन धानमं ी आवास क तरफ जा रही है। यह भीड़ महज एक खूबसूरत चेहरे को देखने के िलए नह जा रही, बि क यह स ा के एक नए प का कटीकरण है।’ उस प कार ने ये उ मीद जािहर क क सरकार अब जनवादी आ थक नीितयां अपनाएगी और सा दाियक िवचार के िखलाफ स त रवैया अपनाएगी।58 1950-52 म कु छ इ ह तरह के हालात म पंिडत नेह ने कु छ अलग ख अपनाया था। पु षो मेे दास टंडन और उनके सािथय के पारं प रक िवचार से चुनौती पाने पर भी उ ह ने पाट को तोड़ने क बजाय उनके साथ िमलकर काम करना बेहतर समझा। ले कन इस मामले म जैसा क एक राजनैितक जानकार ने कहा क ीमती गांधी ने एक आ ामक ख अि तयार कया, जो कां ेसी परं परा से िब कु ल अलग था। नेह और शा ी के आमसहमित वाले और सबको साथ लेकर चलने के अंदाज के िवपरीत वे एक हद तक िनमम थ । उनम लोग को आंकने क गजब क मता थी, सही व को पहचानने क मता और नाटक य हावभाव द शत करने क मता थी। इससे भी बड़ी बात ये क उनम आखरी घड़ी तक हार नह मानने क मता थी, उ ह ने अपनी स ा को बरकरार रखने के िलए मु क को आजादी दलाने वाली पाट को भी तोड़ डाला। ऐसा करके उ ह ने लोग को भौच ा कर दया।59 XI बक के रा ीयकरण के बाद अब ीमती गांधी ने देशी राजा -महाराजा को िमल रही सुिवधा पर अपना यान क त कया। आजादी के समय जब देशी रजवाड़ का भारतीय संघ म िवलय हो गया, तो उ ह संवैधािनक गारं टी दी गई क वे अपनी उपािध, जेवरात और महल रख सकते ह। इसके अलावा उ ह उनक रयासत के आकार क तुलना म एक सलाना ि वी पस भी दया गया, जो कसी भी क ीय कर और आयात कर से मु था। देश म इतनी तादाद म और इतने यादा गरीब लोग थे क इन सुिवधा को देने का न तो कोई मतलब था, न ही ये व क मांग थी। ये पी.एन. ह सर के िवचार थे, ले कन इसका समथन उनके दायरे के बाहर के लोग ने भी कया।60 1967 म ही एआईसीसी (आॅल इं िडया कां ेस कमेटी) ने एक ताव पा रत कर इन उपािधय और ि वी पस को ख म करने क मांग क थी। गृह मं लय ने इस िवषय पर एक िव तृत मसौदा तैयार कया और सरकारी कारवाई के बजाय कानून बनाकर इसे ख म करने क िसफा रश क । गृहमं ी वाई.वी. च नान को देशी राजा से बात करने के िलए कहा गया। ंगधारा के महाराजा उस व देशी राजा क नुमाइं दगी कर रहे थे। ऐसी उ मीद जािहर क गई क देशी राजे-महाराजे, सरकार के इस फै सले को आसानी से मान लगे। उनके ऐसा न करने क सूरत म सरकार संिवधान संशोधन के िलए तैयार थी।61 1968 म च नान और ंगधारा के महाराज के बीच कई लंबी बैठक ले कन कसी भी तरह के समझौते तक नह प च ं ा जा सका। कां ेस के अंदर का स ा संघष कसी भी तरह क अितवादी कारवाई के प म नह था। ब त सारे सांसद तो ऐसे थे जो या तो खुद ही राजा थे या कसी राजा के भाव म थे। ऐसे सांसद के मत ीमती गांधी के रा पित उ मीदवार के िलए उस व िनहायत ज री थे। वी.वी. िगरी के रा पित पद पर िनवाचन के बाद, फर से सरकार और रजवाड़ के बीच बातचीत का िसलिसला शु आ और दोन ही प अपनी शत पर अड़े रहे। इसी बीच नवांनगर के जाम साहब ने भारत सरकार को एक गु ताव भेजा। इस ताव म दोन ही प क आलोचना क गई। रजवाड़ क इसिलए आलोचना क गई क वे अि़डयल और समझौता न करने वाला रवैया अपना रहे थे। जब क सरकार क इसिलए आलोचना क गई य क वो अपने पुराने संवैधािनक वाद और आ ासन से मुकर रही थी। जाम साहेब ने इस गितरोध का एक हल सुझाया। उस समाधान के मुतािबक सरकार, रजवाड़ क सुिवधाएं ख म कर सकती थी ले कन इसके एवज म उसे 20 साल के बराबर एकमु त रािश रजवाड़ को देने का सुझाव दया गया। सरकार ये पैसा 25 फ सदी कै श के प म, 25 फ सदी सरकारी बाॅ स के प म (िजसे हर 20 साल पर नवीनीकरण कया जाता) और शेष 50 फ सदी एक चै रटेबल ट के प म देती िजसका धान कोई पूव राजा होता। यह ट खेल को बढ़ावा देन,े िपछड़े वग को िश ा देने और लु होते जा रहे व यजीवन के संर ण के िलए काम करता।62 जाम साहेब ने सोचा क यह एक ऐसी योजना थी, जो देश क ग रमा के अनुकूल थी। ीमती गांधी ने इस ताव को गृहमं लय भेज दया, साथ ही उस पर ये भी नोट िलख दया क यह ताव सकारा मक उ े य से आया है। ले कन उस ताव का कु छ नह हो पाया। 18 मई, 1970 को, जब संसद के ी मकालीन स का आखरी दन था, गृहमं ी वाई.वी. च नान ने लोकसभा म देशी राजा क सुिवधा को ख म करने संबंिधत संिवधान संशोधन िवधेयक पेश कर दया। इस िवधेयक पर अगले स म िवचार कया गया और इस पर बोलते ए ीमती गांधी ने कहा क यह िबल, हमारे समाज के लोकतांि करण का अगला कदम है। लोकसभा म यह िबल ज री दो ितहाई ब मत से पा रत कर दया गया। इसके प म 336 मत पड़े जब क िवप म 155। ले कन, रा यसभा म यह ताव एक मत से िगर गया। शायद धानमं ी को इस ताव पर रा यसभा के ख के बारे म पहले से ही अनुमान था, इसिलए तुरंत ही रा पित ारा ह ता रत एक सरकारी आदेश जारी कया गया, िजसम देशी राजा -महाराजा क मा यता को ख म कर देने का ऐलान कर दया गया। इसके चार दन बाद यानी 11 िसतंबर, 1970 को महाराज के एक समूह ने सरकार के इस फै सले के िखलाफ सु ीम कोट म अपील क । मु य यायाधीश क अ य ता म सव यायालय क पूणपीठ ने इस मामले पर िवचार कया। 11 दसंबर को अदालत ने कहा क सरकार का ये फै सला मनमाना है, संिवधान क मूल आ मा के िखलाफ है। कु छ याियक जानकार क राय म सरकार का ये फै सला लोकतं क जीत थी। दूसरी तरफ वामपंथी िवचार के कु छ अितवा दय क राय म सु ीम कोट का ये फै सला उसक पुरानी मनोवृित के ही अनु प था, िजसके तहत वो िनिहत ‘ वाथ त व को सुर ा’ देती आ रही थी। बक के रा ीयकरण के मामले म भी अदालत बीच म आ गई थी। अब अपने अिधकार और स ा को चुनौती िमलते देख धानमं ी ने जनता के बीच जाने का फै सला कर िलया। लोकसभा का कायकाल अभी भी एक साल बचा आ था। आॅल इं िडया रे िडयो पर अपने इस फै सले क ा या करते ए धानमं ी ने कहा क हमारी सरकार ने देश क ब सं य जनता के जीवन म बेहतरी लाने और उनक उ मीद पर खड़ा उतरने क कोिशश क थी, ले कन ित यावादी ताकत ने इसम बाधा डालने म कोई कसर नह छोड़ी है।63 XII कम से कम एक मोच पर ीमती गांधी क सरकार के िलए ज र अ छी खबर थी। वो खबर यह थी क सरकार क नई कृ िष नीित के नतीजे अब सामने आने लगे थे। 1967 म ब त भयंकर सूखा पड़ा था, िजसने िबहार ांत को खासतौर पर भािवत था। ले कन उसके अगले साल अ छी फसल ई थी और देश म 9.5 करोड़ मी क टन खा ा का उ पादन आ। उ पादन म यादातर वृि पंजाब-ह रयाणा म ई, जहां के कसान ने बौने क म के नए गे ं के बीज बोए थे। इन बीज का भारतीय वै ािनक ने मैि सकन माॅडल के बीज से िवकास कया था। दूसरी तरफ चावल, कपास और मूंगफली क नई क म का भी अ छा उ पादन आ था। जहां संचाई क सुिवधा उपल ध थी और जहां का कृ षक समुदाय नए बीज और यादा मा ा म खाद के इ तेमाल को तैयार था, ऐसे िजल को िचि नत करना सी. सु यम क रणनीित का िह सा था। इस नीित का नतीजा धमाके दार रहा। 1963 से 1967 तक, जब तक नया तरीका अि तयार नह कया गया था, भारत म गे ं क सलाना पैदावार 90 लाख मी क टन से 1.1 करोड़ मी क टन के बीच थी। ले कन 1967 से 1970 क अविध म इसक पैदावार बढ़कर 1.6 करोड़ टन से लेकर 2 करोड़ टन तक प च ं गई। धान के पैदावार म भी ऐसा ही कु छ देखने को िमला। 1963 से 1967 क अविध म धान क पैदावार 3 करोड़ टन से 3.7 करोड़ टन के बीच थी जब क 1967 से 1970 के बीच यह 3.7 करोड़ से बढ़ 4.2 करोड़ टन हो गई।64 हालां क इन आंकड़ां◌ म घनघोर इलाकाई अंतर देखने को िमलता है। देश का बड़ा िह सा अभी भी ऐसा था, जो संचाई के िलए बा रश पर िनभर रहता था। वहां साल म िसफ एक ही फसल ली जा सकती थी। ले कन फर भी देश म लोग के बीच एक भरोसा जग गया था क खा ा क थायी कमी अब अतीत क बात हो गई है। आधुिनक िव ान मालथस के भूत को झूठा सािबत कर रहा था। अग त 1969 म भारत के पुराने जानकार एक ि टश प कार ने िलखा क इतने साल म पहली बार म भारत म एक साफ आ थक त वीर देख रहा ।ं य क पहली बार फजां म ऐसा डर नह दखता क अथ व था महज मानसून क कामयाबी या नाकामयाबी पर िनभर कर रही है।65 देश म खा ा क सम या तो हल हो गई ले कन ब त सारे लोग क राय म हंद ु तान अभी भी अपनी िविवधता क वजह से िबखर सकता था! ऐसा नेिवले मे सवेल और कई दूसरे लोग का सोचना था। भारतीय गणतं के बीस साल पूरा होने पर यूयाॅक टाइ स के संपादक य ने य िप इसे एक ‘उ लेखनीय उपलि ध’ माना था ले कन इसने आगे िलखा क इन दन भारतीय संघ और इसके लोकतं पर खतरा बढ़ता जा रहा है और दोन का भिव य संदह े के घेरे म है।66 हालां क हंद ु तान क िविवधता से यादातर भारतीय को कोई द त नह थी। देश क साझी राजनीितक िवरासत ( वतं ता आंदोलन से अब तक), एक ब लतावादी संिवधान और िनरं तर हो रहे चुनाव ने उ ह देश क धा मक, न लीय और े ीय िविवधता को बांधने वाली शि का अहसास करा दया था। न ही ांत ारा दी जा रही चुनौती को लोग देश क एकता के िलए कोई खतरा मानते थे। एक राजनीितक टीकाकार ने मे सवेल ारा देश के िबखरने क आशंका को ये कहकर खा रज कर दया क देश म लोकतं के उिचत माहौल के िलए एक मजबूत क का होना कोई ज री नह है। उसने आगे िलखा क देश क संघीय व था और े ीय दल के उदय से देश का लोकतं मजबूत ही होगा। इं डोनेिशया और घाना का उदाहरण देते ए उसने आगे िलखा क जब वहां सुकण और ू मा ने मजबूत क क व था पर जोर दया तो वहां तानाशाही का ही उदय आ।67 साठ के दशक क घटना क वजह से बु क म के भारतीय के मन म भी देश के टू टने का खतरा कह नह था। न ही वे ये सोचते थे क देश म जनता ारा चुनी गई सरकार क जगह सैिनक शासन थािपत हो जाएगा। सैिनक शासन का सवाल कह नह था। हां, एक सश क युिन ट िव ोह का खतरा ज र लोग के मन म था जो देश के बड़े िह से को अपने लपेट म ले सकता था। ह रत ांित क वजह से देश म लाल ांित क संभावना ज र पैदा हो सकती थी य क इस वजह से देश म सामािजक िवषमता पैदा हो गई थी। न सलबाड़ी क भौगोिलक ि थित ज र चंता का िवषय थी य क वह छोटी प ी पूव पा क तान और नेपाल के बीच म पड़ती थी, जहां से चीन ब त दूर नह था। इसके अलावा यही वो गिलयारा था िजससे उ र-पूव के रा य शेष भारत से जुड़े ए थे। यह क युिन ट अिभयान छेड़ने क एक आदश जगह थी, जहां से मनमज नेपाल या पा क तान भागा जा सकता था और चीन से हिथयार ा कए जा सकते थे। इसिलए नई द ली को इस बात क सतत चंता थी क न सलबाड़ी से पी कं ग समथक क युिन ट बंगाल के शेष भाग म अपने सुसु सहयोिगय से तार जोड़ सकते थे और कलक ा तक प च ं सकते थे। पीछे उ ह चीनी सेना का समथन िमल सकता था जो भारत के िहमालयी सरहद पर खतरा बने ए थे।68 दूसरी तरफ ऐसे भी कु छ लोग थे, जो ये मानकर चल रहे थे क हंद ु तान म क युिन ट ांित क जमीन तैयार हो रही है। ऐसा सोचने वाले न सली थे ले कन उनके कु छ पि मी शुभ चंतक भी ऐसी ही सोच रखते थे। मूल प से अमे रकन ले कन कनाडा म पढ़ा रहे मा सवादी मानविव ानी कै थलीन गफ ने 1968-69 क स दय म एक लेख िलखा, िजसम कहा गया क भारत म अभी भी ांित क उ मीद है। लेख म आगे कहा गया क यह ांित देश के अंद नी िह स से शु होगी जहां देश के अिधसं य गरीब लोग रहते ह। देश के िछटपुट िह स म चल रही न सली गितिविधय और उनक िवचारधारा से उ सािहत होकर गफ ने िलखा क देश का संसदीय लोकतं नाकामयाब होने क कगार पर है और क युिन ट िव ोिहय का रा ता ही एकमा उ मीद भरा िवक प है।69 ले कन गफ अके ले ि नह थे जो यह मानते थे क ांितकारी क युिन ट ही भारत क मु य या एकमा उ मीद है। उ ह स दय म सन् 68 क घटना से े रत होकर एक वीिडश जोड़े ने हंद ु तान का दौरा कया। उसने पूव उ र देश के मैदान से लेकर दि णी कावेरी डे टा के धान उ पादक इलाक तक क गहन या ा क । उसने पाया क भारत के दबे-कु चले और वंिचत लोग म एक नई क म क जाग कता पनप रही है, िजससे देश म भारी सामािजक ष े पैदा हो रहा है। उस वीिडश जोड़े के मुतािबक जातीय संघष, वग संघष म त दील हो रहा था (जैसा क मा सवादी िस ांत कहता है और उ मीद भी करता है)। जब क कु छ बुि जीिवय क राय म ये खुशी क बात थी क संसदीय लोकतं को कु छ लोग संदह े क दृि से देखने लगे थे। एक वामपंथी छा नेता ने ट पणी क क हरे क पांच साल म होने वाले चुनाव के नाटक को हम बदा त नह कर सकते। हम खुद को मूख बनने से रोकना ही होगा। उस वीिडश समाजशा ी ने भिव यवाणी क क इन सारे प रवतन का भारत के भिव य पर गहरा असर होगा। उसके मुतािबक देश म खून क न दयां बहाई जा रही ह (मा सवादी िस ांत के अनुसार ऐसा होना ही चािहए)। देश म सामािजक संघष कभी-कभी इतना हंसक हो जाता है क इसक क पना तक करना क ठन है। उसने आगे िलखा क सौभा य से भारत म नया ांितकारी आंदोलन आगे क ओर बढ़ रहा है। उन लेखक क राय म यह बात साफ थी क जब हंद ु तान के लाख -करोड़ लोग अपना भिव य अपने हाथ म ले लगे तभी देश से गरीबी और शोषण के युग का अंत हो पाएगा। अपने लेख म उ ह ने उ मीद जािहर क क शायद न सलबाड़ी ही भारतीय म ांित का पयाय है।70 3 िवजय क तैयारी इं दरा गांधी गूंगी गुि़डया है। राम मनोहर लोिहया, 1967 I नवंबर 1969 म द ली के सा ािहक थाॅट ने ट पणी क क ऐसा लगता है क कां ेस ने खुद म ये भरोसा खो दया है क वो देश को एकजुट रखने वाली ताकत है। एक जमाने क सबसे शि शाली पाट अब आपस म ही संघष कर रहे गुट म बंट गई है। जब देश म अगले आम चुनाव क घोषणा क गई तो थाॅट ने िलखा क इस चुनाव म कां ेसी ही कां ेसी से लड़गे। कां ेस के इस स ा संघष से वाभािवक प से े ीय और जाितवादी समूह को फायदा होगा। सा ािहक ने आगे िलखा क नतीजतन ीमती गांधी क पाट को संसद म एक ितहाई सीट भी िमलनी मुि कल हो जाएगी। दूसरे समूह का भिव य इससे भी खराब दखता है।1 एक साल के बाद धानमं ी ने चुनाव करवाने का फै सला कर िलया। सरकार का कायकाल अभी भी 14 महीने बचा आ था। उनक पाट कां ेस(आर) जनता का ब मत चाहती थी ता क वो गितशील सुधार को लागू कर सके , िजसे ित यावादी ताकत ने रोक रखा था। उनके चुनावी घोषणाप ने जनता से आ थक-सामािजक िवकास क एक ांितकारी योजना देने का वादा कया। पाट ने जनता से कहा क वो छोटे कसान और भूिमहीन मजदूर के िहत म काम करे गी साथ ही बड़े पूंजीपितय से छोटे ापा रय के िहत क िहफाजत करे गी। इसने िनचली जाित और अ पसं यक के क याण का वादा कया। खासतौर पर उदू भाषा के िवकास क बात क गई, िजसे अभी तक उसका उिचत हक नह िमला था। इसने एक मजबूत और थायी सरकार देने का वादा कया और जनता से दि णपंथी शैतानी और बुरी ताकत से लड़ने के िलए समथन मांगा। पाट क राय म ये ताकत देश के लोकतांि क और समाजवादी उ े य को न करने पर आमादा थी।2 इं दरा गांधी, 1971 म िजस राजनैितक ि थित का सामना कर रही थ , वह ब त कु छ वैसी ही थी जैसी उनके िपता जवाहरलाल नेह 1952 म कर रहे थे। नेह क ही तरह अपनी पाट से लड़ाई लड़कर ीमती गांधी भी चुनाव म गई थ । उ ह क तरह उ ह ने भी जनता से एक गितशील सरकार के िलए जनमत मांगा था। पंिडत नेह क तरह वह भी अपनी पाट क मु य चारकता और व ा भी थ । वह खुद एक तीक बनकर जनता के बीच जा रही थ । समय से पहले आम चुनाव करवाकर धानमं ी ने बड़ी चतुराई से अपने आपको िवधानसभा चुनाव से अलग कर िलया था। ये चुनाव पहले साथ-साथ आ करते थे। दोन चुनाव साथ-साथ होने क ि थित म जाित और न लीयता क संक ण भावना रा ीय मु को भािवत कर देती थी। 1967 के चुनाव म कां ेस को इससे ब त घाटा आ था। इस बार ीमती गांधी ने तय कया क पहले आम चुनाव करवाकर वो इन दोन ही मु को अलग कर दगी और जनता से रा ीय मु के आधार पर सीधा समथन मांगगी। इस बीच िवप , कां ेस के िखलाफ एक संयु मोचा बनाने क तैयारी म था। न बे साल से ऊपर के हो चुके सी. राजगोपालाचारी इसके पैरोकार थे। चूं क कसी एक नेता के नाम पर सभी पा टयां सहमत नह हो पा रही थी, इसिलए राजाजी ने सलाह दी क गु र ला लड़ाई लड़ी जाए। राजाजी ने कहा क संिवधान को ख म करने क सािजश, जनता क आजादी पर आघात और रा य के हाथ म शि क त होने से रोकने को मु ा बनाकर इं दरा के उ मीदवार को सभी सीट पर हराया जाए।3 िवप ने एक महागठबंधन बनाया िजसम जनसंघ, वतं पाट , कां ेस(ओ), समाजवादी और े ीय पा टयां शािमल थ । इसका उ े य यह था क चुनाव म ब कोणीय लड़ाई को रोका जाए। कसी काॅपीराइटर ने तमाम मु े को समेटते ए ‘इं दरा हटाओ’ नाम का नारा गढ़ दया। इसके जवाब म धानमं ी ने हा य के अंदाज म कहा क वे कहते ह इं दरा हटाओ, हम कहते ह गरीबी हटाओ। पता नह यह नारा धानमं ी ने गढ़ा या उनके कसी गुमनाम सहयोगी ने, ले कन ‘गरीबी हटाओ’ का नारा जनता म चल गया। इस नारे क वजह से कां ेस को नैितकता का उ धरातल िमल गया। पाट ने खुद को गितशील बताया जब क िवप को ित यावादी ताकत का गठजोड़ बताया गया। िवप ारा चुनाव को ि क त बना देने से इसका फायदा होने क बजाय नुकसान क ही यादा संभावना थी य क उसका एजडा, कां ेस क भिव य क त योजना क तुलना म नकारा मक था। अपनी पाट को चुनाव म िजताने के िलए ीमती गांधी ने दन-रात मेहनत क । दसंबर, 1970 के आखरी स ाह म जब लोकसभा भंग क गई तबसे लेकर 10 स ाह बाद होने वाले चुनाव तक उ ह ने 36,000 मील क या ा क । उ ह ने 300 चुनावी सभा को संबोिधत कया और करीब 2 करोड़ लोग ने उनका भाषण सुना। ीमती गांधी ने अपने एक अमे रकन िम को खुद ही इन आंकड़ां◌ के बारे म िव तार से खत िलखा। उ ह ने इस अनुभव का खूब आनंद उठाया। उ ह ने ट पणी क क लोग क आंख म चमक देखना उनके िलए वाकई अ भुत अनुभव था।4 अपने भाषण म धानमं ी ने अपनी नई पाट और पुरानी पाट के वा तिवक और आभासी फक को खुलकर जनता के सामने रखा। ‘पुरानी कां ेस’ ि़ढवादी और िनिहत वाथ के हाथ क कठपुतली थी जब क ‘नई कां ेस’ गरीब के िहत के ित सम पत थी। या बक के रा ीयकरण और ि वी पस क समाि से ऐसा ही संदश े नह दया गया? धानमं ी का िनशाना सही जगह लगा था। ले कन एक प कार ने इस पर ं य करते ए कु छ यूं िलखा - एक गटर म िगरे ए इं सान के िलए सबसे बड़ा पुर कार यही है क उसे ये कहा जाए क वह सफाई िनरी क से बड़ा आदमी है। चूं क अमीर को सरकार ने उनक सीमा म ला दया है तो यह गरीब के िलए बड़ा आ ासन है क अब उसके भी दन फरगे। ये त काल गरीबी हटाने का जो सरकार ने नारा दया है वह एक आ थक बकवास से यादा कु छ नह है। हालां क मनोवै ािनक और राजनीितक दोन ही दृि कोण से यह उस समुदाय के िलए एक बड़ा आ ासन है जो तक और वै ािनकता से कोस दूर है।5 धानमं ी के देश ापी चुनावी दौर ने उ ह सन् 1967 क तुलना म यादा लोकि य बना दया। पूरे देश के लोग अब उ ह जानने लगे थे। जनता से वोट मांगते व उ ह ने अपने ‘आकषक ि व’, अपने ‘िपता के ऐितहािसक भूिमका’ और सबसे यादा ‘गरीबी हटाओ’ जैसे नारे का खुलकर इ तेमाल कया। भूिमहीन मजदूर , िनचली जाित के लोग और अ पसं यक ने कां ेस(आर) को भारी समथन दया। िपछले चुनाव म मुसलमान ने कां ेस को खुलकर वोट नह दया था। नई पाट क सांगठिनक कमजोरी को युवा कायकता के उ साह ने दूर कर दया, िज ह ने देशभर म घूम-घूम कर अपने नेता के संदश े को फै लाया। मतदान के दन, मतदान क पर उमड़ी भारी भीड़ ने साफ कर दया क लोग तकलीफ से छु टकारा पाने के िलए नई उ मीद से लबरे ज ह।6 1952 के चुनाव म यह कहा गया था क अगर कां ेस एक लपपो ट को भी टकट दे दे तो वो चुनाव जीत जाएगा। ले कन जब नतीजे सामने आए तो साफ हो गया क ीमती गांधी क जीत उनके िपता क जीत से भी यादा बड़ी थी। 518 सीट म से कां ेस(आर) को 352 सीट पर जीत हािसल ई जब क दूसरे नंबर पर आने वाली सीपीएम को महज 25 सीट ही िमल पा । िवजेता और परािजत होने वाले, दोन ने ही वीकार कया क यह एक ही ि क जीत है। लेखक खुशवंत संह ने ट पणी क क इं दरा गांधी ने सफलतापूवक अपने आपको एकमा रा ीय तर के नेता के प म थािपत कर िलया है। हालां क आगे उ ह ने चेतावनी देते ए िलखा क अगर जनता के एक बड़े वग ारा वे छा से कसी एक ि को असीिमत स ा स प दी जाती है और िवप मह वहीन हो जाता है तो फर स ा म आने वाल के िलए अपनी उिचत आलोचना को भी बदा त करना मुि कल हो सकता है। इं दरा गांधी को असीिमत स ा देने के खतरे हमेशा मौजूद रहगे।7 1971 के चुनाव के नतीज म से एक था स ाधारी पाट का नाम बदल दया जाना। कां ेस(आर) को बदलकर कां ेस(आई) कर दया गया। हालां क बाद म ‘आई’ को भी हटा दया गया। जीत के भारी अंतर ने साफ कर दया क इं दरा गांधी क कां ेस ही वा तिवक कां ेस है और इसे कसी भी तरह के उपनाम क ज रत नह है। चुनाव म िमली कामयाबी ने ीमती गांधी को देशी राजा-महाराजा के िखलाफ िनणया मक कारवाई करने के िलए मजबूत ि थित म ला दया। सन् 1971 म, साल भर सरकार और देशी राजा के बीच बातचीत का दौर चलता रहा ले कन कोई कामयाबी नह िमली। अब रजवाड़े इस बात पर भी राजी होने को तैयार थे क भले ही उ ह ि वी पस न दया जाए ले कन उनक उपािधय से उ ह वंिचत न कया जाए। ले कन संसद म िवराट ब मत रखने वाली धानमं ी समझौता करने को तैयार नह थ । आिखरकार, 2 दसंबर को देशी राजा-महाराज को िमलनेवाली तमाम सुिवधा को समा करने संबंधी संिवधान संशोधन िवधेयक लोकसभा म पेश कर दया गया। लोकसभा ने इस िवधेयक को 6 के मुकाबले 381 वोट से जब क रा यसभा ने इसे 7 के मुकाबले 167 वोट से पास कर दया। अपने भाषण म धानमं ी ने राजा-महाराजा को नई दुिनया के सं ांत वग म शािमल होने के िलए आमंि त कया। धानमं ी ने आगे कहा क आज का सं ांत वह है जो अपनी ितभा, ऊजा और मानवजाित के िवकास म अपने योगदान क वजह से स मान पाता है और यह तभी हो सकता है जब हम िबना कसी े ता क भावना से एकसाथ िमलकर काम कर।8 II भारत के मु य चुनाव आयु ने पांचवं◌े आम चुनाव का िववरण िव तारपूवक अपनी रपोट म कािशत कया। उस चुनाव म कु ल मतदाता क सं या 27.5 करोड़ थी, जो 1952 म ए पहले चुनाव क तुलना म 10 करोड़ यादा थी। फर भी कसी भारतीय को मतदान के िलए अपने घर से दो कलोमीटर से यादा दूर नह जाना पड़ा। पूरे देश म 342,944 मतदान क बनाए गए जो 1962 क तुलना म 100,000 अिधक थे। मतदान करवाने के िलए हरे क मतदान क पर मतप , मतपेटी, प याही और मतपेटी क सील जैसी 43 व तु क आपू त क गई। इस चुनाव म 28.2 करोड़ मतप क छपाई क गई (यो य मतदाता से 70 लाख यादा ता क ु टय और दुघटना क सूरत म इसका इ तेमाल कया जा सके ) और 17,69,802 कमचा रय को इस काम म लगाया गया। इनम से यादातर क और रा य सरकार के कमचारी थे। मु य चुनाव आयु ने आगे अपनी रपोट म चुनाव म ई गड़बि़डय के िलए नाखुशी जािहर क । 1967 म ए चुनाव के अ ययन ये बताते ह क तमाम तरह के हंसक घटना क सं या 375 थी, िजनम से 98 घटनाएं िसफ िबहार म ई थ ।9 1971 म चुनाव आयोग ने अपनी रपोट म कहा क मतदान क पर क जा करने क 66 घटनाएं , िजसम मतपे टय पर बलपूवक क जा कर िलया गया और कसी एक ही उ मीदवार के प म मत डाल दए गए। क मीर घाटी के अनंतनाग म एक मिहला, अपने बुक म मतपेटी लेकर भाग गई और जब उसने इसे लौटाया तो इसम सैकड़ मतप डले ए थे। इस बार भी सबसे यादा गड़बड़ी िबहार म ही ई। 66 म से 52 बूथ कै च रं ग क घटना िबहार म , जहां जातीय सरगना के इशार पर गुंड ने मतदान क पर क जा कर िलया। मु य चुनाव आयु क राय म िबहार, पूरे देश म सबसे यादा जाितवाद से त रा य था और इस तरह का अितशय जाितवाद राजनीितक माहौल को िवषा बना रहा था। हालां क इन गड़बि़डय के बावजूद पांचवां आम चुनाव एक ऐसी घटना थी, िजसके िलए मु क अपने आपको बधाई दे सकता था। मु य चुनाव आयु ने अपनी रपोट क भूिमका म ऐसा ही िलखा, हालां क उ ह आगे चुनाव म गड़बड़ी संबंधी आंकड़ा भी देना पड़ा। चुनाव आयु के मुतािबक िपछले चुनाव और इस चुनाव के बीच हंद ु तान घने अंधेरे जंगल म भटक गया था और राह तलाश रहा था। देश म गुटबंदी चरम पर थी, संिवद सरकार आ और ग और इस अिन य के वातावरण को और भी अंधेरे म डालकर देश के रा पित बीच म ही चल बसे। इस बीच कां ेस जैसी शि शाली पाट म िवभाजन हो गया। चुनाव आयु क राय म कां ेस म िवभाजन क तुलना 1796 म इ लड के वंग पाट म ए िवभाजन से क जा सकती है। ऐसे तनाव, म, दबाव और लगातार प रवतन के बीच देश के भीतर और बाहर बबादी के मसीहा ने ये भिव यवाणी करनी शु कर दी थी क इस महान देश का लोकतं खतरे म पड़ गया है। चुनाव आयु ने कहा क िवनाश के इन भिव यवे ा को भारत भा य िवधाता (जनता) क यो यता म भरोसा नह था, जो ाचीन काल से ही भारत क आ मा म जीत का ज बा भरकर िवपरीत हालात से िनपटती रही है। इसी ेरणा ने देश क भौितक, नैितक और आ याि मक शि को पुनज िवत आ मिव ास दान कया है। हालां क कई लोग इस तक से असहमत हो सकते थे क चुनाव का इतने बड़े पैमाने पर करवाया जाना भारतीय आ याि मकता क िवजय थी ले कन यह िनि त तौर पर कहा जा सकता है क यह चुनाव, आधुिनक राजनीितक व प या चुनाव आधा रत लोकतं के जड़ जमाने क एक साफ अिभ ि था।10 III हंद ु तान म ए पांचवं◌े आम चुनाव से तीन महीने पहले पा क तान म पहली बार वय क मतािधकार के आधार पर चुनाव करवाए गए। यह चुनाव अयूब खान के उ रािधकारी, पा क तान के रा पित और सैिनक शासन के मु य शासक जनरल यहया खान ने करवाया था। पा क तान म ए चुनाव म दो पा टयां आमने-सामने थ । एक थी पि मी पा क तान क जुि फकार अली भु ो क पा क तान पीप स पाट और दूसरी थी पूव पा क तान क शेख मुजीब क पाट नेशनल अवामी लीग। आॅ सफोड और टडफोड म पढ़े, एक बड़े जम दार के बेटे भु ो ने ऊपरी तौर पर अपने आपको वगिवहीन नेता के प म पेश कया और हरे क पा क तानी से रोटी, कपड़ा और मकान का वादा कया। जब क शेख मुजीब ने चुनाव चार म पूव पा क तान के शोषण, बंगला भाषा के दमन और पि मी पा क तान के सैिनक शासक ारा इसके ाकृ ितक संसाधन के दोहन को अपना मु ा बनाया।11 ऐसा लगता है क यहया खान ने इस उ मीद के साथ चुनाव क घोषणा क थी क पीपीपी स ा म आ जाएगी और उ ह रा पित पद पर बनाए रखेगी। दसंबर 1970 के तीसरे स ाह म चुनाव करवाए गए। पीपीपी को पि मी पा क तान क 144 म से 88 सीट पर जीत हािसल ई जब क अवामी लीग ने यादा आबादी वाले पूव पा क तान क 169 म से 167 सीट जीत ली! चुनाव के नतीज से खुद शेख मुजीब को भी ता ुब आ, जब क यहया खान िनराशा म डू ब गए। यहया खान इस उ मीद म जी रहे थे क पा क तान क नई असबली एक लोकतांि क संिवधान का िनमाण करे गी ले कन चंता क बात यह थी क बल ब मत से िवजयी अवामी लीग एक संघा मक व था पर जोर दे रही थी। ऐसी व था म पूव पा क तान, अिधकांश मामल म वाय हो जाता, िसफ र ा और िवदेशी मामले ही क के अधीन रह जाते। मुजीब ने पहले ही संकेत दे दया था क पूव पा क तान, अपने संसाधन ारा अ जत िवदेशी मु ा और संभवतः अपनी मु ा पर भी िनयं ण चाहता था। यहया खान क चंता को भु ो क राजनीितक मह वाकां ा से बल िमला। चूं क पा क तान के दोन िह स का आपसी संबंध सा ा य और उपिनवेश जैसा था, िजसम पि मी पा क तान सैिनक, आ थक और यहां तक क सां कृ ितक प से भी पूव पा क तान पर बुरी तरह हावी था। ऐसी हालत म यहया खान और भु ो दोन के िलए ही यह बदा त से बाहर क बात थी क कोई बंगाली उनके भा य का फै सला करे । पि मी पा क तान के मुसलमान क िनगाह म पूव पा क तान के मुसलमान कमजोर और ौण क म के थे, जो हंद ु के संपक म आकर ब त ज दी हो सकते थे (अभी भी 1 करोड़ के करीब हंद ू पूव पा क तान म रहते थे)। इन हंद ु म ब त सारे पढ़ेिलखे पेशेवर थे िजनम वक ल , डाॅ टर और ोफे सर क तादाद खासी थी। पि मी पा क तान के सं ांत लोग को ये आशंका थी क अगर मुजीब क अवामी लीग को स ा संभालने का मौका िमल गया तो उनके ारा बनाया जाने वाला संिवधान हंद ु के लौह भाव से त हो जाएगा।12 दूसरी तरफ, पूव पा क तान के मुसलमान, पि मी पा क तान के मुसलमान को महज शासक वग ही नह बि क िवदेशी शासक वग यहां तक क शोषण करने वाला शासक वग मानता थे। वे अपनी भाषा बंगाली को खा रज कर दए जाने से नाराज थे और उनक िशकायत थी क उनके कृ िष संपदा का दोहन पि म पा क तान को िखलाने के िलए कया जा रहा है। उनक ये भी िशकायत थी क बंगाली मुसलमान क नुमाइं दगी पा क तान क नौकरशाही, यायपािलका और सेना म न के बराबर थी। अपने शोषण के िखलाफ उनक नाराजगी साल से िवकिसत होती आ रही थी। 1970 म ए चुनाव के समय इसी राजनीितक िवचार से े रत पूव बंगाल के लोग उस क ीय स ा के ित िव ोही मानिसकता से भर गए, जो हजार मील दूर से उन पर शासन करने वाली थी।13 जनवरी, 1971 म यहया खान और भु ो ने पूव पा क तान क राजधानी ढाका का अलग-अलग दौरा कया। उ ह ने शेख मुजीब से वाता क ले कन मुजीब एक संघीय संिवधान क मांग पर अड़े रहे। कोई समझौता न होता देख, रा पित यहया खान ने नेशनल असबली क बैठक ही नह बुलाई। इसके जवाब म अवामी लीग ने एक अिनि तकालीन हड़ताल का आ नान कया। पूरे पूव पा क तान म दुकान और कायालय पर ताला लग गया, यहां तक क रे लवे टेशन और हवाई अ ा भी बंद कर दया गया। पुिलस और दशनका रय के बीच क झड़प रोजमरा क घटना बन गई। सेना ने इस िवरोध को ताकत के बल पर कु चलने का फै सला कया। हवाई जहाज और समंदर के रा ते सेना क टु कि़डयां पूव बंदरगाह चटगांव पर उतारी जाने लग । 25-26 माच क रात को सेना ने ढाका यूनीव सटी पर घातक हमला कया, जहां के छा अवामी लीग के क र समथक माने जाते थे। दजन टक यूनीव सटी कै पस म घुस गए और छा वास पर भारी गोलाबारी शु कर दी गई। छा को बाहर िनकाला गया और तोप से भून दया गया। उनक लाश को वह कै पस म ही गाड़ दया गया और उनके ऊपर तोप के पिहये चला दए गए। शहर के दूसरे िह स म भी सेना क टु कि़डयां इसी तरह अपने काम को अंजाम दे रही थ । बंगाली अखबार और थानीय राजनीित के घर को िनशाना बनाया गया। उसी रात शेख मुजीबुरहमान को िगर तार कर िलया गया और हवाई जहाज से पि मी पा क तान म कसी अ ात जगह पर भेज दया गया।14 पा क तानी सेना अब देश के अंद नी िह स म घुस गई और बगावत क कसी भी आवाज को दबाने म जुट गई। पूव पा क तानी सेना के जवान ने कई जगह पर िव ोह कर दया। चटगांव म सेना के एक मेजर ने रे िडयो टेशन पर क जा कर िलया और बंगलादेश के वतं जन गणरा य के थापना क घोषणा कर दी।15 देश म छापामार यु शु हो गया। इन छापामार िव ोिहय के दमन के िलए पा क तान क सेना ने थानीय वफादार रजाकार के िगरोह का गठन कया। ये रजाकार मजहब और एक संयु पा क तान को बचाने के नाम पर अपने ही भाइय का क ल करने लगे। गांव के गांव, क बे, छोटे शहर यहां तक क अदद हवाई अ ा भी िव ोिहय के क जे म आता गया। पा क तानी सेना को फर से उस पर क जा करना पड़ता। पा क तानी सेना का जवाब अब बबरता क सीमा पार करने लगा। एक अमे रकन दूतावास के अिधकारी ने अपनी रपोट मे िलखा क पा क तानी सेना इस बात म यक न करने लगी क वह हंद ु के ारा कर दए गए बंगाली मुसलमान के िखलाफ िजहाद कर रही है।16 उस बगावत को याद करते ए एक पा क तानी िसपाही ने िव तृत िववरण िलखा है, िजसम पा क तानी सेना रा य स ा को फर थािपत करने का यास कर रही थी और उन जगह पर फर से क जा कर रही थी जो रा य-िवरोधी ताकत के क जे म चला गया था। उसक याद के मुतािबक, िव ोिहय क तुलना म उस इलाके क भौगोिलक दशा यादा ितरोध उ प कर रही थी। उसने आगे िलखा है क जमीनी संचार के मा यम िछ -िभ हो गए थे, िव ोही छापामार आम जनता म आसानी से घुल-िमल जाते थे और इस वजह से पा क तानी सेना क गित म भारी बाधा आ रही थी।17 पा क तानी सेना ने िवदेशी प कार को पूव पा क तान छोड़ देने का आदेश दया। ले कन ग मय म उनम से कु छ को फर से वापस आने क इजाजत दे दी गई। एक जमन प कार ने िलखा क पूव पा क तान म हर जगह गृहयु जैसे हालात थे। शहर के बाजार म आग लगा दी गई और गांव के खेत और मकान को जला कर न कर दया गया। कभी जंदगी और ऊजा से लबरे ज रही बि तयां अब सुनसान हो चुक थ । वहां भुतहा स ाटा पसरा आ था। एक अमे रकन संवाददाता ने िलखा क ढाका पर सेना का क जा है, जहां जबद ती ताकत और आतंक के बल पर शासन चलाया जा रहा था। पा क तानी सेना, खासतौर पर हंद ू अ पसं यक पर जु म ढा रही थी और उसके अिधकारी हंद ू मं दर को तोड़ रहे थे। इस बात पर भी यान नह दया जा रहा था क उन मं दर म आराधना करने के िलए कोई हंद ू बचा भी है या नह । िव बक क एक टीम ने पूव पा क तान का दौरा करने के बाद पाया क शहर , क ब और गांव म संपि का ापक िवनाश आ था और जनता म भारी आतंक ा था।18 ढाका से बड़े पैमाने पर लोग का पलायन शु हो गया। देश के अ य िह स से भी लोग भागने लगे और सम या िवकराल हो गई। लोग भारतीय सीमा क तरफ भागने लगे। अ ैल, 1971 के आिखर तक करीब पांच लाख शरणाथ भारत म दािखल हो चुके थे। मई तक उनक तादाद पं◌ैतीस लाख हो गई और अग त आते-आते उनक सं या बढ़कर अ सी लाख के करीब हो गई। सभी तो नह ले कन उनम यादातर हंद ू थे।19 भारतीय सीमा म पि म बंगाल, ि पुरा और मेघालय म शरणाथ िशिवर क बाढ़ आ गई। इन रा य पर बोझ को कम करने के िलए कु छ शरणा थय को म य देश और उड़ीसा भेज दया गया। शरणा थय को बांस और पोलीथीन से बनी झोपि़डय म रखा गया। जो थोड़े खुशनसीब थे उ ह कू ल और काॅलेज के बरामद म जगह िमली। इन शरणा थय के िलए खा ा क व था पि मी सहायता एजिसय और भारत के सरकारी अनाज गोदाम से क गई, जो अब ह रत ांित से पहले क तरह खाली नह थे।20 शु म भारत सरकार ने ‘खुले ार क नीित’ अपनाई थी, िजसम शरणा थय को देश म आने क इजाजत दी गई थी। शरणा थय क िज मेदारी रा य क नह बि क क सरकार क थी। भारत सरकार, शु से ही पूव पा क तान म चल रही घटना पर गौर से नजर रखती आ रही थी। सरकार के गु आिधका रक प चार म इसे बंगलादेश के िलए संघष कहा जाता था। दूसरी तरफ पा क तान ने इसे एक इ लामी पा क तान के िखलाफ भारतीय-य दी ष ं का नाम दया।21 यह िन य ही एक अितशयोि पूण बात थी य क पूव पा क तान म जो कु छ हो रहा था वो पूरी तरह पा क तान क अंद नी सम या थी और इजरायल यहां कही त वीर म नह था। ले कन एक बार जब िववाद शु आ तो भारत इसे अपने फायदे के िलए भुनाने से रोक नह पाया। भारतीय खु फया एजसी राॅ ( रसच एंड एनािलिसस वंग) इस पूरे घटना म म मु य भूिमका िनभा रही थी। राॅ क थापना अमे रक खु फया एंजेसी सीआईए क तज पर 1968 म क गई थी और इसका उ े य दुिनया भर म भारतीय िहत क र ा करना था। इसके याकलाप को संसदीय जांच से छू ट िमली ई थी और यह सीधे धानमं ी कायालय के ित िज मेदार थी। राॅ के मुिखया (शायद अिनवाय प से) एक क मीरी ा ण आर.एन. काव थे जब क इसके अिधका रय म पुिलस सेवा के अिधकारी और कभी-कभी सेना के अिधका रय को भी शािमल कया जाता था। पा क तान म चुनाव क घोषणा होते ही राॅ, पा क तान पर रपोट बनाने म जुट गई। 1971 म राॅ क एक रपोट ने पा क तानी सेना क ताकत के बारे म भारत सरकार को च काने वाली सूचना दी। इसम बड़े िव तार से पा क तानी सेना क कु ल सं या, उसके टक, लड़ाकू जहाज और उसक नौसैिनक शि के बारे म बताया गया। रपोट म यह दावा कया गया क पाक सेना ने भारत के साथ यु कर सकने लायक अ छी खासी शि अ जत कर ली है। रपोट ने चीन-पाक गठजोड़ के म ेनजर पा क तान ारा भारत पर हमले क संभावना से भी इं कार नह कया। इसके अलावा रपोट ने इस बात क ओर भी इशारा कया क पा क तान म संिवधािनक संकट को देखते ए वहां के सैिनक शासक जनता को बहकाने के िलए भारत पर यु थोप सकते ह। 1965 क तरह ही पा क तानी सेना, ज मू-क मीर म घुसपैठ करवा सकती है।22 पता नह , यहया खान के दमाग म ये बात थी या नह । इस बात का खुलासा पा क तानी अिभलेख से ही हो सकता है। ले कन भारतीय अिभलेख क मान तो भारत ने िवपरीत हालात से िनपटने के िलए पा क तान के ित ज र कु छ तैयारी कर रखी थी। इन योजना के पीछे पी.एन. ह सर और उनके सहयोगी डी.पी. धर काम कर रहे थे, जो उस व सोिवयत संघ म भारत के राजदूत थे। अ ैल, 1971 म धर ने ह सर को िलखा क ‘ये खुशी क बात है क चार यु म भारत, पा क तान से आगे िनकल गया है। खासकर, पूव पा क तान म पा क तानी सेना के दमन के बारे म हम दुिनया को बताने म कामयाब हो रहे ह।’ नई द ली के स ा ित ान म कु छ िव ेषक पा क तान के िखलाफ त काल सै य कारवाई क वकालत कर रहे थे ले कन डी.पी. धर क राय थी क भारत को हड़बड़ी म कोई कदम उठाने क बजाय पूव पा क तान म चल रही गितिविधय पर यान क त करना चािहए। उनक राय म पा क तान क बेहतरीन ढंग से िशि त सेना से लड़ना भारत के उ े य के िलए फायदे क बात नह थी। धर ने कहा क हम पूव पा क तान को ऐसी खाई के प म त दील कर देना है, िजसका कोई अंत नह हो और जो पूरे पा क तान क फौज और उसके संसाधन को िनगल जाए। हम साल-दो साल क योजना बनानी चािहए, न क एक-आध स ाह क ।23 IV 1971 क ग मय तक हंद ु तान सैकड़ शरणाथ िशिवर चलाने लगा। ले कन अब भारत ने बंगाली छापामार के िलए िश ण िशिवर क भी शु आत कर दी। इसे मुि बािहनी का नाम दया गया। मुि बािहनी म कु ल 20,000 हजार लड़ाके थे, िजनम ऐसे लोग भी शािमल थे जो कभी संयु पा क तानी सेना के िनयिमत सैिनक अिधकारी रहे थे। इसके अलावा इसम वयंसेवी बंगाली नौजवान शािमल थे, िज ह ह के हिथयार चलाने का िश ण दया जा रहा था। शु म इस िश ण क िज मेदारी सीमा सुर ा बल के पास थी, ले कन पतझड़ आते-आते भारतीय सेना ने सीधे इसक िज मेदारी संभाल ली। भारत म अपने आधार िशिवर से बंगाली छापामार ने पा क तानी सेना पर हमला और संचार के मा यम को तबाह करना शु कर दया।24 अ ैल, 1971 म चीन के धानमं ी ने पा क तानी रा पित को प िलखा िजसम भारत ारा पा क तान के ‘अंद नी मामल म ह त ेप’ क आलोचना क गई। उ ह ने पूव पा क तान म चल रहे ितरोध को पा क तान क एकता को ख म करने के िलए कु छ मु ी भर लोग ारा चलाया जा रहा आंदोलन मानने से इं कार कर दया। चीनी धानमं ी ने पा क तान को आ त कया क अगर हंद ु तान क िव तारवादी ताकत पा क तान पर हमला करने का दु साहस करती है तो इस यायपूण संघष म पा क तान क सं भुता और वतं ता बचाने के िलए चीन क जनता पहले क ही तरह सहयोग करने को तैयार है।25 चाउ एन-लाई क िच ी पा क तानी म अखबार म छपी। भारत म भी इसे ज र पढ़ा गया होगा। इस बीच भारत सरकार ने अपने व र क ीय मंि य को यूरोप और अ क देश के दौरे पर भेजा। इन मंि य को दुिनया को ये बताना था क हालात और शरणाथ सम या कतनी गंभीर हो चुक है और भारत इसे सुलझाने के िलए या कर रहा है। धानमं ी ने दुिनया के नेता से प िलखकर अपील क क वे पा क तानी सेना को बेकाबू होने से रोक। जुलाई, 1971 के पहले स ाह म अमे रक रा पित िन सन के सुर ा सलाहकार हेनरी क संजर द ली म ीमती गांधी से िमले, जहां उ ह पहली बार पूव बंगाल के मु े पर ि थित क गंभीरता का अहसास आ। शरणा थय क बाढ़ ने भारत के सामने बड़ी सम या खड़ी कर दी थी। धानमं ी ने क संजर से कहा क हम िसफ कठोर इ छा शि क बदौलत ही संयम धारण कए ए ह। सम या का समाधान तभी हो सकता था, जब पूव पा क तान के लोग क आकां ा को संतु कया जाए। भारत ने अमे रका से यह मांग क क पा क तान के सैिनक शासक पर सम या के समाधान के िलए अमे रक दबाव डाला जाए।26 नई द ली से क संजर इ लामाबाद गए और वहां से - गु प से - चीन क राजधानी पी कं ग का दौरा कया। पा क तान ने लंबे समय से िवरोधी रहे इन दोन देश के बीच बातचीत शु करने म मदद क थी। अमे रका और चीन के संबंध म आई गमाहट भी एक अहम वजह थी क अमे रका, पा क तान के सैिनक शासक के पीछे खुलकर खड़ा था। क संजर अपने साथ रा पित िन सन का एक प लाए थे, िजसम भारत से शरणा थय क शांितपूण वापसी म मदद देने और पा क तान क अखंडता को बरकरार रखने क मांग क गई थी। इसके जवाब म भारत ने अमे रका को आड़े हाथ लेते ए कहा क अमे रका ारा दए गए हिथयार जो 1965 म भारत के िखलाफ इ तेमाल कए गए थे, अब पा क तान क अपनी ही जनता के िखलाफ इ तेमाल कए जा रहे ह। भारत ने आगे कहा क उन लोग का कसूर इतना ही है क उ ह ने पा क तान के रा पित के उस वादे पर भरोसा कर िलया, िजसम लोकतं को बहाल करने क बात क गई थी। अमे रक रा पित ने संयु रा संघ के पयवे क क िनगरानी म शरणा थय क वापसी क बात क थी, िजसके जवाब म ीमती गांधी ने कहा क या रा संघ, िहटलर के आतंक से भागे ए य दी शरणा थय को घर वापसी के िलए मना पाया था, जब य दी और दूसरे नाजी िवरोधी राजनीितक कायकता का क लेआम जारी था?27 हाल ही म सामने आए कु छ द तावेज से ये पता चलता है क रा पित िन सन और उनके मु य सलाहकार हेनरी क संजर के बीच पूव पा क तान के भिव य को लेकर साफ मतभेद था। क संजर के अंदर छु पा आ इितहासकार साफ देख रहा था क - एक न एक दन बंगलादेश ज र आजाद हो जाएगा। उ ह ये भी दख रहा था क ‘भारत एक संभािवत िव शि है जब क पा क तान हमेशा एक े ीय शि ही रहेगा।’ ऐसा उ ह ने वाॅ शंगटन म भारतीय राजदूत से कहा भी था। फर भी िन सन, पूव पा क तान के सै य समाधान क उ मीद कर रहे थे। वह हंद ु तान को पसंद नह करते थे और उ ह ने क संजर को कहा था हंद ु तानी अ छे लोग नह ह। जब क दूसरी तरफ पा क तान के रा पित को वह भावुकता के तर तक पसंद करते थे। िन सन क राय म यहया खान एक सुस य और तकशील इं सान थे और अमे रका के ित अपने समपण क वजह से वे पुर कार के हकदार थे। यह पुर कार उ ह पूव पा क तान म िव ोह के दमन म अमे रक सहायता देकर दया जा सकता था। जब अ ैल, 1971 म क संजर ने अपनी एक रपोट म पूव पा क तान को यादा वायत ा और संभवतः नए हालात म आजादी तक देने क बात क तो िन सन ने इससे सहमित जािहर नह क । िन सन ने उस रपोट पर िलखा - यहया खान को इस व मत िनचोड़ो! िन सन के पा क तान के ित इस ख से नाउ मीदी जािहर करते ए क संजर ने एक बार अपने एक सहयोगी से कहा था क रा पित, यहया खान के ित िवशेष भाव रखते ह। क संजर ने आगे कहा क कोई देश इस आधार पर अपनी नीित तय नह कर सकता, ले कन यह भी जीवन का एक त य है। अग त, 1971 म िन सन ने अपने अिधका रय से जोर देकर कहा क वैसे तो पा क तानी कभी-कभी बेवकू फ जैसा वहार करते ह ले कन वे सीधी बात करते ह। दूसरी तरफ हंद ु तानी पचीदे क म के लोग ह और इतने चालाक ह क हम उनक बात म आ जाते ह। िन सन ने कहा क अमे रका कसी भी सूरत म शरणाथ सम या क वजह से हंद ु तान को पा क तान का िवखंडन करने नह देगा।28 जैसे-जैसे भारत क दूरी एक महाशि से बढ़ती गई, वह दूसरी महाशि के नजदीक आता गया।29 सोिवयत संघ, भारत क इस बात से सहमत था क पा क तान के दोन िह से एक दूसरे से फर नह िमल सकते। भारत और सोिवयत संघ अब नजदीक आ थक संबंध बना रहे थे। दोन देश के बीच क े माल का आयात और तैयार माल का िनयात कया जा रहा था। इस संबंध को और भी मजबूत बनाने के िलए सोिवयत संघ ने भारत को टीयू-22 बमवषक देने का ताव कया। इस ताव का अनुमोदन करते ए सोिवयत संघ म भारतीय राजदूत डी.पी. धर ने कहा, ‘हालां क पि मी देश क तुलना म सोिवयत िवमान िन को ट का है फर भी नाटो देश से जहाज खरीदना राजनीितक और आ थक नज रए से सही नह होगा।’30 जून, 1971 म भारत के िवदेश मं ी सरदार वण संह, माॅ को क या ा करने वाले थे। उनके माॅ को आगमन से पहले सोिवयत िवदेश मं लय ने डी.पी. धर से संपक कया और भारत-सोिवयत संघ के बीच मै ी संिध का ताव रखा। इस ताव को चीन और पा क तान के कसी भी सैिनक दु साहस के िखलाफ एक मजबूत ितरोधक बताया गया। सोिवयत अिधका रय ने धर से कहा क भारत को पा क तान क चंता नह करनी चािहए, ले कन उसे उसक उ री सीमा क तरफ से होने वाले कसी भी अनपेि त हमले (चीन) से िनपटने को तैयार ज र रहना चािहए।31 जब दोन देश के िवदेश मंि य क बैठक ई तो चीन का भय फर से वाता के एजडे पर हावी हो गया। वण संह ने ट पणी क क चीन ही ऐसा देश है, जो पा क तानी सैिनक शासन को हर तरह से मदद कर रहा है। इसके जवाब म आ ई े ोिमको ने कहा, ‘चीन हमेशा सोिवयत नीितय के भी िखलाफ रहा है। हम िजस उ े य का भी समथन करते ह, चीन उसका िवरोध करता है और िजसे हम सही नह समझते, चीन उसे सही ठहराता है। भारत-पा क तान के आपसी र त के संदभ म म नह समझता क चीन इस सामा य िनयम का अपवाद सािबत होगा।’32 सीमा िववाद को लेकर भारत-चीन के बीच दु मनी 1959-62 के जमाने से चली आ रही थी। चीन का सोिवयत संघ के साथ िववाद ताजा था और उसक वजह थी अंतरा ीय क युिन ट आंदोलन के नेतृ व को लेकर ित िं ता। माओ से तुंग ने सी संशोधनवाद का मजाक उड़ाया था और 1969 म उरी नदी के कनारे दोन देश म झड़प भी ई थी। भारत और सोिवयत संघ क सीमाएं कह भी एक दूसरे को नह छू ती थ , ले कन दोन देश क लंबी सीमाएं चीन के साथ लगी ई थ । इसिलए एक नजदीक गठबंधन दोन के ही िहत म था। िजस गु द तावेज का ऊपर िज कया गया है, उससे पता चलता है क मा य िनयम के उलट इस गठबंधन का ताव भारत जैसे गरीब और अिवकिसत देश क तरफ से नह कया गया था, बि क सोिवयत संघ जैसी महाशि आगे बढ़कर भारत से ये ताव कर रही थी। ोिमको से बातचीत के बाद, वण संह ने सोिवयत थायी सिमित के चेयरमैन एले सी कोसीिजन से संभािवत संिध पर चचा क । दोन देश के बीच संिध के मसौद का आदान- दान आ और 9 अग त, 1971 को दोन देश के िवदेश मंि य ने नई द ली म समझौते पर द तखत कर दए। यह समझौता कोई सामा य समझौता नह था बि क इसका अिधकांश िह सा दुिनया के िलए कसी धमाके से कम नह था। इस समझौते को शांित, िम ता और सहयोग क संिध का नाम दया गया, िजसने दुिनया के सामने सोिवयत संघ और भारत के बीच एक अिमट और उ तरीय िम ता का उ ोष कया। इस संिध क धारा नौ क एक पंि ने समझौते क मूल आ मा को कु छ इन श द म प कया संिध पर द तखत करने वाले दोन देश पर कसी बाहरी आ मण या आ मण क आशंका क सूरत म, ऐसी कसी भी प रि थित से िनपटने के िलए दोन ही देश आपस म पर पर सलाहमशिवरा करगे और अपने देश म शांत बहाली के िलए और देश क सुर ा के िलए उिचत कदम उठाएंग।े 33 1971 क ग मय तक भारतीय उप-महा ीप म खेमेबंदी साफ हो चुक थी। एक तरफ पा क तान(पि मी), चीन और अमे रका था तो दूसरी तरफ भारत, सोिवयत संघ और पूव पा क तान। V िसतंबर 1971 के आखरी स ाह म धानमं ी ने सोिवयत संघ का दौरा कया। उसके अगले महीने उ ह ने पि म के कई शहर का दौरा कया और आिखर म वाॅ शंगटन ग । हरे क जगह उ ह ने पूव पा क तान के िवकराल होते संकट पर दुिनया का यान आक षत कया। वाॅ शंगटन के नेशनल ेस लब म उ ह ने कहा क पूव पा क तान म जो कु छ चल रहा है वो कोई सामा य गृहयु नह है, बि क यह उन लोग को दंड देने के िलए चलाया जा रहा नरसंहार है, जो लोकतांि क ढंग से अपनी सरकार चुनना चाहते थे। उ ह ने कहा क लोकतं का दमन पा क तान क सारी सम या क मूल वजह है। उ ह ने आगे कहा क अगर अमे रका और भारत के िलए लोकतं अ छी व था है तो यह पूव बंगाल के लोग के िलए भी अ छी व था है।34 नवंबर म अपनी अमे रका या ा के दौरान ीमती गांधी, रा पित िन सन से दो बार िमल । क संजर ने इस मुलाकात को ‘दो बहरे लोग क शा ीय मुलाकात’ क सं ा दी। िन सन ने कहा क अमे रका, यहया खान के स ापलट म भागीदार नह बनना चाहता और अगर भारत सै य कारवाई करता है, तो इसके नतीजे ब त ही ख़तरनाक ह गे। इसके जवाब म ीमती गांधी ने कहा भारत नह , बि क पा क तान क तरफ से धमयु छेड़ने क धमक दी जा रही है। उ ह ने कहा क पि मी पा क तान ने बंगािलय के साथ बेईमानी और िव ासघात कया है और हमेशा उनके साथ भेदभाव भरा बताव कया है। दूसरी तरफ भारत अपने देश के अलगाववादी त व के साथ हमेशा संयम से पेश आता रहा है।35 इधर ीमती गांधी मु क से बाहर थ , उधर सरहद पर लड़ाई तेज हो गई। अ टू बर के अंत तक सीमा पर गोलाबारी और भी तेज हो गई। भारतीय सेना से उकसावा पाकर और उनक गोलाबारी क छतरी तले मुि बािहनी ने हमला तेज कर दया। अब उ ह सरहद पार कर हमला करने और वापस आकर छु पने म आसानी होने लगी। नवंबर के तीसरे स ाह तक भारी हिथयार से गोलाबारी शु हो गई। एक खबर के मुतािबक 21 अग त को ई एक भीषण लड़ाई म पा क तान को करीब 13 तोप से हाथ धोना पड़ा।36 यहया खान ने इसक िशकायत करते ए िन सन से कहा क भारत ने पा क तान पर िबना कसी उकसावे के एकतरफा हमला कया है। भारत ने पूव पा क तान से लगती सीमा पर 12 िडवीजन फौज का जमावड़ा कर रखा था और एक छु टपुट लड़ाई को ापक लड़ाई म बदलने क कोिशश कर रहा था।37 इितहास के इस कालखंड म दोन देश क फौज के बीच कोई मुकाबला नह था। िपछले दशक म भारतीय सेना, आधुिनक हिथयार से लैस क गई थी और इसके संगठन को चु त-दु त कया गया था। इसके अलावा, भारत ने हिथयार के वदेशी उ पादन क दशा म भी कदम बढ़ा दया था। हालां क भारतीय खु फया एजसी ने पा क तानी सै य मता को बढ़ा-चढ़ाकर दखाया था, ले कन हक कत ऐसी नह थी। अंतरा ीय रणनीित अ ययन सं थान के एक शोध के मुतािबक भारत, टक और भारी हिथयार के मामले म अपने पड़ोसी से कम से कम दो गुना यादा ताकतवर था। इसके अलावा देश म चल रहे गृहयु क वजह से पा क तानी सेना का मनोबल काफ कमजोर था। वह अपने बंगाली अिधका रय और जवान के सेना छोड़कर चले जाने और अपनी ही जनता के िखलाफ लड़ने से आ मिव ास िवहीन थी।38 इन बात के बावजूद पहला हमला पा क तान ने ही कया। 3 दसंबर क दोपहर को पा क तानी लड़ाकू िवमान ने भारत क पि मी सीमा से लगी हवाई प य पर हमला कया। साथ ही पा क तानी सेना क सात रे िजमट भारी हिथयार के साथ क मीर क तरफ से गोलाबारी करने लग । हमले के बाद भारतीय सेना ने जबद त पलटवार कया। भारत ने पा क तानी ठकान पर भारी हवाई हमला कया। भारत ने क मीर और पंजाब क सीमा पर जमीनी लड़ाई शु क जब क समंदर के रा ते भारतीय नौ सेना कराची क तरफ बढ़ने लगी। नौ सेना का इ तेमाल पहली बार कया जा रहा था। पि मी सीमा पर लड़ाई िछड़ने से भारत को पूव सीमा पर मोचा खोलने का सटीक बहाना िमल गया। भारतीय सैिनक टु कि़डयां और टक के द ते सरहद पार कर पूव पा क तान म घुस गए और दोन देश के बीच चल रहा छर् ◌ंयु एक खुली जंग म त दील हो गया।39 पि मी सीमा से भारत पर हमला करने का यहया खान का फै सला ब त के िलए आ यजनक था। एक सै य इितहासकार ने तो इस फै सले क ता ककता पर ही सवाल उठा दया।40 शायद पा क तानी ये उ मीद कर रहे थे क वे भारत पर व रत हमला कर भारतीय सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दगे और हालात िबगड़ने से पहले संयु रा संघ या अमे रक ह त ेप भारत को पलटवार करने से रोक देगा। पा क तानी सेना के कु छ जनरल को ये भी उ मीद थी क लड़ाई िछड़ने क हालत म उ ह चीनी मदद ज र हािसल होगी। 5 दसंबर को पूव पा क तान म पा क तानी सेना के कमांडर जनरल ए.ए.के . िनयाजी को सेना मु यालय से एक संदश े िमला, िजसम कहा गया क ब त ज द ही चीनी गितिविधय के शु होने क उ मीद है।41 हो सकता है पा क तान को ऐसी कोई चीनी मदद िमल भी जाती, ले कन दसंबर म िहमालय क घा टयां बफ क मोटी चादर से ढंक ग और चीनी मदद असंभव हो गई। यही मौसम हंद ु तािनय के िलए ढाका फतह करने का माकू ल व था। इससे तीन महीने पहले मानसून क वजह से इस इलाके क जमीन नम हो जाती और तीन महीने बाद चीनी सेना को उ र-पूव भारत से लगी सीमा पार करने का मौका िमल जाता। कु ल िमलाकर मौसम, थानीय आबादी और दोन सेना क ताकत म भारी अंतर, सब कु छ हंद ु तािनय के प म था। भारतीय सेना चार अलग-अलग दशा से ढाका क ओर बढ़ी। पूव पा क तान का डे टा इलाका न दय के जाल से पटा पड़ा था। ले कन मुि बािहनी जानती थी क कहां पुल बनाना है और कस शहर म दु मन क कतनी तादाद है। एक पा क तानी कमांडर ने उस लड़ाई को याद करते ए िलखा क मुि बािहनी को अपने नाग रक सािथय से काफ मदद िमली। भारतीय सेना हमारे सारे ठकान के बारे म जानती थी। उसे ‘ थानीय लोग से एक-एक बंकर तक क खबर िमल चुक थी।’42 इस तरह हंद ु तािनय के िलए राह आसान होती गई और वे तेजी से आगे बढ़ते गए। ढाका और दूसरे सबसे मह वपूण शहर चटगांव के बीच संचार व था को काट दया गया। हंद ु तािनय ने मु य रे ल लाइन पर िनयं ण थािपत कर िलया और ऐसी हालत म पा क तानी सेना बुरी तरह िघर गई।43 6 दसंबर को भारत ने पूव पा क तान क जगह एक नए देश को मा यता देने के अपने पुराने इरादे का खुलेआम ऐलान कर दया। इसी दन भारत सरकार ने ‘बंगलादेश नाम के गणरा य क अ थायी सरकार’ को मा यता दे दी। मुजीबुरहमान क गैरमौजूदगी म सैयद नज ल इ लाम को नए देश का कायकारी रा पित बनाया गया, िजनके अधीन एक पूरी मंि प रषद थी। हंद ु तान के िलए ये लोग वैसे ही थे, जैसे ि तीय िव यु के समय िम रा के िलए डी गाॅल क वतं ांसीसी सेना थी। मुि बािहनी के नेता बड़ी ाकु लता से उस ण के इं तजार म थे, जब उनका बड़ा भाई भारत, उनके ही यारे शहर पर क जा करके उ ह स प देता। एक स ाह क लड़ाई म ही भारतीय सेना ढाका के करीब प च ं गई। शहर पर भारी गोलाबारी क गई और भारतीय सेना उ र, दि ण और पूरब क तरफ से ढाका क ओर बढ़ी। भारतीय सेना को थोड़ी चंता तब ई, जब बमवषक से लैस अमे रका का सांतवां बेड़ा बंगाल क खाड़ी म प च ं गया। हेनरी क संजर ने कहा क अमे रका का यह कदम इस यु म ‘अमे रक ख’ को दज करना था।44 हालां क अमे रका क यह धमक तीका मक या कह क थ क म क थी। िवयतनाम क लड़ाई म बुरी तरह फं से होने के बाद अमे रका कसी दूसरी लड़ाई म फं सने का खतरा शायद ही लेता। खासतौर पर तब, जब भारत-सोिवयत मै ी संिध के बाद ये लड़ाई हो रही थी। जब ढाका का पतन लगभग नजदीक आ गया तो पूव पा क तान के गवनर और वहां के सैिनक कमान के मुिखया के बीच िववाद िछड़ गया। गवनर ज द से ज द आ मसमपण चाहता था, जब क भारतीय सेना से िघर चुक पा क तानी सेना का जनरल लड़ाई को जारी रखना चाहता था। गवनर ने त काल एक टेली ाम इ लामाबाद भेजा, िजसम तुरंत यु िवराम और सम या के राजनीितक समाधान क मांग क गई। टेली ाम म आगे कहा गया क अगर ऐसा नह आ तो भारतीय सेना के एक बार पूव मोच से फा रग हो जाने क सूरत म पि मी पा क तान पर भी खतरा बढ़ जाएगा। गवनर ने कहा क पि मी पा क तान के बिलदान का कोई मतलब नह है य क जनरल िनयाजी आखरी ण तक लड़ाई क बात तो कर रहे ह ले कन फर भी हम ढाका को नह बचा पाएंग।े 45 पूव पा क तान के गवनर के इस ख क पा क तान के दो मु य सहयोगी अमे रका और चीन ने भी पुि क । 10 दसंबर को क संजर ने वाॅ शंगटन म चीन के राजदूत आंग आ से मुलाकात क । चीनी राजदूत ने बड़े कठोर वर म कहा क बंगलादेश के िनमाण से उपमहा ीप म भारत क एक कठपुतली सरकार बन जाएगी। उ ह ने इसक तुलना मंचुकाओ सरकार से क , िजसे कभी जापान ने चीन क जमीन पर थािपत कया था। क संजर ने जवाब म कहा क बड़े दुख के साथ हम ये वीकार करना पड़ रहा है क यह लड़ाई पा क तान के हाथ से िनकल चुक है। उ ह ने कहा क अगर लड़ाई दो स ाह भी यादा खंची तो पि मी मोच पर भी पा क तानी सेना का वही हाल होगा, जो उसका ‘पूव इलाक ’ म आ है। क संजर ने आगे कहा क अब हम बचे-खुचे पा क तान क चंता करनी है। साथ ही सां वना के वर म उ ह ने कहा क हम बंगलादेश को मा यता नह दगे, न ही उससे कोई समझौता करगे।46 13 दसंबर क रात को भारतीय वायुसेना ने ढाका म गवनर के आवास पर भारी बमवारी क । उसी रात यहया खान ने जनरल िनयाजी को हिथयार डालने का संदश े भेज दया। इसक वजह ये बताई गई क ‘मानवीय िवनाश को देखते ए’ अब भारत का ितरोध संभव नह है। जनरल िनयाजी अगले पूरे दन आ मसमपण के बारे म मंथन करते रहे। आिखरकार, उ ह ने आ मसमपण का फै सला कर िलया। 15 दसंबर क सुबह वह अमे रक काउं िसल जनरल से िमले, िजसके ारा नई द ली को आ मसमपण का संदश े भेज दया गया। 16 दसंबर को भारतीय सेना के पूव कमान के मुख लेि टनट जनरल जे.एस. अरोड़ा आ मसमपण का प लेने ढाका प च ं गए।47 उसी शाम धानमं ी इं दरा गांधी ने लोकसभा म घोषणा क क ‘ढाका अब एक आजाद मु क क आजाद राजधानी है।’ कां ेसी सांसद ने इं दरा गांधी जंदाबाद के नारे लगाए, लोकसभा इन नार से गूंज उठी। यहां तक क एक िवप ी सांसद को भी ये कहते ए सुना गया क बंगलादेश क आजादी के िलए धानमं ी का नाम इितहास म वणा र म िलखा जाएगा।48 संसद से ीमती गांधी सीधे आॅल इं िडया रे िडयो के टू िडयो ग , जहां उ ह ने पि मी सीमा पर एकतरफा यु िवराम क घोषणा क । इसके चौबीस घंटे बाद जनरल यहया खान ने भी रे िडयो पर घोषणा क क उ ह ने भी अपनी सेना को यु िवराम करने का िनदश दे दया है।49 सन् 71 क लड़ाई दो स ाह के भीतर ही ख म हो गई। भारतीय सेना ने दावा कया क इस लड़ाई म उसके 42 जब क पा क तान के 86 बमवषक िवमान व त ए। टक के बारे म यह आंकड़ा 81 और 226 का था।50 ले कन सबसे बड़ा अंतर यु बं दय क सं या म था। पि मी मोच पर दोन ही प ने कु छ हजार िसपािहय को यु बंदी बनाया था जब क पूव मोच पर 90,000 पा क तानी िसपाही बतौर यु बंदी भारत के क जे म थे। इस लड़ाई के नतीजे से अमे रक रा पित िन सन सबसे दुखी थे। उ ह ने क संजर से कहा क भारतीय दोगले च र के होते ह। उ ह ने कहा क ‘पा क तान क इस हालत से मेरा दल बैठ जाता है। हमने उस धूत और दु औरत को चेतावनी दी थी, फर भी उसने ऐसा कया? जब नवंबर म वो मिहला, वाॅ शंगटन आई थी या हमने उससे कु छ यादा स ती से वहार कया था? ऐसा लगता है क उस चालाक बूढ़ी औरत क बात म आकर हमने भारी गलती क ।’ उस समय तक क संजर भी भारतीय क सही ताकत को खा रज करते आए थे। वह भी भारतीय क सै य मता का आंकलन नह कर पाए। अ टू बर म क संजर ने दावा कया था क भारतीय ऐसे खराब पायलट होते ह, ‘वे एक बमवषक िवमान को भी नह उड़ा सकते।’ ले कन अब उनक राय म हंद ु तान क ताकत को कम कर आंकने वाले लोग बुरी तरह गलत सािबत ए। पूव पा क तान पर भारत के क जे से पा क तान क हालत ‘ब के खेल क तरह’ हा या पद हो गई।51 जहां तक अमे रक ेस क बात है टाइम पि का ने समान प से दोन प क आलोचना क । टाइम ने यहया खान पर ‘बंगाली िव ोिहय के क लेआम’ का जब क इं दरा गांधी पर ‘एक संपूण यु ’ छेड़ने का आरोप लगाया। पि का क राय म इन दोन घटना ने उप-महा ीप के लोग क तकलीफ और बढ़ा दी। हालां क यूयाॅक टाइ स अखबार के भावशाली तंभकार जे स( काॅटी) रे टन अपने लेख म पूवा ही हो गए। रे टन ने तीखे ढंग से और खुलासा करने के अंदाज म िलखा क इस ‘वीभ स आपदा’ से अगर कसी मु क को फायदा आ है तो वह सोिवयत संघ है। भारत, दि ण एिशया म सोिवयत संघ का नया सहयोगी बन जाएगा और सोिवयत नौसेना के िलए हंद महासागर तक का इलाका स प देगा। इसके अलावा सोिवयत संघ भारत का उपयोग चीन क दि णी सीमा पर राजनीितक और सै य अिभयान छेड़ने के िलए भी करे गा। रे टन ने दावा कया क इसक ब त संभावना है क सोिवयत संघ भारत म अपना सैिनक अ ा थािपत कर लेगा। उनक राय म भारत का लोकतं के साथ एक छोटा सा अनुभव ख म होने क कगार पर है। रे टन ने सवाल कया क या भारत इस हाल म रह पाएगा क वह पूव पा क तान के िलए तो आजादी क बात करे ले कन अपने ही देश म के रल के क युिन ट समेत दूसरे कई गुट क आजादी क मांग को खा रज कर दे?52 VI पा क तान पर भारत क जीत से देश भर म खुशी क लहर दौर गई। इसे शताि दय के बाद भारत क पहली सैिनक जीत बताया गया। भारत एक देश के प म नह बि क एक भौगोिलक और जनसांि यक इकाई के प म पहली बात जीता था।53 दूसरी सह ा दी के पूवाध म भारत क उ र-पि मी सीमा से होकर कई िवदेशी आ मणकारी भारत को लूटने-खसोटने के इरादे से आए थे। बाद के दौर म बतौर शासक मुसलमान क जगह ईसाइय ने ले ली, जो जमीन क बजाय समंदर के रा ते हंद ु तान आए थे। हाल ही म हंद ु तान को चीन के हाथ करारी हार का सामान करना पड़ा था। एक लंबे समय तक हार और अपमान को बदा त करने के बाद हंद ु तािनय को सैिनक िवजय के ये नायाब और मधुर ण नसीब ए थे। सरहद के उस पार कु छ दूसरा ही माजरा था। य ही पा क तानी सेना के आ मसमपण क खबर आई, लाहौर के एक उदू अखबार ने िलखा क आज पा क तान खून के आंसू रो रहा है। अखबार ने िलखा क आज हंद ु तानी फौज ढाका प च ं गई है और िपछले हजार साल म हंद ु ने पहली बार मुसलमान पर जीत दज कर ली है...। आज हम परािजत और िनराश ह...। हालां क कु छ ही दन बाद पा क तान का उदू ेस इितहास से सबक लेकर मु क को सां वना देने म लग गया। एक अखबार ने छापा क हालां क पा क तान क यह हार िन य ही इ लाम के कले म एक सध जैसी है ले कन महान मौह मद गौरी भी उपमहा ीप म अपनी पहली लड़ाई हार गया था, ले कन बाद म जीत उसी क ई थी। अखबार ने अपने पाठक को याद दलाया क पहली हार के बावजूद मौह मद गौरी एक नए जोश से लबरे ज होकर का फर क जमीन पर इ लाम का झंडा फहराने फर से वापस आया था।54 हंद ु तान म जीत का ेय उन अनिगनत और अनाम फौजी जवान को िमला िज ह ने मु क के नाम अपने आपको कु बान कर दया। इसके साथ ही जीत का ेय एकमा राजनेता - ीमती इं दरा गांधी को भी िमला जो मु क क धानमं ी थ । अमे रक धमक के आगे न झुकते ए बड़े योजनाब तरीके से पा क तान के दो टु कड़े करवाने के िलए इं दरा गांधी क चार तरफ जय-जयकार ई। कां ेसी तो कां ेसी, यहां तक क िवप ी नेता ने भी ीमती गांधी क तारीफ के पुल बांधे। एक िवप ी नेता ने उनक तुलना हंद ु क पौरािणक देवी दुगा तक से कर दी। राजनीित और नेता को संदह े क िनगाह से देखने वाला देश का बौि क और पेशेवर तबका भी ीमती गांधी क तारीफ करने लगा। नई द ली के गांधी शांित ित ान म बंगलादेश क मुि िवषय पर एक सेिमनार आयोिजत कया गया। यह सेिमनार धानमं ी क शंसा और उनके ित लोग क दीवानगी का एक बड़ा उदाहरण था। इस सेिमनार म उ ाटन भाषण देते ए टाइ स आॅफ इं िडया के संपादक िग रलाल जैन ने कहा क ीमती गांधी के नेतृ व म कां ेस पाट के पुन थान से पूरी दुिनया म भारत का आ मिव ास और इसक छिव मजबूत ई है। आरएसएस के िवचारक के .आर. मलकानी ने 1971 क लड़ाई को आधुिनक भारत क राजनीितक या ा म एक मील का प थर बताया। इस घटना ने भारत को ‘भी और शांिति य देश’ के प म बनी छिव से मुि दला दी, अब भारत एक ‘शि शाली’ देश था। देश क पुरानी छिव को दुिनया गंभीरता से नह लेती थी, ले कन अब भारत दुिनया क इ त का हकदार बन गया। उसे नजरअंदाज नह कया जा सकता था। कू टनियक जी.एल. मेहता ने कहा क देश म आ मस मान क भावना का संचार आ है और इस नई ित ा से सही मायन म गौरव क भावना बढ़ी है। वामपंथी प कार रोमेश थापर क राय म बंगलादेश नीित क कामयाबी ने सोचनेसमझने वाले भारतीय के मन म उपलि ध और ताकत क भावना दान क है। वामपंथी यायिवद वी.आर. कृ णा अ यर ने इस घटना को भारतीय नेतृ व का कदमदर-कदम प रप होना करार दया। उ ह ने कहा क जो नीित गांधी के जमाने म एक अ प िवचार और नेह के समय एक स यतावादी सामािजक दशन थी वह इं दरा गांधी के नेतृ व म सरकारी कारवाई क एक ठोस और गितशील योजना बन गई।55 संकट के समय ीमती गांधी के गंभीर ख क भारत से बाहर भी सराहना क गई। अपने व के इितहास से प रिचत और दशनशा क िव ान मिहला ह ा आरड ने इं दरा गांधी क शान म कसीदे काढ़े। नवंबर क शु आत म आरड, यूयाॅक म अपने एक साझा िम के घर ीमती गांधी से िमली थी। एक महीने बाद जब हंद ु तान क फौज ढाका क तरफ बढ़ रही थी, तो आरड ने अपने उप यासकार िम मेरी मेकाथ को एक खत िलखा। इस खत म आरड ने िलखा क उस पा रवा रक समारोह के दौरान ीमती गांधी काफ खूबसूरत और आकषक लग रही थ । वह िबना कसी दखावे या अिभनय के ब त ही शांतिच सी वहां मौजूद लगभग हरे क पु ष के साथ हा यिवनोद कर रही थ । ह ा ने आगे िलखा क ीमती गांधी ज र जानती ह गी क कु छ ही दन बाद वह पा क तान से यु छेड़ने जा रही ह और यह भी क शायद उस अमानवीय और भयावह यु का वह आनंद भी लेनेवाली ह। अपने मनपसंद उ े य को ा करने म कामयाब होने वाली इस तरह क मिहला क मजबूती कतनी अ भुत चीज है!56 VII इसम कोई शक नह क धानमं ी और उनक पाट ने जवान क शहादत से िमली इस जीत का राजनीितक फायदा उठाना चाहा। माच, 1972 म तेरह रा य म िवधानसभा चुनाव करवाए गए। इनम से कु छ म िवप क सरकार थी जब क कु छ म कां ेस क अगुआई वाली बेमेल गठबंधन सरकार थी। सभी तेरह रा य म कां ेस आराम से जीत गई। इसम िबहार, महारा और म य देश जैसे मह वपूण रा य भी शािमल थे। जनसंघ के नेता अटल िबहारी वाजपेयी के श द म इन चुनाव म िवप ने 27,00 अलग-अलग उ मीदवार खड़े कए थे जब क कां ेस क तरफ से सभी सीट पर एक ही उ मीदवार चुनाव लड़ रहा था, िजसका नाम इं दरा गांधी था।57 इतनी तूफानी जीत के बावजूद फर भी एक रा य म धानमं ी क छिव और उनके जीत का उदाहरण काम नह आया। यह रा य था पि म बंगाल, जहां कां ेस िसफ इसिलए जीत पाई य क उसने चुनाव म बड़े पैमाने पर धांधली और आतंक का सहारा िलया। गुंड के िगरोह ने मनमाने तरीके से मतपेटी भर दी और पुिलस मुंह ताकती रही। कलक ा म ापक पैमाने पर मतदान क पर क जा कया गया। एक कायकता ने बाद म िलखा क कलक ा म कां ेस ारा लाए गए गुंड ने मतदान क से बाहर खड़े लोग से कहा क वे घर लौट जाएं य क पंजीकृ त सारा वोट पहले ही डाल दया गया था।58 सीपीआई के साथ गठबंधन म कां ेस ने रा य क 280 सीट म से 251 पर क जा कर िलया। कां ेस क इस भारी जीत से रा य म पांच साल से चले आ रहे, उथल-पुथल का युग ख म हो गया और पि म बंगाल पर क सरकार का मजबूत भाव थािपत हो गया। अब घरे लू मामल म धानमं ी िन ंत थ । उ ह ने अपना यान पा क तान से संबंिधत सम या को हल करने पर क त कया। पा क तान म यहया खान इ तीफा दे चुके थे। उनक जगह जुि फकार अली भु ो ने स ा संभाल ली थी। भु ो ने पूव ि टश धानमं ी सर एिलक डगलस होम से कहा क वह भारतीय नेतृ व के साथ िशखर बैठक करके िब कु ल ही नए िसरे से संबंध बनाने के इ छु क ह। ि टेन से यह संदश े भारत को भेज दया गया, साथ ही यह सलाह दी गई क पा क तान क हार के बाद उसके खंिडत गौरव को देखते ए िशखर बैठक का ताव भारत क तरफ से आना चािहए।59 इस ताव को भारतीय ने शु म हाथोहाथ नह िलया, वे पा क तान के ित शंकालु थे। इसक वजह भु ो क अिव सनीयता और भारत के ित उनका श ुता से भरा रवैया था। पा क तानी रा पित के नजदीक लोग ने भारत को इस बात का भरोसा दलाया क भु् ो पर भरोसा कया जा सकता है। पा क तान के अथशा ी महबूब अल हक ने अपने एक भारतीय समक से कहा क भु ो ब त ही संयमी और वहा रक मानिसकता के हो गए ह।60 डाॅन के संपादक मजहर अली खान ने अपने िम और पूव क युिन ट और भारतीय स ाद जहीर से कहा क भु ो ईमानदारी से अतीत को भूलने क कोिशश कर रहे ह। भारत को भु ो का हाथ मजबूत करना चािहए नह तो सेना और क रपंथी िमलकर उ ह स ा से हटा दगे, िजसका नतीजा भारत और पा क तान दोन के िलए खतरनाक होगा।61 जहीर और खान दोन ही हंद ु तान के बंटवारे से पहले टु डट फे डरे शन आॅफ इं िडया म साथ-साथ काम कर चुके थे। अब अपने पुराने िम और सदाबहार यायावर पी.एन. ह सर से इशारा पाकर वे उनसे िमलने लंदन प च ं े ता क दोन नेता के बीच होने वाली कसी संभािवत समझौते क शत पर िवचार कया जा सके । खान ने सलाह दी क पा क तान ारा बंगलादेश को मा यता देने क एवज म भारत को सभी पा क तानी यु बं दय को छोड़ देना चािहए। इसके अलावा दोन देश क सेना को यु शु होने से पहले क ि थित म लौट जाना चािहए और दोन नेता ारा शांित बहाली का संयु व जारी होना चािहए। ले कन जब क मीर क बात आई तो खान ने कहा क इस घोषणा म क मीर के िज से बचना होगा, य क इससे ‘भानुमती का िपटारा’ खुल सकता है। स ाद जहीर ने कहा क भारत को इस बात का पु ता आ ासन िमलना चािहए क भिव य म भारत पर कोई हमला नह होगा, कोई घुसपैठ नह होगी, वादा िखलाफ नह होगी और न ही ‘पा क तान के ारा क मीर म कोई भारत िवरोधी ोपगंडा होगा।’ खान इस बात पर राजी हो गए ले कन उ ह ने कहा क इस बात क मांग भारत क तरफ से होनी चािहए य क हम इस बात को मानना होगा क पा क तान म कोई भी वैसी सरकार नह चल सकती, जो खुले तौर पर ‘क मीर के मु े को छोड़ दे।’62 खान ने सीधे ये बात भु ो को बता और जहीर ने पी.एन. ह सर के ारा ये संदश े इं दरा गांधी तक प च ं ाया। जून, 1972 के आखरी स ाह म पा क तान के रा पित को एक िशखर स मेलन के िलए ि टश भारतीय सा ा य क पुरानी ी मकालीन राजधानी िशमला आमंि त कया गया। जुि फकार अली भु ो अपनी बेटी बेनजीर भु ो के साथ िशमला आए। उनके साथ पा क तानी अिधका रय का एक बड़ा समूह भी था। पहले अिधका रय के बीच मुलाकात ई फर उनके नेता आपस म िमले। भारत क मीर सिहत सभी मु का एक ापक समाधान चाहता था जब क पा क तान कदम-दर-कदम आगे बढ़ना चाहता था। एक िनजी बातचीत म भु ो ने ीमती गांधी से कहा क ‘वो खाली हाथ’ अपने लोग के बीच नह जा सकते। पा क तान ने कड़ी सौदेबाजी क । भारत चाहता था क ‘नो वार पै ट’ क बात वीकार कर ली जाए जब क ‘आपस म बल योग न करने’ क बात पर ही सहमित हो सक । भारत ‘एक संिध’ करना चाहता था, जब क पा क तान ‘महज समझौते’ पर ही राजी हो पाया। भारत, क मीर सम या के हल के िलए आगे माकू ल व का इं तजार करने के िलए तैयार हो गया ले कन उसने कहा क दोन ही प को िनयं ण रे खा का स मान करना होगा। भु ो ने इसम बड़ी चालाक से एक पंि और जोड़ दी क ‘दोन प के वीकाय ख पर िबना कसी पूवा ह के ’।63 इसका छु पा आ मतलब ये था क िनयं ण रे खा के बारे म पा क तान का जो ख था वो उस पर कायम रहेगा, जो क मीर िववाद को जंदा रखने के िलए ज री था! ीमती गांधी के मु य सलाहकार म से एक डी.पी. धर चाहते थे क इसी समझौते म क मीर सम या का थायी समाधान कर िलया जाए और इसे पा क तानी यु बं दय को छोड़ने क एक पूव शत बनाया जाए।64 डी.पी. धर प े क मीरी थे, उनका ज म और परव रश क मीर घाटी म ई थी। धानमं ी भी क मीरी मूल क थ ले कन उनके पुरखे कभी क मीर म रहा करते थे। वह इस िवषय पर उतनी मजबूती से नह सोच पा और उ ह इस मु े पर अंतरा ीय िवचार क भी चंता थी। उ ह पा क तान म भु ो क नाजुक ि थित (जैसा क मजहर अली खान ने चेतावनी दी थी) क भी चंता थी। आिखरकार 3 जुलाई क दोपहर को िजस समझौते पर दोन नेता ने द तखत कए, उसम िनयं ण रे खा के स मान क बात ही गई। हालां क भारत के जोर देने पर समझौते के मसौदे म एक धारा और जोड़ी गई, वो ये क दोन मु क अपने सारे िववाद को, शांितपूण तरीक से आपसी बातचीत के ारा या कसी अ य उपाय से, िजस पर दोन मु क सहमत ह , हल करगे। इस तरह सै ांितक प से आपसी िववाद म कसी तीसरे प क म य थता या क मीर म हंसा को बढ़ावा देने क बात को पूरी तरह से खा रज कर दया गया।65 हालां क जुि फकार अली भु ो ने साफतौर पर ीमती गांधी को भरोसा दलाया था क जब भी उनक ि थित पा क तान म मजबूत होगी वे अपने लोग को इस बात के िलए मनाने क कोिशश करगे क िनयं ण रे खा को अंतरा ीय सीमा मान िलया जाए। िशमला समझौते क याही सूखी भी न होगी क जुि फकार अली भु ो अपने वादे से (कम से कम अनौपचा रक प से ही सही) मुकर गए। 14 जुलाई को उ ह ने पा क तान क नेशनल असबली म तीन घंटे तक भाषण दया। उनका भाषण 69 प का था। उ ह ने इस बात पर चचा क क कै से वे 15 साल क उ से ‘अखंड पा क तान के िवचार’ को जीते आए ह। उ ह ने मुजीब, यहया और अपने को छोड़कर हरे क दूसरे ि को बंगलादेश के अलग होने क ‘दुभा यपूण और ासदभरी’ घटना के िलए िज मेदार ठहराया। उसके बाद वह क मीर मु े पर आए, जो अभी भी भारत और पा क तान के बीच िववाद का िवषय था। भु ो ने कहा क समझौते के दौरान यु िवजेता के प म हंद ु तान के हाथ म सारे प े थे। ले कन फर भी उसे हमारे साथ ‘एक बराबरी का समझौता करना पड़ा’। उ ह ने कहा क िशमला समझौता पा क तान के िलए एक बड़ी कामयाबी है य क हमने अपने सारे यु बं दय को छु ड़ा िलया और अपनी सारी जमीन वापस ले ली, जो हंद ु तािनय के क जे म थी। इसके बावजूद हमने ज मू-क मीर क जनता के ‘आ मिनणय के अिधकार पर कोई समझौता’ नह कया। उ ह ने पा क तानी जनता क तरफ से पूरी ितब ता दोहरायी क भिव य म जब कभी क मीर के लोग अपनी आजादी क लड़ाई छेड़गे, अगर शेख अ दु ला, मौलवी फा ख या कोई दूसरा नेता जनांदोलन शु करता है तो पा क तान उ ह समथन देगा।66 भारतीय नेता ने िशकायत क क भु ो ने वादा िखलाफ क है।67 शायद उ ह यह सोचना चािहए था क उ ह ने सन् 62 क लड़ाई के बाद कै सा महसूस कया था। चीिनय ने उस व बड़े अपमानजनक ढंग से मु क को यु म परािजत कया था। पूरी जनता और सारे नेता उस हार से सदमे म थे। ठीक वही हाल 1972 म पा क तान का आ था। उ ह भी भारत के हाथ एक भारी पराजय का सामना करना पड़ा। सचाई तो यह थी क पा क तािनय को यादा बुरी हार िमली थी, य क चीिनय ने भारत क महज थोड़ी सी और बेकार सी जमीन पर क जा कया, जब क भारत ने बंगलादेश के िनमाण म सहायता देकर अखंड पा क तान के िवचार को ही व त कर दया। इसका पा क तान क तरफ से एक ही जवाब हो सकता था, और वह यह था क क मीर को हंद ु तान से अलग कर एक अखंड और धमिनरपे भारत के िवचार को ही व त कर दया जाए। 4 ित ं ी इं दरा हंद ु तान है, और हंद ु तान इं दरा है। डी.के . ब आ, कां ेस अ य , 1974 I 15 अग त, 1972 को हंद ु तान ने अपना 25वां वतं ता दवस मनाया। लोकसभा म आधी रात को एक बैठक बुलाई गई, जहां धानमं ी ने 1857 के िव ोह से लेकर अब तक के संघष को याद कया। ीमती गांधी ने कहा क भारत क नीित सबसे दो ती क ले कन कसी के आगे न झुकने क रही है।1 अगली सुबह उ ह ने लाल कले के ाचीर से रा को संबोिधत कया। उ ह ने कहा क भारत प ीस साल पहले क तुलना म आज एक ताकतवर देश है। हमारे यहां लोकतं ने जड़ जमा ली ह। हमारी सोच साफ है। हमारा ल य तय है और उस ल य को ा करने के रा ते भी साफ है। हमारी एकता पहले क तुलना म काफ मजबूत है। ीमती गांधी ने कहा क दुिनया के इितहास म कोई भी रा दूसर क तरफ देखकर नह बि क अपने आ मिव ास, इ छाशि और एकता के बदौलत आगे बढ़ा है।2 यहां गौर करने लायक बात यह थी क ीमती गांधी के भाषण ने आ थक पहलु को नह छु आ। आजादी के बाद से भारत क अथ व था 3-4 फ सदी क दर से बढ़ोतरी कर रही थी। कारखान म उ पादन करीब 250 फ सदी बढ़ा था, खासकर उपभो ा व तु क तुलना म भारी उ ोग म उ पादन यादा बढ़ा था। उ िमय का एक नया वग पनप गया था, िजसने पुराने औ ोिगक क से दूर अपनी ईकाइयां थािपत करनी शु कर दी थ । सरकार ने बुिनयादी ढांचा सुधारने पर यान दया था। 1951 म िबजली का उ पादन 66 लाख कलोवाट घंटा हो रहा था, जो बढ़कर 1971 म 5 करोड़ 60 लाख कलोवाट घंटा हो चुका था। सड़क क लंबाई दोगुनी हो गई थी जब क मालगाि़डय से ढु लाई म करीब तीनगुना बढ़ोतरी हो गई थी।3 िवकास क इन गितिविधय से ामीण और शहरी उ िमय और कसान को काफ फायदा आ। जहां न दय पर बांध या ूबवेल से संचाई क सुिवधा उपल ध थी, वहां कसान ने खा ा , कपास, िमच और सि जय का उ पादन बढ़ा दया था। पहले के अलग-थलग रहे गांव अब बाहर क दुिनया से जुड़ गए। नई सड़क के बनने से गांव से अनाज लाना और उन तक अ य चीज को प च ं ाना आसान हो गया। अब गांव के लोग आसानी से शहर जाने लगे और नए िवचार से अवगत होने लगे। हालां क अभी भी गांव के अंदर साइ कल, टेलीफोन और कू ल जैसी सुिवधा का ब त धीमा सार आ था।4 इन सारे सुधार के बावजूद देश म चंताजनक प से े ीय िवषमता पनप आई। ह रत ांित से ामीण भारत के महज दस फ सदी िजल को फायदा आ था। अभी भी यादातर इलाक म खेती का काम मानसून के भरोसे ही था। इसी तरह कृ िष और औ ोिगक उ पादन म बढ़ोतरी के बावजूद देश के अंद नी िह स म अभी भी ापक गरीबी का आलम था। धानमं ी ारा आजादी क 25व सालिगरह पर दए गए भाषण से ठीक एक साल पहले पूना के दो अथशाि ाय वी.एम. दांडक े र और नीलकं ठ रथ ने ‘भारत म गरीबी’ (पावट इन इं िडया) नाम से एक शोध रपोट कािशत क । देश के अंद नी भाग म कए गए अपने सव ण के आधार पर इस रपोट म यह िन कष िनकाला गया क देश क 40 फ सदी ामीण और 50 फ सदी शहरी आबादी को सामा य जीवन तर भी नसीब नह है। उस व सामा य जीवन यापन का पैमाना ामीण आबादी के िलए सालाना 324 पए और शहरी आबादी के िलए सालाना 489 पए खच करने का था। रपोट म ये कहा गया क िपछले एक दशक म गरीबी घटने क बजाय बढ़ गई है। साठ के दशक क शु आत म ामीण इलाक क 33 फ सदी और शहर क 49 फ सदी आबादी गरीबी रे खा से नीचे थी। 1970 के आसपास दांडक े र और रथ ने अनुमान लगाया क करीब 22.3 करोड़ भारतीय गरीब थे, जो देश क कु ल 53 करोड़ आबादी के 40 फ सदी थे। कु छ दूसरे अथशाि ाय ने कु छ अलग अनुमान लगाया। कु छ ने गरीबी रे खा से नीचे रहने वाल क सं या दांडक े र और रथ से भी यादा बताई जब क कई दूसर ने कहा क ये सं या थोड़ी सी कम है। अथशाि ाय म इस बात पर मतभेद था क भारत म वा तव म कतने गरीब लोग रहते ह ले कन वे इस बात से सहमत थे क उनक सं या काफ यादा है। ि़ढवादी से ि़ढवादी अनुमान भी यह कहता था क भारत म कम से कम 20 करोड़ गरीब ज र थे। इन अ ययन के मुतािबक ामीण भारत के गरीब लोग अपनी आमदनी का 80 फ सदी भोजन पर, 10 फ सदी धन पर और शेष 10 फ सदी कपड़े और अ य सुिवधा पर खच करते थे।5 सा रता न बढ़ा पाना देश क दूसरी बड़ी नाकामयाबी थी। िपछले साल म िव ान और मानिवक िवषय के काॅलेज क तादाद म खासी बढ़ोतरी ई थी। इं जीिनय रं ग और मेिडसीन जैसे पेशेवर पा म के सं थान भी काफ खुले थे ले कन ाथिमक िश ा दान करने म देश बुरी तरह िपछड़ गया था। 1947 क तुलना म 1972 म यादा िनर र लोग थे। हालां क हजार नए िव ालय खोले गए थे ले कन उन लाख वय क और बुजुग को पढ़ाने क कोई गंभीर व था नह क गई, जो िलख या पढ़ नह सकते थे। िजन लोग ने कू ल म दािखला िलया, उनम से ब त कम ातक क पढ़ाई कर पाए। पढ़ाई बीच म ही छोड़ देने वाले लोग क सं या ब त यादा थी। ऐसे ब म लड़ कय और िनचली जाित के प रवार से ता लुक रखने वाले ब े यादा थे।6 ीमती गांधी ारा लाल कले से दए गए भाषण के कु छ ही स ाह बाद अथशा ी जगदीश भगवती ने हैदराबाद म एक ा यान दया। भगवती ने कहा क आजादी के बाद भारत म िमि त अथ व था क नीित लागू क गई िजसम समाजवाद और पूंजीवाद के कई त व को शािमल कया गया। ले कन हक कत यह है क हंद ु तान दोन मामल म िपछड़ गया। भगवती ने कहा क हंद ु तान क अथ व था इतनी धीमी गित से बढ़ी है क इसे पूंजीवादी नह कहा जा सकता, दूसरी तरफ यह गरीबी और अिश ा िमटाने म इतनी नाकामयाब रही है, क यह समाजवादी कहलाने क हकदार नह है।7 II धानमं ी ने दावा कया क भारत म लोकतं ने जड़ जमा ली ह। कु छ मायन म यह सही भी था। देश म सफलतापूवक पांच आम चुनाव और सौ के करीब रा य िवधानसभा चुनाव करवाए जा चुके थे। िजन रा य क िवधानसभा के िलए चुनाव करवाए गए थे, उन रा य का आकार कसी यूरोपीय देश से छोटा नह था। वतं चुनाव के अलावा देश म लोग के कह भी आने-जाने और िवचार के आदान- दान करने पर कोई रोक नह थी। मु क म एक आजाद ेस काम कर रहा था। ले कन दूसरे अथ म देश क लोकतांि क न व उतनी मजबूत नह थी। एक जमाने म आॅल इं िडया कां ेस कमेटी म हरे क रा य के चुने ए ितिनिध आ करते थे, िज ह तालुक और िजला तर से भेजा जाता था। सबसे अहम बात यह थी क कां ेसी मु यमंि य का चुनाव कां ेस िवधायक दल के ारा होता था। ले कन अब हालात बदलने लगे थे। 1969 म पाट म िवभाजन के बाद इं दरा गांधी अपने वामीभ उ मीदवार को अहम ओहद पर िबठाने क ि थित म आ गई थी। 1971 के चुनाव म भारी जीत के बाद तो उनक यह ि थित और भी मजबूत हो गई। सारी शि एक ि के हाथ म क त होती गई। उसी साल उ ह ने राज थान और आं देश के मु यमंि य को एक के बाद एक करके बखा त कर दया और अपने मनपसंद ि को मु यमं ी बना दया। एक अखबार ने िलखा क अब इसका कोई मतलब नह रह गया क कौन सा ि आं देश का मु यमं ी बनता है। य क जो भी ग ी पर बैठेगा, उसे अपना पद बचाने के िलए हैदराबाद म बैठे िवधायक या संिवधान क ओर देखने क बजाय द ली म बैठी उस मिहला पर िनभर होना पड़ेगा।8 1971 के चुनाव के बाद धानमं ी के दूसरे बेटे संजय गांधी सावजिनक जीवन म यादा दखाई पड़ने लगे। अपनी पढ़ाई के दौरान उ ह अपने पहले कू ल से िन कािसत कर दया गया था। ब त मुि कल से दूसरे कू ल म उ ह ने पढ़ाई पूरी क थी। भारत आकर अपनी कार क फै टरी थािपत करने से पहले संजय गांधी ने इं लड म राॅ स राॅयस कार क कं पनी म थोड़े समय के िलए िश ण िलया था। जब वह अपनी फै टरी के िलए जमीन देख रहे थे, उसी व उ ह ने राजनीित म अपना पहला कदम रखा। 1971 म ीमती गांधी ने उ ह द ली नगर िनगम चुनाव के चार अिभयान के उ ाटन का िज मा स पा। अगले महीने एक िस सा ािहक को उ ह ने सा ा कार दया। यह सा ा कार कसी धमाके से कम नह था। उ ह ने कहा क वे बातचीत और लंबे समय तक िवचारिवमश म यक न नह रखते, बि क उ ह नतीज म यक न है। उनके िवचार म भारतीय युवा नाजुक लीवर वाले होते ह, उनम कोई मा ा नह होता। मानिसक तौर पर वे अपने माता-िपता क मानिसकता के करीब होते ह, उनम कोई नयापन नह होता...!9 धानमं ी के बड़े बेटे राजीव गांधी एक िशि त पायलट थे, जो इं िडयन एयरलाइं स म काम करते थे। ीमती गांधी संजय को लेकर चंितत रहती थ । 1971 म अपने एक िम को भेजे प म उ ह ने िलखा क राजीव तो कु छ करता भी है, ले कन संजय कु छ नह कर रहा और वह एक खच ले काम म लगा आ है। उ ह ने आगे िलखा क संजय का वभाव मेरे ही जैसा है, म भी उसक उ म वैसी ही थी... िज ी और अपने मन क करने वाली। मेरा मन उसे लेकर परे शान रहता है क कह आगे उसे तकलीफ न उठानी पड़े।10 बहरहाल, संजय क कार प रयोजना को सरकार से आननफानन म हरी झंडी िमल गई। छोटी कार बनाने के लाइसस के िलए सरकार के पास 18 आवेदन आए थे, िजसम से िसफ एक ही आवेदन को हरी झंडी िमली। वह आवेदन धानमं ी के बेटे का था। जब क उ ह इसका कोई पूव अनुभव नह था। ह रयाणा के कां ेसी मु यमं ी बंसी लाल ने संजय गांधी क कार प रयोजना के िलए 300 एकड़ जमीन औने-पौने दाम पर आवं टत कर दी।11 िवप के सांसद ने इस पर संसद म सवाल कया। ीमती गांधी ने इन सारे सवाल को खा रज कर दया। हालां क उनके सबसे नजदीक सलाहकार पी.एन. ह सर को भी इस पर आपि थी। एक रपोट के मुतािबक ह सर ने ीमती गांधी को सलाह दी क वे मा ित प रयोजना को खा रज कर द और खुद को अपने बेटे के कारनाम से अलग कर ल।12 ह सर क सलाह पर कसी ने कान नह दए। धीरे -धीरे संजय गांधी अपनी मां के साथ यादा दखने लगे और सिचवालय म ह सर का भाव ीण होने लगा। 1972 के आते-आते कां ेस म भाई-भतीजावाद का बोलबाला हो गया और ाचार म भी बढ़ोतरी होने लगी। जून, 1971 म ह सर ने कां ेस शािसत राज थान म जड़ जमा चुके और सं थाब हो चुके ाचार पर धानमं ी का यान आक षत कया।13 मंि य और नौकरशाह का समूह सरकारी प रयोजना क दलाली म लगा था। क ीय सरकार के तर पर भी इस तरह क गितिविधयां बढ़ती जा रही थ । असम से आने वाले एक क ीय मं ी ने भारी मा ा म धन जमा कर िलया था। म य देश के एक दूसरे क ीय मं ी पर आरोप लगा क उनक सांठ-गांठ एक ांसीसी हिथयार िव े ता कं पनी से है, िजससे पैसा खाकर उ ह ने उसे ठे का दलवाने का वादा कया था।14 III सामािजक मोच पर देश को एक बड़ी उपलि ध यह हािसल ई थी क धानमं ी के पद पर एक मिहला आसीन थी। ले कन पूरे देश म मिहला क या ि थित थी? एक तरफ धानमं ी चुनाव-दर-चुनाव जीत रही थ , साथ ही उनक अगुआई म देश ने हाल ही म एक यु भी जीता था। दूसरी तरफ भारतीय सामािजक िव ान शोध प रषद ने मिहला क ि थित पर 75 अलग-अलग सव ण करवाए थे, िजसके नतीजे कु छ और ही थे। यह सव ण देश क अथ व था, कानून, रोजगार, िश ा, वा य और कई दूसरे े म मिहला क उपि थित के संदभ म था।15 सव ण के नतीजे काफ िनराशाजनक थे। ब त मायन म देश म चल रही आधुिनकता क या ने समाज म लंग-िवभेद को बढ़ावा दया था। उदाहरण के िलए वा य सेवा म बेहतरी से मु यत पु ष को फायदा आ था। देश म लंगानुपात खराब हो रहा था और 1971 म 1000 पु ष क तुलना म देश म मिहला क सं या महज 931 रह गई थी। औ ोिगक े म काम करने वाले कामगार म मिहला क सं या 1961 के 31.53 फ सदी क तुलना म 1971 म महज 17.35 फ सदी रह गई थी। कभी कारखान म पित-पि य को िनयुि के दौरान ो साहन िमलता था, ले कन तकनीक गित होने से ब त सारे अकु शल कामगार को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, िजसम यादा सं या मिहला क थी। देश क अिधसं य मिहलाएं सुदरू इलाक और देश के अंद नी िह स म काम करती थ । कसान प रवार म हरे क सौ कामगार पर 50 मिहलाएं काम करती थ , जब क भूिमहीन प रवार म काम करने वाली मिहला क तादाद 78 तक थी। धान क बुआई जैसे खेतीबाड़ी के यादातर क ठन काम मिहला के िज मे थे, िजससे उ ह आंत संबंधी बीमारी और क टाणुजिनत रोग होने का खतरा रहता था। इसके अलावा उ ह प रवार के िलए धन, पशु के िलए चारा और अपने ब क भी देखभाल करनी पड़ती थी। ये ऐसे काम थे, जो मिहला और प रवार क लड़ कय के िलए ही आरि त थे।16 देश म सामा यतया सा रता क दर ब त ही खराब थी। मिहला के िलए तो सा रता न के बराबर थी। 1971 के आंकड़ां◌ के मुतािबक महज 39.5 फ सदी मद और 18.4 फ सदी औरत ही पढ़-िलख सकती थ । िबहार के ामीण इलाक म महज 4 फ सदी मिहलाएं ही सा र थ । िबहार और उड़ीसा जैसे रा य म गरीबी क भयावह ि थित ने रोजगार के िलए बड़े पैमाने पर पलायन को बढ़ावा दया था, िजससे मिहला के कं ध पर और भी बोझ बढ़ गया। आईसीएसएसआर (भारतीय सामािजक िव ान शोध प रषद) क रपोट के मुतािबक मिहला के िलए जो कु छ भी मुम कन हो सकता था, वो वा तव म उनक ‘प च ं से ब त बाहर’ था। उनके अ ययन म ये पाया गया क हंद ु तानी समाज मिहला के िलए नए सं थान और काय के नए तौर-तरीके िवकिसत करने मे िब कु ल नाकामयाब रहा था। आजाद भारत म अपने िलए एक ब आयामी भूिमका तलाश करने का उनके पास कोई अवसर नह था। अिधकांश मिहला को संिवधान द अपने अिधकार और मौक का पता ही नह था। दहेज के मामल म बढ़ोतरी और अ य दूसरी तरह क घटनाएं बढ़ रही थ , जो मिहला क ि थित को कमजोर करती थ । यह उन िस ांत म िगरावट क सूचक थी, िजसक क पना और िजसका िवकास जंग-एआजादी के दौरान कया गया था। तािलका 21.1 1947 से 1971 के बीच िश ण सं थान म ित 100 लड़क पर लड़ कय क सं या सामािजक बदलाव क शि य का असर िसफ शहर , ऊंची जाितय और अं ेजी भाषी प रवार म आ था, िज ह ने अपनी बे टय को िशि त कया था और उ ह काॅलेज म पढ़ने के िलए भेजा था। ये लड़ कयां उन काॅलेज म ावसाियक और तकनीक िश ा हािसल कर रही थ । इस छोटे से समूह म काफ सं या म मिहलाएं डाॅ टर, इं जीिनयर, नौकरशाह और यहां तक क वै ािनक भी बनने लगी थ । दूसरी तरफ ब त से खेितहर समुदाय और िनचली जाितय के लोग अब क या को मू य देने क बजाय लड़क के िलए दहेज मांगने लगे थे। यह मिहला क ि थित म आई िगरावट को साफ दशाता था। तेज र तार शहरीकरण और बड़े पैमाने पर पु ष के पलायन ने वे यावृित के िलए मिहला क खरीद-फरो त को भी बढ़ावा दया। हालां क चुनाव के व मतदान के ितशत म मिहला क बढ़ती भागीदारी ज र एक राहत देने वाली बात थी। 1962 के चुनाव म 46.6 फ सदी मिहला ने मतदान कया था जब क 1967 म 55.4 फ सदी और 1971 म 59.1 फ सदी मिहला ने मतदान कया। स र के दशक क शु आत म मिहला आंदोलन के ल ण भी उभरकर सामने आने लगे थे। इसी दौरान देश के पहले मिहलावादी संगठन क भी थापना ई, िजसका ल य मिहला कामगार और मजदूर के अिधकार क र ा और मू य वृि का िवरोध करना था।17 िनचली जाितय के सशि करण आंदोलन क तरह ही मिहला आंदोलन को भी देखने के दो नज रए थे। एक नज रया ये था क अभी भी मिहलाएं बड़े पैमाने पर शोषण का िशकार थ । जब क दूसरा नज रया ये कहता था क आजादी के समय से मु यधारा म उनक कम उपि थित और परं परा ारा पोिषत-प लिवत उनके ऐितहािसक शोषण को देखते ए उनक ि थित म सुधार आ था। इस तरह देखा जाए तो हालां क उनक सा रता दर चंताजनक तर तक कम थी, फर भी आजादी से पहले क ि थित को देखते ए उनक ि थित म उ लेखनीय सुधार आ था। इसे तािलका 21.1 से साफ समझा जा सकता है। मिहला क ि थित म सबसे यादा सुधार सुदरू दि ण के रा य के रल म आ। यहां पर मिहला-पु ष का लंगानुपात 1.019 था, जो देश म सबसे यादा था (हक कत म यह एकमा ऐसा रा य था, जहां मिहला क सं या पु ष से यादा थी)। इस रा य म मिहला क जीवन याशा सबसे यादा 60.7 साल थी जब क उनक सा रता दर 60 फ सदी से यादा थी, जो उनके रा ीय औसत 20 फ सदी से ब त ही यादा थी। के रल म ित ि वा य पर खच सबसे यादा था, साथ ही िशि त दाइय और नस क सहायता से होने वाले िशशु ज म दर भी सबसे ऊंची थी। इसके अलावा रा य म ज म के समय होने वाली क या मृ युदर पूरे देश म सबसे कम थी। यह दर 1000 लड़ कय के ज म पर महज 48.5 क थी।18 के रल िसफ मिहला के बारे म ही अपवाद नह था। यहां के पु ष भी यादा िशि त थे और वा य सुिवधा तक उनक बेहतर प च ं थी। आंकड़ां◌े से ये पता चलता है क के रल, वा तिवक अथ म सामािजक समानता क ओर बढ़ चुका था। जीवन के हरे क े म िनचली जाितय के लोग मु यधारा म आ रहे थे और उनक आवाज मजबूत हो चुक थी। समाज से छू आछू त क था करीब-करीब ख म हो चुक थी। िनचली जाित ही नह , के रल म कमजोर वग का आंदोलन भी काफ मजबूत था। के रल म देश का सबसे िवकिसत मजदूर आंदोलन वजूद म था। ले कन सवाल ये है क ऐसा के रल म ही य आ? जैसा क अ याय 14 म काश डाला गया है, के रल म गितशील महाराजा , ईसाई िमशन रय और सामािजक आंदोलन का एक इितहास रहा है। ये आंदोलन जाित और वग के इद-िगद घूमते थे और इनसे टकराते भी थे। आजादी के बाद इन तमाम सुधारवादी परं परा को के रल म बनी देश क पहली क युिन ट सरकार ने(1957-59) सुधार क दशा म मजबूती से आगे बढ़ाया था। बाद म स र के दशक क शु आत म सीपीआई-कां ेस गठजोड़ क सरकार म क युिन ट मु यमं ी सी. अ युतमेनन ने भी इन सुधार को काफ ो सािहत कया। इस सरकार ने गैरमौजूद जम दार क काफ जमीन बटाईदार और मजदूर म बांटने का काम कया था, साथ ही भूिमहीन मजदूर के जीवन तर को सुधारने और मजदूरी म बढ़ोतरी के िलए कृ िष िमक कानून पास कया गया। हालां क ांितकारी िवचार के बुि जीिवय ने िजन सुधार क मांग क थी, उतना नह हो पाया ले कन फर भी उस जमाने म दूसरे रा य क तुलना म ये कदम काफ थे। इन कदम से के रल पूण समतावादी तो नह , ले कन यूनतम िवषमता वाला रा य ज र बन गया।19 IV माच, 1973 म सरकार ने सु ीम कोट म एक नए मु य यायाधीश क िनयुि क । पहले ऐसा होता था क जब भी कोई मु य यायाधीश सेवािनवृत होता था, तो उसक जगह व र तम यायाधीश क िनयुि क जाती थी। ले कन इस बार यायमू त ए.एन. रे को मु य यायाधीश बना दया गया जब क व र ता म म तीन यायाधीश उनसे ऊपर थे। जािहर सी बात थी सरकार का ये फै सला राजनीित से े रत था और सरकार यायपािलका को िनयंि त करना चाहती थी। इससे पहले कानून मं ी एच.आर. गोखले ने यायालय क अवमानना क हद तक जाते ए एक बयान दया था। उ ह ने कहा था क अदालत पुरातन कालीन और मृत ायः हो चुके पुराने लैक टोन के िस ांत का हवाला देकर बता रही है क संपि का अिधकार ाकृ ितक अिधकार है। उ ह ने चेतावनी भरे लहजे म कहा क अदालत का यह रवैया सरकार क उस ितब ता क राह म एक बड़ी बाधा है, िजसके तहत सरकार देश के पूरे सामािजक-आ थक ताने-बाने का पुनगठन करना चाहती है।20 हाल के वष म सु ीम कोट ने संिवधान क मूल भावना से छेड़छाड़ करने क सरकार क कोिशश क कड़ी आलोचना क थी। बक के रा ीयकरण और ि वी पस क समाि जैसे मामल म अदालत के फै सले सरकार के अनुकूल नह थे। सरकार को अपनी बात मनवाने के िलए संिवधान संशोधन का सहारा लेना पड़ा था। इसी बीच बंबई म ए एक जनसमारोह म यायमू त के .एस. हेगड़े ने इस बात पर चंता क क राजनीितक िववशता और नेता के िनजी वाथ ने शासिनक मशीनरी के काय को िवकृ त कर दया है। उनक राय म क सरकार ने असंिवधािनक तरीके से रा य के अिधकार े का हनन कया है। यायमू त हेगड़े ने कहा क बढ़ता आ ाचार, 21 अ यिधक पद लोलुपता, धन और संर ण क लालसा ब त चंता क बात है। 1973 के शु आती स ाह म सु ीम कोट ने एक यािचका पर िवचार कया, िजसम उस कानून को चुनौती दी गई िजसके तहत संसद को संिवधान संशोधन करने के िलए यादा शि दी जाने वाली थी। इस यािचका पर िवचार करने के िलए संिवधान क पूण पीठ बैठी। छह जज ने संसद क शि को बढ़ाने के िवरोध म फै सला दया जब क सात जज ने इसके समथन म फै सला दया। सरकार के प म मतदान करने वाले जज म एक ए.एन. रे भी थे जब क सरकार के िवप म वोट करने वाल म एक यायमू त हेगड़े थे। रे क पदो ित को इस मामले से जोड़कर देखा गया। साथ ही पी.एन. ह सर के उस बयान से भी उ ह जोड़ा गया, िजसम ह सर ने कहा था क ‘ यायाधीश और नौकरशाह को सरकार क नीितय और दशन के ित ितब ’ होना चािहए। ए.एन. रे क िनयुि के आलोचक म से एक व र सव दयी नेता जय काश नारायण भी थे। उ ह ने धानमं ी को प िलखा क या िनयम से बाहर जाकर पदो ितयां इसिलए क जा रही ह क सु ीम कोट को सरकार के अधीन कर दया जाए। धानमं ी ने जवाब दया क इस तरह के ह के िन कष िनकाले जाने क कोई ज रत नह है, य क व र ता के िस ांत को मशीनी तरीके से अनुसरण करने से कई असुिवधाएं होती ह। ऐसा करने से ब त ज दी-ज दी मु य यायाधीश सेवािनवृत हो जाते ह।22 सरकार के इस फै सले के दूसरे सबसे बड़े आलोचक थे संिवधान िवशेष ए.जी. नूरानी। उ ह ने अपने एक िवचारो ेजक लेख म सरकार के इस फै सले को यायपािलका के राजनीितकरण का यास बताया। नूरानी क राय म ब त सारे यायाधीश अपने अिधकार े से बाहर जाकर राय करने लगे थे और ए.एन. रे समेत दूसरे कई ‘ गितशील’ यायाधीश क पदो ित यायपािलका को राजनीितक भाव म लाने क साफ कोिशश थी। नूरानी ने इस बात पर चंता जािहर क क ेस और यायजगत से जुड़े लोग एक वतं यायपािलका के प म सजग नह दख रहे ह। उ ह ने चेतावनी दी क अगर इन चुनौितय से नह िनपटा गया तो लोग क ि गत आजादी खतरे म पड़ सकती है।23 हक कत तो यह थी क नए मु य यायाधीश क िनयुि से पहले ही ब त सारे अहम सरकारी पद पर नौकरशाह को िबठा दया गया था। ये ऐसे नौकरशाह थे, जो ीमती गांधी और उनके सलाहकार क समाजवादी नीितय से इ ेफाक रखते थे।24 1973 तक यह िवचारधारा ब त सारे नए े म भी घुसपैठ कर गई। ापा रक गितिविधय म एकािधकार को रोकने के िलए एक आयोग (मोनोपोली एंड रे ि ि टव ेड ैि टसेज कमीशन) बना दया गया, िजसका मकसद बड़े ापा रक समूह क तर पर रोक लगाना और लघु उ िमय को बढ़ावा देना था। सरकारी उप म का िव तार और िनजी उ ोग का रा ीयकरण बद तूर जारी था। कोयला और तेल जैसे अहम संसाधन अब सरकार के सीधे िनयं ण म थे। इसके बावजूद 1973 के अंतरा ीय तेल संकट ने भारत को बुरी तरह भािवत कया। धानमं ी ने एक ब चा रत काय म के तहत अपने आवास से संसद तक घोड़े क ब गी म सफर कया। स ा म अपनी तीसरी पारी के उ राध म धानमं ी काफ आ मिव ास से भर गई थ । उ ह ने शेख अ दु ला से बातचीत शु क । सन् 71 क लड़ाई म भारत क बड़ी जीत से क मीर क ि थित बदल गई थी। ऐसी खबर थ क इस ‘घटना के बाद से अलगाववा दय ’ म िनराशा का भाव छा गया था। यहां तक क घाटी के क रपंथी भी अब भारतीय संिवधान के अंदर ही कु छ समाधान क बात करने लगे थे।25 अपने ताजा बयान म शेख ने इस बात का कोई खुलासा नह कया क ‘आ मिनणय के अिधकार’ से उनका मतलब या था। या इसका मतलब वाय ता था या आजादी? 1971 से वह द ली म ही रह रहे थे और एक रा ीय नेता के तौर पर इं दरा गांधी के उदय को उ ह ने नजदीक से देखा था। पा क तान से लड़ाई म भारत क जीत के बाद शेख अब कसी म म नह थे। उ ह ये अ छी तरह महसूस हो गया क अब क मीर क आजादी का ही नह उठता। जून, 1972 म शेख अ दु ला, धानमं ी से िमले। दोन के बीच या बातचीत ई, इसे गु रखा गया ले कन कु छ ही दन बाद शेख को घाटी जाने क इजाजत िमल गई। पहले क ही तरह उनका घाटी म भारी वागत आ। ले कन भीड़ म कु छ असंतु भी थे, िजनके हाथ म इ तेहार क ति तयां थ । इन ति तय पर िलखा था - क मीर पर कोई सौदेबाजी नह , हम जनमत सं ह चाहते ह।26 इससे पहले 1964 म पंिडत नेह ने शेख अ दु ला को अयूब खान से िमलने भेजा था। इस तरह पंिडत नेह ने लगभग साफतौर पर वीकार कर िलया था क क मीर िववाद म पा क तान भी एक प है। ले कन अब पा क तान के दो टु कड़ म बंट जाने के बाद ीमती गांधी ने कहा क पुरानी ि थित ख म हो गई है। घाटी म अपनी वापसी के बाद शेख ने अपने लोग से कहा क उ ह इ लामाबाद क तरफ मदद के िलए न देखकर, नई द ली के साथ एक स मानजनक समझौता कर लेना चािहए। िसतंबर म अपने 67व ज म दन पर आयोिजत एक समारोह म बोलते ए शेख ने यहां तक कहा क म हंद ु तानी ं और हंद ु तान मेरी मातृभूिम है।27 शेख अ दु ला क चाहत अब मु यमं ी बनने क थी। उ ह अपने रा य के िलए एक ापक वाय ता भी हािसल करनी थी। वह चाहते थे क क सरकार क मीर म म याविध चुनाव क घोषणा करे , िजसम उ ह अपनी पाट नेशनल काॅ स के जीतने क पूरी उ मीद थी। हालां क इसका रा य के कां ेसी नेता ने भारी िवरोध कया य क वे अपना पद इतनी आसानी से नह छोड़ना चाहते थे। 1972 और 73 के दौरान शेख के ितिनिध िमजा अफजल बेग और जी. पाथसारथी के बीच कई दौर क बातचीत ई। जी. पाथसारथी, धानमं ी क तरफ से बात कर रहे थे। बातचीत इस िवषय पर ई क रा य म कां ेसी नेता क मह वाकां ा और क मीरी भावना को आहत कए िबना शेख अ दु ला को कै से क मीर म फर म थािपत कया जाए।28 उधर िहमालय के दूसरे छोर पर बसे नागालड से भी शांित के संकेत िमल रहे थे। नगा समुदाय के यादा से यादा लोग भारत के साथ समझौता करने को तैयार थे। 1963 म रा य के गठन के बाद से नागालड क स ा भारत समथक गुट संभाल रहा था। उसे भारतीय संिवधान से कोई आपि नह थी। िव ोही जंगल म छु पे ए थे और कभी-कभार सेना क टु कि़डय और मु यधारा के नेता पर हमले कर देते थे। ले कन अब धीरे -धीरे ि थित सामा य होती जा रही थी। उदाहरण के िलए ाहम िबली नाम का ईसाई धमगु कोिहमा आया, तो उसे सुनने के िलए 25,000 लोग प च ं गए। ये लोग नागालड के िविभ भाग से बस म आए थे। ाहम ने कई दन तक अपना वचन दया। उसने लोग को तीन मु य उपदेश दए। उसने नागालड क पहाि़डय क खूबसूरती क तारीफ क , थानीय चच क बदहाली पर चंता जताई और नगा से कहा क सभी चीज को ई र के भरोसे छोड़ द। एक साल के बाद हंद ु तान के अ णी फु टबाॅल लब मोहन बागान ने कोिहमा जाकर फु टबाॅल मैच क एक शृंखला खेली। पहले मैच म तािलय क गड़गड़ाहट और जोश से भरी 15,000 क भीड़ के सामने कोिहमा-11 क टीम ने अपने मेहमान को 1-0 से हरा दया। हालां क अगले दन मोहन बागान ने मेजबान टीम को 5-0 से हराकर हंद ु तान क इ त ज र बचाई। 1 दसंबर, 1973 को इं दरा गांधी ने कोिहमा का दौरा कया। उनका यह दौरा रा य के गठन क 10व बरसी के उपल य म कया गया था। लगभग 15,000 लोग क भीड़ को संबोिधत करते ए उ ह ने भूिमगत िव ोिहय को बाहर िनकालकर नए नागालड के िनमाण के िलए आमंि त कया। इससे पहले कई सौ िव ोही पहले ही सरकार के सामने आ मसमपण कर चुके थे। 1974 म ए रा य िवधानसभा चुनाव से पहले भी ब त ने हिथयार याग दया था। धीरे -धीरे नगा समुदाय, भारतीय लोकतं का अनुभव ा कर रहा था। जब चुनाव का व आया तो नागालड के गांव और क बे अपने उ मीदवार के प म लगाए जा रहे नार से गूंज उठे । एक लेट चावल, मांस, शराब क एक याली और कु छेक पय के िलए मतदाता से उनके मत मांगे गए। लोग को तरह-तरह के वादे सुनने को िमले। खासकर, मंि य ने जमीन पर चांद और िसतारे तक तोड़कर लाने के वादे कर दए। हालां क, िपछले दस साल से िवकास का कह कोई काम नह आ था फर भी कह पर लब, कह पर अ पताल, कह कू ल का भवन तो कह पर सड़क बनवाने के वादे कए गए।29 चुनाव के बाद नागालड म एक गठबंधन सरकार स ा म आ गई। इस गठबंधन म कई पूव िव ोही भी शािमल थे। उ ह ने कहा क वे बातचीत के आधार पर एक समझौता करना चाहते ह, िजसका आधार ‘बंदक ू नह बि क यक न’ होगा। द ली के एक अखबार ने उ मीद जािहर करते ए िलखा क आिखरकार नगा को मना िलया गया। अखबार ने िलखा क अगर भारत सरकार िश ा, रोजगार और आ थक िवकास के िलए सूबे को यादा रािश आवं टत करती है तो धीरे -धीरे क रपंथी िव ोही भी टू ट जाएंगे और वहां शांित थािपत हो जाएगी, जो इस सीमावत रा य के िलए बेहद ज री है।30 V आजाद हंद ु तान को सैकड़ तरह के संघष का सामना करना पड़ा। ये संघष जमीन, भाषा, े और धम से संबंिधत थे। इन संघष म शायद नागालड और क मीर क सम या सबसे गंभीर थी। आजादी के बाद से ही दोन जगह पर क र माई नेता का उदय आ था, िज ह अपना एक वतं मु क चािहए था। उनको अपनी जनता का भारी समथन हािसल था। अगर नागालड और क मीर को ये िवक प दया जाता क वे अपना अलग मु क चुन ल तो िन य ही उनम से यादातर लोग भारत म रहने क बजाय उस िवक प को चुन लेते। हालां क 1973-74 के आसपास शेख अ दु ला फर से मु यधारा म लौटने क कोिशश कर रहे थे। नगा िव ोिहय क तरफ से भी ऐसे ही संकेत थे। उनम से ब त सारे लोग ने हंसा का रा ता छोड़ दया था और चुनाव म िह सा भी िलया। कभी उ वाद से त रहे अशांत इलाके शांित क तरफ बढ़ रहे थे। ले कन दूसरी तरफ देश के क ीय िह स म उथल-पुथल शु हो रही थी। ये ऐसे इलाके थे जो ऐितहािसक, राजनैितक, पारं प रक और भाषायी दृि कोण से लंबे समय से भारतीय गणरा य के अिभ िह से समझे जाते थे। इस उथल-पुथल क शु आत गांधीजी क ज म थली गुजरात से ई। यहां कां ेस का शासन था, जो ाचार म आकं ठ डू बा आ था। आम जनता म रा य के मु यमं ी िचमनभाई पटेल ‘िचमन चोर’ के नाम से मश र हो गए थे। जनवरी, 1974 म रा य सरकार क बखा तगी क मांग को लेकर गुजरात म एक बड़ा छा आंदोलन आ। नविनमाण के नाम से जाना जाने वाला यह आंदोलन हंसक हो गया। बस और सरकारी कायालय म आग लगाई जाने लगी। ‘िचमन चोर’ को इ तीफा देना पड़ा और सूबा रा पित शासन के अधीन आ गया।31 गुजरात क घटना से िबहार के छा को अपने रा य म कु शासन के िखलाफ आंदोलन चलाने क ेरणा िमली। िबहार ने राजनीितक अि थरता और उठापटक का लंबा दौर देखा था। कई सरकार आ और कई ग । 1972 म एक कां ेसी मंि मंडल का गठन आ ले कन यह सरकार ाचार म आकं ठ डू ब गई। लोग म गहरा असंतोष था, कु छ मु ी भर लोग के हाथ रा य क अिधकांश जमीन क त थी और शहर म लोग महंगाई से ा त थे। सीपीआई (भारतीय क युिन ट पाट ) क अगुआई म वामपंथी धड़ ने एक महंगाई िवरोधी मोचा बनाया। हालां क इस सामा य उ े य के िलए बनाए गए मोच का नाम बड़ा ही ज टल था - िबहार रा य महंगाई अभाव पेशा कर िवरोध मजदूर व कमचारी संघष सिमित। 1973 के आखरी स ाह म मोचा ने कई जन दशन कए। मोचा ने नारा दया - पूरा पानी, पूरा काम... नह तो होगा च ा जाम। ऐसा उसने करके भी दखाया। वामपंिथय के िवरोध दशन से दूसरे दल म भी िवरोध करने क होड़ मच गई। जनसंघ का छा संगठन अिखल भारतीय िव ाथ प रषद( एबीवीपी) भी इसम कू द पड़ा। एबीवीपी और दूसरे गैर-क युिन ट छा संगठन ने ‘छा संघष सिमित’ नाम का एक मोचा बनाया। इस मोच का तेजी से फै लाव आ और रा य के अिधकांश शहर म इसक शाखाएं थािपत क ग । िश ण सं थान म रोज धरने- दशन होने लगे और क ाएं थिगत क जाने लग । 18 माच, 1974 को छा संघष सिमित ने िबहार िवधानसभा क तरफ अिभयान कया। पुिलस ने आंदोलनकारी छा को रोकने क कोिशश क । छा के जूम ने सरकारी कायालय , भारतीय खा िनगम के एक गोदाम और दो अखबार के द तर को आग के हवाले कर दया। शहर के कई िह स म पुिलस और दशनकारी छा के बीच झड़प । इन झड़प म कई छा घायल ए और कम से कम तीन छा क जान चली गई। य ही ये खबर फै ली, आंदोलन पूरे सूबे म फै ल गया। पूरे रा य म छा , सड़क पर उतर आए।32 18 माच क घटना के बाद छा ने जय काश नारायण से आंदोलन क अगुआई करने क अपील क । जेपी इकह र साल के हो चुके थे। उनके नेतृ व म देश ने कई शांिति य और उ वादी आंदोलन को होते ए देखा था। वह सैकड़ आंदोलन और उ े यपरक गितिविधय से जुड़े ए थे। हाल के वष म वह नागालड और क मीर सम या के समाधान के िलए स य रहे थे। उ ह ने न सिलय को मु यधारा म लाने का यास कया था और चंबल के डाकू को हिथयार डालने पर राजी कया था। ऐसे म छा क इस अपील को वह अ वीकार नह कर पाए। एक जमाने म वह खुद भी छा नेता रहे थे। ले कन वो अमे रक रा य िवसक िसन क बात थी। इस बार मामला अपने गृहरा य िबहार का था। जवाहरलाल नेह के जीवनकाल म जय काश नारायण क उनसे कई बार बातचीत ई। पंिडत नेह चाहते थे क जेपी उनके मंि मंडल म शािमल ह , ले कन जेपी ने स ा से बाहर रहना ही पसंद कया। सरकार से बाहर रहकर उ ह ने नेह क नीितय क तीखी आलोचना भी क । ले कन वह नेह क ब त इ त भी करते थे। पंिडत नेह क मृ यु ने जेपी को तोड़कर रख दया था। नेह जी से अपनी दो ती क वजह से वह इं दरा गांधी को भी अ छी तरह से जानते थे। हक कत तो यह थी क जब इं दरा गांधी धानमं ी बन , तो जेपी उ ह सबसे पहले बधाई देने वाल म से एक थे। हालां क बाद के दन म वह ीमती गांधी को कई मु पर िबन मांगी सलाह भी देते रहे। जेपी ने बंगलादेश यु के व इं दरा गांधी क तारीफ क थी, ले कन रा पित चुनाव के िववाद और सु ीम कोट म जज क बहाली के मु े पर उ ह ने उनक कटु आलोचना भी क ।33 जब छा संघष सिमित ने जेपी से आंदोलन क अगुआई करने का आ ह कया, तो उ ह ने दो शत के साथ इसे वीकार कर िलया। पहली शत यह थी क यह आंदोलन पूणतया अ हंसक रहेगा और दूसरी यह क इसका फै लाव िसफ िबहार तक सीिमत नह रहेगा। पटना म ई झड़प के तुरंत बाद 19 माच को उ ह ने बयान दया क वह देश म ा कु शासन, ाचार और दूसरे मु के ित मूकदशक बनकर नह बैठ सकते, चाहे मामला पटना, द ली या कह का भी य न हो। उ ह ने कहा क इसी दन को देखने के िलए उ ह ने आजादी क लड़ाई नह लड़ी थी। उ ह ने ाचार, कु शासन, कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, जमाखोरी और मौजूदा िश ा व था के िखलाफ आरपार क लड़ाई का आ नान कया। उ ह ने सही अथ म लोकशाही लाने के िलए जंग लड़ने का ऐलान कया।34 जेपी एक बड़ी नैितक स ा के मािलक थे और आजादी क लड़ाई म बड़े नेता म से एक थे। जनता म उनक ब त इ त थी। अपने दूसरे सािथय क तरह स ा का आकषण उ ह छू तक नह पाया था। छा आंदोलन क कमान उनके हाथ म आ जाने से आंदोलन म उफान आ गया। अब ‘िबहार आंदोलन’ को ‘जेपी आंदोलन’ कहा जाने लगा। उ ह ने छा से एक साल तक पढ़ाई छोड़ देने क अपील क और कहा क वे आम जनता क सोई ई चेतना को जगाने का काम कर। पूरे िबहार म छा ने कू ल और काॅलेज बंद करवाने शु कर दए। अिधका रय ने पुिलस का सहारा िलया। आंदोलनकारी छा और पुिलस के बीच झड़प आम बात हो गई। खासकर, शहर म इस आंदोलन को भारी समथन िमला। उदाहरण के िलए, गया म सरकारी द तर और अदालत म ताले लग गए, य क छोटे-छोटे ब के साथ स मािनत प रवार क मिहलाएं भी ‘धरने’ पर उतर आ । ये ऐसी मिहलाएं थ , जो पद क वजह से शायद ही कभी अपने घर से बाहर िनकलती थ । सरकारी अिधका रय ने सड़क और गिलय से आंदोलनका रय को हटाने क कोिशश क , िजसके जवाब म छा ने ला ठय और बोतल से हमला कया। पुिलस गोलीबारी म तीन आंदोलनकारी छा मारे गए और बीस गंभीर प से ज मी ए।35 गया क घटना अ ैल, 1974 के म य म ई थी। आंदोलनका रय ने गुजरात क तरह िबहार िवधानसभा भंग कर रा य म रा पित शासन लगाने क मांग क । 5 जून को जेपी क अगुआई म पटना क सड़क पर भारी जुलूस िनकाला गया। यह जुलूस गांधी मैदान जाकर एक जनसभा म त दील हो गया, जहां जेपी ने आजादी क लड़ाई के अधूरे सपन को पूरा करने के िलए ‘संपूण ांित’ का नारा दया। जेपी ने कहा क मु क 27 साल से आजाद है, फर भी हर जगह भूख, महंगाई और ाचार का आलम ा है। उ ह ने कहा क आमलोग को नाइं साफ के पिहय तले कु चला जा रहा है। आंदोलनकारी छा क अपार भीड़ को संबोिधत करते ए उ ह ने चेतावनी दी क आंदोलन क राह काफ पथरीली है। उ ह ने कहा क ‘आंदोलन म आपको कु बािनयां देनी ह गी, तकलीफ झेलनी ह गी, लाठी और गोली खानी होगी और जेल को भी भरना पड़ेगा। लोग क संपि तक कु क कर ली जाएगी।’ बावजूद इसके उ ह ने पूरा भरोसा जािहर कया क आिखरकार संघष अपना रं ग दखाएगा। उ ह ने कहा क ‘गांधीजी ने एक साल के भीतर वराज हािसल करने क बात क थी, म आज एक साल के भीतर वा तिवक लोकशाही लाने क बात कर रहा ।ं एक साल के भीतर सही िश ा व था का उदय होगा। एक नया मु क और एक नया िबहार बनाने के िलए अपने जीवन का एक साल आंदोलन के नाम कु बान कर दीिजए।’36 यही वह जनसभा थी, िजसम पहली बार जेपी ने ‘संपूण ांित’ क बात क थी। यह श द, इसका संघष और इस संघष के वाहक चीनी सां कृ ितक ांित क याद दला रहे थे। एक दशक पहले चीनी क युिन ट पाट के चेयरमैन ारा ऐसी ही एक ांित का आ नान कया गया था। अपने जीवन के अंितम ण म माओ ने युवा से (चीन के संदभ म चीनी रे ड गाड) आ नान कया था क वे समाज म जड़ जमा चुके ाचार, संशोधनवादी त व और पूंजीवादी अवरोध को उखाड़ फक। य क ये त व एक आदश समाज के िनमाण म बाधा थे। राॅबट जे. िल टन के मुतािबक चीन क सां कृ ितक ांित माओ क उस कुं ठा का नतीजा थी, जो उ मीद और जमीनी हक कत क बढ़ती ई खाई क वजह से पैदा ई थी। िल टन का ये भी कहना था क माओ धैयहीन हो गए थे। वे मरने से पहले अपने देश को प रव तत देखना चाहते थे। इस तक म काफ दम नजर आता है, इसिलए नह क इससे सन् 74 म िबहार और हंद ु तान के अ य भाग म ई घटना को समझने म आसानी होती है। इसक वजह ये है क 74 क घटना एक ऐसे नेता क आंदोलनकारी और आ ामक राजनीित क तरफ फर से मुड़ने क घटना है, िजसने िपछले काफ साल से राजनीित से कनारा कर रखा था। पूरे पचास और साठ के दशक म जेपी एक सामािजक कायकता, एक वाताकार और एक सम वयक क भूिमका म रहे थे। ले कन स र के दशक म िब कु ल माओ क तरह वह छा से मुखाितब हो गए, िजसे वह युवाशि कहते थे। अब उ ह संपूण ांित लानी थी। यह एक ऐसा सपना था िजसे वह अपनी जवानी के दन म देखा करते थे।37 इधर गया म पुिलस फाय रं ग ई और पटना म जेपी का भाषण आ, इधर पूरा देश रे ल हड़ताल क वजह से अ त- त हो गया। इस रे ल हड़ताल के सू धार उ समाजवादी नेता जाॅज फनाडीस थे। यह हड़ताल तीन स ाह तक चली और इसम करीब दस लाख रे ल कमचा रय ने िह सा िलया। पूरे देश म लोग क आवाजाही और माल क ढु लाई ठ प हो गई। देश के अहम औ ोिगक इलाक को जोड़ने वाला पि म रे लवे इस हड़ताल से सबसे यादा भािवत आ। कई शहर म हंसक दशन ए और कई जगह पर शांित-बहाली के िलए सेना बुलानी पड़ी।38 इधर देश म हड़ताल और धरने- दशन जारी थे, उधर भारत ने एक परमाणु परी ण कया। कई साल से देश के वै ािनक सरकार पर दबाव डाल रहे थे क भारत को परमाणु परी ण करना चािहए। जब आिखरकार धानमं ी मई, 1974 म इसके िलए राजी , तो इसक एक वजह यह भी थी क वह देश का यान रे लवे हड़ताल और िबहार म चल रहे छा आंदोलन से हटाना चाहती थ । परमाणु परी ण से लोग खुशी से झूम उठे । देश का एक बड़ा तबका रा गौरव क भावना म नहा उठा। करोड़ लोग के मन म देशभि का एक वार सा उठा। एक संवाददाता ने िलखा क य ही यह खबर द ली प च ं ी राजधानी क फजा उ ेजना और जोश से भर उठी। संसद के क ीय क म ब त सारे सांसद जमा ए और एक दूसरे को बधाइयां देने लगे। ऐसा लग रहा था मानो रे लवे हड़ताल और देश क असं य आ थक सम याएं कु छ व के िलए िनगाह से ओझल हो ग ।39 हालां क दूसरे कई लोग परमाणु परी ण से ब त खुश नह थे। इसक वजह ये बताई गई क महज सं ांत परमाणु लब का सद य बन जाने भर से देश क दूसरी सम याएं ख म नह होने वाली थ । ित ि आय के िलहाज से देश अभी भी दुिनया म 102व थान पर था। इसक आलोचना पा क तान म भी ई। इसे दोन देश के बीच संबंध के सामा यीकरण क दशा म बाधा माना गया।40 परमाणु परी ण के बाद ीमती गांधी और जय काश नारायण के बीच प चार के कई दौर चले। शु आती प काफ सहज और समा य थे, जो बाद म धीरे -धीरे कटु होते गए। 22 मई को धानमं ी ने जय काश नारायण को प िलखकर उनके वा य के बारे म चंता जािहर क । ीमती गांधी ने उ मीद क क ‘दोन प रवार के बीच लंबी िम ता को देखते ए आपसी राजनीितक असहमितय को ि गत कटु ता और एक दूसरे के उ े य पर शक कए िबना भी ’ कया जा सकता है। जेपी ने जवाब दया क अपने भुवने र म दए हाल के भाषण म धानमं ी ने उन पर गलत आरोप लगाया है, िजसम ये कहा गया क वे अमीर से िघरे रहते ह और बड़े कारोबा रय क शानदार अितिथशाला म व िबताते ह। जेपी ने कहा इन आरोप से उ ह तकलीफ प च ं ी है और उ ह गु सा भी आया है। जेपी ने आगे िलखा क धानमं ी के हािलया बयान से ऐसा लगता है क वह उ ह पूरी तरह समझने म नाकाम रही ह। उ ह ने िलखा क धानमं ी अपने िखलाफ हो रहे जमीनी आंदोलन और आने वाले तूफान को भी नह देख पा रही ह, िजसके नतीजे खतरनाक हो सकते ह। धानमं ी ने इस प का तुरंत जवाब दया। उ ह ने कहा क भुवने र के भाषण म सव दयी नेता पर ाचार का िज करते ए उ ह ने जाती तौर पर जेपी का नाम नह िलया था। उ ह ने कहा क, ‘मने आपके बारे म कोई अपमानजनक बात नह क । अगर कसी अखबार ने अपनी तरफ से उसम आपका नाम जोड़ दया तो म कु छ नह कर सकती’(हालां क यह भी अमया दत था, य क उन हालात म अखबार ने सव दयी नेता क जो भी ा या क थी वो िब कु ल साफ थी)। ीमती गांधी ने िलखा क भले ही वे ईमानदार ह ले कन उनके सहयोगी ईमानदार नह ह। उ ह ने आगे िलखा, ‘इसिलए आपके कु छ िवचार मुझे िब कु ल यूटोिपया जैसे लगते ह य क वह तभी पूरे हो सकते ह जब देश के सारे लोग आप ही जैसे हो जाएं।’ ीमती गांधी ने सवाल कया क िसफ जेपी देश क नौितक चेतना कै से हो सकते ह? उ ह ने िलखा, ‘बड़ी न ता से म आपसे कहना चाहती ं क आपके समथक के अलावा कई दूसरे लोग भी ह िज ह जनता क भलाई, सावजिनक जीवन क शुिचता और ाचार क काफ चंता ह।’ आिखरकार दोन के बीच शु आ प चार छह स ाह के बाद जेपी ारा बंद कर दया गया। जेपी ने कहा क उ ह उ मीद थी क धानमं ी म इतना साहस होगा क वह उन पर लगाए गए ि गत आरोप पर ज र अपना ख साफ करगी। ले कन ऐसा नह आ और जेपी को इससे ठे स प च ं ी। उ ह ने कहा क, ‘म इस देश का सामा य नाग रक ।ं ले कन मेरा भी अपना एक आ मस मान है। ऐसा लग रहा है क इन प चार से गलतफहिमयां घटने क बजाय बढ़ती ही जा रही ह।’41 अब व आ गया था क आंदोलन म लौट आया जाए। अग त म जेपी ने िबहार का दौरा कया, जहां लोग ने उनका भारी समथन कया। प कार अजीत भ ाचाय ने अपनी डायरी म िलखा क ‘जेपी का का फला बढ़ रहा है। सड़क के दोन कनारे लोग क भारी भीड़ है। हरे क सौ गज पर उ ह कना पड़ता है। गाि़डयां भीड़ से होते ए मंच क तरफ बढ़ रही ह। जेपी को लोग सहारा देकर सीढ़ी पर चढ़ाते ह। वे हर एक कदम के बाद क जाते ह।’ अपने दौरे के बाद जेपी ने सीपीआई को छोड़कर सभी िवप ी पा टय का एक स मेलन बुलाया। उ ह अब जनता के इस उ साह को एक रा ापी जनांदोलन म बदलना था। जेपी ने िलखा क िबहार का संघष एक रा ापी अहिमयत हािसल कर चुका है और देश का भा य इसक सफलता और असफलता के साथ जुड़ गया है। उ ह ने मजदूर संगठन , कसान संगठन और अ य दूसरे पेशेवर संगठन से एक मंच पर आने क अपील क ।42 जय काश नारायण ारा शु कए गए आंदोलन म कम से कम एक िवप ी पाट पहले से मौजूद थी। वह पाट थी जनसंघ। जनसंघ क छा शाखा एबीवीपी (अिखल भारतीय िव ाथ प रषद) पहले से ही आंदोलन म स य थी और इसके व र कै डर अब आंदोलन क मु य भूिमका म आने लगे थे। जेपी के एक गांधीवादी सहयोगी ने उ ह चेतावनी देते ए िलखा भी था क कम से कम थानीय तर पर ही सही, आंदोलन का नेतृ व जनसंघ के हाथ म िखसकता जा रहा है। उस प म ये भी चंता जािहर क गई क ‘आम आदमी को हमारे आंदोलन के तरीक और इसके मू य के बारे म अभी भी पता नह है, उसे लगता है क आंदोलन का उ े य सकारा मक कम और नकारा मक यादा है।’43 जािहर है, जेपी आंदोलन क कई बुि जीिवय ने आलोचना भी क । खासकर, आंदोलन म शािमल त व पर कई लोग को गहरी आपि थी। पूव आईसीएस अिधकारी और समाजसेवी आर.के . पा टल ने इस आंदोलन क ा या करते ए इसके ित अपनी असहजता दखाई। पा टल, ामीण महारा म स य थे और अपने काय क बदौलत लोग म काफ स मािनत थे। जेपी के िनमं ण पर उ ह ने दो स ाह का िबहार दौरा कया था और समाज के िविभ वग के लोग से बातचीत क थी। 4 अ टू बर, 1974 को जेपी को िलखे अपने लंबे प म उ ह ने कहा क ‘इसम कोई शक नह क आंदोलन ने लोग के मन म भारी उ साह पैदा कया है और आपक जनसभा म भारी भीड़ उमड़ी है। लोग शांितपूवक आपको सुनते ह, ले कन जब वे अपने पर उतर आते ह तो अनुशासनहीन हो जाते ह जैसा क िवधानसभा पर हमले के व और रा यपाल को जबद ती उनके सालाना भाषण से रोकते व देखने को िमला था।’ पा टल ने आ य कया क या िबहार म िजस तरीके का आंदोलन कया जा रहा है, वो वाकई गांधीवादी िस ांत पर आधा रत है? उ ह ने सवाल कया क हमारे जैसे देश म जहां औपचा रक प से लोकतांि क व था कायम है, स या ह का या भिव य है? उ ह ने कहा क जनता ारा चुनी गई िबहार िवधानसभा को भंग करने क मांग ‘असंिवधािनक और अलोकतांि क’ है। पा टल ने कहा क ये सच है क चुनाव या म सुधार होना चािहए, इसम यादा पारद शता होनी चािहए और इसे धनबल के भाव से मु होना चािहए ले कन एक बार अगर चुनाव हो जाता है, तो जनता के फै सले का स मान होना चािहए। उनके मुतािबक रा -रा य क प रक पना म जनता क भावना को चुनाव ारा करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नह है। प के अंत म पा टल ने िलखा क इं दरा गांधी सरकार क खािमय से पूरी तरह वा कफ ह, ले कन वह इस बारे म अभी तक आ त नह है क ‘ या गिलय -मुह ल क बहस से चलने वाली सरकार संसदीय बहस ारा बने कानून के तहत चल रही सरकार से बेहतर हो पाएगी?’ पा टल ने आगे िलखा क ‘आज आप अ छाई के िलए लड़ाई लड़ रहे ह, ले कन इितहास गवाह है क भीड़ ारा चलाया जाने वाला आंदोलन राॅ सिपयर भी पैदा कर सकता है। यही वजह है क िबहार आंदोलन जैसे कसी भी आंदोलन से जुड़ने के ित म अिन छु क ।ं ’44 1 नवंबर, 1974 को ीमती गांधी और जेपी के बीच नई द ली म लंबी बैठक ई। धानमं ी िबहार िवधानसभा को भंग करने पर सहमत हो ग ले कन शत यह थी क जेपी दूसरे रा य क िवधानसभा को भंग करने क अपनी मांग छोड़ द। जेपी ने ऐसा करना वीकार नह कया। वाता असफल हो गई। हालां क दोन के बीच चली यह वाता काफ तीखी थी ले कन आिखर म जेपी ने इसे भावुक बना दया। उ ह ने ीमती गांधी को उनक मां कमला नेह ारा िलखी एक िच ी भट क , जो उ ह ने जय काश क प ी भावती को िलखी थी। भावती क हाल ही म मृ यु ई थी।45 इसके तीन दन बाद पटना म एक जनसभा से लौटते व पुिलस ने जय काश नारायण के साथ दु यवहार कया। पुिलस क लाठी से अपना बचाव करते ए जेपी जमीन पर िगर पड़े। अगले दन यह त वीर सारे अखबार म छाई रही। जेपी बुजुग हो चुके थे और वह शारी रक प से कमजोर भी थे। उ ह मधुमेह क बीमारी थी। हालां क, उ ह यादा चोट नह आई थी ले कन उनके अपमान ने जनता को आ ोिशत कर दया। िबहार सरकार क तुलना अं ेजी राज से क जाने लगी। एक अखबार ने िलखा क ‘आजाद हंद ु तान म पहली बार जेपी को पुिलिसया उ पीड़न का िशकार होना पड़ा।’46 VI िसतंबर, 1974 म भारतीय गणरा य म िस म का िवलय हो गया। िस म पहले एक अध वतं रा य था, िजसक अपनी अलग मु ा और अपना अलग झंडा था। वहां का शासन चो याल नाम के वंशानुगत शासक ारा चलाया जाता था। िस म आ थक और सैिनक दृि कोण से भारत पर िनभर था। साल 1973 म वहां के कु छ नाग रक ने िस म म एक ितिनिध सभा क मांग शु क । चो याल शासक ने भारत सरकार से िव ोह को दबाने के िलए सहायता मांगी। इसके बदले भारत ने उसे और भी भड़का दया। आिखरकार चो याल को ितिनिध सभा क मांग वीकार करनी पड़ी और चुनाव करवाने पड़े। चुनाव म भारत समथक पाट ने एक सीट छोड़कर सारी सीट जीत ल । चो याल को ग ी छोड़नी पड़ी और भारतीय संिवधान म संशोधन कर िस म को एक सह-रा य का दजा दे दया गया। िस म को भारतीय संसद म अपने ितिनिध भेजने का अिधकार भी दे दया गया।47 िस म ब त ही खूबसूरत रा य है। इसक सरहद चीन से िमलती थ । अगर दूसरा कोई व होता तो धानमं ी भारत क भौगोिलक सीमा म इस बढ़ोतरी का ज ज र मनात । ले कन उस व जय काश नारायण ने उनके िखलाफ राजनीितक लड़ाई छेड़ रखी थी। िस म के भारत म िवलय से धानमं ी को ता कािलक राहत ही िमल पाई। 1974 के आिखर तक, िबहार आंदोलन, रा ीय आंदोलन का प लेने लगा था। जेपी के समथन म पूरे देश के लोग सामने आने लगे। उनके समथन म उ ह भेजे जाने वाली िच य क बाढ़ सी आ गई। आं देश से एक वक ल ने जेपी को िलखे प म उ ह सलाम कया। उसने कहा क िजस उ म लोग अपने काम से सेवािनवृत हो जाते ह, उस उ म आप नई जमीन तलाश रहे ह और नए ितमान को थािपत कर रहे ह। प म आगे िलखा था क जेपी िजस आंदोलन क अगुआई कर रहे ह वह शंसा और स मान का पा है।48 देश के बड़े-बड़े नेता जेपी से िमलने िबहार आने लगे और उ ह ने अपने रा य म लौटकर संघष चलाने का वादा कया। नवंबर के आखरी स ाह म जेपी ने नई द ली म िवप ी पा टय क एक बैठक बुलाई और कहा क िबहार आंदोलन का सबक यही है क व था म आमूलचूल प रवतन कया जाए। उ ह ने कहा क क ीय और रा य सरकार क नीितय के साथ-साथ सां थािनक और नैितकता के धरातल पर ापक प रवतन क ज रत है।49 कई लोग जेपी आंदोलन को के रल क पहली क युिन ट सरकार के िखलाफ ए आंदोलन(1958-9) क रा ीय पुनरावृित से जोड़कर देखते ह। दोन ही आंदोलन म गजब क समानताएं ह। दोन ही मामल म एक तरफ जनता ारा वैध तरीके से चुनी गई सरकार थ , िजस पर संिवधान को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया गया था। दूसरी तरफ इनके िवरोध म एक जनांदोलन उठ खड़ा आ था, िजसम िवप ी पा टय समेत कई गैर-राजनीितक और अधराजनीितक सं थाएं शािमल थ । म थ प न◌ाभन क तरह ही जय काश नारायण भी िन य ही एक बेदाग शि सयत के नेता थे, िजनका जनता एक संत क तरह स मान करती थी। उ ह लोगां◌े ने राजनीित क र ा के िलए आमंि त कया था, जो राजनेता के चंगुल म फं स गई थी। उनका वहार अपने ित िं य क तुलना म िब कु ल उलट था। 1958-9 म नंबूदरीपाद और 1974 म ीमती गांधी अपने िवरोिधय क बात को सुनने या अपनी मज से स ा छोड़ने के प म िब कु ल ही नह थ । हालां क यह एक राजनीितक लड़ाई थी, ले कन इसका एक ि गत प भी था। आजादी क लड़ाई के क ावर यो ा और पंिडत नेह के सहयोगी रह चुके जय काश नारायण इं दरा गांधी को एक नौिसिखया से यादा नह मानते थे। दूसरी तरफ आमचुनाव म जीत और पा क तान को जंग म िशक त देने के बाद ीमती गांधी, जेपी को ब त संजीदगी से नह ले रही थ । वह मान रही थ क जेपी जैसे इं सान के िलए अपना शेष जीवन अब सामािजक काय म िबताना यादा बेहतर होगा। 1974 के आिखर तक देश का जनमत पूरी तरह बंट चुका था। ब त सारे लोग ऐसे थे, जो यूं तो जनसंघ के सद य नह थे ले कन यह मानते थे क कां ेस एक पाट है और ीमती गांधी अपनी आलोचना नह सुनना चाहती ह। ब त सारे लोग ने जेपी आंदोलन को ‘आजादी क दूसरी लड़ाई’ बताया और कहा क इस लड़ाई के बाद वैसे अधूरे सपने पूरे ह गे, िजनका वाब आजादी क लड़ाई के व देखा गया था। दूसरी तरफ ऐसे लोग क तादाद भी काफ थी, जो य िप कां ेस के समथक नह थे ले कन वे जेपी क जनसंघ के साथ जुगलबंदी से सहमत नह थे। उनका मानना था क इस आंदोलन से लोकतांि क ढंग से चुनी सं था क अवहेलना हो रही है। पहले क म के लोग इं दरा गांधी क कटु आलोचना कर रहे थे जब क दूसरी तरह के लोग जेपी क आलोचना कर रहे थे, हालां क उनक आलोचना का वर धीमा था।50 जनवरी, 1975 के पहले स ाह म िबहार म लिलत नारायण िम क ह या कर दी गई। िम एक क ावर कां ेसी नेता थे और ीमती गांधी क सरकार म उ ह ने कई अहम मं लय का िज मा संभाला था। कां ेस पाट के िलए चंदा उगाहने वाले लोग म उनक अहम भूिमका थी। िवचारधारा से ऊपर उठकर उ ह ने सोिवयत संघ और भारतीय उ ोगपितय से काफ पैसा चंदे के प म इक ा कया था। यह पता नह चल पाया क उनक ह या कसने क । ऐसा शक कया गया क या तो जाती दु मनी से या फर 1974 के रे लवे हड़ताल म उनक भूिमका को लेकर कसी मजदूर संघ से जुड़े कायकता ने उनक ह या कर दी। हालां क यह रह य ही रहा। संयोग से िबहार जेपी का गृहरा य भी था। धानमं ी ने इस ह या के िलए किथत प से जय काश नारायण ारा चलाए जा रहे हंसक आंदोलन को िज मेदार ठहराया।51 हालां क िम क ह या से भी जेपी के उस इरादे पर कोई असर नह पड़ा, िजसके मुतािबक वह बसंत के मौसम म संसद भवन का घेराव करना चाहते थे। यह महीना द ली के मौसम के िहसाब से ठीक भी था, य क देशभर से आने वाले लोग को ठं ड क मार नह झेलनी पड़ती। जनवरी और फरवरी महीने म जेपी ने संसद अिभयान म समथन जुटाने के िलए देशभर का दौरा कया।52 अपने भाषण म जेपी ने लोग से शांित बरकरार रखने क अपील क , य क कोई भी अि य घटना धानमं ी को तानाशाही भरा रवैया अपनाने का मौका दे देती। कई जगह पर उ ह ने कहा क धानमं ी उ ह िगर तार करने का बहाना ढ़ूंढ़ रही ह। उ ह ने कहा क अगर ऐसा होता है तो आंदोलन और यादा फै ल जाएगा। उ ह ने इसक तुलना 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से क , जब गांधीजी को िगर तार करके अं ेज ने आंदोलन क आग म घी डाल दया था। जेपी ने अ य प से अपनी तुलना गांधीजी से क और खुले तौर पर कां ेस शासन को सा ा यवादी शासन के बराबर बताया। जािहर है ये ऐसी तुलना थी, िजसे धानमं ी ने खा रज कर दया। एक जापानी प कार को दए अपने सा ा कार म ीमती गांधी ने कहा क उ ह नह मालूम क जेपी आंदोलन का उ े य या है, ले कन उ ह इतना ज र मालूम है क ‘यह मेरी पाट और जाती तौर पर मेरे िखलाफ है। यह आंदोलन मेरे तमाम जीवनमू य के िखलाफ है।’ हक कत तो यह थी क अब ीमती गांधी क पाट के ही कु छ नेता को िवप ी आंदोलन से सहानुभूित होने लगी थी। ऐसे नेता म पूव युवातुक चं शेखर और मोहन धा रया अहम थे। चं शेखर और मोहन धा रया ने महंगाई, ाचार और बेरोजगारी पर रा ीय बहस क मांग क । उनक राय म ये ऐसे मु े थे जो 1971 म कां ेस घोषणाप के अहम िह से थे। असमंजस म कई दूसरे लोग भी थे। शेख अ दु ला भी ऐसे ही नेता म एक थे। सरकार और शेख के बीच आिखरकार जो समझौता आ था, उसके मुतािबक कां ेस िवधायक दल शेख को अपना नेता चुनते और शेख अ दु ला मु यमं ी बन जाते। चुनाव के दो दन बाद शेख अ दु ला अपने पुराने िम और समथक जय काश नारायण से िमलकर उनका आशीवाद लेने गांधी शांित ित ान प च ं गए। अगले दन अखबार ने दोन क गले िमलते त वीर को मुखता से छापा। जेपी ने कहा क वह शेख अ दु ला क क मीर वापसी का वागत करते ह। क मीर को उनक ज रत है। ले कन उनके जनसंघी िम ने शेख और सरकार के बीच ए समझौते क आलोचना क , िजसके तहत शेर-ए-क मीर को फर से ग ी िमली थी। जनसंघ के अ य लालकृ ण आडवाणी ने आरोप लगाया क ‘स ा का इ तेमाल करके शेख अ दु ला अभी भी क मीर क आजादी क चाह रखते ह।’ हालां क कई दूसर ने इसे अलग तरह से देखा। 25 फरवरी को शेख के शपथ हण को इं िडयन ए स ेस ने ‘भारतीय इितहास म युगांतकारी घटना’ क सं ा दी। अखबार ने िलखा क शेख अ दु ला क तेईस साल बाद अपने पुराने पद पर वापसी भारतीय लोकतं क प रप ता और लचीलेपन को दशाती है। य क एक स े लोकतांि क व था म ही गंभीर मतभेद को भी सामंज यपूवक देशिहत म सुलझाया जा सकता है। आिखरकार ऐसा लग रहा था क क मीर िववाद ख म हो चुका है। शेख के मु यधारा म शािमल हो जाने से जय काश नारायण खुश थे। इसी एकमा मु े पर ीमती गांधी और जेपी एकमत थे। य क ठीक उसी दन जब शेख अ दु ला ज मू म मु यमं ी पद क शपथ ले रहे थे जेपी ने ‘ कां ेसी नेता ’ को स ा से उखाड़ फकने के िलए एक ‘रा ीय आंदोलन’ का आ नान कया। जनसंघ ने जेपी का समथन कया। इससे पहले जनसंघ ने क मीर मु े पर जेपी का िवरोध कया था। भारतीय राजनीित क ये अ भुत िवडंबनाएं थ । 2 माच को यानी जेपी के संसद घेरो अिभयान से चार दन पहले ीमती गांधी ने मोहन धा रया को अपने मंि मंडल से हटा दया। उनक गलती यही थी क उ ह ने ीमती गांधी से जेपी से फर से बात करने का आ ह कया था। इसके जवाब म जेपी ने जगजीवन राम और वाई.वी. च नान जैसे व र कां ेसी नेता को अपने पद से इ तीफा दे देने क अपील क ता क वे अपनी पाट को िवनाश से बचा सक और इसके ‘पारं प रक मू य ’ क र ा कर सक। 3 माच को द ली के पुिलस महािनरी क ने आंदोलनका रय क भीड़ को िनयं ण म रखने के िलए एक बैठक बुलाई। करीब 15,000 पुिलस के जवान को इस काम के िलए तैनात कया गया। आंदोलनका रय को शहर म आने से रोकने के िलए पड़ोसी रा य से क और बस के द ली आने पर पाबंदी लगा दी गई। बस पर ितबंध के बावजूद लोग द ली म जमा होने लगे। उ ह लाल कले के बाहर कप म ठहराया गया। यह कप टट से बनाया गया था। उस जगह का नाम अब जय काश नगर हो गया है। 6 माच क सुबह को लोग सभा थल वोट लब क तरफ बढ़ने लगे, जो संसद भवन के नजदीक है। एक खुली जीप म जय काश नारायण लोग का नेतृ व कर रहे थे। रा ते के दोन तरफ लोग क भीड़ देखकर जेपी स थे। लोग उ ह फू ल-मालाएं भट कर रहे थे और उनपर फू ल क वषा कर रहे थे। लोग इं दरा गांधी के िखलाफ नारे लगा रहे थे। झंड और बैनर पर तरह-तरह के नारे िलखे ए थे मसलन, संहासन खाली करो क जनता आती है, जनता का दल बोल रहा है... इं दरा शासन डोल रहा है। जेपी के पीछे जीप का बड़ा एक का फला था, िजसम िवप ी दल के नेता थे। इससे पहले द ली ने इतना बड़ा जुलूस कभी नह देखा था। एक अनुमान के मुतािबक इसम करीब 750,000 लोग शािमल ए थे। इस जुलूस म पूरे देश के लोग शािमल थे ले कन उसम उ र देश और िबहार के लोग क तादाद खासी थी। वोट लब के मैदान म जेपी ने भावुक होकर अपना भाषण दया। उ ह ने उस दन क तुलना गांधीजी क ऐितहािसक नमक या ा से क और लोग से लंबी लड़ाई के िलए तैयार होने का आ नान कया। जनसभा के बाद उनके नेतृ व म एक िश मंडल संसद भवन गया, जहां उ ह ने लोकसभा अ य को आंदोलन का मांगप स पा। इसम िबहार िवधानसभा को भंग करने, चुनाव सुधार क या शु करने और कां ेस शासन म ए ाचार क जांच के िलए एक यूनल के गठन क मांग क गई। ीमती गांधी ने दो दन बाद जेपी को इसका जवाब दया। इ पात नगरी राउरके ला म भाषण देते ए उ ह ने कहा क आंदोलनकारी भारतीय लोकतं के ताने-बाने को बबाद करने पर आमादा ह। जेपी का नाम िलए बगैर उ ह ने कहा इस आंदोलन को िवदेशी ताकत से समथन हािसल है। 18 माच को पटना म आंदोलन क पहली वषगांठ के उपल य म जेपी के नेतृ व म एक जुलूस िनकाला गया। जुलूस म लोग नाच-गा रहे थे और एक दूसरे के ऊपर रं ग डाल रहे थे। संयोग से उस दन होली भी थी। अपने उसी भाषण म जेपी ने एक साझा िवप ी दल या मोचा बनाने का आ नान कया, जो भिव य म होने वाले तमाम चुनाव म कां ेस िखलाफ चुनाव लड़ सके । जेपी आंदोलन क जड़ मु यतः उ र भारत म मजबूत थ । हालां क पि म भारत म, खासतौर पर गुजरात म भी उनके काफ समथक थे ले कन देश का दि णी िह सा इस आंदोलन से लगभग अछू ता था। इसीिलए उ ह ने वं य से दि ण के ांत का लंबा दौरा कया। हालां क यहां लोग क उपि थित उतनी नह थी, ले कन फर भी लोग जेपी को सुनने काफ सं या म आए। लोग को याद था क जेपी ने हंदी को गैर- हंदी देश पर जबद ती थोपने का िवरोध कया था।53 VII इधर जेपी आंदोलन र तार पकड़ रहा था, उधर धानमं ी के सामने एक नई चुनौती आ खड़ी ई। यह चुनौती सड़क पर चल रहे आंदोलन क नह थी, बि क यह कानून क चुनौती थी। मामला इलाहाबाद हाईकोट का था, िजसम 1971 के चुनाव म राय बरे ली से धानमं ी के चुनाव को चुनौती दी गई थी। यह यािचका समाजवादी नेता राजनारायण ने दािखल क थी, जो ीमती गांधी से 1971 म राय बरे ली का चुनाव हार गए थे। राजनारायण ने अपनी यािचका म आरोप लगाया क चुनाव जीतने के िलए धानमं ी ने साधन का सहारा िलया और सरकारी मशीनरी का दु पयोग कया है। धानमं ी पर चुनाव म तय सीमा से यादा पैसा खच करने का आरोप भी लगाया गया। 1973 और 1974 तक मामला खंचता रहा और यायमू त जगमोहन लाल िस हा क अदालत म बहस होती रह ।54 19 माच, 1975 का दन। धानमं ी इं दरा गांधी को अदालत म गवाही देनी पड़ी। ऐसा देश के इितहास म पहली बार आ। ीमती गांधी मु क के इितहास म पहली धानमं ी बन ग , िजसे अदालत के सामने हािजर होना पड़ा। ीमती गांधी पांच घंटे तक कटघरे म खड़ी रह और अदालत के सवाल का जवाब देती रह । इलाहाबाद आते व उ ह ने अपने छोटे बेटे संजय को द ली म ही छोड़ रखा था। उनके साथ उनका बड़ा बेटा था। जब धानमं ी अदालत के सवाल का जवाब दे रही थ , उस समय उनका बेटा अपनी इतालवी प ी सोिनया को अपना पु तैनी मकान दखाने ले गया।55 अ ैल म मोरारजी देसाई ने गुजरात म रा पित शासन के िखलाफ भूख-हड़ताल क शु आत क । मोरारजी, जेपी से भी यादा इं दरा िवरोधी थे। सरकार को मोरारजी क मांग के आगे झुकना पड़ा और जून म िवधानसभा चुनाव क घोषणा क गई। िवप ी दल ने कां ेस के िखलाफ एक साझा मोचा बनाने क कोिशश शु कर द । जैसे ही जून के दूसरे स ाह म गुजरात म चुनाव शु आ, जनसंघ के नेता लालकृ ण आडवाणी ने घोषणा क क चुनाव अिभयान ने राजनीितक दल म ुवीकरण क या तेज कर दी है और जनसंघ इसम पूरी मदद करे गा। उ ह ने अपनी पाट क ताकत म कई गुना इजाफा होने क उ मीद जािहर क ।56 इधर मत क िगनती चल रही थी, उधर सभी का यान इलाहाबाद उ यायालय के फै सले क तरफ था। 12 जून क सुबह, कमरा नंबर 15 म यायमू त जगमोहन िस हा ने राजनारायण क यािचका पर अपना फै सला सुनाया। यह वही कमरा था, जहां कभी ीमती गांधी के िपता और दादा ने वकालत क थी। जि टस िस हा ने धानमं ी पर लगाए गए 14 आरोप म से 12 आरोप म उ ह बरी कर दया। जि टस िस हा ने िजस मामले म ीमती गांधी को दोषी पाया वो ये था क यू.पी. सरकार ने ीमती गांधी के भाषण के िलए एक ऊंचा मंच बनाया था ता क वे जनता को भािवत कर सक और दूसरा यह क उनके चुनाव भारी यशपाल कपूर चुनाव चार अिभयान शु होने के व भी सरकारी सेवा म िनयु थे। अदालत ने फै सला दया क ीमती गांधी का चुनाव र कया जाता है। हालां क जि टस िस हा ने इस फै सले के अमल पर बीस दन तक रोक लगा दी ता क ीमती गांधी सु ीम कोट म अपील कर सक।57 12 जून ीमती गांधी के िलए वाकई ब त बुरा दन था। सुबह-सुबह उ ह यह खबर िमली क उनके पुराने सहयोगी डी.पी. धर नह रहे। डी.पी. धर क बीती रात मौत हो गई। थोड़ी देर बाद ही गुजरात से खबर आई क िवधानसभा चुनाव म जनता मोचा ब मत क तरफ बढ़ रहा है। आिखर म उनके अपने ही शहर इलाहाबाद म वहां क हाईकोट ने उनके चुनाव को र कर दया। इलाहाबाद हाईकोट के फै सले पर कई लोग ने सवाल खड़ा कया। लोग ने यायाधीश के मकसद पर संदह े कया। अलीगढ़ म अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जि टस जगमोहन िस हा ने चौदह साल तक बरे ली क अदालत म वकालत क थी। उसके बाद वह िजला जज बन गए थे। 1970 म उ ह हाईकोट म िनयु कया गया। कु छ लोग ने जि टस िस हा के फै सले क यह कहकर आलोचना क क उ ह ने ऐसा इसिलए कया य क वह और जय काश नारायण दोन ही काय थ जाित से ता लुक रखते थे। कई लोग ने कहा क फै सले से कु छ दन पहले उ ह सु ीम कोट म िनयुि का लालच दया गया था, शत यह थी क वे ीमती गांधी के प म फै सला द।58 ीमती गांधी का चुनाव ब त ह के आरोप के आधार पर र कया गया था। फर भी जि टस िस हा के फै सले ने लोकि य जनमत को जेपी आंदोलन के प म घनीभूत कर दया। ीमती गांधी पर लगाए गए गंभीर आरोप पर लोग गौर करने लगे। फै सले के अगले ही दन िवप ी नेता ने रा पित भवन के बाहर धरना देना शु कर दया। रा पित से मांग क गई क धानमं ी को पद से बखा त कया जाए। पटना म जेपी ने बयान जारी कया क धानमं ी अगर पद पर बनी रहती ह और अपने मुसािहब क बात सुनती ह तो यह शमनाक और िनराशाजनक काम होगा। उ ह ने कहा क गुजरात चुनाव के नतीज ने साफ कर दया है क इं दरा का जादू या इं दरा लहर नाम क चीज अब अतीत क बात हो गई है। दूसरी तरफ ीमती गांधी के खास सहयोगी वाकई ब त त थे। 13 जून से ही ह रयाणा के मु यमं ी बंसीलाल ने अपने समथक का जूम द ली भेजकर खुलेआम ीमती गांधी के ित अपनी वामीभि दखाई। धानमं ी आवास के सामने क सड़क उनके शंसक से खचाखच भर गई। इन लोग ने धानमं ी के समथन म नारे लगाए और जि टस िस हा का पुतला जलाया। ीमती गांधी अपने आवास से बाहर िनकल और लोग से कहा क उ ह स ा से हटाने के िलए िवदेशी ताकत िवप ी दल के साथ िमलकर षडयं कर रही ह। उ ह ने कहा क इस काम के िलए ‘उनके िवरोिधय को अथाह पैसा’ दया गया है। हर दन समथक का ताजा ज था धानमं ी आवास के सामने जमा होता और धानमं ी उ ह संबोिधत करत । हालां क कु छ कां ेसी नेता ने अपनी िनजी बातचीत म इस लोकलुभावन हथकं डे क आलोचना भी क । हालां क ब त सारे दूसरे नेता ने इसे ो सािहत ही कया। द ली म एक जनसभा को संबोिधत करते ए कां ेस के अ य देवकांत ब आ ने कहा क ‘कानून जनता ारा बनाया जाता है और जनता क नेता इं दरा गांधी ह।’ जज और वक ल क राय म इं दरा गांधी को नैितकता के आधार पर इ तीफा दे देना चािहए था। ीमती गांधी के मंि मंडल म कभी मं ी रहे एम.सी. चागला क राय भी कु छ ऐसी ही थी। उनक राय म कम से कम जबतक ऊपरी अदालत म सुनवाई नह हो जाती और धानमं ी बरी नह हो जात , उ ह अपने पद पर नह रहना चािहए। दूसरी तरफ पाट के 516 सांसद ने एक ताव पर ह ता र कर धानमं ी से पद पर बने रहने क मांग क । कनाटक से दस हजार कां ेिसय ने अपने खून से ह ता र कर धानमं ी से ऐसी ही अपील क । इन तमाम बहस के बीच सरहद के उस पार जुि फकार अली भु ो ने चंता क क संकट क इन घि़डय म ीमती गांधी पा क तान पर हमला करने का दु साहस भी कर सकती ह। 20 जून को ीमती गांधी ने वोट लब के मैदान म एक बड़ी जनसभा को संबोिधत कया। ऐसा कहा गया क उस सभा म दस लाख लोग ने िशरकत क । यह सं या तीन महीने पहले जेपी ारा आयोिजत जनसभा म जुटी भीड़ से भी यादा थी। उस सभा म धानमं ी ने आरोप लगाया क िवप उनके अि त व को िमटाने पर तुला आ है। इसके बाद देवकांत ब आ ने लोग को संबोिधत करते ए एक तुकबंदी सुनाई इं दरा तेरे सुबह क जय... इं दरा तेरे शाम क जय... तेरे काम क जय... तेरे नाम क जय...! दो दन बाद िवप ने एक दूसरी जनसभा आयोिजत कर इसका जवाब दया। उस दन मूसलाधार बा रश हो रही थी। फर भी लाख लोग रै ली म िशरकत करने प च ं गए। जेपी इस रै ली के िवशेष व ा थे, ले कन आिखर म उनक लाइट र कर दी गई। इं िडयन एयरलाइं स ने कहा क ‘तकनीक द त ’ से जहाज के ‘उड़ान म बाधा’ आई। उनक जगह िवप ी दल के ितिनिधय ने भाषण दया। मोरारजी देसाई ने इं दरा गांधी के शासन को उखाड़ने के िलए ‘करो या मरो’ का नारा दया। 23 जून को सु ीम कोट म ीमती गांधी क यािचका पर सुनवाई शु ई। अगले दन जि टस वी.आर. कृ णा अ यर ने इलाहाबाद हाईकोट के फै सले पर सशत रोक लगा दी। अदालत ने कहा क ीमती गांधी संसद म उपि थत हो सकती ह ले कन जब तक उनक यािचका पर फै सला नह हो जाता, वह संसद म होने वाले मतदान म िह सा नह ले सकत । इं िडयन ए स ेस ने छापा क इसका मतलब ये आ क धानमं ी को ि गत िहत म और देश के िहत म ज र इ तीफा दे देना चािहए। अब तक कु छ व र कां ेसी नेता भी सोचने लगे थे क पाट के िहत म ीमती गांधी का इ तीफा ज री है। अगर वह संसद म मतदान ही नह कर सकत तो वह भावशाली ढंग से सरकार का नेतृ व कै से करगी? उ ह सलाह दी गई क जबतक सु ीम कोट उ ह आरोपमु नह कर देता, तब तक वे ता कािलक तौर पर इ तीफा देकर अपने कसी मं ी को धानमं ी क कु स स प द। उनके सहयोिगय और वक ल को अदालत म उनके बरी होने क पूरी उ मीद थी। धानमं ी पद के िलए संभवतः वण संह का नाम सुझाया गया था, जो एक गैर-िववादा पद नेता थे। धानमं ी को इ तीफा न देने क सलाह देने वाल म से उनके बेटे संजय गांधी और िस ाथ शंकर रे का नाम अहम था। िस ाथ शंकर रे पि म बंगाल के मु यमं ी थे और एक मश र वक ल रहे थे। वह संकट क इन घि़डय म इं दरा गांधी को सलाह देने के िलए कलक ा से द ली आ गए थे। धानमं ी ने उनक सलाह मान ली। बाद म अपनी आ मकथा के लेखक से ीमती गांधी ने कहा क अपने पद पर बने रहने के िसवाय उनके पास चारा ही या था? उ ह ने कहा, ‘आप जानते ही ह क मु क कस हालात म था। अगर म इ तीफा दे देती तो मु क का नेतृ व कौन करता? मेरे िसवाय कोई ऐसा नह था जो देश को संभाल पाता...।’59 एक बार जब फै सला ले िलया गया तो इसे िबजली क गित से लागू कया गया। 25 जून को िस ाथ शंकर रे ने मु क म ‘आंत रक आपातकाल’ लगाने के िलए एक अ यादेश का मसौदा तैयार कया। अ यादेश को रा पित के सामने पेश कया गया और आनन-फानन म इस पर द तखत करवा िलए गए। उस रात द ली के सारे अखबार क िबजली काट दी गई ता क अगले दन यानी 26 जून को कोई भी अखबार न छप पाए। पुिलस ने जेपी, मोरारजी देसाई और दूसरे कई िवप ी नेता को पकड़कर जेल म डाल दया। अगले दन द ली और देश क जनता को सरकारी रे िडयो ारा ये बता दया गया क देश म आपातकाल लागू कर दया गया है और जनता के सारे अिधकार को िनलंिबत कर दया गया है। हालां क बाद म कई लोग ने राय क क इलाहाबाद हाईकोट के फै सले से ीमती गांधी ज रत से यादा बौखला ग । अगर वह आपातकाल न भी लगात , तो उ ह यादा ित होने क संभावना नह थी। जि टस िस हा ने ीमती गांधी को दो मामूली अपराध के िलए सजा दी थी, जो सु ीम कोट म शायद ही टक पाता। कई जानकार क राय म जनसभा म मंच क ऊंचाई को बढ़ा देने को सु ीम कोट शायद ही ‘चुनावी अिनयिमतता’ करार देता। जहां तक दूसरे आरोप क बात थी तो यशपाल कपूर चुनाव अिभयान शु होने से पहले ही सरकारी पद से इ तीफा दे चुके थे। हां, िववाद इस पर ज र था क उनका इ तीफा कस ितिथ को मंजूर कया गया। ऐसे म अिधकांश वक ल क राय थी क सु ीम कोट, इलाहाबाद हाईकोट के उस फै सले को ज र बदल देता। द ली के एक स मािनत यायिवद ने कहा क ीमती गांधी ने कानूनी उपचार और अपील के अिधकार का उपयोग न कर इसके बदले असामा य, अलोकतांि क और असंिवधािनक रा ता अि तयार कर देश पर आपातकाल थोप दया।60 आपातकाल क घोषणा होने से महज चार महीने पहले इं िडयन ए स ेस ने भारतीय लोकतं क प रप ता और लचीलेपन क तारीफ म कसीदे काढ़े थे। अखबार ने िलखा था क कै से इस देश का लोकतं गंभीर मतभेद को भी सामंज य और स ावनापूवक सुलझाने क मता रखता है। ले कन कु छ ही दन म सब कु छ उलट गया। सन् 1975 म भारतीय लोकतं क मीर घाटी और भारतीय संघ म स ाव कायम तो करवा सकता था, ले कन उसक यह मता नह बन पाई थी क वह इं दरा गांधी और जेपी के बीच के संबंध को सुधार सके । 5 संकट म लौह मिहला आने वाली पीि़ढयां हमसे ये नह पूछगी क हमने कतने चुनाव करवाए, बि क वे हमसे ये पूछगी क हमने कतनी तर क । संजय गांधी, दसंबर 1976 I 26 जून, 1975 को सुबह 6 बजे क ीय मंि मंडल क एक बैठक बुलाई गई। मंि य को बता दया गया क म यराि के बाद से देश म आपातकाल लगा दया गया है। मंि य क पलक न द से मुंदी जा रही थ और उ ह इस घोषणा क उ मीद नह थी। देश को यह सूचना देने से पहले मंि मंडल क महज औपचा रक सहमित भर ले ली गई। इसके बाद ीमती गांधी आॅल इं िडया रे िडयो क तरफ रवाना , जहां यह सूचना वह पूरे देश को देने वाली थ । आमलोग को भी इस तरह क उ मीद कतई नह थी। ीमती गांधी ने घोषणा क क रा पित ने देश म आपातकाल क घोषणा क है और इसम घबराने क कोई बात नह है। उ ह ने कहा क यह एक ज री कदम था य क जबसे उ ह ने देश क आम जनता के िहत म कु छ गितशील काय म क शु आत क थी, तबसे इसके िखलाफ गहरी सािजश क जा रही थी। उ ह ने दावा कया क िवखंडनकारी ताकत और सा दाियक शि यां देश क एकता को तोड़ने का यास कर रही थ । उनके मुतािबक उनका स ा म रहना या न रहना यादा अहम नह है। उ ह ने उ मीद जािहर क क हालात ब त ज द सामा य हो जाएंगे और आपातकाल हटा िलया जाएगा।1 हालां क आपातकाल के प म दया गया यह तक काफ र ा मक क म का था। हक कत यह थी क आपातकाल लगाया ही इसिलए गया था क सु ीम कोट ने ीमती गांधी को संसदीय मतदान म िह सा लेने से मना कर दया था। जब आपातकाल क घोषणा क गई उस समय धानमं ी क सबसे नजदीक िम और कलािवद पुपुल जयकर अमे रका म थी। 27 मई को ीमती गांधी ने ीमती जयकर को सूचना दी क बढ़ती ई हंसा, ‘नफरत और गलत बात के चार’ को रोकने के िलए आपातकाल लगाना पड़ा। उ ह ने दावा कया क महज 900 लोग को िगर तार कया गया और यादातर िगर तार कए गए लोग को जेल म नह बि क ‘आरामदायक मकान ’ म रखा गया है। ीमती गांधी ने कहा क आपातकाल के बारे म देश के आमलोग क सामा य राय अ छी है और देश म अमन चैन का वातावरण है। उनक राय म आपातकाल इसिलए लगाया गया ता क मु क सामा य लोकतांि क गितिविधय क तरफ फर से लौट आए।2 देशभर म पुिलस लोग को उठा रही थी और जेल म डाल रही थी। िगर तार कए जाने वाल लोग म से कां ेस को छोड़कर दूसरे अ य दल के नेता शािमल थे। छा कायकता, मजदूर नेता और िजन लोग का थोड़ा सा भी संबंध जनसंघ, कां ेस(ओ), समाजवादी या अ य कसी भी दूसरे कां ेस िवरोधी समूह से था, पुिलस उ ह उठा रही थी। जय काश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे लोग को द ली के िनकट ह रयाणा क कसी सरकारी अितिथशाला म बंद कर दया गया। जब क यादातर लोग को पहले से ही कै दय से खचाखच भरे जेल म बंद कर दया गया। यह तादाद ीमती गांधी के दावे से ब त ही यादा थी। हजार लोग को मीसा(म टनस आॅफ इं टरनल िस यु रटी ए ट) यानी आंत रक सुर ा कानून म बंद कर दया गया। इस कानून को लोग ने ‘इं दरा-संजय सुर ा कानून’ कहना शु कर दया। लोग को दबाने के िलए दूसरे कानूनी हिथयार का भी सहारा िलया गया। वािलयर और जयपुर क राजमाता को जेल म बंद कर दया गया। उन पर ऐसी कानूनी धाराएं लगाई ग , जो अमूमन काला बाजा रय और त कर पर लगाई जाती ह।3 आपातकाल के शु आती महीन म ीमती गांधी ने इसके प म कई सा ा कार दए। इन सा ा कार म भी वह काफ र ा मक नजर आ । लंदन से छपने वाले संडे टाइ स को दए एक सा ा कार म उ ह ने कहा क ये पूरी तरह गलत है क उ ह ने खुद को स ा म बनाए रखने के िलए आपातकाल लगाया है। उ ह ने कहा क जेपी ारा पेश क गई असंिवधािनक चुनौती से संिवधान के िनयम के िहसाब से िनपटने क कोिशश क गई है। ीमती गांधी क राय म देश को ‘अ व था और िवखंडन’ से बचाने के िलए आपातकाल लागू कया गया। उ ह ने कहा क नए आ थक काय म को लागू करने और देश म ‘आ मिव ास क भावना’ का संचार करने के िलए आपातकाल ज री था। यूयाॅक से छपने वाली सेटरडे र ू को दए अपने सा ा कार म उ ह ने कहा क आपातकाल, लोकतं के खा मे के िलए नह बि क इसक िहफाजत के िलए लागू कया गया है। अपने इन सा ा कार म उ ह ने पा क तान और चीन जैसे देश के यादा अिधनायकवादी शासन क तुलना म भारत क आलोचना करने के िलए पि मी ेस क आलोचना क ।4 अपने सा ा कार और सार मा यम पर दए गए अपने भाषण म धानमं ी ने देश म ‘अनुशासन और नैितकता’ क बात पर जोर दया। सरकारी पटकथा लेखक को नए-नए नारे गढ़ने का िज मा स पा गया। नार क बानगी कु छ इस तरह है अनुशासन ही देश को महान बनाता है; काम यादा... बात कम; वदेशी खरीद... भारतीय बन; हमारी मता ही हमारा आदश है वगैरह-वगैरह। दूसरी तरफ ीमती गांधी के ि व और नेतृ व शैली का चार करने वाले नारे भी गढ़े गए मसलनः वह व था और अराजकता के बीच च ान क तरह खड़ी हो ग ... िह मत और साफ दृि कोण का दूसरा नाम इं दरा गांधी हं◌।ै ये नारे हंदी और अं ेजी म बस , पुल और सरकारी इमारत पर िलख दए गए। बड़े-बड़े हो ड स पर भी इस तरह के नारे िलखे गए। ये तानाशाही के साफ ल ण थे। िजस तरह एक सैिनक शासक, स ापलट के बाद अपने देश को बचाने का दावा करता है, ीमती गांधी उसी तरह कर रही थ । ठीक उसी तरह वो कह रही थ क चूं क उ ह ने अपनी जनता से आजादी छीनी है, वे उनके िलए भोजन का इं तजाम करगी! आपातकाल को लागू ए स ाहभर भी नह आ था क उ ह ने आ थक िवकास के िलए एक ‘बीससू ी काय म’ पेश कया। सरकार ने वादा कया क वह आव यक व तु क क मत म व रत कटौती करे गी, भूिमसुधार लागू करे गी, कज क माफ करे गी, बंधुआ मजदूरी था क समाि करे गी, िमक के िलए यादा मजदूरी का ावधान करे गी और म यवग के िलए कर म रयायत देगी।5 इितहास म मिहला तानाशाह क सं या उं गिलय पर िगनने के लायक है। शायद बीसव सदी म ीमती गांधी पहली मिहला तानाशाह थ । मिहला होने के नाते उ ह ने बंब और तीक का भरपूर उपयोग कया, जो शायद उनके पु ष समक के िलए उपयु नह था। आपातकाल लागू कए जाने के साढ़े चार महीने बाद वे माइ ोफोन पर आ और अपने देशवािसय से सीधे िमलने और उनका ‘दुख-दद’ जानने क कोिशश क । वे लगभग एक घंटे से यादा बोल । उ ह ने अनुशासन, सरकार क आ थक नीितय , ाचीन भारत के गौरवशाली इितहास और आधुिनक युग म नाग रक के कत पर बात क । हमारे िवरोधी चाहते ह क क सरकार के कामकाज को ठ प कर दया जाए और हमने पाया क ि थित वाकई गंभीर है। इसे दूर करने के िलए हमने कु छ कदम उठाए। देश म मेरे ब त सारे शुभ चंतक को ये बात समझ म नह आई क इं दराजी ने या कर दया? अब इस मु क का या होगा? हमने महसूस कया क देश को एक बीमारी लग गई है और अगर इसका इलाज करना है तो इसे दवा देनी ही पड़ेगी, भले ही वो कड़वी य न हो। कतना भी यारा ब ा य न हो, अगर डाॅ टर ने उसे दवा िलखी है, तो उसे दवा तो िखलानी पड़ेगी। इसिलए हम ये कड़वी दवा देश को िखलानी पड़ी। ये भी सच है क जब कभी ब े को तकलीफ होती है, तो मां को भी होती है। हम भी यह कदम उठाकर ब त खुश नह ह। ले कन हमने पाया क इसने वैसा ही असर कया है जैसे डाॅ टर क दवा का असर होता है।6 II 15 अग त, 1975 को द टाइ स आॅफ लंदन ने जेपी कपेन (जेपी को मु करो अिभयान) के नाम से एक पूरे प े का िव ापन छापा। इस िव ापन का खच अलगअलग लोग ने वहन कया था। इस पर ह ता र करने वाल म पहला नाम रं गभेद िवरोधी आंदोलन के तीक बन चुके िबशप ेवल हडेल टन का था, तो अंितम नाम मश र ि टश अिभने ी डेम पेगी एस ा ट का। अ य द तखत करने वाले लोग म भारत के पुराने िम और समाजवादी फे नर ोकवे, अथशा ी इ.एफ. सुमेकर और राजनीित शा ी ड यू.एच. मो रस जाॅ स जैसे लोग शािमल थे। इसके अलावा इस ह ता र अिभयान म ऐसी हि तयां भी शािमल थ , िजनका भारत से कोई िवशेष संबंध नह था मसलन, अिभने ी लडा जै सन, इितहासकार ए.जे.पी. टेलर और आलोचक के नेथ टेनन। उस प े पर महा मा गांधी और जय काश नारायण क त वीर छपी थी। उस िव ापन म नाम क इस लंबी फे ह र त के साथ-साथ जेपी क देशभि और उनके च र के बारे म खुद महा मा गांधी के िवचार भी छापे गए थे। िव ापन म कहा गया क आज भारत का वतं ता दवस है, कृ पया भारत के लोकतं पर से ये काश मत ख म होने दीिजए। द तखत करने वाल ने ीमती गांधी से अपील क क सारे राजनीितक कै दय और खासकर जय काश नारायण को छोड़ दया जाए। जय काश का नाम खासतौर पर महज इसिलए नह िलया जा रहा था क वह िवप ी आंदोलन के नेता थे। वा तिवकता तो यह थी क जेपी कपेन के अ णी लोग जेपी को ‘संपूण ांित’ अिभयान शु होने से ब त पहले से जानते थे। ोकवे जैसे वाम िवचारधारा के लेबर नेता जेपी को भारत क आजादी के एक महाननायक के प म तीस के दशक से जानते थे। ई.एफ. सुमेकर जैसे पयावरणिवद, जेपी को 50 के दशक से जानते थे और दोन ही िवक त िवकास क अवधारणा पर एकमत थे। दुिनया भर के राजनीितशा ी जेपी को आजादी से पहले और बाद म एक सदाबहार और भावशाली नेता के प म जानते थे। मो रस-जाॅ स ने उनके बारे म कहा क जय काश नारायण, भारतीय राजनीित म एक संत के समान ह, िजनक िमसाल दी जाती ह। भारतीय आजादी क लड़ाई के वे पुराने शुभ चंतक अब बूढ़े हो चले थे, िज ह ने कभी ये देखा था क पंिडत नेह और जय काश म कतना नजदीक र ता था। वे लोग इस बात से िथत थे क पंिडत नेह क बेटी ने जेपी को जेल म डाल दया है। उ ह ये भरोसा था क शायद इितहास का हवाला देकर जेपी को जेल से िनकाला जा सकता है। इसी तरह का काम िम समाज के सद य ( े कस) ने भी कया, िज ह ने अपना नाम टाइम के उस िव ापन म नह डाला था। ले कन उ ह ने पद के पीछे से समझौता कराने क भरपूर कोिशश क । इस समूह का भारत से पुराना और स मानजनक र ता था। अगाथा है रसन और होरे स अले जडर जैसे े कस ने ि टश सा ा यवा दय और भारतीय रा वा दय के बीच वाता म अहम भूिमका िनभाई थी। हाल तक वे लोग जेपी के साथ िमलकर भारत-पा क तान के बीच संबंध को सुधारने पर काम कर रहे थे। इसके अलावा भारत सरकार और नगा िव ोिहय के बीच बातचीत म भी उनक अहम भूिमका थी। आपातकाल लागू होने के एक महीने बाद अग त म इन े कस ने अपने एक समाजशा ी िम जो. इ डर को त य का पता लगाने के िलए भारत भेजा। इ डर कई लोग से िमले, िजसम जेपी के समथक, कां ेस के नेता और धानमं ी भी शािमल थ । उ ह बड़ी दुिवधा थी क वह कस प क आलोचना कर। एक तरफ जेपी ने अ हंसक जनांदोलन शु कर दया था, जो उनके अनुशासनिवहीन कै डर ारा संचािलत था। उनके आंदोलन को लेकर ब त सारे लोग आ त नह थे और इसे महज एक योग भर मानते थे। इसके साथ ही आंदोलन क िव सनीयता इस बात से भी भािवत ई क इसम अित वाम और अित दि ण धड़े के लोग शािमल थे। दूसरी तरफ धानमं ी ने आपातकाल लागू कर िन य ही गैर-ज री ित या क थी। आपातकाल से आमलोग म दहशत फै ल गई और इसने लोकतांि क या और सं था को 7 मह वहीन कर दया। इ डर के लेखन से पता चलता है आपातकाल क पटकथा इं दरा और जेपी ारा संयु प से िलखी गई थी। दोन ने ही जनता ारा चुनी ई सं था का स मान करने म ब त कम िच दखाई। जेपी ने जनता ारा चुनी ई सरकार को बखा त करने क मांग क तो ीमती गांधी ने जनता ारा वैध तरीके से चुने गए ितिनिधय को ही जेल म डाल दया। दोन म से कसी ने भी आधुिनक लोकतं म रा य क भूिमका का स मान करने क चंता नह क । जेपी ने यह उ मीद कर ली क रा य प रदृ य से िब कु ल गायब हो जाए और सेना और पुिलस, सरकार के ‘अनैितक आदेश ’ का पालन न कर। दूसरी तरफ ीमती गांधी ने रा य के अिधका रय को िसफ एक ि के अधीन कर देने क कोिशश क । सबसे यादा तकलीफ इस बात क थी क दोन धुर िवरोधी एक जमाने म िम रहे थे। वे पीि़ढय से इितहास, परं परा और मजबूत ि गत संबंध के ारा एक दूसरे से जुड़े ए थे। ये कोई नह जानता क जेपी को जेल भेजते व ीमती गांधी ने कै सा महसूस कया होगा। हम िसफ इतना जानते ह क ीमती गांधी के अिधका रय क इस पर िमलीजुली राय थी। धानमं ी के सूचना सलाहकार एच.वाई. शारदा साद खुद ही एक पुराने देशभ और वतं ता सेनानी रहे थे। सन् 42 के भारत छोड़ो आंदोलन म वह भी जेल गए थे, जब जेपी रा ीय नेता के प म उभरकर सामने आए थे। हालां क जो. इ डर क तरह उ ह इतनी छू ट नह थी क आपातकाल को वह एक गैरज री ित या िलख सक, ले कन अपने एक िम को भेजे प म उ ह ने बड़े दुख के साथ िलखा क इितहास के एक ऐसे मोड़ पर जब देश मू य और नैितकता के संकट से गुजर रहा हो, जेपी जैसे ि व का आरएसएस और सीपीएम जैसी सं था को कां ेस से यादा तरजीह देना चंता क बात है। यह एक ऐसी बात है िजसे म आजतक नह समझ पाया ।ं म अपने आपको िसफ इसी बात से दलासा देता ं क जेपी इस आंदोलन के िलए इतने नह होते, अगर उनक प ी भावती जंदा 8 होत । जेपी के िगर तार होने से अथशा ी पी.एन. धर भी ब त दुखी थे। धर, पी.एन. ह सर क जगह धानमं ी के सलाहकार बने थे। उ ह ने जेपी को समझौते के िलए कई संदश े भेजे, ता क कै दय को जेल से रहा कया जा सके और 1976 म होने वाले आम चुनाव से पहले आपातकाल हटाया जा सके । वाताकार ने पाया क जेपी समझौते के िलए धीरे -धीरे मन बना रहे ह। उनके गृहरा य िबहार म आई भीषण बाढ़ ने उ ह वहां जाकर काम करने के िलए ाकु ल कर दया था। उ ह इस बात का पता चल गया था क लोग म इस बात क चचा है क जेपी के गैर-िज मेदाराना वहार क वजह से आपातकाल लगाना पड़ा। उ ह ने कहा क जनांदोलन को फर जंदा करने क उनक कोई आकां ा नह है ले कन जब कभी आम चुनाव करवाया जाएगा वह कां ेस के िखलाफ एक साझा मोचा बनाने और उसके उ मीदवार के प म चार करने का काम करगे।9 जेपी इस बात के इ छु क थे क उनके पुराने िम शेख अ दु ला उनके और ीमती गांधी के बीच म य थता का काम कर। शेख अ दु ला अब ज मू-क मीर के मु यमं ी बनकर भारतीय व था के अंग बन चुके थे। जेपी ने एक रपोट पढ़ी थी, िजसम शेख के हवाले से बताया गया था क वे एक अिखल भारतीय तर के समझौते के प म थे और यह भी क ीमती गांधी भी आपातकाल हटाने के िलए ‘बेस ’ हो रही ह। जेपी ने अ दु ला को िलखा क सरकार और िवप के बीच गितरोध को दूर करने के िलए उनके ारा शु कए गए कसी भी उपाय को उनका पूरा समथन हािसल होगा। प म कहा गया क उनके ज म अभी तक नह भरे ह और उ ह छोटे-छोटे समूह का खलनायक, ष ं कता, ‘गुनाहगार नंबर एक’ और न जाने या- या कहा गया है। प के अंत म उ ह ने िलखा क अगर वाकई धानमं ी आपातकाल ख म करना चाहती ह, तो इसका सबसे बड़ा माण यही होगा क ये प आप तक प च ं ने दया जाए और आपको मुझसे िमलने क इजाजत दी जाए।10 ले कन ऐसा नह होने दया गया। धानमं ी इस इ तेहान म नाकामयाब रह । वह जेपी क इस चुनौती को झेल नह पा । शेख को जेपी का यह प कभी नह िमला और इसी के साथ समझौते क यह उ मीद बेमौत मर गई। नवंबर, 1975 म जेपी क तबीयत िबगड़ने लगी। उनक कडनी म सम या थी। उ ह इलाज के िलए चंडीगढ़ भेजा गया, जहां डाॅ टर ने हाथ खड़े कर दए। अब जेपी को पेरोल पर रहा कर, बंबई के जसलोक अ पताल म भेजा गया, जहां उ ह मू रोग िवशेष एम.के . मिन क िनगरानी म भत कर दया गया। सरकार इस बात क आशंकामा से कांप गई क अगर जेपी क जेल म मृ यु हो गई तो देशभर म हालत बेकाबू हो जाएंगे।11 हालां क जेपी को अ पताल म डायिलिसस पर रखा गया, ले कन जेल म बंद दूसरे नेता को पेरोल पर नह छोड़ा गया। एक अनुमान के मुतािबक िबना सुनवाई के करीब 36,000 लोग को मीसा के तहत बंद कर दया गया। इन कै दय म लगभग सभी रा य के लोग क नुमाइं दगी थी। आं देश से 1,078, िबहार से 2,360, उ र देश से 7,049 और पि म बंगाल से 5,320 राजनीितक बंदी जेल म बंद थे। इसी तरह दूसरे रा य से भी हजार लोग बंद थे।12 सरकार के िखलाफ राजनीितक अपराध क िह मत करने वाले ये लोग आम अपरािधय क तरह जेल म ठु से ए थे। उनका खाना और उनके कपड़े भी आम अपरािधय क तरह ही थे। उ ह गुंड और उठाईिगर क सेल म डाल दया गया। (इससे एक चुटकु ला ये बना क ीमती गांधी का समाजवाद कम से कम जेल म देखने को तो िमलता है!) बुजुग राजनीितक कै दी, िज ह ने अं ेज का जमाना देखा था वे अं ेजी राज क जेल को याद कर रहे थे। कम से कम वहां सफाई अ छी होती थी और जेलर यादा मानवीय दृि कोण रखता था। मिहला राजनीितक बं दय के िलए उनक िन य या करने का कोई खास इं तजाम नह था। वािलयर और जयपुर क राजमाता को अब गंदगी और सीलनभरे माहौल म रहना पड़ रहा था। समाजवादी मृणाल गोरे को बगल क कोठरी म रहने वाली एक कु रोग-पीि़डत मिहला के साथ शौचालय का साझा इ तेमाल करने को कहा गया। सामने वाली कोठरी म िमरगी से त मिहला रहती थी, जो िब कु ल व हीन रहती और चीखती-िच लाती रहती थी।13 III जनवरी, 1963 म अपने िम को िलखे एक प म ीमती गांधी ने इस बात पर चंता जािहर क थी क लोकतं कसी औसत आदमी को िसफ ऊंचाई पर ही नह प च ं ाता, बि क सबसे यादा चीखने-िच लाने वाले आदमी को भी ताकतवर बना देता है, भले ही मु के बारे म उसक समझ शू य हो।14 तीन साल बाद जब वे धानमं ी बन ग , तो एक प कार से उ ह ने कहा था क कां ेस मृत ाय हो गई है और कभी-कभी उ ह लगता है क पूरी संसदीय व था ही मृत ाय हो गई है। ीमती गांधी ने कहा क इसके बावजूद हमारे नौकरशाह क जड़ता लाजवाब है, हमारे पास एक ऐसा तं है जहां हम एक मुद क जगह दूसरे मुद को िबठा देते ह। दुिनया के सबसे बड़े लोकतांि क देश क नई धानमं ी ने कहा क कभी-कभी वो सोचती ह क काश आजादी के व हंद ु तान म भी ांस या स क तरह कोई वा तिवक ांित ई होती!15 लोकतांि क या के साथ ीमती गांधी क असहजता शु म ही साफ हो गई थी। ितब नौकरशाही, यायपािलका म दखलअंदाजी और कां ेस पाट पर धानमं ी के वामीभ लोग का िनयं ण इसका साफ उदाहरण था। यह या आिखरकार आपातकाल म त दील हो गई। इधर िवप ी सांसद जेल म बंद थे, उधर ीमती गांधी के शासन को िनरं तरता दान करने के िलए कई संिवधान संशोधन िवधेयक पा रत कर दए गए। 22 जुलाई, 1975 को 38वां संिवधान संशोधन िवधेयक पा रत कया गया, िजसके तहत सु ीम कोट को आपातकाल क याियक समी ा करने के अिधकार से वंिचत कर दया गया। इसके दो स ाह बाद 39वां संिवधान संशोधन िवधेयक पा रत कर दया गया, िजसके मुतािबक धानमं ी के चुनाव को सु ीम कोट म चुनौती नह दी जा सकती थी। अब इसक सुनवाई संसद के ारा ग ठत संिवधािनक सं था ही कर सकती थी। ऐसा ठीक उसी व कया गया जब सु ीम कोट म ीमती गांधी के चुनाव संबंधी मामले पर फै सला आने वाला था। अदालत ने कहा क चूं क नए संिवधान संशोधन ने उनके चुनाव िववाद को कानून क प रिध से बाहर कर दया है, इसिलए अब कोई मामला नह बन सकता।16 फर भी कु छ महीन के बाद सु ीम कोट ने धानमं ी क बड़ी सहायता क । मीसा के तहत बंद कए गए हजार लोग क तरफ से वक ल ने मांग क क रा य ारा हेिबयस काॅरपस यानी कानून के सम सशरीर उपि थत होने के अिधकार को नह छीना जा सकता। िनचली अदालत ने इस मांग के प म फै सला भी दया, ले कन सु ीम कोट ने कहा क नए िनजाम (आपातकाल) के तहत सरकार िबना सुनवाई के भी लोग को जेल म रख सकती है। पांच यायाधीश क पीठ म से िसफ एक जि टस एच.आर. ख ा ने इस फै सले के िखलाफ मत दया। जि टस ख ा ने कहा क िबना सुनवाई के कसी को जेल म बंद रखना उन लोग के िलए अिभशाप से कम नह है, जो ि गत वतं ता से ेम करते ह।17 कई लोग ने ऐसा कहा क अदालत का फै सला गैर- याियक वजह से भािवत था। तीन जज ने इस उ मीद म फै सला दया था क उ ह एक दन सु ीम कोट का मु य यायाधीश बना दया जाएगा। ये भी कहा गया क उ ह ने इस डर से भी ऐसा फै सला दया य क आपातकाल के दौरान उ ह ने उन अफसर के दंडा मक तबादले देखे थे, िज ह ने सरकार से सहयोग नह कया था। ‘भारत म उ मीद का रण’ नाम से एक िनराशा भरे संपादक य म यूयाॅक टाइ स ने िलखा क एक तानाशाह सरकार के सामने एक वतं यायपािलका का घुटने टेक देना लोकतांि क समाज के िवनाश का आखरी कदम है।18 अभी तो इतना ही आ था। सरकार को अभी और भी ब त कु छ करना था। सरकार अब संिवधान का 42वां संशोधन करने क तैयारी म थी, जो संसद को असीिमत अिधकार दे देता। इस संशोधन से संसद को अपना कायकाल बढ़ाने तक क छू ट िमल जाती और ऐसा संसद ने आनन-फानन म कर भी िलया। इस संशोधन से िवधाियका ारा पा रत कए गए कानून को याियक समी ा से छू ट िमल गई और रा य पर क का िशकं जा और भी मजबूत हो गया। कु ल िमलाकर संिवधान के 42व संशोधन ने संसद को असीिमत ताकत दान कर दी। अब चाहे तो संसद संिवधान को आबाद या बबाद कर सकती थी।19 जनवरी, 1976 म तिमलनाडु क डीएमके सरकार का कायकाल पूरा हो गया। नया चुनाव करवाने के बजाय क ने रा य म रा पित शासन लगा दया। दो महीने बाद गुजरात म भी ऐसा ही कया गया, जहां जनता सरकार आपसी िवखंडन क वजह से ब मत खो बैठी थी। अब पूरे मु क म ीमती गांधी और उनके लोग को चुनौती देनेवाला कोई नह था। माच, 1976 म जब कला इितहासकार िमल ड े और ड यू.जी. आचर ीमती गांधी से िमलने गए तो धानमं ी ने आपातकाल के दौरान कए जा रहे काय पर पूण संतुि क । उ ह ने कहा क नई व था म रा य के शासन को सही तरीके से िनयं ण म लाया गया है। रा य के मं ी काम करने पर मजबूर ए ह। यह ब त दन से बकाया था, और यह ि थित ब त ही अ छी है। उ ह ने कहा क ‘ हंद ु तान म स ा का अित िवक ीकरण घातक हो सकता है। मुझे इस मु क को एक रखना है और वो सबसे ज री काम है।’20 IV आपातकाल के दौरान सबसे यादा भािवत होने वाली चीज म से एक थी ेस क वतं ता। आपातकाल लागू होने के पहले स ाह के दौरान सरकार ने ी-ससरिशप नाम क सं था का गठन कया था। इस व था के तहत संपादक को सरकार या सरकारी नीितय क आलोचना करने वाले लेख या सामि य को छापने से पहले सरकार से अनुमित लेनी होती थी। सरकार ने समाचार क प रभाषा के बारे म लंबेचौड़े दशा-िनदश जारी कए। अखबार को धरना, जुलूस, हड़ताल या सरकार का िवरोध और जेल क दशा पर रपोट छापने से मना कर दया गया। िजन लेख म सरकार क खुली आलोचना होती थी उनके छापने का तो ही नह था, िजन लेख म शासन क ह क सी भी आलोचना क जाती थी, उसे भी छापने क इजाजत नह दी गई।21 पंजाब के एक अखबार ने उन दन को याद करते ए िलखा क िजन-िजन खबर को नह छापा गया, उनम ऐसी भी खबर थ चंडीगढ़ के बजवाड़ा बाजार म दुकान के बंद होने क खबर नह छापी गई। ये खबर इसिलए नह छापी गई य क एक दुकानदार को पुिलस ारा िगर तार कर िलए जाने के िवरोध म बाजार बंद कर दया था। िजन अ य खबर को नह छापा गया उनम से अहम थ , एक वा य अिधकारी क छह साल से गैर-मौजूदगी, शहर क सफाई व था खासकर खुली ई नािलयां, िहमाचल देश के काॅलेज म व ा को िमलने वाले अपया और िवसंगितपूण वेतनमान क िशकायत म संपादक को िलखी गई िच यां और खराब बस सेवा से संबंिधत रपोट। इसके अलावा टमाटर क क मत म बढ़ोतरी, अमृतसर के िनकट रे ल पट रय का िनरी ण करते समय दो लोग क मौत और आव यक दवा क कालाबाजारी पर एक छोटी सी रपोट को भी नह छापा गया।22 ले कन अखबार के खाली प को तो भरना ही था। अखबार के प े धानमं ी के भाषण और सरकार क तारीफ वाली दूसरी अ य खबर से भर दए गए।(वे संपादक िज ह ने गांधी, टैगोर और नेह क ि गत वतं ता और िवचार क आजादी संबंधी लेख से प को भरने क कोिशश क , उ ह तुरंत जेल म डाल दया गया।) िशमला से एक पाठक ने अपने एक ि टश िम को िच ी िलखी क हंद ु तान के अखबार पूरी दुिनया क खबर तो देते ह ले कन हम अपने ही देश क खबर का पता नह चल पाता। हमारे देश क खबर के नाम पर िसफ धानमं ी का भाषण छपता है। मने सोच िलया है क अब म अखबार पढ़ना ही छोड़ दूग ं ा।23 सचाई तो यह थी क अखबार के संवाददाता भी इस बात से काफ दुखी थे। बंबई से िनकलने वाली सा ािहक ि लज के एक संवाददाता ने अपने ि टश दो त को िलखा क उसका अखबार आपातकाल का समथक है, ले कन अगर हम िसफ सरकार के इशार पर ही नाचगे तो हमारे पाठक हमारे बारे म या सोचगे’?24 हा य- ं य क खबर को भी छपने से रोक दया गया। तिमल ं यकार चो रामा वामी ने धानमं ी और उनके बेटे को दशाते ए एक काटू न बनाया। उसम िलखा था क ‘संिवधान संशोधन पर एक रा ीय बहस’। जब एक पाठक ने ये पूछा क इं दरा गांधी कौन है, तो चो ने जवाब दया क ‘इं दरा गांधी, मोतीलाल नेह क पोती, जवाहरलाल नेह क बेटी और संजय गांधी क मां है!’ इसे भी छापने से मना कर दया गया। सरकार के िखलाफ खबर को ससर करने वाली सं था काफ चाकचौबंद थी ले कन फर भी कु छ न कु छ ं य छप ही जाते थे। इसी तरह वी बालासु यम नाम के प कार ई टन इकोनाॅिम ट नाम क पि का म एक लेख छापने म कामयाब रहे, िजसका शीषक था ‘भारत म पशुधन संकट’। इस लेख क पहली पंि थी क भारत म वतमान म 58 करोड़ भेड़ ह! इसी तरह तानाशाही के िखलाफ िमजाज रखने वाले एक अनाम प कार ने टाइ स आॅफ इं िडया म एक िव ापन दया - द डेथ आॅफ डी.ई.एम ओ े सी, उसक प ी टी. थ, बेटे एल.आई. बट और बेटी फे थ, होप और जि टस का दन (इसका मतलब था लोकतं क मौत, उसक प ी स य, बेटे आजादी और बे टयां िव ास, उ मीद और इं साफ का दन)।25 जैसे-जैसे आपातकाल क अविध बढ़ती गई सरकार ने सूचना के सारण पर और स त िनयं ण थािपत कर िलया। यूएनआई और पीटीआई जैसे वतं समाचार सेवा दाता सं थान म दो मह वहीन सं थान का िवलय कर समाचार नाम क सं था ग ठत कर दी। यह सं था सरकार ारा िनयंि त थी। समाचार क साम ी पर िनगाह रखने के िलए बनाई गई वतं सं था ेस काउं िसल का खा मा कर दया गया। उस कानून को ख म कर दया गया, िजसके तहत संवाददाता को संसदीय कारवािहय क रपो टग के दौरान सुर ा िमली ई थी। कम से कम 253 प कार को पकड़कर जेल म डाल दया गया। इनम इं िडयन ए स ेस के कु लदीप नैयर, टाइ स आॅफ इं िडया के के .आर. सुंदरराजन और मदरलड के के .आर. मलकानी जैसे प कार शािमल थे।26 कु छ जुझा और वतं ता ेमी प कार ने सरकार के इस दमन का मुकाबला करने क कोिशश क ले कन उनके मािलकान सरकार के सामने झुक गए। उ ह यह भय सताने लगा क सरकार उनके ेस को बंद कर सकती है या उनक संपि को ज त कर सकती है। वे सरकार से डरते भी थे और उससे संबंध भी खराब नह करना चाहते थे। सरकार ने डीएवीपी (दृ यचार िनदेशालय) को आदेश दया क वो सरकार के समथक अखबार को तो िव ापन दे ले कन जो अखबार या मीिडया हाउस सरकार क आलोचना करते ह उनको िव ापन देना बंद कर दे। ब त सारे अखबार, संपादक और अखबार के मािलक सरकार क इस घोषणा के आगे झुक गए और उसक धुन पर नाचने लगे।27 िजन अखबार ने बड़े आराम से सरकार के सामने घुटने टेक दए उनम हंद,ू टाइ स आॅफ इं िडया और खासकर हंद ु तान टाइ स का नाम अहम था। हंद ु तान टाइ स के मश र और स मािनत संपादक बी.जी. वग ज को अखबार ने उनके पद से बखा त कर दया। अखबार के मािलक के .के . िबड़ला ने ऐसा इं दरा गांधी को खुश करने के िलए कया।(िबड़ला, इं दरा गांधी के ित काफ वामीभ थे। इलाहाबाद हाईकोट के फै सले के बाद के .के . िबड़ला 500 उ ोगपितय के ितिनिधमंडल के साथ ीमती गांधी से यह आ ह करने गए थे क वे पद से इ तीफा न द।)28 िजन अखबार ने सरकार क नीितय के िखलाफ डटकर खड़ा होना वीकार कया, उनम इं िडयन ए स ेस और टे समैन का नाम अहम है। दोन ही अखबार ने सरकार क धमक और दबाव के सामने झुकने से इं कार कर दया। जब उनक िबजली काट दी गई, तो वे अदालत चले गए और तब कह जाकर उनक िबजली बहाल क गई। जब उनक खबर ससर क जात , तो वे सरकारी ोपगंडा को छापने क बजाय अखबार के प े खाली छोड़ देते। उ ह ने बड़ी होिशयारी से िवदेशी अखबार म हंद ु तान के बारे म छपी खबर को अपने अखबार म छाप दया। ऐसी खबर का शीषक ‘ यूज डाइजे ट’ या फर ‘हमारे समकालीन या कहते ह’ इ या द होता।29 इसम कोई दो मत नह क आपातकाल के दौरान ापक सार वाले अखबार सबसे यादा दमन के िशकार ए। ले कन सरकार ने कम सार वाली वैचा रक पि का को भी नह ब शा। द ली से छपने वाली दो िति त पि काएं मेन ीम और सेिमनार सरकार के सामने झुकने क बजाय बंद हो ग । मेन ीम सा ािहक पि का थी जब क सेिमनार मािसक। बंबई से िनकलने वाली सा ािहक िह मत ने आपातकाल का जोरदार मुकाबला कया, ले कन आिखरकार उसे भी बंद होना पड़ा। िह मत को अपने ‘अ छे आचरण के िलए’ एक मोटी रकम बतौर गारं टी देने को कहा गया य क उसने अपने कसी लेख म अ य लोग के साथ महा मा का कह िज कया था। कई सािहि यक पि काएं भी बंद हो ग , य क हालात ऐसे हो गए थे क आजादी के साथ अपने िवचार को अिभ कर पाना मुि कल हो गया था। कई अथ म सरकार लघु पि का से यादा ही भयभीत थी। उनके मािलकान को नह खरीदा जा सकता था। उ ह िसफ धमकाया जा सकता था या नह तो दीवािलया बनाया जा सकता था। इन अखबार म चार प े का एक अखबार ओिपिनयन भी शािमल था, िजसे एक पूव आईसीएस ए.डी. गोरे वाला िनकाल रहे थे। गोरे वाला बड़े ही मजबूत च र के इं सान थे और सरकारी अिधका रय ारा ि गत आजादी के हनन के को मुखता से उठाते थे। उ ह ने ाचार के िखलाफ भी एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। आपातकाल के एक साल बाद ओिपिनयन को बंद करने का आदेश दया गया ले कन गोरे वाला एक आखरी अंक िनकालने म कामयाब रहे िजसम उ ह ने िलखा क 26 जून, 1975 से चल रहा मौजूदा इं दरा शासन झूठ क िबनाह पर पैदा आ, झूठ के आधार पर आगे बढा और झूठ क िबनाह पर फला-फू ला है। इस शासन का मूलभूत त व ही झूठ है। नतीजतन, एक ऐसा अखबार जो हर स ाह इस शासन क खबर ले और इसके झूठ को उजागर करे , जो एक साफ सोच रखने वाला हो और स य से ेम करने वाला हो, इस शासन के िलए असहनीय हो गया है।30 V िजस दन आपातकाल क घोषणा ई, उस दन एक ि टश संवाददाता ने पाया क द ली क गिलय म स ाटा छाया आ है। कामकाजी लोग का झुंड अ य दन क तरह ही सवेरे-सवेरे साइ कल पर सवार होकर काम पर रवाना हो गया। सरकार के िखलाफ नारा लगाती कोई भीड़ जमा नह ई। दुकान और कारखाने अ य दन क तरह ही खुल गए। िभखारी वैसे ही भीख मांगते रहे। अमीर क जंदगी वैसे ही कटती रही।31 व र प कार इं दर म हो ा ने िलखा क आपातकाल के शु आती महीन म हंद ु तान म जो शांित थी, वो उसने बरस से नह देखी थी।32 वाकई यह प रवतन िपछले दशक से िब कु ल अलग था, जब मु क ने काफ उथलपुथल देखी थी। यह भी एक कारण था क देश के म यवग ने आपातकाल का वागत कया। देश म अपराध दर कम हो गई और रे लगाि़डयां समय से चलने लग । 1975 म मानसून अ छा रहा, इस वजह से खा ा क क मत भी नह बढ़ । एक अमे रक प कार को द ली म कसी सरकारी अिधकारी ने कहा क िसफ िवदेश म रहने वाले लोग ही ‘अिभ ि क वतं ता’ जैसी चीज म लगे रहते ह! उस अिधकारी ने कहा क हमलोग एक नाकामयाब लोकतं क उपािध हण करते-करते आिजज हो चुके ह। व आ गया है क अब हम आ थक िवकास के िलए अपने कु छ िनजी अिधकार का बिलदान दे द। उस अमे रक प कार ने पाया क हंद ु तान का कारोबारी वग आपातकाल से अमूमन खुश लग रहा था। द ली के एक होटल मािलक ने उससे कहा क जंदगी अब खूबसूरत हो गई है। पहले हम कमचारी संगठन क सम या का सामना करना पड़ता था, ले कन अब अगर वे कोई सम या खड़ी करते ह, तो सरकार उ ह पकड़कर जेल म डाल देती है। बंबई म वो प कार हंद ु तान के सबसे स मािनत उ ोगपित जे.आर.डी. टाटा से िमला। टाटा ने भी कहा क हालात म काफ सुधार है। टाटा ने कहा, ‘आप क पना नह कर सकते क हम कन हालात से गुजरे ह। पहले अ सर हड़ताल, बिह कार और दशन आ करते थे। हालत तो यहां तक खराब थी क म अपने कायालय से गली म नह िनकल सकता था। संसदीय व था हमारी ज रत के िहसाब से सही नह है।’33 म यवग का आपातकाल से कोई खास नाराज नह होने का एक सबूत ये भी है क इसके िखलाफ कसी भी सरकारी अिधकारी ने इ तीफा नह दया। गांधीजी ने जब ि टश शासन के िखलाफ असहयोग करने का आ नान कया था, तो हजार सरकारी नौकर ने अपने पद से इ तीफा दे दया था। उनम िश क, वक ल, जज यहां तक क आईसीएस आॅ फसर भी शािमल थे। ले कन आपातकाल के मामले म लोकतं के खा मे का िवरोध महज कु छ मु ीभर लोग ारा कया जा रहा था, जो सरकार क सेवा म थे। इन लोग म फली नरीमन और एम.एल. दंतवाला जैसे लोग शािमल थे। नरीमन ने अित र सोिलिसटर जनरल के पद से इ तीफा दे दया और दंतवाला ने रजव बक म सलाहकार बनना वीकार नह कया। एक बागाराम तुलपुले नाम के अिधकारी भी थे, िज ह ने कसी बड़े सरकारी उप म म ऊंचा ओहदा ठु करा दया। हालां क संसद म इसका िवरोध ज र आ। 23 जुलाई को आपातकाल को बढ़ाने के िलए संसद क बैठक बुलाई गई। सदन म कां ेस का ब मत था और 34 सांसद जेल म भी थे। िजन िवप ी सांसद को सदन म भाग लेने क इजाजत दी गई थी, उ ह ने पहले इसके िवरोध म भाषण दया, फर सदन का बिह कार कर दया। सीपीएम सांसद ए.के . गोपालन ने कहा क सांसद क िगर ता रय से सदन एक मजाक और अपमान क व तु बनकर रह गई है। जनसंघ के एक सांसद ने ीमती गांधी पर अपने िनजी फायद के िलए अपनी ‘मातृभूिम से ग ारी’ करने का आरोप लगाया।34 बाद म या तो िवप ी सांसद ने सदन का बिह कार या फर उ ह जेल म डाल दया गया। ले कन एक िनदलीय सांसद आिखर तक सदन क कारवािहय म िह सा लेता रहा। वे थे अहमदाबाद के सांसद पी.जी. मावलंकर, जो पेशे से एक राजनीित िव ानी थे और पहली लोकसभा के अ य जी.वी. मावलंकर के बेटे थे। उनक पृ भूिम क वजह से सरकार उ ह िगर तार करने क िह मत नह जुटा पाई। इसिलए वे संसद आते रहे और जब भी उ ह बोलने का मौका िमलता, वे भारतीय रा वाद के तीन पुरोधा टैगोर, गांधी और नेह क उि य का उदाहरण देते। वे इन तीन नेता क उि य का उदाहरण ‘अिभ ि क आजादी और ि गत वतं ता’ के संदभ म देत।े उन तीन नेता क उि यां मीसा जैसे दमनकारी कानून क तुलना म िब कु ल उलट थ , जो एक अिधनायकवादी सरकार के राजनीितक िहत को साधने के िलए बनाई गई थ । मावलंकर क राय म यह एक ऐसा कानून था, जो भारत के समसामियक इितहास म सबसे खतरनाक था।35 अब देश के अ य भाग म भी िवरोध होने लगे थे। लोग ने सड़क पर और गिलय म िवरोध करना शु कर दया था। 14 नवंबर, 1975 को जवाहरलाल नेह के ज म दन पर लोकसंघष सिमित नाम क एक सं था ने बंबई म स या ह शु कया। हरे क दन एक नया ज था शहर के एक त चौराहे पर िवरोध करने आता और ‘तानाशाही मुदाबाद, जेपी जंदाबाद’ के नारे लगाता। एक महीने के अंदर 146 मिहला समेत 1359 लोग िगर तार कए गए। यह िवरोध दूसरे रा य म भी फै ल गया, जहां रे लवे टेशन, बस टड और अ य सरकारी कायालय नारे बाजी के अ म त दील हो गए। लोग वहां िगर तारी देते। एक खबर के मुतािबक स या ह शु होने के तीन महीन के भीतर कम से कम 80,000 लोग को पकड़कर जेल म बंद कर दया गया।36 15 अग त, 1976 को वतं ता दवस के अवसर पर दूसरा स या ह शु आ। यह स या ह मनीबेन पटेल के नेतृ व म शु आ, जो भारत के पहले गृहमं ी व लभभाई पटेल क बेटी थी। 50 स या िहय का ज था अहमदाबाद से डांडी रवाना आ। यह वही सड़क थी, जहां कभी महा मा गांधी ने 46 बरस पहले नमक कानून तोड़ने के िलए डांडी या ा क थी। स या ही ‘आपातकाल हटाओ’ और ‘राजनीितक कै दय को मु करो’ जैसे नारे लगा रहे थे। एक मील के भीतर ही मनीबेन को िगर तार कर िलया गया ले कन अगले ही दन अदालत ने मनीबेन को रहा कर दया। मनीबेन ने लगातार समु तक क अपनी या ा क । उनके साथ कु छ पुिलसवाले भी सादे कपड़ म या ा कर रहे थे।37 िजन लोग को बंबई म िगर तार कया गया, उनम मराठी के एक मश र लेखक दुगा भागवत भी थे। लेखक समुदाय के दूसरे लोग ने भी अपने तरीके से आपातकाल का िवरोध कया। क ड़ लेखक के एक समूह ने गु प से आपातकाल और इसके मु य सू धार के िखलाफ हा य- ं य क किवता िलखकर जनता म चार कया। जी.एस. िशव पा ने ‘इस देश म’ नाम क एक किवता िलखी। किवता कु छ यूं थी इस देश म, वीर पूजा, प रवार पूजा ख म होनी चािहए ले कन मेरी कु लदेवी क तरफ कोई आंख न उठाए इस देश म हरे क को अपना मुंह बंद रखना चािहए ले कन उ ह मेरे श द को सुनने के िलए अपने कान खुले रखने चािहए।38 दूसरे लेखक ने दूसरे तरीक से अपनी असहमित क । बंगाली िनबंध लेखक आनंद शंकर रे ने घोषणा क वे और उनके िम का समूह आपातकाल के िवरोध म अपना ‘लेखन काय’ छोड़ देगा। उ ह ने आपातकाल लागू रहने तक कलम छू ने से इं कार कर दया। काटू िन ट के . शंकर िप लई, िज ह ने कभी बड़े ही मजा कया और ं यपूण तरीके से नेह के खुलकर बोलने क आदत क तुलना िनया ा जल पात से क थी (इसके िलए उ ह नेह से तारीफ भी िमली थी), ने अपनी पि का बंद कर दी। ऐसा उ ह ने सरकारी आदेश िमलने से पहले कर दया। उ ह ने बड़े दुख के साथ ट पणी क क ‘तानाशाही हा य ं य बदा त नह ’ कर सकती। उ ह ने कहा क ‘िहटलर के पूरे शासनकाल के दौरान जमनी म अ छे हा य नाटक, अ छे काटू न और अ छे ं य लु ही हो गए।’ हंदी के सािह यकार फणी रनाथ रे णु ने सरकार को प श◌ ी क उपािध लौटा दी। उनका यह काम गु देव रव नाथ टैगोर क याद दलाता था, जब उ ह ने जिलयांवाला बाग कांड के िवरोध म ि टश सरकार को नाइट ड क उपािध लौटा दी थी। क ड़ सािह यकार िशवराम कारं थ ने सरकार को प श◌ ी से भी बड़ी उपािध प भ◌ूषण लौटा दी। बीस के दशक म कारं थ गांधीजी क ेरणा से आजादी क लड़ाई म कू दे थे ले कन अब उन मू य को पचास साल तक जीने के बाद उ ह ने महसूस कया क भारत क जनता के साथ कए जा रहे इस अ याय का िवरोध करना चािहए।39 इसके अलावा भूिमगत तरीके से भी आपातकाल का िवरोध कया जा रहा था। इसके मु य सू धार थे उ समाजवादी नेता जाॅज फनािडस, िज ह ने 1974 क रे लवे हड़ताल का नेतृ व कया था। जब आपातकाल क घोषणा क गई उस व फनाडीस उड़ीसा के गोपालपुर शहर म थे। गोपालपुर समु कनारे ि थत था। वह कु छ स ाह तक छु पे रहे और जब उनक दाढ़ी उग आई तो वे एक िसख के प म कट ए। इसके बाद उ ह ने शहर-दर-शहर दौरा कया और अपने सािथय से िमलते रहे। उनक योजना थी क कसी भी तरह रा य के स ातं को ठ प कर दया जाए। इसके िलए डायनामाइट जमा कया गया और नौजवान को रे लवे पट रय और पुल को उड़ाने का िश ण दया गया। हर रोज अपने बदलते ठकान से ही फनािडस अपने सािथय को प िलखते और उनसे अपील करते क वे उस तानाशाह औरत और नेह खानदान को ‘उखाड़ फकन’ के िलए उठ खड़ ह । हालां क इनम से कोई डाइनामाइट फट नह पाया, ले कन भारत सरकार इस बात से खफा थी क वह फनाडीस को पकड़ नह पा रही है। उनके भाई लाॅरस को पुिलस ने बंगलौर ि थत उनके घर से उठा िलया और बबरतापूवक उनक िपटाई क गई। उनक िम अिभने ी ेहलता रे ी को भी पुिलस ने जेल म बंद कर दया। जेल क यह कोठरी नम और एकांत थी, जहां उनके खाने-पीने क कोई उिचत व था भी नह थी। ेहलता रे ी अ थमा क मरीज थ । इस यातना ने उनक बीमारी और बढ़ा दी और उ ह पेरोल पर छोड़ना पड़ा। पर कु छ ही दन के बाद उनक मौत हो गई। जाॅज फनाडीस क प ी और ब े इस डर से िवदेश भाग गए क अगर वे यहां रहे तो उ ह भी पुिलिसया यातना से गुजरना होगा। आिखरकार 10 जून, 1976 को कलक ा म फनाडीस को भी िगर तार कर िलया गया। तब तक आपातकाल को एक साल बीत चुका था।40 सरकार के बल िवरोिधय म एक थे जे.बी. कृ पलानी। 1976 क ग मय म कृ पलानी क उ न बे के करीब थी ले कन वह अभी भी सरकार के िखलाफ मोचा खोले ए थे। उ ह ने िशकायत क उनके सारे सािथय को ‘जेल का सुख’ नसीब हो रहा है जब क सरकार ने उ ह बाहर छोड़ रखा है। उ ह ने एक संधी कहावत को याद करते ए ं य कया क ‘डायन भी एक घर छोड़ देती है।’41 2 अ टू बर, 1975 को महा मा गांधी के ज म दवस पर कृ पलानी ने गांधीजी क समािध पर एक ाथना सभा का आयोजन कया, िजसम कई लोग ने भाषण दया। पुिलस ने कई लोग को िगर तार कर िलया ले कन कृ पलानी को िगर तार नह कया गया। उनक उ को देखते ए नह बि क िवराट ि व के कारण सरकार उ ह िगर तार करने क िह मत नह जुटा पाई। आजादी क लड़ाई म उनके योगदान और रा भि के तमाम पैमान पर िशवराम कारं थ, मोरारजी देसाई यहां तक क जेपी भी उनके सामने कह नह ठहरते थे। 1917 के चंपारण स या ह के समय से ही वे गांधीजी के साथ जुड़े ए थे। उसके ब त बाद जवाहरलाल नेह महा मा गांधी के साथ जुड़।े तीन दशक बाद जब देश को आजादी नसीब ई तो कृ पलानी उस समय कां ेस पाट के अ य का ओहदा संभाल रहे थे। उसके बाद तीन अलग-अलग रा य से लोग ने उ ह चुनकर लोकसभा भेजा था। कु ल िमलाकर उनक पृ भूिम, उनका ि व और उनका योगदान इतना ापक था क धानमं ी भी उनपर ‘देश क एकता को भंग करने का’ आरोप लगाने से पहले हजार बार सोचती। अ ैल, 1976 म कृ पलानी ने सरकार को चुनौती दी क उन लोग के नाम बताए जाएं, िज ह िगर तार कया गया है। उसके बाद वे गंभीर प से बीमार पड़ गए। उ ह अ पताल म भत कया गया और उनके शरीर म तरह-तरह क नली, तार और अ य उपकरण लगा दए गए। जब उनका एक िम उनसे िमलने आया तो कृ पलानी ने नई िशकायत क , ‘मेरे पास कोई संिवधान नह है, मेरे पास तो बस संशोधन ही संशोधन ह।’42 VI आपातकाल ने इस बहस को फर से जंदा कर दया क या हंद ु तान कभी वा तिवक अथ म लोकतांि क हो पाया या भिव य म हो पाएगा? या इसे लोकतांि क होना चािहए? अ टू बर, 1975 म टाइम पि का के एक संवाददाता ने हंद ु तान का दौरा कया और उसने जो कु छ भी देखा उससे काफ भािवत आ। उसने पाया क ेस क आजादी या अ य दूसरी बात हंद ु तान क 60 करोड़ जनता के िलए ब त मायने नह रखती थ । वे लोग इससे यादा मु ा फ ित क घटती दर से खुश थे (जो क िपछले साल क तुलना म 31 फ सदी नीचे आ गई थी)। उस संवाददाता ने िलखा क ‘ धानमं ी ने सामािजक े म कई सुधार करके जनता के बड़े िह से का समथन हािसल कर िलया है। पूरे देश म इन दन अनुशासन, व छता, समय क पाबंदी और अ छे आचरण के िलए आ ामक अिभयान चलाया जा रहा है।’43 कम से कम कु छ लोग तो ऐसे ज र थे जो सरकार के इन नार और उि य को गंभीरता से ले रहे थे। टाइम के रपोटर को ऐसा लगा क लोकतं भारत के िलए उपयु नह है, वह िसडनी मो नग हेरा ड ने िलखा क हंद ु तान जैसे देश म जो एिशया म ही नह बि क िवकासशील देश म लोकतं क मुख उ मीद थी, लोकतं ख म हो गया है। अखबार ने िलखा क अगर भारत भी अ य एिशयाई देश क तरह तानाशाही क राह पर कदम रखता है तो इसक िज मेदारी सा ा ी इं दरा और उनके िपता पंिडत नेह को उठानी होगी, िज ह ने भारतीय उ मशीलता के माथे पर सोिवयत तज पर ‘समाजवाद के बहाने’ भारी औ ोगीकरण और सरकारीकरण थोप रखा है। अखबार ने आगे िलखा उस समाजवाद को कामयाब बनाने के िलए नेह क बेटी ने इसम सोिवयत संघ क तरह राजनीितक तानाशाही भी थोप दी है।44 उ मीद के मुतािबक ही भारत बनाम लोकतं के पर ि टश ेस म काफ जोरशोर से बहस ई। इं लड का राजनीितक वग इस मु े पर िवभािजत था। कु छ सांसद ने ‘ जेपी अपील’ पर ह ता र कए थे जब क कई दूसर ने इं दरा गांधी क सरकार का समथन कया था। इनम लेबर सांसद माइकल फू ट (इस आधार पर क नेह क बेटी गलती कर ही नह सकती) जेनी ली और टोरी नेता मारगेट थैचर अहम थी। इनम से अंितम दोन नेता ने भारत क या ा क थी और उनका आंकलन ये था क कु ल िमलाकर आपातकाल भारत क जनता के िलए सही है। अपनी भारत या ा के दर यान कां ेस नेता से बातचीत करने के बाद कं जरवे टव सांसद ए डन ि फथ ने द टाइ स को िवरोध म एक िच ी िलखी क हंद ु तान म आपातकाल ‘उतना दमनकारी’ नह है िजतना अखबार ने छापा है। ि फथ ने ये भी कहा क इं लड क वे टिमिन टर माॅडल क सरकार गैर-पि मी देश के िलए उपयु नह है। इस पर ड यू.एच. मो रस जाॅ स ने ं य म िलखा क इस तरह का सरलीकरण एक ऐसा खेल है िजसका धुर सा ा यवादी टोरी और ांितकारी मा सवादी दोन ही समान प से आनंद उठाते ह। आपातकाल से पहले देश म पांच आम चुनाव सफलतापूवक करवाए जा चुके थे और एक वतं ेस काम कर रहा था। साथ ही देश म कई वाय सं थाएं सफलतापूवक काम कर रही थ । ऐसे म आपातकाल ने दो दशक से चले आ रहे वतं राजनीितक जीवन को भारी ित प च ं ाई, जो अब आम जनजीनव का अंग बन चुका था।45 ले कन अब भिव य म या होने वाला था? आपातकाल क पहली वषगांठ पर आंकलन करते ए आॅ जवर ने िलखा क देश म सतह के नीचे ब त बड़ा आंदोलन पनप रहा है। अखबार क राय म एक खराब मानसून पहले से ही अ त त अथ व था को तबाह कर देगा और इससे महंगाई बढ़ जाएगी जो आंदोलन क आग को और भड़काएगी। अखबार ने दावा कया क इससे पैदा होने वाला जना ोश जून, 1975 के जनांदोलन से भी भयंकर होगा। आॅ जवर क राय म इसका एक संभािवत प रणाम यह हो सकता है क देश फर से लोकतं क राह पर लौट आए, य क अभी तक कां ेस पाट क सबसे बल संभािवत उ रािधकारी सेना ही है।46 VII आॅ जवर ने गलती ये क उसने ि य के बजाय सं थान पर यादा यान क त कर दया। य क भारत के अंदर ही लोग सेना को कां ेस का उ रािधकारी नह समझ रहे थे, बि क धानमं ी के दूसरे बेटे को ीमती गांधी का सबसे बल उ रािधकारी समझा जा रहा था। याद क िजए ये संजय गांधी ही थे, िज ह ने अपनी मां को इ तीफा देने से मना कया था और वे आपातकाल के सबसे बल पैरोकार म से एक थे। आपातकाल के पहले ही महीने म संजय गांधी का जलवा कायम हो गया। उ ह अ सर ीमती गांधी के साथ देखा जाता और अ सर वे अपनी मां को मंि मंडल म िनयुि जैसे मसल पर राय देते। जब इं कु मार गुजराल ेस के ित यादा उदार दखने लगे तो उनको हटाकर वी.सी. शु ला जैसे नेता को सूचना सारण मं ी बना दया गया। शु ला आई.के . गुजराल क तुलना म यादा कठोर और यादा कड़क नेता थे। नेह के मंि मंडल म काम कर चुके अनुभवी नेता वण संह को हटाकर संजय गांधी के नजदीक माने जाने वाले बंसीलाल को र ामं ी बना दया गया। वण संह आपातकाल लागू करने को लेकर ब त उ साही नह थे।47 आपातकाल लागू होने के छह स ाह बाद संजय गांधी ने द ली क एक पि का सज को लंबा सा ा कार दया। इस सा ा कार म उ ह ने अपनी जंदगी के िनजी पहलु पर िव तार से चचा क , मसलन क वे शराब नह पीते या िसगरे ट नह पीते। उ ह ने अपनी मां से अपने संबंध पर भी चचा क और वीकार कया क हां उनक मां उनक बात मानती ह। (‘हां, वो आव यक प से मेरी बात मानती ह, म जब 5 साल का था तब भी वो मेरी बात मानती थ ...’) संजय गांधी ने अपने काम के बारे म भी चचा क क वे 12 से 14 घंटे काम करते ह और ये भी क वे एक ऐसी कार बनाने वाले ह, जो ब त ज दी ही फएट और ए बे डर को बाजार से बाहर कर देगी (वे दो कार िजनका उस समय भारतीय बाजार पर क जा था)। उ ह ने कहा क वे मु बाजार व था के समथक ह और यही ऐसी व था है, िजसम हम तेजी से तर कर सकते ह। संजय गांधी ने कहा क सरकार को उ ोग पर से सारे ितबंध को हटा लेने चािहए क कहां, कब और कै से कोई उ ोगपित कोई कारखाना लगाना चाहता है। लोकतं के बारे म जब उनसे पूछा गया तो उनका कहना था क इसका ये मतलब नह क कोई कसी भी चीज को इस देश म अपनी मज से बबाद कर दे। संजय गांधी ने कहा क लोकतं का मतलब है अपने देश के ‘िनमाण क आजादी’। कां ेस के बारे म पूछे जाने पर उ ह ने कहा क इसे ‘कै डर आधा रत’ पाट होना चािहए। जब सा ा कार लेनेवाले ने इशारा कया क जनसंघ और क युिन ट दोन ही कै डर आधा रत पा टयां ह तो संजय गांधी ने जनसंघ को ‘फायदे के आधार पर’ बनी पाट बताकर खा रज कर दया। क युिन ट पाट के बारे म संजय गांधी क राय थी क अगर आप उस पाट के सारे लोग क बात कर या िसफ बड़े नेता या म यम ेणी के नेता क भी बात कर, तो आपको उनसे अमीर या लोग और कह नह िमलगे।48 सज एक नई पि का थी और उसम संजय गांधी का यह सा ा कार कसी धमाके से कम नह था। पि का के संपादक ने आनन-फानन म उस सा ा कार को कई दूसरे एजिसय को बेच दया, िजसने इसे देश-िवदेश के कई अखबार को बेचा। इन अखबार ने संजय गांधी के मु बाजार व था पर क गई उनक राय को मुखता से छापा, जो उनक मां के समाजवादी िवचार से िब कु ल उलट थे। इसके अलावा ीमती गांधी के िव त सहयोगी क युिन ट को संजय गांधी ने अपने सा ा कार म ‘ ’ कहा था, उसे भी मुखता से छापा गया। जब यह सा ा कार छपा तो धानमं ी सकते म आ ग और अपने सिचव पी.एन. धर को मामला रफा-दफा करने को कहा। धानमं ी क राय म संजय गांधी का यह सा ा कार ‘बकवास’ था। उनक राय म उनके बेटे का यह सा ा कार िसफ उ ह लोग को तकलीफ नह प च ं ाएगा, िज ह ने उ ह समथन दया है बि क यह पूरे समाजवादी खेमे म ‘गंभीर संकट’ पैदा कर सकता है। धर तुरंत स य ए और ितपू त करने म भरसक कामयाब रहे। आगे ेस म कु छ भी नह छपा और सज को सा ा कार के दूसरे अंश छापने से रोक दया गया। संजय गांधी को एक बयान देने पर राजी कर िलया गया, िजसम उ ह ने कहा क जनसंघ के नेता क युिन ट से भी यादा ह और क युिन ट क इस बात के िलए तारीफ क जानी चािहए क उ ह ने ीमती गांधी क ‘ गितशील नीितय खासकर गरीब के िहत म बनाई गई नीितय ’ का समथन कया है।49 हालां क इतना होने पर संजय गांधी ने सा ा कार देना बंद नह कया। जब इ ेटेड वीकली आॅफ इं िडया ने उनसे प का रता पर अंकुश के बारे म सवाल कया तो उ ह ने कहा क ेस लगातार दु साहसी प से अपमानजनक और झूठी खबर छाप रहा है और िसफ ससरिशप ही एक तरीका है, िजससे इस पर रोक लगाई जा सकती है। जब उनसे आपातकाल क उपलि धय के बारे म सवाल कया गया तो उनका कहना था क सबसे बड़ी उपलि ध ये है क लोग म अनुशासन क भावना बढ़ी है और काम करने क र तार तेज ई है। पि का ने अगला सवाल कया क आपातकाल से देश ने या खोया है, तो संजय गांधी ने जवाब दया क आपातकाल से देश ने कालाबाजारी, जमाखोरी, बस को जलाए जाने क घटना और काम पर देर से प च ं ने क अपनी 50 आदत खोई है। उस स ािहक के संपादक खुशवंत संह, संजय गांधी के सबसे बड़े शंसक बनकर उभरे । संजय गांधी के बारे म ये कहा गया क यह वो आदमी है, जो ‘काम करवाने का मा ा’ रखता है और उ ह इं िडयन आॅफ द ईयर के िखताब से नवाजा गया। इल ेटेड वीकली ने संजय गांधी और उनक नविववािहता मेनका गांधी पर िव तृत फ चर छापा, िजसम बड़े ही खूबसूरत वा य के साथ प े दर प े उनक त वीर छापी ग (उदाहरण के िलए - उनम ितब ता है, याय क भावना है, जोिखम उठाने क मता है और उनम डर नाम क चीज ही नह है। संजय गांधी ने राजनीितक नेतृ व म नया आयाम जोड़ा है। वह दोहरे च र या चमचे क म के आदिमय को पसंद नह करते। वह शराब नह पीते, वह सादा जीवन जीते ह। उनके श द िसफ हवाहवाई नह होते बि क गितिविधय से भरपूर होते ह)।51 सरकार ारा िनयंि त आॅल इं िडया रे िडयो और दूरदशन ने धानमं ी के बेटे को अपने सारण म जबद त जगह दी। इसम ता ुब क अब कोई बात भी नह थी। आॅल इं िडया रे िडयो के द ली टेशन से ही एक साल के अंदर संजय गांधी पर 192 खबर चलाई ग । इसके अलावा उसी अविध म दूरदशन ने संजय गांधी क गितिविधय पर 265 खबर चला । जब संजय गांधी ने आं देश का दौरा कया तो सूचना सारण मं लय के तहत आने वाले फ म िडिवजन ने उन पर एक पूरी डाॅ यूम ी बना दी। उस डाॅ यूम ी का नाम था ‘ए डे टु रमे बर’ । इस डा यूमं◌े ी म तीन भाषा म कम ी क गई।52 संजय गांधी क बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा सबूत था, उनके ित क ीय मंि य और मु यमंि य का सम पत वहार। नौसेना के कन दो एडिमरल म से एक को पदो ित देनी है, इसका फै सला करने से पहले र ामं ी बंसीलाल उन उ मीदवार को संजय गांधी के सामने ले जाते, जहां उनका सा ा कार होता। जब संजय गांधी ने राज थान का दौरा कया, तो वहां के मु यमं ी उनक अगुआई करने हवाई अ े तक आए। संजय गांधी ने जब जयपुर म वेश कया, तो उ ह ने 501 तोरण ार को पार कया, जो उनके वागत म लगाए गए थे। ऐसा ही तब आ जब संजय गांधी ने उ र देश का दौरा कया। हवाई अ े पर उनके पैर से उनक च पल िनकल गई, तो इसे वहां के मु यमं ी ने अपने हाथ से उठाया और संजय गांधी को पहना दया।53 VIII कभी ीमती गांधी ने पूव राजा-महाराजा को ज म क बजाय कम क बदौलत ित ा पाने क नसीहत दी थी। ले कन अब अपनी उसी नसीहत के सामने उ ह ने घुटने टेक दए थे। उनके बेटे क तर उसी सामंती और वंशवादी रा ते से ई थी। िजस तरह एक युवराज को कसी खास जगह के ूक ( ूक आॅफ...) या कसी खास जगह के ंस ( ंस आॅफ...) क पदवी दी जाती है उसी तरह संजय गांधी को कां ेस क युवा शाखा का भारी बना दया गया (हालां क सै ांितक प से संजय गांधी उस संगठन के कायकारी सिमित के सद य भर थे ले कन वहार म युवा कां ेस का अ य उनसे आदेश लेता था)। िजस तरह मुगल शहजाद को स ा संभालने से पहले कसी न कसी सूबे का सूबेदार बना दया जाता था, उसी तरह से संजय गांधी को भारत क राजधानी का भार स प दया गया। आपातकाल लगने के कु छ ही महीन के भीतर यह बात पूरी तरह से चा रत हो गई क धानमं ी खुद ही चाहती ह क द ली का मामला उनका बेटा ही देख।े 54 अब तक संजय गांधी ने अपनी मां के बीस सू ी काय म को पूण प से लागू करने के िलए अपना एक पांच सू ी काय म तैयार कर िलया था। इन काय म म प रवार िनयोजन, वृ ारोपण, दहेज था उ मूलन, िनर रता िमटाओ अिभयान और झु गीझोपड़ी हटाओ अिभयान अहम थे। इन सारे काय म म रा ीय तर पर मु य जोर प रवार िनयोजन पर था जब क द ली के मामले म सबसे यादा जोर झु गी-झोपड़ी हटाने पर था। पूरी राजधानी म जगह-जगह झु गी-झोपि़डयां थ , िजनम कम आमदनी वाले लोग रहते थे। ये लोग रहायशी काॅलोिनय म या सरकारी कमचा रय के घर म काम करके अपना गुजारा करते थे। इन झु गी-झोपि़डय म मेहतर, र शाचालक, घरे लू नौकर, कायालय म काम करने वाले लोग और उनके प रवार रहते थे। द ली म इस तरह क करीब सौ बि तयां थ , िजनम लगभग पांच लाख लोग रहते थे।55 संजय गांधी चाहते थे क शहर से ये झुि गयां हटा दी जाएं और उ ह यमुनापार के खेत म बसा दया जाए। उनका यह िवचार जगमोहन से काफ मेल खाता था। जगमोहन द ली िवकास ािधकरण के उपा य थे और काफ मह वाकां ी क म के ि थे। बेरन हाउसमैन, जगमोहन के आदश थे। जगमोहन वही काम करना चाहते थे जो हाउसमैन ने कभी पे रस के िलए कया था। झु गी-झोपि़डय को हटाकर और शहर म खुल-े हवादार इलाक का िनमाण कर हाउसमैन ने पे रस क कायापलट कर दी थी। एक जमाने का ‘कु प और गंदा शहर’ अब ऊजा से लबरे ज, शानदार और गितशील ‘सां कृ ितक शहर’ बन चुका था। अपने कामकाज म जगमोहन िब कु ल तानाशाह थे। वह उस अंदाज के कायल थे, जो चीनी क युिन ट ने शंघाई के िलए अपनाया था। यह उनके कु छ बयान से प है। वह कहते थे क उनका काम एक मजबूत रा ीय नीित और ितब ता से े रत है जब क भारत म काम करने क र तार अभी भी ब त धीमी है। जगमोहन ने एक बार कहा था क म कोई हाउसमैन का अवतार नह ,ं न ही संयोग से म ल टयंस ं म कोई काबूिजयर भी नह िजसके पीछे नेह का वरदह त था। म तो एक साधारण आदमी ं म इन गिलय का अनाथ .ं .. फर भी इतने बंधन के बावजूद म तनकर खड़ा ं म दनरात काम करता ं और काम के ित सम पत ,ं म हालत से लड़ने का इ छु क ,ं म सपना देखना चाहता .ं ..56 ये पंि यां आपातकाल से पहले 1974 म िलखी गई थ । एक साल के बाद जगमोहन को बंधन से मु करने के िलए देश के राजनैितक पटल पर संजय गांधी का आगमन आ। नगर िनयोजनकता के प म जगमोहन इन झु गी-झोपि़डय से एक अरसे से परे शान थे, जो द ली को एक ‘बीमार और आ मािवहीन’ शहर बना रही थ । इसे साफ-सुथरा करने के अिभयान म जगमोहन क राह म लोकतांि क याएं बड़ी बाधा थ । उ ह हर घड़ी सरकार से वीकृ ित लेनी होती, पुनवास क योजना बनानी होती और जनता के ितिनिध राजनीितक कायकता से समझौता करना होता। जगमोहन उस चौकड़ी के मुख सद य थे, जो संजय गांधी के इद-िगद पनप गया था। इस चौकड़ी के दूसरे सद य म द ली के उपरा यपाल के सिचव नवीन चावला और एक आईपीएस अिधकारी पी.एस. भंडर भी अहम थे। मिहला म, युवा कां ेस क अ य अंिबका सोनी और द ली क समाजसेवी खसाना सु ताना अहम थ , िज ह ने संजय गांधी के साथ काम कया था। खसाना सु ताना द ली म बड़े लोग क मह फल म आकषण का खास क आ करती थी। वह झु गी-झोपड़ी वाल के िलए संजय गांधी क अनौपचा रक ितिनिध थी। हरे क सुबह यह समूह संजय गांधी के कायालय म जमा होता। वहां से आव यक आदेश िलया जाता और गित रपोट स पी जाती। इसके अलावा इस बैठक म धानमं ी के टेनो ाफर आर.के . धवन भी होते जो भारत सरकार और इस समूह के बीच पुल का काम करते थे। इस चौकड़ी को ान देनेवाले एक लंबी दाढ़ी वाले वामीजी थे, िजनका नाम धीर चारी था। चारी का वेश धानमं ी आवास म बतौर योगगु आ था ले कन धीरे -धीरे उ ह ने संजय गांधी क नजदीक भी ा कर ली। धीर चारी एक हंद ू साधु क वेशभूषा म रहते थे और उनका िश ण भी वैसे ही आ था ले कन वे इतने आधुिनक थे क एक बंदक ू का कारखाना भी चलाते थे। इस चौकड़ी क खबर शहर म सबको थी और लोग अ सर धीमी आवाज म इसके बारे म बात कया करते। ऐसा कहा जाता था क अगर आपको कोई सरकारी काम करवाना है तो इस समूह के कसी आदमी से बात कर ल। िजन ापा रय को लाइसस लेना होता या टै स माफ करवाना होता या फर िजन सांसद को मं ी बनना होता वो इस चौकड़ी से संपक करता। दलच प बात ये थी क संजय गांधी के इन ‘पंजाबी मा फया’ सलाहकार और उनक मां के ‘क मीरी पंिडत’ सलाहकार म साफ फक था। पंजािबय म एक ‘अ खड़पन’ था जब क क मी रय का वहार ‘महीन और सधा आ’ होता था। हालां क दोन के काम करने के अंदाज म उतना फक नह था, िजतना उनके मंसूबे म। एक तरफ जहां क मीरी गुट अपने नेता के साथ-साथ समाजवादी िवचारधारा के ित भी ितब था, वह संजय गांधी के पंजाबी सलाहकार िसफ संजय गांधी के ित ितब थे।57 इसके अपवाद िसफ जगमोहन थे। द ली को साफ-सुथरा बनाकर सजाना-संवारना ब त पहले से उनके जीवन का ल य था। वह इस बात से खुश थे क धानमं ी का बेटा उनके काम का समथन कर रहा था। अब संजय का समथन और आपातकाल क छतरी ने जगमोहन के काम को एक तरह से वैधता ही दान कर दी। अब वे लोग को मनाने क बजाय जबद ती पर उता हो गए। अब खुलेआम द ली क झु गी-झोपि़डय म बुलडोजर घुस जाते, यहां तक क ेस क उपि थित से भी जगमोहन को कोई डर नह लगता। आपातकाल लगने से पं ह साल पहले तक डीडीए महज 60,000 झुि गय को द ली से हटा पाई थी जब क आपातकाल के पं ह महीन म ही यह तादाद दोगुनी से यादा प च ं गई।58 जगमोहन क गितिविधय का क पुरानी द ली का इलाका था, जहां घनी आबादी वाले मोह ल म म यकालीन मुगल मारक और मि जद मौजूद थे। इन इलाक म तंग गिलयां ह और मकान एकदूसरे से सटे ए ह। 13 अ ैल, 1976 क सुबह को एक बुलडोजर अ णा आसफ अली माग के पीछे तुकमान गेट के पास कट आ। यह वो इलाका है जो पुरानी द ली को नई द ली से अलग करता है। दो दन के भीतर हाल ही म बसी एक झोपड़प ी को तबाह कर दया गया, िजसम चालीस प रवार रहते थे। इसके बाद बुलडोजर प े मकान क तरफ मुड़ा, िजसक ऐितहािसकता के बारे म िनि त तौर पर कु छ नह कहा जा सकता था। इलाके के लोग ने अपनी सांसद सुभ ा जोशी से संपक कया। सुभ ा जोशी कां ेस पाट से ही थी और इं दरा गांधी क पुरानी करीबी थी। सुभ ा जोशी ने डीडीए अिधका रय से और खुद जगमोहन से इस बारे म बात क । हालां क इस बातचीत से यह अिभयान कु छ दन के िलए रोक दया गया ले कन फर कु छ दन के बाद शु कर दया गया। इस बार तीन बुलडोजर लगाए गए और ऐसा कहा गया क ये जगमोहन के आदेश पर लगाए गए थे। इन बुलडोजर ने करीब सौ मकान को तोड़ दया। इलाके म अफरा-तफरी मच गई। आिखरकार मिहला और ब का समूह बुलडोजर के सामने आकर खड़ा हो गया। जब लोग बुलडोजर के सामने से हटने को तैयार नह ए तो डीडीए ने पुिलस को बुला िलया। लोग के समथन म आसपास के दुकानदार ने अपनी दुकान बंद कर द । पुिलस ने लाठीचाज कया और लोग को हटाने क कोिशश क ले कन जब वे इसम नाकामयाब रहे, तो उसने आंसू गैस का योग कया। जवाब म लोग ने प थर फकना शु कर दया। पुराने शहर क तंग गिलय म लड़ाई फै ल गई। लोग क भीड़ बढ़ने लगी। अब पुिलस आंसू गैस के बदले गोली चलाने लगी। दन का अिधकांश िह सा शांित बहाली म बीत गया। एक आंकलन के मुतािबक इस झड़प म मरने वाल क सं या 10 से 200 के बीच थी। पुराने शहर म क यू लगा दया गया और करीब एक महीने बाद ही उठाया जा सका।59 द ली के बहादुरशाह जफर माग पर देश के मुख अखबार के द तर ह। यह जगह तुकमान गेट से एक मील से भी कम क दूरी पर है। ले कन फर भी आपातकाल के हालात म कसी भी अखबार ने इस खबर को छापने क जुरत नह क । हालां क भूिमगत आंदोलनका रय तक ये खबर प च ं गई और इसका खूब चार कया गया। यह खबर शेख अ दु ला तक भी प च ं ी, जो इस गोलीबारी से ‘अ यिधक पीि़डत’ ए। उ ह ने धानमं ी से इसक िशकायत क , जो उस इलाके का दौरा करने पर राजी हो ग । एक बड़े कां ेसी नेता के साथ अ दु ला ने पुराने शहर का दौरा कया और लोग से उनक तकलीफ सुन ।60 यहां अ दु ला को पता चला क लोग को इस घटना के साथसाथ िजस बात से यादा तकलीफ प च ं ी थी, वो था सरकार ारा चलाया जा रहा जबद ती प रवार िनयोजन अिभयान। यह अिभयान संजय गांधी के पांचसू ी काय म का अिभयान था। जून, 1976 म भूिमगत अखबार स य समाचार ने खबर छापी क शेख अ दु ला ने कां ेसी सांसदां◌े से ये कहा क असली सम या तब शु ई जब जवान, बुजुग और यहां तक क ब तक को पकड़कर जबद ती नसबंदी कर दी गई। अ दु ला ने कहा क धानमं ी क आ थक नीितय से कसी को िशकायत नह है, ले कन िजस तरीके से वे लागू क जा रही ह, मुझे पूरा यक न है इस वजह से एक दन ब त बड़ा तूफान आएगा।61 IX सचाई तो यह थी संजय गांधी ऐसे अके ले इं सान नह थे, िज ह देश क िवशाल और बढ़ती ई आबादी क चंता सता रही थी। आबादी बढ़ने और उसके प रणाम के बारे म मालथस क भिव यवाणी का भूत ब त दन से भारत का पीछा कर रहा था। यह इस कताब के िपछले प म पहले व णत कया जा चुका है। पि मी प कार ने भारत म बड़े पैमाने पर अकाल क भिव यवाणी क थी। वहां के जीविव ािनय ने भारत को पहले ही हर मोच पर खा रज कर दया था। ब त सारे भारतीय को भी ये चंता सता रही थी क बढ़ती ई आबादी से देश क सारी उपलि धय पर पानी फर जाएगा। 1857 से लेकर 1957 के बीच देश क सकल उ पादकता ठठक गई थी। ऐसे भी मौके आए थे, जब यह नकारा मक भी हो गई थी। आजादी के बाद देश क सकल रा ीय उ पादकता तीन फ सदी सलाना क दर से बढ़ी थी। हालां क आबादी वृि क ती र तार ने ित ि आय म महज एक फ सदी क बढ़ोतरी होने दी थी। देश म जनसं या वृि क बढ़ती दर पर आजादी के बाद से ही बहस चल रही थी। कई समाजसेिवय ने िमलकर साल 1949 म एक प रवार िनयोजन संघ क थापना क । 1950-51 म अपने गठन के साथ ही योजना आयोग प रवार िनयोजन के मह व के बारे म बताता आ रहा था। फर भी देश क सं कृ ित और लोग क आ थक ि थित बड़े प रवार के समथन म खड़ी थी। पूवा ह क वजह से लड़ कय को अभी भी ब ा पैदा करने क मशीन समझा जाता था। िश ा-दी ा देने म उनके साथ भेदभाव कया जाता था और प रवार म उ ह अभी भी एक कमाऊ सद य क हैिसयत ा नह थी। कृ िष पर लगातार िनभरता क वजह से भी प रवार म लोग यादा ब े चाहते थे। भारतीय मुसलमान और कै थोिलक को उनके धमगु प रवार िनयोजन से रोकते थे। दूसरी तरफ हंद ु म लड़ कय क तुलना म लड़कां◌े को यादा तरजीह दी जाती थी। वे तब तक ब ा पैदा करते रहते थे, जब तक कम से कम एक बेटा न हो जाए। सन् 1901 म भारत क आबादी 24 करोड़ थी, जो 1971 म बढ़कर 55 करोड़ हो चुक थी। इस अविध म ज मदर म थोड़ी सी कमी आई थी। ज मदर 50 ितहजार से घटकर 40 ितहजार रह गई थी ले कन मृ युदर इससे भी यादा तेजी से घटी थी। देश म मृ युदर 42 ितहजार से घटकर 1970 तक 15 ितहजार रह गई थी। िच क सा िव ान म उ ित और अ छे पोषण क वजह से अब नवजात िशशु का यादा दन तक जंदा रहना मुम कन हो गया था। पहले इन ब क ब त कम उ म ही मौत हो जाती थी। ले कन अभी भी ज मदर और प रवार का औसत आकार कम नह हो पा रहा था। इसिलए आबादी बढ़ती ही जा रही थी।62 यह अनुमान लगाना मुि कल है क प रवार िनयोजन के बारे म संजय गांधी क दलच पी कब शु ई। अग त 1975 म सज पि का म छपे उनके सा ा कार म इस बारे म कोई संकेत नह िमल पाया था। हालां क साल भर बाद इल ेटेड वीकली ने ज र इस बात को मुखता से छापा क संजय गांधी ने देश भर म प रवार िनयोजन पर यादा जोर दया है। संजय गांधी ने दावा कया क अगर उनके काय म को सही तरीके से लागू कया गया, तो हंद ु तान क पचास फ सदी सम याएं दूर हो जाएंगी। संजय गांधी ने खुद कहा क वे अिनवाय नसबंदी का समथन करते ह, िजसके िलए गांव तर तक सुिवधाएं मुहय ै ा क जानी चािहए।63 संजय गांधी के जीवनीकार के मुतािबक उनके पांचसू ी काय म म प रवार िनयोजन को छोड़कर अ य चार उबाऊ क म के काय म थे। उन काय म म ‘क र माई नेतृ व’ पैदा कर सकने के गुण नह थे। प रवार िनयोजन पर पूरी ताकत लगाई गई और सभी ने महसूस कया इस सम या का समाधान देश क समृि के िलए ही नह बि क अि त व के िलए भी ज री हो गया है। इस तरह प रवार िनयोजन, संजय गांधी के आपातकालीन गितिविधय का मु य क बंद ु बन गया।64 अपने देश ापी दौर म संजय गांधी अ सर एक रा य क तुलना दूसरे रा य से कया करते। वे कसी रा य के मु यमं ी से ये कहते क दूसरे रा य के मु यमं ी ने कस तरह महज दो स ाह के भीतर ही 60,000 आॅपरे शन करवाएं है और उ ह इस सं या से भी यादा करके दखाना चािहए। इस ल य को पूरा करने का आदेश िजलािधका रय तक िभजवाया गया। जो अपने ल य को पूरा करता या उससे भी बेहतर करता उसक पदो ित क जाती और जो इसम नाकामयाब होता, उसका तबादला कर दया जाता। इस या से देशभर म जबद ती आॅपरे शन करने क होड़ लग गई। िनचले दज के कमचा रय को अपना पुराना बकाया लेने से पहले नसबंदी करवानी पड़ती। क चालक को अपना लाइसस नवीनीकरण से पहले नसबंदी करवानी होती। ऐसा ही झु गी-झोपड़ी म रहने वाल को भी करना होता, अगर वे पुनवास के िलए जमीन लेना चाहते।65 इस काम म सरकार को शहर म अपे ाकृ त यादा कामयाबी िमली। हालां क गांववाल को भी नह ब शा गया। महारा के सतारा िजले का दौरा कर रहे एक मानविव ान शा ी ने पाया क आपातकाल लगने के पहले साल म इसे ब त कामयाबी नह िमली। बीससू ी काय म के तहत गरीब के िलए कु छ मकान बनाए गए। साथ ही तानाशाही के िखलाफ कु छ नारे भी कह -कह िलखे पाए गए। फर िसतंबर, 1976 म संजय गांधी के महारा दौरे के कु छ ही दन बाद गांव म अिनवाय नसबंदी का काय म शु कर दया गया। थानीय अिधका रय ने ‘यो य पु ष ’ क फे ह र त बनाई, िजनके पहले से ही तीन या चार ब े थे। पुिलस क गाि़डयां आत और उ ह पकड़कर नजदीक वा य क पर ले जात । कु छ पु ष इससे बचने के िलए पहाि़डय क तरफ भाग गए। िजनक पहले ही नसबंदी क जा चुक थी, वे इस पर बात करने से श मदगी महसूस करते।66 झु गी-झोपड़ी हटाओ अिभयान क तरह ही लोग ने नसबंदी का भी िवरोध कया। िसतंबर, 1976 म एक भूिमगत अखबार ने खबर छापी क द ली और उ र देश म जबद ती प रवार िनयोजन के िखलाफ लोग म गु से क लहर है। कई जगह वा य अिधका रय और दुकानदार के बीच नसबंदी को लेकर झड़प । उ र देश के कई शहर मसलन सु तानपुर, कानपुर और बरे ली से िवरोध क खबर आ । कू ल के िश क म इस बात को लेकर काफ नाराजगी थी, िज ह घर-घर जाकर नसबंदी के बारे म सव ण और लोग को मनाने का काम स पा गया था। कम से कम 150 िश क को सरकारी आदेश क अवहेलना के जुम म िगर तार कर िलया गया। तुकमान गेट से भी बुरी घटना मुज फरनगर म ई। मुज फरनगर, द ली से 70 मील उ र-पि म म ि थत है। वहां का िजलािधकारी अपने उ साह और सां दाियक मानिसकता क वजह से काफ कु यात था। उसके आदेश से पुिलस ने, िजनम हंद ु क सं या यादा थी, मुसलमान द तकार और मजदूर क नसबंदी करनी शु कर दी। 18 अ टू बर को सरकारी कमचा रय और लोग के बीच लड़ाई िछड़ गई। लोग आपे से बाहर हो गए और वा य क को जलाकर राख कर दया गया। लोग ने सरकारी कमचा रय पर बोतल और प थर से हमला कर दया। शासन ने पुिलस बुला ली और गोलीबारी म 50 से यादा लोग मारे गए। िवप ी सांसद का एक दल लोग से िमलने गया ले कन उ ह लोग से बात करने क इजाजत नह दी गई। हालां क फर भी ये खबर िवदेशी मीिडया के हाथ लग गई और धानमं ी को संसद म बयान देना पड़ा क मुज फरनगर कोई ‘घटना’ ई है।67 संजय गांधी के प रवार िनयोजन अिभयान के ता कािलक िशकार लोकि य महान गायक कशोर कु मार भी हो गए। नसबंदी के प म पैसा जुटाने के िलए अ य कई गायक और संगीतकार काय म करने पर राजी हो गए ले कन कशोर कु मार ने मना कर दया। नतीजतन कशोर कु मार को आॅल इं िडया रे िडयो के िविवध भारती काय म पर ितबंिधत कर दया गया। िविवध भारती पर फ मी गान का सारण कया जाता था। फ म ससर बोड को यह िनदश दया गया क िजन फ म म कशोर कु मार ने अिभनय कया है या गीत गाया है उसके रलीज होने पर पाबंदी लगा दी जाए। संजय गांधी के लोग ने रकाॅ डग कं पिनय को भी कशोर कु मार के गान को बेचने से हड़काया। कु ल िमलाकर कहा जाए तो यह इितहास के साथ एक ू र मजाक था।68 X धानमं ी ने अपने जीवन के अहम राजनीितक मोड़ पर िसफ संजय गांधी पर य भरोसा कया, यह बात ब त के गले नह उतरी। जब क उनके साथ पी.एन. ह सर और उनके कई सहयोगी मौजूद थे। ऐसा मानने वाल म उनके िनकट सहयोिगय क सं या भी काफ थी। इसके बारे म अलग-अलग लोग ने अलग तक दया। कु छ का मानना था क एक एकाक अिभभावक होने के नाते ीमती गांधी अपनी ह या को लेकर आशं कत थ , इसिलए वह िसफ अपने प रवार पर ही भरोसा कर सकती थ । कु छ ने कहा क संजय गांधी अपने मां के कई गु राज जानते थे, इसिलए ीमती गांधी उनके भाव म थ । कई लोग का कहना था क धानमं ी इसिलए संजय गांधी क बात मानती थ य क ये संजय ही थे िज ह ने आपातकाल लगाने के ताव का खुलकर समथन कया था। हालां क एक जीवनीकार या एक इितहासकार के िलए ये सब बात कोई मह व नह रखत । अहिमयत इस बात क नह है क ीमती गांधी ने अपने छोटे बेटे पर िनभर रहना यादा ज री य समझा, अहिमयत इस बात क है क उनक इस िनभरता का हंद ु तान और यहां के लोग के िलए या नतीजा िनकला। आपातकाल और संजय गांधी का राजनीितक उदय, ीमती गांधी के राजनीितक जीवन क प िवभाजक रे खा है। संजय गांधी के राजनीितक पटल पर आगमन से पहले ऐसा कहा जा सकता है क उ ह ने कई उ लेखनीय काम कए। उ ह ने चुनाव जीता, बंगलादेश का िनमाण करवाया, कां ेस पाट को पुनज िवत कया और अथ व था का पुनगठन करने के िलए साहसी कदम उठाए। ले कन संजय गांधी के गलत भाव म आकर वे बड़े सामािजक ल य को भूल ग और िसफ अपने प रवार और खुद के बारे म सोचने लग ।69 फर भी, अगर उनके पूरे कायकाल को संपूणता म देखा जाए तो संजय गांधी का राजनीितक उदय और आपातकाल उनके पुराने कायकाल का थान बंद ु नह था। यह तो उसको और भी मजबूती से लागू करने के समान था। कां ेस के िवभाजन के समय से ही ीमती गांधी ने पाट के अहम पद पर अपने वामीभ लोग को िबठाना और सरकारी सं थान को अपनी इ छा का गुलाम बनाना शु कर दया था। आपातकाल से पहले ही नौकरशाही, यायपािलका, रा पित भवन और कां ेस पाट का एक सं थान के प म रण हो चुका था। संजय गांधी के आगमन ने इस या को और तेज कर दया। कु छ लोग के मुतािबक यह या ज रत से भी यादा तेज हो गई। आपातकाल ने इस या को िवकृ त और बना दया, साथ ही यह यादा हंसक भी हो गई। इस या ने व से पहले ही संजय गांधी को राजनीित म ला दया। जून, 1975 तक ीमती गांधी बतौर धानमं ी एक दशक पूरा करने वाली थ । कायकाल का दशक पूरा होने म कु छ ही व रह गया था। अगर उनके कायकाल क तुलना उनके िपता के कायकाल से क जाए तो बड़ी िविच िवडंबनाएं सामने आती ह। घनघोर प से पदानु म को माननेवाले समाज म पंिडत नेह ने एक ईमानदार लोकतांि क कोिशश क थी, िजसक उनक बेटी ही नाटक य और िनणायक प से ध ी उड़ा रही थी। के रल क क युिन ट सरकार को गलत तरीके से बखा त करने क बात अगर छोड़ दी जाए, तो नेह ने देश म एक मजबूत िवप के िवकास क हर मुम कन कोिशश क थी। ले कन ीमती गांधी ने शायद ही िवप ी दल क जरा भी इ त क हो। उ ह ने अपने िपता क तुलना म संसदीय कायवािहय म ब त कम िह सा िलया और वे ब त कम बोल । अ य दल के नेता से भी नेह के आ मीय संबंध थे, जो ीमती गांधी के समय म िब कु ल असंभव हो गए। जहां तक कां ेस पाट के अंद नी मामल क बात है, दोन के वहार म जमीन-आसमान का अंतर था। पंिडत नेह के समय म कां ेस पाट एक लोकतांि क और िवक त पाट थी। अगर वे चाहते भी तो भी रा य के नेता क सहमित के िबना कसी रा य म अपनी मज का मु यमं ी नह थोप पाते। दोन म यह फक और भी मजबूत दखता है, जब हम लोकतांि क जीवन के गैरराजनीितक पहलु पर िवचार करते ह। नेह ेस क वतं ता का स मान करते थे और उ ह ने इसे फलने-फू लने म काफ मदद क । वे नौकरशाही और यायपािलका क आजादी का स मान करते थे। अभी तक ऐसा एक भी ात मामला सामने नह आया है, जब उ ह ने कसी खास अिधकारी के प म या िवप म फै सला िलया हो। ऐसा साफ लगता है क 1969 म कां ेस के िवभाजन के समय से ही ीमती गांधी अपने िपता ारा थािपत क गई राजनीितक परं परा से दूर हटती ग । उस परं परा से उनक यह दूरी साल-दर-साल बढ़ती ही गई और इसक प रणित आपातकाल और इसके नतीज म ई। अपने पूवा ह क वजह से िवप ी नेतागण भारत के पहले और तीसरे धानमं ी के बीच के मौिलक अंतर को परख नह पाए। चूं क उ ह ने कभी नेह का िवरोध कया था और अब कां ेस उ ह क बेटी के नेतृ व म चल रही थी, इसिलए वे शायद ही कभी इं दरा क आलोचना करते समय पंिडत नेह क तारीफ कर पाए। चूं क पि म के कई लेखक इन पूवा ह से मु थे इसिलए उ ह ने साफ अनुभव कया क कस तरह इं दरा गांधी अपने िपता क परं परा से दूर हट गई ह। आपातकाल के एक साल बाद नेह के दो अं ेज िम ने इस फक के आधार पर आपातकाल क कड़ी आलोचना क । फे नर ोकवे ने टाइ स म एक लेख िलखा िजसम उ ह ने ‘दुिनया के सबसे बड़े लोकतं का एक दमनकारी व था म प रव तत हो जाने क ’ कड़ी आलोचना क । ोकवे का ज म भारत म ही आ था और उ ह ने ीमती गांधी से अपील क क वे लोग क आजादी और उनक अिभ ि क वतं ता पर कु ठाराघात न कर। उ ह ने उ ह अपने िव ान िपता क याद भी दलाई।70 पे टेटर म िलखते ए जाॅन ि ग ने ीमती गांधी को िन प चुनाव और एक वतं ेस के बारे म नेह क ितब ता क याद दलाई। ि ग के मुतािबक भारत के पहले धानमं ी एक स े देशभ थे, य क वे लोकतं म स ी आ था रखते थे। धानमं ी पद पर लंबे समय तक बने रहने के दौरान नेह ने भले ही ब त सारी गलितयां क ह ले कन अिभ ि और िनजी आजादी के पर उ ह ने कभी भी भारतीय जनता का िव ास नह तोड़ा। ले कन ि ग के मुतािबक ‘िनयित के साथ नेह का सा ा कार अब तानाशाही के साथ सा ा कार म बदल चुका था। और ऐसा कसी दूसरे ने नह बि क खुद उनक बेटी ने कया था।’ कायदे से ीमती गांधी को ‘भारत के लोकतांि क योग का सबसे बड़ा पैरोकार’ होना चािहए था, िजससे पूरी दुिनया को संदश े जाता क ‘नाग रक अिधकार और खुली हवा’ म सांस लेने के िलए अमीर या िशि त होना ज री नह है। ले कन ऐसा नह हो सका। इसके उलट उ ह ने अपने काय से पुरानी सोच रखने वाले ‘सा ा यवादी मानिसकता के चंतक ’ के िवचार का ही पोषण कया िजसके मुतािबक हंद ु तान जैसे देश म िसफ ‘अिधनायकवादी शासन व था’ ही काम कर सकती है। ि ग ने धानमं ी को सलाह दी क वे अपने बेटे के भाव से मु होकर अपने िपता क पीढ़ी के मू य क तरफ लौट। ि ग ने धानमं ी से आ ह कया क भले ही उ ह अपनी स ा, अपने ि व या फर अपने मातृ व का ही बिलदान य न करना पड़े उ ह लोग क आजादी लौटा देनी चािहए। उसने आगे िलखा क ‘ऐसा करना उनके कायकाल का सबसे क ठन फै सला होगा, ले कन यह एक बेहतरीन और बहादुरी भरा काम भी होगा।’71 दूसरे कई अं ेज िम ने भी ीमती गांधी को िनजी तौर पर िलखा क वे आपातकाल हटा ल। इनम से एक थे पुराने े कर होरे स अले जडर, िज ह ने कभी महा मा गांधी और ि टश सरकार के बीच म य थता क थी। इसके अलावा अले जडर क एक और खािसयत थी। ये अले जडर ही थे िज ह ने ीमती गांधी को पहली बार भारत के िविभ िह स म पाए जाने वाली रं ग-िबरं गी िचि़डय को देखने के आनंद का अनुभव करवाया था।72 टाइ स जैसी मश र पि का के मश र तंभकार बनाड लेिवन ने भी आपातकाल क स त आलोचना क । यूं, यह आलोचना िनजी क म क नह थी ले कन यह आमलोग क भावना को ज र करती थी। अ टू बर, 1976 म लेिवन ने भारत म लोकतं पर हो रहे हार के िवरोध म दो लंबे लेख िलखे। हेिबयस काॅरपस ( यायालय म अिभयु क सशरीर उपि थित) को िनलंिबत करने और ेस क आजादी छीनने के सरकारी फै सले क लेिवन ने ये कहकर आलोचना क क ीमती गांधी अपने देश को ‘एक िन को ट क तानाशाही’ म बदल रही ह। जनवरी, 1977 के पहले स ाह म लेिवन ने फर दो लेख िलखे, िजसम उ ह ने सरकार ारा संिवधान संशोधन करके यायपािलका और रा पित क ताकत को कम करने क आलोचना क । लेिवन ने िलखा क इस तरह के आतंककारी ावधान िब कु ल ही गैर-ज री ह और यह उसी ि के िलए ज री हो सकते ह, जो ‘िबना कसी रोकटोक के संपूण स ा अपनी मु ी म’ रखना चाहता हो। लेख म आगे िलखा गया क इन प रवतन ने हंद ु तान को एक पूण अिधनायकवादी रा य म त दील कर दया है, िजसक एकमा तानाशाह ीमती इं दरा गांधी ह।73 18 जनवरी, 1977 को धानमं ी ने लोकसभा भंग कर नया चुनाव करवाने क घोषणा क । उनक यह घोषणा उनके िवरोिधय के िलए भी कसी ता ुब से कम नह थी। जब धानमं ी यह घोषणा कर रही थ , उसी व उनके िवरोिधय को जेल से रहा कया जा रहा था। सबसे बड़ी बात ये क यह घोषणा उनके बेटे संजय गांधी के िलए कसी झटके से कम नह थी। घोषणा से पहले उ ह भी इसक जानकारी नह दी गई थी। हालां क वतमान लोकसभा क अविध को साल-दर-साल के िलए बढ़ाया जा सकता था। भूिमगत आंदोलन पर पूरी तरह काबू पा िलया गया था। फर भी अचानक ीमती गांधी ने िबना कसी से राय िलए यह तय कया क मु क को उसका लोकतं लौटा देना चािहए। धानमं ी ने आपातकाल य हटाया, इसे लेकर लोग म कई तरह क राय थी। द ली के काॅफ हाउस म इस तरह क अफवाह थी क खु फया यूरो के मुख ने ीमती गांधी से कहा क अगर वे अभी चुनाव करवाएं तो कां ेस पाट आराम से जीत जाएगी। कु छ लोग क राय म यह पड़ोसी देश के नेता से उनक होड़ थी। हाल ही म पा क तान के रा पित जुि फकार अली भु ो ने अपने देश म चुनाव करवाने क घोषणा क थी। यह घोषणा तानाशाही शासन के आदी हो चुके पा क तान के िलए िब कु ल अ वाभािवक थी। फर ीमती गांधी कै से पीछे हटत ? उनके देश म तो अिधनायकवादी शासन ही अपवाद था। हालां क ीमती गांधी के सिचव ने आपातकाल के ब त बाद इसक कु छ और ही ा या क । उ ह ने िलखा क आपातकाल क वजह से ीमती गांधी जनता से कट गई थ , जो उनक ऊजा का ोत थी। 1971 म जनता ने िजस तरह से उनका वागत कया था, उसे लेकर वे ना टेि जक हो जाती थ । वह लोग के समथन, उनक खुशी और उनके आध्◌ाद को महसूस करना चाहती थ ।74 शायद उनके उस फै सले के पीछे इन सभी का थोड़ा-थोड़ा योगदान था। पि मी पयवे क और खासकर उनके िम क आलोचना ने भी उ ह ये फै सला लेने को मजबूर कया। पहले िजन लोग का नाम िलया गया है, उनके अलावा जमनी के पूव चांसलर िवली ांड और सोशिल ट इं टरनेशनल ने भी आपातकाल क कड़ी आलोचना क (‘ हंद ु तान म जो कु छ भी हो रहा है, उससे दुिनया के सभी समाजवा दय को िनजी तौर पर दुखी होना चािहए’)। जेनेवा ि थत व ड काउं िसल आॅफ चचज (‘यह मानवािधकार का गंभीर हनन है’ ) और मुख अमे रक मजदूर संगठन एएफएलसीआईओ (‘ हंद ु तान एक पुिलस रा य म त दील हो गया है, िजसम लोकतं को कु चल दया गया है’) ने भी आपातकाल क आलोचना क ।75 ले कन आिखर वो कौन सी वजह थी, िजसने ीमती गांधी को आपातकाल उठा लेने पर मजबूर कर दया? इसके बारे म श तया तौर पर कु छ नह कहा जा सकता, ले कन ऐसा लगता है क वो पि मी आलोचक और पयवे क क आलोचना से बुरी तरह घबरा ग । उन आलोचक को भारत का श ु घोिषत कर खा रज भी नह कया जा सकता था। फे नर ोकवे और जाॅन ि ग क तुलना रचड िन सन या सीआईए से नह क जा सकती थी। न ही उन शंकालु क तुलना िन सन या सीआईए से क सकती थी, िज ह ने कभी भिव यवाणी क थी क भारत म लोकतं नाकामयाब हो जाएगा। इसके िवपरीत ये लोग भारत क आजादी के पुराने समथक थे। जब ि टश राज भारत म अपनी अंितम सांस ले रहा था, तो उस समय इन लोग ने अं ेज पर भारत छोड़ने का दबाव बनाया था और भारत म लोकतं क बहाली का वागत कया था। हम यह ात नह है क ीमती गांधी क िनगाह से इस तरह के लेख या खासकर बनाड लेिवन के लेख गुजरे या नह । हालां क इसक काफ संभावना है क उ ह ने ये लेख ज र पढ़े ह गे। आपातकाल को लेकर असहज उनके कसी कमचारी या नजदीक ि ारा ज र यह लेख िबना कसी ट पणी के उनके सामने रखा गया होगा। यह भी बड़े संयोग क बात है क टाइ स पि का म लेिवन के लेख क दूसरी शृंखला छपने के महज दो स ाह बाद चुनाव क घोषणा कर दी गई। इतने कम समय म पि का हवाई जहाज से भारत भी नह आ सकती थी क उसक कतरन धानमं ी के सामने रखी जा सक। हो सकता है यह महज संयोग हो। ले कन हम शायद इसक वजह कभी नह जान पाएंगे य क ीमती गांधी के प और उनके द तावेज अभी भी हमारी प च ं से बाहर ह (और शायद आगे भी सदा के िलए रहगे)। बहरहाल, इन बात को रे खां कत करते ए इस अ याय को यह ख म कर देना उिचत होगा क कै से भारत क तीसरी धानमं ी अपने िपता क लोकतांि क िवरासत के िब कु ल उलट काम कर रही थ । यूयाॅक टाइ स के ए.एम. रोजथल ने आपातकाल के दौरान नई द ली का दौरा करते ए िलखा क अगर आपातकाल के समय पंिडत नेह जंदा होते, तो शायद वे अपनी बेटी के िवप म खड़े होते। रोजथल एक जमाने म भारत म यूयाॅक टाइ स के संवाददाता रहे थे। रोजथल के एक भारतीय िम ने उनक इस उि क क पना कु छ इन श द म क - इं दरा गांधी धानमं ी िनवास म ह, जब क जवाहरलाल नेह उ ह जेल से िच यां िलख रहे ह।76 यह तुलना नेह के उन िव िव यात प से क गई थी, जो उ ह ने अपनी बेटी को अं ेजी म जेल से िलखे थे। वो तीस के दशक के शु आती साल थे। इन प के मा यम से नेह ने अपनी बेटी को दुिनया के इितहास से प रिचत करवाया था। वो िच यां ीक सा ा य से शु होकर भारतीय वतं ता आंदोलन पर ख म होती थ , िजसम एक िपता ने अपनी पु ी को मानव स यता के िवकास क कहानी समझाई थी। टु कड़े-टु कडे़ म िलखे गए उन प म मनु य क सामािजकता और उसक आजादी पर यादा जोर दया गया था। नेह ने अपने आखरी प म िलखा था क हजार लोग के शहादत क बदौलत िपछली एक शता दी से भी यादा से, कस तरह लोकतं अनिगनत लोग क आकां ा और आदश का क बंद ु रहा है, और अब पूरी दुिनया म उसक न व िहल रही है। 9 अग त, 1933 को िलखे अपने आखरी प म पंिडतजी ने इं दरा को रव नाथ टैगोर क महान कृ ित गीतांजिल क पंि यां िलखी थ , जो मनु य क वतं ता का जयघोष करती ह। नेह ने यह प अपने पहले प के तीन साल बाद िलखा था। जब इन प को कताब क श ल म छापा गया, तो इसक जबद त िब ई। काशक ने पंिडत नेह को इस बात के िलए राजी कया क इसका एक वृहत अंक छापा जाए। 14 नवंबर, 1938 तक नेह ने कताब म फर संशोधन कया और उसम उस दशक क सारी मुख राजनीितक घटना को जगह दी गई। नेह ने इं दरा को िलखा क िपछले पांच साल म फासीवाद के िवकास, उसके ारा लोकतांि क मू य , वतं ता के िवचार और स यता पर कए जा रहे हमल ने आज लोकतं क िहफाजत के को सबसे अहम बना दया है। उ ह ने िलखा क दुभा य से लोकतं और वतं ता आज गंभीर संकट म है और सबसे दुखद बात यह है क उसके सारे तथाकिथत समथक ही उसक पीठ म छू रा घ प रहे ह।77 6 कां ेसी साये से बाहर मेरे िपता ने अपना तमाम लेखन जेल म रहकर कया। मुझे लगता है क भिव य के लेखक को ही नह , बि क नेता को भी कु छ व जेल म ज र िबताना चािहए। इं दरा गांधी, 1962 I सन् ’77 क जनवरी म आिखरकार धानमं ी ने आम चुनाव करवाने का ऐलान कर दया। उ ह ने कहा क लगभग 18 महीने पहले हमारा मु क ‘िवनाश क कगार’ पर खड़ा था। आपातकाल इसिलए लगाया गया य क जनजीवन ‘पटरी से उतर’ चुका था। अब चूं क हालात सामा य हो चुके ह, इसिलए चुनाव क इजाजत दी जा रही है। इधर ीमती गांधी रे िडयो पर अपना भाषण दे रही थ , उधर उनके िवरोिधय को जेल से रहा कया जा रहा था। अगले ही दन, 19 जनवरी को मोरारजी देसाई के द ली ि थत आवास पर चार िवरोधी दल के नेता क मुलाकात ई। ये पा टयां थ ः जनसंघ, भारतीय लोकदल (चरण संह के नेतृ व वाली कसान क पाट ), सोशिल ट पाट और मोरारजी देसाई क पाट कां ेस(ओ)। अगले दन मोरारजी देसाई ने ेस को बताया क इन दल ने तय कया है क अगला चुनाव वे एक ही चुनाव िच और एक ही पाट के झंडे तले लड़गे। 23 जनवरी को जय काश नारायण क मौजूदगी म ई एक ेस काॅ स म जनता (पीप स) पाट क िविधवत घोषणा कर दी गई।1 जनता पाट के गठन के ठीक दस दन बाद जगजीवन राम ने ऐलान कया क वे क ीय मंि मंडल छोड़ रहे ह। बाबू जी के नाम से मश र जगजीवन राम ताउ कां ेसी रहे थे, िज ह ने पंिडत नेह और इं दरा गांधी के कै िबनेट म अहम ओहदा संभाला था। इससे भी बड़ी बात ये थी क वे स दय से अछू त कही जाने वाली जाितय , िज ह अब अनुसूिचत जाित कहा जाता था, के द गज नेता थे। अनुसूिचत जाितयां, सं या बल म हंद ु तान के कु ल मतदाता का 15 फ सदी िह सा थ । मजे क बात ये भी थी क ये जगजीवन राम ही थे, िज ह ने संसद म आपातकाल के प म ताव रखा था! क ीय कै िबनेट से उनका इ तीफा कां ेस के िलए कसी बड़े ध े से कम नह था, और आने वाले तूफान का संकेत भी। बाबू जगजीवन राम को काफ तेज-तरार राजनेता माना जाता था। उनके इ तीफे से ऐसा संकेत गया क कां ेस का जहाज अगर पूरी तरह से डू बा नह है तो कम से कम उसम बड़ा छेद ज र हो गया है। अपने पुराने दल से इ तीफे के बाद जगजीवन राम ने एक नई पाट , कां ेस फाॅर डेमो े सी (सीएफडी) का गठन कया। उ ह ने कहा क कां ेस फाॅर डेमो े सी, कां ेस िवरोधी मत के िवभाजन को रोकने के िलए जनता पाट के साथ तालमेल करे गी। माच के तीसरे स ाह म चुनाव कराना तय कया गया। 6 माच को रिववार के दन िवप ी पा टय ने द ली के रामलीला मैदान म एक िवशाल जनसभा कर चुनाव अिभयान का ीगणेश कर दया। सरकार बौखलाहट म आ गई और रै ली को नाकामयाब बनाने के िलए हर संभव यास करने लगी। िजस व रै ली होनी थी उसी व एक िहट रोमां टक फ म बाॅबी का सारण सरकारी टेलीिवजन पर कया गया। उस व एक ही टीवी चैनल आ करता था, जो सरकारी िनयं ण म था। ऐसा इसिलए कया गया य क सामा य हालात म द ली क आधी जनता ज र टीवी न पर िचपक रहती। ले कन जनता पाट समथक एक अखबार क रपोट के मुतािबक बाबूजी, बाॅबी पर भारी पड़ गए! जगजीवन राम और जय काश को सुनने के िलए लगभग 10 लाख लोग जमा हो गए, जो इं दरा गांधी और कां ेस के िखलाफ एक साझा लड़ाई का संक प लेने के िलए जमा ए थे। इस रै ली म िवप के कई नेता ने भाग िलया।2 ठीक उसी दन देश क ापा रक राजधानी बंबई (अब मुंबई) म शहर के सबसे लोकि य सा ािहक ने इं दरा गांधी और जय काश नारायण का सा ा कार आमनेसामने डबल कू प म छापा। धानमं ी ने उस सा ा कार म कहा क जनता पाट के लोग कसी सकारा मक योजना के साथ एक मंच पर नह आए ह, बि क वे लोग ि गत प से धानमं ी के िखलाफ खड़े ए ह। ीमती गांधी ने कहा क नए नाम से बनाई गई पाट के वही पुराने उ े य ह, इ दरा गांधी को हटाना, इसम नया कु छ भी नह है। दूसरी तरफ जय काश नारायण ने कहा क जनता पाट म कां ेस क तरह अंत वरोध नह है। उ ह ने दावा कया क स ाधारी पाट ‘हर कार के िनिहत वाथ त व ’ से भरी पड़ी है और ‘आपसी अंत वरोध से चरमरा’ रही है। उस सा ािहक अखबार के पाठक के नाम संदश े म जय काश ने कहा क लोग को िबना कसी भय के मतदान म शरीक होना चािहए और उ ह आगाह कया क ‘िवप को वोट करने का मतलब आजादी के प म वोट करने जैसा है, जब क कां ेस को वोट करने का मतलब तानाशाही को समथन देना है।’3 सन् ’77 के चुनाव म िवप क तरफ से मु य चारक वही नेता थे, िज ह ने 1973-75 के आंदोलन म अहम भूिमका िनभाई थी। अपनी उ और खराब वा य के बावजूद जेपी ने इस आंदोलन क कमान अपने हाथ म ले ली। 21 फरवरी से लेकर 5 माच तक जेपी ने वा य क परवाह कए बगैर पटना, कलक ा, बंबई, चंडीगढ़, हैदराबाद, इं दौर, पूना और रतलाम म जनसभाएं संबोिधत क । बीच-बीच म िसफ डायिलिसस करवाने के िलए उ ह ने थोड़ा िवराम िलया। हरे क जगह उ ह ने जनता को िसफ एक ही बात से आगाह कया क ये ‘चुनाव अंितम िन प चुनाव है, अगर कां ेस स ा म वापस आती है, तो िपछले 19 महीने का आतंक अगले 19 साल क यातना बन जाएगी।’4 दूसरी तरफ अपने भाषण म ीमती गांधी ने इस आरोप का खंडन कया क उनक सरकार उनके प रवार क जागीर है। आिखरकार, उनके प रवार जैसे ‘ याग और सेवा का इितहास दुिनया के कु छेक प रवार ’ के पास ही था। उ ह ने वीकार कया क आपातकाल के दौरान कु छ यादितयां ई ह ले कन साथ ही कहा क ऐसा करना व क ज रत थी। ीमती गांधी ने कहा क ‘उ ह इस बात क कोई परवाह नह है क कोई उनक या आलोचना करता है। हम सही नीितय , काय म और िस ांत के साथ सही रा ते पर आगे बढ़ना है।’5 सन् 77 का आम चुनाव सरकार क नीितय और काय म पर ज र एक जनमत सं ह जैसा था, खासकर उ र भारत म इसे ऐसा ही देखा गया। िवशेषकर, सरकार ारा चलाई गई अिनवाय नसबंदी क योजना के िखलाफ जनता म काफ रोष था। एक प कार ने िलखा क इस जबरन नसबंदी के िखलाफ जनता म घृणा के तर तक गु सा था। यह काफ भावना मक और िव फोटक मु ा था, जो सारे िवरोध और गु से का क बंद ु बन गया। लोग ने कां ेसी उ मीदवार से मांग क क वे अपनी नसबंदी का माणप दखाएं और नह दखाए जाने पर उ ह वापस चले जाने तक को कहा। िवप ने भी अपने चार अिभयान म नसबंदी को खासी हवा दी और कां ेस को सरकारी ख सी (बकरा िजसका नसबंदी कर दया जाता है) क के प म चा रत कया। जनता से कहा गया क अगर कां ेस फर से स ा म आती है, तो जबरन नसबंदी को फर से लागू कर दया जाएगा। एक अ य चुनावी नारे म नसबंदी के मु य सू धार संजय गांधी पर िनशाना साधा गया - गांधी, नेह के देश म... कौन है ये संजय गांधी? िवप के इस चार अिभयान म कू ल िश क और िनचले दज के सरकारी कमचा रय ने बढ़-चढ़कर िह सा िलया। इन िश क और कमचा रय क पदो ित रोक दी गई थी या उनका तबादला इसिलए कर दया गया था क उ ह ने सरकार ारा तयशुदा नसबंदी का कोटा पूरा नह कया था।6 20 माच, 1977 क रात। आम चुनाव के नतीजे द ली म अखबार के द तर के सामने च पां कर दए गए। अखबार ने ये खबर पूरे देश म फै ला दी क लोग ने जनता पाट के प म बढ़-चढ़कर मतदान कया है और आपातकाल के कु यात सू धार एकएक कर चुनाव म खेत रहे। जब रायबरे ली जैसे सुरि त गढ़ से खुद ीमती गांधी के हारने क खबर आई, तो लोग गिलय और सड़क पर िनकल आए और नारे बाजी करने लगे। आितशबाजी का दौर शु हो गया। संजय गांधी क हार ने तो मानो लोग को उ मादी बना दया। ीमती गांधी, अपने पुराने राजनैितक िवरोधी (राजनारायण) से चुनाव हार चुक थ , जो चुनावी धांधली को लेकर पहले भी उनके िखलाफ अदालत जा चुके थे। पड़ोस क संसदीय सीट अमेठी म उनके बेटे संजय गांधी का भी यही हाल आ था। उ ह एक सामा य से छा नेता ने परािजत कर दया।7 सन् 77 के चुनाव म भारतीय राजनीित म सबसे शि शाली मां और बेटे क जोड़ी तो चुनाव हारी ही, कां ेस पाट का उ र देश म पूरा सफाया हो गया। यू.पी. म पाट 85 म से 85 और पड़ोसी सूबे िबहार म सारी 54 सीट हार गई। इन दोन ांत म जनता पाट -सीएफडी (कां ेस फाॅर डेमो े सी) गठबंधन को भारी जीत हािसल ई। कां ेस राज थान और म य देश म महज 1-1 सीट जीत पाई। कां ेस को िसफ दि ण भारत से सहारा िमला, जहां आपातकाल आ ामक ढंग से लागू नह कया गया था। दि ण के रा य म कां ेस ने अ छा दशन कया। पाट ने आं देश म 42 म 41, कनाटक म 28 म 26, के रल म 20 म से 11 और तिमलनाडु म 39 म से 14 सीट हािसल क । जनता पाट का िवजयरथ दि ण भारत म जाकर थम गया, ले कन उ र भारत क जनसं या का घन व और यादा सीट क बदौलत वो इस हालत म आ गई क कां ेस को स ा से बाहर कर सके । 1971 म ए लोकसभा चुनाव क तुलना म कां ेस पाट 540 के सदन म महज 153 लोकसभा क सीट ही जीत पाई। उसे 200 से भी यादा सीट पर नुकसान झेलना पड़ा। दूसरी तरफ जनता पाट और सीएफडी (कां ेस फाॅर डेमो े सी) के 298 सांसद जीतकर लोकसभा प च ं गए।8 चुनावी नतीज ने साफ कर दया क देश के अलग-अलग े ने अपने आपको अलग ढंग से अिभ कया था। ऐसी ही अिभ ि जाित और धम के तर पर भी देखने को िमली थी। खासकर उन दो समुदाय ने, िज ह कां ेस का पुराना वोट बक समझा जाता था, पाट को बुरी तरह िनराश कया। इनम से एक थाः दिलत समुदाय, िजसने अपने नेता जगजीवन राम क वजह से जनता पाट का समथन कया था और दूसरा थाः मुि लम समुदाय, जो संजय गांधी के पसंदीदा काय म नसबंदी क वजह से कां ेस से नाराज था। चुनाव क घोषणा के बाद द ली ि थत जामा मि जद के शाही इमाम ने मुसलमान से अपील क क वे कां ेस के िखलाफ वोट कर। इसका बड़ा असर देखने को तब िमला, जब उ र भारत म कां ेस को इसक भारी क मत चुकानी पड़ी।9 चुनाव नतीज के िव ेषक ने अलग-अलग ा याएं क । कु छ संयत क म के िव ेषक ने इसे ‘जनता लहर’ का नाम दया, तो कु छ यादा उ साही टीकाकार ने कहा क यह एक ‘ ांित’ है। मु क के इितहास म िपछले 31 साल म कोई गैर-कां ेसी पाट क क स ा पर कािबज हो रही थी। उस व कसी को ये बात समझ म नह आ रही थी क एक अहम राजनीितक और स ाधारी दल के प म कां ेस के खा रज हो जाने का या मतलब है। महज चंद लोग को इस बात का अहसास था क नेह और इं दरा गांधी जैसे नेता का स ा और भावशाली ि थित म न होने के या मायने हो सकते ह। चुनाव के नतीज से ब त को खुशी ई, कु छ लोग िनराश ए ले कन इसने हरे क को हैरत म डाल दया। अपने एक िम को िलखे प म ीमती गांधी ने अपनी हार क वजह कु छ ‘बुरी ताकत ’ को बताया। उ ह ने िलखा क लोग ये मान बैठे है क म कु छ और ही सोच रही ं और चीज को लेकर ज रत से यादा ित या कर रही ।ं ीमती गांधी का मानना था क वे गहरे ष ं का िशकार हो गई ह, िजसका नतीजा यही होना था।10 एक संपादक, जो ीमती गांधी के िव त समथक म से थे, ने उ ह लेकर ज र कु छ आशावादी िवचार सामने रखे। उनका िवचार था क ीमती गांधी ने वं टन च चल क तरह देश को यु म िवजय दलाई थी, च चल क तरह िवजय का ज मनाया था और च चल क ही तरह अहसानफरामोश लोग ने उ ह स ा से बेदखल कर दया। जािहरन, ये श द ीमती गांधी के िलए मरहम क तरह थे, तो उन लोग के िलए चेतावनी क तरह िज ह ने उ ह स ा से बेदखल कया था। संपादक क राय थी क जनता-सीएफडी गठजोड़ ‘ज द ही समझ जाएगा क जनता को कए गए वादे लाॅलीपाॅप’ क तरह होते ह, जब क उन वाद को िनभाना दवा क कसी कड़वी गोली से कम नह । उ ह ने आगे िलखा क जनभावनाएं पारे क तरह प रवतनशील होती ह और जो लोग आज ताली बजा रहे ह, वे ज द ही जनता पाट से मुंह मोड़ लगे।11 II कां ेस क तरह जनता पाट ने कसी एक नेता के नेतृ व म चुनाव नह लड़ा था। जब चुनाव के नतीजे सामने आ गए, तो इस बात पर िववाद हो गया क अगला धानमं ी कौन बनेगा। चरण संह के समथक सोचते थे क उ र भारत म पाट क भारी िवजय म उनके नेता का अहम योगदान है, इसिलए धानमं ी पद के वे वाभािवक दावेदार ह। जगजीवन राम के लोग सोचते थे क चूं क उनके कां ेस छोड़कर आने से ही जनता पाट को इतनी बड़ी जीत हािसल ई है, इसिलए उनके नाम पर िवचार कया जाना चािहए। सबसे बड़े दावेदार मोरारजी देसाई थे, जो 1964 और 1967 म करीब-करीब धानमं ी बन ही गए थे। इस िहसाब से उनका दावा सबसे मजबूत था। माच के आखरी स ाह म तीन उ मीदवार क तरफ से अपने नाम पर आम सहमित बनाने क ापक कोिशश क गई। अंत म यह तय कया गया क जनता प रवार के िपतृपु ष जय काश नारायण और जे.बी. कृ पलानी पर यह फै सला छोड़ दया जाए। उन दोन ने गहन िवचार-िवमश के बाद मोरारजी देसाई के नाम पर मुहर लगा दी, िजनके शासिनक अनुभव का कोई जोड़ा नह था। इसके अलावा देसाई बेदाग शि सयत के नेता भी थे। जगजीवन राम को र ा मं लय जैसा िति त िवभाग स पा गया, जब क चरण संह को गृह मं लय दया गया। पुराने नौकरशाह एच.एम. पटेल को िव मं ी बनाया गया, जब क जनसंघ के नेता अटल िबहारी वाजपेयी िवदेश मं ी बने। अब सवाल ये था क नई सरकार क नीितयां या ह गी? यह भिव यवाणी करना सबसे क ठन काम था। य क पाट और मंि मंडल दोन म ही अलग-अलग िवचारधारा के लोग थे। कु छ लोग नेह क नीितय के क र आलोचक थे, तो कु छ उन नीितय के समथक भी थे। कु छ लोग सावजिनक े को यादा मजबूत बनाने क बात कर रहे थे, तो कु छ लोग अमे रक और जापानी आ थक माॅडल क वकालत कर रहे थे। मंि मंडल का एक खेमा भारी उ ोग क वकालत कर रहा था, तो कु छ लोग गांव के िवकास क तरफ लौटने क बात कर रहे थे।12 सरकार म चरण संह क अहिमयत ने शहर क त िवकास के िवरोध म पूवा ह को यादा बल दान कया और योजना आयोग म ऐसे लोग यादा नजर आने लगे, जो उ ोगां◌े क बजाय कृ िष म िवशेष ता रखते थे। समाजवा दय क बढ़ी ई ताकत ने िवदेशी पूंजी पर स त ख अपनाना शु कया। ेड यूिनयन के उ नेता से उ ोग मं ी बने जाॅज फनाडीस ने घोषणा क क अमे रक ब रा ीय कं पनी कोकाकोला और आईबीएम को भारत छोड़ना होगा (और उ ह ऐसा करना पड़ा)। दूसरे अहम मंि य म शािमल थेः मधु दंडवते, िज ह रे लवे मं लय स पा गया था। यह सरकार क ऐसी शाखा थी, जो कसी भी दूसरे मं लय क तुलना म यादा और बेहतर तरीके से जनता क सेवा करती थी। दंडवते भी समाजवादी नेता थे ले कन उनका समाजवाद गरीब क तुलना म अमीर से भेदभाव करने म यक न नह करता था। उ ह ने खुद कहा था, ‘मेरी राय म उ वग को नीचे करके गरीब का क याण नह हो सकता, बि क म तो गरीब को ही उस तर तक ले जाना चाहता ।ं ’ दंडवते ने रे लवे टकट आर ण म कं यूटर के इ तेमाल क शु आत क , िजससे बु कं ग लक ारा कया जा रहा ाचार ब त हद तक कम हो गया। इससे टकट के िलए याि य क अिनि तता भी ख म ई। उ ह ने 5000 कलोमीटर लंबी ित त रे ल क पट रय को बदलने और मर मत करने का काम शु कया। ले कन उनका सबसे दूरगामी काम था, ि तीय ेणी लीपर वाले रे ल के िड ब म लकड़ी के त त के ऊपर दो इं च फोम लगवाना, िजससे उनम या ा करने वाले याि य क सुिवधा थम ेणी के बराबर हो गई। यह सुिवधा पहले मु य रे ल माग पर शु क गई, िजसे बाद म सभी रे लगाि़डय म लागू कर दया गया। इससे कु ल िमलाकर करोड़ रे ल याि य को स िलयत ई।13 नई सरकार के स ा म आने के कु छ महीने बाद तक इसक नीितय के बारे म लोग म उ सुकता बनी रही। पयवे क को खास उ सुकता िवदेश नीित के बारे म थी। चुनाव नतीज क घोषणा के एक दन बाद यूयाॅक टाइ स ने िलखा क जहां एक तरफ पि म के ित कां ेस का ख दूरी बनाए रखने और श ुता के भाव वाला था, वह जनता गठबंधन से कु छ उदार संकेत िमल रहे थे। ऐसा लग रहा था क भारत, पि मी देश के ित दो ताना ख अि तयार करे गा और सोिवयत संघ के ित उसका झुकाव कम होगा। अमे रक योजनाकार, सोिवयत संघ के िखलाफ एक भारत-अमे रका-चीन ि कोण क उ मीद पाल रहे थे। उनक राय म जनता पाट क िवजय अमे रका के िलए ‘मुंहमांगी मुराद’ लेकर आई थी।14 ले कन यहां गलती ये क जा रही थी एक प रवार को पूरे देश का पयाय माना जा रहा था। अमे रका सोचता था क भारत क सोिवयत संघ के साथ दो ती जवाहरलाल और इं दरा गांधी क िनजी पसंद थी, जब क हक कत ये नह थी। सचाई ये थी क अमे रका के ित भारतीय का शंकालु नज रया, खासकर पा क तान को उसका समथन िमलने से मजबूत हो गया था। भारत उसके साथ संबंध बढ़ाने से िहचकता था। दूसरी बात ये थी क भारतीय बौि क वग अमे रका क ‘अबाध पूंजीवाद’ क नीित को पसंद नह करता था। दूसरी तरफ भारत को चीन का खतरा भी था, भारत एकबारगी सोिवयत संघ से दो ती नह तोड़ सकता था। जनता पाट के नेता साफतौर पर सोिवयत संघ को खा रज नह करना चाहते थे। वे दोन ही महाशि य से सै ांितक तर पर बराबर क दूरी रखना चाहते थे। जेपी के जीवनीकार और रसूखदार संपादक अजीत भ ाचाय ने ट पणी क क नई सरकार के सामने ये चुनौती थी क सोिवयत संघ क तरफ गुटिनरपे भारत के यादा झुकाव को इस तरह पटरी पर लाया जाए क इससे सोिवयत के साथ भारत का ‘ र ता’ भी खराब न हो।15 अ टू बर, 1977 म मोरारजी देसाई और अटल िबहारी वाजपेयी ने सोिवयत संघ का दौरा कया। यह दौरा ये सािबत करने के िलए कया गया क भारत और सोिवयत संघ का र ता महज कसी एक प रवार का मोहताज नह है। दूसरी तरफ पि मी देश से भी संबंध सुधारने क कोिशश क ग । पि मी और मु बाजार क नीितय के समथक मश र यायिवद ननी पालक वाला को अमे रका म भारत का राजदूत बनाया गया। इसके जवाब म जनवरी, 1978 म अमे रक रा पित िजमी काटर ने भारत क या ा क । िजमी काटर आईजनहावर के बाद भारत क या ा करने वाले पहले अमे रक रा पित थे। भारतीय संसद को भावशाली ढंग से संबोिधत करते ए काटर ने दोन देश के ‘साझा मू य ’ पर जोर दया। उ ह ने इस बात पर भी जोर दया क कै से दोन देश हाल ही म ‘गंभीर संकट’ से बाहर आए ह ले कन फर भी उनके देश म लोकतं जंदा है (िजमी काटर का इशारा अमे रका म वाटरगेट कांड और भारत के आपातकाल क तरफ था)। इसके बाद अपने िलिखत भाषण से अलग उ ह ने वतः फू त ढंग से इस बात का िज कया क महा मा गांधी के िवचार का कज मा टन लूथर कं ग के जनािधकार संघष पर है।16 जनता सरकार ने पड़ोसी देश के साथ भी संबंध सुधारने क दशा म कई पहल क । नवंबर, 1977 म बंगलादेश के साथ एक संिध क गई, िजसका संबंध गंगा नदी के पानी के बंटवारे से था। इस समझौते के तहत बंगलादेश को आम दन म 20,500 यूिवक फ ट जल के इ तेमाल क इजाजत दी गई जब क भारत को 34,500 यूिवक फ ट पानी िमला। यह समझौता पि म बंगाल सरकार के िवरोध के बावजूद कया गया, िजसका कहना था क इस समझौते से गंगा म पानी क कमी हो जाएगी और कलक ा बंदरगाह म िस ट भर जाएगा।17 फरवरी, 1978 म िवदेश मं ी अटल िबहारी वाजपेयी ने पा क तान का दौरा कया, जहां उ ह ने अपने मेजबान को खासा भािवत कया। वाजपेयी से भािवत होने वाल म वहां के सैिनक तानाशाह िजया-उल-हक भी शािमल थे, िज ह ने यह सोच रखा था क जनसंघ से ता लुक रखने वाला यह नेता मुसलमान के ित नफरत का भाव रखता होगा।18 एक साल बाद वाजपेयी ने चीन का दौरा कया। यह दौरा 62 क लड़ाई के बाद कसी बड़े भारतीय नेता का पहला दौरा था। उसी दौरान चीन ने िवयतनाम पर हमला कर दया। वाजपेयी के इस दौरे क रौनक फ क पड़ गई। चीन ने बड़े अहंकारी ढंग से भारत के एक पुराने िम पर हमला कया था। आ थक नीितय क जहां तक बात है जनता सरकार म इस पर आम सहमित नह थी। िवदेश नीित के मामले म सरकार कमोवेश एकमत थी। सबसे यादा आम सहमित इस बात पर थी क पूव धानमं ी के साथ कै सा सलूक कया जाए। जनता पाट के नेता इस बात पर एकमत थे क आपातकाल लागू करने के िलए ीमती गांधी को सजा दी जाए। सेवािनवृत यायाधीश क अगुआई म इसके िलए आठ जांच आयोग बनाए गए। इसम से कई आयोग िसफ इसिलए बनाए गए क वे कां ेसी मु यमंि य ारा कए गए ाचार क जांच कर सक। जय काश नारायण के साथ जेल और अ पताल म बदसलूक क जांच के िलए भी एक जांच आयोग बनाया गया। हद तो तब हो गई, जब एक जांच आयोग इसिलए भी बना दया गया क दस साल पहले 1967 म राम मनोहर लोिहया (गैर-कां ेसवाद के जनक) क अ पताल म कन दशा म मृ यु ई थी! इसके साथ-साथ संजय गांधी क मा ित कं पनी क जांच के िलए भी एक आयोग बनाया गया। सबसे िव तृत दायर के साथ जो आयोग जांच कर रहा था, वो था शाह आयोग। यह उन लोग को दंिडत करने के िलए बनाया गया था, िज ह ने आपातकाल के दौरान लोग पर यादितयां क थ । इसक अ य ता सु ीम कोट के सेवािनवृत मु य यायाधीश जे.सी. शाह कर रहे थे। इनक बैठक क ीय द ली क प टयाला हाउस अदालत म होती थी, जहां पर सफे द बाल वाले यायाधीश एक ऊंचे चबूतरे पर बैठते थे। उनके बगल म उनके दो सहायक होते थे। उनके नीचे माइ ोफोन लगी एक मेज होती और सामने उस दन क गवाही ली जाती थी। शाह आयोग क सुनवाई को काफ लोग सुनते थे, िजनम यादातर सं या प कार क होती थी।19 शु आती कु छ महीन म शाह आयोग ने ब त सारे लोग क गवािहयां ल । इनम नौकरशाह, पुिलस आॅ फसर, नगरपािलका के अिधकारी और ीमती गांधी के मंि मंडल के सद य शािमल थे। ले कन खुद ीमती गांधी ने गवाही देने से इं कार कर दया। उ ह तीन बार कटघरे म बुलाया गया, वो तीन ही बार आ ले कन तीन बार उ ह ने कसी सवाल का जवाब देने से मना कर दया। उ ह ने कहा क वे मंि मंडल क शपथ से बंधी ई ह। आपातकाल के दौरान पीि़डत एक अखबार ने इसे आयोग क कारवाई का ‘अहंकारपूण मजाक उड़ाना’ करार दया।20 जब क ीमती गांधी से सहानुभूित रखने वाले एक दूसरे प कार ने कहा क शाह आयोग ‘ यूरेमवग जांच (ि तीय िव यु के बाद परािजत जमनी और उसके सहयोगी देश को यु अपराध के िलए सजा देने के िलए बनाया गया था) क तज पर बनाया गया है, िजसम सबकु छ पहले से तय है। शाह आयोग एक तमाशा बन गया है, िजसम मु य नाियका (या खलनाियका) लगातार अनुपि थत रहती है और छोटे-मोटे खलनायक या हा य कलाकार मंच संभालते ह। धीरे -धीरे यह लोग म अपना आकषण भी खोता चला जा रहा है। अब लोग, शाह आयोग के नाम से ही ऊबने लगे ह और जैसे ही टीवी या रे िडयो पर इसका िज आता है, लोग उसे बंद कर देते ह।’21 III क म सरकार बदलने के बाद रा य म भी सरकार बदल ग । जैसा ीमती गांधी ने 1971 म कया था, जनता पाट ने भी वैसा ही कया। उ र भारत के कई रा य क सरकार यह कहकर बखा त कर दी ग क आमचुनाव के बाद ये सरकार ‘जनता का िव ास’ खो चुक ह। रा य म नए चुनाव करवाए गए। जनता पाट उ र देश, म य देश, राज थान और िबहार म आसानी से जीत गई। दूसरे रा य म भी प रवतन ए। पि म बंगाल म वाम पा टय का गठबंधन स ा म आ गया। 294 सद य वाली िवधानसभा म सीपीएम ने अके ले 178 सीट जीत ल , जब क उसक सहयोगी पा टय ने 52 सीट पर जीत हािसल क । इससे पहले 1967 और 69 म सीपीएम, बंगाल म गैर-क युिन ट पा टय के साथ गठबंधन सरकार चला चुक थी ले कन वो सरकार अ पाविध क थ । उन सरकर को द ली से भेजे गए ष ं कारी रा यपाल ने अि थर कर दया था। ले कन अब उसे इस तरह क कोई सम या नह थी। अब वे भावशाली ढंग से इस बुजुआ व था म भी अपना सुधार काय म चला सकते थे।22 योित बसु पि म बंगाल के नए मु यमं ी बने। उ ह ने इं लड से वकालत क िड ी हािसल क थी। साठ के दशक म दो संयु मोचा-वाममोचा सरकार म उप-मु यमं ी रह चुके थे। उनके मंि मंडल के दूसरे सद य म उनके जैसे बंगाली भ लोक कम ही थे। वे लोग कसान और मजदूर के बीच काम करके आए ए थे। उनक सबसे बड़ी ाथिमकता कृ िष सुधार थी। उ ह ने अपना यान बगादार (बटाईदार ) को जमीन पर हक दलाने पर क त कया जो ामीण बंगाल क अिधकांश जमीन पर खेती करते थे। नई सरकार ने इसके िलए आॅपरे शन बगा नाम का अिभयान चलाया। बटाईदार के अिधकार को सुरि त कया गया और उपज म उनक िह सेदारी बढ़ाई गई। पहले जमीन के मािलक बटाईदार से आधी या उससे भी यादा फसल ले लेते थे, ले कन भूिमसुधार के बाद अब बटाईदार का उपज म िह सा बढ़कर 75 फ सदी हो गया। इस सुधार से 10 लाख से भी यादा कसान को फायदा आ। इसी बीच वाममोचा सरकार ने गांव म पंचायत का चुनाव भी करवाया। पंचायती राज या थानीय वशासन सरकार क घोिषत नीित थी, िजसका िनदश संिवधान म दया गया था ले कन अिधकांश जगह इसका पालन नह आ था। 1977 म पि म बंगाल म करवाया पंचायत चुनाव इस तरह का पहला चुनाव था, जो इतनी गंभीरता के साथ और इतने बड़े पैमाने पर करवाया था। पंचायत क करीब 55,000 सीट के िलए चुनाव करवाया गया, िजसम वाममोचा ने दो ितहाई सीट जीत ल । दलच प बात यह थी क जीतनेवाले यादातर लोग बटाईदार नह थे बि क इसम छोटे जोतदार, िश क और समाजसेिवय क खासी तादाद थी। इसे िवशु मा सवादी श द म पेटी बुजुआ कहा गया। ले कन वे लोग भी पाट के ही सद य थे या उससे सहानुभूित रखते थे। आॅपरे शन बगा के साथ-साथ पंचायत चुनाव ने ामीण बंगाल पर वाममोचा क पकड़ को और भी मजबूत बना दया।23 तिमलनाडु म भी स ा प रवतन हो गया। आपातकाल से पहले यहां एक दशक से डीएमके का शासन था। आपातकाल के दौरान उसे िबना कसी ठोस वजह के बखा त कर दया गया। चुनाव म अब उसक मु य ित ं ी एआईएडीएमके थी, जो डीएमके से ही अलग ई थी। इस पाट क एकमा पहचान ये थी क इसके नेता तिमल फ म के कवदंती महानायक एम.जी. रामचं न थे। चुनाव म एम.जीरामचं न के क र मे और उनक अपील के सामने डीएमके क मजबूत पाट मशीनरी नाकामयाब सािबत ई। एआईएडीएमके को 130 सीट पर जीत िमली जब क डीएमके 48 सीट पर िसमट गई। एमजीआर ने तुरंत घोषणा क क ‘ हंदी और उ र भारतीय सा ा यवाद’ का िवरोध अब अतीत क बात हो गई है और वे क के साथ अ छे संबंध के प धर ह। मु यमं ी क गरीब समथक फ मी छिव के अनु प कई लोकलुभावन योजना क घोषणा क गई। इ ह योजना म से एक योजना थी कू ली ब के िलए दोपहर का भोजन। यह योजना यादा सं या म लड़ कय को कू ल तक आक षत करने के उ े य से बनाई गई थी।24 कु ल िमलाकर त वीर ये थी क पूरब म क युिन ट पा टयां बुजुआ लोकतं के साथ तालमेल िबठा रही थ , तो दूसरी तरफ दि ण म एक जमाने क अलगाववादी पाट भारतीय संघ के साथ बेहतर संबंध बनाना चाह रही थी। इसके अलावा कई दूसरे इलाक से भी सकारा मक संकेत िमल रहे थे, जहां के लोग पारं प रक प से भारतीय संघ के साथ सहज संबंध बनाने के ित अिन छु क रहे थे। सन् 77 क ग मय म मोरारजी देसाई ने नगा नेता ए.जेड. फजो से लंदन म मुलाकात क । हालां क इस वाता से कोई समाधान नह िनकल पाया ले कन इतना संकेत ज र गया क भारत सरकार ने िवदेश म ही सही, फजो से मुलाकात करके उदारता का संकेत दया है। उसी साल के आिखर म नागालड म िवधानसभा चुनाव करवाए गए। 82 साल के मोरारजी देसाई वहां खुद चुनाव चार करने गए और धुंध से आ छा दत नागालड क घा टय म हवाई जहाज से जाने का जोिखम मोल िलया। एक अखबार ने ट पणी क क देसाई क इस या ा से सरकार ने ये संदश े देने क कोिशश क क वो नागालड म हो रहे चुनाव को कतनी अहिमयत देती है। सरकार ने ये भी उ मीद क क फजो और उनके समथक क वतं ता संबंधी मांग का भी सदा के िलए समाधान हो पाएगा।25 उधर िहमालय के दूसरे छोर पर राजनीितक उथल-पुथल से त क मीर म भी चुनाव करवाए गए। आपातकाल से पहले ीमती गांधी और शेख अ दु ला के बीच ए एक समझौते के तहत शेख अ दु ला कां ेसी सरकार के मुिखया के तौर पर क मीर के मु यमं ी बने थे। मोरारजी देसाई इस बात के ित इ छु क थे क नया चुनाव करवाकर दो नेता के बीच कए गए समझौते क वैधता को परख िलया जाए। ज मू-क मीर िवधानसभा भंग कर दी गई और शेख अ दु ला ने फर से नेशनल काॅ स को जंदा कर िलया। नेशनल काॅ स के पुनज िवत होने से पूरे क मीर म उ साह क लहर फै ल गई। एक क मीरी ने इसे याद करते ए कहा क पूरी क मीर घाटी नेशनल काॅ स के लाल झंड से पट गई। हरे क बाजार और हरे क घर झंड और पताका से दु हन क तरह सज गए।26 नेशनल काॅ स ने 75 म से 46 सीट पर जीत दज क और उसे ब मत िमल गया। हालां क त य यह था क उसे हर इलाके म जीत नह िमल पाई। एक तरफ जहां शेख क पाट मुसलमान बा य क मीर घाटी म पूरी तरह छा गई, वह दूसरी तरफ हंद ू बा य ज मू म उसे महज 7 सीट ही िमल पा । ज मू म िवधानसभा क 32 सीट थ । फर भी ऐसा कहा गया क यह चुनाव आजादी के बाद ज मू-क मीर म आ सबसे ‘िन प और वतं ’ चुनाव था। इस चुनाव से क मीर के लोग को ये भरोसा देने क कोिशश क गई क वे भी अपने मौिलक अिधकार का उसी तरह योग कर सकते ह जैसा शेष भारत के लोग करते ह।27 IV 1978-9 क स दय म ि वस अथशा ी िग बट ए टने ने भारत का दौरा कया। उ ह ने देश के अंद नी िह स और गांव का भी दौरा कया। करीब डेढ़ दशक पहले भी ए टने ने भारत के गांव का अ ययन कया था। उ ह ने पाया क देश के कई िह स के िवकास म ब त बड़ा फक है। जहां एक तरफ पि मी उ र देश और कावेरी डे टा जैसे इलाके आ थक प से यादा गितशील थे वह पूव उ र देश और उड़ीसा जैसे इलाके िब कु ल धीमी र तार से या नह के बराबर िवकास कर रहे थे। गांव क तर म जो बात सबसे अहम नजर आ रही थी, वो थी जल का उिचत बंधन। िजन इलाक म संचाई क सुिवधा प च ं ाई गई थी, उन इलाक क उ पादकता बढ़ गई थी और वहां के लोग का जीवन तर भी अ छा हो गया था। वहां के लोग क आमदनी बढ़ गई थी। पानी के अलावा जो चीज अहम थी, वो थी रसायिनक खाद का बढ़ता योग। ‘ह रत ांित’ से भािवत िजल म रसायिनक खाद का योग चार गुणा बढ़ गया था। ए टने ने पाया क कृ िष उ पादकता म वृि से सबसे यादा फायदा उभरती ई िपछड़ी जाितय को आ। ये जाितयां थ उ र देश म जाट, िबहार म कु म और यादव, महारा म मराठा और तिमलनाडु म वेलाल। अगड़ी या ऊंची कही जाने वाली जाितयां, िजनका कभी अिधकांश जमीन पर अिधकार था, वो शहर क तरफ थानांत रत होती जा रही थ । यही वो खाली जगह थी, िजसे िपछड़ी जाितयां भरना चाह रही थ । हालां क उनसे भी नीचे क जाितय क ि थित म ब त सुधार नह आ था। समाज के सबसे िनचले पायदान पर रहने वाली अनुसूिचत जाित के लोग म 60 और 70 के दशक म ए इस तरह के आ थक िवकास का ब त फायदा नह प च ं पाया था। इन जाितय क बदहाली का एक बड़ा उदाहरण िबहार क मुसहर जाित क ि थित थी। ए टने ने पाया क उनके ब े ‘कु पोषण के िशकार’ ह और उस जाित को देखकर लगता था क वे भीषण अभाव म जी रहे ह।28 ए टने के मुतािबक ामीण भारत क सबसे गितशील आ थक योजना म दु ध उ पादन म वृि लाने क योजना सबसे अहम थी। ऐसा दु ध उ पादन सहका रता सिमितय के मा यम से कया जा रहा था। इसक शु आत 40 के दशक म क ीय गुजरात के आनंद नाम के गांव से ई थी। 50 के दशक म इस सहका रता योजना को पूरे कै रा िजले म लागू कया गया। आनंद, कै रा िजले म ही आता था। दूध को ए स ेस ेन से बंबई भेजा जाता था, जो वहां से पांच घंटे क दूरी पर था। इस योजना क सफलता ने (इसे अमूल के नाम से जाना जाता है, इसका पहला अ र आनंद के नाम पर है) इसे पूरे देश म लागू करने का वातावरण तैयार कया और इसे ‘आॅपरे शन लड’ का नाम दया गया। दशक के शु आत म पूरे देश म 1000 दु ध सहकारी सिमितयां थािपत हो ग , िजसम 2,40,000 कसान शािमल थे। ये सिमितयां ितवष 17.6 करोड़ दूध उ पादन करत । दशक के अंत तक सहकारी सिमितय क सं या 9,000 तक प च ं गई, िजसम करीब 10 लाख कसान शािमल थे। ये सिमितयां करीब 50 करोड़ लीटर दूध का ितवष उ पादन और िब करती थ । इन आंकड़ां◌ से कु छ उ साही लोग ने इसे ‘ ेत ांित’ का नाम दे दया, जो ह रत ांित क पूरक बन रही थी। सचाई यह थी क ह रत ांित क तरह ही इसका भी फायदा पूरे देश के लोग को समान प से नह िमला। यह योजना तिमलनाडु म काफ कामयाब रही, जहां सड़क और रे ल यातायात क अ छी सुिवधा थी। वहां शहरी आबादी भी यादा थी। िजन रा य म बुिनयादी ढांचा कमजोर था, वहां इसके नतीजे िनराशाजनक रहे। हरे क जगह इससे बड़े और मंझोले कसान को ही फायदा िमला। यानी क फायदा उनको िमला, जो अपने जानवर के िलए यादा चारे का खच वहन कर सकते थे, िजनके पास गाय-भस रखने क यादा जगह थी और जो बक से कज ा कर सकते थे।29 खेती और दु ध उ पादन के वािण यीकरण ने ामीण भारत म कसान के एक बड़े तबके को फायदा प च ं ाया। इन आ थक फायद ने इस वग म राजनीितक मह वाकां ा क भावना को बढ़ावा दया। साठ के दशक म इ ह उभरती ई ामीण जाितय ने उ री सूब क सरकार पर अपना दबदबा बना िलया। अब स र के दशक तक इन जाितय ने रा ीय राजनीित म अपनी उपि थित दज करा ली थी। जनता सरकार म ामीण सशि करण क इन ताकत ने अपने आपको चरण संह के ि व और उनक िवचारधारा म िधिनिध व कया। ले कन ये ताकत िसफ एक नेता तक िसमटी नह रह , इनका भाव ापक होता गया। 1977 म ए चुनाव के बाद लोकसभा के करीब 36 फ सदी सांसद इ ह कृ षक पृ भूिम वाली जाितय से संबंध रखते थे। 1952 म संसद म उनक तादाद महज 22 फ सदी थी। उनक बढ़ती ताकत का असर सरकार क आ थक नीितय पर पड़ा िजसका झुकाव अब ामीण िवकास क तरफ भी आ। सरकार गे ं और चावल का खरीद मू य बढ़ाते रहने पर मजबूर ई।30 V हालां क कु छ टीकाकार ने ामीण भारत क इस बढ़ती ई ताकत क ा या वग य संदभ म क । उ ह ने इसे ‘शहर और गांव के संघष’ के प म देखा। उ ह ने इसे ‘कारखाना मािलक और कसान ’ के संघष के प म भी देखा। उ ोग जगत और कृ िष के बीच कारोबार क शत अब कृ िष के प म झुकने लग । जब क पहले उ ोग जगत का पलड़ा भारी रहता था।31 ले कन इस संघष क जातीय ा या भी थी और शायद यह ा या यादा मह वपूण थी। वा तव म, अगर वग य संदभ से हटकर इसे जातीय संदभ म देखा जाए तो इस संघष के दो साफ आयाम दखाई पड़ते ह। पहला आयाम राजनीित और शासन के े का है, जहां िपछड़ी जाितय ने स ा म पहले से वच व रखने वाली जाितय मसलन ा ण, राजपूत, काय थ और बिनय को चुनौती दी। इन जाितय का ऐितहािसक प से िश ा, सािह य, कारोबार और राजनीित पर वच व था। देश के वतं ता सं ाम म अगड़ी जाितय ने बढ़-चढ़कर िह सा िलया था या यूं कह क वो लड़ाई यादातर उ ह के नेतृ व म लड़ी गई थी। इसिलए जब देश को आजादी िमली तो क और रा य क सरकार म इ ह जाितय का दबदबा थािपत हो गया। ले कन धीरे -धीरे चुनावी लोकतं ने िनचली जाितय के दावे को मजबूत करना शु कर दया, जो सं या म भावशाली थ । अब रा य के यादा से यादा मु यमं ी िपछड़ी जाितय से आने लगे। इसी तरह क ीय मंि मंडल म भी उनक तादाद बढ़ती गई। ले कन उनके िलए एक कला फतेह करना अभी भी बाक रह गया। वो कला था धानमं ी कायालय का। अभी तक िपछड़ी जाित का कोई नेता धानमं ी नह बन पाया था। नेह और इं दरा गांधी क तरह ही मोरारजी देसाई भी सबसे ऊंची मानी जाने वाली ा ण जाित से ता लुक रखते थे। (हालां क लालबहादुर शा ी ा ण नह थे, ले कन वे िलखने-पढ़ने वाले और यादातर लेखक य पेशे से ता लुक रखने वाले सं ांत काय थ जाित से आते थे।) दि ण भारत म ि थित कु छ अलग थी। वहां गरीब और िपछड़ी जाितय के िहत म उठाए गए कु छ ‘सकारा मक कदम’ क वजह से सरकारी नौक रय म अगड़ी जाितयां अपना वच व नह बना सकती थ । वहां आर ण क व था क गई थी। इनम से कु छ सकारा मक कदम तो अं ेजी राज के दौरान ही उठाए गए थे। अब जनता पाट क सरकार ने इन कदम को उ र भारत के अपने गढ़ म भी लागू करने का फै सला कया। 70 के दशक क शु आत म िबहार म िपछड़ी जाितय को सभी सरकारी नौक रय म 26 फ सदी आर ण देने के िलए एक आयोग का गठन कया गया। ले कन आयोग क इस सलाह को आपातकाल के दौरान दबा दया गया। 1977 म िबहार म जनता पाट क िवजय के बाद वहां के नए मु यमं ी कपूरी ठाकु र ने इस रपोट को फर से लागू करने का फै सला कया। कपूरी ठाकु र के इस फै सले का अगड़ी जाितय ने कड़ा िवरोध कया। राजपूत और भूिमहर जाित के छा ने बस और रे लगाि़डय म आग लगा दी और सरकारी कायालय म तोड़-फोड़ क । िपछड़ी जाित के नेता भी अपनी मांग पर अिडग थे। िवधानसभा म उनक जाित के िवधायक क सं या करीब 40 फ सदी थी और वे अपनी इस नई ताकत के बल पर पीछे हटने को तैयार नह थे। िपछड़ी जाित के एक नेता के मुतािबक, ‘हमारा संघष िसफ आर ण पाने तक सीिमत नह है, बि क हम उ र भारत और द ली क स ा पर क जा करना चाहते ह।’ िपछड़ी जाित समूह के दबाव म मोरारजी देसाई एक आयोग के गठन पर मजबूर हो गए। इस आयोग का काम इस बात का पता लगाना था क आर ण क व था को क ीय सरकार क नौक रय म भी लागू कया जा सकता है या नह । संिवधान के मुतािबक सरकारी नौक रय म 15 फ सदी सीट अनुसूिचत जाितय के िलए और 7.5 फ सदी सीट अनुसूिचत जनजाितय के िलए आरि त थी। अब िपछड़ी जाितयां भी अपने िलए आर ण मांग रही थ । उस आयोग क अ य ता िबहार के एक नेता बी.पी. मंडल कर रहे थे।32 िपछड़े-अगड़े संघष के बीच िबहार उन सब बात का तीक बनता जा रहा था, जो हंद ु तान म गलत थ । सूबे क िगरती कानून- व था, ाचार ‘सरकारी िनक मेपन’ और रा य क राजनीितक अि थरता (1967 के बाद से रा य म 9 मु यमं ी शपथ ले चुके थे) पर अखबार म कई लेख िलखे गए। इन सब घटना ने रा य को ‘बदहाली’ क तरफ धके ल दया। रा य क वतमान ि थित इसके व णम इितहास से िब कु ल उलट थी, जब इसने महा मा बु , स ाट अशोक और महान मौय सा ा य को ज म दया था। ले कन दुख क बात ये थी क अब िबहार तभी सु खय म आता था, जब वहां बाढ़ या सूखे जैसी आपदा आती या फर कसी कोयला खदान म दुघटना, ह रजन पर जु म या ाचार क खबर आती थ ।33 VI ह रजन पर जु म क खबर एक दूसरे तरह क जातीय संघष का नतीजा थी। इन संघष म एक तरफ िपछड़ी जाितयां होती थ तो दूसरी तरफ ह रजन या अनुसूिचत जाित। इन संघष क भी अपनी आ थक वजह थ । जमीन के यादातर िह स पर िपछड़ी जाितय का अिधकार होता जा रहा था और अनुसूिचत जाित के लोग इस पर काम करते थे। वे लगभग भूिमहीन थे। मजदूरी और काम के हालात से अलग ये लड़ाई आ मस मान क लड़ाई भी थी। िपछड़ी जाितय ने बड़ी आसानी से अगड़ी जाितय के तमाम सं कार हण कर िलए थे, िजनसे उ ह ने यादातर जमीन पाई थी। ऊंची जाितय क तरह ही वे ह रजन को िहकारत के भाव से देखते और अ सर उनक मिहला के साथ दु यवहार करते। एक जमाने म इन िनचली जाितय के पास चुप रहने के िसवाय कोई िवक प नह था। ले कन अब लोकतांि क या के जड़ जमाने और िश ा म सार के बाद ह रजन क नई पौध ये सब बदा त करने को तैयार नह थी। वे स दय से चले आ रहे अपमान, िपटाई, गाली और अ य दूसरे क म के जु म को िनयित क बात मानकर सहने को तैयार नह थे।34 द ली म जबसे नई सरकार ने स ा संभाली थी, ह रजन पर हमले बढ़ गए थे। ीमती गांधी के दस साल के शासनकाल म ह रजन पर हमल क कु ल 40,000 घटनाएं दज क गई थ । ले कन िसफ अ ैल 1977 से लेकर िसतंबर 1978 तक जब जनता पाट स ा म थी, इस तरह क 17,775 घटनाएं दज क ग । एक अनुमान के मुतािबक इनम से दो ितहाई घटनाएं उ र भारत के रा य म , जहां जनता पाट क सरकार काम कर रही थ ।35 इनम से सबसे गंभीर संघष महारा के मराठवाड़ा म आ, जो कभी िनजाम के शासन के तहत आता था। मराठवाड़ा, महारा का एक सूखा त और सुदरू वत इलाका है, जहां अनुसूिचत जाित के लोग डाॅ. बी.आर. अंबेडकर से खासे भािवत थे। इनम से ब त ने बौ धम अपना िलया था, जब क ब त ने गांधीजी ारा दया गया ‘ह रजन’ श द छोड़कर खुद को ‘दिलत’ कहना शु कर दया था। ह रजन का मतलब ई र क संतान होता है, जब क दिलत श द उनक वा तिवक ि थित को यादा सही तरीके और मजबूती से करता था। अपने आपको ‘दिलत पथस’ कहने वाले कु छ लेखक और किवय ने ये मांग शु क क औरं गाबाद िव िव ालय का नाम बदलकर उनके महान नेता अंबेडकर के नाम पर कया जाए। औरं गाबाद, मराठवाड़ा का मुख शहर है। 27 जुलाई, 1978 को उनक ये मांग मान ली गई और रा य सरकार ने िव िव ालय का नाम बदलने संबंधी ताव पा रत कर दया। अब मराठवाड़ा िव िव ालय का नाम डाॅ. बी.आर. अंबेडकर िव िव ालय हो गया। ले कन सरकार के इस फै सले का दबंग मराठा जाितय ने घोर िवरोध कया। इसके िवरोध म छा ने बंद का आयोजन कया, दुकान , कायालय , कू ल और काॅलेज को बंद कर दया गया। इसके बाद यह िवरोध गांव तक फै ल गया। दिलत बि तय और उनके गांव पर हमले भी कए गए। कह -कह आगजनी क घटनाएं भी । एक अनुमान के मुतािबक करीब 5000 लोग बेघर हो गए, िजनम यादा सं या िनचली जाित के लोग क थी। इस घटना के बाद िव िव ालय का नाम बदलने का फै सला वापस ले िलया गया।36 मराठवाड़ा संघष से पहले तीन महीने यू.पी. के शहर आगरा म दिलत और ऊंची जाित के लोग के बीच हंसक झड़प ई। वजह वही थी। एक बार फर डाॅ. अंबेडकर के स मान म सावजिनक प से समारोह करने पर झगड़ा शु हो गया। आगरा म जाटव और मोिचय (अनुसूिचत जाित) क खासी आबादी है, जो जूते के कारोबार से अपे ाकृ त समृ हो गए। 14 अ ैल, 1978 को उ ह ने एक हाथी पर अंबेडकर क मू त को िबठाकर जुलूस िनकाला। हाथी पर अमूमन हंद ू राजे-महाराजे ही बैठते थे। दिलत क ये िह मत देखकर ऊंची जाित के लोग आपे से बाहर हो गए। जुलूस पर हमला कर दया गया। इसके जवाब म जाटव ने ऊंची जाित के लोग क दुकान म तोड़-फोड़ कर दी। दो स ाह तक िछटपुट झड़प चलती रह और आि़खरकार शांित बहाली के िलए सेना को बुलाना पड़ा।37 VII जनता सरकार के पहले साल म जो 10,000 से यादा जातीय हंसा क घटनाएं । उसम से एक ऐसी थी, िजसका भाव कह यादा ापक था। इसक गूंज ब त दूर तक सुनाई पड़ी। यह घटना िबहार के एक गांव बेलछी म ई थी, जहां 27 मई, 1977 को ऊंची जाित के लोग ने 9 ह रजन को जंदा जला दया। संसद म िवप के नेता वाई.बी. च नान ने घोषणा क क वे इस घटना क जांच के िलए बेलछी का दौरा करगे। ले कन च नान वहां नह जा सके । अब उनक पाट के नेता और पूव धानमं ी इं दरा गांधी ने बेलछी का दौरा करने का फै सला कया। चुनाव म अपनी हार और अपने बेलछी दौरे के बीच ीमती गांधी काफ िनराश थ । अपने बेटे संजय गांधी के साथ वे राजनीित से सं यास तक लेने के बारे म सोच रही थ । लोग ऐसा कहते थे क वे िहमालय क घा टय म कह छोटा सा मकान बनाकर रहगी। ले कन िबहार म ए इस ह याकांड के बाद वह फर से हरकत म आ ग । उनक राजनैितक चेतना ने उ ह कहा क यह ह याकांड राजनीित म उनक पुनवापसी का आसार लेकर आया है। बस फर या था, जैसे ही वाई.बी. च नान ने अपनी घोषणा पूरी करने म देर क , ीमती गांधी हवाई माग से पटना प च ं ग और वहां से बेलछी के िलए रवाना । उस समय बा रश म सड़के टू टफू ट गई थ । उ ह कार छोड़कर जीप लेनी पड़ी, फर आगे क या ा के िलए उ ह ने ै टर िलया। आिखरकार जब दलदल म ै टर ने जवाब दे दया, तो उ ह ने हाथी पर चढ़कर सफर पूरा कया। इस तरह अपना सफर पूरा करते ए पूव धानमं ी लोग को सां वना देने उस गांव तक ग , जहां के लोग जातीय हंसा म मारे गए थे।38 ीमती गांधी के इस नाटक य अंदाज ने उ ह फर से राजनीित के क म ला दया। ब त बाद म उनके एक िवरोधी ने इसे याद करते ए कहां क उनक बेलछी या ा ने कई ‘उ े य ’ को एक साथ पूरा कया। इसने जनता सरकार के उस दावे को कमजोर कया, िजसके मुतािबक सरकार गरीब और ह रजन क िहतैषी थी। इं दरा गांधी के इस दौरे ने उनक गरीब और वंिचत के िहतैषी होने क छिव मजबूत क । इसने आम कां ेिसय को भी आ त कया क ीमती गांधी अभी भी स य ह और पाट को फर से स ा म लाने के िलए उनपर भरोसा कया जा सकता है।39 बेलछी जाने का फै सला ीमती गांधी का िब कु ल अपना फै सला था, ले कन सरकार के कु छ अदूरदश कदम ने भी उनक पुनवापसी म मदद क । अ टू बर, 1977 के पहले स ाह म गृहमं ी चरण संह ने इं दरा गांधी को िगर तार करने का फै सला कया। इसके िलए क ीय जांच यूरो ने उन पर ाचार के मामले म एक आरोपप तैयार कया। इन ज री कागजात के साथ पुिलस ीमती गांधी के आवास पर गई और उनको िहरासत म ले िलया। पुिलस क योजना थी क उनको पड़ोस के रा य ह रयाणा ले जाया जाए। रा ते म एक रे लवे ाॅ संग पर पुिलस को कना पड़ा। ीमती गांधी ने इस अवसर का फायदा उठाया और गाड़ी से उतरकर वह एक पुिलया पर धरने पर बैठ ग । इस बीच उनके वक ल ने पुिलस से कहा क वारं ट इस बात क इजाजत नह देता क ीमती गांधी को द ली से बाहर ले जाया जाए। पुिलस और वक ल के बीच बहस शु हो गई, िजसे सुनने के िलए वहां लोग क भीड़ लग गई। आिखरकार, पुिलस को ीमती गांधी के वक ल क बात माननी पड़ी और उ ह वापस द ली ले जाया गया। ीमती गांधी को रातभर पुिलस िहरासत म रखा गया और अगली सुबह मिज ेट के सामने पेश कया गया। मिज ेट ने पुिलस के आरोप को ‘का पिनक और िबना कसी ठोस सबूत’ का बताते ए खा रज कर दया। सरकार क ये चाल बुरी तरह िपट गई। ीमती गांधी क इस िगर तारी ने जनता सरकार क बड़ी कर करी क और उनके बल िवरोधी क लोकि यता म इजाफा कया। अब ीमती गांधी ने सरकार के िखलाफ मोचा खोल दया। उ ह ने बढ़ते अपराध और महंगाई (मु फ ित दो अंक म प च ं गई थी) को मु ा बनाया और मुनाफाखोरी, जमाखोरी और कालाबाजारी क आलोचना क । अ टू बर के आखरी स ाह म यूयाॅक टाइ स ने िलखा क पूव धानमं ी आिखरकार एक बार फर से जोर-शोर से सरकार का िवरोध कर रही ह और अपनी रा ीय छिव को फर से हािसल करना चाहती ह।40 एक बार फर से उभरकर सामने आती ई ीमती गांधी, जनता पाट के नेता के िलए चंता का सबब बन ग । उनक पुनवापसी क संभावना से उनक पाट के कई नेता भी सतक हो गए। कां ेस के कु छ नेता ने उनके िखलाफ पहले ही शाह आयोग म गवाही दे दी थी। जनवरी, 1978 म कां ेस औपचा रक प से दो टु कड़ म बंट गई। ीमती गांधी का खेमा कां ेस(आई) कहलाया। उसके अगले महीने उनक पाट ने आं देश और कनाटक म ए िवधानसभा चुनाव म आसानी से जीत हािसल कर ली। इन चुनाव म ीमती गांधी मु य चारक थ । चुनाव के नतीज ने सािबत कर दया क कम से कम दि ण भारत म गरीब , आ दवािसय , अनुसूिचत जाितय और मिहला के बीच उनक छिव ज र पु ता थी।41 ीमती गांधी अब कसी ऐसी सुरि त सीट क तलाश म थ , जहां से जीतकर वह संसद प च ं सक। उ ह ने कनाटक के काॅफ उ पादक इलाके म पड़नेवाले िचकमगलूर सीट का चुनाव कया। रा य के मु यमं ी देवराज अस शासिनक कामकाज म अपनी कु शलता के िलए मश र थे। रा य के हजार बटाईदार को जमीन पर उनका हक दलवाना उनक उपलि धय म शुमार था। उनके खुद के और देवराज अस के मजबूत काय ने ीमती गांधी को अपने मूल रा य उ र देश को छोड़कर देश के दूसरे छोर से चुनाव लड़ने को े रत कया।42 पूव धानमं ी के िखलाफ चुनाव मैदान म वीर पा टल थे। पा टल कनाटक के अ यिधक स मािनत नेता और पूव मु यमं ी रह चुके थे। पा टल का चुनाव अिभयान ीमती गांधी के आपातकालीन पुराने धुर िवरोधी जाॅज फनाडीस संभाल रहे थे, जो जनता सरकार म उ ोग मं ी थे। फनाडीज ने एक संवाददाता से कहा क ‘जब तक मतदान ख म नह हो जाता म चुनाव े से बाहर कदम नह रखूंगा। हम ीमती गांधी को हर हाल म हराना है।’ ीमती गांधी ने इस चुनौती को गंभीरता से िलया। उसी संवाददाता ने ये खबर दी क ‘ ीमती गांधी मिहला और ब क तरफ ग रमामय ढंग से मु कु राती ह, सैकड़ जगह सड़क कनारे लोग से फू लमालाएं लेती ह, कई पूजा थल पर जाती ह और सभी धम के संत से मुलाकात करती ह।’43 आिखर म जब चुनाव के नतीजे आए तो ीमती गांधी आसानी से जीत ग । ले कन य ही संसद म उ ह ने फर से वेश कया उनके िखलाफ ‘िवशेषािधकार हनन’ का आरोप लगा दया गया। जनता पाट के सद य क ब मत वाली एक संसदीय सिमित ने आरोप लगाया क 1974 म वह जब धानमं ी थ , तो उ ह ने संजय गांधी क मा ित कार फै टरी क जांच म बाधा डाली थी और संसद को गुमराह कया था। उ ह दंिडत करने का काम ‘सदन के िववेक’ पर छोड़ दया गया। सदन म जनता पाट के ब मत ने ये फै सला दया क उ ह एक स ाह के िलए जेल भेज दया जाए। चुनाव आयोग ने कहा क अगर वे जेल जाती ह, तो उ ह अपनी सीट से इ तीफा देना होगा। इस वजह से दोबारा उप-चुनाव करवाया गया, एक बार फर ीमती गांधी चुनाव लड़ और एक बार फर उ ह ने जीत हािसल क ।44 VIII ीमती गांधी को अपमािनत करने का जनता सरकार का फै सला िब कु ल गलत सािबत आ। िजस ग रमा के साथ ीमती गांधी ने अपने जीवन के इस राजनीितक संकट को झेला उसक लोग ने काफ तारीफ क । उ ह दो बार थोड़ी-थोड़ी अविध के िलए िगर तार कया गया, इससे जनता म उनक छिव शहीद क बन गई। सचाई तो ये थी क जो लोग स ा म आए थे, वे खुद आपातकाल क यादितय को झेल चुके थे, ले कन अब बदला लेने पर उता थे। उ ह इस व सही ढंग से सरकार चलाने पर अपना यान क त करना चािहए था। ले कन वे एक ि िवशेष के िखलाफ लगे ए थे। यह उनके दृि कोण क संक णता को साफ दखाता था। पूव धानमं ी को िगर तार करने के पीछे जनता खेमे म नेता क आपसी ित िं ता भी काम कर रही थी। गृहमं ी चरण संह, मोरारजी देसाई के अधीन नंबर-2 क हैिसयत से काम करने को तैयार नह थे। इं दरा गांधी को िगर तार करके वे खुद राजनीित का क बंद ु बनना चाहते थे। उस लड़ाई म उ ह ने दूसरा मोचा भी खोल दया। उ ह ने धानमं ी देसाई को उनके ही बेटे कांित देसाई के बढ़ते भाव के िखलाफ िच ी िलख डाली। कांित देसाई अपने िपता के साथ ही रहते थे और उनका सारा काय म तय करते थे। कांित देसाई क अमया दत तुलना संजय गांधी से क जाने लगी। 1978 के पूवाध म धानमं ी मोरारजी देसाई और गृहमं ी चरण संह के बीच तीखा प चार आ। आिखरकार 1978 म मोरारजी देसाई, चरण संह को बखा त करने पर मजबूर हो गए। चरण संह के साथ उनके खास सहयोगी राजनारायण को भी बखा त कर दया गया। जनता पाट के दूसरे नेता ने शांित समझौता करवाने क काफ कोिशश क ले कन कोई फायदा नह आ। दसंबर म चरण संह ने अपनी चु पी तोड़ी और द ली म एक िवशाल कसान रै ली का आयोजन कया। करीब 2 लाख कसान द ली म अपने नेता को सुनने जमा हो गए। इसम चरण संह के वजातीय जाट क सं या सबसे अिधक थी। ये लोग उ रभारत के िविभ िह स से ै टर और लाॅरी पर सवार होकर आए थे। चरण संह ारा ताकत के इस दशन ने मोरारजी देसाई को उ ह फर से मंि मंडल म लेने पर मजबूर कर दया। फरवरी, 1979 म चरण संह को िव मं ी बना दया गया। साथ ही चरण संह उप- धानमं ी भी थे। उस सरकार म दो उप- धानमं ी थे। दूसरे उप- धानमं ी का पद जगजीवन राम को िमला था। चरण संह ने पहले बजट म कसान के िलए खजाना खोल दया। खाद और संचाई पर खासी सरकारी सहायता दी गई। ले कन मोरारजी और चरण संह के बीच आ यह समझौता ब त दन तक नह टक पाया। जनता पाट म सोशिल ट खेमा चरण संह को समथन करता था, जब क जनसंघ ने मोरारजी को समथन करने का फै सला कया। जनसंघ के सद य क ‘दोहरी सद यता’ ने इन दोन खेम के बीच क दूरी को और भी बढ़ा दया। दोहरी सद यता का मतलब ये था क जनसंघ के सद य एक ही समय जनता पाट के सद य भी थे, जब क दूसरी तरफ रा ीय वयंसेवक के साथ उ ह ने अपना संबंध बरकरार रखा था। जब क माच 1977 म अटल िबहारी वाजपेयी ने घोषणा क थी क उनक पुरानी पाट अब मर गई है और ‘ख म’ हो गई है। ले कन ऐसी धारणा बनती गई क जनता पाट के जनसंघी पृ भूिम के सांसद और मंि य को आरएसएस से दशा-िनदश से िमल रहा है। उनसे कहा गया क वे आरएसएस से अपने संबंध के समाि क घोषणा कर। जनसंघी पृ भूिम के जनता सांसद ने ऐसा करने से ये कहकर इं कार कर दया क आरएसएस महज एक ‘सां कृ ितक संगठन’ है। जुलाई, 1979 म सोशिल ट ने संसद म एक अलग समूह के प म बैठने का फै सला कया। नतीजतन जनता पाट टू ट गई और सरकार अ पमत म आ गई। मोरारजी देसाई को इ तीफा देना पड़ा। सरकार को फर से ब मत म लाने के िलए मोरारजी देसाई ने कां ेस के एक खेमे को मनाने क कोिशश क जब क जगजीवन राम ने दूसरे को। इसी बीच इस खेल म तीसरे िखलाड़ी चरण संह ने अपने पुराने िवरोधी इं दरा गांधी के साथ मौकावादी गठजोड़ कर िलया। इं दरा गांधी से समथन क िच ी पाकर चरण संह रा पित को भरोसा दलाने म कामयाब रहे क संदन का ब मत उनके साथ है। उ ह ठीक उसी व शपथ दलाई गई, जब धानमं ी ारा लाल कले से वतं ता दवस के मौके पर भाषण दया जाता है। इस तरह पहली बार एक कसान का बेटा देश का धानमं ी बन गया।45 इस तरह जनता पाट का िवखंडन हो गया। जय काश नारायण ने नाउ मीदी जािहर करते ए जनता पाट के अपने अनुयाियय को कई खत िलखे। बावजूद इसके जनता पाट को टू टने से नह बचाया जा सका। जेपी बुरी तरह टू ट चुके थे। अ टू बर, 1979 म उनक मृ यु हो गई। उदार िवचार वाले संपादक ए.डी. गोरवाला ने ांजिल अ पत करते ए जेपी को देश क ‘महान नैितक शि और सही-गलत के बीच म फक करने वाला’ बताया। गोरवाला ने आगे िलखा क जनता पाट का िनमाण और उसक िवजय उनका अंितम महान काम था, िजसे संक ण मानिसकता के बेवकू फ और भेदभाव करने वाले नेता ने अपने वाथ और अहं के िलए बबाद करके रख दया। जेपी इससे ‘बुरी तरह टू ट गए।’46 पटना म जेपी का अंितम सं कार कया गया। उनक अं येि म शािमल होने वे सारे आ मक त लोग आए, िज ह ने जनता पाट के योग को चकनाचूर कर दया था। इसम मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण संह भी शािमल थे। सबसे बड़ी बात यह थी इस अं येि म शािमल होने वाल म संजय गांधी और उनक मां इं दरा गांधी भी थ । इं दरा गांधी ने अपने एक िम को प िलखते ए कहा, ‘बेचारे ... जेपी... एक द िमत दमाग के साथ वह कस तरह कुं ठत जीवन जी रहे थे!’ उ ह ने उनके जीवन के उतार-चढ़ाव क वजह उस गांधीवादी दखावे को बताया िजसक वजह से उ ह ने महा मा क अनुयायी भावती से शादी करने पर चय के पालन क घोषणा क थी। ीमती गांधी ने ट पणी क ‘जेपी के उस दखावे और मेरे िपता से उनक ई या ने उनके पूरे जीवन को प रभािषत कया। यह कहना बेवकू फ है क उ ह स ा का मोह नह था। उनके ि व का एक िह सा तो उसक पुरजोर वकालत करता था। उनका ि व इन दो िह स म िवभािजत था। वह स ा का उपभोग भी चाहते थे और ये भी चाहते थे क लोग उ ह एक शहीद और संत के प म याद कर।’47 हालां क ीमती गांधी के इस बयान म ज र कु छ यादा ही तीखापन और अितरं जना है। ीमती गांधी अपने पुराने िम से धुर-िवरोधी बने ि और उसके ारा बनाई गई पाट क दशा देखकर वाभािवक प से ब त ही खुश थ । जब िपछली जुलाई म मोरारजी देसाई ने धानमं ी पद से इ तीफा दे दया और चरण संह शपथ ले रहे थे, उस व िह मत पि का ने िलखा क इस हालात म ीमती गांधी ही एकमा नेता ह जो म याविध चुनाव चाह रही ह और िज ह इससे सबसे यादा फायदा भी िमलने क संभावना है। यह ीमती गांधी के िहत म है क चरण संह धानमं ी बन ले कन वे उस पद पर दो या तीन महीन से यादा न रह।48 जुलाई 1979 के आखरी म चरण संह को धानमं ी पद क शपथ दलाई गई और इसके ठीक एक महीने बाद कां ेस (आई) ने रा पित को सूिचत कया क वो सरकार से समथन वापस ले रही है। रा पित ने फर एक महीने दूसरे पा टय के दावे पर िवचार कया। आिखर म रा पित को ऐसा लग गया क म याविध चुनाव ही इस सम या का एकमा समाधान है। ले कन चुनाव आयोग को फर भी नया चुनाव करवाने के िलए कु छ व चािहए था। इस तरह चरण संह अगले दो महीन के िलए भी साल के आखरी तक धानमं ी बने रहे, िह मत पि का ने उनके पद पर रहने क िजतनी भिव यवाणी क थी उससे भी दो महीने यादा। IX जनता पाट ऊंची उ मीद के लहर पर सवार होकर स ा म आई थी। इसने जनता को अिधनायकवादी शासन से मुि और आजादी क दूसरी लड़ाई लड़ने का वादा कया था। ले कन स ा म आने के एक ही स ाह के भीतर इसने जनता के सहानुभूित क ध ी उड़ानी शु कर दी। क और रा य म जनता पाट के नेता बेहतरीन बंगल , महंगे एयरकं डीशनर और शानदार पा टय के पीछे भागने लगे। उनके संबंिधय क शा दयां भड़क ले अंदाज म होने लग । उनके लंब-े चौड़े टेलीफोन और िबजली के िबल आने लगे और वे छोटे-मोटे काम के िलए भी िवदेश का दौरा करने लगे।49 यहां तक क पारं प रक प से जो पि काएं गैर-कां ेसी आ करती थ वो भी िलखने लग क जनता पाट म ‘आदशवाद’ क मौत हो गई है और यह बड़ी तेजी से पारं प रक तरह क ‘राजनीितक पाट ’ म त दील हो गई है। इसके नेता यादा से यादा पद और ज रत म दलच पी लेने लगे और समाज को बदलने का काम नेप य म चला गया। ऐसा कहा जाने लगा क कां ेस को अपने िस ांत को अलिवदा कहने म तीस साल लग गए जब क जनता पाट अपने िनमाण के महज साल भर के भीतर ऐसा कर बैठी।50 जनता सरकार के तीन साल के कायकाल पर ट पणी करते ए एक राजनीितक िव ेषक ने िलखा क यह पाट द िमत और आपस म लड़ने-झगड़ने वाले लोग का जमावड़ा है, यहां िन ाएं बदलती रहती ह, तोड़फोड़ होती रहती है, एक-दूसरे पर नाकािबिलयत, ाचार और अपमान के आरोप लगते रहते ह और यह काम वो लोग कर रहे ह जो ीमती गांधी को हराकर स ा म आए ह।’51 िजन भारतीय ने उस दौर का अनुभव कया था उन सभी का यही कहना था। कई लोग ने तो यहां तक कहा क जनता पाट जोकर का समूह है। ले कन एक बड़े ही जानकार िवदेशी पयवे क का कहना था क इन आपस क लड़ाइय और झगड़ के बावजूद जनता पाट ने भारतीय लोकतं के िवकास म एक अहम योगदान दया। ेनिवली आॅि टन नाम के इस टीकाकार का कहना था क जनता पाट के स ा म आने के बाद संिवधान को फर से सही कया गया, िजसे आपातकाल के दौरान तोड़मरोड़ दया गया था। संिवधान म नए संशोधन करने के िलए आमसहमित से काम िलया गया और यायपािलका क ग रमा और उसक वतं ता को फर से बहाल कया गया।52 इसक पहल मोरारजी देसाई ने क । 1977 म ए चुनाव से ठीक पहले दए गए अपने एक सा ा कार म देसाई ने कहा क आपातकाल के दौरान संिवधान क ही ‘नसबंदी’ कर दी गई! उ ह ने कहा क अगर उनक पाट स ा म आती है तो वे जनता के दलो दमाग से भय को दूर करने का यास करगे। उ ह ने कहा क ‘इसके बाद हम संिवधान को ठीक करगे। हम सुिनि त करना चाहगे क इस तरह का आपातकाल फर कोई लगा न पाए। कोई भी सरकार ऐसा न कर पाए।’53 आपातकाल के बाद संिवधान म ई गड़बड़ी को दूर करने का अहम काम कानून मं ी शांित भूषण के कं धे पर आ पड़ा। वे काफ कमठ क म के इं सान थे। सबसे अहम संशोधन िजसे दूर करना था वो 42वां संशोधन था। इसके आपि जनक ावधान को हटाने के िलए दो नए संशोधन तैयार कए गए। इन संशोधन के तहत संसद और िवधानसभा का कायकाल फर से पांच साल कर दया गया, धानमं ी पद समेत सभी चुनावी िववाद म सु ीम कोट क सव ता थािपत क गई, रा पित शासन को सीमाब कया गया, संसदीय और िवधायी कायवाही के काशन को ज री बनाया गया और आपातकाल क घोषणा करना और भी यादा क ठन कर दया गया। अब इस तरह क कोई भी घोषणा संसद म िबना दो ितहाई ब मत के नह क जा सकती थी और इसे हरे क छह महीने पर नवीनीकरण करना ज री कर दया गया। इसे अब ‘सश िव ोह’ क सूरत म ही लागू कया जा सकता था, महज अंद नी गड़बड़ी के आधार पर नह । इन प रवतन का उ े य कायपािलका क मनमानी शि य पर अंकुश लगाना और यायपािलका के अिधकार को बहाल करना था। इससे भी यादा इन संशोधन का वा तिवक उ े य संिवधान को बहाल करना था, जो ीमती गांधी के आपातकालीन संशोधन क वजह से तोड़-मरोड़ दया गया था। कानूनी बारी कय क वजह से इन संशोधन को तैयार करने म व लगा। इसम व इसिलए भी लगा य क सहयोगी दल से आमसहमित लेनी भी आव यक थी ता क इसे आसानी से संसद म पा रत कया जा सके । जब संसद म इस पर बहस चल रही थी, उस व ेस शाह आयोग क कायवािहय को रपोट करने म त था। इसके अलावा आपातकाल के दौरान क गई यादितय पर कई पु तक कािशत क जा रही थ । ऐसे हालात म कां ेस भी अपने नेता ारा कए गए संिवधान संशोधन के प म बोलने क मनोि थित म नह थी। अब उसक ितपू त संिवधान के 44व संशोधन ारा क जा रही थी। 7 दसंबर, 1978 को जब यह िवधेयक संसद म आसानी से पा रत कया जा रहा था, तो उसके प म पुराने दो धुर िवरोधी साथ-साथ मतदान कर रहे थे। उनका नाम था मोरारजी देसाई और ीमती इं दरा गांधी!54 X हालां क जनता पाट अपना कायकाल पूरा करने म नाकामयाब रही ले कन चुनाव म इसक जीत भारत के राजनीितक इितहास म एक अहम बंद ु है। आजादी के बाद पहली बार कोई गैर-कां ेसी पाट क क स ा म आई थी। रा य म भी राजनीितक प रदृ य सतरं गा हो गया। बंगाल म क युिन ट स ा म आ गए तो तिमलनाडु म एआईएडीएमके । भारतीय राजनीितक व था अब िवक त हो रही थी और ऐसा िसफ दलगत संदभ म नह हो रहा था। स र के दशक के आिखर से देश म ‘नए सामािजक आंदोलन ’ क बाढ़ सी आ गई। सन् 1978 म बंबई म ‘समाजवादी िवचार के ना रवा दय ’ का एक बड़ा स मेलन आयोिजत कया गया िजसने ‘मिहला अिधकार के हनन’ का मु ा उठाया। दहेज और बला कार के िखलाफ अिभयान चलाए गए। पु ष म नशाखोरी और मिहला के िखलाफ होने वाले यौन दु यवहार के मु े को जोरशोर से उठाया गया। मिहला के िलए कारखान और घर म बेहतर माहौल क मांग क गई। नारीवादी आंदोलन क ये लहर ापक थी और ापक मु को उठाती थी। यह कई रा य म फै ली ई थी जो जनसभा , नु ड़ नाटक , पचा◌े और घर-घर जाकर अपने मु का चार कर लोग का समथन जुटा रही थी।55 स र के दशक के आखरी म देश म एक ापक पयावरण आंदोलन भी उठ खड़ा आ। कसान ने जंगल क जमीन पर अपने हक को लेकर आंदोलन शु कर दया तो आ दवािसय ने बड़ी औ ोिगक प रयोजना से होने वाले िव थापन के िखलाफ िवरोध शु कया। समंदर के कनारे मछु आर ने मछली मारने वाली बड़ी नौका के िखलाफ िवरोध दशन शु कया जो बड़े पैमाने पर समु से मछिलय को िनकाल रहे थे। इन िवरोध दशन म दो बात काफ अहम थ । पहली इन आंदोलन म मिहला क भूिमका बड़ी अहम थी, जो पयावरण क ित क सबसे बड़ी भु भोगी थ । दूसरी बात पि मी देश के उलट हंद ु तान म चल रहा आंदोलन ‘गरीब का पयावरण आंदोलन’ था िजनके िलए कु दरत का यह नायाब तोहफा उनके वजूद के साथ जुड़ा आ था। पि मी देश म पयावरण आंदोलन यादातर म यवग ारा चलाया जाता था, जो इसम एक खास क म का स दयबोध खोजते थे।56 नारीवादी आंदोलन और पयावरण आंदोलन दोन ही स र के दशक के शु आत म शु म ए थे। आपातकाल क वजह से उनक र तार धीमी पड़ गई थी ले कन जब आपातकाल ख म आ तो वे फर से नई ताकत के साथ उठ खड़े ए। यही हाल नाग रक अिधकार आंदोलन का भी था। इसक उ पि कलक ा जेल म न सली कायकता के साथ ई बदसलूक से ई थी। जेल म जब कै दय ने बीड़ी-िच ी आंदोलन (बीड़ी और प चार क सुिवधा क मांग) क शु आत क तो अिधका रय ने इस मांग को मानने से इं कार कर दया। इसे देखकर एक इं जीिनयर किपल भ ाचाय ने ‘लोकतांि क अिधकार सुर ा संगठन’ बनाने का फै सला कया। आपातकाल के लगने से इस तरह के कई समूह द ली, बंबई, हैदराबाद और अ य शहर म भी बने। इसम से कु छ संगठन ने रा य ारा मानवािधकार के उ लंघन और जनता क वतं ता क मांग पर अपना यान क त कया, तो दूसरे समूह ने लोकतांि क अिधकार के ापक मु पर। इन मांग म संिवधान द जीवन जीने का अिधकार, म का बेहतर मू य और कामकाज का बेहतर माहौल और उिचत रोजगार क मांग भी शािमल थी। कु छ समूह ने जेल सुधार और सरकारी अिधका रय खासकर पुिलस ारा अपने अिधकार के दु पयोग पर यान क त कया तो दूसरे समूह ने रा य क नीितय का वंिचत , िनचली जाितय और खासकर आ दवािसय के जीवन पर पड़ने वाले कु भाव के िखलाफ आवाज बुलंद क । इन समूह ने रा य ारा नाग रक और लोकतांि क अिधकार के उ लंघन पर दजन रपोट कािशत क । ये लोग िनचले तर के सुदरू वत इलाक म जाकर तहक कात करते थे। ऐसे लोग म शहर म रहने वाले और लोकिहत म काम करने वाले बुि जीवी शािमल थे।57 इन आंदोलन को नया आंदोलन कहा गया य क उ ह ने ऐसे मु को उठाया था, जो पुराने व के कसान-मजदूर आंदोलन म छू ट गए थे। हालां क, स र के दशक के आिखर म उन पुराने आंदोलन ने भी अपने आपको नए व प म ढाला और अपनी मांग बुलंद क । इस तरह ेड यूिनयन आंदोलन िजसका यान पहले कारखान म काम करने वाले मजदूर के िहत तक ही सीिमत था, अब खदान , घर और लघु उ ोग म काम करने वाले मजदूर के िहत म भी उठ खड़ा आ। इन आंदोलन म छ ीसगढ़ खदान िमक संघ का नाम अहम है, िजसके नेता शंकर गुहा िनयोगी थे। िनयोगी ने मजदूर आंदोलन म गांधी और मा स के िवचार को आ मसात करने क कोिशश क । िजस इलाके म छ ीसगढ़ खदान िमक संघ स य थी, वहां के खदान मजदूर िभलाई इ पात कारखाने के िलए काम करते थे। यादातर आ दवासी पृ भूिम के खदान िमक के बीच काम करते ए िनयोगी ने मिहला-पु ष मजदूर के िलए समान मजदूरी, पु ष क नशाखोरी और उसक वजह से औरत पर ढाए जाने वाले जु म के िखलाफ आवाज उठाई। उ ह ने मजदूर के ब के िलए कू ल खोले और खान मािलक से मजदूर के िलए बेहतर वा य सुिवधाएं और बेहतर मजदूरी क मांग क ।58 इन सारे आंदोलन के समथन म प कार क एक नई पौध पनप आई थी। आपातकाल क समाि ने प कार म एक नई ऊजा का संचार कया, यह कु छ ऐसा ही था जैसे आजादी क लड़ाई के व महसूस आ था। अब ेस ससरिशप का खतरा नह था और संपादक और संवाददाता का अपनी खबर पर कची चलने का भय ख म हो गया था। स र के दशक म भारत म पहले आॅफसेट ेस का आगमन भी आ। इससे भी ेस को काफ मदद िमली। अब अखबार को पुराने ढर के मशीन म गम धातु के लेट पर काफ मेहनत से छापने क सम या ख म हो गई। साथ ही अखबार और पि का के िलए अब बड़े शहर से ही िनकलना आव यक नह रहा। राॅिबन जेफरी नाम के इितहासकार ने भारत क ‘अखबारी ांित’ का ामािणक अ ययन कया है, जो 1977 म शु ई और उसके बाद आगे ही बढ़ती गई। इस अखबारी ांित के कई पहलू थे ले कन कम से कम पांच कारक पर हम साफतौर पर नजर रख सकते ह। इनम से दो का ता लुक नई तकनीक से था। अब एक ही साथ बड़े शहर और सुदरू वत इलाक म कई सं करण को छापने म स िलयत हो गई। दूसरा छपाई का तर खासकर त वीर और अ य दृ य को बेहतर ढंग से छापा जा सकता था। इससे बड़ा फक पड़ा। इस ांित का दूसरा पहलू समाज और राजनीित म बदलाव से भािवत था। आपातकाल के बाद ेस ससरिशप के खा मे से खोजी प का रता को काफ बल िमला। अपराध और राजनीितक ाचार पर कई धमाके दार खबर छपने लग । देश म सा रता क वृि और म यवग के िव तार ने े ीय भाषा क प का रता को नई ऊजा दान क । 1979 म कए गए नेशनल रीडरिशप सव के आंकड़ां◌ के मुतािबक कम से कम 4 करोड़ 80 लाख शहरी भारतीय लगातार कोई न कोई अख़बार या पाि क पढ़ते थे। जब क यह सव ण महज शहर तक सीिमत था। सबसे यादा तेज र तार से वृि छोटे शहर से िनकलने वाले भारतीय भाषा के अखबार म ई थी। 1979 म पहली बार हंदी अखबार के पाठक क सं या ( हंदी बोलने वाल क सं या देश क कु ल आबादी क 40 फ सदी है) अं ेजी अखबार के पाठक (अं ेजी को महज 3 फ सदी लोग बोल पाते है) को पार कर गई। नई प का रता म आमलोग क बोलचाल क भाषा िलखने पर जोर दया गया, िजसे लोग आसानी से समझ सक। जब क पुराने जमाने क प का रता म संपादक और संवाददाता गंभीर और औपचा रक भाषा पर जोर देते थे। पौरािणक सं कृ त से िनकाले गए मुहावर और लोकोि य का चलन ख म कर दया गया और दैिनक बोलचाल क भाषा अखबार म जगह पा गई।59 ले कन 70 के दशक के उ राध म देश म दो पर पर िवरोधी वृि यां भी आकार ले रही थ । एक तरफ तेजी से सरकार के आने और जाने के साथ पूरी राजनीित छोटे-छोटे टु कड़ म बंटती जा रही थी, िजसम कु छ अपवाद को छोड़कर िस ांत के िलए कोई जगह नह थी। राजनीित एक वसाय का प धारण करती जा रही थी, िजसका मु य उ े य मुनाफा कमाना था। दूसरी तरफ ऐितहािसक प से हािशये पर रहे सामािजक समूह जोरशोर से अपने हक क आवाज उठा रहे थे। वे अपने आपको नई धमक के साथ सामने ला रहे थे। इनम िनचली जाितयां, मिहलाएं और असंग ठत े म काम करने वाले लोग शािमल थे। पहली बार एक स य नाग रक अिधकार आंदोलन सामने आ रहा था। आपातकाल के दौरान िजस ेस को डंडे के बल दबा दया गया था, वो अब सबसे यादा मुखर हो उठी थी। अगर औपचा रक और राजनीितक संदभ म देखा जाए तो भारतीय लोकतं का रण हो रहा था और इसका तर िगर रहा था। ले कन अगर गंभीरतापूवक ‘सामािजक’ तौर पर देखा जाए तो ऐसा लगता है क भारतीय लोकतं मजबूत हो रहा था और अपनी गहरी जड़ जमा रहा था। 7 संकट म लोकतं हरे क ि या हरे क पाट लोकतांि क या को रचना मक काय के िलए इ तेमाल नह करती। कभी-कभी लगता है क लोकतांि क अिधकार का योग लोग िवनाशकारी काय के िलए भी करते ह। इं दरा गांधी, मई 1968, जय काश नारायण को I 1977 के चुनाव के तुरंत बाद गा जयन के भारत ि थत संवाददाता ने िलखा क देश म लोकतं क वापसी िणक भी हो सकती है। उसने िलखा क ‘लोकतं तभी जंदा रह सकता है जब देश म आ थक सुधार और तर हो।’ उसने आगे िलखा क ‘जनता सरकार पहले से ही आ थक सम या का सामना कर रही है साथ ही मु ा फ ित चरम पर है। मजदूरी बढ़ाने क मांग हो रही है और िमक हड़ताल कर रहे ह। अगर यह सब बढ़ता ही गया तो देश म उथल-पुथल फर से शु हो जाएगी।’1 ले कन भारत के पुराने शुभ चंतक होरे स अले जडर घटना को लेकर यादा सकारा मक थे। वे अब 87 साल के हो गए थे और पिसलवेिनया म एक े कर होम म रहते थे। यूयाॅक टाइ स म छपे अपने एक प म अले जडर ने िलखा क ‘इस चम कारी चुनाव ने ये सािबत कया है क भारतीय जनता म राजनीितक साहस क कोई कमी नह है। यह राजनीितक साहस उसे गांधीजी के ि व और अपने वतं ता सं ाम क िवरासत से िमला है।’ अपने एक े कर िम को िलखते ए अले जडर ने कहा क चुनाव के नतीज ने भारत म आम आदमी क ताकत को दखाया है। उ ह ने कहा क ‘अब कसी को ये नह कहना चािहए क लोकतांि क अिधकार क बात िसफ बुजुआ अवधारणा है। कु छेक वाम बुि जीिवय के अलावा अब ऐसा ब त लोग नह सोचते।’2 अनवरत काम करने वाले और कभी न थकने वाले अले जडर ने ीमती गांधी को भी खत िलखा। आपातकाल के दौरान उ ह ने लोग क ि गत वतं ता छीनने के िवरोध म ीमती गांधी को कई तीखे खत भी िलखे थे। अपने पुराने िम जवाहरलाल नेह को याद करते ए अले जडर ने िलखा क कै से वे राजनीित से अलग हटकर पढ़ने-िलखने और आराम करने म अपना जीवन तीत करना चाहते थे। उ ह ने ता ुब करते पूछा क या नेह क बेटी ऐसा कर पाएंगी? या वह िहमालय या क मीर क वा दय म िचि़डय को िनहारते ए व िबता पाएंगी? इसके बाद उस प म कु छ कला सािह य क बात भी । आिखर म अले जडर ने िलखा क ‘हम भारत म हो रही घटना पर अपनी नजर बनाए रखगे। हम उ मीद करते ह क पांच साल के बाद फर से एक बड़े ब मत के साथ आप स ा म वापस आएंगी। इसे ही लोकतं कहते ह।’3 ले कन हक कत म ीमती गांधी को फर से स ा म आने म महज तीन साल लगे। 1980 म ए चुनाव म उनक पाट ने 353 सीट पर जीत हािसल क जो 1971 के ‘गरीबी हटाओ’ वाले चुनाव से एक सीट यादा थी! इसने दि ण भारत म ब त ही बि़ढया दशन कया जब क उ र भारत म इसे जनता पाट के दो ित ं ी घटक क लड़ाई म मत के बंटवारे का फायदा िमला। उदाहरण के िलए, उ र देश जैसे अहम रा य म कां ेस को 36 फ सदी वोट िमले जब क उसने 60 फ सदी सीट जीत ल । जनता पाट के एक धड़े को 22.6 फ सदी वोट िमले जब क दूसरे को 29 फ सदी। दोन जनता पा टय ने कु ल िमलाकर 32 सीट जीत जब क कां ेस को 50 सीट पर जीत हािसल ई।4 संपादक भाष जोशी 1980 के चुनाव को याद करते ए कहते ह क उस चुनाव ने ‘वैचा रक राजनीित’ के अंत क घोषणा कर दी। पहले के चुनाव लोकतं , समाजवाद, धमिनरपे ता और गुटिनरपे ता के मु े पर लड़े गए थे ले कन 1980 के चुनाव म ीमती गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे क जगह अपने शासन करने क ‘यो यता’ को मु ा बनाया। उ ह ने मतदाता से कहा क जनता पाट थायी सरकार नह दे सकती, थायी सरकार देने क मता िसफ उनम है। जनता पाट के खंड-खंड होने के अलावा दूसरे भी कई अ य ऐसे मु े थे, जो जनता पाट के िखलाफ गए। बाजार म आव यक व तु क भारी कमी हो गई, िजसका खािमयाजा जनता पाट को भुगतना पड़ा। एक चुनावी नारे ने जनता पाट का कु छ यूं मजाक उड़ाया - जनता पाट हो गई फे ल, खा गई चीनी, िम ी तेल।5 कु ल िमलाकर जनता पाट ने खुद ही अपनी छिव खराब कर ली। चुनाव पर गहरी नजर रख रहे एक संवाददाता ने कहा क इं दरा गांधी क तो कम से कम एक आरोिपत ‘छिव’ भी थी, ले कन जनता पाट के नेता क तो कोई ‘छिव’ ही नह है।6 इस बीच अनुसूिचत जाितय पर बढ़ते ए हमल ने इन जाितय को फर से कां ेस क तरफ गोलबंद कर दया। इसके अलावा संजय गांधी ने आपातकाल के दौरान क गई यादितय के िलए मुसलमान से माफ मांग ली और इस वग का एक तबका फर से कां ेस के समथन म आ गया।7 हंद ु तान के यादातर िह स म िन प और वतं चुनाव करवाए गए। हालां क िबहार और उ र देश के कु छ िह स म जहां सड़क और टेलीफोन लाइन टू टी ई या गैर-मौजूद थ , चुनाव आयोग हिथयारबंद गुंड ारा मतदान क पर क जे को पूरी तरह नह देख पाया। ऐसे इलाक म गं◌ुड के आजाद िगरोह घूमते थे और ‘वय क मतािधकार’ क जगह पर ‘जबद ती मतािधकार’ का योग कया गया। वहां िजन उ मीदवार के पास सबसे यादा बंदक ू होती थ , वो आम जनता क तरफ से ‘ ापक 8 मतदान’ करवा लेता था! II इं दरा गांधी के फर से स ा म आने के कु छ ही दन बाद कां ेस से सहानुभूित रखने वाले एक व र राजनीित िव ानी ने ीमती गांधी को सलाह दी क पाट को फर से वैसे ही ‘वा तिवक सं थान’ क तरह पुन न मत कया जाए, जैसे नेह के जमाने म था। ीमती गांधी को सलाह दी गई क स ा का ि क त होने क बजाय उसका उिचत बंटवारा करना और नेतृ व के ऊपर से थोपकर आने क बजाय जमीन से ताकत पाना यादा उिचत होगा। इससे पहले क ीमती गांधी को फर से हािसल ये क र मा गायब हो जाए, इसका इ तेमाल खुली राजनीित क सं था को मजबूत बनाने के िलए कया जा सके गा।’9 ये मासूम और आदश भावनाएं थ । य क िसफ ीमती गांधी ही खुद को कां ेस पाट के पयाय के प म नह देखती थ , बि क देश के आमलोग भी ऐसा ही मानते थे। मई, 1980 म उ ह ने एक िवदेशी प कार से कहा क ब त साल से वो कई ि य , समूह और राजनीितक दल के िनशाने पर रही ह। ‘वे लोग हंद ू या मुि लम क रपंथी, सामंती िमजाज वाले पुराने लोग या िवदेशी िवचार से सहानुभूित रखने वाले लोग ह। जहां एक तरफ वो देश क आ मिनभरता, आ थक मजबूती और भारत क नीितय क वतं ता के प म ह तो दूसरी तरफ कई लोग आ मिनभरता, धमिनरपे ता और समाजवाद के िखलाफ खड़े ह। वे लोग कोई न कोई बहाना खोजते रहते ह, ता क मुझे बदनाम कया जा सके ।’10 इस ि थित क ा या करने के िलए शायद िव म श द का इ तेमाल ठीक रहेगा। खैर जो भी हो, इतना तय था क इन हालात म इ दरा गांधी, िसवाय अपने बेटे संजय के , कसी के साथ स ा म साझेदारी करने को इ छु क नह थ । संजय गांधी अब पाट के सांसद थे और महासिचव भी। द ली क एक पि का ने ट पणी क क संजय गांधी एक बार फर से भारतीय राजनीित म सबसे अहम हो गए ह। जब 1980 के लोकसभा चुनाव के बाद ीमती गांधी ने 9 रा य सरकार को बखा त कर दया, तो ये संजय गांधी ही थे, िज ह ने टकट का बंटवारा कया था। कां ेस के जीतने क सूरत म संजय ही तय करने वाले थे क कौन कस रा य का मु यमं ी बनेगा। उ र देश के नविनयु मु यमं ी िव नाथ ताप संह ने ेस से कहा क ‘संजय गांधी एक ज मजात नेता ह और वह मेरे भी नेता ह।’11 ीमती गांधी अब ितरे सठ साल क हो चुक थी और उ रािधकार तय करने का िवचार उनके मन म आ रहा था। इसी बीच 23 जून, 1980 को एक जहाज दुघटना म संजय गांधी क मौत हो गई। संजय गांधी शौ कया तौर पर एक हवाई जहाज उड़ा रहे थे, िजसम एक ही इं जन था। उनके जहाज ने हवा म तीन च र काटे और चौथा च र काटने क कोिशश म िनयं ण खो बैठा। वह जहाज उनके घर से महज 500 गज क दूरी पर दुघटना त आ, जहां वे अपनी मां के साथ रहते थे। संजय और उनके सहयोगी पायलट क त ण मौत हो गई।12 अपने बेटे क मौत से शोक-संत ीमती गांधी चार दन बाद ही कामकाज संभाल पाई। संजय क मौत ने उ ह तोड़कर रख दया। अब वह िब कु ल अके ली हो ग । एक संवाददाता ने िलखा क वह अब पूरी तरह से ‘एकांत’ म रहती ह।13 अग त के आखरी तक उ ह ने अपने बड़े बेटे से इस कमी को पूरा करने का आ ह कया। इससे पहले राजीव गांधी ने राजनीित म आने क कोई इ छा नह दखाई थी। वह पूरी तरह से एक पा रवा रक इं सान थे, जो अपनी इटािलयन प ी और अपने दो ब म डू बे रहते थे। वह देश क एकमा घरे लू हवाई सेवा इं िडयन एयरलाइं स म बतौर पायलट काम करते थे। वे ए ो िवमान से लखनऊ और जयपुर क उड़ान भरते और उनका एकमा पेशेवर ल य द ली और बंबई हवाई माग पर बोइं ग िवमान उड़ाना था। ले कन अब उन पर राजनीित म शािमल होने का ब त दबाव था। यह दबाव खासकर उनक मां क तरफ से था। अग त 1980 म एक सा ा कार म राजीव गांधी ने कहा था क ‘संजय गांधी क जगह लेने का उनका कोई इरादा नह है।’ जब उनसे ये पूछा गया क या वे पाट का कोई पद या चुनाव लड़ना चाहगे, तो राजीव गांधी ने इसका नकारा मक जवाब दया। उ ह ने कहा क उनक प ी उनके ‘राजनीित म भाग लेने क क र िवरोधी है।’14 ले कन इसके नौ महीने बाद राजीव गांधी अपने भाई के संसदीय े अमेठी से सांसद चुन िलए गए। जब उनसे पूछा गया क उ ह ने अपना इरादा य बदल िलया तो उ ह ने कहा क ‘मुझे लगा क म मी क कसी भी तरह से मदद करनी चािहए।’ उनसे ब त ही सहानुभूित रखने वाले एक प कार ने उनके राजनीित म वेश पर िलखा क ‘शायद इसक वजह ये हो क ीमती गांधी, पाट और सरकार को एक िनरं तरता दान करना चाहती ह।’ प कार ने आगे िलखा क ‘राजनीितक ि ितज पर कसी तरह का नेतृ व दख नह रहा था, ऐसे म नेह प रवार से ता लुक रखना अपने आपम एक बड़ी पहचान है और इससे एक बड़ी बढ़त िमलती है।’15 देशभर के कां ेस मंि य और सांसद ने इस अिनवाय संकेत को अ छी तरह पढ़ िलया। राजीव गांधी को सलामी देने वाल क होड़ लग गई। उ ह मेिडकल काॅलेज के उ ाटन के िलए, ह रजन काॅलोिनय के िलए िबजली के लांट के उ ाटन के िलए और नेह जी के ज म दन पर कां ेस कलब म भाषण देने के िलए बुलाया जाने लगा।16 इधर राजीव गांधी भारतीय राजनीित म अपना कदम बढ़ा रहे थे, तो दूसरी तरफ उनक मां अंतरा ीय तर पर भारत क छिव दु त करने म लगी थ । आपातकाल क वजह से भारत क छिव को काफ ध ा लगा था। पि मी देश म अपनी छिव पर लगे आरोप से ीमती गांधी काफ चंितत थ । अब चूं क वह चुनाव के मा यम से फर से स ा म आ गई थ , इसिलए वह अपनी छिव को ठीक करना चाहती थ । 1982 म इं लड म पूरे आठ महीने का भारत महो सव आयोिजत कया गया, िजसम िव टो रया और अ बट सं हालय म भारतीय कला क दशनी लगाई गई। इसके अलावा इस महो सव म रिवशंकर और एम.एस. सु बाल मी के संगीत काय म भी ए और अ य कई तरह के सां कृ ितक काय म ए। कलाकार ने उ तरीय शा ीय संगीत और नृ य से लेकर लोकगीत और लोकनृ य तक का काय म कया। इस तरह वरसे टरशायर म एक हाई कू ल को राज थानी गांव के लघु प म त दील कर दया गया, जहां राज थान के नतक और क सागो स ाह भर के रहे। उनका पूरा खच कू ल ने कप लंग के नाटक जंगल बुक का दशन करके उठाया। इस महो सव को भारत सरकार ने आयोिजत करवाया था और आंिशक प से इसके खच का वहन भी कया था। भारतीय धानमं ी ने इस महो सव क शु आत और अंत म ि टेन का दौरा कया और उसका मु य आकषण बनकर उभर । आपातकाल के दौरान ि टश ेस के एक िह से ने ीमती गांधी को रा स के तौर पर िच ण कया था ले कन अब एक तंभकार ने िलखा क ‘उ ह इस बात का वागत करना चािहए क वे यहां लोग का कु छ यादा ही यान आक षत कर रही ह।’ एक समारोह म जहां ीमती गांधी और ि टश धानमं ी मु य अितिथ थ , उ ह ने कहा क भारत लोकतं और समाजवाद के ित क टब है, और िसफ समाजवाद ही ऐसा िवषय है जहां वे ीमती थेचर से इ ेफाक नह रखत । िविभ अखबार के संपादक से बातचीत करते ए उ ह ने ं यपूवक कहा क उ ह उ मीद है क अब ि टश ेस उ ह भारत क सा ा ी कहकर नह पुकारे गा। कु ल िमलाकर भारत महो सव इसके आयोजक ारा बड़ी कामयाबी के साथ संप आ। इसके बाद यह अमे रका, सोिवयत संघ और ांस म भी दोहराया गया। इस तमाशे पर आखरी श द काटू िन ट आर.के . ल मण ने िलखा। उ ह ने सड़क पर चल रहे दो अधनंगे भारतीय का काटू न बनाया। इसम से एक अखबार पढ़कर दूसरे से बात कर रहा था - ले कन इस तरह के महो सव से हम नह जान पाएंगे क हम और हमारी उपलि धयां कतनी महान ह!17 III ऐसा माना जाता है क पेशेवर प से काटू न बनाने वाले ताकतवर लोग क आलोचना करने को बा य होते ह। ले कन ल मण का मामला थोड़ा अलग था। वे बंबई म रहते थे, जहां देश के कसी भी िह से क तुलना म अमीरी और गरीबी का अंतर ब त ही यादा था। ऐसा आ क लंदन म जब भारत महो सव का आयोजन हो रहा था, उसी व बंबई क कपड़ा िमल म ब त भारी हड़ताल ई। यह हड़ताल द ा सामंत के नेतृ व म ई थी, जो पेशे से तो डाॅ टर थे, ले कन िजनक राजनीितक िवचारधारा िनि त नह थी। द ा सामंत का क र मा ऐसा था क उ ह ने समाजवा दय और क युिन ट का असर ख म कर दया था, जो पहले बंबई क ेड यूिनयन पर दबदबा रखते थे। बंबई म द ा सामंत का क रयर ए पायर डा ग नाम क एक कपड़ा िमल से शु आ था, जहां वह िमक के िलए 200 पए ित महीना वेतन बढ़वाने म कामयाब रहे थे। उनक इस कामयाबी ने उ ह दूसरी िमल क तरफ यान देने को े रत कया। बंबई के िवशाल सूती व उ ोग के िमक उनके पीछे गोलबंद हो गए। उनका वेतन साल-दर-साल बढ़ रहा था, हालां क वह महंगाई के िहसाब से पया नह था। मजदूर ने वेतनमान म पूरी तरह फे रबदल क मांग क । द ा सामंत ने मांग क क मजदूर का यूनतम वेतन 670 पए से बढ़ाकर 940 पए कर दया जाए। जब इस मांग को खा रज कर दया गया, तो उ ह ने हड़ताल का आ नान कया। 18 जनवरी 1982 को शु ई यह हड़ताल लगभग दो साल तक चली। इस हड़ताल म करीब दो लाख कामगार ने िह सा िलया और करीब 2 करोड़ 20 लाख मानव दवस क ित ई। वाकई यह सही अथ म एक जनांदोलन था। इसक गूंज शहर म ही नह बि क बाहर ब त दूर तक सुनाई दी। हजार कामगार ने िगर ता रयां द जब क दूसरे कइय ने हड़ताल को तोड़ने के िखलाफ लड़ाइयां लड़ । हड़तािलय क इस आ ामक मनोि थित ने दूसरे े के िमक को भी उकसाया। कम वेतन पाने वाले पुिलस के जवान ने भी अपना संघ बना िलया और िवरोध म सड़क पर उतर आए। इसके जवाब म पुिलस को हिथयार िवहीन कर दया गया और अधसैिनक बल ारा पकड़कर जेल म डाल दया गया।18 देश के अंद नी िह स म भी वग य आधार पर संघष पनप रहे थे। आपातकाल के दौरान पकड़े गए ले कन बाद म छोड़ दए गए न सल कायकता आं देश के इलाक म आ दवािसय के बीच अपनी पैठ बना रहे थे। ये आ दवासी सरकार के जंगल िवभाग और हंद ू सा कार के सताए ए थे। दूसरे कई न सली समूह, क ीय िबहार के ह रजन समुदाय के बीच काम कर रहे थे। यह आंदोलन ऊंची जाित के जम दार के िखलाफ था। वीिडश लेखक जेन िमरडल जैसे कु छ शुभ चंतक ने इन आंदोलन से आशा क क एक दन चीनी ांित अपना भारतीय सं करण ज र खोज लेगी।19 अ सी के शु आती दशक म देश म न ल के आधार पर ुवीकरण भी शु हो गया। एक नए आ दवासी रा य झारखंड क मांग को लेकर आंदोलन और भी तेज और हंसक होता गया। एक आिधका रक आंकड़े के िहसाब से छोटानागपुर पठार म ‘आ दवािसय के िवकास’ के िलए करीब 30 अरब पए खच कए गए थे। पता नह ये पैसा कहां गया ले कन वहां के लोग अभी भी पुरातन काल म जी रहे थे। वहां कू ल नह थे, अ पताल नह थे, सड़क नह थ और न ही िबजली क कोई व था थी। उनक जमीन बाहरी लोग ारा हड़प ली गई थ और सरकार ने उनको जंगल के उ पाद का इ तेमाल करने से मना कर रखा था। लेिखका महा ेता देवी ने कहा क, ‘इन तमाम बात क पृ भूिम म झारखंड रा य क मांग को देखा जाना चािहए। यहां एक तरफ तकलीफ और शोषण क कहािनयां ह तो दूसरी तरफ ितरोध के वर ह।’20 झारखंड रा य का आंदोलन िशबू सोरे न के नेतृ व म चलाया जा रहा था। िशबू सोरे न उस जमाने म नौजवान आ करते थे। वे काले लंबे बाल रखते थे और ब त ज द ही वे आ दवािसय के बीच िमथक य नायक बन गए। उ ह ने दकु (बाहरी लोग) ारा आ दवािसय क हड़पी गई जमीन पर धान क जबरन खेती शु करवाई और जंगल क जमीन पर ये कहकर हमला कया क उस पर आ दवािसय का हक है। िसतंबर, 1980 म गुआ म िवरोध दशन करती ई एक भीड़ पर पुिलस ने गोली चलाई िजसम 15 लोग मारे गए। इससे आंदोलन और भी उ हो गया और झारखंड रा य क मांग और भी तेज हो गई।21 इसके साथ-साथ दो अ य नए रा य के गठन क मांग भी उठ रही थी। ये रा य थे छ ीसगढ़ और उ राखंड। छ ीसगढ़ क मांग म य देश से अलग एक नए रा य के प म क जा रही थी तो उ राखंड क मांग उ र देश के पहाड़ी िजल को िमलाकर एक नए रा य के प म। हालां क इन दोन रा य क मांग झारखंड जैसी उ नह थी। ये दोन े भी लकड़ी, पानी और खिनज संसाधन से समृ थे, ले कन इसका फायदा वहां के थानीय लोग को नह िमल पा रहा था। इन संसाधन का उपयोग रा ीय अथ व था के िलए कया जा रहा था।22 अ सी के दशक म नगा आतंकवाद फर से जागता आ दखा। आपातकाल के दौरान भारत सरकार ने फजो के नगा नेशनल काउं िसल के ब त सारे लोग को हिथयार डालने और मु यधारा म लौटने के िलए राजी कर िलया था। सरकार म शािमल कु छ लोग को उ मीद थी क िशलांग समझौते (यह समझौता िशलांग म आ था) से िव ोह के खा मे क शु आत हो जाएगी। हालां क टी मोईवा जैसे क रपंथी नगा नेता ने इसे ‘भारत के हाथ िबका आ’ समझौता घोिषत कर दया। मोईवा थंगकु ल नगा समुदाय से आते थे, िज ह ने सबसे पहले साठ के दशक म चीन से मदद लेनी चाही थी। मोईवा चार साल तक चीनी ांत यूनान म भी रहे थे, जहां चीन क पीप स िलबरे शन आम ने उनको िशि त कया था। वे चीन म ई सां कृ ितक ांित से काफ भािवत ए और उ ह ने इसके आदश का तालमेल अपने धम के साथ िबठाने क कोिशश क , िजसम वे पैदा ए थे। इस तरह वे ईसाई िमशन ारा चा रत धम का तालमेल ांितकारी समाजवाद से िबठाना चाहते थे। 1980 म मोईवा और आइजेक वू ने नेशनल सोशिल ट काउं िसल आॅफ नागालड (एनएससीएन) क थापना क । उस समय तक चीनी सहायता िमलनी ख म हो गई थी, इसिलए मोईवा ने मदद के िलए उ र-पूव और बमा के दूसरे िव ोही गुट के साथ संबंध बढ़ाए। जंगल म छु प रहे मोईवा से एक प कार ने जब मुलाकात क तो उ ह ने कहा क ‘नागालड क आजादी का सपना तभी पूरा हो सकता है, जब भारत खुद ही कई टु कड़ म बंट जाए।’ नगा नेता ने िसख आतंकवा दय और क मीरी अलगाववा दय से भी अपने संबंध बना रखे थे और वे इस बात क बेस ी से उ मीद कर रहे थे क कु छ इसी तरह का आंदोलन तिमलनाडु म भी शु हो जाएगा और देश अराजकता क गत म समा जाएगा।23 मोईवा के सबसे क र समथक उनके अपने ही थांगकु ल समुदाय के लोग थे, जो मिणपुर के ऊपरी इलाक म रहते थे। अगर एक आजाद नागालड का गठन होता तो ये इलाके उसके िह से होते, ले कन मिणपुर के नगा इस बात से नाखुश थे क उ ह रा य के मेइती हंद ु के शासन तले रहना पड़ रहा है। मिणपुर क आबादी म मेइितय क अ छी-खासी आबादी है और वहां उनका खासा दबदबा है। एनएससीएन के गठन के बाद भारत सरकार सकते म आ गई और इसने मिणपुर के उख ल िजले म सुर ाबल क सं या बढ़ा दी। 19 फरवरी, 1982 को आतंकवा दय ने इ फाल-उख ल माग पर सेना के एक का फले पर हमला कया, िजसम िसख रे जीमट के 22 जवान मारे गए। मारे गए जवान म कु छ अिधकारी वग से भी थे। सेना ने जवाब म पूरे इलाके म तोड़फोड़ मचा दी। उ ह ने िजले के हरे क गांव म घर-घर तलाशी ली, पु ष को पकड़कर पीटा और मिहला पर हमले कए। नाग रक अिधकार से जुड़े ए एक समूह ने इलाके का दौरा कया और पीि़डत क गवािहयां ल । उ ह ने पाया क भले ही भूिमगत िव ोिहय को कु छ ही लोग का समथन हािसल हो, ले कन सेना ने सभी लोग को संदह े के दायरे म ले रखा है।’24 IV देश म अलग रा य क मांग को लेकर कई आंदोलन चल रहे थे। उनम से कु छ आंदोलन भारतीय संघ के दायरे म अलग ांत बनना चाहते थे तो कई भारत से अलग एक देश क मांग कर रहे थे। कई आंदोलन इस मांग के िलए भी चल रहे थे क रा य के भीतर ही कु छ इलाक को वाय ता दे दी जाए। कां ेस के पुराने गढ़ आं देश म लोग क नाराजगी इस बात से बढ़ती जा रही थी क मु यमं ी क क तरफ से ‘थोपा’ जा रहा है। 1978 से लेकर 1982 के बीच ीमती गांधी ने कम से कम चार बार रा य म मु यमं ी बदल दए। फरवरी 1982 म राजीव गांधी का वागत करने रा य के नए मु यमं ी टी अंज या समथक क भारी भीड़ के साथ हवाई अ े तक गए। राजीव गांधी ने मु यमं ी को इतने कड़े श द म डांट िपलाई क उनक आंख म आंसू आ गए।25 मु यमं ी को यह अपमान िनजी तौर पर तो महसूस आ ही, तेलुगु मीिडया म सामूिहक प से भी इसक गूंज सुनाई दी। मीिडया ने इसे तेलुगु गौरव के अपमान क तरह पेश कया। अ य दूसरे लोग जो इस बात से उ ेिजत ए उनम से तेलुगु फ म के महानायक एन.टी. रामाराव भी शािमल थे। एन.टी. रामाराव का तेलुगु फ म जगत म वही दजा था, जो एम.जी. रामचं न का तिमल फ म म था (एक आंकलन के मुतािबक उ ह ने 150 फ म म काम कया था, दूसरे के मुतािबक 300 म जब क तीसरे सू के मुतािबक उ ह ने 292 फ म म अिभनय कया था)। एमजीआर क तरह ही एनटीआर का भी कोई राजनीितक इितहास नह था। न ही उनक फ म कसी तरह का सामािजक संदश े ही देती थी। वे अमूमन पौरािणक च र के आधार पर बनी फ म म अिभनय करते थे। अपने 60व ज म दन पर उ ह ने एक े ीय दल तेलुगु देशम पाट का गठन कया। यह पाट करीब 6 करोड़ तेलुगु भाषी लोग के आ मस मान और गौरव क र ा करने के िलए बनाई गई थी। उ ह ने कहा क अब आगे से आं देश जैसा गौरवशाली रा य कां ेस पाट के शाखा कायालय क तरह काम नह करे गा।26 नई पाट का गठन माच 1982 म आ, जब क रा य िवधानसभा का चुनाव साल के आिखर म होना था। चुनाव क तैयारी करने के िलए एनटीआर ने रा य के िजल का दौरा कया और कां ेस के शासन के िखलाफ आवाज बुलंद क । उ ह ने रथ के आकार क एक गाड़ी पर रा यभर का दौरा कया। जनसभा म वे अचानक ही गाड़ी के ऊपर कट होते, िजसका मंच एक जनरे टर के सहारे ऊपर उठा होता। वह अमूमन भगवा व धारण करते, जो सं यास का तीक था। इसका मतलब ये होता क उ ह ने जनता क सेवा करने के िलए अपना फ मी क रयर छोड़ दया है। वह एक पौरािणक नायक क तरह थे, जो वा तव म जनता को याय दलाने और ाचार और लालच से मु करने आया था। एनटीआर को सुनने के िलए मिहला क भारी भीड़ उमड़ी। एनटीआर ने उ ह िव िव ालय और रा य क नौक रय म वरीयता देने का वादा कया।27 हालां क रा ीय मीिडया एनटीआर क सफलता के ित आ त नह था, ले कन तेलुगु दैिनक इनाडु एनटीआर के साथ पूरी मजबूती के साथ खड़ा हो गया। अखबार के िव ास को तब बड़ी मजबूती िमली, जब तेलुगु देशम पाट ने रा य िवधानसभा म आसानी से दो-ितहाई ब मत हािसल कर िलया। जनवरी 1983 के दूसरे स ाह म रामाराव को हैदराबाद के फतेह मैदान म आं देश के मु यमं ी क शपथ दलाई गई। उनके शपथ हण समारोह म करीब दो लाख लोग क भीड़ जुटी।28 स ा म आने के बाद एनटीआर का पहला काम था जनता को दो पए ित कलो क दर से चावल मुहय ै ा करवाना। इस बावत खा िवभाग को िनदश जारी कए गए। यह उनका चुनावी वादा भी था। इस तरह उ ह ने अपने आपको पाट और सरकार दोन के ही प म जनता के सामने पेश कया। यह ऐसा तरीका था, जो उनके िम एमजीआर और ीमती गांधी के राजनैितक तरीक से मेल खाता था। एक समाजवादी ने कहा, ‘अगर धानमं ी सोचती ह क वह खुद ही हंद ु तान ह, तो एनटीआर भी साढ़े छह करोड़ तेलुगु लोग के एकमा ितिनिध ह। सरकार क नीितय और काय म को तय करने म तेलुगुदश े म के िवधायक का कोई योगदान और उनक कोई आवाज नह है। एनटीआर अके ली पाट अ य और मु यमं ी दोन क ही भूिमका म ह।’29 ले कन फर, ीमती गांधी क ही तरह एनटीआर भी प रवारवाद के िशकार होते गए। उ ह ने एक अनािधकृ त सरकारी ज़मीन पर अपने बेटे को फ म टू िडयो बनाने क इजाजत दे दी, िजसम िनयम को ताक पर रख दया गया।30 V वाय ता के िलए एक दूसरा गंभीर क म का आंदोलन असम म आकार ले रहा था। यह यादा गंभीर इसिलए था क यह कसी ि गत क र मे क बजाय आम लोग के िवचार से भािवत था। इसक एक वजह ये भी थी क असम हंद ु तान क दय थली म ि थत नह था, बि क उथल-पुथल से त इलाके म ि थत था। असम क सीमा पि म बंगाल और कई उ र-पूव रा य के अलावा बंगलादेश और भूटान को भी छू ती है। असम क सरकारी भाषा असमी है ले कन वहां बंगाली भी काफ बोली जाती है। असम म इन दोन भाषाभािषय के बीच लड़ाई-झगड़े का पुराना इितहास था। अं ेजी राज के दौरान बंगािलय ने शासन के िनचले और मंझोले पद पर अपना दबदबा बना िलया था। अिधकारी, िश क और मिज ेट के प म वे थानीय असमी लोग पर कू मत करते थे। वे उ ह हेय दृि से देखते थे और उनका अपमान भी करते थे। 19व सदी के उ राध म जमीन के भूखे बंगाली कसान ने असम के जंगल और िनचले इलाक म आना शु कर दया था। आजादी के बाद भी ये पलायन जारी रहा और जब भी कभी पूव बंगाल म आ थक या राजनीितक अि थरता आती तो इसक र तार और बढ़ जाती, जैसा क बंगलादेश बनने के बाद भी आ। स र के दशक म असम म पंजीकृ त कु ल मतदाता क सं या 60 लाख से बढ़कर 90 लाख प च ं गई। 31 यह बढ़ोतरी मु य प से बंगलादेश से आए लोग क वजह से ई। असमी लोग इस भय म जी रहे थे क वे बंगाली म यवग क वजह से सां कृ ितक प से िपछड़ जाएंगे, जब क बंगाली कसान के आने से उ ह ये भय सता रहा था क कह असम म असमी ही अ पसं यक न बन जाएं। पचास और साठ के दशक म रह-रहकर वासी िवरोधी दंगे ए थे ता क इन वािसय को इनके मूल थान पर भेजा जा सके । हालां क स र के दशक के आिखर म ही जाकर ये भावनाएं एक मुक मल सामािजक आंदोलन का प धारण कर पाई।32 इस बदलाव का मु य वाहक आॅल असम टू ड स यूिनयन (आसू) नाम का छा संगठन था। इसका रा यभर म िव तार हो गया और इससे सभी कू ल और काॅलेज के छा संगठन जुड़ गए। 1979 से लेकर अगले पांच साल तक आसू ने पूरे सूबे म सैकड़ बंद और हड़ताल का आयोजन कया। इन आंदोलन का मकसद क सरकार पर दबाव डालकर इन घुसपै ठय को सूबे से बाहर िनकालना था। असमी रा वा दय ने अपनी मांग को सं कृ ित और जनसं या के च र के आधार पर सामने रखा था। आसू ने इसम एक तीसरा तक भी जोड़ दया। वो तक अथ व था का था। असम क अथ व था साफतौर पर बाहरी लोग के िनयं ण म थी। रा य के समृ चाय बागान ऐसी कं पिनय ारा संचािलत थे जो कलक ा या लंदन म आधा रत थ । असम म हंद ु तान का सबसे बड़ा तेल उ पादक इलाका था, इसके बावजूद जो सरकारी कं पनी वहां तेल िनकालती थी उसम ब त कम थानीय लोग को (शीष बंधन के तर पर तो वो भी नह ) रोजगार िमला आ था। इससे भी बुरी बात ये थी क इसके बाद तेल िनकालकर उसे दूसरे रा य म साफ करने को भेजा जाता था। रा य का थानीय कारोबार राज थान के मारवाि़डय के हाथ िनयंि त था। कु ल िमलाकर हालत ये थी क असम एक ‘आंत रक उपिनवेश’ था जो अपना स ता क ा माल महानगर को मुनाफा कमाने के िलए भेज देता था। असम आंदोलन क ापक मांग एक नई आ थक नीित को लेकर थी, ता क रा य के लोग अपने रा य के ाकृ ितक संसाधन का बेहतर इ तेमाल करके पैसा और रोजगार कमा सक। इस आंदोलन क ता कािलक मांग रा य क मतदाता सूची से वासी लोग का नाम हटाना था, ता क उ ह सूबे से बाहर कया जा सके । दुभा य से इस आंदोलन ने सां दाियक प अि तयार करना शु कर दया और धम के आधार पर ुवीकरण को बढ़ावा दया। शायद सां दाियक प लेना इस आंदोलन क िनयित भी थी। य क हाल म आने वाले यादातर वासी लोग मुसलमान थे। कां ेस पाट , जो उस व क म शासन कर रही थी और रा य म भी काफ समय तक दबदबे म थी, उस पर आरोप लगाया गया क वोटबक क राजनीित के तहत वो वािसय को बचा रही है। इसके अलावा आॅल असम माइनो र टज टू डट यूिनयन (एएएमएसयू) के गठन ने भी इस धु्रवीकरण को बढ़ावा दया।33 1980 क ग मय म असम का दौरा करने पर द ली के एक प कार ने पाया क आंदोलन ने िनि त तौर पर िवशाल प धारण कर िलया है। अब यह आंदोलन िसफ पढ़े-िलखे या सं ांत लोग के बीच ही सीिमत नह था। असम के लोग ब त तेजी से अपने आपको कुं ठत और ठगा आ महसूस कर रहे थे। इस आंदोलन म महज िवदेिशय के िखलाफ ही गु से का इजहार नह हो रहा था। खतरनाक बात तो ये थी क अब ये गु सा बंगाली-िवरोधी, वाम-िवरोधी, मुि लम-िवरोधी, गैर-असमी िवरोधी और यहां तक क भारत िवरोधी श ल भी अि तयार करता जा रहा था।34 बंगािलय के घर पर हमले हो रहे थे और उ ह आग के हवाले कया जा रहा था। ले कन िनशाने पर क क सरकार भी थी। आंदोलनका रय ारा रे लवे क पट रयां उखाड़ी जा रही थ जब क आसू ने क मती लकि़डय और जूट का रा य से बाहर जाना बंद कर दया। वे लोग रा य से तेल ले जाने वाली पाइप लाइन को भी रोकने म कामयाब हो गए। सरकार को इन पाइप लाइन के दोन तरफ आधे कलोमीटर तक के इलाके को संरि त े घोिषत करना पड़ा। आिखरकार पाइप लाइन के ारा सुदरू िबहार म ि थत तेलशोधक कारखाने के िलए तेल क आपू त को बहाल करने के िलए सेना क सहायता लेनी पड़ी।35 जुलाई 1980 के आखरी स ाह म धानमं ी ने आसू नेता को चेतावनी दी क उ ह इस आंदोलन के िलए गंभीर नतीजा भुगतना होगा। उ ह ने कहा क क पना क िजए क दूसरे रा य असम को इ पात क आपू त बंद कर द तो असम के लोग कै से उ ोग धंध का िवकास करगे? भारत क संघा मक णाली आपस म एक दूसरे पर िनभर रहने के िस ांत पर टक ई है और ऐसी व था म कसी बड़ी इकाई क छाया म ही हरे क इकाई जंदा रह सकती है। अ यथा बाहरी दबाव को बदा त करना मुि कल हो जाएगा।’36 हालां क एक तरफ ये चेतावनी जारी क जा रही थी तो दूसरी तरफ भारत सरकार आसू नेता से समझौते क तैयारी भी कर रही थी। यह बातचीत अगले तीन साल तक चलती रही। यह कई बार क कई बार फर से शु ई। इस बीच रा य म हड़ताल और िवरोध दशन जारी रहे। जब भी वाता टू ट जाती, िवरोध शु हो जाते। औपचा रक प से समझौता वाता म एक तरफ आसू के नेता थे तो दूसरी तरफ गृहमं लय। ले कन इस वाता म कई म य थ भी लगे ए थे। इसम गांधी शांित ित ान और मिणपुर के मु यमं ी आर.के . दोर संह का नाम अहम है। मतभेद का असली िवषय था उस ‘वा तिवक ितिथ’ को तय करना, िजस दन से वािसय को रा य म अवैध माना जाता। आसू क मांग थी क 1951 के बाद से आए ए तमाम वािसय को अवैध घोिषत कर उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जाए और उ ह रा य से िनकाल बाहर कया जाए। जब क भारत सरकार का मानना था इससे देश क संघा मक व था का िस ांत आहत होगा। सरकार के मुतािबक इससे देश के नाग रक क देश के भीतर वतं आवाजाही के िस ांत का उ लंघन होगा। हालां क वे लोग इस बात को मानने को तैयार थे क 1971 को वा तिवक ितिथ (साल) मान िलया जाए य क उसी साल पूव पा क तान म उप व शु आ था और बड़े पैमाने पर सीमा पार से वासी असम म आ गए थे। एक आंकड़े के मुतािबक साल 1980, 1981 और 1982 म भारत सरकार के ितिनिध और आंदोलन के मु य नेता आपस म 114 बार िमले। कई समझौत पर गहन प से चचा क गई। गांधी शांित ित ान ने सुझाया क जो लोग 1951 से 1961 के बीच रा य म आ गए थे उनके रहने और मतदान के अिधकार को मा यता दे दी जाए। इसके अलावा जो लोग 1961 से 1971 के बीच रा य म आए उ ह देश के दूसरे भाग म बसा दया जाए और जो लोग 1971 के बाद आए (बंगलादेश यु के समय) उ ह उनके मूल थान पर भेज दया जाए।37 हालां क समझौते का कोई भी फामूला मा य नह हो पाया। संघष फर से शु हो गया और इसने भयावह प अि तयार कर िलया। ऐसी ही भयानक घटना म असमी और आ दवासी समुदाय क भीड़ ारा सैकड़ क सं या म बंगाली मुसलमान का क लेआम कर दया गया। इस तरह व र प कार देवद क वो खौफनाक आशंका सच सािबत हो गई िजसके अनुसार उ ह ने कहा था क ‘अगर इस सम या का हल नह िनकाला गया तो िजस तरह पु नदी असम के 450 मील के इलाके म तांडव करती है, उसी तरह के तांडव का दृ य सामने आएगा।’ उ ह ने ये आशंका तब क थी, 38 जब भारत सरकार और आंदोलनकारी वाता के शु आती चरण म थे। VI असम आंदोलन के समय ही देश म वाय ता के िलए एक और गंभीर आंदोलन चल रहा था। यह आंदोलन पंजाब म चल रहा था। म यहां ‘और भी गंभीर’ श द का इ तेमाल इसिलए कर रहा ,ं य क पंजाब क सीमा पा क तान से लगती है, िजससे भारत पहले तीन बार जंग के मैदान म िमल चुका था। इसके अलावा इस रा य क ब सं यक जनता हंद ू नह , बि क िसख समुदाय से थी। यहां भाषा और े के अलावा धम नाम का खतरनाक त व भी काम कर रहा था। जैसा असम म दखने को िमल रहा था, पंजाब के ‘िवरोध’ या ‘आंदोलन’ या ‘संकट’ (इसके कई नाम म से एक) क कई सुदरू और ता कािलक वजह थ । िसख बौि क वग का एक तबका उ मीद कर रहा था क कसी भी श ल म िसख के िलए एक ऐसा ही रा य हािसल कया जाए जैसा 19व सदी के पूवाध म महाराजा रणजीत संह ने बनाया था। दूसरे कई लोग इसे भारत के िवभाजन क िनगाह से देख रहे थे, जब समुदाय को दा ण संकट से गुजरना पड़ा था। उस समय उ ह अपने िलए एक अलग रा य क मांग को मंगवाने म करीब बीस साल लगे थे। भारत सरकार ने लंबे आंदोलन और संघष क वजह से उनक यह मांग मानने का फै सला कया था। हालां क फर भी जब 1966 म एक नया पंजाब रा य बन भी गया तो इसक मुख पाट अकाली दल पूरे अिधकार और धमक के साथ रा य म शासन करने म नाकाम रही। पाट इस बात से बुरी तरह िनराश ई क 1967 और 69 के चुनाव म इसे हंदव ू ादी पाट जनसंघ के साथ सरकार बनाने पर मजबूर होना पड़ा। जब क 1971 म इसक पुरानी ित ं ी कां ेस अपने बल पर स ा म आ गई।39 अ टू बर, 1973 म अकाली दल कायकारी सिमित ने आनंदपुर सािहब ताव पा रत कया। इसम भारत सरकार से मांग क गई क चंडीगढ़, पंजाब को स प दया जाए (चंडीगढ़, पंजाब और ह रयाणा दोन क संयु राजधानी है) और दूसरे रा य के पंजाबी भाषी इलाके पंजाब को स प दए जाएं। इसके साथ ही सेना म िसख का अनुपात बढ़ाने संबंधी मांग भी पेश क गई। इस ताव के ारा ये भी मांग क गई क भारतीय संिवधान को वा तिवक संघीय भावना के िहसाब से पुन न मत कया जाए ता क पंजाब और दूसरे अ य रा य के मामले म क का ह त ेप महज सेना, िवदेशनीित, मु ा और सामा य शासन तक सीिमत रहे। अ य सारे मामले रा य को दे दए जाएं और उ ह उस पर कानून भी बनाने क इजाजत दी जाए। हालां क सरसरी तौर पर देखने से लगता था क आनंदपुर सािहब ताव रा य के िलए महज ापक वाय ता क मांग कर रहा है, िजसका संकेत संिवधान म भी दया गया है। ले कन इस ताव क और भी खतरनाक ा या क जा सकती थी। इस ताव क तावना म अकाली दल के बारे म ये कहा गया क ‘यह दल एक िसख रा य (देश) क आकां ा और उ मीद का जीता-जागता प है।’ पंथ (समुदाय) का राजनीितक ल य खालसा (िसख भाईचारा) क ‘सव ता’ को थािपत करना था। अकाली दल क मौिलक नीित एक उिचत माहौल और एक उिचत राजनीितक मंच का िनमाण कर खालसा के ज मिस अिधकार को अहसास कराने क थी।40 शायद सन् 1973, इस तरह क मांग को आगे रखने का उिचत व नह था। पा क तान से एक जंग जीतने के बाद ीमती गांधी क लोकि यता चरम पर थी और क सरकार पहले से भी यादा ताकतवर हो चुक थी। आपातकाल लगने से क के हाथ म असीम शि यां आ ग और हजार क तादाद म अकाली कायकता जेल म डाल दए गए। ले कन 1977 म आपातकाल हटा िलया गया और चुनाव करवाए गए िजसम कां ेस पाट बुरी तरह हार गई। अब पंजाब म अकािलय का शासन था। आनंदपुर सािहब ताव को पूरा करने क मांग फर से उठने लगी और इसम कु छ नए ताव भी जोड़ दए गए। हंद ु तान के बटवारे के व पंजाब क पांच न दय म से िसफ तीन ही उसके पास रह गई थ । इ ह पांच न दय के नाम पर सूबे का नाम पंजाब पड़ा था। ले कन उस पर भी सूबे को अपनी न दय का पानी ह रयाणा और राज थान के साथ साझा करना पड़ रहा था। अकािलय ने न दय के पानी म यादा िह से क मांग क और इस आ थक मांग के साथ ही एक नई सां कृ ितक मांग भी जोड़ दी। अब मांग ये कही गई क िसख के सबसे पिव शहर अमृतसर को, जहां वण मं दर ि थत है, ‘पिव शहर’ घोिषत कया जाए।41 अ ैल, 1978 म अमृतसर म िनरं का रय का एक जनसमागम आ। िनरं कारी खुद को िसख ही मानते थे। ले कन वे एक जीिवत गु क अवधारणा म यक न रखते ह, इसिलए क रपंथी िसख उ ह िवधम मानते थे। अब चूं क अकाली स ा म आ गए थे इसिलए कु छ िसख धमगु ने कहा क िनरं कारी अमृतसर म स मेलन करके उस शहर को अपिव कर रहे ह। िनरं कारी स मेलन के िवरोध का नेतृ व एक क रपंथी िसख धा मक नेता जरनैल संह भंडरावाला कर रहा था। भंडरावाले का ज म एक जटिसख प रवार म आ था और वे अपनी प ी और ब को छोड़कर दमदमी टकसाल का मुख बन गया था। दमदमी टकसाल िसख का एक धा मक िश ण सं थान था। वह एक भावशाली शि सयत का मािलक था। वह छह फ ट से यादा लंबा, छरहरा और कसरती बदन का मािलक था। उसक आंख हमेशा कु छ ढ़ूंढ़ने क कोिशश म लगी रहत और वह लंबी नीले रं ग क पोशाक धारण करता। वह एक भावशाली और ेरणा पद िसख धम चारक था, िजसे िसख धम ंथ का गहरा ान था। उसका कहना था क आजाद भारत म िसख क ि थित ‘गुलाम के बराबर’ हो गई है और हंद ु क तुलना म इनसे भेदभाव कया जाता है। भंडरावाला चाहता था क िसख अपने आपको शु कर और धम के मूल िस ांत क तरफ लौट। वह ‘ और कमजोर’ हंद ु के िखलाफ जहर उगलता था और उससे भी यादा ‘आधुिनक दखनेवाले’ िसख का मजाक उड़ाता था, जो अपने आपको इतना िगरा चुके थे क बाल नह रखते थे और तंबाकू और शराब का सेवन करते थे।42 कु छ लोग क राय म भंडरावाले को संजय गांधी और जैल संह ने बढ़ावा दया था (जैल संह खुद पंजाब के मु यमं ी रह चुके थे)। ऐसा अकािलय को कमजोर करने के इरादे से कया गया था। िसतंबर 1982 म एक प कार आयशा कागल ने िलखा क भंडरावाले को मूलतः क सरकार ने पैदा कया है और वही उसका ‘ चार’ भी कर रही है ता क अकािलय के भाव को कम कया जा सके ।43 यहां मूलतः श द यादा अहम है य क भले ही कसी ने भी भंडरावाले को बढ़ावा दया हो ले कन उसने ब त ज द ही अपना वतं भाव और क र मा कायम कर िलया। उसके समथन म ब त सारे जटिसख जमा होने लगे, िज ह ने देखा था क ह रत ांित का फायदा कु छेक बड़े जोतदार तक सीिमत रह गया है। उसके दूसरे समथक म िनचली जाित के िसख, द तकार और मजदूर तबके के लोग थे िज ह ये लगा क शुि करण क या म वे सामािजक िवकास क सीि़ढयां चढ़ पाएंगे। समाज म अनपेि त आ थक तर के बाद लोग म धम के ित बढ़ते झान से भी भंडरा वाले को फायदा आ।44 एक तरफ अमृतसर म िनरं कारी समागम चल रहा था तो दूसरी तरफ भंडरा वाला वण मं दर प रसर म जहरीला भाषण दे रहा था। उसके भाषण से उ ेिजत होकर िसख क एक भीड़ उस जगह क ओर बढ़ चली िजधर िनरं का रय का स मेलन हो रहा था। िनरं का रय और िसख म लड़ाई शु हो गई और इस लड़ाई म 15 लोग क जान चली गई। 1980 म िसख गौरव को फर से तब झटका लगा जब पंजाब म अकाली दल क सरकार बखा त कर दी गई और कां ेस स ा म आ गई। उसी साल जून महीने म िसख छा का एक समूह वण मं दर प रसर म िमला और एक आजाद िसख रा के गठन का आ नान कया गया। इस गणरा य का नाम खािल तान रखा गया और लंदन म रह रहे िसख नेता जगजीत संह चौहान को इसका रा पित घोिषत कया गया। इस तरह के िवचार के पीछे शु म मु यतौर पर वासी िसख ही थे। यह घोषणा एक ही साथ अमे रका, इं लड, कनाडा और ांस म क गई।45 भारत सरकार इन िछटपुट त व को लेकर ब त चंितत नह थी। वह तो अपना यान अकािलय पर क त रखे ई थी जो स ा से बाहर होने के बाद संघष पर उता हो गए थे। अकािलय के नए नेता संत हरचरण संह लोग वाल थे, जो वण मं दर म रहते थे और वहां से वह कई मु पर िवरोध- दशन का आ नान करते। उन मु म चंडीगढ़ को पंजाब को स पा जाना और पंजाब को न दय का यादा पानी देना अहम होता था। भंडरावाले मं दर के दूसरे िह से से अपनी गितिविधय को अंजाम देते थे। कु छ हिथयारबंद लोग उनके क र समथक हो गए थे, जो उनके सहकम और अंगर क दोन क भूिमका िनभाते थे और व आने पर िबना कसी शु क के लोग क ह या भी कर देते थे। पूरे अ सी के दशक म िवरोध क राजनीित के साथ-साथ बड़ी असहजता से ह या क राजनीित भी चलती रही। अ ैल 1980 म िनरं कारी नेता बाबा गुरचरण संह को नई द ली म गोली मार दी गई। लोग का कहना था क इस ह या म भंडरा वाले का हाथ है, ले कन उस पर कोई कारवाई नह ई। फर िसतंबर, 1981 म लाला जगतनारायण क ह या कर दी गई। वे एक अखबार के भावशाली और नामचीन संपादक थे और उ ह ने िसख चरमपंथ के िखलाफ मुिहम छेड़ रखी थी। इस बार भंडरा वाले के िखलाफ पुिलस ने वारं ट जारी कर दया। पुिलस जब उसे िगर तार करने ह रयाणा के एक गु ारा प च ं ी, तब तक वह अपने धा मक िश ण सं थान तक सुर ापूवक प च ं चुका था। पंजाब के मु यमं ी दरबारा संह चाहते थे क पुिलस उसे िगर तार करे , ले कन क ीय गृहमं ी ानी जैल संह ने ऐसा करने से मना कर दया। जैल संह को ये चंता थी क कह इसका उ टा राजनीितक भाव सामने न आ जाए। भंडरावाले ने संदश े भेजा क वह आ मसमपण के िलए तैयार है ले कन उसक ितिथ उसक मज से तय क जाएगी और वह तभी समपण करे गा, जब उसे िहरासत म लेने आने वाले पुिलस अिधकारी दाढ़ीवाले िसख ह गे! ता ुब क बात ये थी क इस अपमानजनक शत पर भी पंजाब सरकार राजी हो गई। लाला जगतनारायण क ह या के दो स ाह बाद भंडरावाले ने अपनी सं था के सामने आ मसमपण कर दया। बाहर उसके समथक नारे बाजी करते रहे और पुिलस पर प थर फकते रहे। रा य म दूसरी कई जगह पर उसके समथक ने सरकारी संपि य को ित प च ं ाई और पुिलस को कारवाई करने के िलए उकसाया। एक रपोट के मुतािबक भंडरावाले क िगर तारी के फल व प ई हंसा म करीब दजनभर लोग मारे गए।46 ले कन तीन स ाह बाद भंडरावाले को सबूत के अभाव म बरी कर दया गया। पंजाब आंदोलन का लेखा-जोखा करने वाले दो लेखक ने िलखा क भंडरावाले के बरी होने क घटना उसके क रयर म बड़ा मोड़ था। अब उसे एक नायक के तौर पर देखा जा रहा था, िजसने भारत सरकार को चुनौती देकर उससे जीत हािसल क थी। दूसरे लेखक ने िलखा क भंडरावाले क िगर तारी के नाटक ने उसे एक ह या के आरोपी से राजनीितक ताकत म त दील कर दया।47 सन् 1982 म पूरे सालभर भारत सरकार और अकािलय के बीच बातचीत का दौर चलता रहा। ले कन कोई समझौता नह हो पाया। समझौता इस बात पर अटक गया क चंडीगढ़ के बदले पंजाब, ह रयाणा को कौन सा इलाका देगा और नदी जल बटवारे का आधार या होगा। 26 जनवरी, 1983 को गणतं दवस के दन सभी अकाली िवधायक ने रा य िवधानसभा क सद यता से अपना इ तीफा दे दया। शायद इस खास दन का चुनाव कर अकािलय ने भारतीय संिवधान के ित अपनी अना था जताने क कोिशश क थी। भंडरावाले क तरफ से िमल रही चुनौती अकािलय को और भी यादा अितवादी ख अि तयार करने को मजबूर कर रही थी। अब अकाली, कां ेसी शासन क तुलना मुगल के जमाने से करने लगे थे। अब उ ह ने कौम के इस नए उ पीड़न से िहफाजत के िलए शहीद ज था का गठन करना शु कर दया।48 22 अ ैल, 1983 को वण मं दर से पूजा-अचना करके बाहर िनकलते व पुिलस के एक बड़े िसख अिधकारी क ह या कर दी गई। उस पुिलस अिधकारी का नाम ए.एस. अटवाल था। गोली मारने के बाद ह यारा, वहां से आराम से िनकल गया। अटवाल क ह या ने पंजाब पुिलस के मनोबल को कमजोर करने का काम कया, िजसम िसख क तादाद सबसे यादा थी। उसके बाद बक डकै ितय का िसलिसला शु आ और हंद ू अ पसं यक का एक तबका सूबा छोड़कर बाहर जाने लगा। जो लोग वहां रह गए उ ह ने अपने आपको हंद ू सुर ा संघ के झंडे तले संग ठत कया। इस तनाव क वजह से हंद ू और िसख के बीच स दय से चला आ रहा भाईचारा चरमराने लगा। अपने सा ा कार म भंडरावाले ने कहा क िसख एक अलग ‘कौम’ है। यूं तो कौम का मतलब ‘समुदाय’ के अथ म लगाया जाता है ले कन ब त आसानी से इसको एक अलग ‘मु क’ के प म भी ा याियत कया जा सकता है। उसने कहा क उसने खािल तान क मांग नह क है ले कन अगर ‘खािल तान’ उसे दया जाता है तो वह इसे वीकार करने से इं कार भी नह करे गा! उ ह ने भारत के धानमं ी का ‘पंिडताइन’ और ‘ ा ण क बेटी’ कहकर मजाक उड़ाया। यह ऐसी ट पणी थी जो अपमानजनक तरीके से कही गई थी और जट िसख उन तमाम लोग के िलए उपयोग म लाते थे जो शरीर के बजाय दमाग से काम करते थे। उससे जब पूछा गया क या वह धानमं ी से िमलना चाहता है, तो उसने कहा क नह वह ऐसा नह चाहता। अगर धानमं ी उससे िमलना चाहती ह तो वो यहां आ सकती ह।49 अपने समथक से तो भंडरावाला और भी यादा खा और कटु वहार करता था। उसने एक बार कहा क ‘अगर हंद ू तु हारी खोज म यहां आते ह तो उनका िसर टीवी के एंटीना से तोड़ दो।’ उसने िसख को उनके वीरतापूण इितहास क याद दलाई। उसने कहा क ‘जब मुगल ने हमारे गु को ख म करने क कोिशश क थी तो हमारे पुरख ने महज चालीस लोग के साथ एक लाख हमलावर का सामना कया था। अपने नए शोषक के साथ िसख अब भी वह सलूक कर सकते ह।’ इसके अलावा अब समकालीन दुिनया म भी कई उदाहरण सामने आ चुके थे। उसम से एक इजरायल का उदाहरण था। भंडरावाले ने कहा क अगर मु ीभर य दी अपने से कई गुणा यादा सं या वाले अरब का मुकाबला कर सकते ह, तो िसख को भी ज र ऐसा ही करना चािहए।50 5 अ टू बर, 1983 को आतंकवा दय ने हाइवे पर एक बस को रोक दया और हंद ू मुसा फर को चुन चुनकर गोली मार दी। उसके अगले ही दन रा य म रा पित शासन लागू कर दया गया। 1983 के आखरी स ाह म भंडरावाले ने अकाल त त को अपना िनवास बना िलया। अहिमयत के िहसाब से अकाल त त, वण मं दर के बाद दूसरे नंबर पर था। वण मं दर नीले पानी क एक चमकती ई झील म बना आ है जो िसख के िलए आ याि मक स ा का क है, जब क अकाल त त वण मं दर से िब कु ल सटा आ उ र म ि थत है जो सांसा रक स ा का क है। अकाल त त से ही सभी िसख गु मनामा जारी करते थे, िजसका सारे िसख पालन और स मान करते थे। इसी जगह से म यकाल म िसख यो ा अपने शोषक के िखलाफ छापामार लड़ाई लड़ने के िलए गु से इजाजत लेत।े 51 भंडरावाले ने इस जगह के चुनाव का फै सला कया और कसी को उसे रोकने क िह मत नह ई। उसका यह फै सला अपने आपम ब त ही खतरनाक संकेत छु पाए ए था। VII सां दाियक हंसा म हो रही बढ़ोतरी ने पंजाब के बारे म कई उन दाव को तार-तार कर दया, जो इस सूबे और यहां के लोग के बारे म कहे जाते थे। पचास के दशक म ये कहा जाता था क आने वाले व म िसख का तेजी से हंदक ु रण हो जाएगा और यह एक अलग धम नह बि क एक अिखल भारतीय धम का एक पंथ बन जाएगा। साठ के दशक म यह कहा गया क स ा का वाद चख लेने के बाद अकाली दल का च र धमिनरपे हो जाएगा और सरकारी नीितय के बारे म इसका मत धा मक वजह से नह बि क आ थक वजह से संचािलत होगा। ले कन स र का दशक आते-आते यह आम सहमित संघष म त दील हो गई। जब क उ मीद यह क जा रही थी क जब संघष शु होगा तो यह वग के आधार पर होगा और ‘ह रत ांित,’ ‘लाल ांित’ का प ले सकती है। इससे भी अगले दशक क शु आत म भारत के िसख क तुलना ीलंका के तिमल से क जाने लगी। राजनीित िव ानी पाॅल वालेस ने िलखा क ीलंका क तरह ही यहां भी भाषा, धम और े ीयता के िम ण से एक िव फोटक वातावरण तैयार हो रहा है, िजसे वहां का राजनीितक भु वग काबू म करने का यास कर रहा था।52 इसके अगले ही एक-दो साल म इस िम ण म एक नया जहरीला त व घुस गया और वह नया त व था सश हंसा का। भारतीय इितहास के संदभ म हंद ू और िसख के बीच म हंसा आ यजनक बात थी। हालां क एक तरफ इस तरह क हंसा शु हो रही थी, तो दूसरी तरफ अ य कार का सामािजक संघष सामने आता जा रहा था। प कार एम.जे. अकबर ने अपने रपोट के स ह को एक सम अंक के प म संकिलत कया जो राइट आ टर राइट (दंगे के बाद दंगा) के नाम से छपा। कताब का यह नाम बड़ा ही ासंिगक और उिचत था।53 इस संघष क एक धुरी िनि त तौर पर जाित थी। जनवरी-फरवरी 1981 म गुजरात म अगड़ी और िपछड़ी जाितय के बीच लड़ाई शु हो गई। इस झगड़े का मु य कारण मेिडकल और इं जीिनय रं ग काॅलेज म िनचली जाितय को दया जाने वाला आर ण था। रा य के काॅलेज म छा और िश क के तौर पर िनचली जाितय खासकर ह रजन क सं या काफ कम थी। गुजरात के मेिडकल काॅलेज म कु ल 737 िश क म ह रजन िश क क सं या महज 22 थी। फर भी उनके बेहतर ितिनिध व क मांग का क र िवरोध कया गया। यह संघष छा समुदाय से बाहर भी फै ल गया और कपड़ा िमल के मजदूर भी इसम शरीक हो गए। जो लोग कभी एक ही झंडे के तले संग ठत रहते थे, उनम भी जातीय आधार पर बटवारा हो गया। उस हंसा म कम से कम पचास लोग मारे गए।54 संघष का एक दूसरा बंद ु वाभािवक प से धम था। जनता सरकार के शासनकाल म सां दाियक तनाव चंताजनक प से बढ़ने लगा। क और रा य क स ा म अपने संगठन से जुड़े ए नेता क मौजूदगी म रा ीय वयंसेवक संघ का भाव और ताकत बढ़ने लगी। 1979 म इ पातनगरी जमशेदपुर म एक भयानक दंगा आ। इसक याियक जांच से पता चला क इस दंगे का माहौल तैयार करने म आरएसएस का पूरा हाथ था। शहर क ि थित ऐसी थी क एक छोटी सी कोिशश भी दंगे को भड़का सकती थी।55 1980 के चुनाव म जनता पाट के सफाए के बाद इसके जनसंघ धड़े ने एक अलग पाट का गठन कया। इसका नाम भारतीय जनता पाट (भाजपा) रखा गया। ले कन इस नए नाम से पाट अपने पुराने ल य को नह भूल पाई। अब फर से एक राजनीितक दल खड़ा हो गया था जो हंद ू िहत क र ा करने और उसे आगे बढ़ाने को ितब था। बीजेपी के गठन से उ री और पि मी भारत म धा मक हंसा क लहर सी फै ल गई। उ र देश के मुरादाबाद और मेरठ शहर म हंद-ू मुसलमान के भयानक दंगे ए (अग त 1980)। इसी तरह के दंगे िबहार के िबहारशरीफ (1981), गुजरात के वड़ोदरा (िसतंबर 1981), गोधरा (अ टू बर1981), अहमदाबाद (जनवरी 1982) और आं देश क राजधानी हैदराबाद म (िसतंबर 1983) ए। मई-जून 1984 म महारा के शहर िभवंडी और बंबई म भी दंगे ए। ये दंगे कई दन तक चलते रहे, जानोमाल क काफ ित ई और आिखरकार इसे सुर ाबल के ारा ही दबाया जा सका।56 इन दंग पर भारी मा ा म कए गए लेखन से कु छ वृि यां बार-बार उभरकर सामने आई।57 अमूमन दंगे दुिनयादारी के मसल पर ही शु होते थे। कभी इसक वजह जमीन का एक छोटा सा टु कड़ा होता था िजस पर दोन समुदाय के लोग दावा करते थे, तो कभी गिलय म हंद ू और मुि लम फे रीवाले जगह के िलए लड़ जाते थे। ये दंगे कसी सूअर को कसी मि जद म फक देने से या फर कसी मरी ई गाय को मं दर के नजदीक फक देने से भी शु हो सकते थे। कभी-कभी हंद ू और मुसलमान के योहार साथ-साथ हो जाने से और सड़क पर उनके जुलूस के साथ-साथ िनकलने से भी दंगा हो जाता था। हालां क जब भी एक बार फसाद शु होता, यह बड़ी तेजी से फै लता था। यहां अफवाह क भूिमका अहम होती थी और मूल झगड़े को हरे क ि एक दूसरे से बढ़ा- चढ़ाकर पेश करता। ऐसा तब तक कया जाता, जब तक क दो ि य का झगड़ा दो समुदाय के बीच धमयु म न त दील हो जाता। सां दाियक संगठन और पाट ित िं ता ने इस तरह के संघष को बढ़ावा देने का काम कया। थानीय नेता धम के आधार पर बंट जाते। जुबानी झगड़ा हाथापाई म बदल जाता, मु े बाजी तलवारबाजी म बदल जाती और फर बम-बा द और बंदक ू का भी इ तेमाल कया जाता। पुिलस या तो मुंह ताकती रहती या भेदभावकारी नीित अि तयार करती। उ र देश और िबहार म पुिलस ने इस तरह के दंग म खुलकर हंद ु का प िलया और कई बार मुसलमान के घर और दुकान को भी लूटा। दंगे अमूमन शहर म ही होते जहां क आबादी म मुसलमान क खासी तादाद होती थी। उनक आबादी कई शहर म 20 से 30 फ सदी तक थी और बाद के दौर म उ ह ने थोड़ी-ब त आ थक तर भी कर ली थी। देश म उभर चुके एक बड़े बाजार म अपनी सेवा और कौशल बेचकर कु छ मुसलमान कामगार और द तकार ने आ थक तर कर ली थी। इस तरह के फसाद चाहे कसी ने भी शु य न कए हो, आिखरकार मुसलमान और गरीब को ही सबसे यादा भुगतना पड़ता था। सभी समुदाय अपनी-अपनी तरफ से दावे और ितदावे करते। दंग का दु प रणाम मुसलमान को इसिलए झेलना पड़ता क भले ही उनक आबादी लड़ाई लड़ने के िलए खासी हो ले कन उ ह अपने से दो या तीन गुना यादा लोग से लड़ना होता। गरीब को इसिलए इसका नतीजा भुगतना पड़ता य क गरीबी क वजह से वे शहर के घने बसे इलाक म रहते थे, जहां के मकान क े और वलनशील पदाथ से बने होते थे। अगर उनम एक बार आग लग जाती थी तो यह ब त ज द पूरे इलाके म फै ल जाती थी। दूसरी तरफ म यवग खुली हवादार आवासीय काॅलोिनय म रहता था, जहां िनजी और सामूिहक सुर ा का बंदोब त करना आसान था। हंद ु तान म जाित और सं दाय आधा रत झगड़े साथ-साथ चल रहे थे ले कन अ सी के दशक म उ ह ने एक दूसरे को भािवत करना शु कर दया। इन घटना म सबसे अहम था तिमलनाडु के एक गांव म ह रजन ारा िलया गया वो फै सला िजसम उ ह ने सामूिहक प से इ लाम धम कबूल कर िलया। 19 फरवरी, 1981 को मीना ीपुरम गांव के एक हजार ह रजन ने इ लाम धम वीकार कर िलया। अपने धम और अपने नाम के साथ-साथ उ ह ने अपने गांव का नाम भी बदल िलया। अब वे मीना ीपुरम को रहमतनगर कहने लगे। मीना ीपुरम क घटना का आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन ने कड़ा िवरोध कया। इस धम प रवतन को ‘ हंद ु व खतरे म है’ का नाम दया गया और इसम ‘खाड़ी देश से आने वाले पैसे’ क भूिमका पर सवाल उठाया गया। यह कहा गया क अरब देश अपने पे ो-डाॅलर क ताकत से भारतीय उपमहा ीप म धम प रवतन कराना चाहते ह और इसम भारतीय मुसलमान सहायक हो रहे ह। ये बात सही थी क इ लािमक धम चारक उस इलाके म स य थे ले कन यह बात भी सही थी क ह रजन समुदाय के लोग ऊंची जाितय के जम दार के शोषण से ा त होकर ित यावश ये कदम उठा रहे थे। इसके अलावा सरकारी कू ल और नौक रय म अपने साथ हो रहे भेदभाव से भी वे दुखी थे। उ ह ये उ मीद थी क एक ऐसा धम अपनाकर िजसम सबके िलए समानता का वहार कया जाता था, वे इस सामािजक कलंक से मुि पा सकगे।58 VIII एक इितहासकार के िलए ीमती गांधी के पहले कायकाल और दूसरे कायकाल का पहला साल कई अ भुत समानता को समेटे ए था। इन वष म उनके पहले शासनकाल क तरह ही काफ सम याएं समाने आई थी। 1966 से लेकर 1969 के बीच कां ेस पाट और क सरकार ने कई सम या का सामना कया था। इनम से तिमलनाडु म डीएमके और पि म बंगाल म संयु मोचा क िवजय लोकतांि क व था के अंदर से आने वाली चुनौती थी, तो िमजो िव ोह और न सलवाद क सम या व था से बाहर क चुनौती थी। इसम उन दन पड़ने वाले भयावह अकाल ने आग म घी डालने का काम कया, िजससे आव यक व तु क भारी कमी हो गई। हमने पहले ही ये देखा है क ीमती गांधी ने उन सम या का कै से सामना कया। ीमती गांधी के मुख सिचव पी.एन. ह सर के ारा जमा कए गए वृहत द तावेज से हम ये जानने म काफ सहायता िमली है। 1980 तक ह सर, ीमती गांधी को छोड़ चुके थे और हमारे पास वैसे कोई कागजात उपल ध नह ह जो बता सक क इस बार उ ह ने उन सम या का सामना कै से कया जो न लीय- े ीय आंदोलन और सां दाियक झगड़ क वजह से पनप रही थ । 1969-70 म ीमती गांधी ने जो रा ता अि तयार कया था वो वैचा रक था। उ ह ने अपने आपको गरीब के मसीहा के प म थािपत कया और अपनी नई पाट बनाई ता क वे उन नीितय को लागू कर सक। ले कन अब व बदल चुका था। अगर ह सर अभी भी उनके साथ होते तो ीमती गांधी अब या रा ता अि तयार करत ? या फर संजय गांधी जंदा होते तो वे कौन सा रा ता चुनत ? हालां क इस तरह के पूवानुमान िब कु ल अकादिमक क म के ह। हम जो पता है उसके मुतािबक 1982 के आखरी महीन और उसके बाद से ीमती गांधी गंभीरतापूवक फर से स ा म आने क तैयारी कर रही थी। वह 1977 क हार को दोहराना नह चाहती थी। इस हार से बचने के िलए उ ह ने तय कया क जब चुनाव का व आएगा तो वे अपने आपको देश के तारणहार के प म पेश करगी। उ ह ने तय कया क वो उन िवभाजनकारी शि य के िखलाफ अपने आपको पेश करगी जो देश क एकता को तार-तार करना चाहती ह।59 हालां क इस बीच गैर-कां ेसी पा टयां भी अगले चुनाव को लेकर उतनी ही संवेदनशील थ और एक साझा मोच का िनमाण करना चाहती थ । इस पहल क अगुवाई एन.टी. रामाराव कर रहे थे, िज ह ने मई 1983 म िवजयवाड़ा म िवप ी दल का एक स मेलन बुलाया। इसम ज मू-क मीर के नए मु यमं ी फा ख अ दु ला भी शरीक ए, िज ह ने 1982 म अपने िपता क मृ यु के बाद मु यमं ी पद क कु स संभाली थी। एन.टी. रामाराव क इस पहल से धानमं ी िचढ़ ग और फा ख अ दु ला क इसम िशरकत से वे नाराज हो ग । जब 1983 म ज मू-क मीर म नया चुनाव करवाया गया तो उ ह ने कां ेस पाट क तरफ से ापक चुनाव चार कया। ज मू के हंद ू बा य इलाक म अपने भाषण के दौरान उ ह ने फा ख को अध-अलगाववादी मानिसकता का ि बताया। ज मू और क मीर के बीच का िवभाजन पहले भी सां दाियक रं ग लेता रहा था ले कन कभी कसी भारतीय धानमं ी ने ऐसा नह कया था। यह एक खतरनाक जुआ था और कां ेस इसम कामयाब नह हो पाई। फा ख और उनक पाट नेशनल काॅ स को जनता ने फर से चुन िलया।60 इस बीच पंजाब का संघष खतरनाक ि थितय तक प च ं गया। हंद ू नाग रक पर हमल क घटना बढ़ गई। 30 अ ैल, 1984 को एक व र िसख पुिलस अिधकारी क ह या कर दी गई। वैसे भी िसख पुिलस अिधकारी आतंकवा दय के िनशाने पर रहते ही थे। फर 12 मई को रमेश चंदर क ह या कर दी गई। रमेश चंदर, संपादक लाला जगत नारायण के बेटे थे और उनक जगह अखबार का कामकाज संभाल रहे थे। इस समय तक भंडरावाले और उसके सहयोगी वण मं दर क कलेबंदी करने म जुट गए थे। यह काम शुबेग संह नाम के आदमी क देखरे ख म हो रहा था, जो भारतीय सेना म पूव मेजर जनरल रहा था और 1971 क लड़ाई के नायक म से एक था। शुबेग संह ने उस लड़ाई म मुि बािहनी को िशि त करने का काम भी कया था। शुबेग संह क देखरे ख म आतंकवा दय ने मं दर के परकोट के सामने बालू क बो रयां रखनी शु कर द और आसपास क ऊंची इमारत को अपने अिधकार म लेना शु कर दया। सभी ठकान पर िशि त लोग को तैनात कया गया जो बेतार से शुबेग संह से जुड़े रहते। शुबेग संह अकाल त त से अपनी कारवाइय का संचालन करता। आतंकवा दय को भी पूरी तरह पता था सरकार उन पर हमला ज र करे गी। तैयारी इस उ मीद म क गई क वे सेना को काफ समय तक उलझाए रखगे ता क गांव म और सूबे के अ य िह स म आम िसख के िव ोह को उकसाया जा सके । उ ह उ मीद थी क गांव से िसख के ज थे वण मं दर क तरफ चल पड़गे। आतंकवा दय ने अपने िलए खाने-पीने के काफ समान जुटा िलए थे ता क एक महीने तक ितरोध कया जा सके । दूसरा प भी कारवाई क तैयारी कर रहा था। 31 मई को मेरठ से मेजर जनरल आर.एस. बरार को बुलाया गया जो वहां एक इं फै ी िडिवजन के मुख थे। बरार से कहा गया क उ ह वण मं दर को आतंकवा दय के चंगुल से मु कराना है। इस अिभयान क कमान उ ह को स पी गई। बरार भी जट िसख ही थे, िजनका पैतृक गांव भंडरावाले के गांव से कु छ ही मील दूर था। वह शुबेग संह को भी भली तरह से जानते थे। शुबेग संह भारतीय सै य सं थान देहरादून म उनका िश क रहा था और उ ह ने बंगलादेश अिभयान के व भी साथ काम कया था। बरार को दो लेि टनट जनरल , सुंदरजी और दयाल ने पूरा मामला समझाया। बरार से कहा गया क सरकार क राय म पंजाब म हालात नाग रक शासन के काबू से बाहर हो गए हं◌ै। अकािलय के साथ कोई समझौता करने क क क कोिशश नाकामयाब हो गई थ । अकाली नेता भंडरावाले को मं दर क कलेबंदी और उस प रसर को छोड़ने पर राजी कर पाने म नाकाम हो गए थे। वे खुद ही अ यिधक उ हो रहे थे। अकाली नेता संत लोग वाल ने घोषणा क क 3 जून से वह पंजाब से अनाज बाहर नह जाने देने के िलए आंदोलन शु करगे। सरकार ने बड़े पैमाने पर पलटवार करने का िवचार कया। फर इस िवचार को इस डर क वजह से याग दया गया क कह रा य के दूसरे िह स म उप व न शु हो जाए। ले कन काफ अिन छा के बाद धानमं ी ने तय कया क कसी भी क मत पर आतंकवा दय को िनकाल बाहर करना है। बरार को इस योजना को बनाने और इसक अगुआई करने का िनदश दया गया िजसका नाम आॅपरे शन लू टार था। उ ह यह अिभयान 48 घंटे म ख म करना था और इसे इस तरह चलाया जाना था क वण मं दर को कोई ित न प च ं े और यादा 61 जान क ित न हो। अगले चौबीस घंट के भीतर ही सेना अमृतसर क तरफ रवाना हो गई और अधसैिनक बल से शहर का िनयं ण अपने हाथ ले िलया। 2 जून को एक युवा िसख अिधकारी ने मं दर म एक ालु के प म वेश कया और इधर-उधर घूमता रहा। उसने आतंकवा दय क सुर ा व था का बारीक से मुआयना कया। मं दर के बाहर के अहम िह स पर जहां आतं कय ने क जा कर रखा था, उसका भी गु प से जायजा िलया गया। मं दर म छु पे आतंकवा दय पर हमला करने से पहले उ ह साफ करना ज री था। 2 जून क रात को धानमं ी ने आॅल इं िडया रे िडयो पर अपना भाषण दया। उ ह ने पंजाब के सभी वग के लोग से अपील क क वे ‘एक दूसरे का खून न बहाएं बि क नफरत क भावना को दूर करने का यास कर।’ हालां क यह आ नान ब त गंभीर नह माना गया, य क सेना पहले ही हमला करने क तैयारी कर रही थी। 3 जून को पंजाब का रे ल, सड़क और टेलीफोन संपक काट दया गया। िसफ अमृतसर म क यू हटा िलया गया ता क ालु गु अजुनदेव क शहादत क वषगांठ मना सक। अगले दन मं दर के आसपास िछटपुट गोलीबारी क घटना ई। सेना मं दर के आसपास क जगह को आतंकवा दय से मु करवाना चाहती थी। उस दन और उसके अगले दन लाउड पीकर पर ालु से मं दर प रसर छोड़ देने को कहा गया। आतंकवा दय पर हमला 5 जून क रात को शु हो गया। बरार को ये उ मीद थी क म यराि तक मं दर के आसपास क जगह को खाली करा िलया जाएगा िजसके बाद अकाल त त के भीतर सुर ाबल के जवान मोचा संभाल लगे और अगले दन सुबह तक वण मं दर खाली करवा िलया जाएगा। ले कन उनक इस योजना ने आतंकवा दय क सं या, उनके पास मौजूद गोलाबा द, उनके िश ण और उनके दृढ़िन य को कम करके आंका। अकाल त त क हरे क िखड़ कयां आतंकवा दय के क जे म थ और उनसे बंदक ू ं ◌े झांक रही थ । मशीनगन और ेनेड के साथ अ य आतंकवादी पूरे मं दर प रसर म फै ले ए थे। वे उस प रसर के च पे-च पे से वा कफ थे और सेना के जवान पर औचक हमला करना चाहते थे। 6 जून क सुबह दो बजे सेना अपनी तयशुदा योजना से काफ पीछे थी। बरार िलखते ह क ‘कई तरफ से आतंकवा दय क घनघोर गोलाबारी क वजह से हमारे जवान अकाल त त के इतने नजदीक नह प च ं पा रहे थे क वहां से मोचा संभाला जा 62 सके ।’ आिखरकार, द ली से इजाजत मांगी गई क आतंकवा दय के सुर ाघेर को तोड़ने के िलए टक के इ तेमाल क इजाजत दी जाए। शाम तक कई टक वण मं दर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गए और मोचा संभाल िलया। एक अनुमान के मुतािबक इन टक क सं या 5 से 13 के बीच थी। लगभग पूरे दन वे अकाल त त म मोचा संभाल रहे आतंकवा दय पर गोलीबारी करते रहे। शाम तक ऐसा मान िलया गया क अब जवान को अंदर भेजा जा सकता है ता क अगर कोई आतंकवादी बचा आ है तो उसे ख म कया जा सके । मं दर के बेसमट म शुबेग संह को मृत पाया गया। उसके हाथ म अभी भी उसक कारबाईन थी और पास ही उसका वाक टाक पड़ा आ था। भंडरावाले और उसके क र समथक अमरीक संह का मृत शरीर भी बरामद आ। अमरीक संह आॅल इं िडया िसख टू ड स फे डरे शन से जुड़ा आ था। सरकार के आंकलन के मुतािबक इस लड़ाई म सेना के 4 अिधकारी और 79 जवान मारे गए जब क 492 आतंकवादी मारे गए। दूसरे कई लोग ने मृतक क सं या काफ यादा बताई। उनके मुतािबक इस अिभयान म कम से कम 500 सेना के जवान और करीब 3000 दूसरे लोग मारे गए, िजनम काफ सं या ालु क थी, जो बीच म फं स गए थे। आर.एस. बरार ने ट पणी क क ई र के घर को जंग के मैदान म बदलकर दस िसख गु के िस ांत और िनयम को उठाकर फक दया गया। हालां क यह बात वीकार क जानी चािहए क िजस मजबूती से आतंकवा दय ने जमीन पर मोचा बना रखा था, िजस साहस से वे लड़े और िजस आ मिव ास का उ ह ने प रचय दया उसक तारीफ क जानी चािहए।63 हालां क इन पंि य के लेखक से सहानुभूित होती है, य क वाकई उसने ऐसा काम कया जो यु या शांित काल म कसी भी भारतीय सै य अिधकारी के िलए सबसे मुि कल भरा काम था। बंगलादेश क लड़ाई के व िजस िसख जनरल को बरार और शुबेग संह दोन ही रपोट करते थे उसने आॅपरे शन लू टार के बारे म िलखा क ‘सेना का इ तेमाल एक ऐसी सम या को दूर करने म कया गया िजसे सरकार ने पैदा कया था। इस तरह के काम से सेना क मता बबाद होकर रह जाएगी।’64 IX वण मं दर जािलयांवाला बाग से महज 10 िमनट पैदल क दूरी पर है जहां अ ैल 1919 म एक ि टश ि गेिडयर ने िनह थे हंद ु तािनय क भीड़ पर गोली चलवाई थी। उस गोलीबारी म 400 से यादा लोग मारे गए थे। उस घटना ने देश के इितहास और इसक जातीय मृित म एक कभी न िमटने वाला गहरा घाव छोड़ दया। इस घटना से जनता म जो सामूिहक गु सा फू टा था, उसका महा मा गांधी ने ब त कािबिलयत के साथ इ तेमाल करके उपिनवेशवादी शासन के िखलाफ देश ापी अिभयान छेड़ा था। हालां क आॅपरे शन लू टार अपने उ े य म अलग था। इसने एक शांिति य आंदोलन क तुलना म एक सश िव ोह को दबाने क कोिशश क थी, ले कन इसके नतीजे अलग नह थे। इसने िसख क समूिहक चेतना पर गहरा घाव कया था और वे भारत सरकार को शक क िनगाह से देखने लगे थे। द ली क तुलना पहले जमाने के शोषक और हमलावर क स ा से क जाने लगी। इसक तुलना मुगल और 18व सदी के अफगान लुटेरे अहमदशाह अ दाली से क जाने लगी।65 एक अखबार के संवाददाता ने जब पंजाब के इलाक का दौरा कया तो उसने पाया क िसख समुदाय अलग-थलग और ‘गु से’ म है। एक बुजुग िसख ने कहा क ‘हमारे अंदर के वािभमान को कु चल दया गया है। हमारे पंथ के आधार पर हमला कया गया है और एक पूरी परं परा न कर दी गई है।’ अब वैसे भी िसख जो पहले भंडरा वाले का िवरोध करते थे, अब उसे एक नए दृि कोण से देखने लगे। भले ही उसका अतीत और उसका अपराध कु छ भी य न रहा हो, ले कन वह और उसके समथक ही थे जो हमलावर से उस पिव जगह क िहफाजत करते व मारे गए थे।66 हालां क पंजाब से बाहर लोग का िवचार िब कु ल अलग था। ब त सारे लोग ने भंडरावाले के िखलाफ स त कदम उठाने के िलए ीमती गांधी क तारीफ क । ऐसा कहा जाता था क उन आतंकवा दय को पा क तान से मदद िमलती थी। अब धानमं ी खुद कई रा य म उन त व के िखलाफ कदम उठाने का मन बना रही थ जो उनके िखलाफ थे। कु छ समय से वह ज मू-क मीर म फा ख अ दु ला क सरकार को बखा त करने पर जोर दे रही थ । जब रा य के रा यपाल और ीमती गांधी के चचेरे भाई बी.के . नेह ने कहा क ये कदम असंिवधािनक होगा तो उ ह बदलकर संजय गांधी के खास रहे जगमोहन को ज मू-क मीर का रा यपाल बना दया गया। जुलाई, 1984 म जगमोहन ने स ाधारी नेशनल काॅ स म िवभाजन करवा दया और दूसरे धड़े के नेता को रा य का मु यमं ी बना दया। नई द ली से थैिलय म भरकर पए ीनगर भेजे गए ता क नेशनल काॅ स के बचेखुचे िवधायक अपने नेता के िखलाफ बगावत कर सक। फा ख को सदन के पटल पर ब मत िस करने का मौका तक नह दया गया। हक कत तो यह थी क उ ह उनक बखा तगी का आदेश आधी रात को दया गया। यह ठीक उसी कार था जैसे उनके िपता के साथ 1953 म कया गया, जब उ ह संदह े ा पद कानूनी और नैितक आधार पर पद से हटा दया गया था। बी.के . नेह ने िलखा ‘इस बार क मीर के लोग को पूरी तरह पता चल गया क उनके चुने ए नेता को दोबारा पद से हटाकर हंद ु तान क सरकार ने अपनी मंशा जता दी है। हंद ु तान कभी उ ह उनक मज से राज करने नह देगा।’67 एक महीने बाद आं देश म भी नेतृ व प रवतन कर दया गया। एक बार फर कां ेस पाट के पुराने सद य से रा यपाल बने एक नेता ने यहां िसयासत का सतही खेल खेला। तेलुगुदश े म पाट के एक खेमे को पाट से बगावत करने और कां ेस के साथ िमलकर सरकार बनाने के िलए उकसाया गया।68 ज मू-क मीर और आं देश क सरकार क बखा तगी लोकतांि क या का खुला उ लंघन था। यह कोई सश िव ोह नह था, बि क यहां कानूनी तौर पर चुनी ई सरकार काम कर रही थ । यहां ि गत खु स और दु मनी से इं कार नह कया जा सकता, य क ये एनटीआर और फा ख अ दु ला ही थे िज ह ने िवप ी दल म एका लाने क पहल क थी। धानमं ी ने ये ज र गणना क होगी क लोकसभा चुनाव से पहले रा य म अपनी समथक सरकार होनी चािहए। अपने एक िम को िलखे एक प म उ ह ने िवप ी दल पर आरोप लगाया क ‘वे लोग मुझे हटाने के एकमा उ े य पर काम कर रहे ह। उनका कामचलाऊ गठबंधन जाितवाद, े वाद और स दायवाद पर आधा रत है’।69 वह अपने काय को गलत तरीके से यायोिचत ठहरा रही थ । हक कत तो यह थी क 1983 और 1984 म ीमती गांधी क खुद क ब त सारी नीितयां उनके अगले आमचुनाव जीतने के एकमा उ े य से संचािलत हो रही थ । आॅपरे शन लू टार के बाद खु फया एंजेिसय ने धानमं ी को उनक सुर ा के बारे म चेतावनी दी थी। उ ह सलाह दी गई क वे अपने िसख अंगर क को हटा दं◌।े ीमती गांधी ने इस ताव को यह कहकर खा रज कर दया क या हम धमिनरपे नह ह?70 31 अ टू बर क सुबह अपने घर से कायालय जाते समय उनक नजदीक से गोली मारकर ह या कर दी गई। उनक ह या उनके ही अंगर क सतवंत संह और बेअंत संह ने कर दी। वे दोन ही िसख थे जो हाल ही म अपने मूल िनवास थान का दौरा करके वापस आए थे और वहां के हालात को देखकर काफ गु से म थे। वे आॅपरे शन लू टार का बदला लेना चाहते थे। जब धानमं ी को अ पताल ले जाया गया तो डाॅ टर ने उ ह मृत घोिषत कर दया। दोपहर तक िवदेशी रे िडयो मा यम ने यह समाचार सा रत कर दया, हालां क आॅल इं िडया रे िडयो ने अपनी आिधका रक घोषणा शाम 6 बजे ही क । उसके कु छ ही देर बाद उनके बेटे राजीव गांधी को धानमं ी पद क शपथ दला दी गई। जब उनक मां को गोली मारी गई, वह उस व कलक ा म थे। वह तुरंत ही द ली आए जहां कां ेस के व र नेता और मंि य के एक समूह ने आमसहमित से ये तय कया वे अपनी मां के उ रािधकारी बनगे। उस रात देर रात को द ली से कु छ लूटपाट और आगजनी क खबर आ । उसक अगली सुबह ीमती गांधी के शव को तीनमू त भवन म रखा गया, जहां उनके िपता बतौर धानमं ी रहा करते थे। पूरे दनभर और उसके अगले दन भी हंद ु तान का एकमा टीवी चैनल दूरदशन उनके शव के नजदीक लोग के रोने-धोने और चीखने िच लाने क त वीर दखाता रहा। रह-रहकर दूरदशन का कै मरा बाहर खड़े लोग का जूम भी दखाता था, जो इं दरा गांधी अमर रह का नारा लगा रहा था। ले कन उन नार म धमक भरा नारा भी लगाया जा रहा था - खून का बदला खून से लगे। 31 अ टू बर क रात से जो हंसा शु ई वह नवंबर के शु आती दो दन म और िवकराल प धारण कर गई। इसका पहला भयानक प दि णी और क ीय द ली म देखने को िमला। उसके बाद इसक लपट यमुनापार के िव थािपत क काॅलोिनय तक फै ल ग । हरे क जगह िसफ और िसफ िसख समुदाय के लोग को िनशाना बनाया जा रहा था। उनके घर जला दए गए, उनक दुकान लूट ली ग । उनके पूजा थल और उनक धा मक कताब को अपिव कया गया। च मदीद के मुतािबक िसख पर हमला करने वाली भीड़ ‘सरदार को ख म करो’, ‘ग ार को ख म करो’ और ‘िसख को सबक िसखाओ’ जैसे नारे लगा रही थी। िसफ द ली म ही एक हजार से यादा िसख मारे गए। 18 से 50 साल के िसख पु ष को खासकर िनशाना बनाया गया। उ ह मारने के िलए कई तरीके अि तयार कए गए। अ सर उ ह उनक मां और बीवी के सामने ही क ल कर दया गया। शव क होली जलाई गई और बाप के साथ बेटे को जंदा जला दया गया। ह यार क टोली कह रही थी क ‘ये सांप का ब ा है इसे भी ख म करो’। इस भीड़ म ऐसे हंद ू शािमल थे, जो द ली या इसके आसपास के इलाक म रहते थे। इसम अनुसूिचत जाित के मेहतर, जाट, कसान और आसपास के गांव के गुजर चरवाहे शािमल थे। उ ह कां ेस नेता , शहर के िनगम पाषद , सांसद और यहां तक क क ीय मंि य तक का संर ण ा था। कां ेस नेता ने इन लोग को पैसा और शराब का आ ासन दया था, इसके अलावा जो समान वे लूट सकते थे वो उनका अपना था। पुिलस मुंह ताकती रही या लुटेर और ह यार को मदद करती रही।71 इस संकट क घड़ी म राजीव गांधी ने बयान दया, ‘जब कोई बड़ा पेड़ िगरता है तो धरती ऐसे ही कांपती है।’ इसम कोई शक नह क ीमती गांधी क ह या से उनके शंसक काफ उ ेिजत ए। म यवग का एक बड़ा तबका 1971 क लड़ाई म उनके फै सल और उनक नेतृ वशैली क वजह से उनका बड़ा समथक था। गरीब म भी एक बड़ा वग मानता था क राजनेता म ीमती गांधी ही ऐसी ह जो उनक चंता करती ह। पंजाब म हो रही घटना से हंद ू समाज भी चंितत था। उ ह डर था क खािल तान आंदोलन देश को टु कड़े-टु कड़े कर देने क एक बड़ी सािजश है। ीमती गांधी क ह या दो िसख ने ही क थी। इससे भी इस भावना को बड़ा बल िमला। ीमती गांधी क ह या के तुरंत बाद ही कई दूसरी तरह क अफवाह फजा म तैरने लगी। ऐसी अफवाह उड़ाई गई क हंद ु क लाश से भरी रे लगाि़डयां पंजाब से द ली आ रही ह और राजधानी क जलआपू त व था म जहर िमला दया गया है। द ली के लोग काफ गु से म थे। जो कु छ भी हो रहा था या बताया जा रहा था उसे देखकर वे आपे से बाहर हो गए थे। यहां तक क राजीव गांधी का खुद का बयान ही ब त असंवेदनशील था। वह िजस शासन को संभालने जा रहे थे यह उसके वहार क एक झलक मा ा थी। तीनमू त भवन म भारी भीड़ इक ा हो गई थी और लोग बदला लेने क बात कर रहे थे। सरकारी टेलीिवजन इसे सा रत कर रहा था। यह एक भयावह भिव यवाणी का संकेत था। पुिलस हाथ पर हाथ धरे बैठी ई थी और कां ेसी नेता क भूिमका काफ अनैितक थी। ले कन सबसे बड़ी गलती ये क गई क सेना को बुलाने क कोई इ छा नह दखाई गई। द ली म ही सेना क एक बड़ी छावनी है और राजधानी के पचास मील इद-िगद कई इं फै ी िडिवजन मौजूद ह। सेना को नह बुलाया गया। धानमं ी और उनके गृहमं ी पी.वी. नर संह राव से कई बार इसके िलए आ ह भी कया गया, ले कन सरकार ने ऐसा नह कया। शायद नवंबर क पहली या दूसरी तारीख को अगर शहर म सेना बुला ली जाती तो हालात इतने बेकाबू न होते। ले कन ऐसा कभी नह हो पाया। इस हंसा म राजधानी के िसख ने तो तकलीफ उठाई ही, उ र भारत के दूसरे कई शहर मं◌े भी उन पर हमले ए। उ र देश म इ ह घटना म 200 से अिधक िसख मारे गए। इं दौर म 20 िसख और इ पात नगरी बोकारो म करीब 60 िसख मारे गए। इन सभी जगह पर भीड़ को थानीय कां ेसी नेता ने उकसाया था। िसफ एक शहर जहां हंसा सबसे कम ई वो कलक ा था। शहर म करीब 50,000 िसख थे िजनम से यादातर टै सी ाइवर थे। वे अपनी पगड़ी और दाढ़ी से ब त आसानी से पहचान म आ सकते थे। इस घटना के बाद ब त कम लोग को नुकसान आ और कसी क जान नह गई। पि म बंगाल के मु यमं ी योित बसु ने पुिलस को आदेश दया था क कानून और व था क ि थित काबू म रहनी चािहए। इस आ ा का पालन कया गया और शहर के ताकतवर ेड यूिनयन ने इस पर कड़ी िनगाह रखी। कलक ा के उदाहरण ने सािबत कया क शासन ारा उिचत कारवाई करने से सां दाियक हंसा पर काबू पाया जा सकता है। ले कन दुभा यवश ऐसा पूरे देश म नह हो पाया।72 X अपने मु क के इितहास पर ीमती गांधी का एक िनि त भाव है। यह भाव उनके िपता के भाव से कम नह है। जवाहरलाल नेह 16 साल 9 महीने तक देश के धानमं ी रहे। उनक बेटी भी अपने दो कायकाल म उस पद पर लगभग उतने ही दन रह । वह जनवरी 1966 से लेकर माच 1977 तक और फर जनवरी 1980 से लेकर अ टू बर 1984 तक स ा म रह । आजाद हंद ु तान के इितहास म ये दो अहम शि सयत ह, िज ह ने अपने-अपने तरीके से अपने मु क को भािवत कया। इसिलए एक क तुलना दूसरे से करना अिनवाय है और शायद ज री भी। एक सैिनक नेता के प म ीमती गांधी का कोई सानी नह था। बंगलादेश संकट के समय उनके तुरंत फै सला लेने क मता वाकई अ भुत थी। इसक तुलना अगर नेह के चीनी हमले के समय िलए गए ढीले-ढाले फै सले से क जाए तो वाकई वह े सािबत होती ह। नेह कभी मरते दम तक दो ती का वादा करते तो कभी िबना कसी ताकत के दु मन को हमला न करने क चेतावनी देत।े उस तुलना म इं दरा गांधी यादा ावहा रक थ । जहां तक आ थक नीितय का संबंध है नेह का सावजिनक े और आ मिनभरता पर यादा जोर देना उनके युग के अनुकूल फै सला था। ले कन 60 के दशक म जब अथ व था को बाजार क ताकत के िलए सतकतापूवक खोलने क बारी आई तो ीमती गांधी ने सरकारी िशकं जा और भी मजबूत कर दया। सामािजक प से दोन ही बड़े फलक पर सोचते थे और धम, लंग, वग और े से परे पूरे हंद ु तान का ितिनिध व करते थे। ले कन नेह को जहां बढ़त िमलती है वो लोकतांि क या और काय करने के तरीक से संबंध रखता है। ीमती गांधी क मृ यु के बाद यह िवचार कृ णाराज ने तुत कया। कृ णाराज भारत म जन िवषय क मुख पि का इकोनाॅिमक एंड पोिल टकल वीकली के संपादक थे। दोन के बीच िविभ ता का एक बंद ु यह है क िपता और पु ी ने कै से अपनी पाट के साथ वहार कया िजसके साथ वे जंदगी भर जुड़े रहे। कृ णाराज ने िलखा क जब इं दरा गांधी ने 1966 म नेतृ व संभाला तो उस व कां ेस पाट ब तरीय जवाबदेह नेतृ व के साथ बड़ी ही सुसंग ठत ि थित म थी और उसका िव तार देश के हरे क िह स म था। ले कन उसके बाद उ ह ने पाट भंग कर दी और ऐसा उ ह ने सुिनयोिजत तरीके से कया। चूं क वह कसी पर भरोसा नह करती थ , जो िव ासपूवक उनके अधीन थ क भूिमका िनभा सके , उ ह ने पाट के ि तीय ेणी के नेता से मुि पा ली और पाट का फर से गठन कया। यह गठन महज कागज पर था िजसम कोई लोकतांि क ढांचा नह था और पाट संगठन के लोग िनजी तौर पर उनके ारा चुने जाते थे। दुभा य क बात यह थी क िसफ कां ेस पाट ही नह थी जो धानमं ी क इ छा क गुलाम हो गई थी। अब भारत सरकार क ि थित भी ऐसी ही हो गई। जब इं दरा गांधी जनवरी, 1966 म स ा म आ , उस व चीन के साथ यु म अपमानजनक हार के बावजूद हंद ु तान का सामािजक ताना-बाना इतना मजबूत था क इसे सामािजक ि थरता और ग रमा के िलए पूरी दुिनया म जाना जाता था। देश के सामने सामािजकआ थक उ े य क एक शृंखला थी िजसके इदिगद यह एक कृ त था। देश का राजनीितक वग सा य और साधन क पर पर िनभरता को वीकार करता था। यह बात ापकतौर पर मानी जाती थी क रा य के उपकरण का उ े य कभी भी जानबूझकर िनजी िहत को बढ़ावा देने म नह कया जाएगा। ले कन इं दरा गांधी क मृ यु के व तक इन िस ांत म गुणा मक प रवतन आ गया। अब भारत एक बंटा आ मु क है। अब यहां गहरे घाव ह और गहरी असिमितयां है। पंचवष य योजनाएं जो एक व लोग क उ मीद और आकां ा का अिभ ि प थ , उसका कोई मतलब नह रह गया है। अब रा य क सं था का उपयोग हमेशा कु छेक लोग के िहत को आगे बढ़ाने के िलए कया जाता है जो सामािजक तौर पर तो ऊंचे पायदान पर ह ले कन आबादी के िहसाब से अ पसं यक ह। अब क क सरकार अंदर से हो चुक 73 है और इं दरा गांधी इसक िज मेदारी से नह बच सकत । पि मी मीिडया के एक िह से ने भारत के िलए अंधकारमय युग क भिव यवाणी क । ीमती गांधी क मृ यु के साथ ही यूयाॅक टाइ स ने िलखा क मु क सतत अिनि तता के मुहाने पर खड़ा है। अंद नी अि थरता और पड़ोसी देश खासकर पा क तान के साथ नए तनाव इस देश के िलए चुनौती हो सकते ह। यूयाॅक से छपनेवाले सन ने तो और भी नकारा मक िवचार पेश कए। उसने िलखा क धानमं ी क ह या ने देश के िबखरने क आशंका खड़ी कर दी है, िजससे यह े ीय और अंतरा ीय ित िं ता का अखाड़ा बन सकता है। वाॅ शंगटन म अमे रका के कु छ उ ािधकारी इस बात से चंितत थे क न लीय और धा मक ित िं ता इस देश को हंसा के हवाले कर सकती है और देश खंड-खंड हो सकता है। ऐसी ि थित म हंद ु तान का घबराया आ नेतृ व सोिवयत संघ क यादा से यादा मदद ले सकता है।74 भारतीय संघ के बारे म िलखी जाने वाली यह न तो पहली ांजिल थी, न ही आखरी। ले कन यह अभी भी ता ुब क बात है क कै से कां ेसी चरण क तरह पि मी पयवे क भी इस बात को वीकार करने पर सहमत हो गए क वाकई इं दरा ही भारत है! ले कन ऐसा ही नतीजा िनकाला गया और यह अपने आपम एक बड़ा सबूत था क कै से वग य धानमं ी, लोकतांि क सं था को मह वहीन करने म कामयाब हो गई थ । 8 यह बेटा भी कम नह हंद ु तान म कु व था और थािय व म से एक को चुनने क बात कभी नह होती। बि क यहां संभाल पाने लायक या न संभाल पाने लायक अराजकता क बात होती है, यहां मानवीय या अमानवीय कु व था क बात होती है और सहने लायक या न सहने लायक उप व क बात होती है। आशीष नंदी, समाजशा ी, 1990 I भारतीय राजनीित का जो तर था, उस िहसाब से भी सन् 1984 एक उथल-पुथल भरा साल था। जून के पहले स ाह म आॅपरे शन लू टार को अंजाम दया गया, िजसम सरकार ने एक धम थल पर अनपेि त हमला बोला था। अ टू बर क आखरी तारीख को धानमं ी क ह या कर दी गई। यह ह या महा मा गांधी क ह या के बाद देश क सबसे बड़ी राजनीितक ह या थी। उस ह या ने ता कािलक प से हंद-ू मुि लम हंसा को तो रोक दया, ले कन इसके बाद िसख पर हंद ु ारा बड़े पैमाने पर हमले कए गए। इ ह खूनखराब के बीच राजीव गांधी को धानमं ी पद क शपथ दलाई गई। उनके शपथ लेने के एक महीने बाद एक ऐसा हादसा आ िजसम ब त सारे लोग क मौत हो गई। मरने वाल क तादाद िसख िवरोधी दंग म मरने वाल क सं या से कम नह थी। 3 दसंबर 1984 क सुबह मुंह अंधेरे शहर भोपाल म आसमान म सफे द धुएं का एक गुबार उठा। सोये ए लोग न द से जाग उठे । अचानक लोग को छ क, िमतली और आंख म जलन महसूस होने लगी। घबराहट म वे अपने िब तर से उठे और गिलय म भागने लगे, ले कन गैस थी क उनका पीछा नह छोड़ रही थी। सुबह होते-होते शहर क मु य सड़क पर लोग क अपार भीड़ जमा हो गई। लोग बड़ी ाकु लता से इधरउधर सुरि त ठकाना ढू ंढ़ने लगे। ब त सारे लोग दम घुटने से और च र खाने क वजह से गिलय म ही िगर पड़े। कु छ लोग कसी तरह अ पताल प च ं पाए, जहां 1 िब तर क भारी कमी थी। वह जहरीली गैस िमथाइल आईसोसाइनेट थी और यह अमे रक कं पनी यूिनयन काबाइड के कारखाने से िनकली थी। गैस को अमूमन एक भूिमगत टक म रखा जाता था और वातावरण म छोड़ने से पहले हािनरिहत बनाया जाता था। ले कन उस अभागी रात को एक अनपेि त रसायिनक ित या क वजह से िमथाइल आईसोसाइनेट अपने जहरीले प म ही वातावरण म रसने लगी। इसका असर बड़ा िवनाशकारी सािबत आ। गैस रसाव के एक घंटे के भीतर ही करीब 400 लोग क मौत हो गई। कु ल िमलाकर इस घटना म करीब 2000 लोग क जान ग । यह घटना मानव इितहास म सबसे बड़ी औ ोिगक दुघटना सािबत ई। मरने वाल म यादातर लोग झु गीझोपड़ी और घनी बि तय म रहते थे, जो कारखाने के इद-िगद बसी ई थ । मृतक के अलावा इस दुघटना से करीब 50,000 लोग जीवनभर के िलए भािवत हो गए। दुघटना के बाद भोपाल प च ं ने वाले लोग का तांता लग गया, हालां क उनम सबका उ े य पिव नह था। उनम से ब त सारे डाॅ टर भी थे जो लोग क मदद को आए थे। ले कन ब त सारे वक ल भी थे, जो मृतक और पीि़डत क तरफ से अमे रक यायालय म ‘वग य’ मुकदमा दायर कर मुनाफा कमाना चाहते थे। यूिनयन काबाइड का सीईओ भी भोपाल आया, उसे थोड़ी देर के िलए िगर तार कया गया और फर जमानत पर रहा कर दया गया। वह अमे रका भाग गया। घटना के बाद भारतीय वै ािनक का एक दल गैस के भाव को ख म करने भोपाल प च ं ा, िजसका जखीरा अभी भी उस कारखाने म पड़ा आ था। इस अिभयान का नाम आॅपरे शन फे थ रखा गया ले कन इसने लोग म अिव ास ही पैदा कया। भिव य म फर कोई ऐसी ही दुघटना न हो, इस आशंका से हजार लोग भोपाल छोड़ने लगे और शहर के बस अ े और रे लवे टेशन पर भारी भीड़ जमा हो गई। वहां अफरा-तफरी का माहौल था। भागते ए लोग अपने साथ जो भी सामान लेकर आ सकते थे, वहां जमा हो गए और शहर छोड़ने लगे।2 घटना क जांच ने इसके पीछे कई वजह क तरफ इशारा कया। टक म पानी जमा हो जाना, टक को ठीक से साफ नह कया जाना और गैस को उिचत तापमान से यादा पर जमा कया जाना, इसक संभािवत वजह बताई ग ।3 ले कन जो बात साफ थी वो ये क जान-माल को भािवत कर सकने वाले इतने बड़े उ ोग को शहर के बीच म थािपत करना िब कु ल गलत था। जब कारखाने ने 1980 म अपना उ पादन शु कया था तो शहर िनयोजक एम.एन. बुच ने कहा था क यूिनयन काबाइड को कोई सुरि त और कम आबादी वाली जगह खोजनी चािहए। ले कन उस सलाह पर यान नह दया गया। हक कत तो यह थी क 1984 म एक रपोट ने जािहर कया क कारखाने का इितहास बड़ा ही सं द ध था। पहले भी कं पनी के कई कारखान म गैस रसाव, टू टी ई पाइप लाइन, छोटी दुघटना , अ ात क म क बड़ी दुघटनाएं हो चुक थी और अब वह कसी बड़े हादसे के होने क तैयारी कर रहा था।4 II भोपाल क दुघटना दसंबर के पहले स ाह म ई थी। महीने के आखरी म देश म आठवां आम चुनाव करवाया गया। यह चुनाव इं दरा गांधी क ह या और उनक याद के साये म हो रहा था। कां ेस के चुनाव अिभयान ने राजीव गांधी को उनक मां के िवरासत के स े वा रस के प म पेश कया और पाट ने खुद को अलगाववादी ताकत के िखलाफ इकलौते यो ा के प म तुत कया। वह चुनाव अिभयान िव ापन एजसी रे िड युजन क देखरे ख म चलाया गया था। एक िव ापन क पंचलाइन थी क आपके एक क मती मत से हंद ु तान एक या िवखंिडत हो सकता है, जब क दूसरे िव ापन क पंि थी - या सन् 77 आंदोलन के नेता कभी भी एक िवचारधारा तले एक हो सकते ह िसवाय स ा क लालच के ?5 एक टीकाकार ने िलखा क कां ेस का अिभयान जनता म असुर ा क भावना का दोहन करने का यास कर रहा था और इं दरा गांधी क ह या को भारतीय रा य पर आ हमला बताया जा रहा था। कां ेस पाट इस बात को जनता के मन म िबठा रही थी।6 जब चुनाव के नतीजे सामने आये तो कां ेस ने भारी जीत दज क । पाट को करीब 50 फ सदी मत िमला जब क इसने लोकसभा क करीब 80 फ सदी सीट पर क जा कर िलया। एक राजनीितक नौिसिखए नेता क अगुआई म पाट ने लोकसभा क 401 सीट पर जीत दज क । यह सं या नेह या इं दरा गांधी ारा जीती गई सीट से भी ब त यादा थी। हालां क धानमं ी के सलाहकार म से एक ने वीकार कया क ‘यह जीत िजतनी उनक थी, उससे कह यादा उनके वग य मां क थी।’7 यह आमचुनाव जनता के मन म अलगाववाद का भय दखाकर जीता गया था, ले कन भारी ब मत से स ा म आने के बाद धानमं ी ने पंजाब म शांित बहाली क कोिशश तेज कर द । अकाली नेता को जेल से रहा कर दया गया और उनसे बातचीत क पहल क गई। संत हरचरण संह लोग वाल भी राजीव गांधी क तरह ही अतीत को भूलने के प म थे। जुलाई 1985 म दोन नेता ने एक समझौते पर द तखत कए िजसके मुतािबक एक खास समय सीमा के अंदर चंडीगढ़ पंजाब को स प दया जाना था। इस समझौते के तहत न दय के जल म पंजाब को उसका उिचत िह सा दया जाना था और रा य से रा पित शासन हटाकर ताजा चुनाव करवाया जाना था। इसके अलावा क सरकार ने सभी रा य के िलए क -रा य संबंध क ताजा समी ा का भी आ ासन दया। इस समझौते के बाद संत लोग वाल ने पंजाब का दौरा कया। उ ह ने जनसभा को संबोिधत कया और गु ार म भाषण दए। हरे क जगह उ ह ने लोग से अपील क क लोग इस नए सामंज य का वागत कर। संग र म ऐसी ही एक जनसभा म दो नौजवान ने संत लोग वाल क गोली मारकर ह या कर दी। उन पर आरोप लगाया गया क उ ह ने द ली के शासक के साथ तालमेल करके िसख के साथ ग ारी क है। यह घटना 20 अग त को घटी, ले कन सरकार ने फर भी िह मत का प रचय देते ए िसतंबर के आिखर म चुनाव करवाने का फै सला कया। संत क ह या ने उनक पाट के िलए रा यभर म सहानुभूित क लहर पैदा कर दी। रा य के इितहास म अकाली दल पहली बार अपने दम पर स ा म आया। पाट को ब मत िमला। रा य के कु ल मतदाता म से दो-ितहाई लोग ने अपने मतािधकार का योग कया। ऐसा कहा गया क यह चुनाव आतंकवाद के िखलाफ एक जनादेश है।8 इसी बीच देश के दूसरे छोर पर सरकार ने आॅल असम टू ड स यूिनयन (आसू) के साथ भी एक समझौता कया। दोन ही प घुसपै ठय के रा य म आने क कोई एक ितिथ मानने पर रजामंद हो गए। ऐसा तय कया गया क 1 जनवरी 1966 और 25 माच 1971 (िजस दन बंगलादेश क लड़ाई शु ई) से पहले आने वाले लोग को भले ही मतािधकार न दया जाए ले कन रा य म बसने क इजाजत दे दी जाए। इसके अलावा जो लोग उस ितिथ के बाद वहां आए ह उनक पहचान क जाए और उ ह उनके मूल थान पर भेज दया जाए। यहां भी रा पित शासन हटा िलया गया और चुनाव क घोषणा क गई। अब उस छा संगठन आसू ने अपने आपको एक राजनीितक दल के प म प रव तत कर िलया और इसका नाम असम गण प रषद रखा गया। जब दसंबर, 1985 म चुनाव करवाए गए तो नई राजनीितक पाट असम गण प रषद ने एक जमाने क ताकतवर रही पाट कां ेस को धूल चटा दी। नए मु यमं ी फु ल महंत क उ महज 32 साल थी और उनके कई िवधायक तो उनसे भी छोटे थे। पंजाब क तरह ही इस नतीजे को भी लोकतं क जीत बताया गया। द ली म कां ेस के व र नेता ने कहा क भले ही इन चुनाव म उनक पाट हार गई हो ले कन लोकतं क जीत ई है। एक क ीय मं ी ने कहा क जो लोग कल तक डाइनामाइट बांटते थे वे आज चुनावी पच बांट रहे ह। एक रा वादी दृि कोण से इसे हार कहा जाए या जीत?9 जून, 1986 म भारत सरकार ने िमजो नेशनल ं ट के नेता लालडगा के साथ भी एक शांित समझौता कया। समझौते क शत के मुतािबक एमएफएन (िमजो नेशनल ं ट) के नेता ने हिथयार डाल दया और सरकार ने उ ह आम माफ दे दी। सरकार िमजोरम को एक पूण रा य का दजा देने पर राजी हो गई और लालडगा ने रा य के मु यमं ी क कु स संभाली। यह कु स उ ह ने, कां ेस मंि मंडल से हण क । यहां वही फामूला अपनाया गया जो शेख अ दु ला के साथ क मीर म 1975 म अपनाया गया था।10 एक अखबार ने िलखा क राजीव गांधी िसख और असिमय क तरह ही िमजोरम के लोग के िलए भी स द छा लेकर आए ह।11 हालां क हक कत म इन समझौत क परे खा और इसका खाका सरकार के अिधका रय और जी. पाथसारथी जैसे व र कू टनियक ने ख चा था ले कन इसका ेय युवा धानमं ी को िमला। ऐसा माना गया क दलगत भावना से ऊपर उठकर उ ह ने रा ीय स ावना को मजबूत करने का काम कया है। इन तीन ही रा य म कां ेस िवरोधी पा टयां शांिति य तरीक से स ा मआग । III राजीव गांधी के िलए उनका राजनीित से बाहर का होना फायदेमंद सािबत आ। लोकि य जनमत म उनका नाम कसी िववाद से जुड़ा आ नह था, न ही वे कसी खेमे से जुड़े ए थे और न ही उ ह ने अपना कोई गुट बनाया था। उनके युवा होने, उनक खूबसूरती और उनके खुले वहार क वजह से लोग म उनक अपील ब त यादा थी। जब उ ह ने धानमं ी पद क शपथ ली, उस व उनक उ करीब 40 साल ही थी। ‘ धानमं ी क कु स पर एक भ पु ष बैठा था, जो मतलब क बात करता था, काम करने के ित गंभीर और ईमानदार था। उनके दीवाने हो चुके देशवािसय ने उनका नाम िम टर लीन रख दया।’12 राजीव गांधी के मु य सलाहकार भी राजनीित से बाहर के े के थे। इसम से दो अ ण संह और अ ण नेह काॅपारे ट जगत से आए थे, िज ह मं ी बनाया गया। राजीव गांधी क तरह ही वे युवा और अं ेजी बोलने वाले थे और राजीव गांधी क तरह ही वे आधुिनक तकनीक के इ तेमाल म सहज थे। उन लोग ने भारत को 16व सदी से 21व सदी म ले जाने का इरादा जािहर कया। उ ह ने भारत को बैलगाड़ी के जमाने से िनकालकर कं यूटर के जमाने म ले जाने क बात क । मीिडया के कु छ िह स म राजीव गांधी ारा िनयु कए गए इन लोग को ‘राजीव का कं यूटर बाॅय’ कहकर मजाक भी उड़ाया गया। हालां क मीिडया के एक िह से ने उनक तारीफ भी क । मीिडया ने राजीव गांधी क तुलना जाॅन एफ. के नेडी से क जो उनक ही तरह नई पीढ़ी और युवा के तीक थे और िज ह ने अपने देश का एक नया भिव य गढ़ने के िलए बेहतरीन और तेज-तरार लोग क एक टीम बनाई थी।13 अपने कायकाल के पहले साल धानमं ी यादातर व दौरे पर ही रहे। वे देश के उन िह स को देखना चाहते थे, िजसे उ ह ने पहले नह देखा था। राजीव गांधी ारा क जा रही ‘भारत क खोज’ को ेस और टेलीिवजन ने काफ सकारा मक तरीके से छापा। अ सी के दशक म देश म टेलीिवजन सेट क सं या म भारी वृि ई थी। टेलीिवजन सारण पर अभी भी सरकार का एकािधकार था। दूरदशन ने युवा और खूबसूरत धानमं ी के दौरे पर सैकड़ घंटे का काय म बनाया। कभी उ ह क मीर म एक हाउसबोट पर दखाया जाता, तो कभी कसी सुदरू आ दवासी गांव म, तो कभी के रल के ना रयल पेड़ के बीच। हरे क जगह वे आम हंद ु तानी लोग से िमलते, उनसे आवेदन लेते और उसे िजला शासन को कारवाई के िलए स प देते।14 ले कन इ ह आवेदन म से एक ने नई सरकार के िलए पहला संकट पैदा कया। हालां क यह धानमं ी को नह , बि क सु ीम कोट को दया गया था। आवेदनकता एक बुजुग इं सान था और उसका नाम मोह मद अहमद खान था। उसने िनचली अदालत के उस फै सले के िखलाफ सु ीम कोट म अपील क थी, िजसम उसे अपनी तलाकशुदा प ी शाहबानो को गुजारा भ ा देने का िनदश दया गया था। खान ने कहा क उसने इ लािमक कानून के तहत (उसके दावे के मुतािबक) अपनी तलाकशुदा बीवी को तीन महीने का गुजारा भ ा देकर अपना फज अदा कर दया है। सु ीम कोट ने अपराध दंड संिहता क धारा 125 के तहत खान क अपील को खा रज कर दया, िजसके मुतािबक एक तलाकशुदा औरत को अपने पूव पित से गुजारा भ ा पाने का अिधकार है, अगर उसके पित ने दूसरी औरत से शादी कर ली है (जैसा क खान ने कया था), और अगर तलाकशुदा मिहला ने पुन ववाह नह कया है और कमाने लायक नह है (शाहबानो का मालमा इस पर सटीक बैठता था)। अदालत ने व था दी क धारा 125 इसीिलए बनाई गई थी ता क उन लोग को त काल और यूनतम मदद मुहय ै ा कराई जाए जो खुद कमा सकने म असमथ ह। इससे या फक पड़ता है क उपेि त प ी, ब ा या माता-िपता कस धम से ता लुक रखता है? यायाधीश के िवचार म अपराध दंड संिहता सटीक तरीके से ा या करता है क दंड संिहता और िनजी कानून के बीच िववाद क ि थित म धारा 125 िनजी कानून से ऊपर है। एम.ए. खान ने पहली बार 1981 म अपनी यािचका दायर क थी और इसका फै सला चार साल बाद आया। 23 अ ैल 1985 को सु ीम कोट ने खान क अपील को खा रज करते ए फै सला दया क उसे हाईकोट के फै सले के मुतािबक तय आ गुजारा भ ा अपनी प ी को देना पड़ेगा (हाईकोट ने खान को 179.20 पए ित महीना गुजारा भ ा देने को कहा था!)। इसके बाद यायाधीश ने यािचका के संदभ से बाहर जाते ए कु छ सामा य ट पणी भी क । उ ह ने संिवधान क धारा 44 का िज करते ए समान नाग रक संिहता का हवाला दया और इस पर खेद जताया क संिवधान क ये धारा एक ‘मृत द तावेज के बराबर’ हो गई है। उ ह ने कहा क लोग म ऐसी धारणा बन गई है क िसफ मुसलमान को ही अपने िनजी कानून म सुधार के िलए आगे आना चािहए। िववा दत िवचार वाले कानून के ित ाकु ल ितब ता को दूर कर एक समान नाग रक संिहता, रा के एक करण म मददगार सािबत होगी।15 कई हलक म सु ीम कोट क इस ट पणी को पूरे मुि लम समुदाय के ित एक गैरज री ट पणी के प म देखा गया। मुसलमान ने जज के फै सले को दूसरे प म िलया। मुसलमान ने कहा क ये आरोप लगाया जाता है क इ लामी कानून मिहला के उ थान म बाधक है (उ ह ने ये भी कहा क हंद ू व थाकार मनु ने भी कहा है क मिहलाएं आजादी क हकदार नह ह)। मुि लम धमगु ने फै सले क ये कहकर आलोचना क क यह इ लाम पर एक हमला है। देशभर क मि जद म इसका िवरोध कया गया। मु ला और मौलिवय ने सु ीम कोट और शाहबानो क कड़ी आलोचना क ।16 दूसरी तरफ कु छ इ लामी िव ान ने इस फै सले का वागत करते ए कहा क यह शरीयत के िखलाफ नह है। उ ह ने कहा क इ लाम म ये ावधान है क तलाक देते समय पित को अपनी पूव प ी क मृ यु या उसके पुन ववाह तक उसको उिचत गुजारा भ ा देना चािहए।17 सु ीम कोट के इस फै सले के तीन महीने बाद जी.एम. बनात वाला नाम के सांसद ने संसद म एक ाइवेट मे बर िबल पेश कया िजसम मुसलमान को धारा 125 के दायरे से मु करने क बात थी। सदन म इस िबल का िवरोध क ीय गृह रा य मं ी आ रफ मोह मद खान ने कया, जो गितशील मुसलमान के दृि कोण क नुमांइदगी कर रहे थे। उ ह ने मौलाना आजाद का हवाला देते ए अदालत के फै सले का समथन कया। मौलाना आजाद सबसे मश र रा वादी मुसलमान होने के साथ-साथ इ लािमक कानून के आिधका रक िव ान भी थे। मौलाना ने िलखा था क कु रान के मुतािबक कसी भी हालत म तलाकशुदा औरत क उिचत व था क जानी चािहए। यह िनदश इस आधार पर दया गया क औरत, पु ष से तुलना मक प से कमजोर होती है और उसके िहत क उिचत र ा होनी चािहए। खान ने इसके आगे तक दया क आज के जमाने म हम इन वग के साथ बेहतर वहार करना चािहए और िसफ दबे-कु चल के िहत क र ा करके ही इ लािमक िस ांत और याय के िस ांत का पालन कया जा सकता है।18 आ रफ मोह मद खान को धानमं ी का समथन हािसल था और कां ेस पाट ारा िबल के िवरोध म जाने के कारण यह िबल संसद म िगर गया। ले कन सदन के बाहर यह बहस चलती रही। अपने शहर इं दौर म क रपंिथय ने शाहबानो को धम युत करार कर दया, उसके घर के बाहर धरना दशन कया गया और पड़ोिसय से उसके बिह कार क मांग क गई। 15 नवंबर को शाहबानो, क रपंिथय के दबाव के सामने झुक गई और उसने एक कागजी बयान पर अंगूठे का िनशान लगा दया, िजसम कहा गया क सु ीम कोट के फै सले क िज मेदारी उस पर नह है और वह गुजारा भ े को लोकसेवा िलए दान दे देगी। इसके साथ ही उसने ये भी कहा क मुि लम िनजी कानून म कसी तरह का याियक ह त ेप नह होना चािहए।19 1985 के अंत तक कां ेस पाट उ र भारतीय रा य म ए उप-चुनाव म बुरी तरह परािजत ई। राजनीितक टीकाकार ने ‘शाहबानो त व’ को इसक वजह बताया य क ितप ी पा टय ने मुि लम बा य े म इस आधार पर धा मक भावना को हवा देने म कोई कसर नह छोड़ी।20 मुसलमान के पाट से अलगाव ने राजीव गांधी को चंितत कर दया और वे पाट और मंि मंडल के मसल पर उदारपंथी आ रफ खान क बजाय जेड.ए. अंसारी से सलाह लेने लगे। संसद म अपने तीन घंट के भाषण म अंसारी ने सु ीम कोट के फै सले को पूवा ह त, भेदभावकारी और िवरोधाभास से पूण बताया। अंसारी ने बड़े ं यपूवक और मजाक उड़ाते ए कहा क अदालत के यायाधीश इ लामी कानून क ा या करने के िलए ब त छोटे इं सान 21 ह। अब तक शाहबानो के अलावा कां ेस पाट भी क रपंिथय के दबाव म आ गई थी। अब पाट ने भी क रपंथी त व को मुि लम समाज के एकमा व ा के प म 22 वीकार कर िलया था। फरवरी, 1986 म सरकार ने संसद म एक मुि लम मिहला िबल पेश कया िजसके ारा मुि लम िनजी कानून को अपराध दंड संिहता के दायरे से बाहर रखकर सु ीम कोट के फै सले को पलटने क कोिशश क गई। इस िबल ने तलाकशुदा प ी के गुजारे क व था का िज मा अपने संबंिधय पर छोड़ दया। अब तलाक देने वाले पित को िसफ उसे तीन महीने का गुजारा भ ा देना था। मई म इस िबल को पा रत कर दया गया और कां ेस पाट ने इसे पा रत करने के िलए अपने सारे सांसद को पाट ि हप जारी कया। अपनी पाट और अपने नेता ारा खा रज कए जाने के बाद आ रफ मोह मद खान ने कां ेस से इ तीफा दे दया। उ ह ने एक सा ा कार म कहा क इस नए कानून के पा रत हो जाने के बाद से पूरी दुिनया म िसफ भारतीय मुि लम मिहला ही ऐसी ह गी िज ह तलाक के बाद गुजारा भ ा नह िमलेगा।23 शाहबानो मामले ने जो िववाद पैदा कया वह बहस कई मायन म वैसी ही थी जैसी तीन दशक पहले हंद ू िनजी कानून के सुधार के व शु ई थी। उस समय भी लिगक समानता को बढ़ाने के यास का पुजा रय ारा कड़ा िवरोध कया गया था, जो पूरे समुदाय क तरफ से बोलने का दावा करते थे। उस दावे क परी ा ली गई और उसे तब कमजोर पाया गया जब जवाहरलाल नेह ने 1952 का चुनाव लड़ा और उसे जीत िलया। उस चुनाव म कई दूसरे मु के साथ हंद ू िनजी कानून अिधिनयम भी एक मु ा था। 1985-86 म ऐसी ही ि थित का सामना करते व राजीव गांधी के पास 400 सांसद का समथन था। मुि लम िनजी कानून म सुधार करके मिहला क ि थित को उ त करना सरकार के िब कु ल दायरे म था। सरकार िब कु ल ऐसा कर सकती थी। सरकार के पास लिगक भेदभाव से रिहत समान नाग रक संिहता लागू करने का मौका भी था (जैसा क संिवधान म िनदश भी दया गया था)। ले कन िजस बात क भारी कमी थी, वो थी धानमं ी म सामािजक सुधार को लागू करने क दृढ़ इ छाशि । राजीव गांधी सरकार म ऊंचे पद पर आसीन अिधकारी ने बाद म याद करते ए कहा क ‘शाहबानो मामले के बाद क ि थित को संभालने क कोिशश म देश का राजनीितक तं , युवा धानमं ी पर हावी हो गया। पंजाब और असम म उनक पहल से उनके अंदर क मजबूती और फै सला लेने क वतं ता झलकती थी, ले कन शु म सुधारवा दय को समथन देने के बाद उ ह ने क रपंथी त व के सामने घुटने टेक दए। ऐसा मुि लम मत को खोने के भय से कया गया और इस तरह राजीव गांधी के अंदर का टे समैन, राजनीित के प म प रव तत होने लगा।’24 IV शाहबानो मामले म सु ीम कोट का फै सला आने के दस महीने बाद एक िजला अदालत के फै सले ने और भी बड़े भूचाल को ज म दे दया। 1 फरवरी 1986 को उ र देश के शहर अयो या म िजला यायाधीश ने एक छोटे से हंद ू उपासना गृह का ताला खोलकर पूजा करने क इजाजत दे दी। अपने छोटे से आकार के बावजूद इस जगह क काफ अहिमयत थी। यह जगह 16व सदी म मुगल बादशाह बाबर के िसपहसलार ारा बनाई गई एक बड़ी मि जद म ि थत थी (इसिलए यह बाबरी मि जद के नाम से जानी जाती थी)। इसके अलावा यह दावा कया जा रहा था क यह जगह हंद ु के देवता राम क ज मभूिम है और मि जद के िनमाण से पहले यह जगह उनको सम पत एक मं दर था। अभी तक इस बात का कोई माण नह है क पौरािणक ंथ रामायण के नायक राम एक ऐितहािसक च र थे, ले कन हंद ू जनभावना और पौरािणक आ यान ऐसा ही कहते थे। कवदंितय और हंद ू जनभावना के मुतािबक राम का ज म अयो या म उसी जगह पर आ था, जहां बाद म मि जद बनाई गई। उस जगह को थानीय लोग राम ज मभूिम कहते थे िजसका मतलब था क राम यह पैदा ए थे। पूरे 19व सदी म इस जगह के मिलकाने हक के िलए ित ं ी गुट म कई संघष ए। ि टश शासक ने दोन प म एक समझौता करवाया था, िजसके मुतािबक मुसलमान मि जद के भीतर उपासना कर सकते थे जब क उसके बाहर बने एक चबूतरे पर हंद ू पूजा-अचना कर सकते थे। 1947 म जब मु क आजाद आ, उसके दो साल के बाद हंद ू िहत से सहानुभूित रखने वाले एक अिधकारी ने मि जद के भीतर रामलला (राम का बाल प) क मू त को रखने क इजाजत दे दी। ऐसा रात के अंधेरे म कया गया। ालु से कहा गया क िनवािसत भगवान अपनी जगह पर दावा करने के िलए वतः फू त प से कट ए ह। यह खबर आग क तरह फै ल गई। इस घटना से फर से तनाव फै ल गया और यह तभी शांत आ जब हंद ु को दसंबर म िसफ एक दन रामलला क पूजा-अचना क इजाजत दी गई। साल के शेष दन मू त क पूजा-आराधना क इजाजत नह दी गई और मि जद म ताला जड़ दया गया। तीन दशक तक उस जगह पर यथाि थित कायम रही। ले कन अ सी के दशक के शु आती साल म िव हंद ू प रषद नाम के एक संगठन ने राम ज मभूिम क मुि के िलए अिभयान चलाना शु कर दया। िविहप (िव हंद ू प रषद) ने अपने झंडे तले अयो या के िविभ मं दर से सकड़ क सं या म साधु को जुटा िलया। जुलूस और जनसभा का आयोजन कया गया, िजसम आ ामक भाषण दए गए और हंद ु से आ नान कया गया क वे अपने भगवान को ‘मुि लम कारागार’ से मु कर। उसके बाद एक थानीय वक ल ने अदालत म यािचका दायर क िजसम मांग क गई क आम लोग को रामलला क पूजा-अचना क अनुमित दान क जाए। इसी यािचका के जवाब म िजला यायाधीश ने फै सला दया क मि जद का ताला खोला जाए और पूजा-अचना क इजाजत दान क जाए।25 लोग का ऐसा मानना था क यायाधीश का फै सला नई द ली के िनदश पर आ है। ऐसा माना गया क धानमं ी कायालय ने ऐसा करने का िनदश दया है। ऐसा लगा क थानीय शासन को फै सले के बारे म पहले से जानकारी थी य क फै सले के एक घंटे के भीतर ही बाबरी मि जद का ताला खोल दया गया। खास बात तो ये थी रा ीय टेलीिवजन भी उस ण इस घटना को अपने कै मरे म उतार रहा था, जब लोग का जूम अभी-अभी खुले उपासना गृह क तरफ जा रहा था। ऐसा लग रहा था क मुि लम मिहला िबल और अयो या के फै सले के बीच कोई मजबूत तार जुड़ा आ है। ऐसा कहा गया क राजीव गांधी ने मि जद का ताला अपने सहयोगी अ ण नेह क सलाह पर खुलवाया ता क हंद ू समाज के क रपंिथय को संतु कया जा सके । एक वामपंथी सांसद ने धानमं ी का मजाक उड़ाते ए कहा क ‘ धानमं ी अपने आपको इ सव सदी म ले जाने वाले एक आधुिनक ि के प म पेश कर रहे थे, ले कन हक कत म उनका दमाग मु ला और पंिडत के समान ही पुरातन काल का था।’26 राजनीितक िव ेषक नीरजा चौधरी ने िलखा क ‘राजीव गांधी एक ही साथ दोन प को संतु करना चाहते थे। अगर एक काम मुि लम मत को आक षत करने के िलए कया गया था तो दूसरा उससे भी बड़ा हंद ू मतदाता को संतु करने के िलए कया गया।’ चौधरी ने अपने लेख म चेतावनी जािहर करते ए कहा क ‘सरकार ारा चुनावी फायदे के िलए दोन ही समुदाय के तु ीकरण क कोिशश एक ऐसे खतरनाक च क शु आत कर सकती है, िजसे तोड़ पाना भिव य म मुि कल होगा।’27 बाबरी मि जद का ताला खोलने क इजाजत दे दए जाने क घटना ने िव हंद ू प रषद क उ मीद बढ़ा द । अब वे मि जद को िगराए जाने और उसक जगह भगवान राम को सम पत एक भ मं दर बनाए जाने क मांग करने लगे। िव हंद ू प रषद, पुराने हंद ू संगठन रा ीय वयंसेवक संघ के साथ िमलकर बारीक से काम कर रहा था, िजसे अब पुनज वन िमल गया था। आरएसएस और िविहप ने देशभर म बैठक क और आ नान कया क देश के ब सं यक समुदाय को अपने अिधकार के िलए उठ खड़ा होना चािहए। मुि लम मिहला िबल को कां ेस सरकार ारा अ पसं यक के तु ीकरण करने क कोिशश के प म चा रत कया गया। ये आरोप लगाया गया क एक ‘छर् ◌ंधमिनरपे ’ रा य म िसफ हंद ु से उनक अपनी आ था को याग कर देने क बात कही जा रही है। एक नया नारा, गव से कहो हम हंद ू ह गढ़ा गया और चा रत कया गया! सा ािहक इं िडया टु डे ने मई, 1986 म िलखा क इस नारे ने लोग के बीच भावना का वार सा ला दया। धीरे -धीरे ले कन िनि त प से जैसे एक भीमकाय वाहन गित पकड़ता है उसी तरह से लोग के अंतमन को छू ता आ, उफान मारता, एक कृ त और तेजी से आ ामक ख अि तयार करता आ एक हंद ू पुनजागरण पूरे देश को झकझोर रहा है। यह एक ऐसा आंदोलन था जो अपने वभाव म खोए ए गौरव क पुनवापसी का य कर रहा था, ले कन उससे राजनीितक स ा िमलने के संकेत भी िमल रहे थे, जो कसी समुदाय के एकताब हो जाने पर िमलती है।28 V हंद ू आ था को एक ऐसी नदी के प म देखा जा सकता है िजसक कई धाराएं ह। इनम से कु छ धाराएं आकर इसम िमल जाती ह, तो कु छ इससे अलग होकर िनकल भी जाती ह। शायद इसक कोई मुक मल त वीर अभी तक बन नह पाई है, य क कई मायन म इसक कोई मु यधारा ही नह है। यह ऐसा िवक त धम है, िजतना दुिनया म कोई भी धम नह है। हरे क िजले म अपना अलग पूजा और उपासनागृह है जो क थानीय पुजा रय ारा चलाया जाता है। कभी-कभी इसका जुड़ाव अपनी जाित और अपने े से होता है। उदाहरण के िलए उ र क ड़ िजले के माधव ा ण के अपने िनि त मं दर होते ह और अपने गु होते ह। ले कन अयो या िववाद क वजह से देश म एक संभावना पैदा हो गई क इन अलगथलग परं परा को एक झंडे के तले संग ठत कर एक एक कृ त आंदोलन का प दया जाए। िव हंद ू प रषद ने हंद ू धम के मुख मत के धमाचाय और नेता को संग ठत कर एक धम संसद क थापना क । इन धमाचाय ने फर हजार साधु और संत से बातचीत क और उ ह संग ठत कया, िजनके अनुयायी पूरे देशभर म फै ले ए थे। अयो या म राम मं दर के िनमाण के अलावा भी एक ापक और अिखल हंद ू एक करण क पहल म ापक राजनीितक संभावना छु पी ई थी। एक बड़े संत ने कहा हंद ू समाज म दजन धमाचाय ह और येक के पास करीब 25 लाख का वोटबक है। उदाहरण के िलए गुजरात के मुरारी बापू, राज थान के रामसुख दासजी महाराज, उ र देश के ी देवराहा बाबा, आरएसएस के ी देवरसजी, अयो या के ी नृ यगोपालदास महाराज आ द। इसके अलावा सैकड़ धमाचाय ऐसे ह िजनके पास करीब एक लाख का वोटबक है। हंद ू समाज म करीब 10 लाख साधु का एक मजबूत दल है। अगर इसम से हरे क साधु कम से कम सौ आदमी को भी संग ठत करता है तो इस देश क राजनीित का हंदक ू रण हो जाएगा।29 दूसरी तरफ अयो या के पुराने मि जद पर मंडरा रहे खतरे ने देश म मुसलमान को आशं कत कर दया। वे इसक िहफाजत के िलए चंितत हो गए। बाबरी मि जद ए शन कमेटी नाम क एक सं था का गठन कया गया, िजसने सरकार से अपील क क बाबरी मि जद और दूसरी इबादतगाह को क रपंथी हंद ु के जबरन क जे म जाने से रोका जाए। हालां क समुदाय के कु छ तबक क मनोि थित काफ उ थी। सरकार के पुरात व सव ण िवभाग क देखरे ख म आने वाली मि जद म भी नमाज पढ़ने क इजाजत दए जाने क मांग क जाने लगी। कु छ लोग ने तो यहां तक कहा क अगर सरकार उनक मांग नह मानती है तो गणतं दवस समारोह का बिह कार कर दया जाए।30 हालां क उसी व दो ऐसी घटनाएं िजससे हंद ु के धु्रवीकरण को और भी मदद िमली। िसतंबर 1987 म राज थान के एक गांव म पकं वर नाम क एक मिहला अपने पित क मौत के बाद सती हो गई। उसने खुद को आग म जला िलया। हालां क हंद ू परं परा म सती का उ लेख है और इसक मा यता दी गई है ले कन कानूनन यह ितबंिधत है। रा य ारा इस पर पाबंदी और सबसे यादा नारीवा दय के बल िवरोध के बावजूद ामीण राज थान म पकं वर कांड से लोग म आ था और भि का सैलाब उमड़ आया। उसके सती होने क जगह पर एक मं दर बना दया गया और हजार लोग वहां दशन को जुटने लगे। पकं वर क शंसा म जनसभाएं आयोिजत क ग और उसे हंद ू नारी व का एक अनुपम उदाहरण बताया गया जो अपने पित क याद म जान तक कु बान कर सकती है।31 दूसरी ओर एक और अहम घटना थी दूरदशन पर धारावािहक रामायण का सारण। यह एक अदĤाुत क म का टीवी काय म था जो राम क जीवनलीला पर आधा रत था। जनवरी 1987 से जुलाई 1988 तक इसका सारण कया गया। यह सारण हरे क रिववार क सुबह को कया जाता था। इसक कु ल िमलाकर 78 क त थ और यह शृंखला चार महीन के िलए बािधत भी ई। रामायण एक अ भुत, दैवीय और वृहद महाका है िजसम जीवन के हरे क रं ग ह। इसम ेम, बिलदान, वीरता और धोखेबाजी क कहािनयां ह। इसम र रं िजत घटनाएं ह। इसम छोटे-बड़े नायक क भरमार है और यह सोप-ओपेरा क को ट म भी सटीक बैठता है। इसका ऐसे व म सारण आ, जब देश म टेलीिवजन दशक क सं या बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। उस दर यान हरे क साल 30 लाख टेलीिवजन सेट बेचे जा रहे थे।32 फर भी इस काय म क इतनी बड़ी कामयाबी क उ मीद कसी को नह थी। पूरे देश म इसके करीब 8 करोड़ दशक थे। शहर क सड़क और गिलयां रिववार क सुबह वीरान हो जाती थ । िजस भी समारोह या काय म का रिववार के िलए िव ापन कया जाता था, उसम िलखा होता - रामायण के बाद! सड़क के कनारे हरे क दुकान पर या जहां कह भी टेलीिवजन सेट होता, भीड़ जमा हो जाती। रिववार क सुबह, होटल , अ पताल और कारखान म बड़ी सं या म लोग गैरमौजूद रहते।33 इस धारावािहक को देखने वाल क सं या तो मह वपूण थी ही, लोग िजस गहनता और त लीनता से इसे देखते थे वो भी कम मह वपूण नह था। लोग रिववार क सुबह सबेरे ही उठते और नहा-धोकर पूजा कर लेते। जब काय म शु होता तो टेलीिवजन सेट पर फू ल क माला चढ़ाई जाती और उसे चंदन का ितलक लगाया जाता। खास बात तो यह थी क धारावािहक क लोकि यता ने धा मक सीमा को भी तोड़ दया। मुसलमान ने इसे खुशी और कौतूहल से देखा तो चच ने उस समय अपना काय म बदल दया।34 नृिव ानशा ी फिलप लूटज ाफ ने िलखा क दि ण एिशया के लोग इससे पहले कभी भी इतने बड़े पैमाने पर कसी एक काय म से एकब नह ए थे। इससे पहले कभी ऐसा नह आ था क कोई एकमा संदश े एक ही समय म इतने बड़े 35 दशक वग तक प च ं ा हो। जहां मुसलमान और ईसाइय ने रामायण को मनोरं जन के दृि कोण से देखा, तो दूसरी तरफ ब त सारे हंद ु ने इसे मनोरं जन के साथ-साथ ा के दृि कोण से भी देखा। ऐसा कसी योजना के तहत नह बि क अनायास ही आ क टेलीिवजन पर सा रत यह महाका एक ब लतावादी और िवक त धम म एक अदृ य प रवतन ला रहा था। यह प रवतन एक ऐसे धम म आ रहा था जो स दय से कई पंथ म बंटा आ था, िजसको माननेवाले अलग-अलग देवी-देवता क पूजा करते थे, िजनका न तो कोई एकमा पिव ंथ था, न ही कोई एक देवता, और न ही कोई एकमा धा मक क । अब अपने टेलीिवजन सेट के सामने इितहास म पहली बार पूरे देश के हंद ु ने एक ही समय एक ही काय म को देखा। दरअसल इस धारावािहक ने हंद ू धम म एक सामूिहक चेतना का िवकास कया।36 धारावािहक रामायण सरकारी टेलीिवजन दूरदशन पर सा रत आ था, िजसका अयो या आंदोलन से कोई लेना-देना नह था। ले कन धारावािहक क अपील और इसके भाव ने िव हंद ू प रषद के रामज म भूिम मुि आंदोलन को बढ़ाने म खासा योगदान दया। य क अब तक हंद ु ारा पूजे जा रहे कई देवता म से एक राम को सबसे मह वपूण और आकषक देवता के प म लोग धारावािहक क वजह से य टेलीिवजन पर देख रहे थे। VI नए धानमं ी ारा उठाए गए कदम म से एक था आ थक मोच पर कए जाने वाले कु छ सुधार। इन सुधार म पुराने जमाने के कु छ कठोर िनयम कायद को िवदा कर दया गया। राजीव गांधी ने वी.पी. संह को िव मं ी के पद पर िनयु कया। िव नाथ ताप संह उ र देश से आते थे और बड़े संयिमत क म के नेता थे। वे कामकाज म अपनी िन ा के िलए मश र थे। माच, 1985 म पेश कए गए सरकार के पहले बजट म कठोर बंधन म जकड़ी अथ व था पर से कु छ िनयं ण और पाबं दय को हटाने क कोिशश क गई। आयात-िनयात क या को उदार बनाया गया। कु छ आयात क जाने वाली व तु पर से कर म ढील दी गई और िनयात यो य सामि य के िनयात को ो साहन दया गया। उ ोग को लाइसस देने क या को भी सरल बनाया गया और कु छ अहम े जैसे मशीन, उपकरण, कपड़ा, कं यूटर और दवा े को िविनयंि त कया गया। िनजी कं पिनय क संपि य पर लगे कर को आंिशक प से हटा िलया गया और काॅपारे ट और ि गत आयकर को कम कया गया। ऐसा कहा गया क इन प रवतन से उ पादकता म बढ़ोतरी होगी और औ ोिगक ित पधा बढ़ेगी। फरवरी, 1985 म धानमं ी ने कहा क भारतीय अथ व था यादा से यादा िनयं ण लगाने के दु च म फं स चुक है। इन िनयं ण से ाचार म बढ़ोतरी होती है 37 और प रयोजना म देरी। हम इसे ही दूर करना चाहते ह। वामपंथी बुि जीिवय ने इस बजट क ये कहकर आलोचना क क ये अमीर लोग को फायदा प च ं ाने वाला है। उ ह ने कहा क आयात-िनयात को िनयं ण से मु करके सरकार देश को िवदेशी पूंजी पर अ यिधक िनभरता क तरफ धके ल रही है।38 हालां क इन नई आ थक नीितय का कारोबारी तबके और देश के म यवग ने वागत कया।39 अब तक देश का म यवग खासा बड़ा हो चुका था। कई आंकलन के मुतािबक म यवग क सं या 10 करोड़ के बराबर हो चुक थी। उपभो ा व तु का बाजार फै ल रहा था। रे जरे टर और कार, जो पहले कु छ िगनेचुने लोग ही खरीदते थे, अब म यवग के दायरे म आता जा रहा था। 1984-5 म मोटरसाइ कल और कू टर क िब म 25 फ सदी से यादा क बढ़ोतरी दज क गई, जब क कार क िब म 52 फ सदी क वृि ई। हर समय नए-नए धंधे और कारोबार खुल रहे थे। गृहिनमाण और आवास के बाजार म उफान आ गया। नए-नए रे तरां और शाॅ पंग काॅ ले स खुल रहे थे। एक पयवे क ने िलखा क तेजी से तर कर रही अथ व था म एक उभरता आ म यवग सबसे यादा दखने वाला वग है।40 अ सी के दशक का उ राध कारोबार के िहसाब से अ छा था। औ ोिगक े ने 5.5 फ सदी क दर से तर क जब क िविनमाण े ने इससे भी यादा अ छा कया। इसम 8.9 फ सदी ितवष क तर दज क गई। 1980 क तुलना म बाजार क सकल पूंजी 68 अरब पए से बढ़कर 550 अरब पए हो गई।41 वाभािवक है, कु छ कं पिनय ने दूसर क तुलना म तेज छलांग लगाई। सबसे यादा तर रलायंस इं ड ीज क ई िजसके सं थापक धी भाई अंबानी कभी अदन म पे ोल पंप पर नौकरी कया कया करते थे। हंद ु तान लौटकर उ ह ने सबसे पहले मसाल के कारोबार म हाथ आजमाया। उसके बाद वे नायलाॅन और रे याॅन के िनयात क तरफ मुड़।े इसके बाद उ ह ने सूती कपड़ा बनाना शु कया। अंबानी ने फर पीछे मुड़कर नह देखा। उसके बाद तो वह पे ोके िमकल, इं जीिनय रं ग और िव ापन के े म बढ़ते गए और अपने काय े को िव तृत कर िलया। रलायंस ने िजस िहसाब से तर क वह भारतीय उ ोग के इितहास म अपने आप म अजूबा है। यूं कह क इस तरह क तेज र तार तर दुिनया के औ ोिगक इितहास म कम कं पिनय को ही नसीब ई होगी। एक आंकलन के मुतािबक पूरे अ सी के दशक म कं पनी क संपि म करीब 60 फ सदी सालाना क दर से बढ़ोतरी ई। इसक िब म 30 फ सदी सालाना क बढ़ोतरी दज क गई और इसका मुनाफा 50 फ सदी क दर से बढ़ा। अंबानी योगधम उ ोगपित थे, उ ह ने अ याधुिनक तकनीक का इ तेमाल कया (जो अमूनन आयाितत था) और फै ल रहे म यवग से पि लक इशू के मा यम से पूंजी उगाही (अमूमन प रवार क त दूसरी भारतीय कं पिनयां ऐसा करने म नाकाम रही)। फर भी उनक कं पनी के तर म िवशु कारोबारी कािबिलयत क तुलना म उनके गहन संपक सू का यादा योगदान था। उ ह ने राजनेता और नौकरशाह से अ छा र ता बनाकर रखा, उ ह शानदार दावत म आमंि त कया और िवदेश म तफरीह कराई। नतीजतन उ ह सरकार क आ थक नीितय , मसलन कर क दर का ित पधा होने से पहले पता चल जाता था, िजसका उ ह ने जमकर फायदा उठाया।42 स ाधीश से रलायंस क नजदीक राजनेता और उ ोगपितय के बीच पनप रहे गठजोड़ का िसफ एक ल ण भर था। हक कत तो यह थी क हरे क बड़े औ ोिगक घराने ने द ली म अपना िबचौिलया िनयु कर रखा था, िजसका काम नेता और नौकरशाह से संबंध बनाकर अपने कं पनी के िहत को आगे बढ़ाना था। ऐसा काम िसफ रा ीय राजधानी म ही नह हो रहा था, बि क रा य के मु यमं ी और मं ीगण भी पैसे के बदले उ ोगपितय को फायदा प च ं ा रहे थे। औ ोिगक और कारोबारी काम के िलए जमीन दलाना और उस पर संपि य का िनमाण करना पैसा बनाने का एक मु य ोत था। कई कानून ने सरकार को ये अिधकार दे रखा था क वे शहर के करीब कृ िषयो य जमीन का अिध हण कर उसे अपनी नजदीक कं पिनय को कारखाना या कायालय बनाने के िलए दे सकते थे। इन सौद म करोड़ां◌े-अरब पय का लेन-देन आ, िजसम से कु छ सीधे नेता क जेब म प च ं ा, तो कु छ चुनाव लड़ने के 43 िलए पाट फं ड म जमा कर दया गया। इतनी बड़ी रकम के सौद से ई आमदनी ने भारतीय नेता क जीवनशैली बदलकर रख दी। कभी अपनी सादगी और सरलता के मश र भारतीय नेता अब बड़ेबड़े आलीशान मकान म रहने लगे जो हर तरह क सुिवधा से सुसि त थे। वे लंबी और आलीशान गाि़डय म या ा करते और पांचिसतारा होटल म खाना खाने लगे। वाकई वे ‘नए महाराजा ’ के अवतार म आ गए। एक राजनीितक टीकाकार ने ट पणी क क गांधी से राजीव गांधी तक का सफर वाकई राजनीितक मा यता म आई एक लंबी छलांग है। राजनीितक जीवन से धोती गायब हो चुक है और उसी तरह से छड़ी, लकड़ी के खड़ाऊं और रे लवे के तीसरे दज म सफर भी ख म हो चुका है। महंगे जूत,े महंगे च म, बुलेट ूफ जैकेट, मसडीज गाि़डयां और सरकारी हेिलकाॅ टर ने इनक जगह ले ली। अब भारतीय राजनीित से पसीन क गंध दूर हो चुक है, हालां क यह अभी भी साफ और गंधहीन नह है - इससे आ टरशेव क बदबू आ रही है।44 VII एक तरफ उ ोग धंधे और देश का म यवग तर कर रहा था, तो दूसरी तरफ देश क आबादी का बड़ा िह सा भयावह गरीबी और कु पोषण से त ि थित म जी रहा था। साल 1985 के पतझड़ म उड़ीसा के आ दवासी िजल से भूखमरी से ई मौत क कई खबर सामने आ । जब बा रश ने धोखा दे दया और फसल बबाद हो गई तो गांव के लोग इमली के बीज और आम क गुठली का शोरबा खाने पर मजबूर हो गए, िजससे कई लोग को पेट संबंधी बीमारी हो गई। पहले के जमाने म जब खा ा क कमी होती थी तो लोग जंगल से भोजन ा कर लेते थे ले कन वन के तेजी से लु होते जाने से इस तरह का कोई आ ासन अब नह बचा। िसफ कोरापुट और कालाहांडी से ही 1000 से यादा लोग के मरने क खबर आई।45 1987 म देश को फर से एक बार भारी सूखे का सामना करना पड़ा। ऊपरी उड़ीसा के इलाके फर से एक बार सबसे यादा भािवत ए ले कन पि मी भारत के कम पानी वाले इलाके खासकर गुजरात और राज थान को भी इसका सामना करना पड़ा। सूखे से घबराकर पशुपालक अपने जानवर को क म लेकर चारे क खोज म म यभारत के इलाक म आ गए जो उनके अपने इलाक म उपल ध नह था। इस सूखे को पूरी शता दी म सबसे भयानक सूखे क सं ा दी गई। एक आंकलन के अनुसार इस सूखे से करीब 20 करोड़ लोग भािवत ए। अखबार क त वीर ने उनक तकलीफ को ापक प से िचि त कया िजसम सूखे और वीरान खेत और फटी ई जमीन दखाई देती और मरे ए जानवर क हि यां दूर-दूर तक िछतरी ई दखत ।46 1985 और 87 के संकट ने इस बात को रे खां कत कया क देश अभी भी अनवरत प से कृ िष और अथ व था के िलए मानसून पर िनभर था। यहां तक क िजन इलाक म संचाई क बेहतर व था थी वहां भी लोग म असंतोष था। इस असंतोष को दो नए कसान संगठन ने और भी उकसाया। इसम से एक था शेतकारी संगठन जो महारा म स य था तो दूसरा था भारतीय कसान यूिनयन जो ह रयाणा और पंजाब म स य था। शेतकारी संगठन का नेतृ व कभी नौकरशाह रहे शरद जोशी कर रहे थे तो भारतीय कसान यूिनयन का नेतृ व जाट कसान म हं संह टकै त के हाथ म था। जोशी के मुतािबक असली झगड़ा ‘इं िडया’ और ‘भारत’ म है। इं िडया क नुमाइं दगी शहर म रहने वाला और अं ेजी बोलने वाला म यवग कर रहा है जब क भारत क नुमाइं दगी गांव म रहने वाले लोग कर रहे ह। उ ह ने कहा क देश क आ थक नीित भारत क बजाय इं िडया का लगातार समथन कर रही है। इन पूवा हभरी नीितय को उलटा करने के िलए जोशी और टकै त ने ताव कया क कृ िष उ पाद क यादा क मत दी जाए और कृ िष काय के िलए कम दर पर िबजली दी जाए। दोन नेता के संगठन का बड़ा जनाधार था। दोन ही संगठन कभी भी अपनी मांग को मनवाने के िलए रा य क राजधािनय म 50,000 या उससे भी यादा कसान का जमावड़ा कर सकते थे।47 हालां क जोशी और टकै त पूरी ामीण आबादी क तरफ से बोलने का दावा करते थे ले कन हक कत ये थी क वे अपे ाकृ त म यवग य और समृ कसान क नुमाइं दगी करते थे। वे वैसे कसान क नुमाइं दगी करते थे िजनके पास ै टर था, िबजली से चलनेवाले पंपसेट थे और जो अपना अित र अनाज मंिडय म बेच सकते थे। गरीब कसान अिधकांशतः उनके दायरे से बाहर थे। अ सी के दशक म कए गए अ ययन ने एक बार फर सािबत कया क ामीण भारत म वग क अवधारणा बुरी तरह से जाित पर हावी थी। अभी भी असली वंिचत म सबसे यादा सं या ह रजन या अनुसूिचत जाित के लोग क ही थी। कनाटक म ए एक सव ण म पाया गया क रा य के सुदरू वत िह स म रहने वाले दिलत म से 80 फ सदी और शहर म रहने वाले दिलत म से 60 फ सदी आिधका रक गरीबी रे खा से नीचे जीवन जी रहे थे। उनका मािसक खच 50 पए ित महीने से भी कम था। हंद ु तान के दूसरे िह स क त वीर भी ऐसी ही थी।48 VIII अपने कायकाल के पहले साल म राजीव गांधी ने असम, िमजोरम और पंजाब सम या जैसे कई जातीय और न लीय मु को सुलझाया था। ले कन उनके कायकाल के दूसरे साल के अंत तक उनक सरकार को कई इस तरह के नए मु का सामना करना पड़ा। इन मु ने पहले से चले आ रहे धम और वग के आधार पर चल रहे संघष म बढ़ोतरी ही क । िपछले दशक क तरह ही आजाद भारत के इस दशक म (या कसी भी दूसरे दशक म) होने वाले सामािजक संघष क ा या कसी एक अ याय, एक कताब या कसी एक िव ान के वश क बात नह है। हां, इनम से कु छेक अहम संघष पर नजर ज र डाली जा सकती है। एक ही रा य के अंदर अलग-अलग समूह के बीच झगड़े चल रहे थे। उदाहरण के िलए बंगाल म दा ज लंग के नेपाली भाषा-भाषी लोग ने अपने िलए एक अलग रा य क मांग शु कर दी। उनका नेता एक पूव फौजी था िजसका नाम सुभाष घीस ग था। घीस ग के पीछे उसके लोग च ान क तरह खड़े थे और उसक एक आवाज पर िजले क सारी दुकान और कू ल बंद करवा सकते थे। उनका गोरखा नेशनल िलबरे शन ं ट लोकतांि क दायरे के भीतर और उससे बाहर भी काम करता था। वे कभी-कभी क ीय मंि य को आवेदन देते और कभी-कभी उनक पुिलस से झड़प हो जाती। 1986 के उ राध से इस तरह क झड़प और भी यादा तीखी होती ग । इस बीच धानमं ी ने घीस ग से मुलाकात क और नेपाली भाषा-भािषय के िलए एक अलग रा य क जगह उ ह एक वाय पवतीय प रषद के िलए राजी कर िलया।49 असम म सीमावत इलाक म बोडो आ दवासी थानीय प से भावशाली असिमय के िखलाफ िव ोह पर उता थे। उनका आंदोलन उनके ितपि य क नकल पर ही बोडो युवा ारा संचािलत था। इसका नाम आॅल बोडो टू ड स यूिनयन(आ सू) था। आ सू के नेता चाहते थे क असम से काटकर उनके िलए एक अलग रा य का गठन कया जाए। इसके िलए उ ह ने सड़क जाम कर दी, पुल म आग लगा दी और गैर-बोडो लोग पर हमले कए। जब असमी क रपंिथय ने जवाबी हमला कया तो ये संघष हंसक हो उठा िजसम दजन लोग क जान ग ।50 इसी बीच ि पुरा म आ दवासी आंदोलनका रय ने बंगािलय के िखलाफ संघष छेड़ दया, जो मु क के बंटवारे के बाद बड़ी तादाद म ि पुरा म बस गए थे। कु छ प रभाषा के मुतािबक ि पुरा नेशनल वोलं टयस आतंकवा दय क को ट म आते थे, िज ह ने आमलोग का अपहरण और उनक ह याएं क थ और अपने ल य को पूरा करने के िलए पुिलस दल पर हमले कए थे। 1986 म टीएनवी (ि पुरा नेशनल वोलं टयस) छापामार ने सौ से यादा लोग क ह या कर दी। अगले साल यह सं या इससे भी यादा थी। अग त 1988 म टीएनवी नेता िवजाॅय रं ग वाल अपने भूिमगत अ े से बाहर आया और उसने सरकार के साथ एक समझौते पर द तखत कर दया। उसके वयंसेवक ने इस शत पर हिथयार डाल दए क थानीय िवधानसभा म आ दवािसय के िलए यादा सीट आरि त क जाएंगी और आ दवासी गांव म स ती दर पर चावल और खाना पकाने के तेल क आपू त क जाएगी।51 दूसरे तरह के संघष म कसी खास सूबे के लोग क ीय सरकार के िखलाफ खड़े हो गए। इस तरह पंजाब म राजीव गांधी-लोग वाल के बीच समझौते से जो लोग म उ मीद जगी थी वो िणक सािबत ई। संत क ह या आने वाले कल का एक बड़ा संकेत थी। अब आतंकवा दय क नई पौध खािल तान के संघष को आगे बढ़ा रही थी। आॅपरे शन लू टार और द ली और अ य जगह पर िसख िवरोधी दंग से जो ज म पनपे थे उसने इस आंदोलन म नए-नए लड़ाक को आक षत कया था। इसके अलावा क सरकार ने चंडीगढ़ को पंजाब को स प देने का वादा भी नह पूरा कया। इस वजह से भी लोग गु से म थे। एक बार फर से वण मं दर को आतंकवादी अपना गढ़ बनाने जा रहे थे। खािल तान के प म धमगु और खुद अकाली दल से सद य क तरफ से 52 नारे लगाए जा रहे थे। पंजाब म आतंकवाद को फर से पनपने से रोकने के िलए पंजाब पुिलस के 34,000 जवान तैयार थे। पुिलस के मनोबल को बढ़ाने के िलए इसम एक नए मुिखया को िनयु कया गया। सीधी जुबान म बात करने वाले बंबई के पुिलस अिधकारी जे.एफ. रबेरो को पंजाब पुिलस का मुिखया बनाया गया। इसके अलावा उ र-पूव म आतंकवा दय से लड़ाई का अनुभव रखने वाले िसख पुिलस अिधकारी के .पी.एस. िगल क भी िनयुि पंजाब पुिलस म क गई। रबेरो और िगल ने ‘मारो और सहलाओ’ क नीित अि तयार क । वे एक तरफ खुले मैदान म िसख कसान से िमलकर जनसंपक का अिभयान चलाते, दूसरी तरफ आतंकवा दय का सफाया करने के िलए सतकता समूह का गठन करते। पुिलस पाट ने रा य के सुदरू इलाक को छान मारा, घर-घर तलाशी अिभयान चलाया गया और भागते ए लोग को गोली मार दी। इन तलाशी अिभयान म दजन आतंकवादी मारे गए ले कन सामा य गांववाल को भी काफ तकलीफ उठानी पड़ी।53 ले कन आतंक गितिविधयां चलती रह । हाइवे पर बस को रोक दया जाता, हंद ू मुसा फर को उतारकर उ ह गोली मार दी जाती। 1984 क तुलना म, जब भंडरा वाले जंदा था, 1986 म दोगुने लोग क ह या क गई। डर के मारे , ब त सारे हंद ू पंजाब छोड़कर ह रयाणा क तरफ भाग गए। हक कत म पंजाब से अ पसं यक को बाहर िनकालना आतंकवा दय के कई ल य म से एक था। उनका दूसरा ल य तो और भी खतरनाक था। वे चाहते थे क पंजाब से बाहर के िसख के मन म भय क भावना भर दी जाए। इस इरादे को पूरा करने के िलए द ली और उ र-भारत के दूसरे शहर म, बाजार और बस अ के नजदीक बम िव फोट क शृंखला करवाने क कोिशश क गई। ऐसा इसिलए कया गया ता क िसख के िखलाफ बदले क कारवाई हो। अगर ऐसा हो जाता तो फर िसख पंजाब क तरफ लौट जाते और एक मजबूत, एक कृ त और एक ही तरह का समाज पूरे पंजाब म वजूद म आ जाता ता क खािल तान क लड़ाई को और भी मजबूती से आगे बढ़ाया जाता। यह माॅडल चालीस के दशक म पा क तान के कामयाब माॅडल पर आधा रत था िजसके तहत पा क तान के बाहर के मुसलमान के अंदर भी असुर ा क भावना भर दी गई थी।54 मई, 1988 म एक बड़े अिभयान के तहत सुर ाबल ने वण मं दर म छु पे ए करीब 50 आतंकवा दय को िनकाल बाहर कया। आॅपरे शन लू टार के उलट यह अिभयान दन के उजाले म चलाया गया था, ता क िवपरीत हालात का गौर से अ ययन कया जा सके । हालां क कसी भी तरह से ये आतंकवादी भंडरावाले के आदिमय क तरह लड़ने को तैयार और े रत नह थे। वे सुर ाबल का जरा भी मुकाबला नह कर सके । उ ह ने मं दर के गभगृह म शरण ले ली। उ ह भोजन और पानी से वंिचत कर दया गया और उ ह ने 72 घंट के बाद आ मसमपण कर दया।55 पंजाब म आतंकवाद के फर से पनपने के साथ-साथ दूसरे सीमावत रा य ज मूक मीर म भी फर से उप व शु हो गया। साल 1984 म ीमती गांधी ने शेख अ दु ला के बेटे फा ख अ दु ला को मु यमं ी पद से हटा दया था, ले कन अब उनके बेटे राजीव गांधी ने दोन प रवार और पा टय के बीच फर से संबंध को जंदा कया। नवंबर 1986 म दोन पा टय ने िमलकर रा य म कायकारी सरकार का गठन कया। इस गठबंधन के प म बोलते ए फा ख अ दु ला ने कहा क कां ेस क म कू मत करती है। क मीर जैसे सूबे म अगर मुझे सरकार चलानी है और बीमा रय से लड़ने क योजनाएं बनानी है तो मुझे क के साथ िमलकर काम करना होगा।56 सन् 1987 म ज मू-क मीर िवधानसभा के िलए ताजा चुनाव करवाए गए। उस चुनाव म क से आजादी क मांग करने के बजाय वाय ता क मांग करने वाले क मीरी नेता ने मुि लम यूनाइटेड ं ट (एमयूएफ) के नाम से एक मोचा बनाया। ले कन एमयूएफ के कायकता को शासन ारा ताि़डत कया गया और चुनाव म ापक पैमाने पर धांधली क गई। हालां क वैसे भी कां ेस-नेशनल काॅ स गठबंधन के ही चुनाव जीतने क संभावना थी, ले कन चुनाव म धांधली करके उस जीत को और भी महान बनाने क कोिशश क गई। यहां तक क खु फया यूरो ने भी वीकार कया क कम से कम 13 सीट पर चुनावी धांधली क वजह से एमयूएफ उ मीदवार को हार झेलनी पड़ी।57 क मीर म िजस तरीके से 1987 का चुनाव करवाया गया उसने रा य के राजनीितक कायकता को गहरी िनराशा से भर दया। अब उ ह नई द ली से उिचत वहार क कोई उ मीद नह रही। वे सहायता के िलए पा क तान का मुंह ताकने लगे। झुंड के झुंड क मीरी नौजवान सरहद पारकर पा क तान चले गए और उन िश ण िशिवर म शािमल हो गए, िज ह पा क तानी सेना चला रही थी। साल भर बाद वे घाटी लौटे। उ ह अब अपने िश ण का इ तेमाल करना था। 1989 के वसंत म क मीर घाटी म शृंखलाब प से गोलीबारी, बम-धमाके और ेनेड से हमले ए। अब क मीर क हसीन वा दयां लािसिनकोव, िडटोनेटर, मो टोव काॅकटेल, िजले टन यूज, मोटार और नकाबपोश आतंकवा दय का अ ा बन गई। 1989 के पूवाध म घाटी म 97 हंसा क घटनाएं दज क गई िजसम कम से कम 52 लोग मारे गए और 250 घायल हो गए। एक संवाददाता ने दुख करते ए िलखा क ऐसा लगता है क 58 क मीर दूसरा पंजाब बन गया है। IX िमि त सफलता के साथ एक तरफ जहां भारत अपने घर म अलगाववाद पर काबू पाने क कोिशश कर रहा था तो दूसरी तरफ इसने पड़ोसी देश ीलंका म न लीय िववाद को हल करने क मह वाकां ी कोिशश भी क । ीलंका एक छोटा सा ीप है और अपने आपम ब त खूबसूरत है। इसक तुलना उस तरह तो नह ले कन दूसरे प म पहाड़ और घा टय से अंटे पड़े क मीर से क जा सकती है। ले कन ब सं यक संहिलय और अ पसं यक तिमल के बीच चल रहे गृहयु ने इसे तबाह करके रख दया था। इस संघष क वही पुरानी वजह थ , िजससे भारत कई दशक से जूझ रहा था। भाषा, न ल, धम और े ही ीलंका म चल रहे संघष क वजह थ । ीलंका म उस व चल रहे संघष का िसलिसलेवार इितहास हम ब त दूर लेकर चला जाएगा।59 यहां पर यही कहना सही होगा क संघष ने तब उ प ले िलया जब संहली को पूरे देश क एकमा राजभाषा घोिषत कर दया गया। तिमल ने अपनी भाषा को बराबर का हक देने क मांग क ले कन जब उनक मांग खा रज कर दी गई, तो उ ह ने इसका िवरोध कया। साल तक अ हंसक िवरोध चलता रहा ले कन बाद म वह िवरोध हंसक हो गया। िवरोध का झंडा उठाने वाले तिमल संगठन म सबसे यादा ताकतवर संगठन िलबरे शन टाइगर आॅफ तिमल ईलम (एलटीटीई) या िल े था। एलटीटीई क कमान िव लुिप लै भाकरण नाम के एक खूंखार लड़ाके के हाथ म थी, िजसका ल य एक वतं तिमल रा का िनमाण करना था। इस तिमल रा का गठन ीलंका के उ री और पूव इलाक को िमलाकर कया जाना था, जहां तिमल क ब सं या थी। पूरे अ सी के दशक म तिमल लड़ाक ने लंका के सैिनक कप पर हमला कया और नाग रक के साथ अ याचार कया। संहिलय ने इसका और भी यादा हंसक जवाब दया। दूसरे श द म यह एक ऐसा संघष था, िजसने ू रता और बबरता के सारे मापदंड व त कर दए। एलटीटीई लड़ाके लंबे समय से तिमलनाडु को अपनी सुरि त पनाहगाह के तौर पर इ तेमाल करते आए थे। उनक गितिविधय को रा य सरकार से स य सहायता िमलती थी, िजसपर नई द ली ने आंख मूंद रखी थ । 1987 क ग मय म ीलंका के रा पित जयवधने ने राजीव गांधी से कहा क इस संघष क म य थता म मदद कर। भारत और ीलंका के बीच एक शांित समझौता आ, िजसके तहत भारतीय शांित र क सेना को ीलंका म बहाल कया जाना था। ीलंका क सेना बैरक म चली जाती और भारतीय सेना, एलटीटीई लड़ाक को हिथयार डालने के िलए राजी करती या मजबूर करती। जुलाई, 1987 के आिखर से भारतीय सेना क टु कि़डय ने ीलंका जाना शु कर दया। इन टु कि़डय म कई-कई हजार जवान होते थे (कु ल िमलाकर करीब 48,000 भारतीय सेना के जवान को ीलंका म तैनात कया जाना था)। संहली रा वा दय ने भारतीय सेना के जवान को शक क िनगाह से देखा य क उनका मानना था क भारत का यह कदम ीलंका क सं भुता के िलए ठीक नह है। दूसरी तरफ तिमल भी इससे खुश नह थे य क वे हमेशा ये मानते थे क भारत उनके साथ खड़ा है। जब उनसे हिथयार डालने को कहा गया तो तिमल ने कई शत रख द । उन मांग म सरकारी जेल से तमाम तिमल कै दय को रहा कया जाना और ीप के पूव भाग म संहली उपिनवेशवाद को रोका जाना भी शािमल था। अ टू बर तक एक असहज शांित कायम रही ले कन जब शांित सेना ने आतंकवा दय के िखलाफ अिभयान शु कया तो यह ख म हो गई। जाफना म िल े मु यालय पर हमला कया गया और उस पर क जा कर िलया गया ले कन भारतीय सेना को इसक खासी क मत चुकानी पड़ी। ीलंका का लोकि य जनमानस भारतीय सेना के िखलाफ हो गया जो अब उसे ‘बाहरी और हमलावर सेना’ के तौर पर देखता था। िल े के लड़ाके जंगल म छु प गए, जहां से वो घात लगाकर भारतीय सेना पर हमला करते और जंगल म भाग जाते। उ ह ने बा दी सुरंग का बड़ा खतरनाक इ तेमाल कया। जब सेना क टु कि़डया सड़क माग से एक जगह से दूसरे जगह जाती तो उसे भारी ित उठानी पड़ती। 1987 के आिखर तक ेस ने ीलंका को ‘भारत का िवयतनाम’ कहना शु कर दया। य क भारतीय सेना ने कभी भी इस तरह क लड़ाइयां नह देखी थ । वह एक अजनबी जमीन पर ऐसे दु मन से लड़ रही थी, िजसक कोई वद नह थी, जो यु िनयम पर ए जेनेवा समझौते के कसी भी िनयम को नह मानता था ले कन फर भी मिहला और ब क आड़ म घातक हिथयार से हमला करता था।60 हालां क िल े के बारे म राय करते ए एक भारतीय सै य कमांडर ने उसक तारीफ भी क । हालां क उ ह ने िल े के पागलपन भरे , हठीले और िवनाशकारी हिथयारबंद ितरोध क आलोचना क ले कन उनके अनुशासन, समपण, ितब ता, ेरणा और तकनीक महारत क तारीफ भी क ।61 जैस-े जैसे लड़ाई म मारे गए जवान क लाश भारत प च ं ती ग , सरकार पर जवान को वापस बुलाने का दबाव बढ़ता गया। 1989 क ग मय से जवान क वापसी शु हो गई, हालां क उनक पूरी वापसी 1990 के वसंत तक ही हो पाई। उस लड़ाई म 1000 से यादा सेना के जवान क मौत हो गई। ीलंका म भारत का सेना भेजने का फै सला उसी अवधारणा के तहत िलया गया था, िजसके तहत भारत दि ण एिशया म े ीय वच व कायम करना चाहता था।62 जनसं या और आ थक िहसाब से इस े म भारत का दबदबा था और अब वह सैिनक तैया रय के िलहाज से भी इस इलाके म अपना भाव दखाना चाहता था। जनवरी, 1987 म भारतीय सैिनक टु कि़डय ने पा क तान क सीमा के पास एक बड़ा सै य अ यास कया। हालां क इसका घोिषत उ े य नए उपकरण क जांच करना था ले कन वा तव म यह पुराने दु मन के सामने अपनी नई हािसल ई ताकत का दशन करना भी था।63 इसके बाद माच 1988 म भारत ने जमीन से जमीन पर मार करने वाले अपने पहले िमसाइल का परी ण कया िजसक मारक मता सौ मील तक थी। इसके सालभर बाद इसने और भी यादा उ त मता वाले ेपा ा का परी ण क जो दस गुणा यादा वजनी हिथयार को 1500 मील तक ले जा सकता था। भारतीय िमसाईल वै ािनक ने अपने देश को उस खास समूह का िह सा बना दया था िजसके अ य सद य अमे रका, सोिवयत संघ, इं लड, ांस, चीन और इजरायल जैसे देश थे।64 इन घटना ने दि ण एिशया के कई देश को चंितत कर दया। अब भारत को लोग ‘बदमाश भारतीय’ कहलाने लगे जैसे पूरी दुिनया के लोग अमे रकन को ‘बदमाश अमे रकन’ कहते थे। कलक ा के एक सा ािहक ने वीकार कया क ‘ हंद ु तान क छिव इस इलाके म एक बदमाश लड़के ’ क बन गई है।65 X अपनी मां क मृ यु के बाद ए चुनाव म राजीव गांधी एक भारी ब मत के साथ स ा म आए थे। जैस-े जैसे 1989 का आम चुनाव नजदीक आता गया उनक पाट के जीतने क संभावना साफतौर पर अिनि त लगने लगी। जैसा 1967 और 1977 म आ था, कां ेस को अपनी ि थित बरकरार रखने क ज ोजहद करनी पड़ रही थी। सबसे बड़ी बात यह थी क इस बार पहले क तुलना म कही गंभीर प से े ीय पा टय क चुनौती थी। राजीव गांधी के कायकाल म असमगण प रषद ने असम म, तेलगुदश े म् ने आं देश म (1985 म एन.टी. रामाराव फर से स ा म आ गए थे) और अकाली, पंजाब म शासन कर रहे थे। जनवरी 1989 म तिमलनाडु म डीएमके फर से स ा म आ गई। पि म बंगाल म सीपीएम दूसरी पा टय के तुलना म यादा मजबूती से डटी थी, िजसने 1989 म स ा म अपने बारह साल पूरे कर िलए। इतने समय म सीपीएम के नेता और बंगाल के मु यमं ी योित बसु का कद काफ बढ़ गया। उ ह देश के अ य भाग म कृ िष और भूिमसुधार के िलए काफ इ त से देखा जाता था, जो उनक पाट ने बंगाल म लागू कया था। यह एक क युिन ट नेता के िलए असामा य सी बात थी क उसक इ त उ ोगपित भी करते थे, िज ह ने उ पंथी ेड यूिनयन को काबू म रखने और िनवेश को लेकर बसु के ावहा रक ख क सराहना क ।66 एक दूसरे तरह क चुनौती हंद ू दि णपंिथय क तरफ से पेश आई। जनसंघ िजसने अपने आपको अब भारतीय जनता पाट के प म बदल िलया था, उसे 1984 के चुनाव म महज दो सीट िमली थ । ले कन अब इसने अपने आपको अयो या म राममं दर िनमाण आंदोलन के पीछे खड़ा कर िलया था। जैस-े जैसे उस आंदोलन को लोकि यता िमलती जा रही थी उसी िहसाब से पाट क उ मीद बढ़ती जा रही थ । बीजेपी कै डर ने अब आरएसएस और िविहप कायकता के साथ राम िशलापूजन म िह सा लेना शु कर दया। इसम एक आयोजन के तहत भिव य म बनने वाले राममं दर के िलए ट बनाई जात और उनक पूजा क जाती। इस मु े को यादा मजबूती से रखने के िलए िविहप ने घोषणा क क संगठन दो नवंबर को अयो या म िववा दत जगह पर एक औपचा रक िशला यास का काय म करे गी। उस िनि त ितिथ को देश के िविभ िजल से ट प च ं ने लग । द ली क कां ेसी सरकार को सलाह दी गई क िशला यास के काय म पर रोक लगाई जाए, ले कन सरकार ने चुनाव से पहले हंद ु के नाराज होने के भय से इस पर रोक नह लगाई। िविहप ने िशला यास काय म म पहली ट लगाने के िलए िबहार के एक दिलत मजदूर का चुनाव कया और ये दावा कया क इस जगह पर एक दन भगवान राम का भ मं दर बनकर रहेगा।67 ट पूजन समारोह क वजह से उ र भारत के कई शहर म धा मक संघष शु हो गए। इसम सबसे यादा खतरनाक झगड़ा िबहार के भागलपुर म आ, जहां हंद ू और मुसलमान एक दूसरे से स ाहभर तक लड़ते रहे। यह घटना नवंबर महीने म ई। यह संघष ामीण इलाक म फै ल गया, जहां आरएसएस के कायकता क अगुआई म लोग ने इलाके के मश र बुनकर के करघे और घर को तोड़ दया। कई सौ मुसलमान मारे गए और इससे भी कई गुना यादा बेघरबार हो गए। इन लोग को सरकारी नह बि क मुि लम ापा रय और इ लािमक राहत संगठन ारा चलाए गए िशिवर म शरण िमली। भागलपुर के दंगे और राम िशला पूजन के बाद क घटना ने दोन समुदाय को गोलबंद कर दया। मुसलमान ने अपने आपको कां ेस ारा छला आ पाया जब क हंद ू म यवग का एक बड़ा तबका बीजेपी के साथ खुलकर खड़ा हो गया।68 धानमं ी को तीसरी चुनौती उनके पूव मं ीमंडलीय सहयोगी वी.पी. संह ने दी। िव मं ी के तौर पर संह ने कई औ ोिगक घरान पर कर चोरी के आरोप म छापे पड़वाए थे। ऐसा करके मानो उ ह ने अपने अिधकार े का उ लंघन कर दया। उनका तबादला र ामं लय म कर दया गया और बाद म उ ह मंि मंडल से ही हटा दया गया। उसके कु छ ही दन बाद एक र ा सौदे म ई दलाली के खुलासे से िसयासी भूचाल सा आ गया, िजसम कहा गया क भारतीय सेना ारा खरीदी गई वीिडश बोफोस तोप क खरीद म िबचौिलय को दलाली दी गई है। पहली बार यह खबर अ ैल 1987 म वीडन के रे िडयो से सा रत क गई। इसके अगले दो साल तक ेस और िवप ने सरकार पर दबाव बनाए रखा क इसके दोिषय का नाम सावजिनक कर उ ह सजा दलाई जाए। सरकार ने इस मांग को खा रज कर दया। इससे इस धारणा को मजबूती िमली क वे िबचौिलए कसी न कसी तरह से धानमं ी के प रवार से संबंिधत थे। र ा सौद म दलाली क बात से जनता काफ नाराज ई। लोग का गु सा तब और भी बढ़ गया, जब उ ह पता चला क सै य िवशेष ने ांसीसी तोप खरीदने का अनुमोदन कया था, िजसे राजनेता ने खा रज कर दया।69 सही या गलत िजस भी तरीके से आमलोग के दमाग म बोफोस िववाद वी.पी. संह के मंि मंडल से िवदाई से जुड़ा आ था। अब लोग राजीव गांधी क जगह उ ह ‘िम टर लीन’ कहने लगे। वी.पी. संह ने कां ेस छोड़ दी और 1988 म संयु िवप क तरफ से इलाहाबाद से उप-चुनाव लड़ा। उस चुनाव म उ ह ने जीत दज क । अब तक वह गैरकां ेसवाद क बढ़ रही भावना का क बंद ु बन चुके थे। अ टू बर, 1988 म उनके जनमोचा का पुरानी जनता पाट म िवलय हो गया और जनता दल का ज म आ। इस नए दल ने अब कई े ीय पा टय से हाथ िमला िलया और रा ीय मोचा का गठन कया। इसका गठन म ास के मरीना बीच पर आ और इसका समथन करते ए सदाबहार और जोशीले नेता एन.टी. रामाराव ने कहा क ये एक ऐसा रथ है िजसे सात घोड़े खीच रहे ह, और जो रा ीय इितहास पर छाए दशक के अंधकार को दूर करने का काम करे गा।70 अपने कायकाल के आखरी साल म राजीव गांधी ने अपनी घटती लोकि यता को रोकने के िलए चार कदम उठाए। िसतंबर 1988 म उ ह ने संसद म एक िवधेयक पेश कया िजसका म सद ेस क आजादी को कम करना था। इस िवधेयक के अनुसार ेस के संपादक और उसके मािलकान ‘अ ील या अभ काशन’ और ‘आपरािधक गितिविधय ’ के िलए जेल भेजे जा सकते थे। इस ‘अ ीलता’ और ‘अपराध’ को प रभािषत करने क िज मेदारी रा य क थी! जािहर तौर पर इस िवधेयक को इसिलए लाया गया था य क हाल म ेस ने ाचार के मु े पर सरकार क काफ आलोचना क थी। इससे पहले क सरकार क छिव को यादा ित प च ं े सरकार पहला वार करना चाहती थी। इस िबल का पूरे देश के संपादक ने कड़ा िवरोध कया। इसके िवरोध म संसद म बिह कार का आयोजन कया गया, तब जाकर सरकार ने इसे वापस िलया।71 इसके बाद जनवरी, 1989 म धानमं ी ने चीन क या ा क । इस तरह वे िपछले तीन दशक म पहले भारतीय धानमं ी बन गए िज ह ने चीन क या ा क । इस या ा का एक उ े य ये भी था क धानमं ी क अंतरा ीय राजनेता क छिव को फर से सामने लाया जाए। चीनी नेता के साथ बातचीत म सीमा मु े को बड़ी बारीक से दर कनार कर दया गया। इस वाता म नई द ली ने ित बत के मसले पर नरमी दखाई, जब क चीन ने कहा क वह उ रपूव के आतंकवा दय को मदद नह करे गा। 84 साल के हो चुके चीन के वयोवृ नेता दग िशआओ पग से राजीव गांधी क न बे िमनट तक वाता ई, िजसम पग ने उनसे कहा क ‘आप नौजवान ह, आप ही भिव य ह।’72 इसके बाद माच 1989 म राजीव गांधी ने अपने कायकाल के पहले साल म अपनाई गई ब हमुखी और बुि लि त आ थक नीितय को पलट दया। सरकार ारा पेश कए गए बजट म उपभो ा व तु पर कर को बढ़ा दया गया और हवाई या ा और आलीशान होटल म ठहरने पर अित र शु क लगा दया गया। उसी समय ामीण इलाक के िलए एक नई रोजगार उ पादन करने क योजना शु क गई। य - यां◌े चुनाव नजदीक आता जा रहा था राजीव गांधी उ ह लोकलुभावन योजना क तरफ लौटते जा रहे थे, िजनम उनक मां को महारत हािसल थी।73 आिखरकार 1989 क ग मय म सरकार उ तर पर और जोर-शोर से जवाहरलाल नेह क ज म शता दी मनाने म जुट गई। इसके िलए काय म क एक शृंखला तैयार क गई िजसम सेिमनार, फोटो दशनी, टीवी ज, का समारोह, संगीत समारोह यहां तक क नेह जी के नाम पर के टंग ितयोिगताएं भी आयोिजत क गई, िजसका खच सरकार ने उठाया। इसका सारण सरकारी टीवी और रे िडयो पर कया गया। वैसे तो ऊपरी तौर पर ये समारोह महज भारत के पहले धानमं ी के स मान के िलए आयोिजत कए गए थे, ले कन दूसरी तरफ जनता के अवचेतन म एक छु पा आ संदश े देने क कोिशश क जा रही थी। वो कोिशश यह थी क इस देश का नेह प रवार से अ छा कोई अिभभावक नह है और कु ल िमलाकर उस प रवार को हराने का मतलब ये होगा क उस पिव िवरासत को खो देना और अराजक त व को स ा म आमंि त करना।74 फर भी राजीव गांधी भी कसी भी चीज को भा य के भरोसे नह छोड़ रहे थे। अपने चुनाव चार के दौरान देश के िविभ िह स म उ ह ने 170 जनसभा को संबोिधत कया। 1984 के चुनाव क ही तरह ही रे िड यूजन ने उ ह सलाह दी थी क वे देश क सुर ा पर मंडरा रहे खतर पर चार क त रख, जो िवप क बंटवारा करने वाली राजनीित से शह पाती है और िजसे िसफ कां ेस काबू कर सकती है।75 हालां क इस बार यह संदश े उस तरह जनता के मन को नह छू पाया जैसा पहले आ था। सरकार पर ाचार के आरोप ने इसक छिव को काफ नुकसान प च ं ाया था। दूसरी तरफ िवप अ छी तरह से संग ठत था। िवप के तीन मु य धड़ ने इस तरह से तालमेल कया था क यादातर लोकसभा सीट पर कां ेस को कांटे क ट र िमल रही थी। उसे या तो रा ीय मोचा से या बीजेपी से या फर क युिन ट से मुकाबला करना पड़ रहा था। नवंबर 1989 म कराया गया चुनाव कां ेस के िलए ब त ही घातक सािबत आ। पाट महज 197 सीट ही जीत पाई और इस तरह उसे अपने पुराने दशन से 200 सीट कम िमली। हालां क दूसरी तरफ िवप भी िब कु ल ही जीत का दावा नह कर सकता था। जनता दल को 142, बीजेपी को 86 और वाममोचा को 50 से कु छ यादा सीट िमल । वी.पी. संह ने रा ीय मोचा सरकार के मुिखया के तौर पर धानमं ी पद क शपथ ली, िजसे वामपंथी पा टयां और बीजेपी बाहर से समथन कर रही थ । इस तरह भारत का दूसरा गैर-कां ेसी धानमं ी भी वही नेता था, िजसने पहले (मोरारजी) क तरह ही अपने राजनीितक जीवन का अिधकांश िह सा कां ेस म िबताया था। 1989 का आम चुनाव ऐसा आम चुनाव था िजसम कसी भी दल को ब मत नह िमला। इितहास म पीछे मुड़कर देखने से लगता है क यह चुनाव अपने आपम एक युगांतकारी घटना थी। ऐसा ही उस व राजनीितक पयवे क का भी कहना था। वीर सांघवी ने िलखा क हंद ु तान राजनीितक अि थरता म वेश कर गया है। अब मजबूत सरकार और तानाशाह धानमंि य का दौर ख म हो गया है, यह चुनाव एक अिनि त युग क शु आत का उ ाटन है।76 XI भारतीय इितहास के तर के िहसाब से भी अ सी का दशक एक उथल-पुथल भरा दशक था। देश ने पहले भी असंतोष से पैदा ए आंदोलन का अनुभव कया था ले कन एक ही साथ, देश के कई िह स म और इतनी मजबूती से कभी कोई आंदोलन नह आ था। दो चुनौितयां अभी भी लगातार सर उठाए ई थ - पंजाब म जारी आतंकवाद जो एक ऐसे रा य म हो रहा था, िजसे देश क दय थली कहा जाता था (नागालड या क मीर जैसे पुराने िववाद से उलट) और हंद ू क रपंिथय क पूरे देशभर म गोलबंदी जो एक धमिनरपे रा य क पहचान को चुनौती दे रहे थे। छोटी-बड़ी हंसा के अलावा देश म राजनीितक ाचार बढ़ रहा था िजसे एक सजग ेस ने िसफ उजागर ही नह कया था, बि क जनता के बीच इसे लेकर एक आंदोलन चला रहा था। देश के बाहर िल े ारा भारतीय सेना को ई ित क वजह से देश क ित ा को आघात लगा था। 1985 क ग मय म कलक ा से छपने वाली अपने व क अहम और भावशाली सा ािहक सनडे ने देश म बेकाबू हो रही हंसा पर एक आवरण कथा छापी। पि का ने कहा क हरे क जगह सामािजक, आ थक और राजनीितक तनाव और िनराशा क वजह से िछटपुट आतंक क घटनाएं और जन ितरोध हो रहे ह। तोड़फोड़ क घटनाएं, आगजनी, और ह याएं पागलपन क तरह पूरे देशभर म फै ल रही ह। आजादी के सतीस साल बाद हंद ु तान अपने आपको इितहास के एक मह वपूण मोड़ पर पाता है। पि का ने सवाल कया क देश म या और ऐसा य हो रहा है। सनडे ने इस बारे म नामचीन हंद ु तािनय क राय जाननी चाही। संपादक रोमेश थापर ने ट पणी क क हंसा और गु सा यह दखाता है क हालात पर कसी का काबू नह रह गया है। अगर हवाई जहाज के पायलट के मुहावरे म कह तो लोग म ऐसा भय ा हो रहा है क हम जहां जा रहे ह वहां से वापस लौटना नामुम कन होगा। िवनाश साफ दख रहा है। तंभकार कु लदीप नायर ने दंग और ह या पर अखबार क सु खय के आधार पर कहा क एक दूसरे से हजार मील दूर अलग-अलग तरह के लोग के ारा पैदा क गई इन सम या से जो बात सामने आती है वो ये क ये लोग काफ लंबे समय तक िवनाश क कगार पर रहे ह ले कन अब उनका असंतोष िव फोटक तर पर है। पुिलस आॅ फसर के .एम. तमजी ने दुख करते ए कहा क अब भारतीय राजनीित और शासन क रपंिथय और दबंग नेता के चंगुल म फं स गया है जो लोकतांि क िवरोध के नाम पर हजार लोग क ह याएं करवाने का दावा करते ह। उन क रपंिथय और गुंड के सटीक च र और राजनीितक उ े य क ा या करते ए तमजी ने कहा क मृतक को भूल जाइए और वोट िगिनए। उ ह ने आगे कहा क कु छ साल बाद हो सकता है हम वोट भी िगनने क ज रत न पड़े य क तब तक हम लोकतं क ही ह या कर डालगे।77 ये उस दौर म ेस म अ सर छपने वाली ट पिणय म से एक थी क हंद ु तान टु कड़ म बंट जाएगा और लोकतं का प र याग कर देगा। अ ैल 1987 म सनडे के राजनीितक संपादक के वल वमा ने िलखते ए ये गंभीर चेतावनी दी अगर राजीव गांधी क सरकार इसी तरह से लोकि यता खोती चली जाती है और कोई िवक प पैदा नह होता है (जैसा क दख भी रहा है) तो देश राजनीितक अि थरता क तरफ बढ़ जाएगा। य क फर खािल तान एक सचाई बन जाएगा। पहले से ही पंजाब के ामीण इलाक म िसख चरमपंथी एक समानांतर सरकार चला रहे ह। रामज मभूिम-बाबरी मि जद मु ा भी उ रभारत म बड़ा सां दाियक यु करवा सकता है। लंबे समय तक एक राजनीितक अि थरता और अिनि तता से दु साहसी ताकत को हमारे मामले म ह त ेप करने का मौका िमल जाएगा। उदाहरण के िलए अगर रा पित, धानमं ी को बखा त करते ह तो फर सेना य सुंदरजी तय करगे क कसे रहना चािहए।78 ऊपर िजन लेखक का िज आ है वो सब या तो अपनी उ के पचासव दशक म थे या साठव म। वे सब नेह के जमाने क आभा और राजनीितक गमाहट को देखते ए इस उ मीद म जवान ए थे क एक नया मु क आकार ले रहा है। इसम कोई शक नह क उनक भावनाएं थोड़ी ब त नाॅ टेि जया से त थ , हालां क उनम से कु छ जायज भी थ । य क नेह के जमाने के राजनीित ने अपने समाज के भाईचारे को तबाह होने देने क बजाय उसे कायम रखने क कोिशश क थी। इसे उ ह ने अपने वाथ क बिल नह चढ़ने दया था। ले कन दूसरी िनगाह से देखा जाए तो उनका ये नाॅ टेि जया सही नह था। य क राजनीितक उथल-पुथल और नई राजनीितक शि य का उदय भले ही हंसक और तकलीफदेह रहा हो, ले कन ये हंद ु तान के राजनीित क बढ़ती िवक ीकरण क वृित को दखा रहा था। यह वृित कसी एक इलाके (उ र भारत), पाट (कां ेस) या कसी एक प रवार (नेह प रवार) के वच व से िब कु ल अलग थी। ले कन हम इस बात पर िवचार करना चािहए क या अंधकार या बबादी क भिव यवाणी वाकई सही थी? इस पु तक म पहले िजन बबादी क भिव यवािणय का िज है, उसमं◌े लगभग हरे क दशक को अब तक का सबसे ‘खतरनाक दशक’ बताया जाता रहा था। अगर उन ताजा भिव यवािणय म कोई नयापन था तो िसफ यही क इस बार इस तरह क भिव यवािणयां हंद ु तािनय ारा क जा रही थ । XII इस अ याय के ख म होने के साथ ही यह कताब उस दौर क तरफ बढ़ती है, िजसे ऐितहािसक प से ‘जाग क या सूचना से लैश प का रता’ कहा जा सकता है। इस कताब का पांचवां भाग, जो आगे के प पर दज है, िपछले दो दशक क घटना से संबंिधत है िजसक परत अभी भी खुल रही ह। चूं क हम इन घटना से नजदीक से जुड़े ए ह इसिलए यह लेखन िसलिसलेवार कम, क सागोई यादा है। क य को आधार देने के िलए हरे क अ याय क शु आत पुराने कसी अ याय क भिव यवाणी से क गई है, िजसने कसी न कसी तरह से आने वाले कल के बारे म इशारा कया था। 1983 म असम आंदोलन पर एक अ ययन कािशत आ था। उस अ ययन के लेखक ने ट पणी क क यह कताब करीब-करीब समकालीन इितहास ही है, और समकालीन इितहास का कोई तक, समझदारी म कोई प ता या वृितय का कोई खास च र नह होता जो व बीतने के साथ चीज म आती है।79 आॅपरे शन लू टार पर 1994 म छपे एक कताब के लेखक ने कहा क एक दशक या इससे भी यादा शायद सही समय होता है जब समकालीन घटना का इितहास िलखा जाए। य क इतना व बीतने पर लेखक के पास आ म चंतन क गुंजाइश होती है और वे घटनाएं भावुक प से उसे भािवत नह करत ।80 दुिनया भर म अिधकांश सरकारी या सं थािनक क म के आरकाइव तीस साल के िनयम पर चलते ह। वे िपछले तीन दशक के द तावेज को गु और सुरि त रखते ह। ऐसा लगता है क यह उिचत ही है य क तीस साल बीत जाने पर कोई भी नया खुलासा शायद ही उस ि को भौितक प से ित प च ं ा पाए जो अभी भी जीिवत ह। मेरा अपना जो अनुभव है उस िहसाब से कसी घटना का इितहास िलखने के िलए लेखक को एक पीढ़ी क दूरी पर ज र रहना चािहए। इतना समय तो ज र बीत जाना चािहए क कोई लेखक घटना क वृि य का अ ययन कर सके , उसे एक िसलिसला दे सके और वतमान के भाव से तट थ रहकर उसक ा या कर सके । एक बार जब लगभग तीन दशक बीत जाते ह तो इितहास लेखन के िलए ब त सी साम ी हाथ म आ जाती है। िसफ आरकाइव ही नह , बि क लोग क याद, जीविनयां और िव ेषणा मक अ ययन भी उपल ध हो जाते ह, जो अब तक कािशत हो चुके होते ह। जब कोई लेखक िब कु ल हाल क घटना के बारे म िलख रहा होता है तो उसे शु आती दौर के ाथिमक सू क काफ कमी महसूस होती है। इसके अलावा वह लेखक एक ऐसे व के बारे म िलख रहा होता है, िजससे वह खुद तो जुड़ा ही है, साथ ही उसके पाठक भी उससे जुड़े होते ह। खुद लेखक के और पाठक के भी, कसी नेता और समकालीन राजनीित के बारे म अपने मजबूत िवचार होते ह। आने वाले अ याय म मने क य से अपने पूवा ह को दूर रखने का यास कया है, ले कन हो सकता है क म उसम उतना कामयाब न आ ।ं ये भी हो सकता है क इस पु तक के दूसरे िह स क तुलना म म इस या म कम कामयाब सािबत होऊं। य क ये दशक घटना और िववाद के दृि कोण से उतना ही समृ है, िजतना आजाद भारत का कोई भी दशक। भागः दो घटना का इितहास 9 हक क लड़ाई भारत म आप मत नह डालते, बि क अपनी जाित को चुनते ह। वी.एन. गाडिगल, कां ेसी राजनीित , 1995 I जनवरी, 1957 के दूसरे स ाह म भारत के एक अ णी मानवशा ी ने कलक ा म िव ान कां ेस के वा षक स मेलन को संबोिधत कया। उस िव ान का नाम था एम.एन. ीिनवास और उस स मेलन म उनका िवषय था आधुिनक भारत म जाित व था। ीिनवास ने अपना व देते ए कहा क इस भाषण के ारा मेरा उ े य ये सािबत करना है क िपछली एक शता दी या उससे भी यादा से जाित कई मायन म ब त ताकतवर हो गई है। यह इतनी ताकतवर हो गई है िजतनी यह ि टश युग से पहले कभी नह थी। सावभौम वय क मतािधकार और िपछड़े समूह के िलए संिवधािनक संर ण ने जाित नाम क सं था को सकारा मक प से मजबूत कया है। हालां क हाल म जाित को जो मजबूती िमली है वह एक जाित और वगिवहीन समाज को लाने के उ े य से मेल नह खाती, िजसके बारे म भारतीय रा ीय कां ेस समेत हमारे कई राजनीितक दल वकालत करते रहते ह। उसके बाद ीिनवास ने ये सािबत करने का यास कया क कस तरह से भारतीय राजनीित, जातीय ित िं ता म त दील होकर रह गई है। आं देश क एक मुख कृ षक जाित क मा, अमूमन भारतीय क युिन ट पाट को (मजाक म कहा जाता था क क युिन ट क िवचारधारा क मा-िन ट है) समथन करती थी, जब क इसक ित ं ी रे ी जाित कां ेस को। पड़ोस के मैसूर ांत म जहां कां ेस स ा म थी, पाट पर िनयं ण के िलए लंगायत और वो ा लंगा म लड़ाई होती रहती थी। महारा और म ास म राजनीितक संघष क मु य धुरी ा ण बनाम गैर- ा ण आ करता था। िबहार म जमीन पर क जा रखने वाली भूिमहर और राजपूत जाित कां ेस संगठन म ऊंचे पद पर क जा करने के िलए पढ़े-िलखे काय थ से लड़ती रहती थी। पड़ोस के उ र देश म जहां िनचली जाितयां अपे ाकृ त बेहतर तरीके से संग ठत थ , ऐसा कहा गया क राजनीितक स ा के िलए राजपूत और चमार (दिलत ) म आने वाले व म राजनीितक लड़ाई और भी ती होगी। ीिनवास ने कहा क हालां क देश के संिवधान म एक जाितिवहीन समाज क क पना क गई है ले कन हक कत म जाित क ताकत और इसक गितिविधय म बढ़ोतरी ही ई है, ‘ य क राजनीितक ताकत शासक जाितय -वग से अब आम जनता तक जा रही है।’ इस तरह देखा जाए तो जाित एक सामािजक गितिविध के प म हरे क जगह मौजूद है। हां, ये हो सकता है क इसके कु छ अलग-अलग े ीय व प ह । यह कोई संयोग नह है क ‘उ र भारत म एक मजबूत ा ण समूह क गैर-मौजूदगी क वजह से यहां ा ण िवरोधी आंदोलन नह पनप पाया और इसने इस अवधारणा को बल दया क वं य से दि ण के इलाके म उ र क तुलना म जाितवाद यादा ताकतवर है।’ ले कन ीिनवास ने आगे कहा क ‘ऐसे ल ण िमल रहे ह क उ र भारत म भी जाित मजबूत हो रही है। हां, जातीय संघष दि ण क तरह ही वहां भी मजबूत हो पाएगा या नह , ये देखने वाली बात होगी।’1 ीिनवास का भाषण उनक अनुपि थित म पढ़ा गया था य क वे खुद उस व अमे रका म थे। हालां क इस पर अं ेजी ेस म काफ टीका- ट पणी भी ई। मु क म दूसरा आमचुनाव होने ही वाला था। तो या उस चुनाव म मतदाता अपनी िनजी पसंद के आधार पर मतदान करने वाले थे जैसा क लोकतांि क िस ांत उनसे करने को कहता था? या वे अपनी जाित के नेता को मत देकर ीिनवास क बात पर मुहर लगाने वाले थे?2 II बाद के कई दशक म घटी घटनाएं ीिनवास के िस ांत के सच होने क गवाह बन । लोकतं और आधुिनक करण के आगमन से भारतीय समाज म जाित का भाव कम होते जाने क बजाय बढ़ता ही गया। इसक आज भी समाज म एक अहम भूिमका है। यह कई मामल म इतनी ताकतवर है क कई मु को भािवत कर देती है। गांव और क ब म, काम के व या आराम के ण म यादातर भारतीय इसी बात से जानेपहचाने जाते ह क वे कस जाित म पैदा ए ह। यह सच है क आजादी के बाद ए आ थक और सामािजक बदलाव से जाित था पर असर पड़ा है। एक जमाने म जाित से बाहर खानपान िब कु ल व जत था, ले कन तब भी शहर म ये सामा य बात थी। पेशेवर तबक म ब त सारी शा दयां जाित से बाहर भी होने लग । जाित और पेशे के बीच, एक जमाने म जो मजबूत संबंध था, वो भी कमजोर होने लगा था।3 इन सब बात के बावजूद जाित और जातीय पहचान आधुिनक चुनावी राजनीित म चुपचाप अहिमयत बना रही थी। साठ और स र के दशक म भारतीय राजनीित क सबसे उ लेखनीय िवशेषता थी िपछड़ी जाितय का उदय। यानी वे जाितयां अब अहम होती जा रही थ जो सामािजक पायदान पर अनुसूिचत जाितय से ऊपर ले कन ा ण-राजपूत से नीचे थ । यू.पी. और िबहार म यादव, पंजाब-ह रयाणा म जाट, महारा म मराठा, कनाटक म वो ा लंगा और तिमलनाडु म ग डर ऐसी ही जाितयां थ । ीिनवास के श द म ये जाितयां अपने-अपने इलाक म दबंग या भावशाली जाितयां थ , जो सं या म िवशाल, सुसंग ठत और समािजक-आ थक हैिसयत से लैस थ । एक दूसरे समाजिव ानी को अगर उ धृत कया जाए तो यही कहा जा सकता है क चुनाव के व ये जाितयां अपनी जाित के नेता के िलए एक वोटबक का काम करती थ । वे उनके पीछे च ान क तरह खड़ी रहती थ । भारतीय कानून म इ ह अनुसूिचत जाित और जनजाित से अलग अ य िपछड़ी जाितय क ेणी म रखा गया है। यही वो िपछड़ी जाितयां थ िज ह ने उन पा टय और नेता का समािजक आधार बनाया था जो कां ेस पाट के वच व को कामयाबीपूवक चुनौती देने वाले थे। डीएमके , जो 1967 के चुनाव के बाद तिमलनाडु म स ा म आई, या फर उ र भारत क कई संिवद सरकार व तुतः िपछड़ी जाितय क ही पा टयां थ । उसके दस साल बाद इन िपछड़ी जाितय ने काफ जोशोखरोश के साथ रा ीय तर पर अपना दावा पेश कया। जनता समूह के चार म से कम से कम दो दल यानी लोकदल और सोशिल ट पाट अपनी आ मा और च र से िपछड़ी जाितय क ही पा टयां थ ।4 भूिम सुधार और ह रत ांित होने से िपछड़ी जाितय के पास आ थक ताकत आ गई थी। ले कन उनम राजनीितक ताकत मतपे टय के ारा ही आ पाई। बस उनम अब िसफ शासिनक ताकत क कमी थी। इसी वजह से जनता पाट क सरकार ने एक आयोग का गठन कया जो उस समय िपछड़ा वग आयोग के नाम से जाना गया। िजसे उसके स य अ य क वजह से बाद म मंडल आयोग के नाम से मश रयत िमली। आयोग ने राय दी क जाित अभी भी ‘िपछड़ेपन’ क सबसे बड़ी सूचक है। इसने रा य म ए सव ण के आधार पर 3,743 जाितय क पहचान बतौर िपछड़ी जाित क । आयोग ने आंकलन कया क इन सारी जाितय क आबादी पूरे देश क आबादी का करीब 50 फ सदी है। ले कन फर भी देश के शासिनक ढांचे म इन जाितय का ितिनिध व ब त ही कम था। खासकर ऊपरी तर पर तो इनक उपि थित िब कु ल ही कम थी। आयोग के गणना के िहसाब से सन् 1980 तक क सरकार के सम त पद म िपछड़ी जाितय क भागीदारी महज 12.55 फ सदी थी। लास वन क नौक रय म तो ये और भी कम थी, महज 4.83 फ सदी। इन िवसंगितय को दूर करने के िलए मंडल आयोग ने िसफा रश क क क सरकार क तमाम नौक रय म 27 फ सदी जगह इन जाितय के िलए आरि त क जाए। संिवधान के मुतािबक दिलत और अनुसूिचत जनजाितय के िलए पहले से ही 22.5 फ सदी नौक रयां आरि त थ । आयोग ने कहा क हम ये बात वीकार करनी चािहए क समािजक िपछड़ेपन के िखलाफ लड़ाई का एक मह वपूण िह सा िपछड़े लोग के दलो- दमाग से लड़ा जाना है। हंद ु तान म हमेशा से सरकारी नौकरी को ित ा और ताकत का िवषय समझा जाता रहा है। सरकारी सेवा म अ य िपछड़ी जाितय का ितिनिध व बढ़ाकर हम उ ह इस देश क सरकार म भागीदारी का ता कािलक एहसास देना चाहते ह। जब एक िपछड़ी जाित का छा कल टर या एसपी बन जाता है, तो उस पद क वजह से जो भौितक और संसा रक लाभ िमलता है वो तो उसके प रवार तक ही सीिमत रहता है। ले कन इसका मनोवै ािनक असर ब त ापक होता है। उस िपछड़ी जाित के उ मीदवार का पूरा समुदाय गौरवाि वत महसूस करता है। भले ही उस समुदाय को कोई भी सीधा फायदा उससे न िमले, यह एहसास क उन लोग का भी कोई नुमाइं दा स ा के गिलयार म बैठा आ है, अपने आपम ब त बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला कारक है।5 िजस समय मंडल आयोग ने अपनी रपोट सरकार को स पी, तब तक जनता सरकार धराशायी हो गई थी। उसके बाद जो कां ेसी िनजाम मशः ीमती गांधी और राजीव गांधी के नेतृ व म स ा म आई, उसने उस रपोट पर कोई कारवाई नह क । ले कन जब 1989 म चुनाव के बाद रा ीय मोचा सरकार स ा म आई तो रपोट को फर से िनकाला गया। नए धानमं ी वी.पी. संह िपछड़ी जाितय क उभरती ई राजनीितक ताकत और चेतना के ित संवेदनशील थे। ले कन साथ ही अ पमत सरकार के मुिखया होने के तौर पर वह अपनी कमजोर राजनीितक ि थित से भी वा कफ थे। इस तरह 13 अग त को चार पैरा ाफ का सरकारी आदेश जारी कया गया, िजसम मंडल आयोग के मौिलक अनुमोदन को वीकार करने क बात कही गई। इसके बाद से इस आदेश के तहत भारत सरकार क सभी नौक रय म 27 फ सदी सीट आयोग ारा िच त ‘शै िणक और आ थक प से िपछड़े वग के उ मीदवार ’ के िलए आरि त क जानी थ । सरकार के इस आदेश ने देश के बौि क हलक म एक गमागम बहस को ज म दया। कु छ िव ान क राय थी क आर ण का मापदंड कसी खास जाित से ता लुक रखने क बजाय पा रवा रक आमदनी होनी चािहए। कई दूसर ने सकारा मक कदम क यह कहकर आलोचना क क हरे क दो म से एक सरकारी नौकरी को यो यता क बजाय कसी अ य मापदंड पर देने से सरकारी सं था क गुणव ा और िव सनीयता भािवत होगी। हालां क कई िव ान ने सरकार के इस सकारा मक कदम का ये कहकर वागत भी कया क यह एक सुधारवादी कदम है और सरकारी सेवा म ऊंची जाितय खासकर ा ण के वच व को इससे कम कया जा सके गा। उ ह ने दि ण भारत के रा य का हवाला दया जहां दो ितहाई से यादा सरकारी नौक रयां जाितगत आधार पर आरि त थ और तक दया क इससे सरकारी सेवा क गुणव ा कसी तरह से भािवत नह हो रही थी।6 िसतंबर, 1990 म मंडल आयोग क िसफा रश के संिवधािनक औिच य के िखलाफ सु ीम कोट म एक यािचका दायर क गई। यािचकाकता ने इसके प म तीन मु य दलील द । पहला, आर ण के िव तार से संिवधान के उस आ ासन का उ लंघन होता था, िजसके तहत अवसर के समानता क बात कही गई थी। दूसरा, जाित कसी के िपछड़ेपन का कोई मापदंड नह है और तीसरा क इससे सरकारी सेवा क गुणव ा पर िवपरीत असर पड़ेगा। अदालत ने मामले पर गौर करते ए सरकार के 13 अग त के आदेश के या वयन को थिगत कर दया। जैसा क हंद ु तान म अमूमन कई मामल म होता है, सरकारी नीितय के बारे म बहस अखबार और अदालत म क जाती ह उसके बाद ही वो आम जनता म फै ल पाती है। 19 िसतंबर को द ली िव िव ालय के एक छा राजीव गो वामी ने मंडल आयोग क रपोट को सरकार ारा वीकार कर िलए जाने के िखलाफ अपने शरीर म आग लगा ली। वह बुरी तरह जल गया ले कन जंदा बच गया। उसके ऐसा करने से कई दूसरे छा भी आ मदाह करने पर उता हो गए। ये आ मदाह करने वाले सारे लोग ऊंची जाितय से ता लुक रखने वाले हंद ु तानी थे, जो खुद भी सरकारी नौकरी पाने क कोिशश कर रहे थे। ले कन अब उनके सपने को नजरअंदाज कया जा रहा था। कु ल िमलाकर 200 के लगभग आ मह या क कोिशश ई, िजसम से 62 कामयाब भी हो ग । दूसरे तरह के िवरोध सामूिहक क म के थे। पूरे उ र भारत के छा ने रै िलय और दशन का आयोजन कया, दुकान बंद करवा द , सरकारी भवन पर हमला कया और पुिलस के साथ झड़प क । कानून के अिभभावक ने अपनी जान बचाने क कोिशश क , िजसका कई बार घातक असर भी आ। पूरे देश म कम से कम छह रा य से पुिलिसया गोलीबारी क खबर आ , िजसम पचास से यादा लोग मारे गए।7 मंडल आयोग क वजह से पैदा आ संघष उ र भारत म सबसे यादा िवकराल था। दि ण म इसके उतने िवकराल न होने क एक वजह ये भी थी क गरीब और िपछड़ के ित सरकार का सकारा मक कदम ब त पहले से दि ण के रा य म लागू था। इसके अलावा उस इलाके म एक उफान मारता आ औ ोिगक े भी काम कर रहा था, िजस वजह से पढ़े-िलखे युवा म सरकारी नौकरी ही एकमा आकषण का क नह थी। अहम बात ये भी थी क दि ण के रा य म ऊंची जाितयां पूरी आबादी म 10 फ सदी से भी कम थ , जब क उ र म इनक आबादी 20 फ सदी के करीब थी। चूं क यहां दांव पर यादा बड़ी चीज लगी थी, इसिलए वाभािवक प से संघष यहां सबसे तीखा था। मंडल आयोग के सबसे मजबूत समथक म से उस व के दो उभरते ए राजनेता का नाम अहम है। ये थे मुलायम संह यादव जो 1989 के आिखर म उ र देश के मु यमं ी बने थे और दूसरे थे लालू साद यादव, जो 1990 क शु आत म िबहार के मु यमं ी बने। दोन का ज म गरीब कसान-प रवार म आ था और दोन अपनी यूनीव सटी पढ़ाई के दौरान राजनीित म स य ए थे, जब उ ह ने भावशाली समाजवादी आंदोलन म िशरकत क थी। आपातकाल के दौरान दोन जेल म रहे थे और जब आपातकाल ख म आ तो दोन जनता पाट म शािमल हो गए। जैसा क उनका साझा उपनाम संकेत करता है, मुलायम और लालू एक ही कृ षकपशुपालक जाित से ता लुक रखते थे जो उ र और पि म भारत म फै ली ई है। अं ेजी राज के दौर म यादव अ सर जम दार के लठै त के प म काम करते थे ले कन आजादी के बाद धीरे -धीरे उनके हाथ म खेती क जमीन आती गई और उ ह ने आ थक ताकत, समािजक ित ा और राजनीितक ताकत हािसल कर ली। लालू और मुलायम दोन ने ही स य प से मुसलमान का समथन पाने क कोिशश क जो यू.पी. और िबहार म दूसरी बड़ी आबादी वाला (और गरीब भी) समुदाय था। इस पहल का गिणत िब कु ल चुनावी था, य क यादव और मुसलमान दोन ही आबादी म करीब 10 फ सदी क िह सेदारी रखते थे। एक ब कोणीय संघष म जो क भारत म लगभग िनयम ही था, स ा पाने के िलए 40 फ सदी मत आमतौर पर काफ होते थे। इस तरह कोई भी उ मीदवार िजसने यादव और मुि लम वोट को इक ा कर िलया हो और अ य दूसरी िपछड़ी जाितय को वोट देने के िलए राजी कर रखा हो, उसके जीतने क संभावना काफ हो जाती थी।8 भारत के सबसे यादा आबादी वाले रा य उ र देश और िबहार 139 सांसद को चुनकर संसद भेजते थे। अ सर भारत म होने वाले आमचुनाव का भिव य यह िनधा रत होता था। पहले के चार आमचुनाव म कां ेस ने यू.पी. और िबहार म अिधकांश सीट जीती थ । आपातकाल के बाद ए चुनाव म 1977 म पाट का इन सूब म सफाया हो गया था। ले कन 1980 और 1984 म इसने अपनी ि थित म सुधार कया और मशः 81 और 131 सीट जीत ल । 1984 का चुनाव कु छ दूसरी तरह का था य क यह ीमती गांधी क ह या के बाद के हालात म कराया गया था। 1989 के चुनाव म कां ेस इन दोन रा य म बुरी तरह परािजत ई, उसे महज 19 सीट पर ही जीत िमल पाई। जब दो साल के बाद म याविध चुनाव क घोषणा ई तो इसक हालत इन दोन रा य म और भी खराब हो गई। उसे यू.पी. म महज 5 और िबहार म मा ा 1 सीट से संतोष करना पड़ा। जब वी.पी. संह ने मंडल रपोट को लागू करने क घोषणा क तो उस व िवप म रह रही कां ेस का रवैया ढु लमुल था। 1991 म ए चुनाव म पाट फर से स ा म आई। िबहार और यू.पी. म इसके कमजोर दशन क भरपाई दि ण भारत म इसके मजबूत दशन से हो पाई। पहले के पैरा ाफ म िजन आंकड़ का िज आ है उसने कां ेस को अपनी रणनीित पर फर से िवचार करने पर मजबूर कर दया। अब अगर कां ेस को फर से उ र भारत म जड़ जमानी थ तो उसके िलए िपछड़ी जाितय को अपनी तरफ ख चना ज री था। इसी के अनु प नए कां ेसी धानमं ी पी.वी. नर संह राव ने 26 िसतंबर, 1991 को एक नया सरकारी आदेश जारी कया, िजसम मंडल रपोट को वीकर कर लेने क बात क गई ले कन साथ ही इसम ये भी जोड़ दया गया क अ य िपछड़ी जाित के लोग को 27 फ सदी नौकरी देते समय उनम से ‘गरीब वग के लोग को ाथिमकता’ दी जाएगी। इस बीच सु ीम कोट अपने सामने पेश क गई यािचका पर सुनवाई करता रहा। आिखरकार 16 नवंबर, 1992 को इसने इस पर फै सला सुनाया। सात जज ने इस यािचका को खा रज करते ए मंडल आयोग क संवैधािनकता और इसक रपोट को लागू कए जाने को सही करार दया। दूसरे तीन जज ने इससे असहमित जािहर क । अदालत का यह फै सला अपने आपम काफ िव तृत था और 500 प म िलखा गया था। इससे असहमित रखने वाले जज ने तक दया क जाित क सामूिहकता एक असंवैधािनक बात है और कौन सा ि वंिचत है इसका आधार जाित के बदले उसक आमदनी जैसे गैर-वैयि क मापदंड पर होना चािहए। दूसरी तरफ ब सं यक वग क तरफ से बोलते ए यायमू त जीवन रे ी ने अदालत के िपछले फै सल का हवाला दया िजसम जाित के िपछड़ेपन को छर् ◌ं प म इ तेमाल कया गया था। उ ह ने अमे रका म अ ेत के िलए सरकार ारा उठाए गए सकारा मक कदम का हवाला दया और कहा क वतमान संदभ म यह कदम िब कु ल सांिगक है। य क यह कहने क ज रत नह है क भारतीय संदभ म समािजक िपछड़ेपन क वजह से शै िणक िपछड़ापन आता है और दोन क वजह से गरीबी आती है। इस वजह से समािजक और शै िणक िपछड़ापन फर से आ जाता है। वे एक-दूसरे को बढ़ावा देते ह और इस वजह से एक खतरनाक च क शु आत होती है। यह एक सविव दत त य है क आजादी िमलने तक देश का शासिनक ढांचा लगभग पूरी तरह से ‘ऊंची जाित’ के लोग ारा बना आ था। शू का, अनुसूिचत जाितय का, अनुसूिचत जनजाितय का, मुसलमान और ईसाइय के अ य िपछड़े समािजक समूह का इस ढांचे म कोई वेश नह था। यही वो असंतुलन है, िजसे आर ण के ारा दूर करने का यास कया गया है।9 सरकार के आदेश को सही ठहराते ए सु ीम कोट ने इसम दो शत जोड़ । पहला, सरकारी सेवा म आर ण 50 फ सदी क सीमा से यादा नह होगा और जाित का मापदंड िसफ िनयुि म लागू होगा, पदो ित म नह । जनता पाट ने 1978 म मंडल आयोग का गठन कया था। इसके नए अवतार जनता दल ने 1990 म इसे लागू कया। शु म इसक ित ं ी पा टयां इसके इस उ साह म शरीक नह । य क सीपीआई और सीपीएम पारं प रक प से जाित को नह बि क वग को राजनीितक गोलबंदी क मु य धुरी मानती थी। भारतीय जनता पाट ने हंद ू धम म अपना गौरव खोजना शु कया। जहां तक कां ेस क बात थी तो वह ऐसा मानती थी क वह पूरे देश क आवाज है। ले कन िजस समय सु ीम कोट अपना फै सला सुनाने वाला था, इन पा टय ने आर ण का समथन करने का फै सला कर िलया। उ ह ने ब त तेजी से मंडल रपोट के लागू होने के राजनीितक नतीज को भांप िलया और इसके िवरोध से होने वाले राजनीितक नुकसान को भी। मंडल आयोग पर ए िववाद कु छ-कु छ पचास के दशक म रा य पुनगठन आयोग पर ए िववाद क याद दलाते ह। एक पहचान के तौर पर जाित उतनी ही ाचीन अवधारणा है, िजतनी क भाषा। मुम कन है, इसे आधुिनक बुि जीवी खा रज कर द ले कन यह उतनी ही कामयाबी से समािजक और राजनीितक गोलबंदी के िलए इ तेमाल म लाई जा सकती है। उस व भी सं या के तक के सामने शि का तक कमजोर पड़ गया था। उस व भी जो बात िववाद और ब कोणीय बहस से शु ई थी, वो बाद म आमसहमित पर जाकर ख म ई। भारत सरकार ारा जो भी रपोट तैयार करवाई जाती, वो ब त ही कम लोग ारा पढ़ी जाती और उससे भी कम लोग उस पर बहस करते ह। हालां क रा य पुनगठन आयोग और मंडल आयोग क रपोट इनम अपवाद है। ये रपोट ब त सारे लोग ारा पढ़ी ग , उनसे भी यादा लोग ने इस पर बहस क और वाकई इसे लागू भी कया गया। िजतने लोग को इन दोन रपोट ने भािवत कया, शायद दुिनयाभर म कसी रपोट ने नह कया। इसके अलावा ये रपोट दुिनया के कसी भी िह से म सरकार ारा तैयार करवाई जाने वाली सबसे यादा भावशाली रपोट थी। रा य पुनगठन आयोग का भाव देश पर सीधे तौर पर पड़ा था। इसने भारत के शासिनक न शे को भाषा के आधार पर पुनग ठत कया था। जब क मंडल आयोग क रपोट का असर यादातर परो प से था। इसक शत के मुतािबक अ य िपछड़ी जाितय को महज कु छेक हजार सरकारी नौक रयां ही िमल पा । ले कन इस रपोट के कािशत होने और इसे मान िलए जाने से जो बहस िछड़ी उसने िपछड़ी जाितय के गौरव और उनक एकता को उफान पर ला दया। इसका सबसे बड़ा फायदा दो यादव नेता लालू और मुलायम को आ। दोन ने जनता दल को अलिवदा कह दया और सफलतापूवक अपनी अलग पाट क थापना कर ली। लालू का रा ीय जनता दल िबहार म एक दशक से भी यादा स ा म रहा (2005 तक) जब क मुलायम संह क समाजवादी पाट न बे के दशक के अिधकांश म यू.पी. क स ा पर कािबज रही और वह एक बार फर से रा य के मु यमं ी ह, िजस व सन् 2007 म मेरी यह कताब िलखी जा रही है। III न बे का दशक दिलत राजनीित के उभार का भी गवाह बना। अब पहले क अछू त कही जाने वाली जाितयां, दिलत के नाम से जानी जाने लगी थ । इसका नेतृ व ब जन समाज पाट के ारा कया गया, िजसक थापना एक ब त ही कािबल राजनीितक उ मी कांशीराम के ारा क गई थी। 1956 म डाॅ. बी.आर. अंबेडकर क मृ यु के बाद अछू त कही जाने वाली जाितय के सबसे मह वपूण नेता जगजीवन राम थे। वह कां ेस पाट म थे और इस वजह से दिलत जाितयां एक लंबे अरसे तक कां ेस का वोटबक बनी रह । हां, इस दावे को िसफ महारा म चुनौती दी गई, जहां अंबेडकर ारा थािपत रपि लकन पाट ने दिलत वोट पर अपना हक जताया। इसके अलावा दूसरी पाट जो इस पर दावा कर रही थी वो थी उ पंथी दिलत पथस आॅगनाईजेशन। इसका एक नतीजा ये आ क अब ये िनचली अछू त जाितयां अपने आपको, अनुसूिचत जाित या गांधीजी ारा दए गए श द ह रजन क जगह, दिलत कहने लग । दिलत का मतलब होता है वो ि या समूह िजसका उ पीड़न कया गया हो। ले कन फर भी पचास के दशक से लेकर अ सी के दशक तक वे यादातर कां ेस को ही वोट करते रहे। दशक तक जगजीवन राम दबी-कु चली जाितय का झंडा बुलंद करते रहे थे और उनके िहत म आवाज उठाते रहे थे। एक ांजिलकता ने कहा क ‘1988 म उनक मृ यु के बाद दिलत राजनीित म एक खालीपन आ गया, िजसे भरना लगभग असंभव हो गया। िबखरे ए, असंग ठत, नेतृ विवहीन और सताए ए 15 फ सदी अनुसूिचत जाितय का भा य अिनि तता म झूल रहा था।’10 जब ये घटना ई उस समय तक कांशीराम (दोन म कोई संबंध नह था) क राजनीितक स यता एक दशक पार कर चुक थी। कांशीराम का ज म सन् 1932 म पंजाब म आ था। यूनीव सटी क पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सरकारी सेवा म शािमल हो गए। वे महारा म एक सरकारी योगशाला म काम करते थे, जहां उनका सा ा कार अंबेडकर सािह य से आ। उससे वे ब त भािवत ए और 1971 म अपनी नौकरी छोड़कर उ ह ने एक संगठन क थापना क िजसका ल य दिलत-वंिचत पृ भूिम के सरकारी सेवक क नुमांइदगी करना था। इसे आॅल इं िडया बैकवड एंड माइनो रटी क युिनटीज ए पलाई फे डरे शन (बामसेफ) कहा गया। अगले एक दशक तक कांशीराम देश ापी दौरा करके इस संगठन क रा य और िजला शाखा का गठन करते रहे। अ सी के दशक क शु आत तक बामसेफ के सद य क सं या दो लाख तक प च ं गई थी, िजसम से यादातर ेजुएट या पो ट ेजुएट थे। यह एक तरह से दिलत सं ांत वग का ेड यूिनयन था, जो उनके नेता के श द म पूरे वंिचत समुदाय के िलए ‘ थंक टक’, ‘ ितभा बक’ और ‘आ थक बक’ का िनमाण करता था।11 बामसेफ के िवकास का इलाका उ र भारत और खासतौर पर उ र देश था, जहां इसक सभा म अ सर एक लाख या इससे भी यादा लोग उमड़ते थे। इस संगठन क कामयाबी ने कांशीराम को एक राजनीितक दल का गठन करने के िलए ो सािहत कया। इसके िलए कई नाम सुझाए गए, ले कन आिखरकार इसका नाम ब जन समाज पाट (बसपा) रखा गया। ब जन श द कई मायन म, दिलत से भी यादा वंिचत समुदाय क नुमाइं दगी करता था। जहां दिलत िसफ अनुसूिचत जाित या पूव के अछू त को ही इं िगत करता था, वह ब जन श द िपछड़ी जाितय और मुसलमान का भी ितिनिध व करता था। देश म दिलत -वंिचत के िलए चार दशक से चलाए जा रहे सकारा मक उपाय से दिलत म एक मजबूत और आ ामक म यवग का उदय हो चुका था। शु -शु म दिलत को िसफ राजक य शासन के िनचले पद पर ही िनयु कया जाता था, जहां अमूमन शारी रक म का काम होता था। ले कन व बीतने के साथ-साथ अब ऊंचे पद पर भी मसलन मिज ेट और सिचवालय म लास वन अिधका रय के तौर पर भी उनक िनयुि होने लगी थी। उनक यह ि थित तािलका 26.1 से प हो जाती है। एक अदद सरकारी नौकरी कसी आम आदमी को आ थक िन ंतता और सामािजक ित ा देती है। साल 1995 तक इस तरह सरकारी नौक रय से फायदा पाने वाले दिलत क सं या करीब 20 लाख तक प च ं गई थी। हालां क ये सच था क उस वग से आने वाले यादातर लोग अभी भी भयंकर बदहाली का जीवन जी रहे थे। वे अभी भी कृ िष मजदूर, मेहतर और भवन िनमाण के काय म िमक का काम करके समािजक प से हीन जंदगी जी रहे थे।12 फर भी अब उनके बीच एक अपे ाकृ त भावशाली म यवग पनप चुका था जो उनके मु को आगे ले जाता। यही वो वग था जो बामसेफ का सद य बना और िजसने बाद म कांशीराम क ब जन समाज पाट म अहम भूिमका िनभाई। तािलका 26.1, भारत सरकार म दिलत के नौकरी का आंकड़ा ो तः नीरजा गोपाल जयाल, ‘सामािजक असामनता और सां थािनक उपाय’। अनुसूिचत जाित और जनजाित आयोग के िलए कया गया एक अ ययन। उनके ारा यह पचा नेटवक आॅन साउथ एिशयन पाॅिल ट स एंड पाॅिल टकल इकोनाॅमी (Network on South Asian Politics and Political Economy) के बंगलौर काॅ स म पढ़ा गया। इस िहसाब से देखा जाए तो दिलत ने जो रा ता चुना वो अ य िपछड़ी जाितय से काफ अलग था। राजनीितक स ा का वाद पाकर िपछड़ी जाितय ने मंडल रपोट के मा यम से शासिनक स ा पर दावा करने क कोिशश क । जब क दिलत ने पहले शासन म एक िह सेदारी ा कर ली, उसके बाद दलगत राजनीित म बड़ी दावेदारी के िलए सामने आए। सन् 1984 के आम चुनाव म बसपा ने राजनीित के मैदान म पहली बार कदम रखा। हालां क उस चुनाव म उसे दस लाख से यादा वोट िमले, ले कन वह एक भी सीट नह जीत पाई। हालां क आने वाले चुनाव म वह काफ कामयाब ई। इसने 1996 के चुनाव म 11 सीट और 1999 के चुनाव म 14 सीट पर जीत दज क । ले कन िजस जगह उसने वाकई उ लेखनीय कामयाबी हािसल क वो था उ र देश िवधानसभा का चुनाव। यहां पाट कायकता ने कामयाबीपूवक दिलत जनता को अपने पाले म ख चा और उ ह चेतावनी दी क कां ेस िसफ उनके समाज से चमच को भत करना चाहती है। दूसरी तरफ बसपा ने कहा क उनक पाट ‘सामािजक याय’ या यहां तक क ‘सामािजक बदलाव’ के िलए लड़ रही है। िसफ उनक अपनी पाट ही दिलत म स मान, ग रमा और समृि ला सकती है।13 यह संदश े दिलत वक ल , िश क और अिधका रय ारा उनके वंिचत भाई-बहन तक प च ं ाया गया। बैठक और जनसभा के अलावा इन बुि जीिवय ने उन िनचली जाितय तक कई लोकगीत और लोककथा क शृंखला का काशन कया जो उनके गौरवशाली अतीत के बारे म बताते थे। ये बात इस िव ास के साथ लोग के सामने पेश क जाती थी क ‘अभी तक भारत का इितहास यादातर ा ण के ारा ही िलखा गया है।’ अब एक समानांतर इितहास गढ़ा जाने लगा िजसके मुतािबक ये दावा कया गया क वा तव म दिलत ने ही ‘हड़ पा और मोहनजोदड़ो जैसी महान स यता का िनमाण कया था।’ ले कन हमलावर आय ने ‘उनक जमीन छीन ली, उ ह जबद ती भगा दया, उनक सं कृ ित को न कर दया और उ ह गुलाम बना िलया।’ इितहास के पूरे दौर म इस अ याचार का दिलत कायकता , कसान , गायक और किवय ारा कड़ा ितरोध कया गया। दिलत क इन वा तिवक और का पिनक कहािनय को छोटी-छोटी पुि तका म छापकर सैकड़ -हजार क तादाद म न बे के दशक म पूरे यू.पी. म बांटा गया।14 राजनीितक संगठन और सामािजक चेतना के साथ-साथ िवकिसत होने क घटना ने बसपा को इस मुकाम पर ला खड़ा कया क वह उ र देश म तेजी से आगे बढ़ सके । 1989 से 2002 के बीच म रा य म पांच िवधानसभा चुनाव ए। इन चुनाव म बसपा ारा जीती गई सीट क सं या मशः 13, 12, 69, 67 और 98 रही। सबसे आखरी चुनाव म इसने कु ल मत का 20 फ सदी ा कर िलया। बसपा क उपलि धयां यादातर कां ेस क क मत पर । दिलत के समथन से सामने आई यह पाट यू.पी. क तीन अहम बड़ी पा टय म से एक हो गई। दूसरी पाट मुलायम संह यादव क समाजवादी पाट और हंद ू िवचार वाली भाजपा थी। इस समय तक उस पाट म एक नए नेता का उदय हो चुका था, िजसने कभी कांशीराम के संर ण म काम कया था। अब वह नया नेता कांशीराम क बड़ी िज मेदारी को संभालने के िलए तैयार हो चुका था। उसका नाम मायावती था। मायावती का ज म 1956 म द ली म आ था। उनके िपता सरकारी िवभाग म एक लक थे। मायावती क इ छा थी क वे समाज म ित ा दलाने वाली भारतीय शासिनक सेवा म शािमल ह , ले कन बामसेफ क एक सभा म कांशीराम से उनक मुलाकात ने उ ह राजनीित म ला दया। भाषण देने क लाजवाब कला और चुटीले ं य क बदौलत मायावती ने जनसभा म लोग का यान आक षत कया। उनका ं य यादातर कां ेस पाट के िखलाफ होता था। फर तो उ ह ने पीछे मुड़कर नह देखा। न बे के दशक क शु आत तक मायावती अपनी पाट का चेहरा बन चुक थ । उ ह इस बात का अहसास हो गया क िसफ अपने समुदाय के मत क बदौलत दिलत कभी भी स ा म नह आ पाएंगे। इसिलए उ ह ने दूसरी पा टय और जाितय से गठबंधन बनाना शु कया। वह कम अंतराल के िलए तीन बार उ र देश क मु यमं ी बन और गठबंधन सरकार का नेतृ व कया। ये गठबंधन सरकार कभी समाजवादी पाट के साथ तो कभी बीजेपी के सहयोग से बनाई ग ।15 भारत से गहरा संबंध रखने वाले प कार, पुराने जानकार जे स के म न ने सन् 70 के दशक म िलखते ए कहा था क भारत के सावजिनक जीवन म िजतनी भी अहम मिहलाएं ह वो अं ेजी भाषी उ वग से ता लुक रखती ह। के म न ने ट पणी क क ‘अभी और इससे पहले भी राजनीित म ऐसी कोई मिहला सामने नह आई जो िमक वग से ता लुक रखती हो।’ के म न ने आगे कहा क यह कहना िब कु ल क ठन है क ऐसा दन कब आएगा। ले कन दो दशक के भीतर ही के म न को उनका जवाब िमल गया, या यूं कहा जाए क उनक बात गलत सािबत हो गई। आिखरकार, वो दन आ ही गया जब एक दिलत के घर म पैदा ई मिहला हंद ु तान के सबसे यादा आबादी वाले सूबे क मु यमं ी बन गई।16 देश के दूसरे िह स म भी दिलत क आवाज सुनी जा रही थ । समाजशा ी आं े बेटले ने िलखा क समकालीन भारत म अनुसूिचत जाितय म जो सबसे अहम िवशेषताएं देखी जा रही ह वो ये क वे ‘हरे क े म देखे जा रहे ह। हालां क अभी भी उनका शोषण होता है, उ ह दबाया जाता है और उ ह कलं कत माना जाता है, ले कन भारतीय समाज म अब उनक मौजूदगी को अनदेखा नह कया जा सकता।’17 एक जमाने म हरे क अ याय के सामने िसर झुका लेने वाले और दबा दए जाने वाले दिलत, भारतीय संिवधान के तहत दए गए अपने अिधकार के बारे म जाग क हो चुके थे और इसके िलए लड़ने को तैयार हो गए थे। वा तव म, भीमराव अंबेडकर, िज ह ने इस संिवधान के िनमाण म अ णी भूिमका िनभाई थी, अब हरे क जगह दिलत ेरणा के तीक बन चुके थे। एक मानविव ान शा ी ने िलखा क ‘पूरे तिमलनाडु म अंबेडकर क मू तयां, त वीर, पच और नाम क ति तयां हर जगह दखाई देती ह। ब त सारे सभागृह , कू ल और काॅलेज का नामकरण उनके नाम पर कर दया गया और यहां तक क उनके वैचा रक िवरोधी भी उनको नए दृि कोण से दखाने का यास करते और उनक िवरासत पर दावा कर अपने आपको ध य समझते।’18 देश के दूसरे सूब म भी ऐसा ही हो रहा था। जहां कह भी दिलत रहते थे या काम करते थे, अंबेडकर क त वीर वहां ज र होती। वो त वीर आिखरकार े म करवाई जाती, उस पर फू ल क माला चढ़ाई जाती और उसे टोल म, घर म, दुकान म और कायालय म मु य जगह पर रखा जाता। इस बीच दिलत समूह के दबाव क वजह से क ब और शहर म अंबेडकर क मू तयां सावजिनक जगह पर लगाई जाने लग । शहर के मु य चौराह , रे लवे टेशन के सामने और बगीच म अंबेडकर क मू तयां लगाई जाने लग । अंबेडकर को गव और वािभमान से खड़े एक नेता के प म तनकर खड़ा दखाया जाता, िजनके हाथ म उनके ारा िलखी गई संिवधान क पु तक होती। अपनी मृ यु के पचास साल बाद अंबेडकर क पूजा हंद ु तान के ऐसे इलाक म भी क जाने लगी, िजस जगह का अपने जीवनकाल म वे कभी दौरा भी नह कर पाए थे। अपने जीवनकाल म उन इलाक म अंबेडकर को कोई नह जानता था। देश के लगभग हरे क िजल म जहां कह भी दिलत ह अंबेडकर को ब त ा और यार से याद कया जाता है।19 IV दिलत म बढ़ती वािभमान क चेतना ने जातीय संघष को भी बढ़ावा दया। न बे के दशक म देश म शृंखलाब तरीके से जातीय संघष ए िजसम आमतौर पर दिलत को ही यादा तकलीफ झेलनी पड़ । देश क संपि और संसाधन पर क जे इन संघष क मु य वजह थ । हक कत यह थी क ऊंची या अ य िपछड़ी जाितय के क जे म अिधकांश खेती क जमीन थ , जब क उन पर काम करने वाले यादातर लोग दिलत थे। ले कन िजस प म यह संघष होता था वह वैचा रक यादा था। दिलत बेहतर मजदूरी या अपने ित बेहतर वहार क मांग करते थे, जो किथत प से ऊंचे समझे जाने वाले लोग को बदा त नह होता था। ये लोग दिलत के साथ पुराने जमाने जैसा ही वहार करना चाहते थे। इस संघष का एक कु े दि ण के रा य तिमलनाडु का सबसे दि णी िजला भी था। यहां पर झगड़ा थेवर जाित के लोग और दिलत के बीच था। थेवर दबंग और तर कर रही म यमवत जाित थी, जब क दिलत भूिमहीन मजदूर थे। उन दोन समुदाय म कसी भी मसले पर मसलन बढ़ी ई दर पर मजदूरी क मांग या कसी दिलत के भारतीय शासिनक सेवा म चुन िलए जाने से झगड़ा शु हो जाता था। दबंग जाितय को ये पसंद नह था क एक जमाने म जो लोग मेहतर का काम करते थे, उनके ब े शासिनक अिधकारी बन जाएं। अब आ मिव ास से लैस दिलत समुदाय के लोग गांव क दुकान पर अलग याल म चाय पीने से इं कार कर रहे थे (यह एक पुराने जमाने से चली आ रही था थी)। यहां तक क थेवर ारा उनके ि य नेता मुथुराम लंगा थेवर (1908-1965) क हरे क मू त के जवाब म दिलत समुदाय के लोग अंबेडकर क एक मू त थािपत कर देते (वा तव म, कु छ दु साहसी क म के झगड़े शु ही इसिलए ए क एक समुदाय ने दूसरे समुदाय के नेता क मू त ढहा दी थी)। ये झगड़े िजतने दुिनयावी मसल को लेकर थे, उतने ही वैचा रक भी थे। ये झगड़े अ सर भड़क उठते और दोन समुदाय को इससे काफ नुकसान उठाना पड़ता। महज एक दशक म ही तिमलनाडु म जातीय संघष ने सौ से यादा लोग क बिल ले ली।20 इसी तरह के िमलते-जुलते जातीय संघष उ र भारतीय रा य म भी ए। ह रयाणा के झझर िजले के एक गांव म ई एक घटना को हम इन संघष क ितिनिध घटना के तौर पर ले सकते ह। 15 अ टू बर 2002 क शाम को ऐसी ही एक घटना म कु छ दिलत क सामूिहक ह या कर दी गई। दरअसल, बात ये ई क उस दन दिलत समुदाय के कु छ लोग मरी ए गाय क खाल लेकर बाजार म बेचने गए थे। ऐसा कहा गया क पुिलस ने उन लोग को रोककर पूछा क उ ह ये खाल कहां से िमली। ले कन एक दूसरी कहानी के मुतािबक दिलत ने एक गाय को रोककर मार दया और उसक खाल िनकालकर बाजार म बेचने गए। यही वो बात थी (जो शायद सच नह थी) जो इलाके म फै ल गई। पूरे इलाके म अफवाह फै ल गई क एक गाय क ह या क गई है। इससे लोग काफ गु से म आ गए य क उ जाित के हंद ू गाय क पूजा करते ह। पुिलस थाने के बाहर लोग क एक भारी भीड़ जमा हो गई और ‘धम का उ लंघन करनेवाल ’ को बाहर ख च िलया गया। वहां खड़े पुिलस वाले मूकदशक बनकर देखते रहे और दिलत को वह मु य सड़क पर ला ठय से पीट-पीटकर मार डाला गया।21 दिलत पर अ याचार करना िसफ सवण हंद ु का ही एकािधकार नह था। पंजाब म रा य क अिधकांश जमीन पर अिधकार रखने वाले जट िसख को भी इन म करने वाली और द तकारी करने वाली जाितय का बढ़ता आ मिव ास हजम नह हो रहा था। 20व सदी क शु आत से ही दिलत िसख जमीन पर हक और िसख गु ार म अपनी िह सेदारी और वेश को लेकर आंदोलन कर रहे थे। दोन पर ही जट िसख का क जा था। कु छ दिलत ने अपना धम बदल िलया और अपने धम को आ द-धम कहने लगे। हाल के साल म ह रत ांित क वजह से जो नई समृि आई थी उसने िनचली जाितय के िलए संभावना के नए ार भी खोल दए थे। अब उनके सामने शहर के कारखान म काम करने या अपना खुद का कारोबार करने का िवक प मौजूद था। अब वासी िसख क सं या भी काफ बढ़ गई थी, जो गांव म अपने भाई-बंधु और प रवारवाल को पैसा भेजने लगे थे।22 यहां भी एक घटना को ितिनिध घटना के तौर पर देखा जा सकता है। औ ोिगक शहर जालंधर से बाहर सटे ए एक गांव त हन म एक धम थल पर िनयं ण के िलए झगड़ा शु हो गया। वह धम थल िमक वग से ता लुक रखने वाले संत बाबा िनहाल संह क याद म बनाया गया था। बड़ी सं या म सभी जाितय के िसख वहां पूचाअचना करते थे। इस वजह से मं दर क आमदनी इतनी यादा थी क वह पूरे िजले म सबसे यादा समृ मं दर बन गया (एक अनुमान के मुतािबक वहां सलाना 5 करोड़ पए चढ़ावे म चढ़ते थे)। ले कन मं दर क कमेटी पर जट-िसख का क जा था। वही तय करते थे क इन पैस को कै से खच कया जाएगा। उ ह क मज से पैसे को या तो मं दर के स दय करण म या गांव क सड़क बनाने म या फर खच ले भोज के आयोजन पर खच कया जाता। एक लंबे समय से दिलत, मं दर क बंध सिमित म अपनी नुमाइं दगी क मांग करते आ रहे थे ले कन उनक मांग को अनसुना कया जाता रहा था। आिखरकार, उ ह ने इस मु े को अदालत म ले जाने का फै सला कया। जनवरी 2003 म जब मामला अदालत म था, तो जट िसख ने दिलत के सामािजक बिह कार का ऐलान कया। इसके जवाब म दिलत ने िवरोध म हड़ताल का आयोजन कया। छह महीने के बाद गांव के एक मेले म दोन समुदाय के बीच हंसक झड़प ई। इसके बाद शासन ने ह त ेप कया और दोन समुदाय के बीच समझौता करा दया गया। मं दर क बंध सिमित म दो दिलत को शािमल कया गया ले कन इसके िलए उ ह िसख परं परा का पालन करते ए अपने बाल और दाढ़ी रखने क अिनवायता वीकार करनी पड़ी।23 V ले कन िजस तरह से िबहार म दिलत को सताया गया था और उन पर अ याचार ए थे वैसा देशभर म कह नह आ था। न ही िबहार क तरह उनके ारा कह ितरोध ही कया जा रहा था। पूरे देश म सबसे यादा कटु और खूनी जातीय संघष िबहार म ही ए। ऐितहािसक प से पूव भारत क कृ िष व था ऐसी बनी ई थी िजसने सामंतवाद और सामंती मानिसकता को सबसे शि शाली और खतरनाक प म सामने लाई थी। पड़ोस के रा य पि म बंगाल म इस असमानता को भूिम सुधार क बदौलत दूर कर िलया गया था, ले कन िबहार म वे असमानताएं अभी भी मौजूद थ । जमीन पर ऊंची और म यमवग य जाितय का क जा था, जब क दिलत उस पर अपना पसीना बहाकर खेती करते थे। स र के दशक से माओवा दय ने उनक मांग को लेकर आवाज बुलंद करनी शु कर दी थी। हालां क पि म बंगाल म, जहां से एक दशक पहले उनका आंदोलन शु आ था, ये न सलवादी कमोवेश गायब हो चुके थे ले कन धीरे -धीरे इ ह ने म य िबहार के िजल म अपनी ताकत बढ़ा ली थी। उ ह ने कृ िष म मोचा का गठन कया, िजसने यादा मजदूरी, काम के कम घंटे और सामािजक शोषण के खा मे क मांग क (इन शोषण म कु छ इलाक म एक यह शोषण भी शािमल था क िन जाित क दु हन को शादी क पहली रात जम दार के साथ िबतानी होती थी)। उ ह ने गांव क आम जमीन म िह सेदारी क मांग क और गांव के ाकृ ितक संसाधन जैसे ताल-तलैय म मछली मारने के अिधकार क बात क , जो सै ांितक प से तो सामुदाियक संपि थी ले कन वहार म वो ऊंची जाितय क िमि कयत थी।24 म य िबहार म वाम-चरमपंिथय ारा िपछड़ म भी सबसे िपछड़ी जाितय क गोलबंदी ने उनम एक गजब के आ मस मान क भावना का संचार कया। साल 1999 म रा य का दौरा करने वाले प कार मुकुल ने दिलत म आए ताजा आ मिव ास को साफ महसूस कया। अब ये दबे-कु चले और गरीब लोग बाहर से आनेवाले लोग से बराबरी के तर पर वहार करते थे और ‘नम कार भाईजी’ कहकर संबोिधत करते थे। अब पहले क तरह दिलत हाथ जोड़कर णाम नह करते थे, न ही वे अब अपने शरीर को झुकाकर सामने आते थे। अब उ ह ने लोग को ‘ जूर,’ ‘साहब’ या ‘मािलक’ जैसे श द से संबोिधत करना बंद दया था। उस प कार ने आगे िलखा क पूरे इलाके म, गांव-दर-गांव लोग अब यही नया श द ‘भाईजी’ का इ तेमाल करते ह, जो वाकई एक सुखद प रवतन है।25 मानविव ानी बेला भा टया िलखती ह क ‘आ मस मान क यह भावना न सल आंदोलन क अहम उपलि धय म से एक है।’ इसक दूसरी उपलि ध बंधुआ मजदूरी था क समाि और मजदूरी क दर म उ लेखनीय बढ़ोतरी है। अमूमन अनाज या दूसरी व तु क श ल म दी जाने वाली मजदूरी लगभग दोगुनी हो गई है, इसके अलावा मजदूरी म पहले क तुलना म ब त ही अ छा अनाज दया जाने लगा है। पहले मजदूर को लगातार 12 घंट तक काम करना पड़ता था, अब उ ह बीच-बीच म आराम करने दया जाता है। सबसे बड़ी बात ये क शायद ात या अ ात इितहास म पहली बार मिहला को पु ष के बराबर मजदूरी िमल रही है। उनके साथ अब पु ष क तरह ही वहार भी कया जाता है। हालां क इन वाम उ वा दय का दूरगामी ल य भारतीय रा य क स ा को उखाड़ फकना था। उनके ारा खुले और छु पे तौर पर, कानूनी-गैरकानूनी हरे क तरह क गितिविधयां साथ-साथ चलाई जाती थ । एक तरफ धरने और जुलूस, दूसरी तरफ हिथयार का सं ह और दु मन पर हमला साथ-साथ चलता था। न सिलय क अपनी लाल सेना थी िजसके सद य को राइफल, हथगोले चलाने और बा दी सुरंग को िबछाने का िश ण दया जाता था। उनके साथ उनका अपना सफाया द ता भी चलता था, िजसके चु नंदा लोग को खासतौर पर शोषक जम दार क ह या को अंजाम देने का िश ण दया जाता था।26 इसके जवाब म सं ांत जम दार ने अपनी सेना का गठन कर िलया। जमीन पर अिधकार रखने वाली हरे क जाित ने अपनी-अपनी िनजी सेना बना ली। भूिमहर क रणवीर सेना थी, कु मय क भूिमसेना, राजपूत क कुं अर सेना, जब क यादव क अपनी लो रक सेना थी। सन् 1980 से लेकर अभी 2007 तक आधुिनक िबहार का इितहास र रं िजत नरसंहार से अंटा पड़ा है, िजसे कभी एक जाित ने तो कभी दूसरी जाित ने अपनी िवरोधी जाितय के िखलाफ अंजाम दया। कभी-कभी कोई भूिमहर या यादव सेना दिलत को इक ा कर उ ह सामूिहक प से जंदा जला देती। इसके जवाब म कभी न सलवादी ऊंची जाित के कसी टोले पर हमला करते और लोग को गोली मार देते। एक सूची (जो क अभी तक पूरी नह ई है) के मुतािबक साल 1996-97 म इस तरह के नरसंहार क 13 घटनाएं , िजसम डेढ़ सौ से यादा लोग मारे गए।27 इसके बाद लोग म बड़ी ही वीभ स और नासमझ क म क नफरत दखाई देती। एक भूिमहर जम दार ने कहा ‘मेरा इितहास मजदूर क िचता पर िलखा जाएगा।’ उधर से न सलवादी इसके जवाब म कहते - ‘आठ का बदला अ सी से लगे।’28 न बे के दशक के म य म पूरे सूबे म रा य सरकार क मौजूदगी कह नह दख रही थी। रा य का दौरा करने वाले एक प कार से एक ऊंची जाित के बंदक ू धारी ने कहा क ‘पुिलस तो यहां िहजड़ जैसी है, उसे साड़ी और चूि़डयां पहन लेनी चािहए। अगर आसपास म उनके सामने भी कोई ह या क घटना हो जाए तो उनम एफआईआर भी दज करने क िह मत नह है। यहां सरकार या पुिलस का नामोिनशान नह है। यहां िसफ रणवीर और माले के (न सली) लोग ह।’29 िबहार म न सिलय क बढ़ती ताकत वाकई तब बड़े प म सामने आई, जब उ ह ने नवंबर, 2005 म जहानाबाद शहर पर हमला कया। सकड़ क सं या म बंदक ू धारी न सिलय ने शहर पर हमला कया, सरकारी भवन पर बम फके और जेल पर हमला कया। वे अपने साथ 200 के करीब कै दय को जेल से छु ड़ाकर ले गए, िजनम से यादातर उनके ही साथी थे। इसम उनका ए रया कमांडर भी था। न सिलय का यह अिभयान इसिलए इतना आसान सािबत आ य क बड़ी सं या म पुिलस वाले चुनाव काय म लगे ए थे। फर भी न सिलय के इस हमले ने संिवधान ारा संचािलत िबहार के शासन क हालत को लोग के सामने उजागर कर दया। य क जहानाबाद, रा य क राजधानी पटना से महज चालीस मील क दूरी पर है।30 VI न सलवादी, अनुसूिचत जनजाितय या आ दवािसय के बीच भी स य थे। भारतीय संिवधान के तहत इनक पहचान अ य वंिचत समूह के तौर पर क गई थी। आ दवासी, हंद ु तान के ऐसे इलाक म रहते ह जो ाकृ ितक संसाधन के िहसाब से सबसे समृ है। उन इलाक म बेहतरीन जंगल ह, क मती खिनज पदाथ ह और कलकल बहती न दयां ह। बीतते व के साथ रा य ने इन इलाक के संसाधन को उपयोग म लाना शु कर दया था और आ दवािसय का उस पर एकछ अिधकार ख म हो गया। यहां तक क आ दवािसय को उसके उपयोग से वंिचत कर दया गया। अब आ दवासी उन बचे-खुचे संसाधन के िलए संघष कर रहे थे। आ दवािसय के गु से क सबसे खास वजह सरकार के जंगल िवभाग का रवैया था, िजसने जंगल के उ पाद पर उनके अबाध अिधकार पर पाबंदी लगा दी थी। आ दवासी जंगल से जलावन और मकान बनाने के िलए लकि़डयां इक ी करते थे, साथ ही अ य तरह के वन उ पाद जैसे शहद या जड़ी-बू टय का सं ह करते थे। वे इसे बेचकर अपना जीवन-यापन करते थे। म य देश म तदू प े (इसका इ तेमाल बीड़ी या चु ट बनाने म कया जाता है) का कारोबार काफ फायदेमंद था। सरकार ने इस कारोबार को िनजी ठे केदार के हवाले कर दया, ले कन इसका वा तिवक सं ह आ दवािसय के ारा ही कया जाता था। उ ह इसक ब त ही कम या लगभग न के बराबर मजदूरी िमलती थी। वे 5,000 प को चुनने क एवज म महज 30 पया पाते थे। ले कन न बे के दशक क शु आत म आ दवािसय ने यादा मजदूरी क मांग शु क । जब इसे खा रज कया गया, तो उ ह ने रा य क मु य सड़क को जाम कर दया।31 आ दवासी इलाक म कई तरह क गितिविधयां चल रही थ । इनम से कु छ गांधीवादी क म क थ , तो कु छ का च र मा सवादी था। वे जमीन और जंगल पर आ दवािसय के अिधकार और बेहतर कू ल व अ पताल तक लोग क प च ं के िलए काम कर रहे थे। िनि त प से ये ऐसे समूह थे जो भारतीय रा य क उपे ा के सबसे यादा िशकार ए थे और उ ह ही प रि थितय क सबसे यादा मार झेलनी पड़ी थी। ि टश राज के दौरान ऐसे कई कानून बनाए गए थे, िजसके तहत कई आ दवासी समूह को अपराधी जनजाित का दजा दे दया गया था। उनका कसूर यही था क वे कसी थायी ब ती म नह रहते थे, बि क जीवनयापन के िलए एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते थे। हालां क आजादी िमलने के बाद इन आ दवािसय को औपचा रक प से इन कानून से मु कर दया गया, ले कन उनके िखलाफ चला आ रहा पूवा ह बद तूर कायम रहा। आ दवासी िजल म बहाल होने वाले अिधकारी वहां के लोग के िखलाफ एक खास िहकारत क मानिसकता से त रहते थे। जब क उ ह इ ह लोग क सेवा के िलए तैनात कया गया था। ले कन सदा से शांत रहने वाले आ दवासी अब अपने शुभ चंतक और आंदोलनका रय के भाव म आकर िवरोध करने को तैयार हो गए। इसका नतीजा यह आ क पुिलस के साथ उनक शं◌ृखलाब झड़प ।32 आ दवािसय के ितरोध का सबसे बड़ा और िस उदाहरण नमदा बचाओ आंदोलन था। इस आंदोलन क नेता एक मिहला मेधा पाटकर थी, जो आ दवासी नह बि क एक सामािजक कायकता थ । वे बंबई म पली-बढ़ी थ और उनके आंदोलनकारी िवचार वह िवकिसत ए थे। यह आंदोलन नमदा नदी पर एक िवशाल बांध के िनमाण के िवरोध म चलाया जा रहा था, िजससे करीब दो लाख लोग बेघरबार हो जाते। इन लोग म यादातर सं या आ दवािसय क थी। पाटकर ने इन आ दवािसय को संग ठत कया और बांध के िखलाफ कई जोरदार अिभयान चलाए। ये अिभयान बांध के िनमाण- थल गुजरात, म य देश क राजधानी भोपाल और नई द ली म चलाए गए। इस बांध से सबसे यादा भािवत होने वाले लोग म य देश के ही थे। इन आंदोलन के मा यम से सवशि शाली भारत सरकार से आ दवािसय के िलए इं साफ क मांग क गई। इस आंदोलन क नेता ने अपने समथक के दुख-दद क तरफ लोग का यान ख चने के िलए कई लंबी-लंबी भूख-हड़ताल क ।33 हालां क इस बांध को बनने से रोक पाने म पाटकर का आंदोलन नाकामयाब रहा, ले कन इसने लाख िव थािपत लोग के िलए बनाई गई पुनवास नीित पर एक बड़ी बहस को ज र ज म दया। इसने सरकार के िनदयी पुनवास रकाॅड को लोग के सामने रखने म ज र कामयाबी हािसल क । िवकास प रयोजना से देशभर म लाख लोग िव थािपत ए थे और यह िसलिसला अभी भी जारी था। आिखरकार, आ दवासी समाज के दुख-दद को आिधका रक प से तब वीकार कर िलया गया, जब सरकार ने 1998 म दो नए रा य के गठन को मंजूरी दे दी। ये रा य थे झारखंड और छ ीसगढ़, िज ह मशः िबहार और म य देश के आ दवासी िजल को िमलाकर बनाया जाना था। इसी तरह उ र देश के पहाड़ी िजल को िमलाकर उ रांचल (अब उ राखंड) रा य का गठन कया गया। यह भी झारखंड और छ ीसगढ़ क तरह ही ाकृ ितक संसाधन से भरपूर था, ले कन यहां भी इन संसाधन का दोहन बाहर के ताकतवर लोग ारा कया जा रहा था। VII देश के दय थली म चल रहे संघष से हटकर अब हम अितवादी संघष क थोड़ी बात कर। इन संघष म से एक अभी भी क मीर का संघष था, जो सबसे पुराने व से चला आ रहा था। क मीर घाटी म एक या कह क दो दशक तक शांित रही थी ले कन साल 1989 के शु आती महीन म वहां आंदोलन भड़क उठा। उस साल के नवंबर म राजीव गांधी क जगह वी.पी. संह धानमं ी बने थे। संह ने ‘मु यधारा’ के ताकतवर क मीरी नेता मु ती मोह मद सईद को गृहमं ी के पद पर िनयु कया। यह कदम ापक तौर पर पूरे देश के मुसलमान को खुश करने के िलए उठाया गया, ले कन खासतौर पर यह कदम घाटी के मुसलमान को खुश करने के िलए था। आम क मी रय के अपन म से ही एक आदमी अब मु क का गृहमं ी था, िजसके िज मे पूरे देश क कानून- व था का इं तजाम था। ऐसा माना गया क इस कदम से पुिलस अब घाटी के लोग से पहले क तुलना म अपे ाकृ त नरमी से पेश आएगी। ले कन, ब त ज द ही इस योग के परी ा क घड़ी भी सामने आ गई। 8 दसंबर, 1989 को एक युवा मिहला डाॅ टर का ीनगर म अ पताल जाते व अपहरण कर िलया गया। वह कोई आम डाॅ टर नह थी, उसका नाम बैया सईद था। वह क ीय गृहमं ी मु ती मोह मद सईद क ही बेटी थी। ज मू-क मीर िलबरे शन ं ट (जेकेएलएफ) के आतंकवा दय ने उसका अपहरण कर िलया। आतंकवा दय ने मांग क क बैया सईद को छोड़े जाने क एवज म जेकेएलएफ के पांच आतंकवा दय को जेल से रहा कया जाए। रा य के मु यमं ी फा ख अ दु ला आतंकवा दय क मांग को वीकार करने के प म नह थे। ले कन धानमं ी ने उनक राय को खा रज कर दया। 13 दसंबर को जेल म बंद आतंकवा दय को छोड़ दया गया, िजनका जेल से िनकलने पर एक भारी भीड़ ने वागत कया। लोग ने इसका ज मनाया और उन आतंकवा दय को लेकर ीनगर क गिलय म जुलूस िनकाला गया। जुलूस नारे बाजी कर रहा था। इन नार म एक था - जो करे खुदा का खौफ, उठा ले लािसिनकोव। इसका मतलब था क अगर आप खुदा का काम करना चाहते ह, तो लािसिनकोव बंदक ू उठा लीिजए। उसी दन, बाद म बैया सईद को छोड़ दया गया और वो अपने प रवार से जा िमली।34 इस मामले म सरकार का झुक जाना आतंकवा दय के िलए एक बड़ी जीत थी। उसके बाद तो अपहरण का तांता सा लग गया। बीबीसी के एक संवाददाता, एक बड़े सरकारी अिधकारी और फर से एक नेता क पु ी का अपहरण कर िलया गया। घाटी म ह या का दौर भी चला। इन ह या म क मीर िव िव ालय के वाइस चांसलर और एक थानीय टेलीिवजन क के मुख क ह या अहम थी।35 इस दौर तक सन् 1989-90 के बीच भारतीय खु फया िवभाग ने सरकार को रपोट दी क घाटी म करीब 32 अलगाववादी समूह स य थे। इनम से दो समूह खासतौर पर मह वपूण थे। पहला था जेकेएलएफ जो एक आजाद और धमिनरपे क मीर के िलए लड़ाई लड़ रहा था, जहां हंद ू और िसख को मुसलमान के बराबर ही अिधकार देने क बात कही जा रही थी। इसके ल य को एक लोकि य नारे के मा यम से कया और समझाया जा रहा था और वो नारा था - हम या चािहए? आजादी! आजादी! दूसरा संगठन था िहजबुल मुजािह ीन, जो एक इ लािमक रा य क मांग क तरफ यादा झुकाव रखता था और रा य के पा क तान म िवलय के िखलाफ नह था। िहजबुल का नेतृ व सैयद सलाउ ीन कर रहा था, जो उन नेता का अगुआ था िज ह ने िमलकर 1987 के चुनाव के व एक डेमो े टक ं ट बनाई थी। चुनाव म धांधली करके सैयद सलाउ ीन को हरा दया गया था। उसके बाद उसने बंदक ू उठा ली और पा क तान का समथक बन गया। उसने अपने साथ कई लोग को पा क तान समथक आतंकवादी संगठन का सद य बना िलया।36 जेकेएलएफ और िहजबुल, दोन के ही पास अलग-अलग क म के हिथयार का जखीरा था। इन हिथयार से उ ह ने कई लोग क ह याएं क । इनम से कई बेकसूर लोग भी थे, िज ह रणनीितक भाषा म आसान ल य कहा जा सकता है, जब क कई ऐसे लोग भी थे जो आतंक संगठन के ल य क राह म बाधा थे और िज ह मारने म आतंकवा दय को थोड़ी क ठनाई भी ई। उ ह ने बक म डकै ितयां डाली और पुिलस नाक के सामने हथगोले फके । वे िह मतवर होते गए। नवंबर 1990 म उ ह ने आॅल इं िडया रे िडयो के टू िडयो म राॅकेट से हमला कया। अब सरकार ने उनसे स ती से िनपटने का फै सला कया और घाटी म अधसैिनक बल व सेना क कु छ टु कि़डय को कानून- व था बहाल करने के िलए तैनात कर दया। साल 1990 के पूरा होने तक घाटी म 80,000 सुर ाबल तैनात कए जा चुके थे। इस तरह ‘इस सम या के राजनीितक समाधान खोजने क कोिशश को दर कनार कर दया गया और दमन क नीित पर यान क त कर दया गया।’37 क मीर घाटी के हालात अखबार क इन सु खय से अ छी तरह िचि त होते ह। ये सारी सु खयां साल 1990 क हः - अलगाववादी आंदोलन म युवा क अ णी भूिमका - धमाक ने क मीर को थराया - आतंकवा दय ने पुिलस के जवान को ीनगर म फांसी पर लटकाया - ज मूक मीर म िव ोह के िलए पा क तान िज मेदार - क मीर म आतंकवा दय के िखलाफ लड़ाई म सेना भी शािमल ई - अनंतनाग म सेना बुलाई गई, क यू लगाया गया - सुर ाबल ने 81 आतंकवा दय को ढेर कया - ज मू-क मीर म जुलूस पर फाय रं ग, 3 मरे - क मीर म पूण बंद, िसर कटी लाश बरामद - आतंकवाद क वजह से ज मू-क मीर म िसतंबर तक 1,044 जान गइं - ीनगर म आमलोग नाराज, क यू हटाया गया ले कन दुकान बंद - संयु रा कायालय म ितरं गा जलाया गया - ज मू-क मीर ‘आजादी’ रै ली म 5 लाख लोग शरीक ए - क मीर के घाव क भरपाई िसफ आजादी से38 क मीर घाटी के आमलोग आतंकवा दय और सुर ाबल के बीच होने वाली लड़ाई म फं स गए थे। हालां क अंितम कु छ सु खयां इस बात क तरफ इशारा करती ह क उनक सहानुभूित सुर ाबल से यादा आतंकवा दय क तरफ होने लगी थी। जो लोग इन घटना से िनरपे थे, वे भी घाटी के िति त धा मक नेता मीरवाइज मोह मद फा ख क मई, 1990 म ह या के बाद अलगाववा दय के प म होने लगे या ऐसा करने को उ ह राजी कर िलया गया। गमजदा लोग क एक भारी भीड़, फा ख के शव के साथ क गाह क तरफ जा रही थी। पता नह कस जगह और कस तरह से (इसका योरा अभी तक सं द ध है) उनका झगड़ा सीआरपीएफ के जवान से हो गया। घबराहट म सीआरपीएफ के जवान ने भीड़ पर गोली चला दी, िजसम 30 लोग मारे गए और कम से कम 300 घायल हो गए। वैसे यह बात साफ थी क मीरवाईज के ह यार को पा क तान क तरफ से ऐसा करने का िनदश िमला था, ले कन आिखर म हंद ु तान ये चार यु िनणया मक प से हार गया।39 क मी रय का हंद ु तान क सरकार और इस मु क से अलगाव उन लोग क वजह से और बढ़ता गया िजन लोग को उनक िहफाजत का िज मा देकर वहां भेजा गया था। भारतीय सेना के जवान और खासतौर पर सीआरपीएफ के लोग अिधकांश नाग रक को भी आतंकवा दय से सहानुभूित रखने वाला मान लेते। उनके याकलाप और गितिविधय को एमने टी इं टरनेशनल और भारतीय मानवािधकार कायकता ने िसलिसलेवार ढंग से िलिपब कया।40 1990 के वसंत म िति त यायिवद वी.एम. तारकुं डे के नेतृ व म एक दल ने घाटी का दौरा कया और सरकारी अिधका रय , आतंकवा दय और आम गांववाल से बातचीत क । इस बातचीत के दौरान सेना ारा क गई कई ‘ यादितय ’ को रकाॅड कया गया। इनम लोग (कई बार ब को भी) को पकड़कर पीटना, यातना (ऐसे लोग को भी जो बेकसूर थे), गैर- याियक ह याएं (या मुठभेड़ म ह या) और मिहला से दु यवहार जैसी यादितयां शािमल थ । तारकुं डे क टीम ने ट पणी क क िजतने मामले हमारे सामने लाए गए उन सारे मामल को सूचीब करना मुम कन नह है, ले कन सेना और शासन के काम करने का तरीका और पैटन यहां साफतौर पर दखता है। आतंकवादी िछटपुट घटना को अंजाम देते ह और सुर ाबल इसका बदला लेते ह। इस या म बड़ी सं या म बेकसूर लोग को तकलीफ उठानी पड़ती है। उ ह पीटा जाता है, उनके साथ बला कार होता है और उनक ह या कर दी जाती है। कु छ मामल म पीि़डत दोन तरफ से चल रही गोलीबारी का िशकार हो उसम फं स जाता है और ब त से मामल म तो वह कह होता भी नह । वह दोन तरफ से चल रही गोलीबारी के बीच भी नह पड़ता, फर भी उसे झेलना पड़ता है। इस वजह से लोग अलगाववाद के और भी करीब होते जा रहे ह। मुसलमान का ये आरोप है क उनक ह या और उनक संपि क बबादी इसिलए होती है य क वे मुसलमान ह।41 VIII सन् 1950 क तरह ही सन् 1990 म भी क मीर के चरमपंथी द ली के राजनीित के िलए िसरदद बन रहे थे। उ मीद के मुतािबक वैसा ही काम उ र-पूव के चरमपंथी भी कर रहे थे। ले कन उस े के सबसे बड़े रा य असम से कु छ अ छी खबर भी आ रही थ । बोडो समुदाय के लोग के साथ एक समझौता कया गया, िजसम एक ‘ वाय प रषद’ के गठन पर सहमित बन गई। यह वाय प रषद उन िजल को िमलाकर बनाई जाने वाली थी, िजसम बोडो लोग क ब सं या थी।42 ले कन बुरी खबर ये थी क अलगाववादी यूनाईटेड िलबरे शन ं ट आॅफ असम (उ फा) ब त स य हो गया था। रा य के कु छ िह से तो शासन के िनयं ण म थे, ले कन दूसरे िह स म उ फा क मज के बगैर प ा तक नह िहलता था। वहार म हरे क चाय बागान िव ोिहय को सालाना टै स अदा करता था। इस टै स का आधार उन चाय बागान म कमचा रय क सं या और उनका मुनाफा होता था। अपने खजाने को बढ़ाने के िलए ये िव ोही लगातार बक पर हमला करते और उसे लूटते रहते थे। कानून- व था बहाल करने के िलए सेना को तैनात कर दया गया। सेना ने उ फा के कु छ बड़े कै डर को िगर तार कया और उनक ह या कर दी। दूसरे उ फा के कै डर सरहद पार कर बंगलादेश म छु प गए।43 न बे का दशक ि पुरा के िलए भी काफ उथल-पुथल का दशक था। आ दवासी अिधकार क वकालत करने वाले हिथयारबंद समूह अ सर बंगाली वािसय क बि तय पर हमला करते रहते। यहां भी आतंकवाद क घटना को महज आपरािधक वारदात से अलग करके देखना काफ मुि कल था। साल 2001 म एक शोधकता ने िलखा क ‘बेकसूर लोग क ह याएं, अपहरण और फरौती क घटनाएं ि पुरा के जनजीवन क सामा य घटना बन गई ह और ये कई साल से चल रहा है।’ सन् 1993 से लेकर सन् 2000 के बीच रा य म लगभग 2000 लोग मारे गए, िजसम सुर ाबल के जवान, आतंकवादी और सबसे यादा आम नाग रक शािमल थे।44 उ र-पूव के ही एक दूसरे छोटे से रा य मिणपुर म भी बंदक ू का बोलबाला दख रहा था। मिणपुर कभी एक आजाद रयासत रहा था। वहां पर जो हंसा हो रही थी, वो मु यतः ित ं ी गुट के वच व क लड़ाई का नतीजा थी। मिणपुर म मेईती समुदाय के लोग क ब सं या ह, जो घाटी म रहते ह। उनका ऊपरी मिणपुर म रहने वाले आ दवािसय से झगड़ा होता रहता था। पहाि़डय म भी लोग म ब त मतभेद था, खासकर, थांगकु ल नगा और कू क समुदाय के लोग के बीच। मई, 1992 म नगा आतंकवा दय ने कु क गांव म आग लगा दी, िजससे नरसंहार का एक खतरनाक च शु हो गया। हालां क ये समूह आपस म लड़ते रहते थे, ले कन वे भारतीय रा य के िब कु ल िखलाफ थे। कु क समुदाय के कु छ लोग और उनसे भी यादा थांगकु ल नगा और मेईती ऐसा सोच रहे थे क एक दन वे अपना आजाद मु क ज र हािसल कर लगे।45 इलाके के कई शहर म अलगाववा दय ने हंदी फ म के दशन पर पाबंदी लगा दी थी, जो उपमहा ीप क लोकि य सं कृ ित का सबसे बड़ा वाहक था। यह उनक खुद क िव ोही प रभाषा थी, िजसके तहत वे अपने आपको गैर-भारतीय दखाना चाहते थे। इस नकारा मक पहचान को हािसल करने म उ फा, ि पुरा नेशनल वोलं टयस, कू क नेशनल आम और मेईती िव ोिहय ने नगा से ेरणा ली थी, जो उ र-पूव म शु ए उप व के सबसे पहले ज मदाता थे। सन् 1962 म एक नगा गुट ने भारत सरकार के साथ शांित समझौता कायम कर िलया था। ऐसा ही एक दूसरे गुट ने साल 1975 म कया। ले कन फर भी एक ऐसा गुट मौजूद था, जो िजद पूवक एक आजाद और सावभौम नागालड क मांग के िलए अड़ा आ था। इस गुट का नाम था नेशनल काउं िसल आॅफ नागालड (एनएससीएन), िजसका नेतृ व आइजेक वू और टी मोईवा के हाथ म था। एनएससीएन के पीछे कु छ हजार िशि त लड़ाक का मजबूत समथन था। वे बमा ि थत अपने ठकान से अिभयान चलाते, सीमापार कर हमले करते और भारतीय सेना को उलझाए रखते। नागालड के अंदर इन िव ोिहय को लोग का यार और समथन था और शायद लोग इनसे डरते भी थे। जैसे भी हो, ले कन आमलोग से ा चंद से ही वे अपनी गितिविधयां चला रहे थे। यहां तक क सरकारी अिधकारी भी इन भूिमगत िव ोिहय को मािसक ‘टै स’ अदा करते थे। यह घटना अपने आपम एक आ यजनक और इकलौती भारतीय िवडंबना है, िजसम खुद भारतीय रा य के अिधकारी एक आतंक समूह को पैसा देने के िलए मजबूर थे और वे आतंकवादी, रा य के ही िवनाश क कसम खाए बैठे थे! हालां क न बे के दशक के म य म कु छ चच और िसिवल सोसाइटी संगठन से िमलकर बने एक संगठन नगा होहो ने िव ोिहय और सरकार को यु िवराम के िलए राजी कर िलया। 1997 म बंदक ू शांत हो गई और दोन प वाता के िलए तैयार हो गए। शु म ये बातचीत बकाक और ए सटडम म ई, ले कन बाद म मोईवा और वू हंद ु तान के दौरे पर राजी हो गए। वे धानमं ी से िमले और उ ह ने उ र-पूव क या ा भी क । ले कन कोई समझौता नह हो सका। इस समझौते म दो मु य बाधाएं आ रही थ । िव ोही ये चाहते थे क भारत सरकार घोषणा करे क बातचीत संिवधान के दायरे से बाहर क जाएगी और उनक ये मांग क मिणपुर, असम और अ णाचल देश जैसे रा य के नगा इलाक को नागालड म शािमल करके ेटर नगािलम को वीकर कया जाए - समझौते क राह म मु य बाधाएं थी। जुलाई 2008 तक इस यु िवराम के दस साल पूरे हो गए थे। फर भी, दोन प को मा य एक पार प रक समझौता अगर असंभव नह , तो दृि गोचर भी नह हो रहा था। भारत सरकार कहती है क वो नगा को हरमुम कन वाय ता देने पर तैयार है, ले कन वो भारतीय संिवधान के दायरे म ही होगा। जब क एनएससीएन कहता है क कोई भी समझौता तभी मुम कन है जब नगा सावभौिमकता को वीकार कर िलया जाए। इसके पीछे उसका तक यह है क ‘नागालड, िविजत प से या सहमित से इितहास म कभी भी हंद ु तान का िह सा नह रहा है।’46 वह एक वतं नगा सेना को कायम रखने क भी बात करता है। उसके मुतािबक, इससे कु छ भी कम उन लोग के ित ग ारी होगी, िज ह ने इस उ े य के िलए अपनी जान क कु बानी दी है। फजो के पैतृक गांव म एक िशलालेख लगाया गया है, िजस पर िलखा है - ‘खोनोमा के इन पु ष और मिहला ने एक आजाद नगा मु क के िलए अपनी जान क कु बानी दी है। हम उ ह याद करते ह और उनके उ े य का समथन करते ह।’47 दूसरी तरफ, एक वृहत नगािलम (नागालड) के िवचार का वे रा य िवरोध करते ह, िज ह इस वजह से अपने नगा इलाक से हाथ धोना पड़ेगा। मिणपुर के मेईितय ने इसका हंसक िवरोध कया है। उनका दावा है क उनका रा य एक वतं और एक कृ त े के प म िपछले हजार साल से भी यादा से वजूद म रहा है। साल 2001 क ग मय म मेईती अितवा दय ने इसके िवरोध म सरकारी भवन म आग लगा दी और नगा से वाता के िवरोध म पुिलस नाक पर हमला कया। घर और कायालय क दीवार पर पच िचपका दए गए, िजसम िलखा था क ‘वे मिणपुर के िवभाजन के िखलाफ ह और उनके े क अखंडता के साथ कोई समझौता उ ह वीकार नह है।’48 उ र-पूव हंसा और संघष का इलाका है और इस वजह से वहां से बड़े पैमाने पर लोग का पलायन भी आ है। कु छ पलायन सरहद पार क तरफ आ है, तो कु छ लोग का पलायन लगातार ही बंगलादेश क तरफ से हो रहा है। कु छ लोग उसी इलाके म एक जगह से दूसरे जगह भी चले गए ह। ब त सारे लोग नौकरी क तलाश म तो कु छ न लीय हंसा के डर से पलायन कर गए ह। ‘पयावरण पर आए खतरे ’ क वजह से भी कु छ लोग पलायन कर गए ह। 60 के दशक म पा क तान के िचटगांव पहाड़ी इलाके म एक ऊंचे बांध के बनने से 60,000 चकमा लोग को पलायन करना पड़ा। चूं क वे अपने देश म (मुि लम वच व वाले देश म चकमा बौ धम को मानने वाले लोग थे) ि तीय ेणी के नाग रक जैसा जीवन जी रहे थे, इसिलए उ ह ने भारतीय रा य अ णाचल देश म शरण ले ली। वहां वे अभी भी रहते ह, ले कन भारतीय सरकार ारा उ ह नाग रकता नह दी गई है और उ ह यहां भी दोयम दज के नाग रक सा जीवन जीना पड़ रहा है। इसी बीच, अ णाचल और नागालड म ब त सारे बांध बनने से फर से करीब 100,000 ामीण के बेघरबार होने क आशंका है। ये लोग भी अपने मूल थान से कह और पलायन करने पर मजबूर हो जाएंगे, ता क जीवन-यापन और खेती के िलए कह जमीन खोज सक। कृ िषयो य जमीन, एक ऐसा संसाधन है जो दि ण एिशया म ब त कम उपल ध है और इसके िलए मारामारी होती है।49 उ र-पूव के रा य म सेना का भारी जमावड़ा है। इस इलाके के रा य क सीमा चीन, बंगलादेश और बमा से लगती है। चीन के साथ अतीत म भारत एक ब त ही महंगी लड़ाई लड़ चुका है, जब क बंगलादेश के साथ उसका ख ा-मीठा संबंध रहता आया है। ले कन इन इलाक म िसफ बाहरी सुर ा के खतर क वजह से ही भारतीय सेना का इतना बड़ा जमावड़ा नह है। उनको इसिलए भी इतनी बड़ी सं या म तैनात कया गया है क ता क इस इलाके म आव यक व तु और सेवा क आपू त बािधत न हो। वहां से गुजरने वाली सड़क , रे लवे पट रय और िव ोही आतंक गुट को काबू म रखने के िलए भी सेना का इतना बड़ा जमावड़ा उन इलाक म कया गया है। मिणपुर म एक लंबे समय तक स ा म रहे एक मु यमं ी का कहना है क ‘सेना के मामले म हमारी कोई दखलअंदाजी नह है। उनके काम करने का अपना अलग तरीका है। वे हम कु छ भी नह बताते और न ही वे हमारी कसी भी तरह क बात सुनते ह। ये बात अलग है क उ ह नाग रक शासन क सहायता करने के िलए यहां तैनात कया गया है।’50 उ र-पूव रा य म भारतीय सेना आ ड फाॅसज पेशल पावस ए ट (एएफएसपीए) यानी सश बल िवशेष शि कानून के तहत काम करती है जो इसके अिधका रय और जवान को िसिवल कोट के ारा कसी भी तरह के ह त ेप से मु कर देती है। सेना को कटघरे म तभी खड़ा कया जा सकता है, जब इसके िलए खासतौर पर क सरकार इजाजत दे। चूं क यह कानून सेना के जवान को कसी भी अपराधी या सं द ध ि पर बल योग या उसे गोली तक मारने का अिधकार दान करता है, ऐसी ि थित म सेना के जवान पर करीब-करीब कोई अंकुश नह है। वे कभी भी आ ामक रवैया अपना सकते ह। इसी वजह से ब त साल से कई मानवािधकार संगठन आ सा (एएफएसपीए) यानी सेना कानून के खा मे क मांग कर रहे ह। इसक अगुआई मिणपुर क मिहलाएं कर रही ह, जो ब त दन से पु ष ारा क जा रही सभी तरह क हंसा के िखलाफ स य रही ह। रा य म दजन क सं या म मीरा पैबी समूह (मिहला पथ दशक) स य ह। ये मिहला समूह सेना क यादितय के िखलाफ अिभयान छेड़ने से पहले कामयाबीपूवक नशाखोरी के िखलाफ अिभयान चला चुका है। मीरा पैिबय ने मांग क है क सेना के जवान कू ल और बाजार से हट जाएं, मनमज से नौजवान लड़क को पकड़ना बंद कर और जेल -हवालात को जन-िनरी ण के िलए खोल दया जाए।51 जुलाई 2004 म इन मांग को लेकर फर से एक बार जोरदार आंदोलन आ, जब एक मिहला को उसके घर से सुर ाबल ने िगर तार कर िलया। उस मिहला पर आतंकवा दय को सहायता देने का आरोप था। उस मिहला को यातना दी गई, उसके साथ बला कार कया गया और आिखरकार उसक ह या कर दी गई। उसक लाश को सड़क के कनारे सड़ने के िलए फक दया गया। मिहला का एक समूह, जुलूस क श ल म इ फाल के सैिनक कायालय तक गया, जहां उ ह ने सेना के िखलाफ नारे बाजी क । उन मिहला ने वहां (लगभग) िनव होकर दशन कया। उस दशन के दौरान उ ह ने अपने शरीर को िसफ एक झंडे से ढंक रखा था, िजस पर िलखा था - ‘भारतीय सेना के जवानो! आओ और हमारा बला कार करो।’ एक छा ने इसके िखलाफ वतं ता दवस के दन अपने शरीर म आग लगा ली और एक पचा छोड़ गया, िजस पर िलखा था - ‘सेना कानून के तहत सुर ाबल के हाथ मरने से बेहतर है क खुद को आग के हवाले कर दया जाए। इस िव ास के साथ म एक मानव-मशाल के प म आम लोग के आगे-आगे चल रहा ।ं ’ इसके िवरोध म एक छा अिनि तकालीन भूखहड़ताल पर चली गई, उसे अ पताल ले जाया गया, ले कन उसने खाना खाने से इं कार कर दया। दो साल के बाद भी वह िब तर पर लेटी ई है। उसे सरकार के ारा जबद ती खाना िखलाया जा रहा है य क उसने कहा क वह सैिनक शासन के अधीन रहने क बजाय मर जाना पसंद करे गी।52 IX मई 2000 म भारत क आबादी एक अरब हो गई। सरकार ने द ली म पैदा ई एक ब ी को आिधका रक प से ‘एक अरबवां ब े’ के प म चुना। उस ब ी का नाम आ था रखा गया और उसका जबद त वागत कया गया। उ सािहत भीड़, ेस और टेलीिवजन के कै मर म उसक त वीर लेने क होड़ लग गई। ेस फोटो ाफर उस अ पताल के िब तर और टेबल क बेहतरीन त वीर उतारने म लगे थे। ध ा-मु से दुखी एक ेस रपोटर ने कहा क ‘असं य कै मरे क लैशलाइट इस एक अरबव ब े क त वीर उतार रही थ और डाॅ टर का कहना था क इससे उस ब े क वचा पर असर पड़ सकता है।’53 भारत म पैदा होने वाले एक अरबव ब े के िलए आ था का चुनाव िनि त ही राजनीितक प से सही फै सला था य क हाल ही म संयु रा संघ ने क या िशशु वष मनाया था। हालां क ये इस त य के िब कु ल िवपरीत लगता था क इस देश म लड़ कय और क या िशशु के साथ कै सा वहार कया जाता था। द ली और इसके आसपास ही नह , बि क देश के कई िह स म ज म के बाद और उससे पहले भी क या िशशु के साथ अ छा वहार नह कया जाता था। िपछली सदी म मिहला-पु ष का लंगानुपात लगातार कम आ था और यह म जारी था। सन् 1901 म मिहलापु ष का अनुपात 972 मिहला ितहजार पु ष था जो क 1951 म घटकर 947 रह गया और 1991 तक आते-आते यह 927 मिहला ितहजार पु ष रह गया। लिगक आधार पर देखा जाए तो लड़के और लड़ कय क बाल मृ युदर म भी काफ फक था। भारत के अिधकांश घर म लड़ कय क तुलना म लड़क के पालन-पोषण पर यादा यान दया जाता था। उ ह अ छा पौि क भोजन, बेहतर वा य सुिवधाएं और बेहतर कू ल म भेजा जाता था, जब क उनक बहन खेत म और जंगल म काम कर रही होती थ । अ सी के दशक के बाद से वा य सेवा म सुधार से इस पूवा ह को और यादा बल िमला। मामला और भी खतरनाक प धारण करने लगा। अब लंग जांच करने क आधुिनक सुिवधा ने मां-बाप को क या ूण के गभपात क सुिवधा मुहय ै ा करा दी। हालां क ऐसा करना भारत म गैर-कानूनी है, ले कन ये सुिवधा पूरे देश के लीिनक म उपल ध है। नई शता दी के द तक देने के बाद जनसं यािवद ने वाकई ही होश उड़ा देने वाले आंकड़े पेश कए। 1981-2001 तक क अविध म और 0-6 आयुवग के बीच आं देश म लड़ कय क ज मदर 992 ितहजार लड़के से घटकर 964 ितहजार लड़का रह गई। कनाटक म यह अनुपात 974 से घटकर 949, तिमलनाडु म 967 से घटकर 939 और के रल म 970 से घटकर महज 963 ितहजार लड़के रह गया था। उ र भारत म तो यह प रवतन और भी यादा नाटक य था। ह रयाणा म इसी अविध म (1981-2001) लड़ कय का अनुपात 902 से घटकर 820 और पंजाब म 908 से घटकर 793 ितहजार लड़के रह गया था।54 पंजाब और ह रयाणा म िबगड़ते लिगक अनुपात ने इन रा य म ‘पु ष व के िलए संकट’ खड़ा कर दया। िववाह के परं परागत िनयम के िहसाब से कसी पु ष क शादी, उसी क जाित और उसी क भाषा बोलने वाली मिहला से क जाती थी, जो अमूमन उसके गांव क नह होती थी। ले कन इन रा य म िववाह यो य पु ष को प ी नह िमल रही थी। इसिलए उ ह ने सैकड़ मील दूर क लड़ कय से शादी करनी शु कर दी। ऐसी लड़ कयां दूसरे रा य , जाितय और भाषा-समूह से ता लुक रखती थ । न बे के दशक म बड़े पैमाने पर असम, िबहार और पि म बंगाल क मिहला से इन रा य के पु ष ने शादी क । कई बार तो वे दु हन को खरीदकर लाते थे। कई बार ये अंतजातीय ‘वैवािहक संबंध’ अनौपचा रक होता था, तो कई बार इसे वैवािहक रीित- रवाज के ारा मा यता भी दी जाती थी। ले कन सवाल ये था क इन अ वाभािवक िववाह से पैदा ए ब के साथ समाज कस तरह का वहार करे गा? य क वह समाज अभी भी अिधकांश मामल म जाित और र संबंध के ारा एक दूसरे से जुड़ा आ था।55 लड़के और लड़ कय के ित मां-बाप, प रवार और समाज के वहार म जो फक था, वो सां कृ ितक और इलाकाई दोन ही तर पर था।56 दि ण के रा य और देश के शहरी इलाक म मिहला के साथ अपे ाकृ त अ छा या कम खराब वहार कया जाता था। शहरी संदभ म अगर देखा जाए तो वे कू ल जाने, नौकरी करने और अपना जीवनसाथी चुनने म अपे ाकृ त यादा आजाद थ । देश म कामकाजी मिहला का एक वग उभर रहा था, जो अपनी अलग पहचान बना रहा था। कई बार तो उ ह ने कई े म उ लेखनीय मुकाम भी हािसल कया। अदालत म, अ पताल म और यूिनव स टय म हर जगह मिहलाएं अपना झंडा गाड़ रही थ । कामयाब मिहला उ मी िव ापन एजिसयां और दवा क कं पिनयां चला रही थ । इसके अलावा एक मजबूत और जोरदार नारी आंदोलन भी पूरे देश म चल रहा था। यह आंदोलन बड़े शहर म आधा रत था और इ ह लेखक और आंदोलनका रय के ारा चलाया जा रहा था। इन लेखक और स य आंदोलनका रय ने कई उ तरीय लेख और कताब िलख , जो आधुिनक भारत म मिहला के संघष और उनक जंदगी क रोजमरा क तकलीफ पर आधा रत थ ।57 कई साल तक राजनेता के बीच चार करने, समझाने-बुझाने और उ ह राजी करने के बाद ये नारीवादी इस बात म कामयाब ए क मिहला संबंधी कानून म प रवतन लाया जाए। इन कानून म ये प रवतन खासतौर पर उन मिहला के िलए फायदेमंद सािबत होने वाले थे, जो सुिवधािवहीन थ और गांव म रहती थ । वे मिहलाएं इन शहरी आंदोलनका रय क ामीण बहन थ । इन आंदोलन के फल व प हंद ू उ रािधकार अिधिनयम, 1956 म संशोधन कया गया और पहली बार कृ िषयो य जमीन को इसके दायरे म लाया गया। इसके तहत मिहलाओ को पैतृक संपि म बराबर का हक दया गया। एक दूसरे संशोधन के तहत मिहला उ रािधका रय को संयु प रवार म पु ष उ रािधका रय के बराबर माना गया (पहले इसम बेट को बे टय क तुलना म संपि म यादा बड़ा हकदार माना गया था)। कृ िष और लिगक सम या पर उ लेखनीय काम करने वाली अथशा ी बीना अ वाल ने कहा क ‘ तीका मक प से कानून म यह प रवतन एक बड़ा कदम है। अब कानून क नजर म हर तरह से हंद ू मिहला को बराबर का दजा िमल गया ह।’58 ले कन, दुख क बात ये थी क अभी भी सामािजक प से ऐसा वहार नह होता था। X मेरे एक पुराने िश क कहा करते थे क ‘ हंद ु तान, सम या बटोरनेवाल का मु क है।’ हालां क मुझे लगता है क उनके ारा देश का ये च र -िच ण संपूण नह है। य क हंद ु तानी िसफ सम या ही नह बटोरते, बि क उसे पैना भी करते ह। पहले क तरह ही न बे के दशक म भी देशभर म लोग कई तरह क मांग के साथ सामने आ रहे थे। इसक अिभ ि कई तरीक से क जा रही थी। पहले क ही तरह कु छ संघष और भी यादा तीखे और हंसक प म हो रहे थे, जब क दूसरे कई तरह के संघष धीमे भी पड़ रहे थे या उ ह सुलझाया भी जा रहा था। उदाहरण के िलए िमजोरम म अमन-चैन क वापसी हो गई थी। िमजो नेशनल ं ट के नेता ने अपने आपको आ यजनक तरीके से बदल िलया था। जो लोग कभी जंगल म रहकर आतंक गितिविधयां चलाया करते थे, अब वे रा य के सिचवालय म राजनेता के प म चुनकर आ गए थे। रा य म शांित कायम होने क वजह से लोग को कई फायदे ए। पानी क पाइप लाइन, सड़क और सबसे अहम कू ल का बड़ी तादाद म िनमाण कराया गया। साल 1999 आते-आते िमजोरम ने सा रता के मामले म के रल को भी पीछे छोड़ दया। िमजोरम का देश क मु यधारा से बड़ी तेजी से जुड़ाव होता जा रहा था। अब िमजो समुदाय के लोग रा ीय भाषा हंदी सीख रहे थे और के ट भी देख और खेल रहे थे। चूं क वे ब त ही फराटेदार अं ेजी भी बोलते थे (िमजोरम क आिधका रक भाषा अं ेजी ही है) इसिलए वे उफान मार रहे सेवा े म बि़ढया नौकरी भी हािसल कर रहे थे। होटल और खासतौर पर हवाईसेवा म उ ह अ छी नौक रयां िमल रही थ । िमजोरम के मु यमं ी जोरमथंगा ने अपने रा य को ‘पूरब का ि व जरलड’ बनाने क बात कही। उनके इस दृि कोण म ये बात शािमल थ क यूरोपीय देश और हंद ु तान के दूसरे रा य से िमजोरम म सैलानी आएंगे और पड़ोसी देश बमा और बंगलादेश के साथ कारोबार से रा य क अथ व था कु लांचे भरे गी। िमजोरम इन देश को फल और सि जय क आपू त करे गा और इसके बदले मछली और मुग का आयात करे गा। जोरमथंगा भारत सरकार और नगा व असमी िव ोिहय के बीच म य थ बनकर एक बड़ी भूिमका भी अदा कर रहे थे। लोग को अब यह याद भी नह था क यह भिव य ा नेता एक जमाने म क र अलगाववादी रहा था, जो िमजोरम क आजादी के िलए हंद ु तान से लड़ाई रहा था। जोरमथंगा उस व िमजोरम क िनवािसत सरकार म उपरा पित और र ामं ी का पद संभाल रहे थे।59 कमोवेश, पंजाब म भी हालात सुधर गए थे। यहां भी सम या का समाधान खोज िलया गया था। हालां क यहां यह या काफ यातनादायक रही। सन् 1987 म रा य म रा पित शासन लगा दया गया और लगातार छह-छह महीन के िलए बढ़ाया जाता रहा। एक चुनी ई सरकार के अभाव म पुिलस ने बड़े आ ामक तरीके से आतंकवा दय का पीछा कया और उ ह कु चलने के िलए हर सही-गलत तरीक का इ तेमाल कया। पुिलस नाक के आसपास और सुदरू वत इलाक म भी गोलीबारी क बात सामा य थ । 1990 म वहां सेना बुला ली गई, िजसे सालभर बाद हटा िलया गया। आिखरकार, 1992 म रा य िवधानसभा के चुनाव करवाए गए, िजसका अकाली दल ने बिह कार कया। चुनाव के बाद मु यमं ी बने बेअंत संह क ह या कर दी गई। उनक ह या एक आ मघाती द ते ने क , जब वे कायालय जाने के िलए रवाना हो रहे थे। हालां क 1993 म अकािलय ने थानीय ाम प रषद के चुनाव म िह सा लेकर फर से लोकतांि क या म अपनी वापसी का ऐलान ज र कया। इसके चार साल के बाद वे िवधानसभा चुनाव म भी शािमल ए और भारी जीत दज क । अब तक सूबे से आतंकवाद काफ हद तक ख म हो चुका था। कु छ आतंकवादी फरौती वसूलने वाले गुंडे बन गए थे, जो िसख उ िमय और कसान से जबरन पैसा वसूलते थे। अब लोकि य जनमानस एक अलग रा य क मांग से अलग हो चुका था। िसख ने फर से एक बार भारत म बने रहने के फायद क पहचान कर ली थी। अब वे देश क मु यधारा म लौट आए थे। हालां क रा य क कृ िष िवकास क दर कम हो गई थी, ले कन कारोबार तर पर था और रा य के मृत ाय हो चुके औ ोिगक े को फर से पटरी पर लाने क कोिशश क जा रही थ ।60 रा य म सामा य ि थित बहाल हो जाने का एक संकेत ये भी था क अकाली अब अपनी पाट म ही मलाईदार और िति त माने जाने वाले मं लय के िलए झगड़ रहे थे। पाट के नेता और बुजुग मु यमं ी काश संह बादल ने इन मतभेद को दूर करने के िलए दसव गु गो वंद संह ारा खालसा (या िसख भाईचारा) क घोषणा कए जाने के 300 वष पूरा होने के उपल य म एक भ समारोह का आयोजन कया।61 बादल क अगुआई वाली पंजाब सरकार ने इस समारोह के िलए 300 करोड़ पए आवं टत कए जब क भारत सरकार ने 100 करोड़ का अनुदान दया। नए टेिडयम, अितिथशालाएं और धम थल के अलावा िसख नायक क याद म नए मारक बनाए गए। आनंदपुर सािहब के महान गु ारे म िसख बुि जीिवय और लेखक को एक रं गारं ग काय म म स मािनत कया गया, िजसम मु यमं ी और धानमं ी दोन ने ही िशरकत क । इस समारोह म स मािनत होने वाले प कार और उप यासकार खुशवंत संह ने संतोषपूवक कहा क ‘एक व म अलग-थलग पड़ चुके इस समुदाय ने अब फर से अपना आ मगौरव ा कर िलया है और रा िनमाण म अ णी भूिमका िनभाने के िलए तैयार हो गया है।’62 हालां क देश को और इस समुदाय को इसके िलए इसक भारी क मत चुकानी पड़ी थी। एक अनुमान के मुतािबक पंजाब म अशांित के दौर म 1981 से 1993 के बीच 20,000 से यादा लोग मारे गए, िजनम 1,714 पुिलस के जवान, 7,946 आतंकवादी और 11,690 आमलोग शािमल थे।63 फरवरी, 2005 म मने पंजाब का दौरा कया। यह तीन दशक म मेरी पहली पंजाब या ा थी। उस समय तक िसख समुदाय से ता लुक रखने वाला एक ि , भारत का धानमं ी बन चुका था। चीफ आॅफ द आम टाफ और योजना आयोग के उपा य के पद पर भी एक िसख ही बैठा था। यह त य क िसख समुदाय के लोग देश के अहम पद पर बैठे थे, इस बात का सबसे बड़ा संकेत था क हंद ु तान का कामयाबीपूवक पंजाब के साथ सामंज य हो गया है। उस रा य से गुजरते ए मुझे खुद ही ऐसा महसूस नह आ क कभी यह रा य आतंकवाद का भी गवाह रहा है। मुझे ऐसा नह लगा क यहां कभी उथल-पुथल भी रही होगी। वो सारी तकलीफ आतंकवाद के साथ ही ख म हो गई। रा य म नए िनवेश हो रहे थे। यह इस बात के संकेत थे क चीज थािय व क तरफ बढ़ रही ह। हरे क जगह नए कू ल, नए काॅलेज, कारखाने और यहां तक क शानदार ‘हे रटेज िवलेज’ भी हाइवे के कनारे खुल रहे थे। उस हे रटेज िवलेज म पारं प रक पंजाबी खाना पेश कया जा रहा था और पंजाबी लोकगीत क धुन सुनाई दे रही थी। मने कार से पूरे पंजाब क या ा क । म प टयाला से लेकर अमृतसर तक घूमा। वाभािवक प से मेरा अंितम पड़ाव वणमं दर ही था। मं दर म अपूव शांित ा थी जैसी पूजा थल पर होनी चािहए। मं दर प रसर शानदार तरीके से साफ-सुथरा था और अनुशासनब ालु क कतार दख रही थ । लोग क आंख भि म डू बी ई थ और सोने के महान गुंबद से मधुर संगीत सुनाई दे रहा था। जब मने वणमं दर के मु य वेश ार के ऊपर ि थत िसख इितहास के सं हालय म वेश कया तभी मुझे याद आया क हमारी अपनी याददा त म यही वो जगह है, जहां ब त खून-खराबा आ था। सं हालय के कई कमरे िसलिसलेवार ढंग से आपको आगे ले जाते ह। उनम वो अनमोल िच रखे ए ह जो इितहास के कई युग म िसख के बिलदान को दशाते ह। ब त सारे शहीद के िच इसक दीवार पर लगे ए ह, िजसम से आखरी िच सतवंत संह, बेअंत संह और के हर संह का है। उसके नीचे िवखंिडत अव था म अकालत त क त वीर है, िजस पर िलखा है क यह इं दरा गांधी ारा उठाया गया एक ‘सुिनयोिजत कदम’ था। उसके साथ ये भी िलखा है क ‘सेना क कारवाई म बेकसूर लोग मारे गए, ले कन िसख ने अपना बदला ले िलया।’ हालां क कस श ल म यह बदला िलया गया ये बात श द म नह िलखी गई है, ले कन सतवंत, बेअंत और के हर संह क त वीर के ज रए इसे साफतौर पर कया गया है। इं दरा गांधी के ह यार को इतने स मािनत प म देखना मेरे िलए काफ असहज था। हालां क सं हालय के िनचले तल पर, मं दर म ही कई ऐसे भी संकेत थे, जो बता रहे थे क िसख समुदाय के लोग भारत सरकार के साथ सहज हो गए ह। एक हंद ू कनल ने एक संगमरमर का िशलाप मं दर को अ पत कया था। उस कनल ने इस पिव शहर क कृ त याद म ऐसा कया था, िजसने उसे और उसके सहयोिगय को यहां उनक तैनाती के व सुर ा मुहय ै ा कराई थी। दूसरा िशलाप और भी अथपूण था। यह एक िसख कनल ारा लगाया गया था, िजसने क मीर घाटी म ‘सफलतापूवक अपनी सेवा के दो साल पूरे’ कर िलए थे। 10 दंगे भीड़ क भाषा िसफ जनता के िवचार क अिभ ि है, जो संयम और दखावे से रिहत होती है। ह ा आरन I अ टू बर, 1952 म रा ीय वयंसेवक संघ के मुख का अं ेजी ेस म एक ह ता रत लेख कािशत आ जो कभी-कभार ही कािशत होता था। एम.एस. गोलवलकर ने इस बात पर जोर दया क ‘अपनी जड़ से कटकर कोई देश अपना पुन नमाण नह कर सकता।’ उ ह ने िलखा क इसिलए यह ज री है क हम अपने मौिलक िवचार और मू य को फर से जंदा कर और उन तमाम िच और तीक को ख म कर द, जो हम हमारे अतीत क गुलामी और अपमान क याद दलाते ह। यह हमारी ाथिमकता होनी चािहए क हम अपने आपको पिव तम मौिलक प म देख। हमारा वतमान और भिव य हमारे व णम अतीत के साथ पूण प से ए यब होना चािहए। उस टू टी ई कड़ी को फर से जोड़ने क ज रत है। वही एक ऐसी चीज है जो नए भारत के युवा को अपने देशवािसय के ित सेवा और समपण क भावना से काम करने को े रत करे गा। रा ीय एकता के िलए इससे बड़ा आ नान कोई नह हो सकता क हम अपनी मातृभूिम के गौरव और ित ा के िलए बिलदान देने को सदैव त पर रह। वही रा भि का सबसे उ तम व प है। इस तरह के सामा यीकृ त प से पेश कए गए आदश को या व प दया जा सकता है या उसका या मतलब िनकाला जा सकता है? वे कौन से खास मु े थे जो युवा को अपना सव व बिलदान करने के िलए े रत कर पाते? आरएसएस मुख क राय म हमारे रा ीय जीवन म इस तरह के स मान का तीक गौमाता क र ा के अलावा कु छ भी नह है, जो हमारी धरती माता का जीता-जागता व प है और हमारे समपण और पूजा क एकमा अिधका रणी है। इसिलए आगे से हमारे इस खास स मान के तीक पर हमले को रोकने के िलए और मातृभूिम के ित समपण क भावना पैदा करने के िलए वराज के अंतगत गौह या पर ितबंध हमारे रा ीय पुनजागरण क महती ाथिमकता होनी चािहए।1 गु गोलवलकर और उनके संघ क राय म भारत एक ‘ हंद’ू रा था। ले कन हंद ू खुद ही कई जाितय , पंथ , भाषा और े म िवभािजत थे। सन् 1925 म अपने थापना काल से ही संघ का उ े य हंद ू समाज को एक मजबूत और सुसंगत तरीके से लड़ाकू शि के प म प रव तत करना था। इसके सद य और संगठन के िलए धा मक भावनाएं, राजनीितक उ े य के साथ जुड़ी ई थ । गाय के ित गोलवलकर क ि गत ा पर शक नह कया जा सकता फर भी गौह या पर ितबंध को रा ीय ाथिमकता बनाने संबंधी उनका आ वान कसी िवराट उ े य के ित सम पत था और वह उ े य था पूरे हंद ू समाज को एकताब करना। गाय पूरे हंद ु तान म पाई जाती है और हंद ू भी पूरे देश म फै ले ए ह। हंद ू गाय क पूजा करते ह जब क मुसलमान और ईसाई गाय को काटते और खाते ह। इसी तक के आधार पर आरएसएस एक रा ापी अिभयान क शु आत करना चाहता था। गोलवलकर के लेख छपने के चौदह साल बाद एक भारी भीड़ ने गौह या पर ितबंध क मांग के साथ संसद भवन क तरफ अिभयान कया। यह उस अिभयान का िशखर बंद ु था, उसके बाद वह अिभयान धीमा पड़ गया। हालां क इस अिभयान के चरम पर भी इसम भाग लेने वाले मु यतः हंद ू साधू-संत और आरएसएस कायकता ही थे। यह अिभयान आम जनमानस म कभी भी अपनी पैठ नह बना पाया जैसा क इसके संचालक ने उ मीद क थी। हालां क सन् 1980 के दशक म एक छोटे से शहर म एक छोटे से धा मक थल ने वो काम ज र कर दया, जो वह पिव जानवर नह कर पाया था। अयो या म एक मि जद क जगह एक मं दर िनमाण के चार अिभयान ने लोग को ापक प से आंदोिलत कर दया। देशभर म ब त सारे हंद ू जो अलग-अलग जाितय से ता लुक रखते थे उ ह ने इसे ‘अपने रा ीय जीवन म एक स मान के बंद’ु के तौर पर देखना शु कर दया। उन लोग क राय म अयो या म बाबरी मि जद वाकई उनके ‘अतीत क गुलामी और अपमान क तीक थी।’ उस जगह पर एक भ राम मं दर का िनमाण करना हजार हंद ू युवा के जीवन म ‘समपण और पूजा का एकमा उ े य बन गया।’ यह एक खास उ े य के िलए ऊजा का ऐसा फु टीकरण था िजसक क पना गोलवलकर ने भी नह क थी। अगर वे जंदा होते तो उ ह ज र आ य होता और वे ज र इससे स होते। II जनसंघ क उ रािधकारी बीजेपी को सन् 84 म ए आठव आमचुनाव म महज दो सीट पर जीत हािसल ई थी। ले कन पांच साल बाद यह आंकड़ा 86 सीट का हो गया। इसक एक मुख वजह उसका अयो या आंदोलन म शािमल होना था। कां ेस को स ा से बाहर रखने के िलए बीजेपी ने वी.पी. संह के नेतृ व वाली रा ीय मोचा सरकार को बाहर से समथन दया। हालां क सरकार ारा मंडल कमीशन रपोट को लागू कए जाने के फै सले ने पाट को असमंजस म डाल दया। कु छ नेता क राय म यह हंद ू समाज को िवभािजत करने का एक ष ं था। दूसरे कई नेता क राय थी क िपछड़े वग के िलए सकारा मक कदम क शु आत उनक आकां ा को पूरा करने के िलए एक आव यक कदम थी। पाट और आरएसएस क शाखा म इस पर आ ामक बहस ई क मंडल आयोग क रपोट का समथन कया जाए या नह । ले कन इस िवषय पर एक खास ख अि तयार करने क बजाय बीजेपी ने राजनीितक बहस को दूसरी तरफ मोड़ने का यास कया। पाट ने मंडल और जाित क बजाय धम और मं दर-मि जद के सवाल को उठाने का फै सला कया। पाट ने गुजरात के ाचीन शहर सोमनाथ से लेकर अयो या तक एक रथया ा क शु आत क घोषणा क । उस अिभयान का नेतृ व लालकृ ण आडवानी ने कया जो एक स तिमजाज और ती ण नेता थे, िजनके चेहरे पर ब त कम मु कु राहट देखने को िमलती थी। उ ह अपने सहयोगी अटल िबहारी वाजपेयी क तुलना म याटा ‘क र’ माना जाता था। उनक रथया ा का इं तजाम एक टोयोटा गाड़ी म कया गया, िजसे रथ का आकार दया गया। रथया ा को रा ते म जगह-जगह जनसभा को संबोिधत करते ए आगे बढ़ाने क योजना बनाई गई। 25 िसतंबर, 1990 से शु होकर पांच स ाह बाद आडवाणी क रथया ा क योजना अयो या प च ं ने क थी। इस म म उनका रथ आठ रा य से होकर करीब 6000 मील क दूरी तय करता। िव हंद ू प रषद (िविहप) के अितवा दय ने उस रथ को हरी झंडी दखाई और वे शहर-दर-शहर इसके वागत म जुट गए। जनसभा म उनके साथ भगवा व धारी साधु-संत होते िजनके गले म पूजा क माला, उनक लंबी दाि़ढया और उनके भ म (भभूत) लगाए ललाट उन सश नौजवान के बर श एक भावशाली दृ य पैदा करते जो इन जनसभा म बड़ी तादाद म मौजूद होते थे। उस अिभयान का मनोिव ान पूरी तरह से ‘धा मक, तीका मक, उ पंथी, पौ ष से ओत ोत और मुि लम-िवरोधी’ था। इस बात क अिभ ि आडवाणी के भाषण म साफतौर पर ई, िज ह ने सरकार पर मुि लम अ पसं यक के ‘तु ीकरण’ और ‘छर्- ◌ंधमिनरपे ’ नीितय को बढ़ावा देने का आरोप लगाया िजससे हंद ू ब सं यक क यायपूण आकां ा क उपे ा हो रही थी। अयो या म राम मं दर के िनमाण को इन आकां ा और िहत क पू त के िलए एक तीका मक कदम के तौर पर पेश कया गया।2 उ र-पि म भारत म आडवाणी क यह रथया ा वी.पी. संह सरकार के िलए एक बड़ा िसरदद सािबत ई। य क इस अिभयान ने ‘धा मक भावना को उकसाने का खतरा पेश कर दया िजसे नजरअंदाज नह कया जा सकता था। इससे पूरे देश म अ व था, दंगे और मि जद के अि त व पर खतरा मंडराने लगा। ले कन इसे रोकने के गंभीर नतीजे िनकल सकते थे। ऐसा करके वी.पी. संह िसफ भगवान राम के िवरोधी ही करार नह कर दए जाते बि क उनक अपनी गठबंधन सरकार का वजूद भी खतरे म पड़ जाता और गंभीर अ व था फै ल जाती।’3 आिखरकार, रथया ा द ली प च ं गई, जहां आडवाणी कई दन तक के रहे और सरकार को उ ह िगर तार करने क चुनौती देते रहे। ले कन सरकार ने उस चुनौती को नजरअंदाज करना उिचत समझा और या ा फर शु हो गई। हालां क अपने अंितम मुकाम पर प च ं ने से एक स ाह पहले रथया ा को रोक दया गया और आडवाणी को एहितयातन िहरासत म ले िलया गया। उस िगर तारी का आदेश िबहार के मु यमं ी लालू साद यादव ारा दया गया, जहां से रथया ा गुजर रही थी। इधर आडवाणी िबहार सरकार क एक अितिथशाला म बंद थे, उधर उनके समथक अयो या क तरफ अिभयान कर रहे थे। हजार क सं या म कारसेवक पूरे देशभर से अयो या क तरफ कू च कर रहे थे। अपने िबहारी समक क तरह ही और उ ह के जाितसूचक उपनाम वाले उ र देश के मु यमं ी मुलायम संह यादव बीजेपी के क र िवरोधी थे। उ ह ने रा य के बाहर से आने वाले लोग क िगर तारी का आदेश दे दया। करीब 150,000 कारसेवक को िहरासत म ले िलया गया ले कन उससे आधे के करीब अयो या प च ं ने म कामयाब हो गए। अयो या म सुर ाबल के बीस हजार जवान पहले से ही तैनात थे, िजनम कु छ िनयिमत पुिलस के जवान थे जब क दूसरे बीएसएफ जैसे अध-सैिनक बल से थे। 30 अ टू बर क सुबह को कारसेवक क एक भारी भीड़ सरयू नदी के पुल पर देखी गई, जो अयो या के पुराने शहर को नए शहर से अलग करती थी। वयंसेवक ने पुिलस का घेरा तोड़ डाला और मि जद क ओर तेजी से बढ़ चले। वहां उनका सामना बीएसएफ द त से आ। कु छ कारसेवक उनको भी चकमा देने म कामयाब हो गए और मि जद तक प च ं गए। एक ने उस ढांचे पर भगवा झंडा लहरा दया तो अ य कई लोग ने उस पर कु हाड़ी और हथौड़ से हमला कया। उस उ मादी भीड़ के हमले को रोकने के िलए बीएसएफ के जवान ने पहले आंसू गैस और फर बाद म गोिलय का इ तेमाल कया। कारसेवक को तंग गिलय म और मं दर के प रसर म खदेड़ा गया। उनम से कु छ ने ला ठय और प थर से मुकाबला कया। कारसेवक को उ ेिजत थानीय लोग ने समथन कया और उ ह ने घर क छत से पुिलस पर देसी हिथयार और प थर से हमला कया।4 सुर ाबल और वयंसेवक के बीच पूरे तीन दन तक लड़ाई चलती रही। आिखरकार इस लड़ाई म 20 कारसेवक मारे गए। उनक लाश को िविहप कायकता ारा एकि त कया गया और उनका अंितम सं कार कया गया। उनक अि थय को कलश म जमा कया गया और उसे पूरे उ र भारत के शहर और क ब म ले जाया गया। जहां-जहां ये अि थ कलश गए लोग क भावनाएं भड़कती ग । हंद ु से अपील क गई क वे अपने धम पर कु बान होने वाले ‘शहीद ’ के खून का बदला ल। उ र देश तो मानो दंग से दहल उठा। हंद ु क उ मादी भीड़ ने मुि लम बि तय पर हमला करना शु कर दया। ये हमले कु छ-कु छ उसी तरह के थे जैसे मु क के बंटवारे के व ए थे। रे लगाि़डय को सरे आम रा ते म रोक दया जाता और चुन-चुनकर मुसलमान क ह या कर दी जाती। कु छ जगह पर पीि़डत ने जवाब देना शु कया ले कन उ ह पीएसी ( ांतीय सश बल) के जवान ने दबा दया, जो पहले से ही अपने अ पसं यक िवरोधी ख के िलए कु यात थी।5 जैसा क एक पयपे क ने कहा क लालकृ ण आडवाणी क रथया ा व तुतः एक र या ा म त दील हो गई।6 III रथया ा के नतीज के िशकार होने वाल म से एक धानमं ी वी.पी. संह भी थे। नवंबर, 1990 म उ ह बीजेपी ारा समथन वापस ले िलए जाने क वजह से इ तीफा देना पड़ा य क उनक गठबंधन सरकार अ पमत म आ गई थी। जैसा सन् 1979 म आ था - जब मोरारजी देसाई को इ तीफा देना पड़ा था - कां ेस ने इस बार भी एक कमजोर आधार पर खड़े धानमं ी को (इस बार यह िज मा चं शेखर ने संभाला) समथन दया और वे म याविध चुनाव क तैयारी करने लगे, जो 1991 क ग मय म आ। उस चुनाव अिभयान के बीच म ही तिमलनाडु के एक शहर म राजीव गांधी क ह या कर दी गई। ह या करने वाली मिहला उस िव फोट म खुद भी मारी गई। बाद म पता चला क वह िलबरे शन टाइगस आॅफ तिमल ईलम क सद य थी। राजीव गांधी पर हमला एक बदले क कारवाई था य क िल े ने राजीव गांधी को उनके ारा ीलंका म शांित सेना भेजे जाने को लेकर माफ नह कया था। राजीव गांधी क ह या के बावजूद चुनाव अपने िनधा रत समय पर ही करवाए गए। उससे पहले चुनाव िवशेष ने एक ि शंकु संसद क भिव यवाणी क थी, िजसम कसी भी पाट को ब मत ना िमलने क संभावना जताई गई थी। ले कन राजीव गांधी क ह या के बाद उमड़ी सहानुभूित लहर म कां ेस 244 सीट जीतने म कामयाब रही। िनदलीय सांसद क सहायता से कां ेस सरकार बनाने क ि थित म प च ं गई। आं देश से कां ेस के व र नेता पी.वी. नरिस हा राव िज ह ने राजीव गांधी कै िबनेट म मह वपूण िज मेदा रयां संभाली थ , को धानमं ी पद क शपथ दलाई गई। सन् 1991 म ए लोकसभा चुनाव म बीजेपी को 120 सीट पर जीत हािसल ई, जो क उसक िपछली सं या से 35 यादा थी। इसने उ र देश म ए िवधानसभा चुनाव म भी जीत हािसल क । अब पाट उ र भारत के चार रा य म स ा म थी (म य देश, राज थान और िहमाचल देश अ य तीन रा य थे)। जािहर तौर पर अब पाट को राम मं दर अिभयान का राजनीितक फायदा िमल रहा था। दंगे बड़े ही भावशाली प से मत म त दील हो रहे थे। ले कन साथ ही साथ इन चुनावी कामयािबय ने पाट को पहचान के संकट क तरफ भी धके ल दया। सवाल ये था क या बीजेपी एक राजनीितक दल था या एक सामािजक आंदोलन? कु छ नेता क राय थी क पाट को अब मं दर-मि जद के िववाद को कनारे कर देना चािहए और इसके बदले इसे आ थक और िवदेश नीित के ापक िवषय को उठाना चािहए ता क इसका फै लाव दि ण भारत म भी हो सके । दूसरी तरफ िविहप और आरएसएस चाहते थे क अयो या म िववा दत थल के मु े पर यान क त रखा जाना चािहए। अ टू बर, 1991 म उ ह ने मि जद के चार तरफ क जमीन का अिध हण कर िलया और जमीन को समतल बनाने म जुट गए। इस तरह से वे मं दर िनमाण क अपनी कोिशश म जुट गए। जुलाई 1992 म क सरकार के एक दल ने हालात का जायजा लेने के िलए िववा दत थल का दौरा कया। उ ह ने पाया क ‘िववा दत थल पर बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ क गई है’ और ‘बड़े कं ट के चबूतरे का िनमाण’ कया जा रहा है। ये दोन ही गितिविधयां अदालत के उस आदेश के िखलाफ थ , िजसम उस थल पर यथाि थत बनाए रखने को कहा गया था। उ ह िनराशा तब ई जब आरएसएस समथक (और उसके सद य रहे) क याण संह के नेतृ व वाली उ र देश सरकार इन गितिविधय के ित आंख मुंदे ए थी। कु ल िमलाकर अयो या म ‘साफतौर पर कानून क धि यां उड़ाई जा रही थ ।’ इस बात से क प रि थितयां बेकाबू हो सकती ह, नई द ली म गृहमं लय ने उ र देश म रा पित शासन लगाने और मि जद-मं दर प रसर को क ीय सरकार के अधीन लाने क एक आपात योजना बनाई। हालां क धानमं ी राव अभी भी उ मीद कर रहे थे क सम या का समाधान बातचीत के ारा हो जाएगा। उनक िव हंद ू प रषद के नेता के साथ कई बैठक । ऐसी ही बैठक उनक िविहप के इस अिभयान क िवरोधी बाबरी मि जद ए शन कमेटी के नेता से भी ई। इस िवषय को सु ीम कोट म ले जाने के िवषय म भी चचा क गई।7 इस बीच िव हंद ू प रषद (िविहप) ने घोषणा क क 6 दसंबर को उस ‘शुभ’ दन के प म चुना गया है, जब मं दर का िनमाण-काय शु कया जाएगा। नवंबर के म य से पूरे देशभर से वयंसेवक का जमावड़ा अयो या क तरफ जाने लगा। वे इस बात से उ सािहत थे क अब रा य सरकार बीजेपी के हाथ म है। उ र देश के मु यमं ी क याण संह को नई द ली तलब कया गया। नरिस हा राव ने उनसे आ ह कया क इस मामले को सु ीम कोट के ारा हल हो जाने द। क याण संह ने धानमं ी से कहा क ‘अयो या िववाद का एक ही सवमा य हल है और वो हल ये है क िववा दत ढांचे क जमीन हंद ु को स प दी जाए।’8 क याण संह ने अपने शासन को िनदश दया था क रा य से और रा य के बाहर से आने वाले हजार वयंसेवक के खाने और ठहरने क व था क जाए। इतने बड़े पैमाने पर लोग के अयो या म जमा होने क सूचना ने क ीय गृहमं लय को सकते म ला दया। उ ह ने एक नई आपातकालीन योजना बनाई, िजसके तहत अधसैिनक बल के 20,000 जवान को अयो या भेजा जाना था। महीने के अंत तक उन 20,000 जवान को शहर से एक घंटे क दूरी पर िविभ जगह पर तैनात कर दया गया। वे ज रत पड़ने पर वहां जाने के िलए िब कु ल तैयार थे। त कालीन गृहसिचव ने कहा क ‘आजादी के बाद से अब तक कया गया ये सुर ा बल का सबसे बड़ा जमावड़ा था।’9 दूसरी तरफ एक लाख से भी यादा कारसेवक अयो या म दािखल हो चुके थे। उनके पास ‘ि शूल, तीर और धनुष थे।’ नवंबर महीने क आखरी तारीख को द ली म बोलते ए लालकृ ण आडवाणी ने अयो या जाने क घोषणा क और कहा क ‘वे इस बात क गारं टी नह दे सकते क 6 दसंबर को अयो या म या होगा। हम िसफ इतना ही जानते ह क हम कारसेवा करने जा रहे ह।’10 6 तारीख क सुबह को एक प कार ने पाया ‘िववा दत जगह पर मि जद के आसपास लाठी हाथ म िलए पीएसी के जवान और हिथयार के साथ आरएसएस के कायकता जमा थे।’ अयो या के इद-िगद जमा क ीय बल को अयो या म आने को नह कहा गया था। वहां क सुर ा का पूरा िज मा यू.पी. पुिलस और इसके जवान के भरोसे था। िव हंद ू प रषद (िविहप) ने 11.30 बजे ढांचे के सामने बनाए गए एक ऊंचे चबूतरे पर ाथना सभा करने का फै सला कया। ले कन इसी बीच कु छ कारसेवक ने मि जद क तरफ खतरनाक इरादे से बढ़ना शु कर दया। आरएसएस के कायकता और पुिलस ने उ ह रोकने क कोिशश क ले कन उन पर भीड़ ने प थर बरसाना शु कर दया जो क पल-पल यादा उ मादी हो रही थी। भीड़ मि जद क तरफ इशारा करके िच ला रही थी - मं दर यह बनाएंग।े एक दु साहसी नौजवान मि जद के घेराव पर कू दकर चढ़ा और फर मि जद के एक गुंबद पर चढ़ गया। यह मानो उस भीड़ के िलए एक संकेत था, जो िबजली क तेजी से मि जद क ओर बढ़ चली। पुिलस वहां से भाग खड़ी ई और हजार क भीड़ हाथ म कु हाड़ी और लोहे का स रया िलए ए मि जद म घुस गई। दोपहर होते-होते वयंसेवक का जूम पूरे मि जद प रसर पर िनयं ण कर चुका था। उनके हाथ म भगवा वज लहरा रहे थे और वे िवजय के नारे लगा रहे थे। मि जद के गुंबद को िगराने के िलए बड़े-बड़े कांटे फं सा दए गए थे ता क उ ह िगराया जा सके जब क मि जद के आधार को हथौड़ और कु हाि़डय से तोड़ा जा रहा था। दोपहर दो बजे तक मि जद का एक गुंबद धराशायी हो गया िजसके नीचे करीब दजनभर लोग दब गए। उ पंथी भाषणकता सा वी ऋतंभरा नारे लगा रही थी - ‘एक ध ा और दो, बाबरी मि जद तोड़ दो!’ साढ़े तीन बजे तक दूसरा गुंबद भी जम दोज हो गया। उसके एक घंटे बाद तीसरा और आखरी चौथा गुंबद भी जमीन म िमल गया। एक ऐसी इमारत, जो कई शासक और राजवंश का गवाह रही थी और िजसने 400 से भी यादा वसंत देखे थे, वह िसफ एक दोपहरी म जम दोज कर दी गई।11 सवाल ये है क या बाबरी मि जद का िव वंस पहले से ही तय कर िलया गया था? या यह ता िणक भावना और गु से क अिभ ि थी? हालां क उस घटना से बीजेपी के कु छ नेता सकते म ज र आ गए। एक स ाह पहले अपने चेतावनी भरे दए गए भाषण के बावजूद जब लाल कृ ण आडवाणी ने वयंसेवक को उस इमारत क तरफ जाते ए देखा, तो उ ह ने उनसे वापस लौटने क अपील क । जब मि जद के गुंबद िगराए जा रहे थे तो उनक आरएसएस के व र पदािधकारी एस.वी. शेषा और के .एस. सुदशन से बहस भी ई। उनक राय म जब ढांचा िगरा ही दया गया तो आरएसएस और बीजेपी को इसका ेय लेना चािहए। सुदशन ने आडवाणी से कहा क ‘इितहास क परे खा पहले से तय होती है और जो भी कु छ यहां आ है उसे वीकार क िजए।’ आडवाणी ने कहा क ‘इसके बजाय वे इसके िलए सावजिनक प से खेद कट करगे।’12 उसके बाद ई ेसवाता म बीजेपी के व ा ारा जो श द अ सर इ तेमाल म लाया जाता रहा वो ये क घटना ‘दुभा यजनक’ थी। वे जानते थे क कानून ारा शािसत एक लोकतं म देश क मु य िवप ी पाट ारा कए जाने वाले कसी भी अराजकतापूण तोड़फोड़ के काय को सही नह ठहराया जा सकता। 6 तारीख क शाम को द ली म बीजेपी मु यालय म ई ेसवाता म पाट के िवचारक के .आर. मलकानी ने ‘साफ कया क वे चाहते थे क पुराने ढांचे को हटा दया जाए ले कन ऐसा वे कानून के तहत करना चाहते थे। खेद क बात यह थी क ऐसा अिनयिमत तरीके से कया गया।’ इस घटना से बीजेपी को दूर रखने क कोिशश करते ए उ ह ने कहा क िजन कारसेवक ने मि जद पर हमला कया वे संभवतः िशवसेना के समथक थे य क उ ह मराठी बोलते ए सुना गया था।13 ले कन इस आंदोलन म शािमल होने वाले अितवा दय को कोई िहचक नह थी। िव हंद ू प रषद के एक नेता ने गव से कहा क िसतंबर म ही इं जीिनयर को कहा गया था क उस ढांचे क कमजोर जगह को िचि नत कर और वयंसेवक को इसके िलए िशि त कया गया था क मि जद को कै से आसानी से िगराया जाए। उसने एक संवाददाता से पूछा क ‘आप कै से सोचते ह क िबना इस योजना के हम महज छह घंट म ढांचे को िगरा पाते? या आप मानते ह क कारसेवक का एक उ मादी समूह इतने योजनाब तरीके से वहां प च ं पाता?’14 ढांचे को िगराने के तुरंत बाद म ास म बोलते ए िववादा पद ि व रखने वाले अ ण शौरी ने कहा क ‘जहां एक तरफ बीजेपी नेता ने इस घटना से अपने को अलग और दूर रखने क कोिशश क वह भारत के हंद ु ने ढांचे को तोड़ डाला और उस पर क जा कर िलया।’ शौरी ने कहा क अयो या क घटना ने ये दशाया है क ‘ हंद ु को इस बात का एहसास हो गया है क वे इस देश के ब सं यक ह, उनक भावनाएं उन लोग ारा साझा क जा रही ह जो रा य क व था म बैठे ए ह और वे अपनी मज से रा य-स ा को झुका सकते ह।’ शौरी ने उ मीद जािहर क क ‘अयो या क घटना को एक सां कृ ितक पुनजागरण और समझदारी के प म देखा जाना चािहए जो आिखरकार भारत के आम जनजीवन को इस तरह से पुनग ठत कर देगा जो भारत क सां कृ ितक िवरासत के अनुकूल हो।’ कु ल िमलाकर उनके कहने का ल बोलुआव ये था क बाबरी मि जद का िव वंस भारत को हंद ू रा म त दील करने क एक शु आत है या शु आत होनी चािहए।15 हालां क ये िनि त तौर पर नह कहा जा सकता क हंद ू समाज के सभी लोग इन भावना से इ ेफाक रखते थे जैसा क शौरी मानकर चल रहे थे। ले कन उन हंद ु ने िज ह ने 6 दसंबर को मि जद को जम दोज कर दया था, उ ह ने िन य ही भारतीय रा य को अपनी मज के िहसाब से झुका दया था। उनको रोकने लायक सुर ाबल आसपास ही मौजूद था ले कन उन सुर ाबल को ये आदेश कभी नह िमल पाया। नरिस हा राव क सरकार इस बात से चंितत थी क कह उसे हंद-ू िवरोधी घोिषत न कर दया जाए, इसीिलए ‘उसने बाबरी मि जद िव वंस के प म अपे ाकृ त छोटे पाप को हो जाने दया।’ जब घटना घ टत हो गई उस के बाद ही कोई कारवाई क गई। उ र देश सरकार को बखा त कर दया गया और वहां रा पित शासन लगा दया गया।16 IV जब बाबरी मि जद के गुंबद िगराए जा रहे थे, तो उन गुंबद के साथ वे लोग भी नीचे िगर पड़े जो गुंबद पर चढ़े ए थे। इसम पचास से यादा कारसेवक घायल हो गए, िजनम से कु छ क ि थित तो गंभीर थी। कम से कम छह लोग के मरने क खबर आ । घटना के बाद का माहौल काफ खतरनाक हो गया। बीजेपी के मु य नेता जैसा लाल कृ ण आडवाणी और अ य कइय को िहरासत म ले िलया गया। पूरे देश म दंगे शु हो गए। शहर-दर-शहर सां दाियक दंगे फू ट पड़े। ये दंगे दो महीने तक चलते रहे और इनम 2000 से यादा लोग क जान ग । उप व क शु आत अयो या के नजदीक ही हो गई। एक थानीय भावशाली पुजारी ने ये इ छा जािहर क क अयो या को ‘ हंद ु का वे टकन’ बना दया जाए। उस बड़े ल य क पू त के िलए थानीय अ पसं यक का शहर से सफाया करना ज री था। कारसेवक ने मि जद के िव वंस का ज मनाते ए मुि लम घर और बि तय म आग लगा दी। दूसरे शहर म िव हंद ू प रषद के जुलूस के िखलाफ दंगे शु हो गए। कई जगह पर मुसलमान ने बाबरी िव वंस के िखलाफ िवरोध- दशन कया। उ ह ने पुिलस चौ कय पर हमला कया और सरकारी इमारत म आग लगाने क कोिशश क । कभी हंद ु के िवजयो माद क वजह से तो कह मुसलमान के िवरोध- दशन क वजह से इन दंग ने उ र और उ र-पि मी भारत के बड़े िह से को अपनी चपेट म ले िलया। इन दंग म गुजरात म 246, म य देश म 120, असम म 100, उ र देश म 210 और कनाटक से 60 लोग के मरने क खबर आ । उ मादी भीड़ ने िजन हिथयार का इ तेमाल कया था उसम तेजाब, गुलेल, तलवार से लेकर बंदक ू तक का इ तेमाल कया गया। ब को जंदा जला दया गया और मिहला को पुिलस ारा गोली मार दी गई। हंसा क इस महामारी म ‘अमानवीयता क सारी संभव हद पार कर दी ग ।’17 जो शहर सबसे बुरी तरह इन दंग क चपेट म आया, वो हंद ु तान क ापा रक राजधानी बंबई था। 7 दसंबर क सुबह को मोह मद अली रोड क मुि लम ब ती म लोग का सामूिहक गु सा भड़क उठा और हंद ू दुकान पर हमला कया गया। बीजेपी नेता के पुतले जला दए गए। एक मं दर को भी जम दोज कर दया गया। जब पुिलस क एक टु कड़ी वहां आई, तब भी भीड़ पर कोई असर नह आ। वे िच ला रहे थे - जब अयो या म मि जद िगराई जा रही थी, तो पुिलस वहां चुपचाप खड़ी थी, अब हम इसका बदला तुमसे लगे। पूरे दन और उसके अगले दन पुिलस और भीड़ म लड़ाई होती रही और इसम करीब 60 लोग मारे गए। इसी बीच शहर के उ र म धारावी क झोपड़प य म हंद ू उ मा दय का कहर जारी था। वे अपनी जीत का ज मना रहे थे। बीजेपी और िशवसेना ारा एक ‘िवजय जुलूस’ िनकाला गया, िजसम मुसलमान के घर और दुकान पर हमला कया गया। जवाब म मुसलमान ने एक हंद ू पुजारी को मार दया और मं दर म आग लगा दी। कई अ य जगह पर लोग का गु सा अपने ित ं ी समुदाय के ित नह बि क रा य के िखलाफ फू ट पड़ा। दजन क सं या म सरकारी बस को आग के हवाले कर दया गया या तोड़ दया गया और कम से कम 130 बस टड या उनके कने क जगह का भी यही हाल कया गया।18 9 दसंबर को िशवसेना और बीजेपी ने अयो या म अपने नेता क िगर तारी के िवरोध म बंबई शहर म हड़ताल का आ वान कया। बंबई के एक प कार ने याद करते ए कहा क यह उनके समथक के िलए एक ‘इशारा था क वे तोड़फोड़ शु कर द। उ ह ने मि जद और मुि लम रहाइशी इलाक पर हमला शु कर दया। एक इलाके म तो िशवसेना ने कसी मुसलमान के घर को दखाने के िलए 50,000 पए के इनाम क घोषणा तक कर दी।’19 िशवसैिनक को अपने नेता और संर क बाला साहेब ठाकरे से उकसावा िमल रहा था। 10 दसंबर को पाट के अखबार सामना के एक संपादक य म ठाकरे ने इस बात पर जोर दया क अतीत के कु छ दन से हो रही हंसा क घटनाएं तो महज बदला लेने क एक शु आत भर है। इस युग म िसफ इसी देश का नह बि क पूरी दुिनया का इितहास और भूगोल बदलने वाला है। अखंड हंद ू रा का सपना साकार होने जा रहा है। यहां तक क क रपंथी पािपय (मतलब मुसलमान ) क छाया भी हमारे जमीन से गायब होने वाली है। अब हम खुशी से जंदगी िजएंगे और खुशी से मर पाएंगे। िबना आसूं बहाए कोई भी ांित संभव नह है। कोई भी ांित िसफ एक ही चीज मांगती है, और वो चीज है उसके समथक का खून।20 शहर म क यू लगा दया गया और सेना बुला ली गई। शहर म सामा य ि थित बहाल होने, उपनगरीय रे लसेवा क बहाली और कायालय और कारखान को पहले क तरह खुलने म दस दन लग गए। तीन स ाह तक शांित बहाल रही ले कन जनवरी के शु आत म फर से दंगे भड़क उठे । 5 जनवरी क सुबह को एक मुि लम इलाके म बंदरगाह पर काम करने वाले दो हंद ु को मार डाला गया। इसके कारण का साफसाफ पता नह चल पाया - शायद यह कामगार यूिनयन क आपसी ित िं ता भी हो सकती थी। ले कन हंद ु के मारे जाने क खबर पूरे शहर म फै ल गई, िजससे और हंसा भड़क उठी। धारावी म हंद ु क उ ेिजत भीड़ ने मुसलमान क दुकान और उनके गोदाम लूट िलए। एक दूसरे झोपड़प ी वाले इलाके जोगे री म एक हंद ू प रवार को जलाकर मार डाला गया। एक स ाह तक खून-खराबा चलता रहा और यह आिखरकार तब बंद आ, जब बाल ठाकरे ने सामना के संपादक य म घोषणा क क दंगे को रोक दया जाना चािहए ‘ य क क रपंिथय को सबक िसखा दया गया है।’ हक कत म यह अ पसं यक समुदाय के लोग ही थे, िज ह इन दंग क िविभिषका को झेलना पड़ा था। इन दंग म िजसम करीब 800 लोग मारे गए उनम दो ितहाई सं या मुसलमान क थी जब क शहर म उनक आबादी महज 15 फ सदी ही थी। एक बार फर बंबई अपने पुराने ढर पर लौट आई। इस बार वहां पूरे दो महीने तक शांित बनी रही। ले कन 12 माच 1993 को बम धमाक क एक श नखला ने शहर को दहलाकर रख दया। इनम से एक बम बंबई शेयर बाजार क इमारत के सामने और दूसरे बड़े होटल और काॅरपोरे ट कायालय के सामने या भीतर फटे थे। इन धमाक का इरादा यादा से यादा लोग क जान लेना था य क ये धमाके दोपहर क शु आत म शहर के सबसे तम और समृ इलाक म ए थे। इन धमाक म 300 से यादा लोग क जान गई। इन धमाक म आरडीए स जैसे शि शाली िव फोटक का इ तेमाल कया गया था। ये धमाके दुबई म रहने वाले दो मा फया डाॅन के इशारे पर करवाए गए थे जो जािहर तौर पर उससे पहले ए अपने हम-िबरादर क ह या का बदला लेना चाहते थे। बीते साल म िशवसेना के उदय ने बंबई क उस िसि को ध ा प च ं ाया था, िजसके मुतािबक इसे हंद ु तान का सबसे यादा वैि क और ब सां कृ ितक शहर कहा जाता था। उस छिव को सन् 1992-3 म ए दंग और धमाक ने और भी यादा नुकसान प च ं ाया। अब यह शहर एक ‘ थायी प से प रव तत,’ ‘अंदर तक बंटा आ’ और यहां तक क ‘अपने आपसे लड़ता आ शहर’ बन चुका था।21 बाबरी मि जद िव वंस क घटना वाकई एक शोकाकु ल कर देने वाली घटना थी ले कन जैसा क तंभकार बहराम काॅ टर ने िलखा क ‘संभवतः उससे भी बड़ी दुखांतकारी घटना ये थी क िसफ हंद ु तान का धमिनरपे च र ही भािवत नह आ था, बि क बंबई भी अब एक वैि क शहर नह रह गया था। अब आगे जो भी हो, चाहे रामज मभूिम मु े का समाधान हो जाए या हंद ू और मुसलमान फर से एक दूसरे के साथ रहना सीख जाएं ले कन एक मु , ऊजावान और उ मीद से लबरे ज शहर के प म बंबई क िसि सदा के िलए ख म हो गई जो हंद ु तान के हरे क िह से से हर समुदाय के लोग को अपनी तरफ ख चता था।’22 V सन् 1994 म िविहप नेता अशोक संघल ने ट पणी क क बाबरी मि जद िव वंस क घटना ने ‘वैचा रक ुवीकरण म उ ेरक का काम कया है जो अब पूरी हो चुक है।’23 दो साल के बाद भारतीय जनता पाट को इस घटना से तब फायदा आ जब 11वां आम चुनाव करवाया गया। इसने लोकसभा म 161 सीट जीत ल और सबसे बड़ी पाट बनकर उभरी। कां ेस को दूसरे थान से संतोष करना पड़ा और उसे बीजेपी क तुलना म 21 सीट कम िमली। बेजीपी के व र नेता अटल िबहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के िलए आमंि त कया गया ले कन दो स ाह बाद ब मत जुटा पाने म नाकाम होने पर उ ह इ तीफा देना पड़ा। अगले दो साल तक बीजेपी िवप म बैठी रही जब क नेशनल ं ट के नाम से े ीय पा टय का एक ढीला-ढाला गठबंधन सरकार चलाता रहा। जब सन् 1998 म म याविध चुनाव करवाया गया तो बीजेपी ने अपने दशन म सुधार कया और 182 सीट जीत ल । इस बार छोटे दल और िनदलीय सांसद क सहायता से पाट इस ि थित म आ गई क वो सरकार बना सके । हालां क एक साल के भीतर ही इसने अपनी ि थित को और भी मजबूत बनाने के िलए फर से चुनाव म जाने का फै सला कया। हालां क पाट ने उतनी ही सीट (182) जीत ले कन कां ेस ने अब तक का सबसे बुरा दशन कया। उसे महज 114 सीट ही िमल पाई। बीजेपी के सहयोगी दल के मजबूत दशन ने इसे अगले पांच साल तक कू मत करने का मौका दे दया। इस तरह बीजेपी के अटल िबहारी वाजपेयी देश के पहले गैर-कां ेसी धानमं ी बन गए िज ह ने सबसे लंबे समय तक शासन कया। वे छह साल तक धानमं ी रहे। आजादी के पहले साल म बंटवारे के ज म ने हंद ू दि णपंिथय को मजबूती से थािपत होने और आवाज उठाने का मौका दया था। उस दर यान आरएसएस खासतौर पर स य था। ले कन जब सन् 1952 के चुनाव म जनसंघ को महज तीन सीट पर जीत िमली तो राजनीितक टीकाकार ने उस पाट क ांजिल िलखनी शु कर दी जो एक आधुिनक से यूलर और लोकतांि क रा य म धम के आधार पर राजनीित करना चाहती थी। समाजवादी राजनेता अशोक मेहता ने िलखा था क ‘ हंद ू सं दायवाद दो मौक पर कमजोर सािबत आ है, पहली बार 1946 के चुनाव म और दूसरी बार 1951-2 के चुनाव म।’ वे इस बात के ित आ त थे क ‘अब इसका ेत जमीन म दफन हो गया है।’24 लेखक दंपती ताया और मौ रस िजन कन ने ट पणी क थी क ‘ हंद ू अित सहनशील होते ह।’ वे दोन खुद भी लंबे समय से भारत म रह रहे थे। चुनाव के नतीज ने दखा दया था क ‘ हंद ू सं दायवाद को पूण प से हरा दया गया है’ और वा तव म ‘सं दायवाद नाकामयाब हो गया है और संभवतः यह उसक आखरी हार है।’25 अ य दूसरे पयवे क मसलन क मीरी नेता शेख अ दु ला क राय म ऐसा मु यतः जवाहरलाल नेह क वजह से आ था, िज ह ने भारतीय रा य और यहां क राजनीित को से यूलर राह पर बनाए रखा था। उनक चंता ये थी क नेह के बाद या होगा। नेह क मृ यु के बाद धीरे -धीरे जनसंघ ने भाव बढ़ाना शु कर दया। इसने सन् 1967 के चुनाव म 25 और 1971 के लोकसभा चुनाव म ‘इं दरा लहर’ के बावजूद कमोवेश अपनी सं या को बरकरार रखते ए 22 सीट जीत । बाद म जेपी आंदोलन म इसक भागीदारी, आपातकाल के दौरान इसके नेता क िगर तारी और उन पर ढाये जाने वाले जु म और जनता सरकार म इसके नेता के योगदान ने पाट क उपि थित और इसके कद को काफ बढा दया। हालां क इसके बाद यह फर से लुढ़क गई। भारतीय जनता पाट के नए नाम से इसे सन् 1984 के चुनाव म महज दो सीट पर जीत िमली। यहां तक क अटल िबहारी वाजपेयी जो सन् 1957 से सांसद बनते आ रहे थे, वो भी चुनाव हार गए। एक बार फर से धम के आधार पर क जाने वाली राजनीित क ांजिल िलखी जाने लगी। एक बार फर से ये दावा कया गया क हंद ू इस तरह के कसी भी पूवा ह से मु ह। दो अमे रक राजनीित शाि ाय ने िलखा क ‘भारतीय राजनीित क सबसे उ लेखनीय िवशेषता है इसका सतत क वादी होना।’ भारत क वाभािवक उदारवादी वृि के अलावा भी बीजेपी को यहां जाित और े के आधार पर बंटे मतदाता समूह को वीकार करना पड़ा। इसिलए िन कष म यही कहा गया क ‘एक रा ीय च र वाली पाट के समथन आधार के प म हंद ू ब सं यक का ितिनिध व एक ामक धारणा है।’26 न बे के दशक म घटने वाली घटना ने इन धारणा को ामक बना दया। य क वा तव म इस दशक क सबसे बड़ी घटना हंद ू सं दायवाद का िवकास था जो एक के बाद एक कई चुनाव म बेजीपी ारा जीती गई सीट क बढ़ोतरी के प म दज आ। दलगत राजनीित के औपचा रक मंच से बाहर, जमीनी तर पर भी प रवतन प रलि त हो रहे थे। उ र भारत के शहर और गांव म हंद ु और मुसलमान के बीच का र ता पुनप रभािषत हो रहा था। कभी दोन ही समुदाय के लोग एक ही साथ रहते थे, एक ही साथ कारोबार करते थे, यहां तक क एक ही साथ दो ती करते और खेलते थे। हालां क ये भी सच था क उनम आपसी ित िं ता और संघष भी था। दोन धा मक प से अपने आपको े मानते थे और दोन के ही पास एक दूसरे ारा सताए और दबाए जाने क कई वा तिवक और का पिनक याद थ । ले कन फर साथसाथ रहने क बा यता ने इन दीवार को कमजोर कर दया था और साझा गितिविधय ने दू रयां बढ़ने नह दी थ । ले कन अयो या आंदोलन के बाद ए दंग ने उस अिनि तता को साफतौर पर एक श ुता म त दील करके रख दया। दु मनी और शक हंद-ू मुि लम संबंध को प रभािषत करने वाले मुहावरे (कु छ लोग के मुतािबक एकमा मुहावरे ) बन गए थे।27 सं या म कम और सामा यतया आ थक प से कमजोर मुसलमान को ऐसे तनावयु संबंध से यादा नुकसान होने क आशंका थी। यादातर दंग म हंद ु क तुलना म मुसलमान क जान यादा ग , उ ह के घर यादा जलाए गए। पूरा समुदाय एक गहरी असुर ा क ंिथ का िशकार हो गया। हंद ू क रपंिथय के ताने क उ ह पा क तान चले जाना चािहए, ने उ ह यादा असुरि त और पीि़डत बना दया। सन् 1995 म भारतीय मुसलमान क भावना का इजहार तेलुगु किव खादर मोिहउ ीन के श द म साफतौर पर होता है। वे िलखते ह क एक तरफ हंद ु ारा मुसलमान को यह सोचने के िलए कहा जाता है क मेरा धम एक ष ं है मेरा नमाज पढ़ना एक ष ं ह मेरा चुपचाप रहना एक ष ं है मेरा सोने से जागना एक ष ं है मेरा दो त बनाना एक ष ं है मेरी अनिभ ता, मेरा िपछड़ापन एक ष जब क दूसरी तरफ - ं है इसम कोई ष ं नह है क हंद ु ारा मुझे शरणाथ बना दया जाए िजस मु क म म पैदा आ ं इसम कोई ष ं नह है क उन हवा को जहरीला बना दया जाए िजसम म सांस लेता ं और जहां म रहता ं इसम िन य ही कोई ष ं नह है क मेरे टु कड़े-टु कड़े कर दए जाएं और फर एक अखंड भारत क क पना क जाए। मुसलमान से लगातार पूछा जा रहा था क वे भारत के ित अपनी वामीभि सािबत कर। जैसा क खादर मोिहउ ीन ने पाया क ‘हरे क के ट मैच मेरी देशभि को मापता और उसका वजन करता है।’ जब भारत पा क तान के साथ कोई के ट मैच खेलता था तो मुसलमान से मांग क जाती थी क वे अपने घर के बाहर रा ीय झंडा लहराएं और जोर-जोर से देश के समथन म नारे लगाएं। उस किव के श द म ‘देश के ित मेरे ेम को कभी मत देखो, मह वपूण यह है क दूसरे देश से म कतनी नफरत करता ।ं ’28 दोन समुदाय के बीच ुवीकरण संघ प रवार क एक बड़ी जीत थी। आरएसएस और बीजेपी के साथ इसके सहयोगी अ य संगठन को सामूिहक प से संघ प रवार कहा जाता था। आजादी के पहले पांच दशक तक संघ प रवार क िवचारधारा ब त हद तक ि थर रही थी। मेरी जानकारी म संघ के िवचारधारा क सबसे बेहतरीन तुितकरण डी.आर. गोयल िलिखत संघ के आिधका रक इितहास म देखने को िमलती है। गोयल क ा या के मुतािबक संघ प रवार िजसे ‘ हंद ु व’ कहता है उसका मूल िव ास िन वत है भारत म हंद ू अनंतकाल से रहते आए ह। हंद ू अपने आपम एक रा है य क इस देश म सभी सं कृ ितयां, स यताएं और जीवन के सभी प हंद ु के योगदान से ही बने ह। इस देश म गैर- हंद ू या तो हमलावर रहे ह या फर अितिथ और उनके साथ तब तक एकसमान वहार नह कया जा सकता जब तक क वे हंद ू सं कृ ित और हंद ू परं परा आ द को अपना न ल। गैर- हंद ू खासकर मुसलमान और ईसाई उन सभी चीज के दु मन ह जो हंद ू सं कृ ित म रची-बसी ह और इसिलए उनके साथ एक खतरे क तरह वहार कया जाना चािहए। इस देश क वतं ता और तर , हंद ु क वतं ता और तर है। भारत का इितहास िवदेिशय के हमले से अपने धम और सं कृ ित क सुर ा और संर ण के िलए अनवरत संघष का इितहास है और वह खतरा अभी भी मौजूद है य क स ा उन लोग के हाथ म है जो ये नह मानते क यह देश एक हंद ू देश है और जो रा ीय एकता क बात उन सभी के िलए करते ह जो इस देश म रहते ह और ऐसा करके वे अ पसं यक मत को ा करना चाहते ह। इसिलए वे ग ार ह। हंद ु क एकता और उनक मजबूती व क ज रत है य क वे चार तरफ से श ु से िघरे ए ह। हंद ु को सश प से पलटवार करने क मता हािसल करनी चािहए य क आ मण ही सबसे बि़ढया सुर ा है। हंद ु म एकता क कमी उनक सारी बीमा रय क जड़ है और संघ का ज म इसी दैवीय उ े य के साथ आ है क वह सभी हंद ु को संग ठत करे ।29 गोयल आगे िलखते ह क ‘िबना कसी िवरोधाभास के भय के ऐसा कहा जा सकता है क अपने अि त व से लेकर आजतक िपछले 74 साल म आरएसएस क शाखा म इससे यादा कु छ नह कहा गया।’ हालां क इसक िवचारधारा अप रव तत रही ले कन समय के साथ आरएसएस के संगठन का फै लाव ब त तेजी से आ। इसक शि और इसके भाव म काफ बढ़ोतरी ई। एक जमाने म यह िसफ पु ष का संगठन आ करता था ले कन अब इसने अलग से एक मिहला शाखा क शु आत क िजसम कू ल जाने वाली लड़ कय और गृहिणय को शािमल होने के िलए ो सािहत कया गया। एक जमाने म यह उ र भारत म ही स य था ले कन अब इसने उन रा य म भी अपनी शाखाएं खोल जहां इसक उपि थित नह थी। हरे क जगह संघ के मूल िवचार को थानीय संदभ के िहसाब से ढाला गया। इस तरह गुजरात म ाचीन सोमनाथ मं दर के पुन नमाण को एक एक कृ त और मुखर हंद ु व क अिभ ि के तौर पर चा रत कया गया। उड़ीसा म संघ ने महान जग ाथ मं दर पर अपना यान क त कया ता क थानीय लोग और अिखल भारतीय हंद ू पहचान के बीच एक पुल बनाया जा सके । आ दवासी इलाक म काम करने पर जोर दया गया ता क आ दवािसय पर ‘ फर से दावा’ कया जा सके और उ ह ‘ फर से हंद ू धम म’ वापस लाया जा सके । उन इलाक म कू ल खोले गए जहां आ दवासी युवा को सं कृ त िसखाना शु कया गया और हंद ू पुराण और दंतकथा से उ ह अवगत कराया जाने लगा। आरएसएस ने ाकृ ितक आपदा के समय काफ क ठन मेहनत क । जब बा रश दगा दे जाती थी तो यह लोग के िलए अनाज का इं तजाम करता और भूकंप आने के बाद इसने लोग के घर बनाए।30 जैसे-जैसे इसका संगठन बढ़ता गया, आरएसएस क िवचारधारा अपनी नई चार रणनीित के तहत पूण अिभ ि पाती गई। एम.एस. गोलवलकर ने सोचा था क गौह या को मु ा बनाकर संघ प रवार रा ापी आंदोलन छेड़ पाएगा। उसक वह रणनीित तो कामयाब नह हो पाई ले कन कां ेस सरकार क अ य भयंकर गलितय ने उसे बैठे-िबठाए कई भावना मक मु े दे दए। जब राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो मामले म सु ीम कोट के फै सले को संसद ारा कानून बनाकर पलट दया और मुि लम क रपंिथय के तु ीकरण का यास कया तो हंद ू क रपंिथय के उन दाव को पहले से भी यादा बल िमल गया (जैसा क डी.आर. गोयल ने पहले ही कहा था)। उन दाव के मुतािबक वे कहते आ रहे थे क ‘मौजूदा शासकवग अ पसं यक वोट पाने के िलए उनका तु ीकरण कर रहा है’ और इसे रोकने के िलए ‘ हंद ु क एकता और मजबूती समय क ज रत है।’ आरएसएस का यह दावा क ‘गैर- हंद ू इस देश म हमलावर या अितिथ ह’ फर से तब सािबत होता लगा जब मुसलमान ने दृढ़तापूवक बाबरी मि जद को उ ह देने से मना कर दया। वह इमारत अपने आपम हंद ू गौरव को अपमािनत करती एक जीता-जागता तीक थी, जो संघ के मुतािबक हंद ु के अतीत क गुलामी का एक िच थी िजससे पूरी तरह मुि नह पाई जा सक थी। ये बात क हंद ु को अपने य े राम के ज म थल पर मं दर िनमाण क इजाजत नह दी जा रही थी संघ के मुतािबक इस बात क त दीक करती थी क ‘ हंद ू लोग चार तरफ से दु मन से िघरे ए ह।’ उसके मुतािबक ऐसे दु मन उन राजनेता क श ल म देश म भी थे जो मुसलमान का तु ीकरण करते थे और देश से बाहर भी दु इ लामी रा पा क तान क श ल म थे, िजसने हंद ु तान के िखलाफ तीन बार लड़ाइयां लड़ी थ । इसिलए राम मं दर बनाने के िलए और उससे भी यादा आमतौर पर अपने समाज क सुर ा करने के िलए हंद ु को ऐसी ‘ मता िवकिसत करनी थी िजससे वे जबद त पलटवार कर सक’ और उस िवचार को साकार कर सक क ‘आ मण ही सबसे बेहतरीन सुर ा है।’ डी.आर. गोयल के संि लेख से जो मुहावरे उ धृत कए ह उसम हम वह मह वपूण पंि जोड़नी चािहए, िजसम कहा गया है क ‘एकता क कमी हंद ू समाज क सभी सम या क जड़ है और संघ का ज म इसी पिव उ े य को पूरा करने के िलए आ है।’ राम मं दर आंदोलन म आरएसएस को अपने सहयोगी अनुषिगक संगठन से काफ मदद िमली। खासकर इसम िव हंद ू प रषद ने जोर-शोर से िह सा िलया, िजसने इसे सबसे पहले उठाया। साथ ही इसम बजरं ग दल (िजसका नामकरण राम के महान वानर भ हनुमान के नाम पर कया गया था) ने भी अहम भूिमका िनभाई। यह उ मादी युवा का एक संगठन था, जो अपने ‘देवता क र ा करने से यादा’ (जैसा हनुमान के बारे म माना जाता है) कसी को भी पीटने के िलए तैयार रहता था जो उसक राह म आ सकता था। आिखर म इसके साथ िशवसेना भी थी, जो य िप एक अलग पाट थी ले कन िजसक िवचारधारा और तौर-तरीके िविहप और बजरं ग दल से भी यादा उ थे। वे मुसलमान को ‘जहरीला सांप’ और ‘ग ार’ बोलते थे और उ ह पा क तान चले जाने क नसीहत दया करते थे।31 अ सी के दशक तक आरएसएस को िसफ पु ष का या उ र भारतीय का संगठन नह कहा जा सकता था, बि क यह अब मिहला समूह तक प च ं चुका था और देश के अ य िह स म भी अपना फै लाव कर चुका था। हालां क ऐसा राम मं दर आंदोलन क वजह से ही संभव हो पाया क बीजेपी ‘ ा ण-बिनया संगठन’ के ठ पे से बाहर िनकलने म कामयाब हो गई, िजसे पहले सं ांत लोग के वच व म िनदिशत और पारं प रक प से िशि त हंद ू जाितय का संगठन माना जाता था। अपने वजूद म आने के पहले साठ साल तक आरएसएस महाराि यन ा णां◌े के नेतृ व म रहा था। पहले के .बी. हेडगेवार, फर एम.एस. गोलवलकर और बाद म बालासाहेब देवरस इसके सरसंघचालक बने थे। उसके बाद माच 1994 म उ र देश से आने वाले एक गैरा ण राज संह को आरएसएस का मुख बनाया गया। यह मंडल आयोग क रपोट के लागू हो जाने के बाद चल रही बहस के सामने झुकने का ही तीक भर नह था बि क अयो या आंदोलन म िपछड़ी जाितय के योगदान को वीकार करने क भी एक कोिशश थी। िशवसेना और िविहप के यादातर कै डर म यमवत जाितय से आते थे और उनम एक अ छी-खासी सं या दिलत क भी थी। े , लंग और सबसे यादा जाितय के बीच अपने आधार को इस तरह से िव तृत करने क कोिशश के ारा संघ ने ‘सभी तरह के वोट बक’ को साधने क कोिशश क । सन् 1985-86 म जब अयो या िववाद अपने शु आती चरण म था तो िविहप नेता इस मु े को ‘साठ करोड़ हंद ु क भावना से जोड़कर देखते थे।’ जैसे-जैसे व बीतता गया, देश क आबादी बढ़ती गई और सम या अनसुलझी बनी रही, इस सं या म वाभािवक बढ़ोतरी ई। ‘साठ करोड़’ हंद ु क सं या बढ़कर ‘स र करोड़’ और यहां तक क ‘अ सी करोड़’ हो गई। जािहर तौर पर यह कसी गव ि से कम नह थी। हक कत तो यह थी क िविहप या आरएसएस हंद ू ब सं यक का ितिनिध व नह करती थी। ले कन हां वे इतने हंद ु क तरफ से ज र बोलती थी, िजसने उनके राजनीितक मंच बीजेपी को संसद म सबसे बड़ी पाट बना दया। न बे के दशक म बीजेपी देश के राजनीितक एजडा को प रभािषत करने क ि थित म आ गई। यह कु छकु छ वैसा ही था जैसी कां ेस क ि थित सन् पचास और साठ के दशक म थी। इस तरह से उ र भारत के एक छोटे से शहर का संपि िववाद रा के जीवन म अ यिधक मह वपूण हो गया। इस तरह आमतौर पर राजनीितक िवमश आ थक िवकास या सामािजक सुधार के मसल क बजाय धा मक पहचान के सवाल से त हो गया। सरकार पर अपनी पकड़ खोने के बाद और संसद म लगातार कम सीट जीतने के बाद कां ेस अब महज बीजेपी ारा शु क गई बहस पर ित या भर दे रही थी। आिखरकार बेचैनी क हालत म कां ेस ने राजीव गांधी क िवधवा सोिनया गांधी को पाट नेतृ व संभालने के िलए आमंि त कया, जो उस समय तक द ली म अपने प रवार के साथ एक अलग-थलग जंदगी जी रही थ । सन् 1998 म पाट क कमान संभालने के बाद सोिनया ने पाट क ‘ हंद ू िवरोधी’ छिव को दूर करने के िलए दनरात मेहनत क । उ ह ने िनयिमत प से मं दर का दौरा कया और महान कुं भ मेले तक म िह सा लेने ग , जो हरे क बारह साल पर लगता है और िजसम गंगा के कनारे इलाहाबाद म करोड़ो हंद ू ान करते ह।32 एक तरफ संघ प रवार ने अयो या िववाद पर अपना यान क त कए रखा तो दूसरी तरफ इसने न बे के दशक म दूसरे तरह के अिभयान म भी िह सा िलया। कई अ य थान िच त कए गए जहां यह आरोप लगाया गया क मुसलमान ने हंद ू पूजा थल पर क जा कर िलया है। ये थान थे मथुरा, बनारस, म य देश म धार और कनाटक के िचकमगलूर िजले म बाबा बूदन क पहाड़ी आ द। इन जगह पर ‘ फर से क जा करने’ के िलए ‘हमलावल ’ के िखलाफ कई अिभयान चलाए गए, िजसम उसे कह कम तो कह यादा कामयाबी िमली। साथ ही साथ ईसाई िमशन रय पर भी हमले कए गए खासकर आ दवासी इलाक म जहां वे यादा स य थे। कई चच म आग लगा दी गई और म य देश और गुजरात जैसे रा य म पाद रय को पीटा गया। एक आॅ ेिलयन िमशनरी को उसके दो बेट समेत उड़ीसा म जंदा जला दया गया। आग लगाने वाले का नाम दारा संह था, िजसे बाद म बजरं ग दल के सद य के तौर पर िच त कया गया।33 भारत म हंद ू ब सं यक थे, फर भी आरएसएस ने इस बात पर जोर दया क उनके वच व को एक तरफ ईसाई धम- चारक ारा चुनौती दी जा रही है तो दूसरी तरफ मुि लम प रवार के बड़े आकार ारा इसे चुनौती दी जा रही है। मुि लम प रवार म यादा सद य होने के िलए उस समाज म ब प ी था को िज मेदार ठहराया गया।34 ये घटनाएं देश के अलग-अलग िह स म हो रही थ । कभी इसक अगुआई आरएसएस करता था, तो कभी इसक शु आत िविहप या िशवसेना ारा क जाती थी। ले कन इस अिभयान म कु छ चीज समान थ । हरे क मामले म धा मक अ पसं यक - या तो मुसलमान या फर ईसाई - को ल य बनाया जाता था और उन पर आरोप लगाया जाता था क वे हंद ू भावना के साथ खेल रहे ह या फर कसी िवदेशी ताकत के इशारे पर ऐसा कर रहे ह। दूसरे को खतरनाक सािबत करना अपनी ताकत को संग ठत करने के िलए एक आव यक शत थी और इस तरह से हंद ू समाज क सामूिहक भावना को ए यब करने क कोिशश क जा रही थी जो स दय से बंटा आ था। आमतौर पर उपयु िवचार म कई बार ब त दुभावना छु पी होती थी। कभी-कभी जो मु े उठाए जाते थे वो डरावने कम मजाक यादा लगते थे। उदाहरण के िलए सन् 2000 क ग मय म आरएसएस मुखप पां च ज य ने आरोप लगाया क हंदी फ म उ ोग के तीन मुख िसतारे (आिमर, शाह ख और सलमान खान) मुसलमान है। प क राय म यह एक छु पा आ ष ं था, िजसके मु य सू धार मा फया डाॅन थे जो इन िसतार क फ म म पैसा लगाते थे और वे ब रा ीय कं पिनयां थी िजनके उ पाद का ये िसतारे िव ापन करते थे! इस ष ं को परािजत करने के िलए पांचज य ने अपने पाठक से अपील क क वे उभरते ए िसतारे ऋितक रोशन का समथन कर जो क खान के वच व के सामने इकलौती हंद ू चुनौती थे!35 VI सामा यतौर पर हंद ु तान के मुसलमान हंद ु क तुलना म गरीब और कम पढ़े-िलखे थे। कु छ मुि लम वसायी ज र थे ले कन हक कत म कोई मुि लम म यवग नह था। वसाय और सरकारी सेवा म उनका ितिनिध व लगातार कम बना रहा। शहर म रहने वाले चालीस फ सदी मुसलमान गरीबी रे खा से नीचे जीवन जी रहे थे और देश के अंद नी िह स म भी उनक ि थित इससे बेहतर नह थी। मुि लम समाज म सा रता क दर रा ीय सा रता क दर से नीचे थी और अ य समुदाय के साथ इस े म ये खाई बढ़ती ही जा रही थी। ब त कम मुि लम लड़ कयां कू ल भेजी जाती थ जब क मुसलमान लड़के मदरस म पढ़ने के िलए भेजे जाते थे, िजसका पुरातन कालीन पा म उ ह आधुिनक बाजार व था म नौकरी पाने के िलए तैयार नह कर रहा था। इसी बीच संघ प रवार क तरफ से िमलने वाले तान ने मुि लम बौि क वग के बीच म एक असुर ा मक या कह क एक कुं ठत मानिसकता को ज म दया। मुि लम युवा ने खासकर धम क तरफ देखना शु कर दया। वे इ लाम क तरफ एक नवीन ितब ता के साथ उसे िवक प के तौर पर देखने लगे, जो उनक गरीबी और बाहरी दुिनया म उन पर हो रहे भेदभाव से मुि दलाता। हालां क धम क तरफ उनका यह झुकाव हमेशा मूक ही नह रहा। टु डट इ लािमक मूवम स आॅफ इं िडया (िसमी) नाम का एक संगठन पनप आया, िजसके नेता ने तक दया क ित ं ी धम क चुनौती को हिथयार क ताकत के बल पर िनपटा जाएगा।36 न बे के दशक म हंद ू क रपंथ के उदय ने पहले से ही असुरि त महसूस कर रहे अ पसं यक वग को और भी सुर ा मक बना दया। हालां क ज मू और क मीर जैसे सीमावत सूबे म ि थित दूसरी थी। यहां के मुि लम ब सं यक ब त तेजी से अपनी आकां ा को धा मक आधार करने लगे थे, िजसका खािमयाजा हंद ू अ पसं यक को भुगतना पड़ रहा था। सन् 1989 म क मीर घाटी म लोकि य िव ोह आ था। वह शु म ज मू-क मीर िलबरे शन ं ट (जेकेएलएफ) ारा शु कया गया था, ले कन सालभर बाद ही जेकेएलएफ ने वो जमीन िहजबुल-मुजािहदीन को स प दी िजनक एक ब -धा मक च र वाले क मीर के ित ितब ता खुद ही िनि त नह थी। आजादी क मांग बड़ी तेजी से िजहाद के आ वान म बदलती जा रही थी। जैसा क िहजबुल कै डर के एक लोकि य नारे ने इसक बानगी पेश क - ‘न गु र ला जंग, न कौमी जंगः अल िजहाद, अल िजहाद।’37 धम क तरफ इस तरह के झुकाव का एक नतीजा ये आ क आतंकवा दय क िनगाह म क मीरी पंिडत संदह े ा पद हो गए। वे हंद ू थे ले कन दूसरे कई मामल म वे अपने मुसलमान भाइय के यादा नजदीक थे। वे एक ही भाषा बोलते थे, एक ही तरह का खाना खाते थे और घाटी क एक ही तरह क िमली-जुली सं कृ ित के उ रािधकारी थे। अतीत के दन म हंद ू और मुसलमान के बीच आ थक ित िं ता रही थी। शेख अ दु ला ने घाटी क कृ िषयो य जमीन पर और वहां के शासन से पंिडत का वच व ख म कर दया था और इस तरह से उ ह नाराज कर दया था। ले कन कमोवेश सामािजक स ाव पूरी तरह कायम था। यहां तक क मु क के बंटवारे के व ए दंगे और मारकाट के दौरान भी क मीर घाटी इन सबसे अछू ती रही थी, िजसक तारीफ खुद महा मा गांधी ने भी क थी। सन् 1989-90 क स दय म य ही िहजबुल ने जेकेएलएफ क जगह ली, क मीरी पंिडत आतंक हमल के िशकार होने लगे। चूं क वे हंद ू थे और िसफ इसी वजह से उ ह रा य का एजट माना गया जो लंबे समय से क मी रय का शोषण करता आ रहा था। सन् 1989-90 के दौरान कई सौ हंद ु को मौत के घाट उतार दया गया और उ ह इस तरह मारा गया क शेष बचे हंद ु के मन म अंदर तक दहशत ा हो गई। एक संवाददाता ने िजसने इन ह या को दज कया, उसने बाद म िलखा क ये औरत और मद पुिलस और आतंकवा दय क गोलीबारी म दुभा यजनक प से नह मरे बि क एक तयशुदा योजना के तहत उनको ल य बनाया गया। ब त सारी मिहला के साथ सामूिहक बला कार कया गया और फर उ ह मार डाला गया। एक मिहला के शरीर को िमल क आरी से दो टु कड़े कर दया गया। पु ष के शरीर पर यातना के िच थे। गला घ टकर ह या, फांसी, अंगिव छेद, आंख क पुतिलय का बाहर आ जाना ये बात असामा य नह रह गई थ । अ सर उनक लाश पर ये िचट िलखकर फक दया जाता था क जो कोई उ ह छू एगा उसका भी यही ह होगा।38 घबराहट म क मीरी पंिडत का प रवार घाटी छोड़कर हंद ू बा य ज मू इलाके क तरफ पलायन करने लगा। ब त सारे लोग तो उससे भी आगे द ली या बंबई भाग गए। एक आंकलन के मुतािबक क मीर घाटी म दो लाख पंिडत रहते थे। सन् 1990 क ग मय तक उनम से आधे वहां से पलायन कर गए। वे शरणाथ िशिवर म रहने लगे, िजनम से कु छ सरकार ारा तो कु छ आरएसएस ारा चलाया जाता था। शु म सरकार और शरणा थय को उ मीद थी क यह पलायन अ थायी है और एक बार घाटी म शांित आ जाए तो वे वापस चले जाएंग।े ले कन वे उन िशिवर म और अ य जगह पर लगातार रहते रहे।39 पूरे न बे के दशक म िजन क मीरी पंिडत ने घाटी म रहने का फै सला कया था उनपर हमले होते रहे। कभी-कभी पूरी ब ती को ही आग के हवाले कर दया जाता। दशक के ख म होते-होते 4,000 से भी कम पंिडत घाटी म रह गए थे, जो स दय से मुि लम समुदाय के अपने क मीरी भाइय के साथ रहते आ रहे थे। अब वे एक दुखद मृित से यादा कु छ नह थे।40 क मीर म बढ़ते आतंकवाद को पा क तान ने स य प से समथन कया। पा क तान क इं टर स वसेज इं टेिलजस (आईएसआई) ने इन आतंकवा दय के िश ण के िलए िशिवर चलाए और उ ह गोला-बा द व इलाके का न शा मुहय ै ा करवाया। आईएसआई क मदद से क मीरी आंदोलनकारी व छंदतापूवक सीमापार करने लगे। वे हंद ु तान म ह या करते, बम फोड़ते फर आराम करने और पनाह लेने पा क तान चले जाते। अब तक थानीय आतंकवा दय के साथ िवदेशी लड़ाके भी जुड़ चुके थे, िजनम अरब, चेचेन और उजबेक लड़ाक क भी काफ सं या थी। इन लड़ाक ने अफगािन तान म सोिवयत संघ क कठपुतली सरकार के िखलाफ लड़ाइयां लड़ी थी। जब वह लड़ाई ख म हो गई और सोिवयत सेना परािजत होकर वापस लौट गई, तो इन आतंकवा दय ने क मीर क मुि के श ल म एक दूसरा धा मक मु ा खोज िलया। न बे के दशक के म य तक िहजबुल के साथ ब त सारे मेहमान मुजािह ीन मैदान म आ चुके थे। ये कई गुट के लोग थे िजनका मु यालय पा क तान म था। वे सभी इ लाम के क रपंथी और कठोर प का पालन करते थे जो पा क तान के ब त सारे मजहबी कू ल म पढ़ाया जाता था। अ सी के दशक म पा क तानी समाज का इ लामीकरण ब त तेजी से आ था। सन् 1947 म पा क तान के ज म के समय मु क म महज 136 मदरसे थे जो क सन् 2000 तक आते-आते 30,000 हो चुके थे। ता रक अली िलखते ह क ये मदरसे ‘क रपंिथय को पैदा करने क सै ांितक नसरी थे।’ पा क तान म अब 58 इ लािमक राजनीितक पा टयां पनप चुक थ और वहां 24 हिथयारबंद मजहबी संगठन थे, जो देश के मदरसा तं से िनकले ए लोग ारा चलाए जा रहे थे।41 पा क तानी समाज के यादा से यादा क रपंथी होते जाने से क मीर क ‘मुि ’ के िलए उनक ितब ता दन पर दन बढ़ती ही गई। मि जद और मदरस के धम पदेशक ने बार-बार क मीर म भारत सरकार के जु म क कहािनय को सुनाकर लोग को िजहाद म शािमल होने के िलए उकसाना जारी रखा। इन भावना म बहकर वहां के नौजवान ल कर-ए-तैयबा जैसे समूह म शािमल होने लगे िजसने तेजी से क मीर घाटी म हिथयारबंद संघष म अपनी िनणायक भूिमका बना ली। उनका ल य क मीर घाटी को पा क तानी रा के साथ एक कृ त करना था और यह महज ‘पा क तान के लोग क ही िज मेदारी नह थी बि क पूरे िबरादराना इ लाम क िज मेदारी थी।’ उनका एक ापक उ े य भारत म गृहयु को बढ़ावा देना भी था। जैसा क ल कर-ए-तैयबा के मुख हा फज मोह मद सईद ने गव ि पूण ढंग से कहा क ‘वे हंद ु तान भर म मुजािह न का नेटवक बना रहे ह’ जो अपनी तैयारी के बाद ‘ हंद ु तान के िवखंडन क या को शु कर दगे।’42 सईद ने एक अमे रक प कार से कहा क ‘बदला लेना हमारा धा मक कत है।’ उसने कहा क ‘हमने अफगािन तान म स जैसी महाशि को परािजत कया है, अब हम हंद ु तान को भी परािजत करगे। हम अ लाह क मदद से लड़ रहे ह और एक बार हम िजहाद शु करगे तो कोई भी ताकत हम रोक नह पाएगी।’ एक पा क तानी संवाददाता से बात करते ए ल कर के मुिखया ने कहा क ‘हमारा संघष क मीर क मुि के बाद भी चलता रहेगा। हम उसके बाद भी हंद ु तान से पूव पा क तान (बंगलादेश) क ित का बदला लेना है।’43 ऐसी श ुता और घृणा शायद उ मीद के मुतािबक ही थी। य क िजहा दय के िलए हंद ु तान का फर और नाि तक का मु क था। ले कन जैस-े जैसे घटनाएं आकार ले रही थ , उनका गु सा उनके हममजहब पर भी जु म ढाने लगा था। अब नेशनल काॅ स के आंदोलनका रय क भी ह याएं क जाने लगी थ , जो भारत के अधीन रहकर वाय ता चाहते थे। वे लोग जेकेएलएफ के सद य को भी मारने लगे थे जो पा क तान म िमलने क बजाय एक ‘ वतं क मीर’ क मांग कर रहे थे। ऐसा ही सलूक पीप स काॅ स के नेता के साथ भी कया जा रहा था जो अ हंसा क बात करते थे।44 क रपंिथय ने लोग के मनोरं जन और उनके आमोद- मोद पर भी रोक लगानी शु कर दी। िसनेमा हाॅल और वीिडयो पालर बंद कर दए गए और शराब और िसगरे ट पीने पर पाबंदी लगा दी गई। आतंकवादी समूह ने इस आशय के पच बांटे क मिहला को सर से लेकर पांव तक अपने आपको बुक म ढंकना होगा। बुका क मीरी परं परा के िवपरीत था, वहां तो मिहलाएं काफ से अपना िसर भी नह ढंकती थ । इसके अलावा एक बुक क क मत भी 2,000 पए थी। कई लोग क राय म दज और कपड़े के ापारी इस तरह के तुगलक फरमान के पीछे थे, िज ह इससे फायदा हो रहा था। इसे लागू करने के िलए कठोर यास कए गए और िजस कसी मिहला ने भी इसके िखलाफ जाने क कोिशश क उस पर तेजाब से हमला कया जाने लगा।45 ले कन क रपंिथय के मु य िनशाने पर थे भारतीय रा य और इसके तीक। शायद ही कोई स ाह बीतता हो जब कसी सैिनक चौक या पुिलस नाके पर आ मघाती हमला न होता हो। उ ह रोकने के िलए घाटी म सेना क सं या बढ़ाई जाती रही। अब ीनगर के हर गली, हर नु ड़ पर सेना के बंकर बन गए थे। क मीर म भारतीय सेना एक ‘बा यकारी और सव ापी श ल’ अि तयार कर चुक थी, बि क कह क वह एक ‘समानांतर’ सरकार ही बन गई थी। इसके िज मे महज कानून और व था क ही िज मेदारी नह थी, बि क अ पताल, हवाईअ ,े बस अ े और पयटक क को संभालने का भी िज मा इसी के पास था। रा य सरकार ने अपनी यादातर िज मेदा रयां इसे स प दी थ । सन् 1995 तक आते-आते या उसके आसपास क मीर म दो सं थाएं काम कर रही थी, िजसम से एक थी भारतीय सेना और दूसरी थी िजहा दय का समूह।46 जैस-े जैसे घाटी एक अिधकृ त (सेना ारा) े बनती गई, आम जनमानस िजहादी उ े य के समथन म आता गया। आतंकवादी आसानी से आम जनता म घुलिमल जाते थे और उ ह उनके बीच अपनी कारवाइय को करने से पहले या बाद म शरण भी िमलती थी। जब बम हमल म भारतीय सेना के जवान मारे जाते थे, तो सेना क कारवाई भीषण हो जाती। सेना के जवान िबना कसी सूचना के सुदरू गांव म छापा मारते और जब उ ह कोई आतंक हाथ नह लगता तो वे गांववाल और कसान को ही पीटने लगते। उस दर यान बड़ी सं या म िहरासत म ई मौत क भी खबर आई। इस कभी न ख म होते दखने वाली लड़ाई का खच साफतौर पर ब त यादा था। सरकारी आंकड़ के मुतािबक जनवरी 1990 से लेकर अग त 2001 तक घाटी म अ ाकृ ितक प से मरने वाले नाग रक क सं या 12,000 थी। इनम से तीन-चौथाई आतंकवा दय के हाथ मरे थे जब क शेष सेना और आतंकवा दय के बीच होने वाली गोलीबारी म मरे थे। सुर ाबल ने दावा कया क उ ह ने 13, 400 आतंकवा दय को मार िगराया है जब क इस दौरान उनके 3,100 जवान शहीद ए थे। घाटी म आबादी के कम घन व को देखते ए यह सं या पूरे देश के तर पर 40 लाख भारतीय के मारे जाने के बराबर थी।47 घाटी भर म ह याएं क जा रही थ , जो खूबसूरत तो थी ले कन धीरे -धीरे वीरान होती जा रही थी। हालां क उनम से यादातर नौजवान क मीरी ही थे, जो इन अभागे दशक म जवान ए थे। प कार मुजािमल जलील जो खुद ही लगभग आतंकवादी बन गया था, उसने जब अपने पैतृक गांव के नजदीक दौरा कया तो उसने पाया क उसके दो त और सहपा ठयां◌े क इ स क वहां मौजूद थ ।48 जैसा क जे स बुचान ने िलखा है क साल 1990 से लेकर - क मीरी मुसलमान और भारतीय सरकार ने क मीरी स यता क ज टलता को ख म करने क सािजश क है। यहां कभी गुलजार रहने वाली दुिनया लु हो गई है। रा य सरकार, राजनीितक वग, कानून का शासन, लगभग पूरी हंद ू आबादी, शराब, िसनेमा, के ट मैच, के सर क या रय के बीच चांदनी रात म िपकिनक, कू ल, यूनीव सटी, आजाद ेस, पयटक, बक सबकु छ ख म हो गए ह। नाग रक वा तिवकता के ख म होते जाने के बीच क मीर का पूरा दृ य पुनप रभािषत हो गया है। िसफ यहां क झील या मुगल गाडन ही नह या फर क मीर क कृ िष, ह तकला और पाककला क मश रयत ही नह बि क दो सं थाएं मि जद और सेना जो िबना कसी म य थ के एक-दूसरे के सामने िवरोधी के प म खड़े ह, वे भी पुनप रभािषत हो गए ह।49 पूरे न बे के दशक म हंद ू क रपंथी शेष भारत म मजबूत हो गए जब क इ लामी क रपंथी क मीर म जड़ जमाते गए। हालां क दोन याएं एक दूसरे से वतं प से हो रही थी ले कन एक ने दूसरे को वैधता और मजबूती ज र दान क । अयो या आंदोलन क वजह से जो भी कोई दंगा होता था, उसे घाटी के मुि लम क रपंथी ये कहकर चा रत करते क भारत हंद ु ारा और हंद ु के िलए शािसत एक देश है। दूसरी तरफ घाटी म एक भी नाग रक या भारतीय सेना के जवान क ह या होती तो आरएसएस ये कहने से नह चूकता क इसम पा क तान का हाथ है, जो भारत म गड़बड़ी फै लाना चाहता है। दो बड़ी घटनाएं ऐसी थ , िजसने इस ित पध क रवा दता को अ छी तरह प रभािषत कया। इनम से एक थी बाबरी मि जद को जम दोज कया जाना और दूसरी थी घाटी से क मीरी पंिडत का पलायन। या ऐसी ि थित म कोई भी ि कसी रा य क ितब ता पर भरोसा कर सकता था, जो एक ाचीन उपासना थल क सुर ा तक नह कर पाया था? या कोई ि कसी रा य क उस ितब ता पर भरोसा कर सकता था जो अलग धम को मानने वाले नाग रक को सुर ा देने म नाकाम रही थी? ये सवाल पूरे उपमहा ीप म गूंजते रहे। इसे अनिगनत ऐसे हंद ु तािनय ने उठाया जो पहले धम और आ था के आधार पर नह सोचते थे। VII जब बाबरी मि जद ढहा दी गई तो हंद ू क रपंिथय ने सोचा क वहां एक भ राम मं दर का िनमाण कया जाए। इसके िलए वा तुिवद को लगाया गया क वे संगमरमर के एक भ मं दर का न शा बनाएं और कारीगर लगाएं जो संगमरमर को काट और तराश सक। हालां क वह जमीन रा य के अिधकार म ही बनी रही। इलाहाबाद हाईकोट और सु ीमकोट म उन मुक म क सुनवाई होती रही क या वहां कभी राम मं दर अि त व म था और ये क या िविहप का उस पुरानी मि जद और उसके आसपास क जमीन पर कानूनी अिधकार है? अदालत से बाहर भी इस सम या के हल िनकलने क कोिशश क जाती रह । कांची के भावशाली शंकराचाय ने बाबरी मि जद ए शन कमेटी से मुलाकात क और उस जमीन के टु कड़े को इस आधार पर स प देने का अनुरोध कया क आगे से मुसलमान से इस तरह क कोई मांग नह क जाएगी। ले कन बीजेपी अयो या म मं दर िनमाण के ित ितब बनी रही। जब यह सन् 1998 म स ा म आई तो इसने कहा क यह मं दर िनमाण के िलए एक रा ीय आम सहमित बनाने का काम करे गी और अगर इसम नाकामयाब रही तो फर कानून का रा ता अि तयार कया जाएगा। धानमं ी अटल िबहारी वाजपेयी ने कहा क ‘भारतीय सं कृ ित म राम का स माननीय थान है’ और दावा कया क ‘पूरा देश राम मं दर का िनमाण होते देखना चाहता है’ ले कन ‘ यही है क इसे कै से और कहां 50 बनाया जाए।’ हालां क िववा दत थल पर यथाि थित बरकरार रही। अदालत सुनवाई म अपना व लेती रही और अदालत से बाहर भी सम या का कोई समाधान नह िनकला। इस बीच िव हंद ू प रषद ने पूरे देशभर से अयो या तक कारसेवक का दौरा आयोिजत करवाया। उ ह ने मं दर िनमाण के िलए धा मक समारोह भी करवाए। इसी तरह का एक य फरवरी, 2002 के अंितम स ाह म करवाया गया, िजसम गुजरात से सैकड़ वयंसेवक ने िह सा िलया। ये कारसेवक जब ेन से वापस अपने घर को लौट रहे थे, तो गोधरा रे लवे टेशन पर कु छ मुि लम फे रीवाल से इनका झगड़ा हो गया। फे रीवाल से कहा गया क वे भगवान राम क शि त म नारे लगाएं और जब उ ह ने ऐसा करने से इं कार कर दया तो उ ह दाढ़ी पकड़कर ख चा गया। ये खबर आसपास के गांव म फै ल गई और पड़ोस से मुि लम नौजवान वहां जमा हो गए। कारसेवक फर से ेन म चढ़ गए, जो चल पड़ी थी। उस पर पथराव शु कर दया गया। हालां क गोधरा से बाहर ेन रोक दी गई य क उसके एक िड बे से आग क लपट उठने लग । उस भयानक आग म 58 लोग जलकर मर गए। गोधरा शहर म सां दाियक दंग का एक लंबा इितहास रहा था। यहां सन् 1949 और फर सन् 1981 म भी दंगे ए थे। साफ है क हंद ु और मुसलमान के बीच अ छा संबंध नह था और अयो या मामले ने इसे और भी िबगाड़ दया था। इस बात म भी कोई शक नह है क टेशन पर घटी घटना कारसेवक ारा शु क गई थी, िजसे उ ह ने मुसलमान वडर पर ताना देने से शु कया था। जो बात साफ नह है वो ये क बाद म जो ेन म आग लगी वो कै से लगी। िविहप ने दावा कया क यह मुसलमान भीड़ का काम था। दूसरी तरफ फाॅरिसक सा य ने बताया क आग अंदर से लगी जो क गैस िसलडर या पैरा फन टोव म दुघटनावश आग लग जाने से फै ल गई।51 यह बात क गोधरा म कारसेवक को जलाकर मार डाला गया है तुरंत पूरे गुजरात म फै ल गई। इसके बदले म हंसा के एक भयानक च क शु आत हो गई। यह बड़ौदा और अहमदाबाद शहर म सबसे भयावह और िवकराल प म देखने को िमली। एक जमाने म अपने समाजसेवी उ ोगपितय , गितशील बुि जीिवय , तकनीक आिव कार और कला के े म िनत नए आयाम थािपत करने के िलए मश र इन दोन शहर ने हाल के साल म आ थक िगरावट का सामना कया था। उसके बाद अंतधा मक संबंध म िगरावट का दौर आया। हंद ू और मुसलमान अब एक दूसरे के साथ ब त कम काम करते या खेलते थे। यह एक ऐसा अलगाव था, जो हाल के साल म सां दाियक झगड़ के प म आ था।52 ले कन अहमदाबाद और बड़ौदा म ये ताजा दंगे अनपेि त प से ू रता क सारी हद पार गए। मुसलमान के घर और उनक दुकान पर हमला कया गया, उनक मि जद को आग के हवाले कर दया गया और उनक कार को तहस-नहस कर दया गया। मुसलमान मिहला के साथ बला कार कया गया और उनके मद क ह याएं क ग । उनके शरीर क होली जलाई गई। अ सर उस भीड़ का नेतृ व िविहप का कोई नेता करता, जब क पुिलस हाथ पर हाथ धरे देखती रहती। उ ह ने तलवार, बंदक ू , पे ोल बम और गैस िसलडर तक का इ तेमाल कया। दंगाइय के हाथ म मतदाता सूिचयां थ , िजससे उ ह पता चलता था क कौन सा घर मुसलमान का है और कौन सा नह । रा य सरकार के मं ी पुिलस िनयं ण क म डेरा डाले ए थे और दंगाइय को िनदश दे रहे थे। पुिलस को ‘िविहप और बजरं ग दल के कायकता को खुली छू ट देने का िनदश दया गया था।’53 बड़ौदा और अहमदाबाद से बाहर यह दंगा छोटे शहर और ामीण इलाक तक म फै ल गया। साबरकांठा िजले म दंगाइय क भीड़ जीप और ै टर पर खुलेआम घूम रही थी और मुि लम संपि य को अपना िनशाना बना रही थी। उनक गितिविधय का सांि यक य आंकड़ा उपल ध हैः ‘कु ल िमलाकर 2,161 मकान, 1,461 दुकान, 304 छोटे वसाय, 71 कारखाने, 38 होटल, 45 धा मक थल और 240 गाि़डय को पूरी तरह तबाह कर दया गया।’54 जो कु छ भी साबरकांठा के बारे म सच था लगभग वही बात पूरे सूबे के बारे म भी सच थी। िविहप ने ये साफ कर दया था क वह सूबे के मुसलमान को गृहिवहीन और उ मीद से िवहीन कर देना चाहती है। इस तरह अहमदाबाद म जब हंसा क लपट कम हो ग तो उसके ह त बाद तक मुसलमान को बक से कज, गैस और फोन का कने शन और अपने ब को कू ल म दािखला दलाने म द त आ रही थी। जो मुसलमान गांव छोड़कर भाग गए थे, उनसे कहा गया क अगर वे वापस लौटना चाहते ह तो उ ह दंगाइय के िखलाफ िशकायत वापस लेनी ह गी। कभी-कभी उ ह इसी शत पर वापस आने दया गया, जब उ ह ने हंद ू धम वीकार कर िलया।55 सन् 2002 म गुजरात दंग के समय वहां के मु यमं ी नर मोदी थे, जो क एक क रपंथी हंद ु ववादी िवचारक थे और िजनका राजनीितक िश ण आरएसएस क आ ामक ित यावादी िवचारधारा तले आ था। अब उ ह ने गुजरात म ई हंसा को ये कहकर यायोिचत ठहरा दया क यह गोधरा म ेन म आग लगाने के ित यावश ई है और इसने ‘ या- ित या क शं◌ृखला’ क शु आत क है। सचाई तो यह थी क ित या मूल या से कई गुना यादा हो चुक थी। इन दंग म 2000 से यादा मुसलमान मारे गए और उससे 50 गुना से भी यादा बेघरबार हो गए, जो शरणाथ िशिवर म रह रहे थे और िजनक दा ण ि थित को खुद धानमं ी और रा पित ने अहसास कया था।56 अं ेजी के श द ‘पो ोम’ को आॅ सफोड इं ि लश िड शनरी ने ‘ कसी खास न लीय समूह के सामूिहक नरसंहार’ के अथ म िलया है। इस प रभाषा के मुतािबक भले ही आजाद भारत म सैकड़ क सं या म अंतधा मक हंसा क घटनाएं ई ह ले कन दो ही नरसंहार इस प रभाषा पर खरे उतरते ह। इसम से एक है सन् 1984 म िसख का नरसंहार और दूसरा सन् 2002 म दि णी गुजरात म आ मुसलमान का नरसंहार। दोन ही दंग म कु छ आ यजनक समानताएं भी ह। दोन ही घटनाएं अ पसं यक वग के सद य ारा कसी एक और िछटपुट हंसा क घटना के तौर पर शु ले कन दोन ही घटना के बाद उस पूरे अ पसं यक वग के िखलाफ एक सामा य तौर पर हंसा शु हो गई। िजन िसख का सन् 1984 म क लेआम कया गया, वे कसी भी तरह से उन िसख से संबंिधत नह थे िज ह ने ीमती गांधी क ह या क थी। उसी तरह गुजरात दंगे म िजन मुसलमान का नरसंहार कया गया वे गोधरा के अपराध म पूरी तरह िनद ष थे (जो वैसे भी एक दुघटना हो सकती थी)। दोन ही मामल म हंसा तभी िवकराल प से संभव हो पाई, जब कानून का शासन सुिनयोिजत तरीके से ठ प कर दया गया। सन् 1984 म धानमं ी ने और सन् 2002 म गुजरात म ऐसे अमया दत बयान जारी कए, िजसने हंसा को यायोिचत ठहराने क कोिशश क । उनक सरकार म काम करने वाले मं ी इस हद तक चले गए क वे दंगाइय को िनदश ही देने लगे। दोन ही दंग म आखरी समानता ब त ही भयावह और चंताजनक थी। दोन पा टय और उनके नेता को इन घटना से जमकर राजनीितक फायदा िमला, िजसे उ ह ने सही ठहराया था और िजसक अगुआई क थी। राजीव गांधी क पाट ने िवराट ब मत के साथ सन् 1984 का चुनाव जीत िलया जब क दसंबर 2002 म ए चुनाव म नर मोदी फर से गुजरात के मु यमं ी चुन िलए गए। उनक पाट को िवधानसभा म दो ितहाई सीट पर जीत िमल गई। VIII ापक प से हंद ू दि णपंिथय के उदय और खासकर अयो या म घ टत घटना ने िहदु तान के भिव य के बारे मे एक बार फर से सवाल खड़ा कर दया। म ास से िनकलने वाले पाि क ं टलाइन ने िलखा क ‘भारत का धमिनरपे ताना-बाना इन घटना से बुरी तरह भािवत आ।’ पाि क ने आगे िलखा क ‘ हंद ु तान अब पहले क तरह कभी नह हो पाएगा।’ य क ‘6 और 7 दसंबर को ई घटना ने हंद ु तान को इस बात का अहसास करा दया क अगर हंद ु ववादी ताकत स ा म आ ग और हंद ू रा वजूद म आ गया तो चीज या श ल अि तयार करगी। यह साफ हो गया क अ पसं यक वग के लोग को सामािजक मेल-जोल क बात तो दूर, जीने का भी कोई अिधकार नह दया जाएगा, अिभ ि क वतं ता ख म कर दी जाएगी और सच वही माना जाएगा जो शासकवग कहेगा।’ कलक ा से िनकलने वाले सा ािहक सनडे ने ट पणी क ‘6 दसंबर 1992 के बाद के स ाह म हंद ु तान शायद पूरी तरह बदल गया।’ स ा के चरमरा जाने और कानून के शासन के ख म हो जाने के बाद भारत ‘पूरी दुिनया क नजर म अ का के अराजक गणरा य क तरफ एक कदम और आगे बढ़ता दखा।’ नई द ली से िनकलने वाले इं िडया टु डे ने िलखा क ‘अयो या म अपने अराजकतापूण वहार क कामयाबी के बाद इन त व ने िसफ लोग क ह याएं नह क ह बि क एक रा और एक ि समूह के प म हमारी आकां ा और उ मीद के महल को भी व त करना शु कर दया है।’57 पि मी ेस ने भी इन चंता से सहमित जािहर क । टाइम पि का ने िलखा क ‘िजस तरह 464 साल पुरानी बाबरी मि जद के तीन गुंबद को जम दोज कया गया उसी तरह धा मक रा वाद के ोध ने भारतीय रा य व था के तीन तंभ -लोकतं , धमिनरपे ता और कानून के शासन को भी जोिखम म डाल दया है।’58 िजस दन मि जद िगराई गई उस दन टाइ स आॅफ लंदन ने एक खबर कािशत क िजसक सुख थी - ‘आतंकवा दय ने मि जद के मलबे तले भाईचारे क उ मीद को दफना दया।’ अगले दन अखबार ने लेबर पाट के नेता जैक ा को उ धृत कया, जो बंबई के दौरे पर थे। ा क राय थी क भारत ‘धा मक झगड़े म बुरी तरह उलझ सकता है।’ अखबार के उसी अंक म एक आइ रश बुि जीवी काॅनर ू ज ओ ीन का लेख मुखता से कािशत कया गया, िजसम उ ह ने कहा क ‘एक धमिनरपे रा के प म भारत का इितहास ख म होता तीत होता है।’ ओ ीन ने उ मीद क क भारत से मुसलमान का पा क तान क तरफ ापक पलायन हो जाएगा और पढ़े-िलखे हंद ू यूरोप और उ री अमे रका चले जाएंग।े 59 ये त कािलक या यूं कह क रटी-रटाई ित याएं थ जो उ ेिजत प कार और पेशेवर िनराशावा दय ारा क गई थ (उससे पहले ओ ीन ने भिव यवाणी क थी क ब लन क दीवार के िगरने से जमनी म फर से िहटलर के मत को मानने वाले लोग और उसक िवचारधारा जीिवत हो जाएगी)। ले कन दूरगामी दृि रखने वाले िव ान ने भी इस तरह क आशंका क । एक ि टश लेखक, िजसने भारतीय उपमहा ीप के बारे म कई लोकि य पु तक िलखी थ , ने ट पणी क क ‘जो भी लोग उस देश के बारे म चंता करते ह उ ह उस देश के धमिनरपे लोकतं के बारे म चंता करनी चािहए।’60 एक अमे रक िव ान िजसने अपनी पूरी जंदगी भारत पर अ ययन म िबता दी थी, उसने तो संघ प रवार क तुलना नािजय तक से कर दी। पाॅल ास नाम के िव ान ने िलखा क ‘यह समझ लेना चािहए क भारतीय समाज और राजनीित ब त सारे उन पूव-फािस ट समय के हंसक ल ण को द शत कर रही है, िज ह ने अनिगनत शहर म थानीय प से अपने ‘ टलना त’ (िहटलर के समय म नाजी ठकाने, जो य दय पर हमला करने के िलए बनाए गए थे) बना िलए ह।’ ास क राय थी क ‘ हंसा म बढ़ोतरी, अराजकता और थानीय तर पर अ व था’ से क ीय सरकार को (उस समय क म कां ेस का शासन था) ‘ फर से तानाशाही भरा ख अपनाने के िलए ो साहन िमल सकता है।’ इस तरह भारतीय ‘रा य व था फर से धमिनरपे मौका वा दय और क रपंथी रा वा दय के संघष क वजह से िबखर सकती थी, जो समान प से िम या धारणा, ब िपए च र और रा ीय एकता और महानता के उन तीक और नकलीपन से भािवत थे जो 20व सदी के सभी तानाशाही व था म पाई जाती ह।’61 इस पु तक को िलखते व (सन् 2007) तक ये भयावह भिव यवािणयां सच नह ई थ । वहा रक प से नह तो कम से कम सै ांितक तौर पर ही सही भारत एक धमिनरपे रा य ज र बना रहा। कानून का शासन भले ही वैसा न हो जैसा क होनी चािहए ले कन क ीय सरकार क स ा देश के अिधकांश भाग म अभी भी कायम है। अभी तक भारत अ क देश जैसा घ टया तानाशाह नह बन पाया है, न ही यहां यूरोपीय क म क फासीवादी व था कायम हो पाई है। 11 राजनैितक वग म जानता ं क यादातर सांसद ने संिवधान तब पहली बार देखा होता है, जब वे अपने पद क शपथ लेते ह। मोद महाजन, क ीय मं ी, सन् 2000 वतमान समय म भारत म पहचान क राजनीित या जाित और समुदाय क राजनीित का उभार दरअसल ि के ऊपर उसके समुदाय के वच व का अिभ ि करण है। यह भारत म उदारवादी लोकतं के िलए कोई अ छा संकेत नह है। आं े बेितले, समाजशा ी, सन् 2002 I जुलाई 1958 म जन िवषय पर िनकलने वाली भारत क एक मुख पि का ने एक अनाम लेखक का लेख छापा िजसका शीषक था - नेह के बाद! उस समय तक जवाहरलाल नेह पूरे 11 साल तक भारत के धानमं ी रह चुके थे। उ के िहसाब से वह स र के नजदीक प च ं चुके थे और कां ेस पाट के भीतर उसके पुराने ितिनिधय के आखरी नुमांइदे थे। व लभभाई पटेल और मौलाना आजाद क मृ यु हो चुक थी, गो वंदव लभ पंत बीमार चल रहे थे और च वत राजगोपालाचारी म ास म सेवािनवृत जंदगी जी रहे थे। पाट और रा धानमं ी क नैितक स ा क बदौलत ही चल रहा था। कां ेस राजनेता क अगली पीढ़ी म कोई भी प उ रािधकारी नह दख रहा था। सवाल यह था क उनके जाने के बाद या होगा? िजस लेख ने जुलाई 1958 म ये सवाल उठाया था उसने इसका जवाब भी दयाः ितलक, गांधी और नेह के उ रािधकारी के तौर पर पाट जो ित ा ा करे गी वह शु के कु छ साल तक कसी भी भावशाली और व थ िवप को पनपने नह देगी। ले कन बाद के साल म नई पीढ़ी के पाट नेता के िखलाफ जब लोग का गु सा बढ़ेगा तो वे अपने आपको बचाने के िलए और मत ा करने के िलए जाित, सं दाय और े ीय भावना को हवा दगे यहां तक क वे मतदान क पर क जा भी कर सकते ह। उस लेखक ने कहा क ऐसी ि थित म कां ेस पाट के िलए आ थक भाव के लालच से मु होना मुि कल हो जाएगा। य क एक िमि त अथ व था के राजनीितक-आ थक तं म िजसम ापार और समाजवाद के बीच क रे खा काफ धुंधली है और रा य के तं पर िनयं ण ापारी वग और बंधक को कई तरह के पुर कार दे सकता है, वहां स ाधारी पाट के बीच धन के भाव का घुसपैठ कर जाना िनि त है। आिखरकार, उस लेखक ने भिव यवाणी क क जाित, सं दाय और े वादी भावना के गठजोड़ से ‘पहले ांतीय सरकार और बाद म क ीय सरकार अि थर होती जाएंगी।’ उसके बदले यह अि थरता िविभ राजनीितक दल म ित पध रा वाद क भावना को ो सािहत करे गी। उदाहरण के िलए कां ेस पाट अपने पीछे देश को इस चेतावनी के आधार पर संग ठत करने का यास करे गी क देश का बा कनाईजेशन (खंड-खंड हो जाना) हो सकता है। जनसंघ पा क तान का भय दखा सकती है। जा सोशिल ट पाट भारत और चीन के बीच हो रही ित पधा का भय दखा सकती है जब क क युिन ट पाट आम जनमानस को डाॅलर सा ा यवाद का भय दखा सकती है।1 इन प पर िजतनी भी भिव यवािणयां क गई ह उनम से यह भिव यवाणी व के साथ ब त सही सािबत ई है। सन् 1967 के चुनाव म जो नेह क मृ यु के बाद का पहला चुनाव था, उसके बाद क के साथ-साथ रा य सरकार भी अि थर हो ग । धम, जाित और े के आधार पर लोग क भावनाएं बंटने लग , िजसने स ाधारी पाट के अंदर अिभ ि पा ली और जैसा क लेखक ने खुद भी उ मीद नह क थी - कई नई पा टयां भी इन मु के आधार पर पनप आ । जैसे-जैसे राजनीित यादा ित पध होती गई, इं दरा गांधी के नेतृ व म कां ेस पाट ने का पिनक या वा तिवक भय का काड खेला क देश खंड-खंड म बंट जाएगा। जनसंघ ने पा क तान जैसे का पिनक या वा तिवक खतरे का काड खेला जब क क युिन ट ने अमे रका के दानवीय ष ं का उसी तरह का काड खेला। राजनीित म बड़े पैमाने पर पैसा झ का जा रहा था और चुनाव म धांधली क कई प म तैया रयां क जा रही थ । सवाल यह है क वह बेजोड़ राजनीितक भिव यवे ा कौन था, िजसक भिव यवािणयां बाद क घटना से लगभग इस तरह सच सािबत ? हो सकता है क वह कोई पि मी देश का राजनीित िव ानी हो जो बेनाम होकर दूसरे देश के िववादा पद मु पर िलखता हो। या शायद वो कोई नौकरशाह हो जो भारत सरकार म काम करता हो और िजसे उसक नौकरी खुलकर िलखने से मना करती हो। ऐसा लगता है क शायद वह कोई नौकरशाह ही होगा जैसे क उसक एक ट पणी से झलकता भी है। उसने िलखा क ‘कई व र नौकरशाह उ मीद कर रहे ह क नेह के जाने से पहले ही वे सेवािनवृत हो जाएं’ ता क उ ह नेह से कमतर और कम उदार मानिसकता वाले उ रािधका रय के अधीन काम न करना पड़े।2 II जब जवाहरलाल नेह जीिवत थे तो क म हमेशा कां ेस का शासन बना रहा। सारी िवप ी पा टय म से िसफ क युिन ट पाट ही के रल म स ा का सुख भोग पाई। ले कन सन् 1967 के चुनाव के बाद भारत का राजनीितक प रदृ य यादा से यादा सतरं गा होता चला गया। यादा से यादा रा य क स ा पर गैर-कां ेसी दल का क जा होता गया। सन् 1977 म पहली बार एक गैर-कां ेसी दल नई द ली म क ीय स ा पर भी कािबज हो गया। हालां क अ सी के दशक म कां ेस ने क ीय स ा पर फर से क जा कर िलया, ले कन दशक बीतते-बीतते उसे यह फर से खोना पड़ा। राजनीितक तं का यह बढ़ता आ िवक ीकरण गठबंधन सरकार के प म आ। जनता पाट जो सन् 1977 म स ा म आई थी, वह खुद ही चार राजनीितक दल का गठबंधन थी। दूसरी गैर-कां ेसी पाट जो क क स ा म सन् 1989 म आई वह नेशनल ं ट (रा ीय मोचा) थी। इसम सात अलग-अलग पा टयां थ और फर भी यह एक अ पसं यक सरकार थी। उसके बाद से नई द ली म कोई भी सरकार एक दल ारा शािसत नह रही है।3 ये गठबंधन तीन कार के रहे ह। गठबंधन का पहला कार भारतीय जनता पाट के वच व का रहा है जो पुरानी जनसंघ क उ रािधकारी है। सन् 1996 म दो स ाह के िलए और उसके बाद सन् 1998 से लेकर 2004 तक पूरे छह साल के िलए बीजेपी ने गठबंधन सरकार का नेतृ व कया। इस रा ीय जनतांि क गठबंधन म बीजेपी ने धानमं ी, गृह, िव , िवदेश मं लय का कामकाज अपने पास रखा जब क दूसरे मं लय अपने सहयोगी दल को बांट दए जो मु यतः े ीय दल के समूह थे। बीजेपी ने गठबंधन क राजनीित म अपना कदम इस थािपत अवधारणा के आधार पर रखा क वह अपने दम पर कभी भी क क स ा म नह आ सकती। इसक जड़ उ र भारत म तो मजबूती से जमी थ , ले कन अ य रा य म इसका फै लाव इसके सहयोगी दल क बदौलत ही हो पाया जो खास-खास रा य म मजबूत थे। िशवसेना के अपवाद को छोड़कर ये पा टयां हंद ु व क िवचारधारा को वीकार नह करती थ । इस तरह गठबंधन का िनमाण करते व बीजेपी को राममं दर और धारा-370 (िजसके तहत ज मू-क मीर को िवशेष दजा दया गया है) जैसे मु को कनारे करना पड़ा।4 दूसरी तरह के गठबंधन क शु आत जनता योग के समाजवादी अवशेष के आधार पर ई। इ ह ने सन् 1989-91 और सन् 1996-8 म रा ीय मोचा और संयु मोचा सरकार क अगुआई क । ये दोन ही सरकार अ पसं यक सरकार थ , िजसम मंि मंडल क िज मेदा रय को ापक तौर पर िवक ीकृ त कर दया गया। जहां धानमं ी का पद जनता दल के उ मीदवार को िमला वह गृह और र ा जैसे मह वपूण मं लय सहयोगी दल के नेता को दे दए गए। तीसरी तरह का गठबंधन कां ेस के वच व का था। राजीव गांधी क ह या के बाद ए चुनाव म सन् 1991 म कां ेस को 244 सीट पर जीत िमली थी। हालां क यह अभी भी सबसे बड़ी पाट थी ले कन यह ब मत से करीब 30 सीट दूर थी। हालां क मान-मनो वल करके या कसी अ य तरीके से झारखंड मुि मोचा और अ य िनदिलय के समथन से यह पूरे पांच साल तक स ा म रहने म कामयाब रही। सन् 1996 के चुनाव म कां ेस का आंकड़ा 140 सीट पर आ गया। पीवी. नरिस हा राव ने धानमं ी पद से इ तीफा दे दया और उसके कु छ ही दन बाद पाट अ य पद से भी। अब पाट के बड़े नेता ने राजीव गांधी क िवधवा सोिनया गांधी से पाट क कमान संभालने का आ ह कया। इटली म पैदा ई और कै थोिलक माहौल म पली-बढ़ी सोिनया क शादी भारत के सबसे मुख राजनीितक प रवार म ई थी ले कन उनक अपनी कोई राजनीितक मह वाकां ा नह थी। सन् 1981 म जब उनके पित राजनीित म शािमल ए थे तो वह इसक कटु िवरोधी थ । उसके दस साल के बाद जब उनके पित क ह या कर दी गई तो उ ह ने अपने को घर-प रवार तक समेटकर रख िलया।5 ले कन सन् 1998 के चुनाव से पहले सोिनया गांधी को अपने पित और सास के पुराने सहयोिगय क आ ह के सामने झुकना पड़ा और चुनाव अिभयान म शािमल होने पर वह सहमत हो ग । जब पाट को महज 141 सीट पर जीत िमली तो कां ेस अ य सीताराम के सरी को हटा दया गया और राजीव क िवधवा को पाट क कमान स प दी गई। एक साल के बाद म याविध चुनाव करवाया गया, िजसम कां ेस क सीट क सं या िगरकर और भी कम हो गई। यह महज 114 सीट ही जीत पाई। इस समय तक राजनीितक पंिडत उस घरे लू मिहला से राजनीित के प म प रव तत ई नेता को खा रज करने के िलए िब कु ल तैयार थे। हालां क उनक िनरं तरता का ितफल उ ह ज र िमला। ऐसा भी व आया क जब क म बेजीपी के नेतृ व म एनडीए क सरकार थी वह कम से कम पं ह ांत म कां ेस के नेतृ व म सरकार चल रही थ ।6 सोिनया गांधी के नेतृ व म कां ेस क जो शु आती बैठक ई थ उसम गठबंधन राजनीित से इं कार कया गया था। पाट के पुराने नेता क राय म अतीत क तरह ही भिव य म भी वे अपने बल पर ही स ा पा सकते थे। ले कन जमीनी हक कत ने उ ह अपनी राय बदलने पर मजबूर कर दया। सन् 2004 के चुनाव से पहले कां ेस ने कई िविभ राजनीितक दल के साथ गठजोड़ कर िलया। उस चुनाव म कां ेस को 145 सीट पर जीत िमली ले कन उसके संयु गितशील मोचा (यूपीए) को 222 सीट पर जीत हािसल ई। चूं क बीजेपी के नेतृ व वाली एनडीए को महज 189 सीट पर जीत हािसल ई थी इसिलए कां ेस ने क युिन ट के बाहरी समथन से सरकार बना ली। सोिनया गांधी ने धानमं ी बनने से इं कार कर दया, जो पद फर उनके िव त सहयोगी मनमोहन संह को िमला। एनडीए माॅडल े क तरह ही कां ेस ने गृह, िव और िवदेश मं लय का कामकाज अपने पास रखा। हालां क सूचना तकनीक और कृ िष जैसे मह वपूण आ थक िवभाग सहयोगी पा टय को दए गए।7 तािलका 28.1 कां ेस और बीजेपी को िमले मत का ितशत, 1989-2004 भारतीय राजनीित के इितहास म सन् 1989 एक बड़ी िवभाजक रे खा है। उससे पहले कां ेस एक भीमकाय और ताकतवर संगठन आ करता था ले कन उसके बाद एक पाट का वच व ख म हो गया और कई दल का गठबंधन जमाने क हक कत बन गया। अतीत के चुनाव म करीब 40 फ सदी मत हािसल कर कां ेस रा ीय संसद म 60 फ सदी सीट जीत िलया करती थी। ले कन अब कां ेस क सीट म भारी िगरावट क एक बड़ी वजह इसके जनसमथन म धीरे -धीरे आ रही िगरावट थी। यह तािलका 28.1 से प है। सन् 1989 से लेकर 2004 तक कां ेस के मत- ितशत म दस फ सदी से भी यादा क िगरावट आ गई। इसी अविध के दर यान बीजेपी का मत- ितशत उसी अनुपात म बढ़ा। हालां क िपछले कु छ चुनाव म इन दोन पा टय ारा हािसल कया गया मत ितशत करीब 50 फ सदी के करीब ही रहा था। तो सवाल यह है क फर शेष आधे मत कहां गए थे? क युिन ट पाट जो आमतौर पर पि म बंगाल और के रल म क त थी उसे करीब 8 फ सदी मत िमलते आ रहे थे। िपछड़ी जाितय और दिलत क पाट जो उ र भारत म मजबूत थी उ ह ने 16 फ सदी मत पर अपना दावा कया था। े ीय पा टयां िज ह ने दि ण और पूव भारत म अपने आपको मजबूत कया था उ ह करीब 11 फ सदी मत िमले थे। कां ेस के मत म िगरावट दो चरण म ई। पहला चरण सन् 1957 म के रल म शु आ था और सन् 1983 म आं देश म अपने चरम पर प च ं ा था। इस चरण म कां ेस के वच व को ऐसी पा टय ारा चुनौती दी गई थी जो े , भाषा और वग के आधार पर खड़ी ई थ । दूसरा चरण जो सन् 1967 के बाद से उ र भारत म शु आ था और िपछले दशक म मजबूत होता गया था उसने कां ेस को जाित और धम के आधार पर चुनौती दी थी। कां ेस ने इन पा टय के सामने अपनी जमीन खोई थी। एक तरफ खासतौर पर ऊंची जाितय ने और आमतौर पर हंद ु ने पाट को समथन देना बंद कर दया और बीजेपी के इद-िगद खड़ी हो ग । दूसरी तरफ िनचली जाितय ने अपना समथन मायावती क ब जन समाज पाट और मुलायम संह क समाजवादी पाट को देना शु कर दया। यहां तक क मुसलमान भी जो कभी कां ेस के सबसे मजबूत समथक थे, बाबरी मि जद क घटना के बाद से दूसरी तरफ मुड़ गए। पाट तं के िबखराव क वजह से ही गठबंधन सरकार के उदय का रा ता साफ आ। ये गठबंधन वाकई सतरं गे थे। सन् 1999-2004 म बीजेपी के नेतृ व म जो एनडीए गठबंधन क सरकार बनी उसम 16 अलग-अलग तरह क पा टयां शािमल थ । कां ेसनीत यूपीए िजसने सन् 2004 का चुनाव लड़ा और जीता था, उसम 19 अलग-अलग तरह क पा टयां थ । चूं क ये गठबंधन इतने िविवध कार के होते ह क ये सरकार भी अि थर ही होती ह। सन् 1947 से लेकर 1989 तक िहदु तान पर 10 अलग-अलग सरकार का शासन रहा है और मु क ने 6 धानमं ी देखे थे। ले कन सन् 1989 से लेकर 2004 तक महज पं ह साल म मु क ने सात अलग-अलग तरह क सरकार का अनुभव कया और 6 धानमं ी देख।े यानी क औसतन हरे क दो साल पर एक नई सरकार स ा म आती गई और देश एक नए धानमं ी के शासन का गवाह बना।8 गठबंधन सरकार का उदय भारत म लोकतं क जड़ के मजबूत और गहरे होने क अिभ ि है। देश क व था म अलग-अलग पा टय और समूह ने अपना िह सा हािसल कर िलया है। ये वो पा टयां ह जो यादा से यादा सीट जीतकर अपने मतदाता का ितिनिध व करती ह। ऐसा वे अ सर कां ेस के मत क क मत पर करती ह िजसने आजादी के बाद के दो दशक तक कामयाबीपूवक ये दावा कया था क वह कसी एक खास इलाके क पाट नह बि क पूरे देश क पाट है। ले कन लोकतं क इस मजबूत होती ि थित ने अपनी क मत भी मांगी है और वो ये क नीितगत मु से संबंिधत राजनीित म िगरावट आई है। पचास के दशक म जवाहरलाल नेह के समय जो ापक आ थक और समािजक िवकास क नीितयां शु क गई थ - िजनम भारी उ ोग का िवकास, पुरातन कालीन िनजी धा मक कानून क समाि और एक वतं िवदेश नीित शािमल थी - वे आज क बंटी ई और िबखरी ई राजनीित म संभव नह हो पाती। यहां तक क ल यक त योजनाएं जैसे लालबहादुर शा ी और इं दरा गांधी के व कृ िष पर क त योजना को भी आज के व कामयाब होने म मुि कल का सामना करना पड़ता। पहले के जमाने म िवभाग का बंटवारा करते व मंि य क यो यता और उनके अनुभव को यान म रखा जाता था। जब क आज मं लय का बंटवारा गठबंधन के सािथय को खुश रखने के िलए कया जाता है जो ऐसे-ऐसे मं लय क मांग करते ह जो या तो ित ाजनक या फर फायदेमंद होते ह। अपने कत के िनवहन म कै िबनेट मं ी अब देश या रा य के िहत क बजाय अपने-अपने दल क यादा चंता करते ह। III संसदीय चुनाव के बाद अब हम ांत क गितशील और िनत-नई कहानी बयान करने वाली राजनीित क बात भी करनी चािहए। अपने िगरती राजनीितक ि थित के बावजूद कां ेस देश के अिधकांश िह स म वजूद रखने वाली एक वा तिवक रा ीय पाट है। कई रा य म एक थायी ि दलीय तं आकार ले चुका है, िजसम एक ुव कां ेस है तो दूसरा बीजेपी, क युिन ट या कोई तीसरी े ीय पाट । ले कन उ र देश और िबहार जैसे िवशाल रा य म कां ेस अ ासंिगकता क ि थित म प च ं गई है। यहां जाित आधा रत पा टयां और बीजेपी मु य िखलाड़ी है। िपछले दो दशक म ए रा य के चुनाव काफ उथल-पुथल से त रहे ह। ‘स ािवरोधी झान’ क वजह से स ाधारी दल के हाथ से स ा फसलने क घटनाएं साफतौर पर सामने आ रही ह। इस तरह से िहमाचल देश, राज थान और म य देश म कां ेस और बीजेपी बारीबारी से स ा म आती रहती ह। आं देश म कां ेस तेलुगुदश े म के साथ स ा के िलए होड़ करती है तो के रल म क युिन ट के साथ। ऐसा कभी-कभार ही होता है क कोई पाट लगातार एक बार से यादा स ा म रही हो। इसका एक अपवाद िबहार म रा ीय जनता दल था िजसने सन् 1989 से लेकर 2005 तक लगातार राज कया। इससे भी यादा चम का रक सफलता सीपीएम क अगुआई म बंगाल म वाममोच क थी जो सन् 1977 से 2011 तक लगातार स ा म था (मूल कताब के िलखे जाने तक वाममोचा ही स ा म था। सन् 2011 के चुनाव म तृणमूल-कां ेस गठबंधन स ा म आ गई)। आजादी िमलने के बाद दो दशक तक कां ेस क और लगभग सभी रा य क स ा म थी। फर सन् 1967 से लेकर 1989 तक कां ेस ने क ीय सरकार का नेतृ व कया (जनता पाट के संि कायकाल को छोड़कर) जब क इसे रा य म अपने िवरोधी पा टय ारा स ा साझा करनी पड़ी। हालां क हाल के साल म कां ेस को क क स ा से भी सबसे यादा दन तक बाहर रहना पड़ा। इन प रवतन ने भारतीय संघा मक व था के व प और इसके याकलाप को बदलकर रख दया है। अब हरे क आमचुनाव से पहले कसी भी े ीय पाट को जो अपने रा य म मजबूत होती है उसे रा ीय गठबंधन म शािमल करने के िलए काफ मान-मनो वल करना पड़ता है। इस तरह से ‘रा ीय पाट ’ के दो दावेदार - कां ेस और बीजेपी को - अब कसी फा टफू ड रे तरां क शाखा क तरह काम करना होता है। वे अपने ांड को थानीय एजट को बेचते ह जो थानीय प रि थितय के िहसाब से उसे चुनते ह, खा रज करते ह, सौदेबाजी करते ह और फर पाला बदल लेते ह।9 इस मोलतोल के खेल म िवचारधारा का कोई मतलब नह होता, बि क यह एक रणनीितक गणना के िहसाब से कया जाता है क कौन सी रा ीय पाट उस े ीय पाट को या फायदा देगी। यह फायदा सरकार म मं ी बनाने क श ल से लेकर संबंिधत रा य को यादा से यादा आ थक सहायता या अनुदान भी हो सकता है। इस तरह से डीएमके और एआईएडीएमके दोन ही कां ेस और बीजेपी के गठबंधन साथी रहे है। उसी तरह तेलुगुदश े म बीजेपी और रा ीय मोचा दोन के ही साथ रहा है। द ली म जो गठबंधन क सरकार बनती है वह उन रा य सरकार को तरजीह देती है जो उसे समथन कर रही होती ह। सन् 1972-95 क अविध म कया गया िव बक का एक सव ण बताता है क क सरकार को समथन देने वाली या उसी पाट ारा शािसत रा य को अ य रा य क तुलना म क से 4 फ सदी से लेकर 18 फ सदी यादा तक आ थक मदद िमली। दूसरा अ ययन जो क दो अ य भारतीय अथशाि ाय ारा कया गया और जो यादा हाल के साल का है, वह बताता है क ऐसे रा य को इस तरह िमलने वाला अनुदान 30 फ सदी तक यादा था।10 इस िबखराव का एक नतीजा ये आ है क अब क ीय स ा क धमक उतनी नह रह गई िजतनी एक जमाने म आ करती थी। जब सारे मु यमं ी उसी दल के आ करते थे, िजस दल के धानमं ी थे तो फर उ ह रा ीय िहत के िलए रा य के िहत का बिलदान करने के िलए मनाना उतना मुि कल नह था। ले कन अब मु यमं ी, धानमं ी क बात को मानने पर मजबूर नह ह। एक जमाने म नेह या इं दरा गांधी क तरफ से कहा गया एक भी श द दो रा य के मु यमंि य के बीच-िववाद सुलझाने के िलए काफ था। ले कन अब अगर कोई िववाद शु हो जाता है तो उसे सुलझाना काफ क ठन काम हो गया है। यहां कावेरी जल को लेकर कनाटक और तिमलनाडु के िववाद का उ लेख करना आव यक है। कावेरी का उ म थल कनाटक म है, वह रा य से बहती ई तिमलनाडु जाती है और फर हंद महासागर म िमल जाती है। कावेरी डे टा के िनचले िह से म स दय से िवकिसत संचाई णाली वजूद म रही है, िजससे वहां के कसान उ म क म के चावल क पैदावार म स म ह। इसके िवपरीत कनाटक म संचाई-तं हाल के दन म िवकिसत कया गया है। वहां पहली नहर बीसव सदी क शु आत म बनाई गई और स र के दशक म वहां नहर णाली म ापक बढ़ोतरी दज क गई। सन् 1928 म कावेरी के जल से कनाटक के इलाके म 1 करोड़ 10 लाख एकड़ जमीन म संचाई होती थी जब क तिमलनाडु के इलाके म 14 करोड़ 50 लाख एकड़ म संचाई होती थी। सन् 1971 तक आते-आते यह खाई और भी बढ़ गई। तब तक कनाटक म 4 करोड़ 40 लाख एकड़ म संचाई हो रही थी जब क तिमलनाडु म 25 करोड़ 30 लाख एकड़ म कावेरी के पानी से संचाई हो रही थी। ले कन बीसव सदी के अंत तक कावेरी के ऊपरी इलाके के रा य यानी कनाटक ने बड़ी तेजी से तिमलनाडु का पीछा कया और संिचत इलाक म लगभग बराबरी हािसल कर ली। अब तक कनाटक के भी 21 करोड़ 30 लाख एकड़ जमीन क संचाई कावेरी के जल से हो रही थी जब क तिमलनाडु म ऐसी जमीन 25 करोड़ 80 लाख एकड़ थी। संचाई सुिवधा के इस ापक फै लाव ने कनाटक के मां ा और मैसूर के कसान को काफ समृ कर दया। एक जमाने म वे कम मू य वाली एक ही फसल (अमूमन मोटे अनाज) पर िनभर रहते थे ले कन अब वे साल म दो या यहां तक क तीन-तीन उ मू य वाली फसल जैसे चावल और ग ा उगाने लगे। स र और अ सी के दशक म क ीय सरकार ने कावेरी जल बंटवारा िववाद को कसी वीकाय हल के तहत सुलझाने के िलए कई बैठक बुला । सन् 1968 से लेकर 1990 तक मं ी तर क 26 बैठक ले कन बातचीत कसी समाधान तक नह प च ं पाई। तिमलनाडु को इस बात का भय सता रहा था क नदी के ऊपरी िह से म ापक नहर िनमाण से िनचले डे टा म उसके कसान को ित उठानी पड़ेगी। कनाटक का तक था क उसके देर से नहर बनाने का ये मतलब नह है क उसे उसके इलाके म पानी के इ तेमाल का मौका ही न दया जाए। जून, 1990 म सु ीम कोट के एक आदेश के तहत कावेरी जल िववाद यूनल का गठन कया गया। तीन यायाधीश को (तट थ) इसका सद य बनाया गया। 25 जून, 1991 को यूनल ने एक आदेश जारी कया, िजसके तहत कनाटक से कहा गया क वह 20 करोड़ 50 लाख यूिबक फ ट पानी ितवष तिमलनाडु को जारी करे जब क मामले का आखरी िनपटारा लंिबत रखा गया। दस दन के बाद कनाटक िवधानसभा ने आमसहमित से एक ताव पा रत कया िजसम यूनल के फै सले को मानने से इं कार कर दया गया। उसके बाद कनाटक सरकार ने आदेश जारी कया, िजसम उसके अिधका रय को िनदश दया गया क रा य के कसान के िलए कावेरी के जल को ‘सुरि त और संरि त’ कर। यह मामला सु ीम कोट म ले जाया गया, जहां अदालत ने कहा क कनाटक सरकार का आदेश संिवधान के िखलाफ है। अब क सरकार ने यूनल के आदेश को अपने गजट म कािशत करके आिधका रक बना दया। कनाटक के मु यमं ी एस. बंगर पा ने इसके जवाब म अपने रा य म बंद का आ नान कया। रा य के सभी कू ल और काॅलेज बंद कर दए गए और रा य क राजधानी बंगलौर म िवरोध- दशन करने वाले लोग ने तिमल इलाक पर हमला शु कर दया। रा य शासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और कई दन तक हंसा चलती रही। इस घटना म करीब 50,000 तिमल रा य छोड़कर पलायन कर गए। कनाटक ारा यूनल के फै सले क इस खुली अवहेलना ने तिमलनाडु क मु यमं ी जयलिलता को नाराज कर दया। इसके जवाब म उनके शासन ने तिमलनाडु म क ड़ लोग के घर और वसाय पर हमले को उकसावा देना शु कया। कु ल िमलाकर 20 करोड़ पए से यादा क संपि को नुकसान प च ं ा। कावेरी जल िववाद यूनल के गठन संबंधी आदेश देते ए सु ीम कोट के मु य यायाधीश ने चेतावनी जारी क थी क ‘इस तरह के िववाद से ये खतरा है क वे संबंिधत रा य के लोग म कटु ता पैदा कर सकते ह। िजतने लंबे समय तक ये िववाद कायम रहगे उतनी ही कटु ता बढ़ेगी। इसीिलए पूरे देश के लोग का अिभभावक होने के नाते क ीय सरकार का ये दािय व है क वह इस तरह के िववाद म उिचत कारवाई करे और संिवधािनक तं को सुचा प म चलाए।’ हालां क बात ये थी क क ीय सरकार सरकारी मशीनरी को ज र सुचा प से रख सकती थी ले कन उसके पास वो शि यां नह थ क वो रा य को उन अनुमोदन को वीकार करने पर मजबूर कर सके । अपने गठन के 15 साल बाद भी कावेरी जल िववाद यूनल कसी भी अंितम समाधान तक नह प च ं पाया है। िजस साल मानसून अ छा होता है उस साल कनाटक को 20 करोड़ 50 लाख यूिबक फ ट जल तिमलनाडु को जारी करने म कोई क ठनाई नह होती ले कन िजस साल बा रश दगा देती है तो फर अफरा-तफरी का आलम छा जाता है। तिमल फ म के िसतारे भूख-हड़ताल पर चले जाते ह ता क वो कनाटक को ‘वा तिवक ि थितय ’ से अवगत करवा सक। अपने सबसे हाल के कायकाल म जयलिलता जब तिमलनाडु क मु यमं ी थ तो वह खुद ही भूख-हड़ताल पर बैठी थ । जािहर सी बात है क अपने रा य क मांग को क से मनवाने का यह कोई संिवधािनक तरीका नह था। इस बीच कनाटक म कसान नेता ने अपनी सरकार को चेतावनी दी क अगर कसान क मज के िखलाफ तिमलनाडु को पानी दया गया, तो सरकार को इसका अंजाम भुगतना होगा। जब कभी मौसम खराब होता तो अमूमन जून से लेकर िसतंबर महीन के बीच म कावेरी जल का सवाल कनाटक और तिमलनाडु के अखबार के मु य प से शायद ही गायब होता। िवरोध और उसके िवरोध म दशन जारी रहते और क सरकार कनाटक सरकार को िनदश देती रहती क तिमलनाडु को एक खास मा ा म पानी जारी कया जाए। तिमलनाडु के मु यमं ी उस मा ा से यादा पानी क मांग करते जब क कनाटक का जवाब होता क वह यादा पानी जारी नह कर सकता। एक क ीय दल कावेरी घाटी का सव ण करने के िलए जाता। इस बीच जो थोड़ा-ब त या िजस भी मा ा म पानी जारी कया जाता, उसे कभी भी सावजिनक नह कया जाता। कु ल िमलाकर कहा जा सकता है क पानी का िववाद वै ािनक तक या कानून क धारा से भािवत न होकर अंतदलीय ग या मकता से यादा भािवत होता था।11 इस बीच देश के दूसरे छोर पर जुलाई, 2004 म पंजाब िवधानसभा ने एक ताव पा रत कर दूसरे रा य के साथ ए उसके जल बंटवारे के समझौते को तोड़ दया। उसने कहा क वह रावी और ास नदी के पानी को ह रयाणा और राज थान म जाने से पहले अपनी ज रत के मुतािबक इ तेमाल करे गा। साफतौर पर पंजाब िवधानसभा का ये ताव भारतीय संघ क भावना के िखलाफ था। मह वपूण बात ये थी क यह ताव एक कां ेसी मु यमं ी ारा पा रत करवाया गया था जब क क म भी कां ेस क ही सरकार थी। पंजाब िवधानसभा क ये कारवाई संभवतः अनुिचत थी, शायद गैर-कानूनी भी और िनि त ही असंिवधािनक भी।12 दूसरे रा य को भी ऐसे फै सल से उकसावा िमल सकता था। य क भारत के आ थक िवकास के िलए तेल से भी यादा पानी ज री है। यह कृ िष काय और बढ़ती शहरी आबादी के िलए पेयजल मुहय ै ा करवाने क दृि से भी यादा ज री है। राजनीित के खंड-खंड होते जाने और क ीय सरकार क कमजोर होती ि थित क वजह से यादा से यादा ांत इस तरह के इकतरफा कदम उठाने के िलए ो सािहत हो सकते ह। IV सन् 1993 म संसद ने संिवधान का 73वां और 74वां संशोधन पा रत कया। 73व संशोधन िवधेयक ारा यह आव यक कया गया क ामीण तर पर गांव, तालुक और िजला म थानीय सरकारी सं था का गठन कया जाए जब क 74व संशोधन ारा यह सुिनि त कया गया क ऐसी ही व था शहर और बड़े नगर के िलए भी क जाए। इस तरह क व था म ितिनिधय का चुनाव सावभौम वय क मतािधकार के आधार पर करवाना सुिनि त कया गया। हरे क जगह इसम अनुसूिचत जाितय और जनजाितय के साथ-साथ एक ितहाई सीट पर मिहला के िलए आर ण क व था क गई। पंचायती राज व था महा मा गांधी क मुख चंता म से एक थी। हालां क जवाहरलाल नेह और इं दरा गांधी दोन ही थानीय तर तक स ा के िवक ीकरण म िहचक रहे थे। य िप दोन के मामल म इसक वजह ज र अलग-अलग थ । जवाहरलाल नेह इसिलए ऐसा करने से िहचक रहे थे क कह इससे आ थक िवकास क योजनाएं न भािवत हो जाएं जब क इं दरा गांधी स ा-क ीकरण के ित अपने मोह क वजह से ऐसा नह कर पाई थ । साठ के दशक म महारा और राज थान दोन ही सूब ने गांव और िजला प रषद के गठन के साथ थानीय सरकार का योग कया था। हालां क देश म पंचायती राज को लेकर पहला गंभीर यास पि म बंगाल म ही कया गया जब सन् 1977 म वहां वाम मोचा क सरकार ने स ा संभाली। उस या को कनाटक म जनता सरकार ने आगे बढ़ाया, िजसने सन् 1983 से 87 के बीच वहां थानीय सं था को कई मह वपूण िज मेदा रयां स पी। धानमं ी के प म सन् 1984-9 म राजीव गांधी ने थानीय वशासन को लेकर अिखल भारतीय तर पर एक तं को िवकिसत करने का यास कया। हालां क आंिशक प से इस योजना के ित उनक दलच पी इस वजह से थी क वे स ा और अिधकार क ापक साझेदारी के िलए चल रहे थानीय वाय आंदोलन के ित सरकार का सकारा मक ख दशाना चाहते थे ले कन इसक एक वजह राजनीितक भी थी। जहां एक तरफ क म कां ेस का शासन था वह यादातर रा य म िवप ी पा टयां स ा म थ । पंचायती राज क थापना करके क क सरकार इन िवप ी पा टय क स ा को दर कनार कर सीधे जनता से संवाद थािपत करना चाहती थी और उन िवकास रािशय का एक िह सा सीधे उनके हाथ म थमाना चाहती थी, जो पहले रा य सरकार से होकर आता था।13 राजीव गांधी ारा शु क गई या उनक मृ यु के बाद ही फलीभूत हो पाई, जब कां ेस ने फर से क क स ा हािसल क । जब इन संशोधन के बारे म बहस हो रही थी तो रा य सरकार ने अपनी स ा म कटौती कए जाने को लेकर चंता क थी। हालां क जब अंितम तौर पर यह कानून पा रत कया गया तो रा य िवशेष को यह अिधकार दया गया क वे पंचायती सं था और शहरी िनकाय को कन- कन काय को करने का अिधकार देते ह। इस संदभ म बनाए गए रा य के कानून अपने उ े य और नतीज म अलग-अलग कार के सािबत ए। कु छ रा य ने पंचायत को सभी कार के िवकास काय मसलन संचाई, िश ा, वा य, सड़क िनमाण आ द का अिधकार दे दया और उसके अनु प धनरािश भी जारी क । दूसरे कई रा य ने थानीय िनकाय के काय े और उनके िव के संबंध म यादा सतक ख अपनाया।14 अ सी के दशक म पंचायती राज के े म पि म बंगाल सबसे अगुआ रा य था ले कन बाद म उसका यह दजा के रल ने छीन िलया जहां एक मजबूत क युिन ट उपि थत था। जब सन् 1996 म के रल म वाममोचा क सरकार बनी तो इसने फै सला कया क 35-40 फ सदी िवकास रािश थानीय सं था के िलए िनधा रत क जाएगी िजसका या वयन भी वही करगे। रा य भर म पंचायत को बैठक आयोिजत करने के िलए ो सािहत कया गया, िजसम अिधकारी और तकनीक िवशेष सहायता देते और वे अपनी ाथिमकता खुद तय करते। सैकड़ तरह क थान-िवशेष से संबंिधत योजनाएं तैयार क ग , िजसम ाकृ ितक संसाधन मसलन पानी, िम ी और जंगल के बारीक बंधन पर यान दया गया।15 बंगाल क तरह ही के रल म भी पंचायती राज को आदशवाद और मौकापर ती के अि थर िम ण से ही ो साहन िमला। एक तरफ क युिन ट बुि जीिवय और आंदोलनका रय का मानना है क स ा का िवक ीकरण करके गांव के लोग सावजिनक िव का इ तेमाल थान िवशेष क ज रत के मुतािबक बनाई गई योजना पर कर सकते ह और ऐसा करके उ ह स ा के क क तरफ नह देखना होगा। इस बात के भी कु छ संकेत ह क स ा का िवक ीकरण होने से धन का दु पयोग कता है और वह स ातं के घपल -घोटाल से एक हद तक बचा रहता है। ाचार कम होता है और यादा से यादा धन िवकास काय म खच हो पाता है। जब क गांधीवाद के मूल िस ांत के मुतािबक पंचायती राज सं था को ‘दलिवहीन लोकतं ’ होना था, जहां पंचायत के सबसे स मािनत सद य िबना कसी दलगत जुड़ाव के चुने जाते। जब क हक कत म इस या का गहरे प म राजनीितकरण हो गया है। के रल म और उससे भी यादा बंगाल म सीपीएम ने पंचायती राज सं था को सुदरू इलाक म अपनी पकड़ मजबूत बनाने के एक औजार के प म देखा है। पंचायत और इसके अिधका रय क शि का इ तेमाल महज पंचायत और अपने िलए नह बि क िवधानसभा और लोकसभा चुनाव के व अपनी पाट के प म जनमत क गोलबंदी के िलए भी कया जाता है।16 इन बात के बावजूद, संिवधान के 73व संशोधन ने एक ऐसी या क शु आत क है जो संभवतः भारतीय लोकतं पर अपना एक िनि त भाव डालेगी। इस कानून के बन जाने के बाद पूरे देश क पंचायत म तीस लाख से भी यादा चुने ए ितिनिध थे, िजसम से एक ितहाई मिहलाएं थ । वे लोग एक भारी चुनावी ित पधा के बाद चुने गए और पंचायत के चुनाव म आमतौर पर 70 फ सदी से यादा लोग ने मतदान म िह सा िलया। एक दलच प और शायद उससे भी मह वपूण बात है क पंचायती चुनाव का जाितय के बीच के संबंध पर पड़ने वाला असर। उ र देश म जहां दिलत समुदाय के लोग यादा जाग क और संग ठत ह, वहां दबंग जाितय को उनके साथ थानीय तर पर स ा क साझेदारी करनी पड़ती है। ये दिलत जाितयां ऐितहािसक प से हािशए पर रही ह। जब क उड़ीसा म जहां दिलत जाितयां उतनी जाग क नह ह उ ह पंचायती स ा म साझेदारी से (गैर-कानूनी प से) अ सर वंिचत करने क कोिशश क जाती है। तिमलनाडु म ामप रषद के गठन से जमीन पर क जा रखने वाली थेवार जाित और दिलत के बीच जाित संबंध तीखा हो गया है। वहां कानूनन करीब 20 फ सदी ाम पंचायत के अ य पद पर दिलत का हक बनता है ले कन अ सर ऊंची जाितयां उनक स ा को अित िमत करती ह। उसी तरह जहां कु छ मिहला पंचायत अ य अपनी मज से काम करती ह वह दूसरी तरफ ऐसी अ य मिहला अ य अपने पित, प रवार या जाित के अ य पु ष क महज व ा भर होती ह। उ लेखनीय बात ये भी है क संसद सद य, रा य िवधानसभा के सद य आ द अ सर पंचायती राज के योग को पसंद नह करते। उसी तरह भारतीय शासिनक सेवा के ब त सारे सद य भी उ ह देखना नह चाहते। उनका तक होता है क इससे ‘ ाचार का महज िवक ीकरण’ ही होगा। जब क नई व था के समथक का कहना है क इसके आलोचक इसक आलोचना एक खास वजह से करते ह और वो वजह ये है क अगर सही तरीके से आ थक और शासिनक अिधकार पंचायत को दे दए गए तो नौकरशाह और ऊपरी तर पर नेता का वग इससे सबसे यादा भािवत होगा।17 V न बे के दशक म भारतीय राजनीित घरे लू तर पर और भी यादा ज टल हो गई। इसक वजह राजनीितक दल क गला काट ितयोिगता और थानीय तर पर स ा के िवक ीकरण क शु आत थी। ले कन जहां तक शेष दुिनया के साथ हंद ु तान के ता लुकात क बात थी तो राजनीितक दल म कई मु पर सहमित थी। चाहे सरकार बीजेपी के नेतृ व क हो या फर कां ेस क , सभी सरकार भारत क सै य मता बढ़ाने और एक मजबूत िवदेश नीित के प म थ ।18 इस रणनीित क एक अिभ ि भारतीय सेना क सं या और उसक ताकत क बढ़ोतरी के प म देखने को िमली। भारत ब त तेजी से ऐसी ि थित क ओर बढ़ रहा था िजसम ‘कू टनियक तरीक से सुर ा हािसल करने क बजाय मजबूत ितर ातं के आधार पर कू टनीित को वरीयता दी जा रही थी।’19 सन् 1991 से लेकर 1999 क अविध म महज एक दशक म देश का सै य बजट 7 अरब डाॅलर से बढ़कर 12 अरब डाॅलर जा प च ं ा। इसम से कु छ पैसे जवान के वेतन भ पर खच ए। अब भारतीय सेना म करीब 10 लाख जवान थे जब क 10 लाख जवान अ य अधसैिनक बल म तैनात थे। इसम से कु छ पैसे अ याधुिनक हिथयार खरीदने पर खच कए गए। जब क कु छ पैस का इ तेमाल यु क साम ी के िनमाण म कया गया, िजसे धनी पि मी देश आपू त करने क ि थित म नह थे या तैयार नह थे। अ सी के दशक म बनाए गए अि और पृ वी िमसाईल के साथ-साथ भारत के पास अब अंतमहादेशीय बैलेि टक िमसाईल सूय (12,000 कलोमीटर तक मार करने क मता वाला) और साग रका भी था। साग रका को समु से छोड़ा जा सकता था। भारतीय वै ािनक ने अ य सुर ा मक िवक प भी खोजने शु कर दए थे। उ ह ने छोटी दूरी के िमसाईल भी िवकिसत कर िलए थे, जो दु मन के हमल को रोक सकते थे और उनके ारा कए जा रहे हमल को व त कर सकते थे।20 इन िमसाईल का िवकास र ा अनुसंधान िवकास संगठन (डीआरडीओ) ारा कया जा रहा था, जो देश के दो मह वपूण संगठन म से एक है िजसने देश के सुर ा े म अपनी अहम भूिमका िनभाई है। दूसरा संगठन था परमाणु ऊजा आयोग िजसक िज मेदारी परमाणु हिथयार और परमाणु िबजली दोन के उ पादन क थी। सन् 1974 म देश म परमाणु हिथयार का परी ण कया गया था ले कन बीते साल म भारतीय वै ािनक ने इसक मारक मता और इसक आधुिनकता को और भी िवकिसत कर िलया। अब न बे के दशक क शु आत से वे सरकार पर इस बात के िलए दबाव डालने लगे थे क उ ह परमाणु हिथयार के िवकिसत व प के परी ण क इजाजत दी जाए। भारत के परमाणु काय म के इितहास म जाॅज परकोिवच ने भारतीय वै ािनक के िनरं तर यास को रे खां कत कया है। उन लोग ने िज ह ने िमसाइल और परमाणु काय म क अगुआई क थी, धानमंि य को कहा क अगर अपेि त नतीजे सामने नह आए तो युवा ितभाशाली वै ािनक देश क सेवा करने क बजाय िनजी े म आकषक नौक रय क तरफ मुड़ जाएंगे। उ ह ने तक दया क ‘एक पूण परमाणु परी ण के अभाव म वै ािनक का आ मिव ास ख म हो जाएगा और देश उन उ दराज हो रहे वै ािनक क कमी को पूरा नह कर पाएगा, िज ह ने सन् 1974 म परमाणु परी ण कया था।’ धानमं ी नरिस हा राव ने सन् 1995 के अंत म परमाणु परी ण करने क इजाजत दे दी ले कन जब अमे रक उप ह ने इस बात का खुलासा कर दया तो भारत को पीछे हटना पड़ा। अमे रक सरकार ने भारत को इसके िलए कठोर चेतावनी दी थी। जब सन् 1996 म क म संयु मोचा क सरकार आई तो वै ािनक ने फर से परमाणु परी ण क इजाजत मांगी। ले कन देवगौड़ा ने इस पर आपि जािहर क । उ ह अमे रक आपि य क कोई फ नह थी ले कन उनक ाथिमकता ताकत के दशन क बजाय आ थक िवकास थी।21 माच, 1998 म बीजेपी के नेतृ व म एनडीए क क स ा म आई। उसके अगले महीने पा क तान ने भारत को उकसाते ए गोरी नाम क एक म यम दूरी के िमसाइल का परी ण कया। गोरी एक म यकालीन मुि लम लड़ाका था, िजसने उ र भारत के अिधकांश िह से को जीता था और कु छ दंतकथा के मुतािबक यहां भारी लूटखसोट मचाई थी। ‘इसका तुरंत जवाब देना ज री था य क ऐसा न करने क सूरत म बीजेपी क छिव भािवत होती। इस नए पा क तानी खतरे का जवाब देना ज री था। बीजेपी ऐितहािसक प से सुर ा के मसल पर कठोर कारवाई करने क िहमायती भी थी।’22 परमाणु ऊजा आयोग और र ा अनुसंधान िवकास संगठन के मुख ने सरकार को सलाह दी क परमाणु परी ण इसका सबसे बि़ढया जवाब हो सकता है। उनके इस आ नान को यात परमाणु िव ानी राजा रम ा का समथन िमला, िज ह ने सन् 1974 म परमाणु परी ण के दौरान याित अ जत क थी। उ ह सन् 74 म ए परी ण का िपता भी कहा जाता था। रम ा धानमं ी वाजपेयी से िमले, िज ह ने उ ह आ त कया क वे भारत को ‘एक नरम नह बि क मजबूत देश के प म देखना चाहते ह।’ इस पर उस परमाणु वै ािनक ने कहा क ‘आप वै ािनक को चौबीस साल तक अिन य क ि थित म नह रख सकते, अगर ऐसा आ तो धीरे -धीरे उनक ऊजा ख म हो जाएगी।’23 मई, 1998 म भारत ने राज थान के रे िग तान म पांच परमाणु परी ण कए। इन परी ण म तीन तरह के बम का परी ण कया गया, िजसम एक रे गुलर फजन बम था (एटम बम), एक थम यूि लयर बम और एक ‘सब- कलोटन’ हिथयार था। परमाणु परी ण से पहले और उसके बाद एनडीए सरकार के व र सद य ने अपने पड़ोिसय को ल य करके भड़काऊ बयानबािजयां क । र ामं ी जाॅज फनाडीस ने चीन को भारत का ‘दु मन नंबर एक’ बताया। गृहमं ी लालकृ ण आडवाणी ने कहा क अगर पा क तान क मीर म सम या पैदा करने के िलए आतंक समूह को भारत भेजता है तो भारत उसका करारा जवाब देगा। परमाणु परी ण के बाद देश म जो ओिपिनयन पोल (लोग के िवचार को जानने क या) करवाए गए, उससे यह साफ पता चला क यादातर शहरी भारतीय ने परमाणु परी ण का समथन कया। सबसे उ साही और खुशी मनाने वाली ित या हालां क बीजेपी के सहयोगी दल िविहप और आरएसएस क तरफ से ही आई। उ ह ने घोषणा क क वे परमाणु परी ण थल पर एक मं दर का िनमाण करगे और रे िडयो िव करण से दूिषत बालू के कण को जो उनके िलए पूजनीय था, पूरे देश म पूजा के िलए ले जाएंगे। िशवसेना मुख बाल ठाकरे ने वै ािनक को सलामी देते ए कहा क उ ह ने दखा दया है क हंद ू समाज के लोग ‘िहजड़े’ नह होते ह। वै ािनक ने खुद भी अखबार और समाचार चैनल के कै मर के सामने सैिनक वद पहनकर त वीर िखचवा ।24 ले कन दो स ाह के बाद रा भि के इस गु बारे से हवा िनकाल दी गई और सारा जोश फ का पड़ गया। 28 मई को पा क तान ने भी परमाणु परी ण कर दया। उनका परमाणु काय म बड़े ही सं द ध हालात म चलाया जा रहा था और उसम एक डच योगशाला क तकनीक का चोरी-छु पे इ तेमाल कया गया था, िजसे वहां के वै ािनक अ दुल का दर खान ने हािसल कया था। इसम पा क तान को चीन क तकनीक मदद भी िमली थी। जब क भारत का परमाणु बम पूरी तरह वदेशी तकनीक पर आधा रत था। ले कन दोन देश क तकनीक के बीच ये अंतर तब बेमतलब हो गया, जब पा क तान ने छह परमाणु परी ण करके (भारत से एक यादा) बलुिच तान सूबे म चगाई पहाि़डय को दहला दया। पा क तानी जनता ने गिलय और सड़क पर नाचकर इस खबर का ज मनाया। पा क तानी परमाणु काय म के जनक ए. यू. खान ने सा ा कारकता से कहा क ‘हमारा परमाणु बम भारत के परमाणु बम से यादा स म, मजबूत, उ त तकनीक पर आधा रत और भरोसेमंद है।’25 पा क तान क इस उपलि ध को ‘इ लािमक बम’ का नाम दया गया य क उस समय कसी भी मुि लम देश के पास एटम बम नह था। भारत म भी भारतीय परमाणु काय म के समथक और िवरोधी दोन ही इसे हंद ू बम के प म देखते थे। सचाई तो यह थी क भले मई, 1998 म देश क स ा पर बीजेपी कािबज थी ले कन परमाणु काय म क तैयारी कई पूववत कां ेस सरकार के अधीन क गई थी। परमाणु चय क नीित क - हमारे पास एटम बम है ले कन हम इसका परी ण नह करगे ब त तेजी से अ ासंिगक होती जा रही थी। भारत पर पि मी देश क तरफ से परमाणु परी ण पर ितबंध संबंिधत वैि क समझौते पर ह ता र करने के िलए दबाव डाला जा रहा था। ऐसे म भारत ने सोचा क अपने परमाणु हिथयार का परी ण कर इसे दुिनया के सामने सावजिनक कर दया जाए।26 वाभािवक प से बीजेपी ने परमाणु परी ण का राजनीितक फायदा उठाने क कोिशश क ले कन सीटीबीटी (परमाणु हिथयार पर रोक संबंधी संिध) पर ह ता र करने के दबाव म कोई कां ेस सरकार भी वैसा ही करती जैसा क बीजेपी ने कया था। सचाई तो यह थी क अतीत म ये कां ेस के धानमं ी थे, िज ह ने भारत को दुिनया म ‘शि शाली देश क ेणी’ म लाने क कोिशश क थी और ऐसा दावा भी कया था। शीतयु के खा मे के बाद ये दावे और भी पु ता होते चले गए। भारतीय नेता ने मांग क क अपने आकार, लोकतांि क इितहास, आ थक मता-संभावना आ द को देखते ए भारत को संयु रा सुर ा प रषद का थायी सद य बनाया जाए। ले कन उस दावे को लगातार नजरअंदाज कया जाता रहा और इस वजह से भारत का परमाणु काय म और भी ज री होता गया। दलगत भावना से ऊपर उठकर सभी दल ने इस बात पर सहमित जािहर क क परमाणु हिथयार के खुले ऐलान से पि मी देश भारत क बात पर गंभीरता से िवचार करगे। तक और दलील नाकामयाब हो रही थ , अब हंद ु तान के िलए दुिनया का यान ख चने के इरादे से धमाके करने ज री हो गए थे।27 VI दुिनया म िजन देश को परमाणु अ से लैस देश के प म मा यता हािसल थी वे संयु रा सुर ा प रषद के पांच थायी सद य थे। वे देश थे - स, चीन, अमे रका, ांस और इं लड। इस बात का भी पता चल गया था क इ ायल के पास भी परमाणु मता है। जब सन् 1998 क ग मय म भारत और पा क तान ने इस परमाणु लब म साथ-साथ वेश कया तो इसने पुराने सद य म बेचैनी पैदा कर दी। इस बात क आशंका जताई जाने लगी क क मीर िववाद दुिनया म पहले परमाणु यु का आगाज कर सकता है। दोन देश पर दबाव बढ़ाया जाने लगा क वे आपसी बातचीत के ारा सम या का समाधान कर। फरवरी, 1999 म भारत के धानमं ी ने बस से लाहौर क या ा क और पा क तान के धानमं ी से िमले। अटल िबहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ ने दोन देश के बीच कारोबार बढ़ाने और वीजा क या को उदार बनाने के बारे म बातचीत क । हालां क क मीर मु े पर कोई गित नह हो पाई, ले कन ये बात क दोन देश आपस म बात कर रहे थे यह पूरे उपमहा ीप और पि मी जगत के िलए सुकून क बात थी।28 ले कन वाजपेयी-शरीफ वाता के महज तीन महीन के भीतर भारत-पा क तान के संबंध फर से खराब हो गए। ज मू-क मीर के कारिगल िजले म हिथयारबंद घुसपैठ क खबर आ , िजसम कु छ तो क मीरी मूल के लोग थे ले कन अ य सकड़ क तादाद म पा क तानी नाग रक थे। उस अिभयान क योजना पा क तानी सेना ने बनाई थी, िजसने अपने धानमं ी को तभी इसक सूचना दी जब वे घुसपैठ कर चुके थे। उनका इरादा उस चोटी पर क जा करना था, जहां से ीनगर और लेह को जोड़ने वाली सड़क पर िनगाह रखी जा सके । यह एकमा वो सड़क थी, जो दोन मह वपूण शहर को सालभर चल सकने लायक यातायात मुहय ै ा कराती थी। पा क तानी सै य जनरल का मानना था क उनके पास परमाणु हिथयार होने क वजह से भारत घुसपै ठय पर कारवाई करने क जुरत नह कर पाएगा।29 भारतीय सेना को इस घुसपैठ क सबसे पहली सूचना गड रय के एक समूह से िमली। पहाड़ी बकर क तलाश म दूरबीन से पहाड़ म देखते ए उ ह पठान क वेशभूषा म कु छ लोग दखाई दए, जो बंकर क खुदाई कर रहे थे। उ ह ने इसक सूचना सेना के नजदीक रे जीमट को दी। सेना को पता चल गया क पा क तािनय ने कारिगल से टर के एक बड़े िह से पर क जा कर िलया है। उ ह ने पि म म मुशकोह पहाड़ी से लेकर पूरब म चोरबट ला तक पर क जा कर िलया था। यह फै सला कया गया क उ ह वहां से िनकाल बाहर कया जाए।30 गड रय ने पठान को 3 मई, 1999 को पहली बार देखा था। उसके ठीक दो स ाह बाद भारतीय ने दु मन के ठकाने पर गोले बरसाने शु कर दए। िहमालय क चो टय से होकर दहाड़ मारते बमवषक िवमान उड़ान भरने लगे और जमीन पर भारतीय जवान पहाड़ी चो टय पर चढ़ने का यास करने लगे। गम वातावरण म रहने वाले जवान को अब ठं डे और दु ह इलाके म लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। ‘िनणायक लड़ाई के बाद भारतीय जवान उस समानांतर खड़ी चोटी के करीब प च ं गए और रातभर कं पकं पाने वाली ठं ड म खड़े रहे, जहां से उनका सीधा मुकाबला घुसपै ठय से होना था।’31 पहाड़ क चो टय म भारी लड़ाई ई और दोन ही प को इसक काफ क मत चुकानी पड़ी। भारतीय िसपािहय को दजन चो टय पर क जा करना था, िजसक सुर ा पा क तानी घुसपै ठये मशीनगन से कर रहे थे। भारतीय जवान ने ास से टर म टाइगर िहल पर क जा कर िलया, जो उनके िलए एक मुख िवजय थी। पूरे जून के महीने तक लड़ाई चलती रही। जून क समाि तक पा क तािनय के चंगुल से 1500 वग कलोमीटर इलाका खाली करवाया जा चुका था। िजस इलाके पर फर से क जा कया गया था वे इलाके ऐसे मह वपूण ठकाने थे िजनसे ीनगर-लेह हाइवे पर िनगाह रखी जा सकती थी।32 जून के आखरी स ाह म अमे रक रा पित िबल लंटन को पा क तान के धानमं ी क तरफ से एक अ यािशत फोन कया गया। दोन ही देश नजदीक सहयोगी थे और अब उसम से किन सहयोगी अमे रका से उसे उस दु च से िनकालने म मदद क गुहार लगा रहा था, िजसक सािजश उसने खुद रची थी। उस लड़ाई म 2000 से भी यादा पा क तानी पहले ही अपनी जान खो चुके थे और अब नवाज शरीफ उस लड़ाई से िनकलने का कोई सुरि त रा ता खोजना चाहते थे ता क जनता को वे अपना चेहरा दखा सक। लंटन ने उ ह 4 जुलाई को यानी अमे रका के वतं ता दवस के दन िमलने का व दया। उस वाता म शरीफ ने पा क तानी सेना को वापस बुलाने का इस शत पर वादा कया क अमे रका भारत पर क मीर िववाद को हल करने का दबाव डालेगा। लंटन इस सम या के हल के िलए ‘स य दलच पी’ लेने पर राजी हो गए। इस आ ासन के साथ शरीफ इ लामाबाद लौटे और अिभयान को औपचा रक प से ख म करने क घोषणा कर दी।33 कु ल िमलाकर कारिगल अिभयान म भारतीय सेना के 500 जवान शहीद ए। शहीद ए जवान म पूरे देश के जवान थे और जब उनके शव का ताबूत उनके घर प च ं ा तो लोग म शोक और गौरव क लहर फै ल गई। उनके मृत शरीर को सावजिनक थान जैसे कू ल , काॅलेज और यहां तक क टेिडयम तक म रखा गया, जहां उनके प रवार वाले, दो त और उनके गांव-शहर के लोग उ ह ांजिल देने प च ं ।े पूरे सैिनक स मान के साथ उनका अंितम सं कार कया गया, जहां हजार लोग ने उ ह अ ुपू रत िवदाई दी। ऐसे मौके पर वहां कोई न कोई बड़ी ह ती अमूमन रा य के मु यमं ी या रा यपाल ज र मौजूद होते। िजन शहीद का स मान कया गया उनम अिधकारी वग के शहीद और जवान दोन ही शािमल थे। ब त सारे जवान पारं प रक प से उ र भारत या उ र-पि मी भारत के ही थे जहां से सेना म भत होने क पुरानी परं परा थी। ले कन ब त सारे शहीद उड़ीसा के गंजम् या फर कनाटक के तुमकु र जैसे इलाक से भी थे।34 मु क क िहफाजत म शहीद ए कु छ जवान तो ऐसे इलाक से थे, िज ह भारत क प रक पना म िवपरीत ुव पर माना जाता था। कारिगल क पहाि़डय पर फर से क जा करने म नगा रे जीमट के जवान का मु य योगदान रहा। सेना के एक जनरल ने उ मीद जािहर क क ‘िहमालय के दूसरे छोर पर बहादुर नगा का साहस और कु बानी उ ह उनक भारतीय पहचान दलाने म मदद करे गी।’ उनक बहादुरी िन य ही उनके भाई-बंधु ारा सराही गई। जब एक नगा लेि टनट का शव कोिहमा प च ं ा, 35 तो उसे देखने के िलए हजार लोग हवाईअ े पर प च ं गए। कारिगल म ई झड़प ने पंजाब और पंजािबय के भारत के साथ पूण एक करण को भी मजबूत कर दया। सीमा के आसपास रहने वाले पंजाब के कसान ने जोर दया क अगर यह झड़प एक पूणयु् का श ल अि तयार करती है तो वे भारतीय सेना क पूरी मदद करगे, उ ह भोजन, आवास और ज रत पड़ी तो सैिनक मदद भी मुहय ै ा कराएंग।े एक िसख कसान ने कहा क ‘हम जवान के साथ कं धे से कं धा िमलाकर लड़गे और पा क तािनय को हमारे इलाके म घुसने क जुरत करने के िलए कड़ा सबक िसखाएंग।े ’36 पूरे भारतवष म कारिगल संघष ने देशभि का एक उ माद पैदा कर दया। देशभर म सैिनक िनयुि क पर सेना म भत होने के िलए हजार नौजवान म होड़ मच गई। उनक तादाद इतनी थी क कई बार पुिलस को उ ह िततर-िबतर करने के िलए गोिलयां तक चलानी पड़ ।37 चीन के साथ ई लड़ाई के दर यान भी लोग म ऐसी ही देशभि क भावना देखने को िमली थी। हालां क दोन ही घटना म मह वपूण अंतर था। उस व हमलावर देश क हजार कलोमीटर जमीन पर क जा करने म कामयाब हो गए थे और फर अपने आप लौट गए थे। ले कन इस व उ ह सफलतापूवक हमारी जमीन से हमारी सेना ने खदेड़ दया। उस िहसाब से देखा जाए तो कारिगल यु देश क सेना और देशवािसय के िलए एक भावना मक अनुभव भी था। भारतीय सेना ने आिखरकार फर से अपनी पुरानी हैिसयत हािसल कर ली थी। इसने सन् 1962 म चीिनय को खदेड़े जाने म ई अपनी नाकामयाबी के कलंक को पूरी तरह से धो डाला था। साथ ही साथ इस घटना ने एक यादा भावशाली और यादा धमक वाले भारतीय रा वाद को भी ज म दया। इससे पहले कभी भी सरहद पर मारे जाने वाले जवान के शव ने इतना भावना मक वार पैदा नह कया था। ऐसा लग रहा था क देश का हरे क िजला इस संकट क घड़ी म बिलदान देने के िलए तैयार है। इस भावना क अिभ ि ंट और टीवी के प कार ारा ई, िज ह ने इसे हवा देने म भी कोई कसर नह छोड़ी। खबर बताने क उनक होड़ ने उन अनुभवी प कार को भी अपने भाव म ले िलया, िज ह ये पता था क खबर क इस होड़ का पहला िशकार सच ही होता है! VII अ टू बर, 1999 म लोकतं के साथ पा क तान क संि आंख-िमचौली ख म हो गई। पाक सेना य जनरल परवेज मुशरफ के नेतृ व म ए एक त तापलट म धानमं ी नवाज शरीफ को ग ी से हटा दया गया। इस घटना से भारत के लोग िन य ही ब त खुश नह ए य क ये मुशरफ ही थे, िज ह कारिगल घुसपैठ का मु य सू धार माना गया था। माच, 2000 म अमे रका के रा पित लंटन ने दि ण एिशया का दौरा कया। उ ह ने भारत म पांच दन जब क पा क तान म महज पांच घंटे िबताए। यह अमे रका के पा क तान के ित ऐितहािसक झुकाव से िब कु ल ही अलग ख था। यह संकेत भारत क बढ़ती आ थक हैिसयत क अमे रका ारा क जा रही वीकारोि था ले कन साथ ही साथ सैिनक शासन क तरफ पा क तान के लौटने का अमे रक िवरोध भी। लंटन के द ली आने के महज एक दन बाद भारतीय सेना क व दय म आतंकवा दय ने क मीर के छ ी संघपुरा गांव म वेश कया और िसख पु ष को घर से िनकालकर उ ह गोली मार दी। ‘तीन सौ घर के उस गांव म लगभग हरे क घर ने एक संबंधी, दो त या पड़ोसी खोया था।’ उससे भी दुखद बात ये ई क सुर ाबल ने उन पांच लोग को मार दया िजन पर उ ह उस घटना को अंजाम देने का शक था ले कन बाद म वे बेकसूर िनकले।38 शायद छ ी संहपुरा के ह यारे वतं आतंकवादी थे िज ह ने पा क तान सरकार क इजाजत के बगैर इन कारगुजा रय को अंजाम दया था।39 ले कन फर भी यह साफ था क क मीर िववाद क वजह से ही दोन देश इतना अंदर से बंटे ए थे। पा क तान के रा पित परवेज मुशरफ ने अपने देश क उस दैिनक ितब ता को दोहराया िजसके तहत क मीर के ‘मुि संघष’ का समथन करना उनका नैितक कत था। भारत के धानमं ी ने ‘ि रा वाद के िस ांत से िचपकने के िलए अपने पा क तानी समक क आलोचना क िजसक वजह से मु क का बंटवारा आ था।’40 कोई भी देश क मीर पर एक दूसरे क ि थित को समझने के िलए तैयार नह था। फर भी दोन देश के बीच एक वाता क फर से शु आत ई। शायद यह इस बात से े रत थी क दोन देश दुिनया क िनगाह म एक िज मेदार परमाणु रा के प म सामने आएं। जुलाई, 2001 म रा पित मुशरफ ने भारतीय सरकार के आमं ण पर आगरा क या ा क । उ ह और उनक प ी को एक शानदार होटल म ठहराया गया जहां से ताजमहल साफ दखता था। जनरल मुशरफ और वाजपेयी म कई घंट तक सहायक के साथ और उनके िबना भी वाता ई। हालां क वो वाता िबना कसी नतीजे के ख म हो गई य क वाता के बाद जारी कए गए संयु घोषणाप ने दोन देश को िनराश कया। भारत चाहता था क घोषणाप म सीमापार आतंकवाद पर ठोस आ ासन दए जाएं तो पा क तान का मानना था क घोषणाप म क मी रय क राजनीितक आकां ा को वीकार करने क बात कही जाए। जब जनरल मुशरफ आगरा म थे तो आतंकवा दय ने घाटी म फर से हमला कया। बारह अलग-अलग हमल म करीब अ सी आदमी मारे गए। यह लगभग िनयम ही बनता जा रहा था। जब भी कोई मह वपूण ि नई द ली क या ा करता, घाटी म हंसा का च बेकाबू हो जाता। जब अमे रका के िवदेशमं ी काॅिलन पाॅवेल अ टू बर, 2001 म नई द ली क या ा पर आए तो आतंकवा दय ने ज मू-क मीर िवधानसभा भवन पर ेनेड से हमला कया। दो महीन के बाद तो उ ह ने और भी दु साहसी कदम उठाया। चार आ मघाती आतंकवा दय ने एक कार से भारतीय संसद भवन के प रसर म वेश कया और उसे उड़ाने क कोिशश क । उ ह पुिलस ने मार िगराया िजनक बाद म पा क तािनय के तौर पर पहचान क गई।41 ीनगर म िवधानसभा भवन उस रा य का भारत के साथ एक करण का तीक था। जब क द ली म संसद भवन भारतीय लोकतं का ही तीक था। संसद भवन म भारत क एक अरब जनता के ितिनिध बैठते थे। इन दोन जगह पर हमल ने कू टनीितक वाता का अंत कर दया। भारत ने पा क तान पर आतंकवा दय को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। अमे रक सरकार से भी अपील क गई क वो अपने इस पुराने सहयोगी पर लगाम लगाए। 11 िसतंबर, 2001 को अमे रका पर ए आतंकवादी हमल के बाद भारत ने सहानुभूित जताते ए कहा था क भारत भी इस तरह के आतंकवादी हमल का लंबे समय से िशकार रहा है। सन् 2002 के वसंत म भारत और पा क तानी सेना के बीच झड़प यादा तेज हो ग । जैसे ही वसंत बीता और गम का मौसम शु आ ये झड़प और भी तेज हो गई। सेना का जमावड़ा बढ़ता गया। सन् 1998 म ई कारिगल झड़प क याद ताजा हो गई और इस बात क आशंका जताई जाने लगी क उपमहा ीप म कह इितहास का पहला परमाणु यु तो शु नह हो जाएगा? एक िति त नेपाली मािसक ने िलखा क ‘यह े फर से एक बार यु के मुहाने पर खड़ा है।’ एक मुख अमे रका िव ेषणकता क राय म ‘भारत और पा क तान के बीच क तनातनी सन् 1962 म अमे रक यु पोत ारा यूबा क नाके बंदी से सोिवयत यु पोत के थान क घटना के बाद सबसे खतरनाक घटना है।’42 आिखरकार लड़ाई नह ई, शायद इसक योजना भी नह बनाई गई थी। भारत के भीतर भी क मीर म होने वाले िवधानसभा चुनाव क तरफ यान मोड़ दया गया। जैसा क द ली से कािशत होने वाले एक अखबार ने बडे तीखे वर म िलखा क सन् 1977 के चुनाव को छोड़कर रा य म ‘चुनावी धांधली का एक पुराना इितहास रहा था।’43 अतीत म क मीर म होने वाले चुनाव म ‘चुनाव आयोग हमेशा से ही सुर ा बल और वहां क भेदभाव करने वाली सरकार के प म दखता रहा था।’ अब चुनाव आयोग ने अपनी उस पुरानी छिव से िनजात पाने के िलए दन-रात मेहनत शु क । मु य चुनाव आयु ने मतदाता सूची क पूण समी ा के आदेश दए, िजसे सन् 1988 से अबतक नह बदला गया था। पूरे रा य म इसके िलए घर-घर एक ापक मतदाता सव ण करवाया गया और साढ़े तीन लाख प क एक िवशाल मतदाता सूची तैयार क गई जो उदू िलिप म थी। उसके बाद मतदाता सूची क ितय को राजनीितक दल म बांटा गया। उसे रा यभर म कू ल, अ पताल और सरकारी कायालय के बाहर भी िचपका दया गया। इसके बाद 8000 इलै ाॅिनक वो टंग मशीन का भी आयात कया गया ता क चुनाव म धांधली को रोका जा सके ।44 िसतंबर, 2002 म रा य म िवधानसभा चुनाव करवाए गए। चुनाव से ठीक पहले आतंकवा दय ने एक मुख उदारवादी नेता क ह या कर दी और लोग से अपील क क वे चुनाव का बिह कार कर। इसके बावजूद करीब 48 फ सदी क मी रय ने अपने मतािधकार का योग कया जो देश के अ य िह स म होने वाले मतदान से थोड़ा ही कम था। ले कन यह मतदान उ मीद से कह यादा था। अंतरा ीय पयवे क ने भी माना क चुनाव िन प और वतं प से करवाए गए थे। स ाधारी नेशनल कां े स को स ा से बाहर कर दया गया और पीप स डेमो े टक पाट और कां ेस गठजोड़ स ा म आ गया। रा य क राजनीित को लंबे समय से जानने वाले दो राजनीितक िव ेषक ने िलखा क साल 2002 म करवाए गए ज मू-क मीर िवधानसभा चुनाव को ‘सन् 1987 के चुनाव के उलट एक भूल सुधार के प म देखा जाना चािहए, िजसम लोकतांि क या क धि यां उड़ाई गई थ और िजसने अलगाववादी अिभयान को हवा दी थी। सन् 2002 के चुनाव म लोकि य मतदान के ारा स ा प रवतन कया गया और एक तरह से यह सरकार और जनता के बीच पुल बनाने के काम आया।’45 रा य के नए मु यमं ी मु ती मोह मद सईद ने इन बात को और भी सं ेप म करते ए कहा क ‘यह चुनाव सन् 1953 के बाद से पहला चुनाव है, िजसम भारत ने क मीरी आवाम के बीच म वैधता पाई है।’46 सन् 2003 क ग मय म करीब एक दशक बाद क मीर घाटी म देश के दूसरे िह स से सैलािनय का जूम उमड़ आया। मई और जून के महीने म पचास हजार के करीब सैलानी मौज-म ती के इरादे से घाटी प च ं गए। घाटी और ीनगर के डल झील के इदिगद तमाम होटल सैलािनय से खचाखच भर गए। इं िडयन एयरला स ने द ली से ीनगर जाने के िलए एक अित र उड़ान क घोषणा क । इन बात से उ ेिजत होकर आतंकवा दय ने घाटी म वारदात क एक शृंखला को अंजाम दया। उ ह ने शाॅ पंग काॅ ले स और अ य जगह पर ेनेड से हमला कया, नाग रक का अपहरण कया और मु यमं ी आवास पर आ मघाती हमला कया।47 ले कन अगले साल उससे भी यादा सैलािनय ने घाटी म द तक दी और ीनगर के िलए फर से अित र उड़ान क घोषणा क गई। जनवरी, 2005 म करीब तीन दशक के बाद ज मू-क मीर म थानीय िनकाय के चुनाव क घोषणा क गई। इन थानीय चुनाव म आतंकवा दय क धमक और कु छ उ मीदवार क ह या के बावजूद करीब 60 फ सदी मतदाता ने मतािधकार का योग कया। िजन लोग ने मतदान म िह सा िलया उ ह ने कहा क वे अपने ितिनिधय से नई सड़क, साफ पेयजल और बेहतर सफाई क उ मीद कर रहे ह। पा क तान समथक आतंकवा दय के गढ़ माने जाने वाले सोपोर म एक दुकानदार को यह कहते ए उ धृत कया गया क ‘हम आजादी हािसल होने तक नाग रक सुिवधा के िलए इं तजार नह कर सकते।’48 सरकारी आंकड़ के मुतािबक ज मू-क मीर म हंसक घटना म कमी दज क गई। यह साल 2002 म 3505 से घटकर साल 2005 म 2000 से कम पर िसमट आई।49 हालां क अभी भी ये नह कहा जा सकता था क रा य म पूरी तरह से शांित बहाल हो गई है। ले कन ब त साल के बाद ऐसा लग रहा था क इस इलाके के ऊपर भारत सरकार का दावा पूरी तरह से खोखला नह है। अब पा क तान के साथ वाता म भारत कई तरह के ‘िव ास बहाली के उपाय ’ क बात कर सकता था िजनम क मीर के दोन िह स के बीच बस सेवा क शु आत भी शािमल थी। ीनगर से मुज फराबाद के िलए पहली बस 7 अ ैल, 2005 को चलने वाली थी। ले कन 6 अ ैल क दोपहर को आतंकवा दय ने उस टू र ट काॅ ले स पर हमला कया, जहां या ी ठहरे ए थे। उस हमले को नाकाम कर दया गया और अगले दन योजना के मुतािबक दो बस रवाना हो ग । एक संवाददाता ने, जो उस बस म या ा कर रहा था, िलखा क कै से जब बस ने अमन सेतु (उस पुल का नाम जो िनयं ण रे खा पर बनाया गया था) पार कया तो दशक से ‘िबछड़े ए प रवार एक दूसरे से भावुक होकर िमले और उनके ऊपर गुलाब के पंखुि़डय क वषा क गई। उस असाधारण ण का मह व शायद उन घटना क पृ भूिम म िछपा था। 49 याि य को लेकर गई बस ने जब सीमा पार क तो उसने उस िवभाजक रे खा को ख म कर दया िजसने क मीर को पांच दशक के खूनखराबे और पूवा ह क वजह से बांट रखा था।’50 हालां क ऐसे लोग भी ज र मौजूद थे, जो चाहते थे क खूनखराबा जारी रहे और पूवा ह बरकरार रहे। 11 जुलाई, 2006 को क मीर म पयटक पर दो आतंकवादी हमले ए। इनम आठ बंगाली पयटक मारे गए। उसी दन मुंबई (पहले का बंबई) म लोकल ेन म आठ जगह बम धमाके ए। वहां मृतक क सं या काफ यादा थी। उस हमले म 200 से भी यादा लोग मारे गए और हजार से भी यादा घायल हो गए। यह आतंकवादी घटना के इितहास म सबसे यादा दल दहला देने वाली घटना म से एक थी। हालां क इन घटना को अंजाम देनेवाल क िशना त नह हो पाई ले कन उनके इराद पर कसी को शक नह था। उनका इरादा हंद ु को मुसलमान से, क मीर को शेष भारत से और हंद ु तान को पा क तान से लड़ाई के िलए उकसाना था। VIII जमनी के महान समाजशा ी मै स वेबर ने कभी ट पणी क थी क कसी भी ि के पास राजनीित को अपना पेशा बनाने के दो तरीके ह। या तो वह राजनीित के ‘िलए’ जीता है या फर उससे ‘अलग’ रहता है।51 भारतीय राजनीित म पहली पीढ़ी के अिधकांश नेता ने राजनीित के िलए अपनी जंदगी जी थी। वे उस स ा के ित ज र आक षत थे, जो उ ह राजनीित क वजह से िमली थी ले कन उनम सेवा और याग क भी भावना थी। ले कन यादातर भारतीय नेता क मौजूदा पीढ़ी राजनीित म इसिलए वेश करती है ता क इसके सहारे वे जी सके । वे राजनीित ारा द स ा और ित ा क वजह से इसम वेश करते ह और उससे भी यादा धन कमाने के उ े य से इसके ित आक षत होते ह। वे जानते ह क रा य स ा पर िनयं ण उ ह अक पनीय फायदा प च ं ा सकता है। हालां क ऐसा नह था क सन् पचास के दशक म राजनीितक ाचार के बारे म लोग को पता नह था। मु ा घोटाला और पंजाब के ताप संह कै रो के शासन म ाचार क घटनाएं तब भी ई थ । ले कन इसका आकार सीिमत था। नेह और यहां तक क लालबहादुर शा ी मंि मंडल के यादातर मंि य ने भी आ थक िहत के िलए अपने पद का दु पयोग नह कया था। हालां क कां ेस के कु छ नेता पाट फं ड के िलए ज र ापा रक घरान से धन ा करते थे। ले कन स र का दशक आते-आते नेता ने र ा ठे क और अ य काय के िलए ापा रक घरान से कमीशन क मांग करनी शु कर दी। उस पैसे का उपयोग पाट फं ड म होता था, िजसे अगले चुनाव म इ तेमाल कया जाता था। अ सी के दशक तक राजनीितक ाचार सं थािनक प से िनकलकर िनजी तर तक प च ं गया। अब क और रा य के यादा से यादा मं ी सरकारी ठे क , तबादल और अ य तरीक से पैसा बनाने लगे। राजनीितक ाचार का जो च र है उसके िहसाब से इसका लेखा-जोखा वृतिच मक कम बि क दंतकथा जैसा यादा है। िजन लोग ने ाचार क इस बहती गंगा म कमीशन दए या िलए उ ह ने शायद ही कोई िलिखत सबूत छोड़ा हो। ले कन सन् न बे के दशक म सीबीआई ने कई मुख नेता के िखलाफ ‘आय से यादा संपि रखने’ को लेकर आरोपप ज र पेश कया। उन नेता म िबहार और तिमलनाडु के मु यमं ी लालू साद यादव और जयलिलता सरीखे नेता शािमल थे। दोन नेता पर हजार करोड़ पए के गबन का आरोप लगाया गया जो उ ह ने सरकारी ठे क से हािसल कए थे। एक दूसरे मामले म सीबीआई ने क ीय संचार मं ी सुखराम के घर छापा मारकर 36 करोड़ पए नकदी बरामद कए। यह आरोप लगाया गया क ये पैसे िनजी टेलीफोन कं पिनय को लाइसस दलाने म कमीशन के तौर पर हािसल कए गए थे। इन सभी मामल म आरोपप सजा दलाने के तर तक नह प च ं पाया। कई बार सबूत के अभाव म आरोपी छू ट गए तो कई बार यायपािलका क भी ता क वजह से वे छू ट गए। ाचा रय के बीच आपसी तालमेल भी काफ अ छा देखा गया। चुनाव के व तो िवप ी पा टय ने ाचार को लेकर काफ होह ला मचाया ले कन जब वे स ा म आए तो अपने पूववत िनजाम के ाचार पर आंख मूंद ली। ऐसा इसिलए कया गया क शायद आने वाले व म जब वे स ा म नह रहगे तो उनके ित भी िवप ी पा टयां वैसा ही लचीला रवैया अपनाएंगी।52 हक कत तो यह थी क िविभ पा टय और िविभ देश के नेता एक-दूसरे क मदद ही करते पाए गए। एक बारीक से अ ययन कए गए मामले म ह रयाणा के एक मु यमं ी ने पंजाब के मु यमं ी के बेटे को सरकारी जमीन आवं टत कर दी। उस जमीन का बाजार मू य 50 करोड़ पए था जब क इसके िलए महज ढाई करोड़ पए ही दए गए।53 राजनीित िव ानी पीटर िडसूजा के श द म ाचार भारतीय राजनीित का एक ‘असुिवधाजनक त य’ है। द ली क सरकार िवदेश से होने वाली हरे क खरीद खासकर र ा सौद म कमीशन लेती है। िवदेशी सौद म जो दलािलयां ली जाती ह वो अमूमन सौद क 20 फ सदी तक होती ह। अिधकांश रा य म यादातर मं ी िबकने के िलए तैयार होते ह। वे कं पिनय को दए जाने वाले ठे क , उ ािधका रय क िनयुि य , जमीन के सौद और अ य काम के िलए कमीशन लेते ह। योजना आयोग के एक आंकलन के मुतािबक ामीण िवकास के िलए जारी क गई 70 से 90 फ सदी तक क रािश क बंदरबांट हो जाती है। इसम पंचायत के अिधकारी से लेकर सांसद तक सब पैसा खाते ह। सरकारी अिधकारी भी अपना िह सा लेने म पीछे नह रहते। शहर क सड़क के खराब हालत म होने क एक वजह ये होती है क उनके िलए जारी क गई रकम कह और चली जाती है। बंगलौर नगरपािलका क सड़क के रखरखाव और उनके िनमाण के िलए आवं टत हरे क सौ पए म से चालीस पया नेता -अिधका रय क जेब म और बीस ठे केदार के मुनाफे के प म चला जाता है। वा तिवक काय पर महज चालीस पए ही खच होते ह जो या तो खराब तरीके से कए जाते ह या कए ही नह जाते।54 य क स ा म रहना इतना फायदेमंद है क ाचार क वृि राजनेता म बढ़ती ही जा रही है। ब मत बनाए रखने और सं याबल जुटाए रखने के िलए िवधायक क खरीद-फरो त (अमूमन ऊंची दर पर) क जाती है। गठबंधन और अ पमत सरकार के इस युग म यह धंधा खूब फल-फू ल रहा है। िवधायक अ सर पाला बदल लेते ह और पा टय क अदला-बदली करते रहते ह। यह इतनी सामा य बात हो गई है क कसी खास दल के नेता को तोड़ने के िलए या तोड़कर थोक के भाव म गोवा जैसी ‘छु ी मनाने’ क जगह पर ले जाया जाता है। यहां वे झुंड म ले जाए जाते ह और कई बार उनक सं या पचास तक होती है। यहां उ ह शानदार होटल म रखा जाता ह जहां वे प े खेलते ह और मौजम ती करते ह। होटल के बाहर हिथयारबंद लोग उनपर कड़ी िनगाह रखते ह ता क कोई फोन काॅल या कोई अनजान ि उनसे िमल न सके । यह छु ी का मौसम तब तक चलता है जब तक क राजनीितक संकट ख म नह हो जाता। यह अमूमन कई स ाह तक चलता है। चूं क राजनीित इतना अ छा वसाय है क यह एक गंदे कारोबार म भी त दील हो गया है। सन् 1985 म सनडे नाम के सा ािहक ने ‘द अंडरव ड आॅफ इं िडयन पाॅिल ट स’ के नाम से एक आवरण कथा कािशत क िजसम बताया गया क कै से उ र देश और िबहार जैसे रा य म आपरािधक त व चुनाव लड़ रहे थे। वे कई बार चुनाव जीत भी जाते थे और कई बार उ ह मं ी भी बना दया जाता था। उन पर िजन अपराध के आरोप लगे थे उनम ‘ह याएं, अपहरण, बला कार, छेड़खानी और गुंडागद जैसे अपराध शािमल थे।’55 अगले दशक म इतनी तादाद म आपरािधक त व राजनीित म शािमल हो गए क एक नाग रक समूह ने सु ीम कोट म यािचका दायर क िजसम राजनीितक दल से कहा गया क वे अपने उ मीदवार का िववरण जारी कर। मई, 2002 म अदालत ने राजनीितक दल के िलए ये ज री बना दया क रा ीय और िवधानसभा चुनाव म वे अपने उ मीदवार क संपि और उनके आपरािधक च र के बारे म (अगर कोई है तो) िववरण जारी कर। एसोिसएशन आॅफ डेमो े टक रफाॅ स नाम क सं था ने, िजसने सबसे पहली जनिहत यािचका दायर क थी, रा य म चुनाव पर िनगाह रखने के िलए कमे टयां बना िजसम थानीय वक ल, िश क और छा शािमल थे। सन् 2002-3 म ए पांच रा य म िवधानसभा चुनाव म उ मीदवार ारा जमा कए गए शपथप को सं िहत कया गया और उनका िव ेषण कया गया। मुख राजनीितक दल म मसलन बीजेपी, कां ेस, उ र देश क समाजवादी पाट और िबहार के रा ीय जनता दल के लगभग 15-20 फ सदी उ मीदवार का आपरािधक रकाॅड था। साल 2003 म ए राज थान िवधानसभा चुनाव के एक िव तृत अ ययन ने साफ दखाया क चुनाव लड़ने वाले करीब आधे उ मीदवार भारतीय मानक के िहसाब से काफ धनी थे। उनम से हरे क ने तीस लाख पए से यादा क संपि क घोषणा क थी। उनम से 124 उ मीदवार के आपरािधक रकाॅड थे। उनम से चालीस फ सदी उ मीदवार पर ऐसेऐसे अपराध के आरोप लगाए गए थे िज ह ‘गंभीर’ अपराध क ेणी म रखा जा सकता था। इन अपराध म हिथयारबंद डकै ितयां, ह या क कोिशश, उपासना थल पर हमले या उ ह अपिव करने क कोिशश और आगजनी करने के अपराध भी शािमल थे।56 उसी तरह के च काने वाले शपथप सन् 2004 के लोकसभा चुनाव म उन 541 चुने ए सांसद के भी थे। कां ेस से सवािधक धनी सांसद जीतकर लोकसभा प च ं े थे। उनम से हरे क क संपि औसतन 3 करोड़ 10 लाख पए के बराबर थी। यादातर सांसद क संपि 1 करोड़ से ऊपर क थी। सबसे कम संपि वाले सांसद क युिन ट पा टय से थे। आपरािधक रकाॅड क जहां तक बात है तो यू.पी. और िबहार के सांसद म मानो इस बात क होड़ लग गई थी। आरजेडी (रा ीय जनता दल) के 34.8 फ सदी, बीएसपी (ब जन समाज पाट ) के 27.8 फ सदी और सपा (समाजवादी पाट ) के लगभग 20 फ सदी सांसद आपरािधक रकाॅड वाले थे। कां ेस और बीजेपी इस मामले म थोड़ी सी ही कम थी, उनके मशः 17 और 20 फ सदी सांसद आपरािधक कारनाम वाले थे। ले कन त वीर तब उलट जाती थी, जब सावजिनक िव ीय सं था से पैसा कज लेने क बात आई। कां ेसी सांसद इस मामले म अ वल रहे। कां ेस के 45 फ सदी सांसद जब क बीजेपी के 23 फ सदी सांसद ने सावजिनक िव ीय सं था से कज िलया था। एक बार फर से क युिन ट सांसद का च र यादा उजला था। उनम से लगभग कसी ने भी ऐसा कज नह िलया था।57 ऊपर के िववरण से हम यह अदांजा लगा सकते ह क क क स ा म रहते ए कां ेस और बीजेपी दोन ने पूरे तं का अपने प म योजनाब तरीके से कस कार दोहन कया था। इसम कां ेस का िह सा यादा था चूं क वह यादा दन तक स ा म रही थी। दूसरी तरफ रा य क स ा म बने रहने के िलए सपा, बसपा और राजद बुरी तरह से आपरािधक त व पर िनभर होते चले गए।58 ाचार और अपराधीकरण के साथ ही भारतीय राजनीित बुरी तरह भाईभतीजावाद और खानदानवाद के चंगुल म फं सती चली गई। एक जमाना था जब यादातर राजनीितक दल क एक सुग ठत िवचारधारा और संगठन आ करता था। ले कन अब वे पा रवा रक उप म म त दील होकर रह गई थी। इस या क शु आत उसी महान ाचीन पाट के ारा और उसके भीतर ई थी, िजसका नाम भारतीय रा ीय कां ेस था। अपने इितहास के यादातर काल म कां ेस पाट को लोकतांि क मू य को मानने वाले लोग ने चलाया था, िजसम िजला और ांतीय तर पर िनरं तर चुनाव होते रहते थे। सन् 1969 म पाट म ए िवभाजन के बाद ीमती गांधी ने पाट संगठन के चुनाव पर िवराम लगा दया। उसके बाद से कां ेस के मु यमं ी और रा य के अ य द ली के नेता ारा नामां कत कए जाने लगे। उसके बाद आपातकाल के दौरान ीमती गांधी ने कां ेस परं परा को एक और भारी आघात प च ं ाया जब उ ह ने अपने बेटे संजय को अपना उ रािधकारी घोिषत कर दया। संजय क मौत के बाद उनके बड़े भाई राजीव को पाट और व आने पर सरकार क कमान संभालने के िलए तैयार कया जाने लगा। जब सन् 1998 म पाट नेता ने सोिनया गांधी को पाट क कमान संभालने के िलए आमंि त कया तो यह मानो उस बात क महज वीकारोि थी क पाट ने खानदान के सामने आ मसमपण कर दया था। सोिनया गांधी ने भी अपने बेटे को सन् 2004 म राजनीित म शािमल होने के िलए कहा और उ ह नेह प रवार के िलए सबसे सुरि त माने जाने वाली संसदीय सीट अमेठी स प दी। अगर कां ेस पाट सन् 2009 के चुनाव म स ा बरकरार रखती है (यह कताब 2009 के चुनाव से पहले िलखी गई थी) तो रा ल गांधी अगर चाह तो धानमं ी बनने क दौड़ म दूसरे उ मीदवार से ज र आगे रहगे। भारत के सव मुख राजनीितक दल के च र पर रणकारी भाव के अलावा भी ीमती गांधी के वंशवादी रवैये ने मानो अ य पा टय के िलए वंशवाद का बना-बनाया ढांचा तुत कर दया। काडर आधा रत वाम और दि णपंथी पा टय मसलन क युिन ट और बीजेपी को छोड़कर भारत क तमाम पा टयां पा रवा रक जागीर म त दील होती चली गई ह। एक जमाना था क डीएमके िवड़ रा वाद और सामािजक सुधार क गौरवमयी पाट थी ले कन अब उसके कै डर जानते ह क एम क णािनिध का बेटा या भतीजा ही उनका उ रािधकारी बनेगा। मराठी अि मता और हंद ू रा वाद के अपने तमाम दाव के बावजूद िशवसेना के नेता बाल ठाकरे को जब अपना उ रािधकारी खोजने क ज रत महसूस ई तो उ ह ने भी अपने बेटे उ व पर ही भरोसा कया। समाजवादी पाट और रा ीय जनता दल दोन ही ‘समािजक याय’ क पाट होने का दावा करती है ले कन मुलायम संह यादव ने साफ कर दया है क उनका बेटा अिखलेश ही उनका उ रािधकारी बनेगा। लालू साद यादव को जब िबहार के मु यमं ी पद से इ तीफा देना पड़ा (एक ाचार के मामले के बाद) तो उ ह ने अपनी प ी राबड़ी देवी को मु यमं ी बना दया जब क उनका पुराना काय-अनुभव िसफ प रवार और रसोई तक ही सीिमत था। यह परं परा पूरे तं म ऊपर से लेकर नीचे तक फै ल गई है और आलम यह है क अगर कसी सांसद क मृ यु होती है तो उसके बेटे या बेटी को अमूमन उसक जगह पर नामां कत कर दया जाता है। बंगाल के गांव म शोध करते ए नाॅव के एक मानवशा ी ने पाया क राजनीित को ा याियत करने के िलए िजस श द का अमूमन इ तेमाल होता है वो ‘नून ा’ यानी गंदा है। नेता के बारे म लोग ऐसे बात करते थे मानो वे गलागाली (गालीगलौज), मारामारी (हाथापाई) और गंदगोल (उप व) को बढ़ावा देने वाले ह । कु ल िमलाकर लोग क राय यह थी क राजनीित समाज म िसफ जहर फै लाती है। हालां क गांव वाल का ये भी कहना था क ऐसा हमेशा से नह था। आजादी के व नेता लोग ईमानदार, मेहनती और सम पत होते थे, ले कन अब हरे क दल म ‘ष ं कारी और िस ांतिवहीन लोग’ भर गए ह।59 लोग क ये उि यां पूरे देश के संदभ म भी उतनी ही ासंिगक ह। गैलप नाम क एक सं था ारा साठ देश म कराए गए एक सव ण से ये बात साफतौर पर उभरकर सामने आई क भारत के लोग म अपने नेता के ित िव ास म सबसे यादा कमी पाई गई। सव ण म 91 फ सदी लोग ने कहा क उनके नेता ईमानदार नह ह।60 हालां क दूसरे समाज के बारे म कसी अ य समय म िलखते ए िव ान ने ज र इस संदभ म ऐसी बात कह िजससे भारतीय को थोड़ी राहत िमल सकती है। इस तरह सन् चालीस के दशक म अपने देश के बारे म िलखते ए जाॅज लुईस बोखज ने िलखा क रा य का व प गैर-वैयि क है, अजटीना के लोग तभी फायदे म रह सकते ह जब वे िनजी संबंध के बल पर अपना काम िनकाल। इसिलए उनके मुतािबक सावजिनक धन क लूट कोई अपराध नह था। उ ह ने कहा क ‘म महज इस त य को रे खां कत कर रहा ,ं म इसे सही नह ठहरा रहा या इसके िलए बहाने नह बता रहा।’ िपछली सदी के यूरोप के बारे म बात करते ए इितहासकार आर.ड यू. साउदन ने ट पणी क क ‘म यकालीन शासक के िलए भाई-भतीजावाद, खानदानवाद, राजनीितक घूस और अपने प रवार के िलए सं थागत धन क लूट कोई अपराध नह था। वह तो शासन चलाने क महज एक कला थी! यह िजतनी अ य लोग के िलए ज री थी उतनी ही ज री समाज के मठाधीश के िलए भी थी!’61 IX समसामियक भारत म ाचार िसफ िवधायका म ही नह बि क नौकरशाही म भी आम बात है। अतीत म यह िसफ नौकरशाही के िनचले तर पर सीिमत था जहां िनचले तर के अिधकारी मकान, िबजली के कने शन और नौक रय क सूची बनाते समय घूस िलया करते थे।62 ले कन हाल के समय म यह उ तर के अिधका रय म भी फै ल गया है। यहां तक क सीबीआई ने भारत सरकार के सिचव और रा य के मु य सिचव पर भी ‘आय से अिधक“ संपि रखने का आरोप लगाया है। इन अिधका रय क जीवनशैली भी कु छ इ ह बात क तरफ चुगली करती है। उनके पास िवशाल फामहाउस ह और वे िवदेश म शानदार पयटन थल पर छु या मनाने जाते ह, िजसका खच उनके पूरी जीवनभर क आिधका रक कमाई से यादा होता है।63 जवाहरलाल नेह के व भारतीय िसिवल सेवा राजनीित से अलग मानी जाती थी या ब त हद तक अलग भी थी। तबादले और पदो ितयां सरकार के कायकारी भाग यानी उ नौकरशाही का काम था। ले कन स र का दशक आते-आते ऐसे नौकरशाह क बाढ़ सी आ गई िजनके र ते कसी खास नेता से या खास राजनीितक दल से पनपने लगे। जब उनक मनपसंद पाट स ा म होती थी तो उ ह बेहतरीन िवभाग िमल जाता था। इसके बदले वे उस राजनेता का भेदभावकारी और मनपसंद एजडा जोरशोर से लागू करने लगे। अब कसी भी बड़े या छोटे सौदे म अिधकारी अपने मंि य के साथ िमलकर काम को अंजाम देते ह और इसके बदले म उ ह उनका िह सा भी िमल जाता है। यह बीमारी पूरे तं म ऊपर से नीचे तक फै ल गई है। आलम यह है क हरे क िवधायक का अपने इलाके म मनपसंद िजलािधकारी, पुिलस आॅ फसर और दूसरे अिधकारी होते ह। जैसा क पी.एस. अ पू ने िलखा है क भारतीय रा रा य के सं थापक ने नौकरशाही क वाय ता और उनक कत िन ा का स मान कया था। व लभभाई पटेल ने इस बात पर जोर दया था क उनके सिचव उनक बात को सुधारने या उसक आलोचना करने के िलए वतं ह ता क मं ी और उनक सरकार उस प रि थित म बेहतरीन िनणय ले सक। ले कन जब इं दरा गांधी ने मु यमंि य का चुनाव उनके ित ि िन ा के आधार पर करना शु कया तो उनके मु यमंि य ने भी ऐसे अफसर क बहाली शु कर दी जो िसफ उनके ित िन ावान ह । इस तरह से बीतते व के साथ-साथ सरकारी िवभाग का सिचव अपने मं ी क इ छा और उसके जुबान क एक शाखा मा ा बनकर रह गया।64 धानमं ी को िलखे अपने प म सेवािनवृत नौकरशाह एम.एन. बुच ने शासन के इस राजनीितकरण के नतीज पर काश डाला था। उ ह ने िलखा क ‘िजस तरह से नौकरशाही को चलाया जा रहा है उसका मतलब ये है क िसिवल स वस (साथ ही पुिलस स वस भी) का अनुशासिनक पदानु म पूरी तरह टू ट गया है। एक अधीन थ अिधकारी जो अपना काम सही तरीके से नह करता, अगर उसे उसके व र ारा उसके कत का भान कराया जाता है तो वो जानता है क कोई उसका कु छ िबगाड़ नह सकता य क कसी राजनेता का वरदह त उसे हािसल है। बि क वो उस व र अिधकारी का ही अिहत कर सकता है।’ चूं क मौजूदा समय म नाकामयाबी को दंिडत नह कया जा सकता, तो ‘ऐसे हालत म िज मेदारी क कोई भावना व काय का कोई अधी ण नह रह गया है। तं का कोई िव ीय अनुशासन नह रह गया है और व था का िवघटन साफ दखता है।’65 खासकर के उ र भारत म नेता और नौकरशाह के बीच का संबंध जाित के आधार पर यादा बनता है। उदाहरण के िलए उ र देश म जब समाजवादी पाट स ा म होती है तो िपछड़ी जाितय खासकर यादव अिधका रय को यादा मलाईदार और भावशाली िनयुि यां िमल जाती ह। अगर अगले चुनाव म बसपा चुनाव जीत जाती है तो इन अिधका रय क जगह दिलत अिधकारी ले लेते ह। अगर कभी आचरण को जाित के आधार पर अपनाया और ढंका जाता है तो अ सर इसे प रवार नाम क महान भारतीय सं था के नाम पर भी सही ठहराया जाता है। गैरकानूनी तरीके से कमाए गए पैस से अिधकारीगण अपने ब को महंगे कू ल और िवदेशी काॅलेज म पढ़ाते ह और अगली पीि़ढय के िलए मलाईदार घोसल का िनमाण कर लेते ह। िवडंबना ये है क भारतीय रा यतं म ा ाचार का अिभनेता ने भी मजाक उड़ाया है, जो इसके खा मे क इ छा रखते ह। पूरे उ र-पूव म िव ोही संगठन ने अपहरण और फरौती को एक मुनाफे दार धंधे म त दील कर दया है, िजससे वे अपनी न लीय और वतं ता क लड़ाई लड़ते ह। ि पुरा जैसे छोटे से ांत म साल 1997 से लेकर 2000 तक करीब 1394 अपहरण क घटनाएं दज क ग जो सालाना 300 के औसत से थी। उन अपहरण म िजन फरौितय क मांग क गई वे कम से कम 20,000 पए तक भी थ । ये सबसे कम क रकम छोटे ब के अपहरण क थी जब क कसी चाय बागान के बंधक क फरौती 30 लाख पए तक क थी।66 जनवरी, 1997 म एक ेस वाता म मेघालय के पूव मु यमं ी बी.बी. लंगदोह ने मीिडया क इस बात के िलए आलोचना क क िव ोिहय को कसी मश र ि या सं था के समान दजा दया जा रहा है। लंगदोह ने कहा क ये ‘िव ोही कायर ह, चोर ह, डकै त ह और अपहरणकता ह। उ र-पूव म िव ोह दो दशक पहले ही ख म हो चुका है।’67 हालां क दूसरे नेता अपने व को लेकर इतने साहसी नह थे। मिणपुर के एक बीजेपी के नेता ने के वाईके एल नाम के एक िव ोही संगठन से माफ ही मांग ली। उस नेता ने जब लोकसभा चुनाव लड़ने का फै सला कया तो उसने अपने ‘अतीत क गलितय ’ के िलए अखबार म िव ापन देकर उस िव ोही संगठन से माफ मांग ली! इस सावजिनक माफ के अलावा उस नेता और आतंक संगठन के बीच एक िनजी समझौता भी आ। उस घटना पर रपोट िलखते ए तंभकार हरीश खरे ने ट पणी क क ऐसा लगता है क हरे क चीज क तरह ‘उ र-पूव म िव ोही संगठन से माफ भी िबकाऊ हो गई है!’68 X हालां क ये भी स य है क भारतीय शासिनक सेवा और पुिलस सेवा म अभी भी ब त सारे ईमानदार अिधकारी बचे ए ह। रवायत के देखते ए ऐसा भी लगता है क अिधका रय क सं या, नेता से फर भी शायद कम ही है। ले कन सरकार के तीसरे अंग यायपािलका का या हाल है? हालां क यहां भी ाचार या मामल क अनदेखी करने क बात नई नह है ले कन ‘एक आम आदमी यायपािलका को उस िनगाह से नह देखता जैसे वह िवधायक , मंि य और अफसर को देखता है।’ यह िन कष मश र समाजशा ी एं े बे टले का है िजनका मानना है क ‘ यायाधीश खासकर के ऊंची अदालत के यायाधीश को आमतौर पर िव ान, उ मानिसकता वाला, वतं , कत िन और गुण से यु माना जाता है, जो मंि य और सिचव तर के अिधका रयो म देखने को नह िमलता।’69 एक ऐसे दौर म जब नेता पर िव ास नह कया जा रहा, जहां जाित और धम क िवभेदकारी पहचान ब त कु छ तय कर देती है, उ यायालय और उ तम यायायल म ऐसी जनिहत यािचका क बाढ़ सी आ गई है जहां लोग कानून के उ लंघन पर रोक या संिवधािनक ावधान से छेड़छाड़ पर रोक क मांग करने लगे ह। एक ऐसी ही जनिहत यािचका के बाद उ मीदवार को अपनी संपि और उनके आपरािधक रकाॅड के बारे म जानकारी देने पर मजबूर होना पड़ा। कु छ जनिहत यािचका म पयावरण को हो रहे नुकसान पर रोक लगाने क मांग क गई तो कु छ म समाज के हािशए पर रह रहे वंिचत समूह मसलन आ दवािसय , िवकलांग और पटरी पर रहकर गुजारा करनेवाल क सुर ा क मांग क गई। अमूमन सु ीम कोट कसी भी यािचकाकता के िलए आखरी उ मीद क करण होता है जब उसके िवरोध और उसक अपील के तमाम दरवाजे बंद हो जाते ह। अदालत के कु छ फै सले समािजक प से बड़े ाि तकारी सािबत ए ह िजसके तहत बंधुआ मजदूर को आज़ाद करवाया गया है या हंद ु तान के गंदे और कु व था के िशकार जेल को जन-िनरी ण के िलए खोला गया है। कई दूसरे फै सल ने राजनीितक ाचार पर गहरी चोट क है िजसके तहत गलत तरीके से दए गए लाइसस को र कया गया या फर सांसद और मंि य ारा हड़पी गई जमीन के प े को खा रज कया गया है। हालां क कई बार अदालत ने अपनी सीमारे खा या िवशेष ता का दायरा भी पार कर िलया है खासकर तब जब कोई तकनीक प से ज टल मामला सामने आता है। मसलन कसी नदी पर बांध के बारे म फै सला देते व िजसके बारे म कई बार खुद अदालत क िवशेष ता ही सवाल के घेरे म होती है। कई बार तो कु छ यायाधीश ने गंभीरतापूवक ”एि टिव ट“ का प ही धारण कर िलया और ऐसे फै सले दए िजसे लागू करना ही मुि कल हो जाता है। िबना इस बात पर िवचार कए ए क इससे कतनी बेरोजगारी और असंतोष पनपेगा, वे कई बार क ही आ थक गितिविधय पर ही रोक लगाने का िनदश जारी कर देते ह। कई दूसरे यायाधीश दूभा यपूण ढ़ंग से दखावे क भावना म भी आ जाते ह जैसे क मदुरई के एक जज ने कया जब उसने एक आपरािधक मामले म एक िवधायक को अि म जमानत देते ए उसे शहर के गांधी सं हालय म जाकर पांच दन तक गांधी सािह य पढ़ने का िनदश दे दया!70 XI जब तक हंद ु तान म िनरं तर चुनाव हो रहे ह, एक ब दलीय लोकतं काम रहा है और यहां एक वतं ेस अिसित व म है, भारत िन य ही एक लोकतं बना आ है। ले कन इस लोकतं का च र बीते साल म ब त बदल गया है। आज़ादी के शु आती दो दशक तक भारत कमोवेश एक सांिवधािनक लोकतं था, जब संसद म ज री बहस और संशोधन के बाद उन राजनीितक दल ारा कानून को पा रत कया जाता था जो खुद ही एक सुिनि त िनयम के तहत चलते थे। आज़ादी के बाद के तीसरे और चौथे दशक सं मण के दशक थे जब स ाधारी कां ेस ने संिवधान को प रव तत कर अपने आपको और भी अिधकार संप बनाने क कोिशश क । उसी समय यह पाट आंत रक लोकतं क व था से हटकर एक सवािधकार संप नेता के अधीन जाती दखी। इसके जवाब म िवप ने भी संिवधािनक ावधान से बाहर जाकर िवरोध करना शु कर दया और देश ापी आंदोलन करके एक चुनी ई सरकार और उसक स ा को अ भावी बनाने क कोिशश क । ब त पहले ही सन् 1949 म संिवधान सभा म दए गए अपने अंितम भाषण म भीमराव अंबेदकर ने अपील क थी क भारत म िववादा पद मु को सांिवधािनक ावधान के तहत सुलझाया जाना चािहए न क ापक िवरोध के ारा। उ ह ने नेता के ित भि भाव के िखलाफ भी चेतावनी जािहर क थी िजसमे कसी नेता को इतना ऊंचा मान िलया जाता है क वह हमेशा आलोचना से ऊपर दखने लगता है। ले कन अंबेदकर क चेतावनी को अनदेखा कर दया गया। जैसा क नाटक य प से मंडल और मं दर िववाद म देखने को िमला, राजनीितक मतिभ ता को िवधाियका क वजाय सड़क पर सुलझाने क कोिशश क गई और क जा रही है। इस या को ”पहचान क राजनीित“ के उभार से भी बढ़ावा िमला िजसम लोग के समूह अपने आपको जाित और धम के आधार पर संग ठत कर तक क वजाय अपने सं यावल से अपनी बात को मनवाने क कोिशश करते ह। एक जमाने म उ तरीय प से होने वाली संसदीय बहस अब आरोप- यारोप लगाने वाली ितयोिगता बनकर रह गई है। छोटी-छोटी बात पर राजनीितक दल हड़ताल, बंद, जुलूस और भूख-हड़ताल पर उता हो जाते ह। वे अपनी बात को तक क वजाय जबरन मनवाने क कोिशश करते ह। अ सर भारत के कानून िनमाता खुद ही कानून तोड़ने वाले के प म दखने लगते ह। संसद और सावजिनक िवमश के रण का प रणाम यह आ है क जब भी कभी चुनाव प रणाम आता है िवप ी पा टय ारा सरकारी दल और मशीनरी पर हमल क झड़ी सी लग जाती है। न तो िवप और न ही स ाप म इतना धैय होता है क वह जनता ारा दए गए जनादेश क मािणकता का स मान करे जो उ ह चुनकर संसद या िवधानसभा म भेजती है। दूसरी तरफ सरकार ारा उिचत मांग के िखलाफ भी अि़डयल रवैया अपनाने से िवरोधी-प सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। जनता के आ ोश और उनक गोलबंदी को देखकर िवप को इसक आदत सी लगती जाती है और वह कभी भी ज री संसदीय बहस म नह जाना चाहता जहां से वह लोग क मांग को उठा सके ।71 साथ ही ऐसा भी होता गया है क यादातर राजनीितक दल कसी एकमा नेता क इ छा और आकां ा का िव तार मा ा बनकर रह गए ह। राजनीितक चाटु का रता क परं परा भले ही इं दरा गांधी के काल म कां ेस ारा बढ़ाई गई हो ले कन अब यह कसी एक पाट म सीिमत नह रह गई है। मुलायम संह यादव, लालू और जयलिलता जैसे े ीय नेता िवराट ि व के नेता के प म प रव तत हो गए ह जो अपने पाट के सहयोिगय , नौकरशाह और आम-जनता के सामने सवशि संप हो गए ह। वे अपने वच व क उ मीद भी करते ह और इस भावना को बढ़ावा भी देते ह। दुख क बात यह है क अंबेदकर को भी इस ” ि -पूजा“ क भावना से नह ब शा गया है िजसके वे सबसे बड़े िवरोधी थे। हालां क वे अब इस दुिनया म नह ह और कसी खास पाट से जुड़े ए भी नह ह ले कन वे इतने ापक प से लोग के दलोदमाग म छाए ए ह क उनके काय और उनक िवरासत पर एक गंभीर चचा संभव नह लगती। ले कन आज़ादी के साठ साल के बाद भी हंद ु तान एक लोकतं बना आ है। ले कन िपछले दो दशक म ई घटनाएं इसके िलए एक नए िवशेषण क मांग करती है। भारत अब महज एक सांिवधािनक लोकतं नह रह गया है, बि क एक लोकलुभावन लोकतं म त दील हो चुका है! नोट - भूल सुधार - मूल कताब म रा ल गांधी ारा थम संसदीय चुनाव लड़ेजाने वाले सीट का नाम रायबरे ली है जो क गलत है। वो सीट अमेठी थी जहां से रा ल गांधी फर से 2009 के चुनाव म िनवािचत ए। उसे सुधारने क ज रत है। अनुवाद म अमेठी िलख दया गया है। 12 समृि का दौर उस हताश-परे शान (अमे रकन) साॅ टवेयर ो ामर को देखो... यह वही लड़का है - िब कु ल वही जो yourjobisgoingtoindia.com या फर nojobsforindia.com शु कर रहा है। वह लड़का लोग को उन कहािनय के बारे म बता रहा है, िजसके मुतािबक एक अमे रकन कं यूटर ो ामर को अपने एक भारतीय समक को िश ण देने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इनम से कई कहािनयां सच ह और अमे रका के शहरी दंतकथा का िह सा बन चुक ह। - फरवरी 2004 म वायड पि का म कािशत एक लेख I सन् 1954 म बंबई के एक अथशा ी ए.डी. ाॅफ ने ” इं टर ाइजेज“ नाम के एक मंच क थापना क । आ थक िवकास पर इस सं था के िवचार उस जमाने म भारत सरकार के योजना आयोग के िवचार से िब कु ल उलट थे। ाॅफ ने सरकार ारा उ िमय को ”कम से कम हतो सािहत नह तो उनके साथ भेदभाव“ करने क नीित क ज र आलोचना क । उनका मानना था क अगर ”भारत सरकार औ ोिगक नीित को लेकर अपने कु छ अ वहा रक िवचारधारा से मुि पा ले और िनजी े को अपना स य सहयोग दे तो अगले दस साल के भीतर देश म ती औ ोगीकरण के ल य को ज र हािसल कया जा सकता है।“1 उसी समय ाॅफ क ही तरह ले कन उनसे अलग वतं प से फिलप ैट नाम का एक प कार भी मु उ म के प म लेख क एक शं◌ृखला िलख रहा था। ैट कै ि ज यूनीव सटी का पढ़ा आ एक क यूिन ट था, िजसे उसक पाट ने इस उपमहा ीप म ांित करने के इरादे से सन् बीस के दशक म भारत भेजा था। वह अपनी गितिविधय के दौरान पुिलस ारा पकड़ा गया और उसने कई साल भारतीय जेल म िबताए। उसने जेल म कई कताब पढ़ी और बाद म एक भारतीय मिहला से शादी कर ली। इन दोन बात ने उसे धीरे -धीरे दि ण पंथ क तरफ धके लना शु कया। सन् पचास के दशक म वह बंगलौर से एक अमे रका समथक पि का माईजइं िडया का संपादन कर रहा था। उस पि का म उसने भारत सरकार क आ थक नीितय के िखलाफ जोर-शोर से िलखना शु कया। ैट ने िलखा क ”भारत सरकार उ िमय के साथ अपरािधय क तरह वहार कर रही है, िज ह ने सरकार से वतं होकर अपने दमाग का इ तेमाल उ म को बढ़ाने म लगाया है और रोजगार पैदा कर रहे ह।“ देश के मु य योजनाकार पी.सी. महालनोिबस ने अपने इद-िगद पि मी वामपंिथय और अकादिमक जगत के लोग का जमावड़ा कर रखा था जो उनके इस िव ास को बढ़ावा देते थे क जीवन क ”सभी गितिविधय पर रा य का लौह िशकं जा होना चािहए।“ ैट के मुतािबक ”इन नीितय का नतीजा यह होने वाला था क मु उ मशीलता का गला घ ट दया जाएगा, उपभो ा व तु का अकाल पड़ जाएगा और लाख िमक आ मा को मारने वाली तकनीक के गुलाम होकर रह जाएंगे।“ ैट इस बात के प म थे क ”एक ऐसी योजना बनाई जाए िजसम िनजी उ म को पनपने और उनको ो साहन देने के िलए एक मनोवै ािनक और आ थक माहौल तैयार कया जा सके ।“2 ले कन ैट और ाॅफ क आवाज न ारखाने म तूती क आवाज बनकर रह गई और भारी उ ोग के समथन म उठने वाले शोर ने उसे दबाकर रख दया, िजसे सरकारी समथन और आ थक मदद िमल रही थी। िनि त तौर पर ये कहा जा सकता है क पचास का दशक भारत म मु अथ व था क वकालत करनेवाल के िलए सही व नह था। ले कन समय-समय पर उनके िवचार संशोिधत होते रहे। जब सन् 1966 म पए का अवमू यन कया गया तो ऐसा लगा क सरकार ापा रक िनयम म ढील देने क तरफ बढ़ेगी और लाइसस देने क या म भी कु छ उदारता अपनाई जाएगी।3 ले कन जब सन् 1969 म इं दरा गांधी ने कां ेस म िवभाजन करवा दया तो उनक सरकार ने ”वाम झुकाव“ का दशन करते ए कई ”नए उ ोग का रा ीयकरण“ कर दया और आ थक तानाशाही क तरफ बढ़ गई। फर सन् 1970 के दशक के आिखर म जनता सरकार म समाजवा दय ने भारत क आ थक वतं ता को बचाए रखने क नीयत से आईबीएम और कोकाकोला जैसी िवदेशी कं पिनय को धमाके दार तरीके से भारत से िनकाल-बाहर कर दया। सन् 1980 म स ा म ीमती गांधी क फर से वापसी ई। उसके अगले महीने टाटा समूह के मुख ने एक मुख अखबार म अपना लंबा सा ा कार दया। इस सा ा कार म जे.आर.डी. टाटा ने कहा क ”पचास के दशक के म य से लेकर साठ के दशक के म य तक िमि त अथ व था अपने कामकाज म अ छी तरह प रलि त ई जैसा क मूल प से सोचा गया था।“ उस दौर म औ ोिगक उ पादन म 8 फ सदी सलाना क दर से बढ़ोतरी ई। फर सन् साठ के दशक के अंितम साल म अथ व था को ित पधा के िलए खोलने का सुनहरा मौका आया था। टाटा के मुतािबक ”अगर ऐसा आ होता तो सभी े म रोजगार उ पादन म भारी बढ़ोतरी दज क जाती, पया उ पादन बढ़ जाता और कमी क पू त हो जाती। इससे सरकारी राज व भी बढ़ता और सरकार के पास िवकास के अ य काय के िलए पया धन जमा हो जाता“। ले कन इसके बदले या आ क ”सरकार ने कई मह वपूण उ ोग पर असाधारण प से िशकं जा ही कस दया और उनका रा ीयकरण कर दया।“ अतीत से िनकलकर अगर वतमान क बात कर तो उ ोगपितय ने सरकार से अपील क क वे अथ व था को ”िनजी े के िलए खोल और उसका नतीजा देख।“ हाल के साल म दि ण को रया, संगापुर, पेन और ताईवान जैसे देश क आ यजनक आ थक तर इसिलए संभव हो पाई क इन ”नए-नए औ ोगीकृ त देश ने अपने िनजी उ िमय पर भरोसा कया और वहां क सरकार ने अपनी आ थक नीितय से वहां के िनजी े को ो साहन और समथन देना जारी रखा।“4 II हालां क अ सी के दशक म भारत सरकार ने मु अथ व था के ित ज र अपना िवरोधभाव कु छ कम कया। िनजी उ म को यादा ो साहन दया गया और मह वपूण े के लाइसस पर लगा िनयं ण कु छ कम कया गया। ये कु छ ऐसी ” वसाय समथक“ नीितयां थ , िजसने भारतीय उ ोग को यादा मुनाफे दार और उ पादक बनाने म मदद क । हालां क ये नीितयां भी ”मु बाजार सम थत नीितयां“ नह बन पा िजससे क भारतीय या िवदेशी कं पिनय को देश म वेश या देश से बाहर जाकर कारोबार करने म मदद िमलती और बाजार म ित पधा बढ़ती िजससे आमलोग को उपभो ा व तु के िलए यादा िवक प िमल पाता।5 भारतीय रा यतं इस दशा म तभी आगे बढ़ पाया जब एक बड़ा आ थक संकट देश के सामने आ खड़ा आ। तभी देश पूण उदारीकृ त अथ व था क दशा म आगे बढ़ पाया। यह आ थक संकट सरकार के बढ़ते िवदेशी कज से संबंिधत था। भारत ने ब त पहले िव बक जैसी ब प ीय सं था से िवकास काय के िलए भारी कज ले रखा था। राजीव गांधी के काल म बाजार से कज लेने क वृित भी काफ तेजी से बढ़ी। सन् 1991 क ग मय म देश का कज 70 अरब अमे रक डाॅलर तक प च ं गया, िजसम करीब 30 फ सदी िह सा िनजी कजदाता का था। एक ऐसा भी व आया जब देश का िवदेशी मु ा भंडार महज इतना ही रह गया, िजससे िसफ दो स ाह तक के िलए आयात कया जा सके । सन् 1991 म देश के धानमं ी पी.वी. नर संह राव थे, िज ह राजनीितक तौर पर ब त कमतर करके आंका जा रहा था। ब त ही कम बोलने वाले नर संह राव ने इं दरा गांधी और उनके बड़े बेटे राजीव गांधी क छाया म लंबे समय तक काम कया था। राजीव गांधी क ह या के बाद जब उ ह देश का धानमं ी बनाया गया तो उ ह ने अपने पूव च र के उलट एक साहिसक िनणय िलया। उ ह ने एक गैर-राजनीितक अथशा ी मनमोहन संह को अपना िव मं ी िनयु कया िज ह ने उससे पहले रजव बक के गवनर और िव सिचव का ओहदा संभाला था। सबसे मह वपूण बात यह थी क उ ह ने उ ह अपने िहसाब से आ थक सुधार लागू करने क वतं ता भी दी। सरकारी सेवा म आने से पहले मनमोहन संह ने आॅ सफोड म अपने पीएचडी क थीिसस म इस बात का सुझाव देते ए िलखा था क भारत को एक मु ापार वाली व था क तरफ बढ़ना चािहए। उनका शोधप साठ के दशक म िलखा गया था, ले कन तीन दशक बाद जब उ ह इसे लागू करने का मौका िमला तो उ ह ने पलभर भी देरी नह क । मु ा का अवमू यन कर दया गया, आयात पर से कोटा हटा िलया गया, शु क म कटौती क गई, िनयात को बढ़ावा दया गया और य िवदेशी िनवेश का वागत कया गया। घरे लू बाजार को भी मु कया गया, ”लाइसस-परिमट-कोटा राज“ को ब त हद तक ख म कर दया गया और सावजिनक े के िव तार को हतो सािहत कया गया। कु ल िमलाकर आ थक सुधार ने सरकारी तं के भीमकाय आकार को सीिमत करने का यास कया। िव ीय घाटे को कम करने के उपाय कए गए जो उस समय सकल घरे लू उ पाद के 8 फ सदी तक प च ं गया था।6 जुलाई 1991 म एक नई औ ोिगक नीित तैयार क गई िजसम कहा गया क ”कु छ खास तरह के वग कृ त उ ोग को छोड़कर सभी तरह के उ ोग को उनके िनवेश के तर पर िबना कसी भेदभाव के धीरे -धीरे औ ोिगक लाइसस क या से मु कर दया जाएगा।“ िसफ इस नीित म वही उ ोग अपवाद होने थे जो देश क सुर ा, पयावरण और मानवीय वा य से जुड़े ए थे। इनम िसगरे ट और शराब उ पादन जैसे उ ोग भी शािमल थे। यह नीित लंबे समय से चली आ रही मौजूदा औ ोिगक नीित के िब कु ल उलट थी िजसने कु छ उ ोग को रा य के िलए और कु छ उ ोग को लघु उ ोग े के िलए आरि त कर रखा था।7 सेवा े म भी उदारीकरण क नीित को लागू कया गया और िनजी िखलाि़डय को बीमा, ब कं ग, दूरसंचार और हवाई यातायात म िनवेश के िलए ो सािहत कया गया। ये तमाम े पहले कमोवेश रा य के पूण िनयं ण म थे। कु छ अथशाि ाय क राय थी क आ थक सुधार ब त हद तक कामयाब नह हो पाएगा य क उदाहरण के िलए म कानून म कोई सुधार नह कया गया और वे पहले क तरह ही कठोर बने रहे (इससे बंधक के िलए अपने कमचा रय को िनकालना लगभग असंभव था)। दूसरी तरफ उ ोग या कारोबार म वेश करने क द त भले ही हटा दी गई थ ले कन िनवेश को हटाने पर कई पाबं दयां कायम थ (इस तरह उ िमय को अभी भी अपनी गैर-लाभदायक इकाइय को बंद करने के िलए सरकारी इजाजत क ज रत थी)। उ ोग-धंधा लगाने म नौकरशाही के ह त ेप को भले ही कम कर दया गया हो ले कन उसे पूरी तरह ख म नह कया जा सका था। भारत म अभी कसी कारोबार को शु करने म ह ते या यूं कह क महीने लगते थे जब क चीन या मलेिशया म ऐसा कु छेक दन म हो जाता था।8 ले कन इसके बावजूद नई सरकार के तहत जो आ थक नीितय म प रवतन कए गए थे उससे पुरानी नीितयां काफ हद तक ख म हो चुक थ । महज एक या दो साल पहले ऐसे सुधार के बारे म सोचना भी नामुम कन था। सन् 1989 म हावड िबजनेस कू ल के एक ोफे सर ारा िलखी गई कताब म इस बात क पहचान क गई थी क कस तरह से िनिहत वाथ त व पुरानी ”िनयं ण वाली अथ व था“ को जारी रखना चाहते थे। इन त व म राजनीित , नौकरशाह और देशी उ ोगपित शािमल थे। हावड के ोफे सर ने िलखा क अथ व था पर थायी वच व रखने वाले इस गठजोड़ ने ”देश क आ थक नीितय म सुधार के िलए होने वाले मौिलक बदलाव को रोकने क पूरी कोिशश क ।“ दि ण को रया जैसे देश म बाजार का िनयमीकरण और िवदेशी पूंजी के ित खुलेपन क नीित ने रा ीय आमदनी और उ पादकता म भारी बढ़ोतरी क थी। जब क भारत म रा य और सावजिनक े के उप म ”बीमार“ हो गए थे देशी उ ोगपित सुधार क ज रत के ित ”आंख मूंद“े ए थे। ि थित वाकई गंभीर थी और ”दूसरे अ य औ ौिगक देश ारा जो आ यजनक तर क गई थी वह भारत को अभी भी ललचा रही थी।“9 III साल साल तक भारतीय अथ व था क िवकास दर काफ कम रही थी और उसे ं य से ” हंद ू िवकास दर“ कहा जाता था। अ सी के दशक म अपनाए गए ापार समथक आ थक नीित ने िवकास दर म तेजी लाई और न बे के दशक म बाजार समथक नीितय ने इसे और भी बढ़ावा दया। भारतीय अथ व था के मशः अ छे दशन को तािलका 29.1 म दखाया गया है। तािलका-29.1 भारतीय अथ व था का दशन, 1972-2002 ो तः िवजय एल. के लकर, इं िडयाः आॅन द ोथ टनपाईक, के .आर. नारायण ओरे शन, आॅ ेिलयन नेशनल यूनीव सटी के नवरा, 2004 वाभािवक प से िवकास क या असमान थी। अथ व था के कु छ े दूसरे े से बेहतर दशन कर रहे थे। सबसे मह वपूण िव तार सेवा े का आ िजसम पूरे न बे के दशक म 8.1 फ सदी क बढ़ोतरी दज क गई। इसम सबसे यादा योगदान साॅ टवेयर े का रहा िजसका राज व सन् 1990 म महज 19 करोड़ 70 लाख डाॅलर क तुलना म साल 2000 तक जाते-जाते 8 अरब डाॅलर तक प च ं गया। कई साल तो ऐसे बीते िजसम इसने पचास फ सदी से भी यादा दर से तर क । इसका सबसे यादा िव तार िवदेशी बाजार म आ। जहां सन् 1990 म भारतीय साॅ टवेयर उ ोग का िनयात महज 10 करोड़ डाॅलर था वह सदी के अंत तक यह आंकड़ा 6 अरब 30 करोड़ डाॅलर तक प च ं गया। साल 2000 म भारत म 340,000 साॅ टवेयर पेशेवर थे जब क ितवष 50,000 नए इं जीिनय रं ग ातक क िनयुि यां क जा रही थ । इन पेशेवर म करीब 20 फ सदी मिहलाएं थ । शता दी के शु आती साल म यह उ ोग और भी तेज र तार से बढ़ोतरी कर रहा था। साल 2004 तक इस े म करीब 6 लाख लोग काम कर रहे थे और 13 अरब डाॅलर मू य के बराबर सेवा का िनयात कया जा रहा था। भारत म और िवदेश म भी साॅ टवेयर उ ोग को आ थक सुधार का ”पो टर बाॅय“ कहा जाता है। यह उ ोग मूलतः एक वदेशी उ पाद है िजसम छोटी और बड़ी भारतीय कं पिनयां भारतीय िव िव ालय के इं जीिनय रं ग ातक को रोजगार देती ह। ले कन फर भी यादातर उनका काम उन िवदेशी कं पिनय के िलए ही होता ह, िजसम यादातर दुिनया क बड़ी 500 कं पिनय म शुमार ह। इन काम म कु छ काम तो दैिनक काम क ेणी म है जैसे अकाउं ट और कमचारी रकाॅड को वि थत करना, जब क दूसरे कु छ काम यादा क पनाशील और योगधम है जैसे नए साॅ टवेयर को िडजाइन करना िजसे बाद म पेटट कया जाता है और िवदेशी बाजार म बेचा जाता है। (उदाहरण के िलए आई- ले स नाम का एक िव ीय पैकेज िजसे एक भारतीय कं पनी ने बनाया है, अब दुिनया के 70 से भी यादा देश म इ तेमाल म है)। शु आती साल म कं पिनय ने अपने इं जीिनयर को सीधे िवदेश भेजने पर यान क त कर रखा था, िजसम अ पाविध के िलए वीजा पर इं जीिनयर िवदेश जाते थे और अमे रक -यूरोपीय कं पिनय के प रसर म काम करते थे। ले कन उप ह संचार और इं टरनेट के िवकास और काय क बारीक के साथ अब आउटसो सग पर यादा जोर दया जा रहा है िजसम भारत म उस काम के कोड िलखे और िवकिसत कए जाते ह और उसे फर िवदेश म भेज दया जाता है। िव ो, टीसीएस और इनफोिसस जैसी कं पिनय को अब भारत म घर-घर जाना जाता है। ले कन उ ह िवदेशी कारोबारी जगत म भी काफ जाना-पहचाना जाता है और उनक खासी इ त भी है। वे यूयाॅक टाॅक ए सचज म सूचीब ह और उनक ब त सारी सहयोगी कं पिनयां दुिनया के कई िह स म कायरत ह। ले कन बाजार म कई छोटी और मंझोले तर क कं पिनयां भी काम कर रही ह और बीते दशक म बड़ी कं पिनय का बाजार म िह सा मशः कम होता गया है।10 साॅ टवेयर उ ोग भारत के कु छ शहर म ही क त है जैसे द ली, म ास, हैदराबाद और सबसे यादा बंगलौर म। बंगलौर ने भारत के ”िसिलकाॅन वैली“ के प म अपना नाम थािपत कर िलया है। बंगलौर म ही भारत का सबसे बड़ा और अ छा शोध िव िव ालय इं िडयन इं ि ट ूट आॅफ साइं स भी है िजसक थापना सन् 1909 म ई थी। आज़ादी िमलने के बाद यह शहर औ ोिगक इकाइय का गढ़ बन गया। सरकार संचािलत बड़े-बड़े कारखाने यहां लगाए गए, िजसम मशीन के कल-पुज, हवाईजहाज, टेलीफोन और इलै ाॅिनक उपकरण का उ पादन होता था। इसके साथ ही शहर के खुशगवार मौसम और इसके वैि क सां कृ ितक च र को जोड़ दया जाए तो यह बात आसानी से समझ म आ जाती है क यह शहर य इतना आकषक िनवेश थल के प म उभरकर सामने आया। िव ो और इनफोिसस दोन का मु यालय बंगलौर म ही है। साथ ही साॅ टवेयर े म कई अ य मह वपूण िखलाि़डय का भी मु यालय यह है। साॅ टवेयर े के उदय क ा या करने के िलए नजदीक और सुदरू कारक क ा या ज री है। जाॅन एफ. के नेडी ने कहा था क कामयाबी के कई दावेदार होते ह। ले कन इस खास मामले म इस कामयाबी के सभी दावेदार के पास स य का कु छ न कु छ अंश ज र है। इसका कु छ ेय सन् 1991 म शु ए आ थक सुधार को ज र जाता है िजसने पहली बार भारतीय के िलए िवदेशी बाजार को खोला। ले कन इसका कु छ ेय त कालीन राजीव गांधी सरकार को भी जाता है, िजसने उस समय के नवजात इलै ाॅिनक और टेलीकाॅम उ ोग के िवकास पर जोर दया। उससे भी एक दशक पहले क बात कर तो त कालीन जनता सरकार ने आईबीएम जैसी कं पनी को जब देश से िनकाल बाहर कया था, तो देश म एक वदेशी कं यूटर िनमाण और प रचालन उ ोग को उससे ज र बढ़ावा िमला था। ले कन शायद इस कहानी क असली शु आत जवाहरलाल नेह के शासनकाल म ही हो गई थी िजनके पास इतनी दूरदृि थी क उ ह ने उ तर के इं जीिनय रं ग सं थान क थापना और उ िश ा म अं ेजी को मा यम बनाने पर जोर दया था। साथ ही उनक दलच पी अंतरा ीय संचार म भी काफ थी। जैसा क आईटी से टर के एक िति त िव ेषक ने कहा क ”भारत क सबसे बड़ी ताकत उसक िवशाल, िशि त और अं ेजी भाषी जनता है जो अपे ाकृ त स ती दर पर काम करने के िलए तैयार है।“11 यह वाकई एक सुखद िवरोधाभास है क बाजार उदारीकरण का यह एक अ छा नतीजा उस ि के काय क बदौलत संभव हो पाया जो रा य िनयंि त आ थक िवकास के ित ितब था। इन कारक के अलावा एक अ य भौगोिलक संयोग ने भी इस साॅ टवेयर उफान म मदद प च ं ाई। दुिनया म भारत क ि थित ऐसी है क जब अमे रका म दन होता है तो हमारे यहां रात और जब हमारे यहां रात होती है तो अमे रका म दन होता है। इस तरह भारतीय साॅ टवेयर पेशेवर ारा कए काम तब तक तैयार हो जाते ह जब तक अमे रक पेशेवर अपना िब तर छोड़कर उठ और कामकाज के िलए तैयार होएं। अं ेजी ान म सहजता और समृ पि मी देश से पांच से लेकर दस घंट के समय के फक ने दूसरी कई सेवा को भी भारत म आउटसोस करवाने म मदद क है। मू य संव धत सेवा शं◌ृखला के दूसरे छोर पर अमे रक अ पताल म मरीज क मेिडकल जांच रपोट को भारत म रे िडयोलाॅिज ट और पैथोलाॅिज ट ारा जांच करवाने के िलए भेजा जाने लगा। जब क अ य कम मह वपूण सेवाएं जैसे काॅल सटर के काम भी भारतीय कमचा रय ारा करवाए जाने लगे जहां स ती दर पर भारतीय युवा रातभर जागकर पि मी देश के े िडट काड उपभो ा के फोन काॅल सुन रहे ह या उनके िलए हवाई जहाज और ेन म टकट बुक करवा रहे ह। इन कमचा रय म ब त सी मिहलाएं ह जो ाकरणिन और सहज समझ म आने लायक अं ेजी बोलती ह और जो अपने पि मी समक क तुलना म महज दसव िह से क पा र िमक पर यादा मेहनत से काम करती ह। सन् 2002 म भारत म इस तरह के करीब 300 काॅल सटर काम कर रहे थे, िजनम करीब 110,000 लोग काम करते थे। यह उ ोग 71 फ सदी सलाना क आ यजनक दर से तर कर रहा था। ऐसा आंकलन कया गया क साल 2008 तक यह उ ोग 20 लाख लोग को रोजगार दान करे गा और सलाना 25 अरब डाॅलर का राज व पैदा करे गा जो हंद ु तान के जीडीपी के करीब 3 फ सदी के बराबर होगा।12 पि मी देश म कए जाने वाले काय क भारत म क जा रही आउटसो सग िविवध े म फै ल रही है। के रल के अं ेजी िश क अमे रक ब को इं टरनेट के मा यम से ाकरण और वा य िव यास िसखा रहे ह। अमे रका और कनाडा के कै थोिलक पादरी, भारतीय पाद रय को ाथना करवाने का आ ह भेज रहे ह। अब कसी ि को अगर थ सिग वंग ेयर करवानी है तो वह भारतीय चच म महज 40 पए म हो सकती है जब क इसी काम के िलए अमे रका म इससे पांच गुना यादा रकम खच करनी पड़ेगी।13 कमोवेश न बे के दशक म शु ए आ थक सुधार ने देश के िविनमाण े पर भी अपना भाव डाला। बढ़ती ित पधा और िवदेशी कं पिनय के वेश ने उ पादकता म बढ़ोतरी क िजससे मू य म कमी आई। इससे घरे लू उपभो ा को फायदा आ। कु छ भारतीय कं पिनय ने अंतरा ीय बाजार के खुलने से पैदा ए अवसर का भरपूर फायदा उठाया। इस तरह दुिनया के मश र कपड़ के ांड जैसे गैप, पोलो और टाॅमी िहल फगर ने बड़े पैमाने पर भारत म अपना उ पाद बनवाना शु कया। आज क तारीख म भारत करीब पांच लाख मोटर कार और वाहन म इ तेमाल कए जाने वाले उ तकनीक के कलपुज का िनयात करता है िजसे बाहर कह जोड़ा जाता है (हरे क दो म से एक अमे रक क म ऐसे ए सेल का इ तेमाल कया जाता है िजसे एक भारतीय कं पनी बनाती है)। िवकास का दूसरा े दवा और उससे संबंिधत उ ोग है। साल 2003 म भारतीय कं पिनय ारा िनयात क गई दवा क क मत 1 अरब डाॅलर के बराबर थी। इनम ऐसी दवाएं थ , जो आधुिनक औषिध िव ान के मुतािबक बनाई गई थी साथ ही इसम वदेशी आयुव दक दवा क भी खासी मा ा थी।14 अथ व था के खुलने क वजह से ब त सारी िवदेशी कं पिनयां भी भारतीय बाजार क संभावना का दोहन करने यहां आ । सन् 1991 से लेकर 2000 के बीच सरकार ने 10,000 से यादा िवदेशी िनवेश के ताव को मंजूरी दी। अगर उनम से सारे िनवेश जमीन पर उतर आते तो देश म 2000 अरब डाॅलर का िवराट िनवेश हो जाता। वे ताव दूरसंचार से लेकर रसायन उ ोग और खा सं करण से लेकर कागज के उ पाद तक फै ले ए थे। जो प रयोजनाएं तुरंत ही जमीन पर उतर आ उनम उपभो ा े के मश र ांड थे जैसे फोड, ह डा, टीवी का ांड सैमसंग, नो कया के फोन और पे सी-कोकाकोला जैसे शीतल पेय। इनके िव ापन और इनके शो म भारत के मुख शहरो म मुखता से अपनी मौजूदगी दज करा रहे थे। हालां क धीरे -धीरे फिल स, माइ ोसाॅ ट और जनरल इलेि क जैसी कं पिनयां भी भारत म अपनी उपि थित दज करा रही थ िज ह ने थानीय और बाहर के इं जीिनयर को अ याधुिनक तकनीक के िवकास के िलए िनयु कया था। इन तकनीक का उपयोग और उनका कारोबार वैि क बाजार के िलए कया जाना था।15 न बे के दशक म भारतीय अथ व था के िलए िवदेशी ापार का मह व बढ़ता ही गया। देश का सकल िनयात जीडीपी का 8.5 फ सदी हो गया जो पहले 4.9 फ सदी था। उसी तरह आयात 7.9 फ सदी से बढ़कर जीडीपी के 11.6 फ सदी के बराबर हो गया। ले कन कु ल िमलाकर यह अभी भी एक बंद अथ व था ही थी। सन् 1980 म सकल िव ापार म भारत का िह सा 0.57 फ सदी था जो क 20 साल बाद थोड़ा बढ़कर 0.71 फ सदी तक ही प च ं पाया।16 IV हाल के आ थक इितहास का एक थोड़ा कम च चत आयाम ये भी था क इसने उ मी वग के समािजक च र को बदलकर रख दया। एक जमाना था जब भारत के मुख पूंजीपित देश के पारं प रक ावसाियक वग से ही आते थे। मसलन उनम मारवाड़ी, जैन, बिनया, शे यार और पारिसय क ब तायत थी। जब क िपछले तीन दशक म कृ षक जाितय से ब त सारे उ मी औ ोिगक और कारोबारी े म शािमल हो गए। बाद के कु छ ब त ही कामयाब उ मी मराठा, वेलाल, रे ी, नाडर, और एजावा जाितय से सामने आए। ये ऐसी जाितयां थ जो शताि दय से कृ िष काय म संल रही थ । इसके अलावा कु छ बेहतरीन साॅ टवेयर कं पिनयां जैसे इनफोिसस उन ा ण के ारा शु क ग िज ह ने पारं प रक प से िश ण सं थान म रा य क सेवा क थी और िज ह ने ापार को हेय दृि से देखा था। इस दौर म िव ो के सं थापक अजीम ेमजी जैसे कु छ ब त ही कामयाब मुसलमान उ मी भी सामने आए।17 इस तरह आ थक िवकास क तेज र तार ने भारतीय म यमवग के आकार और इसके भाव म काफ बढ़ोतरी क । राजनीित शा ी ई. ीधरण िलखते ह क ”इस वग के उदय ने भारत के वग य च र को बदलकर रख दया जो क पहले एक छोटे से सं ा त और एक िवशालकाय वंिचत तबके बीच साफतौर पर बटा आ था। अब एक बीच का वग भी पनप आया था।“ हालां क यह कतना बड़ा और भावशाली हो पाया है यह अभी भी प रभाषा और ा या क बात है। साल 1998-9 के मू य पर इसे यूं प रभािषत कया गया क सलाना 70,000 पए आय वाले प रवार को इसम शािमल कया गया। उस िहसाब से भी इसम 25 करोड़ लोग शािमल थे। हालां क अगर इसम सलाना 140,000 पए आमदनी वाले प रवार को शािमल करके इसक ा या क 18 जाए तो इसम महज 5.5 करोड़ भारतीय ही शािमल ह। हाल के साल म िजन सेवा और उ पाद ने भारतीय बाजार म वेश कया है उनका मु य ल य यही म यमवग है। भारत म अब 5 करोड़ ( कताब िलखे जाते समय का आंकड़ा है, वतमान म इससे कई गुणा यादा) से यादा लोग के बल टेलीिवजन के उपभो ा ह और कम से कम 10 करोड़ (अब यह आंकड़ा करीब 85 करोड़ के आसपास है) भारतीय ऐसे ज र ह जो मोबाइल फोन का इ तेमाल करते ह। इन सेवा का फै लाव ठीक उसी तरह तेजी से हो रहा है जैसे क आधुिनक उपभो ा अथ व था के तीक मोटर कार का हो रहा है। उदाहरण के िलए बंगलौर क सड़क पर 20 लाख वाहन दौड़ रहे ह और हर महीने इसम 20,000 नए वाहन जुड़ रहे ह। आजादी के बाद के शु आती साल म भारतीय म यमवग के मन पर गांधीवादी सादगी का जबद त भाव छाया रहा था। एक गरीब देश म ये माना जा रहा था क कसी के पास ब त यादा धन नह होना चािहए और कम से कम धन का दशन तो िब कु ल ही नह होना चािहए। िजन लोग के पास धन था भी उनके पास उसे खच करने के यादा िवक प नह थे। न बे के दशक म अथ व था के खुलने के साथ ही उपभो ावाद के ित जो मन म असहजता थी वो तेजी से ख म होने लगी। चाहे वो िसगरे ट हो, कार हो, ि ह क हो या सन लासेज हो, जो िवदेशी ांड पहले भारत म उपल ध नह थे उससे बाजार पाट दया गया। ावसाियक टीवी चैनल ने बड़े पैमाने पर इन उपभो ा व तु का िव ापन दखाया। बक और े िडट काड देने वाली कं पिनय म होड़ मच गई क वो लोग को इन उपभो ा व तु को खरीदने के िलए आसान दर पर कज द।19 य िप ये िवशेषताएं बड़े शहर क थ ले कन वह यह तक सीिमत नह थी। ामीण के रल म कया गया एक हािलया अ ययन बताता है क कै से इस उदारीकरण के युग म उपभो ा ने बड़ी बारीक के साथ अपने िवक प का इ तेमाल कया है। वे अपनी जेब का भी याल रखते ह और अपने पड़ोिसय से समािजक ित पधा का भी। िन य ही ामीण के रल क िवशेषताएं पूरे भारत के ामीण इलाक क िवशेषता से अलग नह है। उनक जीवन शैली ब त तेजी से शहर -क ब के जीवन शैली क तरह होती जा रही है। वहां के ब त सारे लोग ने म यपूव के देश म आजीिवका हािसल क है और वहां उ ह ने खासा पैसा कमाया है जो उ ह म यमवग का दजा दान करता है। इन नए उपभो ा म टाइल और उनका िमजाज पदानु म म वि थत होते ह और ांड का नाम िवशेषता को इं िगत करते ह। के ाॅन (के रल इले ाॅिन स जो क रा य सरकार का एक उ म है) का टीवी ओिनडा से कम समािजक ित ा दलाता है। वदेशी समान सोनी क तुलना म कम ित ा दलाता है िजसका िनमाण भारत म लाइसस के तहत कया जाता है। िवदेश िन मत और आयाितत टीवी सेट को यादा मह व दया जाता है, कभी-कभी लोग अपने समान पर लगे लेवल नह हटाते ता क लोग को उसके ांड का पता चल सके ।20 जैसा टेलीिवजन सेट के बारे म उपभो ा का नज रया है उसी तरह कई उ पाद के बारे म भी है िजनम चेहरे को खूबसूरत बनाने वाले म से लेकर कार तक शािमल है। भारतीय उपभो ा के सामने िवक प क अब भरमार है। एक जमाना था क लोग को अगर कार खरीदनी होती थी तो उनके सामने सन् 50 के दशक का मो रस या 60 के दशक का फएट माॅडल ही उपल ध था ले कन आज अगर कसी के पास पैसा है तो वह सबसे नए माॅडल क मस िडज वज भी खरीद सकता है। म यमवग य भारतीय जो क कभी भिव य के िलए बचत को लेकर काफ चंितत रहता था, अब वतमान म जीने लगा है। बीस साल पहले महज कु छेक भारतीय के पास े िडट काड आ करता था ले कन आज क तारीख म बीस लाख से यादा लोग के पास ( कताब िलखे जाने तक) े िडट काड ह। एक जमाने म भारत के लोग जोिखम उठाने से परहेज करते थे ले कन अब लाख भारतीय संपि और शेयर बाजार म िनवेश करने लगे ह। उ पादन और उपभोग म आए इस प रवतन ने शहरी प रदृ य को मौिलक प से भािवत कया है। पुराने तरीके के मकान क जगह बड़े-बड़े अपाटमट वाले ब मंिजला इमारत बन रही ह। एक मंिजला कायालय भवन क जगह ब मंिजला और िवशालकाय कं ट और शीशे क इमारत बन रही ह। हालां क अभी भी पारं प रक बाजार मौजूद ह जहां अ थायी दुकान पर िम ी के बतन और पान क िगलौ रयां बेची जाती ह, ले कन अब एक ही छत के नीचे कई दुकान वाले िवशालकाय शाॅ पंग माॅल भी उपल ध ह जहां पर अंतरा ीय ांड जैसे लेवाइस, ई टी लाॅडर, सोनी और बाि कन राॅिब स आसानी से उपल ध ह। V हाल के आ थक सुधार का एक दूसरा नतीजा यह आ है क ऐसे भारतीय क सं या म कमी ई है जो आिधका रक प से गरीबी रे खा से नीचे जीवन बसर करते ह। हालां क इस पर ब त ही तीखी और िव तापूण बहस ई है क भारत म वाकई कतने लोग गरीबी रे खा से नीचे रहते ह। कु छ सांि यक िवद ने कहा है क भारत म महज 15 फ सदी लोग गरीबी रे खा से नीचे रहते ह जब क इससे सहमित न रखने वाले कु छ लोग का मानना है क ऐसे लोग क सं या कु ल आबादी क 35 फ सदी तक है जब क भारत सरकार का अपना आंकलन इन दो अितवादी ा या के बीच का है। सरकार मानती है क करीब 26 फ सदी लोग गरीबी रे खा से नीचे रहते ह। हालां क इन आंकड़ पर िववाद है ले कन सभी िव ान इस बात पर सहमत ह क सापे और िनरपे ि थितय म भी न बे के दशक म देश म गरीबी म कमी आई है। दशक के शु आत म करीब 40 फ सदी भारतीय ”गरीबी रे खा से नीचे“ थे जब क दशक के अंत तक इस आंकड़े म दस फ सदी से भी यादा क कमी आ गई थी।21 ले कन अभी भी भारत म गरीब क एक िवशाल आबादी रहती है। सरकारी आंकड़ के मुतािबक उनक सं या अभी भी 30 करोड़ के आसपास है। उनम से ब त से लोग शहर म रहते ह। चमकते ए शाॅ पंग माॅल और भड़कदार आॅ फस क इमारत से बाहर ब त सारी झु गी झोपड़ी और गरीब क बि तयां ह जहां अिधकांश शहरी आबादी रहती है। ये वो लोग ह जो म यमवग के यहां काम करते ह ले कन फर भी वे उसका िह सा नह ह। वे ”अखबार बेचते ह िजसे वे कभी पढ़ नह पाते, कपड़े िसलते ह िजसे वे कभी पहन नह पाते, कार साफ करते ह िजसे वे कभी खरीद नह सकते और बड़ी-बड़ी इमारते बनाते ह जहां वे कभी रह नह सकते।“22 दूसरे इस तरह के लोग घंट तक मसा य काम करते ह। वे धातु क कटाई का काम करते ह, वे रसायिनक पदाथ को अलग करने का काम करते ह जो उनके वा य के िलए हािनकारक होता है। वे आमतौर पर असंग ठत मजदूर ह िज ह िबना नो टस के कभी भी िनकाला जा सकता है और िज ह बीमा और पशन संबंधी सुिवधाएं नह िमलती।23 हालां क भारत के यादातर गरीब लोग गांव म ही रहते ह य क आ थक उदारीकरण का फायदा सुदरू इलाक तक अभी भी नह प च ं पाया है। तकलीफ क बात ये थी क न बे के दशक म कृ िष े म िवकास क दर ब त ही कम रही। हालां क कु छ यास ज र कए गए क कृ िष का िविविधकरण करके घरे लू बाजार के िलए फल , सि जय और िनयात के िलए फू ल के उ पादन पर जोर दया जाए। ले कन बुिनयादी ढांचे म कमी क वजह से इन यास म सीिमत सफलता ही िमल पाई। िबजली क कमी, फसल का सं करण, भंडारण क कमी और बाजार तक ले जाने लायक सड़क क खराब ि थित इसक मु य वजह रही।24 ले कन फर भी जब बात खा पदाथ जैसे मौिलक संसाधन क आती है तो त वीर उतनी संतुि दायक नह थी िजतनी होनी चािहए थी। हालां क पूरे देश के प र े य म खा पदाथ क पया उपल धता बनी रही और वह ज रत से कु छ यादा ही उ पा दत होती रही। सरकारी गोदाम म 4 से 5 करोड़ टन का बफर टाॅक रखा जाता रहा। ले कन फर भी उनके िवतरण क व था अपया ही रही। कमी के व िजन समुदाय को उनक ज रत होती थी वहां तक खा पदाथ को सही समय पर प च ं ाना एक सम या ही बना रहा। इसके िलए बनाई गई ल य क त योजनाएं हमेशा अपया ही सािबत । जनिवतरण णाली के ारा िवत रत कया जाने वाला अनाज शहरी े और अपे ाकृ त समृ रा य म पहले प च ं जाता था जब क ज रतमंद ामीण और गरीब रा य म यह देर से प च ं ता रहा। इसके अलावा इसम भयानक ाचार भी था। एक आंकलन के मुतािबक जनिवतरण णाली ारा िवत रत कए जाने वाले अनाज म से महज 20 फ सदी ही ज रतमंद लोग तक प च ं पाया। शेष अनाज क कालबाजारी होती रही। देश के ब त सारे िह स म भूख और कु पोषण क सम या बनी रही और जब बा रश दगा दे जाती थी तो भुखमरी से होने वाली मौत क भी खबर आती रह ।25 देश के यादातर िह स म लोग क जंदगी और उनका जीवनयापन पानी क उपल धता पर ही आि त रहा। आज़ादी के साठ साल बीत जाने पर भी देश क सकल कृ िषयो य जमीन का महज 40 फ सदी ही संिचत हो पाया। अिधकांश कसान के िलए साल दर साल वषा क अिन तता के साथ एक संकट ये सामने आ गया क उपल ध जल संसाधन का शहर ारा बेरहमी से दोहन कया जाने लगा। द ली क जल आपू त टेहरी बांध से होती है जो वहां से 200 मील क दूरी पर है जब क बंगलौर को जल आपू त कावेरी से होती है जो वहां से 100 कलोमीटर दूर है। शहर म रहने वाले सुिवधा संप और रसूखदार लोग को स ती दर पर उनके ज रत के मुतािबक पानी क आपू त क जाती है। इसका नतीजा यह होता है क अभाव और भेदभाव क वजह से कई बार लोग ाकु लता म आ ोिषत हो जाते ह। सन् 1993 म तिमलनाडु म या ा करते ए प कार पी. सा नाथ ने पाया क बीच रात म कसान ने ेन रोक दया और सारा पानी िनकालकर ले गए। दस साल के बाद जब उ री राज थान म सूखा पड़ा तो कसान को अपने मवेिशय को बचाने के िलए खुले बाजार से पानी खरीदना पड़ा। उ ह ने पानी के िलए जो मू य अदा कया वो एक आम द लीवासी क तुलना म 166 गुना यादा था।26 बीसव सदी के अंितम साल म देश म पहली कसान आ मह या क खबर कािशत ई। यह एक िवचिलत करने वाला प रदृ य था य क भले ही भूखमरी और गरीबी इस उपमहा ीप म स दय से एक सचाई रही हो ले कन लोग इस हद तक नह गए थे क वे अपनी जान ही ले ल। जैसा क ांसीसी समाजशा ी एमाईल दुरिखम के एक मुख अ ययन म दखाया गया है क आ मह या एक ऐसी प रि थित है जो शहरी जीवनशैली ारा अलग-थलग कर दए जाने और अपनी जड़ से काट दए जाने क वजह से पैदा होती है। 19व सदी के उ राध म उसक बढ़ोतरी ांस म उन लोग के बीच ई जो प रवार और समुदाय के सुर ा मक वातावरण से दूर जाकर रहने लगे थे। ऐसा ही 20व सदी के आिखर म बंगलौर म आ जब युवा साॅ टवेयर पेशेवर के बीच इसक बढ़ो री देखी गई जो काम के लंबे घंट क बजाय, अपने सहक मय क रातोरात तर क वजह से तनाव म आ गए थे। भारतीय मानवशाि ाय ने अपने पूव म कए गए अ ययन म पाया था क कु छ अलग-थलग पड़े पहाड़ी जनजाितय म आ मह या क ऊंची दर मौजूद थ ।27 ले कन भारत म जो कु छ भी इन वि थत कृ षक समुदाय के साथ हो रहा था वो वाकई आ यजनक और अक पनीय था। सन् 1995 से लेकर 2005 के बीच देश म करीब 1 लाख कसान क आ मह या क खबर काश म आ जो आं देश से लेकर राज थान जैसे सूब से आई थी। आमतौर पर प रवार का मुिखया पु ष ही आ मह या करता था, जो अ सर क टनाशक खा लेने, गले म र सी का फं दा डाल लेने या िबजली के करं ट से खुद को मार डालने क श ल म सामने आती थी। ब त सारे मामल म ऐसा इसिलए होता था क वह साल साल से बढ़ता बक, सहकारी सं थान या थानीय महाजन का कज अदा करने म असमथ हो जाता था। ले कन एक बात यह भी थी क कसान के कज म डू बे रहने क परं परा भी ामीण जीवन क एक िवकृ त सचाई थी। सवाल यह था क अब ऐसी कौन सी प रि थित आ गई थी क इसका इतना दुखदायी नतीजा सामने आने लगा था? इसका कोई वि थत अ ययन हमारे सामने उपल ध नह है ले कन कु छ शु आती आंकलन ज र लगाए जा सकते ह। दुरिखम क माने तो कसान क बढ़ती आ मह या शायद इस बात से संबंिधत है क समकालीन भारत म सामािजक प रवतन काफ ती गित से हो रहे ह। नया उपभो ावादी समाज िजसक छिव टेलीिवजन के ारा गांव तक ले जाई जाती है वह कामयाबी और नाकामयाबी क ऊंची क मत वसूल रहा है। इस वजह से जब कभी भी फसल खराब होती है या नई फसल उ मीद के मुतािबक नतीजा नह देती है तो ि गत तर पर अपमानबोध और लाचारगी का एहसास उससे कह यादा होता है जो पहले के जमाने क अपे ा ि थर और कम भौितकवादी युग म होता था।28 VI गरीबी के लगातार बने रहने क एक वजह यह है क मौिलक सुिवधा मसलन िश ा और वा य सेवा दान करने म सरकार का ब त खराब रकाॅड रहा है। सन् 1991 म जब देश म आ थक सुधार शु ए थे तो देश म महज 39 फ सदी मिहलाएं पढ़ और िलख सकती थ जब क पु ष म ऐसा िसफ 64 फ सदी कर सकते थे। यहां भारत न िसफ यादा िवकिसत पि मी देश से िपछड़ गया था बि क वह अपने कु छ एिशयाई पड़ोिसय से भी पीछे था। ीलंका म िशि त पु ष क आबादी 94 फ सदी थी और मिहला क 89 फ सदी थी। चीन म यह आंकड़ा पु ष के िलए 96 ितशत था जब क मिहला के िलए 75 ितशत। अपने सभी या अिधकांश नाग रक को िशि त करने क असमथता या अिन छा आज़ाद भारत क सबसे बड़ी नाकामयाबी मानी गई।29 हालां क न बे के दशक म सरकार ने कई योजनाएं शु क ता क सावभौम िश ा के ल य को हािसल कया जा सके । इसम पहली योजना थी िजला ाथिमक िश ा योजना जो ऐसे 250 िजल म शु क गई जहां मिहला क सा रता दर रा ीय औसत से कम थी। कु छ समय बाद सविश ा अिभयान नाम क योजना शु क गई। ाथिमक िश ा को ल य करके जारी क जाने वाली रािश को बढ़ाया गया और इस े म िवदेश से भी धन के वाह को इजाजत दी गई। सरकार को सु ीम कोट के आदेश क वजह से भी यादा स य होना पड़ा, िजसने सभी रा य सरकार को िनदश दया क कू ल म बना आ दोपहर का भोजन दया जाए। ब त सारे ब े जो ाथिमक िव ालय म पढ़ते थे वे म य िव ालय म जाने से पहले ही कू ल छोड़ देते थे। इन ब म ब त सारी लड़ कयां होती थ , िजनके प रवार वाले उनका कू ल छु ड़ा देते थे ता क वे घर के काम म मदद कर सक। ये लड़ कयां खाना बनाने, घर क साफ-सफाई और जलावन बटोरने का काम करती थी। तिमलनाडु जहां दोपहर का भोजन सबसे पहले कू ल म शु कया गया था, वहां इस योजना ने कू ल म ब क सं या बढाने म काफ मदद क । ऐसी उ मीद क गई क इस योजना को रा ीय तर पर लागू करने से अिभभावक अपने ब को कू ल भेजने के िलए ो सािहत ह गे।30 न बे के दशक म कई क पनाशील गैर-सरकारी संगठन ने भी िश ा के े म वेश कया। आं देश म स य एक गैर-सरकारी संगठन ने 400 गांव के हरे क ब े को कू ल म दािखला दलाने म कामयाबी हािसल क । उस एनजीओ ने ऐसे ब के िलए एक ”ि ज कोस“ चलाया जो देर से कू ल म दािखला लेने आए थे (इनम से अिधकांश लड़ कयां थ ) और फर उनको गहन तरीके से को चंग देकर िनयिमत पाठय म म दािखला दया जाता था। भारत के सबसे बड़े शहर मुंबई म भी एक दूसरा एनजीओ झु गी-झोपि़डय के इलाके म ऐसा ही पाठय म चला रहा था। उसने वहां 3,000 बालवाि़डय क शु आत क िजसम 3 से 5 साल तक के ब को पढ़ना-िलखना िसखाया जाता था। इन घनी बसी झु गी-झोपि़डय म, जहां जगह िमलना ब त ही मुि कल था, सभी तरह क जगह का इ तेमाल कया गया। एनजीओ ने मं दर प रसर, कू ल का बरामदा, सावजिनक पाक और यहां तक राजनीितक दल के कायालय का भी इस काम के िलए उपयोग कया। इन बालवाि़डय से ब को सीधे नगर िनगम के िनयिमत िव ालय म भेजा जाता था। सन् 1998 तक करीब 55,000 ब को इन कू ल म पढ़ाया गया। इस योजना को बाद म उ र और पि मी भारत के अ य शहर म भी आजमाया गया।31 रा य क िश ा व था म भी योजना को लागू करने और उनके भावी होने म काफ अंतर देखा गया। िबहार और उ र देश के कू ल क व था ब त खराब थी। वहां ब त ही खराब सुिवधाएं थ । वहां लैकबोड, कु सयां और लड़ कय के िलए शौचालय का अभाव था। िश क को पढ़ाने म िच नह थी, उनके कू ल से अनुपि थत रहने क दर काफ ऊंची थी और अिभभावक म जाग कता का अभाव था। इस े म बेहतर दशन करने वाले रा य म दि ण म के रल और तिमलनाडु थे तो उ री रा य म िहमाचल देश। िहमाचल देश ारा शै िणक े म क गई तर वाकई काफ तेज और च काने वाली थी। िहमाचल म राजपूत क ब सं या है, जो एक ऐसी जाित है िजसने पारं प रक प से अपनी मिहला को घर से बाहर नह िनकलने दया है। इसके अलावा यह एक पहाड़ी रा य भी है जहां के गांव काफ दूरदराज म फै ले होते ह। इस वजह से वहां कू ल खोलना और कू ल तक प च ं ना काफ क ठन होता है। ले कन फर भी इन ाकृ ितक और सां कृ ितक बाधा को रा य के शासन ने अपने काम म आड़े नह आने दया। िजसका ेय वहां के ऊजावान मु यमं ी डाॅ. वाई.एस. पारमार को जाता है। जब साठ के दशक के अंत म िहमाचल को पंजाब से अलग कया गया तो पारमार ने ाथिमक िश ा को सरकार क सावजिनक नीित का क बंद ु बना दया। ाथिमक िश ा पर रा ीय औसत से दोगुनी रािश खच क गई और वहां िश क-छा का अनुपात देश के दूसरे रा य क तुलना म ब त ही यादा हो गया। अिभभावक ने ब त ज द ही अपने बेटे-बे टय को कू ल भेजे जाने के फायदे का मह व समझ िलया। जाग क प रवार और शासन ने इस बात का याल रखा क कू ल को पूरी तरह से वि थत कया जाए और िश क को उिचत िश ा के िलए े रत कया जाए। इसका आ यजनक प रणाम िनकला। जहां सन् 1961 म रा य क महज 11 फ सदी लड़ कयां सा र थ वह सन् 1998 म यह आंकड़ा 98 फ सदी तक प च ं गया।32 हालां क िहमाचल देश क तरह कोई भी रा य िश ा के े म दशन नह कर पाया ले कन आंकड़ बताते ह क िश ा का े अब उस तरह से िशिथल नह था जैसा क यह कभी आ करता था। न बे के दशक के अंत तक मिहला क रा ीय सा रता दर 39 से बढ़कर 54 फ सदी और पु ष क 64 से बढ़कर 74 फ सदी हो गई थी। सं या म इस ापक प रवतन के पीछे लोग क सोच म आए मौिलक प रवतन अहम वजह थी। एक जमाना था क ब त सारे अिभभावक अपने ब को कू ल भेजने क बजाय काम म लगा देते थे। ले कन अब वे अपने ब को उस ि थित म लाना चाहते थे, जहां वे अपनी मेहनत और क मत से शारी रक म क ि थित से ऊपर उठकर आधुिनक अथ व था म अपना मुकाम बना सक। जैसा क िश ाशा ी िवमला रामचं न ने साल 2004 म िलखा क ”िश ा क इतनी जबद त भूख कभी नह देखी गई। िपछले दस साल म कए गए अ ययन से जो बात सामने आई ह वो बताती ह क सभी वग और सभी समािजक समूह म िश ा के ित जबद त भूख जगी है। जहां कह भी सरकार ने एक अ छे कू ल क व था क है वहां दािखले म जबद त इजाफा आ है।“33 जहां एक तरफ िश ा के े म एक सतक आशावा दता अपनाई गई और दखाई वह दूसरी तरफ वा य े क ि थित खराब बनी रही। क ीय और रा य सरकार ारा िनयंि त और संचािलत अ पताल क बुरी हालत थी। उनम लोग ठु से ए रहते थे, वहां ापक ाचार था और बुिनयादी सुिवधा या यो य डाॅ टर क भारी कमी थी। वा य सेवा के ित देश के राजनीितक वग म चंता क साफ कमी देखी गई। हक कत तो यह थी क वा य सेवा पर सरकारी खच म िगरावट दज क गई। सन् 1990 म वा य सेवा पर जीडीपी का 1.3 फ सदी खच कया जाता था जो क 1999 तक घटकर 0.9 फ सदी रह गया। ले कन साथ-साथ ही िनजी वा य सेवा का ापक फै लाव आ और सन् 2002 तक वा य पर कए जाने वाले खच का 80 फ सदी िनजी वा य सेवा पर कया जाता था। हालां क इसका ल य फै लते ए म यमवग को सुिवधा मुहय ै ा कराना ही था। देश के कु छ इलाक म कु छ ितब एनजीओ ज र वा य सेवा मुहय ै ा करा रहे थे, ले कन देश के यादातर िह स म लोग वा य सेवा के िलए भगवान के भरोसे ही थे। वे थानीय वै और नीमहक म के पास अपनी बीमा रय का इलाज कराते थे। इन बात क पुि के िलए कु छ आंकड़े यहां ासंिगक हो सकते ह। सन् 2001 म देश म औसत जीवन याशा महज 64 साल थी। कई रा य म िशशु मृ युदर काफ अिधक थी। उदाहरण के िलए मेघालय म यह दर ित 1000 ब पर 89 थी। भारत म दुिनया के करीब 60 फ सदी कु रोगी थे (लगभग पांच लाख), जब क ितवष 1.5 करोड़ लोग टीवी से िसत थे िजनक सं या म हर साल 20 लाख क बढ़ोतरी हो रही थी। पुरानी बीमा रय के साथ ही देश म नई-नई बीमा रयां भी द तक दे रही थी। साल 2004 तक भारत म 50 लाख से यादा लोग ए स से िसत थे।34 लोकि य जनमानस म अभी भी अ का महा ीप ही ए स के िवषाणु से सबसे यादा िसत है। ले कन सन् 2005 म िति त सा ािहक फाइनिशयल टाइ स म छपी एक ि टश प कार क खबर के मुतािबक यह एक गलत अवधारणा थी। उस प कार ने दावा कया ”ए स के िखलाफ जंग भारत म लड़ी जाएगी, जहां पूरी दुिनया क आबादी का छठा िह सा रहता है। यह यह तय होगा क यह लड़ाई जीती जाएगी या मानवता इस लड़ाई म हार जाएगी।“ भारत म पहले से ही थानीय प से कई महामा रयां थ , ले कन चंता क बात ये थी क ये बीमा रयां ”प रि थित को और भी उलझा दगी और िवषाणु के फै लने क भयावह ि थित पैदा कर दं◌ेगी।“ अगर ऐसा होता है तो ”भारत क आ थक महाशि य क ेणी म जाने क सारी संभावनाएं ख म हो जाएंगी।“ इसके अलावा, एचआईवी िवषाणु िसफ एक आ थक दु व ही नह है, बि क रा ीय सुर ा का मु ा भी है य क सुर ा सेवा म काम करनेवाल म आम आदिमय क तुलना म इस बीमारी से त होने क पांच गुना यादा आशंका होती है। उस लेख का िन कष कु छ इस तरह से था भारत का अिनि त सावजिनक िव और कम संसाधन म चल रही सावजिनक वा य व था इस ि थित म नह है क वह ए स जैसी महामारी का बोझ झेल सके , जो अ क देश जैसी भयानक ि थित ा करता जा रहा है। भारत ए स क लड़ाई म एक चौराहे पर खड़ा है और इस लड़ाई म वह जो भी रा ता अपनाएगा वह दुिनया के भिव य के िलए िनणया मक सािबत होगा।35 हालां क इस रपोट को भी कोई पुराने जमाने के पि मी प कार क भारत के बारे म िनराशाजनक राय क तरह खा रज कर सकता है जब उ ह ने कसी अकाल, दंगा या कसी राजनेता क ह या के बाद भारत के बबाद हो जाने क भिव यवाणी क थी। ले कन इस बार मामला एक ह यारे वायरस एचआईवी का था। ये मानना होगा क भारत वा य सेवा के े म संकट से ज र गुजर रहा है और यह िसफ ए स िवषाणु तक सीिमत नह है। एक भारतीय प कार के शालीन ले कन गैर-िवरोधाभासी व के मुतािबक ”भारत ने अपनी सावजिनक वा य सेवा के बारे म सोचना छोड़ दया है और इसने उसक एक बड़ी क मत चुकाई है।“36 VII आ थक उदारीकरण ने भारत के लाख -करोड़ो लोग का जीवन तर ज र सुधारा है ले कन लाख -करोड़ लोग इस या म पीछे भी छू ट गए ह। कु छ ऐसे भी भारतीय ह जो बाजार और अथ व था को पूरी दुिनया के िलए खोल दए जाने क या म िवपरीत प से भािवत ए ह। जो लोग उदारीकरण क या से सबसे यादा भािवत ए ह उनम शायद उड़ीसा के आ दवासी सबसे मुख ह। उड़ीसा मु यतः दो भाग म बंटा है। इसका एक भाग इसका तटीय इलाका है जहां सवण हंद ु क ब सं या है, जब क दूसरे और आंत रक इलाके म पहाड़ी े क एक शं◌ृखला है जहां कई आ दवासी समुदाय रहते ह। पूरे रा य क बात क जाए तो हंद ु क ही ब सं या है और वे राजनीितक और शासिनक प से वच व म ह। सन् 1999 म गरीबी के मामले म उड़ीसा ने सबसे गरीब रा य के मामले म िबहार को भी पीछे छोड़ दया। उड़ीसा के अपे ाकृ त ऊंचे इलाक म रहने वाले लोग म आ दवासी समुदाय सबसे गरीब और आ थक प से असहाय ह। चाहे वो कृ िष यो य भूिम क बात हो, आमदनी क बात हो, वा य सुिवधा क बात हो या फर सा रता दर क बात हो वे पूरे रा य म सबसे पीछे ह। आ दवासी मानसून क वषा और जंगल-उ पाद पर अपने अि त व के िलए बुरी तरह आि त ह। ले कन य - य जंगल क कटाई हो रही है और बा रश क अिनि तता रहती है वे गरीबी के दलदल म और भी धंसते जा रहे ह िजसक अिभ ि अ सर भूखमरी से होने वाली मौत के प म होती है।37 इन ऊंचे इलाक क दौलत इसक जमीन के नीचे छु पी ई है। उड़ीसा म पूरे देश का 70 फ सदी बाॅ साईट भंडार है, साथ ही यहां काफ मा ा म लौह अय क भी पाया जाता है। ये खिनज पदाथ रायगढ़ और कोरापुट जैसे आ दवासी िजल म क त ह। अतीत म इन खिनज पदाथ को भारत के सावजिनक े क कं पिनयां िनकालती थ ले कन िपछले दशक म उनक जगह िनजी कं पिनय ने ले ली ह िजनम देशी और िवदेशी दोन ही कं पिनयां शािमल ह। रा य सरकार ने उन कं पिनय को जमीन देने के िलए उनके साथ कई करार कए ह और उ ह आकषक दर पर जमीन मुहय ै ा कराई ह जो 38 उन पहाि़डय को खोदकर खिनज िनकालना चाहते ह। इ ह प रयोजना म से एक मह वाकां ी प रयोजना थी उ कल अ यूिमना िजसक थापना सन् 1992 म क गई। यह कई कं पिनय का समूह थी िजसने आ द य िबड़ला समूह के साथ िमलकर कनाडा और नाव क कई कं पिनय को वहां बुलाया था। उनक िनगाह रायगढ़ िजले के काशीपुर लाॅक म बि लमाली पहाि़डय पर लगी थी िजसके नीचे 20 करोड़ टन बाॅ साइट का िवपुल भंडार था। ताव ये था क इन पहाि़डय म उ खनन का काय कया जाए और उसे नविन मत बाॅ साइट शोधन संयं तक प र कृ त करने के िलए ले जाया जाए और बने-बनाए उ पाद का फर िनयात कया जाए। इस काय के िलए इ तेमाल म आने वाली जमीन का कु छ िह सा सरकार के क जे म था जब क शेष करीब 3000 एकड़ जमीन पर आ दवासी खेती का काम करते थे। उस प रयोजना म उन आ दवािसय के फायदे क कोई चीज नह थी, बि क उ ह उस वजह से वहां से िव थािपत होना था और बदले म मामूली मुआवजा िमलना था। सन् 1993 म आ दवासी आंदोलनका रय के एक िश मंडल ने मु यमं ी से मुलाकात क और उनसे उस जमीन के प े को खा रज कर देने क मांग क । उनक मांग को खा रज कर दया गया और इसके बदले सरकार ने सव णकता का एक दल वहां भेज दया जो उस जमीन के अिध हण का लेखाजोखा तुत करता। अगले कई साल तक आ दवािसय ने कई रणनीितय को अपनाया क वहां से वह प रयोजना कसी तरह शु न होने पाए। उ कल ए यूिमना के कमचा रय के गांव म वेश पर रोक लगा दी गई। सड़क को जाम कर दया गया और जुलूस िनकाले गए ता क लोग म खनन क वजह से होने वाले पयावरणीय ित के बारे म जाग कता पैदा क जा सके । जब कं पनी ने िव थािपत होने वाले लोग के िलए ”माॅडल“ मकान बनाने शु कए तो उससे संभािवत प से लाभ उठाने वाले लोग ने उसे िगरा दया।39 दूसरी तरफ शासन उस प रयोजना को आगे बढ़ाने के िलए क टब था। उसक िनगाह म यह रा य के राज व बढ़ाने का एक ज रया था जब क दूसरी तरफ इससे पाट फं ड और नेता के खाते म भी पैसे जमा हो रहे थे। माच 1999 म द ली से कु छ समाजशाि ाय ने रायगढ़ का दौरा कया और एक रपोट जारी क । इस रपोट म उड़ीसा सरकार को चेतावनी दी गई, ”अगर थानीय आ दवािसय के बीच पैदा आ यह जन-िवरोध सही तरीके से नह सुलझाया गया तो यह शांितपूण िजला न सली गितिविधय का अ ा बन जाएगा।“40 डेढ़ साल के बाद व र पयावरण प कार डे रल डी. म टे ने मुंबई से रायगढ़ आकर ि थित के जमीनी अ ययन का फै सला कया। उ ह ने पाया क आ दवासी अपने िनणय के ित दृढ़ थे। उनका कहना था क ”खनन काय से बं लीमाली पठार का पयावरण बबाद हो जाएगा।“ एक आ दवासी नेता ने कहा क वे उस इलाके म सभी वाहन के वेश को रोक दगे। उसने कहा क हम कसी भी नतीजे को भुगतने के िलए तैयार ह और ”इस िवनाशकारी आग म सभी को झुलसने के िलए तैयार रहना चािहए।“ डी. म टे ने दज कया क दूसरी तरफ सरकार भी उस प रयोजना को हर हाल म लागू करने के िलए तैयार थी। उ ह ने िलखा क ”िपछले पांच साल म पुिलस और नेता के साथ िमलकर िजला शासन एक तरह से उन कं पिनय के िलए अि म सुर ा चौक का काम कर रहा था।“41 आिखरकार दो महीने के बाद असंतोष क आग भड़क ही उठी और दुभा यपूण ढंग से आ दवासी लोग को उसम झुलसना पड़ा। 15 दसंबर 2000 को रा य क स ाधारी बीजू जनता दल ने उस इलाके म प रयोजना के समथन म एक सभा का आ नान कया। ले कन ोिधत गांववाल ने उ ह सभा करने से मना कर दया। िवरोध करनेवाल को िततर-िबतर करने के िलए पुिलस क तीन लाटू न मंगाई ग , िजसे मिहला के एक समूह ने रोक दया। जब पुिलस ने मिहला पर ला ठयां बरसानी शु क तो उ ह बचाने के िलए पु ष सामने आ गए। पुिलस ने उन पर गोलीबारी क िजसम तीन आ दवासी मारे गए।42 ले कन काशीपुर क गोलीबारी के बाद भी रा य सरकार नह चेती और प रयोजना को आगे बढ़ाने पर आमादा रही। खिनज पदाथ क अंतरा ीय मांग से ो सािहत होकर उसने भारतीय और िवदेशी कं पिनय के साथ कई करार पर द तखत कए जो 3 अरब टन लौह अय क और 1.5 अरब टन बाॅ साइट को िनकालने के िलए कए गए। ये खिनज पदाथ इन कं पिनय ारा अगले 25 साल म िनकाले जाने थे। उन करार पर ह ता र करते समय उन इलाक क पयावरणीय और समािजक ि थितय पर तिनक भी िवचार नह कया गया।43 जैस-े जैसे इन प रयोजना ने आकार लेना शु कया, िवरोध दशन बढ़ता ही गया। क लंगनगर म लौह अय क सं करण हेतू टाटा टील के कारखाने क थापना के िलए उड़ीसा सरकार ने ब त ही स ते दर पर जमीन का अिध हण कर िलया। टाटा टील यहां पर लौह अय क का सं करण कर उसे चीनी बाजार म बेचना चाहता था। थानीय लोग के िवरोध को नजरअंदाज कर दया गया और जमीन टाटा टील को दे दी गई। वहां कारखाने के िनमाण का काम शु हो गया। साल 2006 के पहले स ाह म गांववाल ने कारखाने क दीवार को तोड़ दया िजससे पुिलस ने उनपर गोली चला दी। इस घटना म 12 लोग मारे गए। आ दवािसय ने उन मृतक के शरीर को हाइवे पर रख दया और िवरोध- दशन कया। हाइवे का ै फक एक स ाह तक बािधत रहा। उन आ दवािसय के साथ सबसे पहले िज ह ने अपना समथन कया वे माओवादी ांितकारी थे।44 VIII देखा जाए तो बंगलौर को आ थक सुधार के चेहरे के तौर पर देखना सहज लगता है। यहां िवदेशी बाजार के खुलने से भारी मा ा म कु शल म के िलए रोजगार पैदा आ है और काफ पैसा आया है िजसका आमलोग म करीब-करीब ठीकठाक िवतरण भी आ है। दूसरी तरफ उड़ीसा क घटना को आ थक सुधार का बबर चेहरा माना जा सकता है। यहां खनन काय से जो राज व पैदा होगा वह सीधे खदान मािलक और राजनेता क जेब म जाएगा जो उनके साथ िमलकर काम कर रहे ह। िजनक सबसे यादा ित होगी वे आम गांववाले ह गे िजनक जमीन के नीचे बाॅ साईट का अथाह भंडार छु पा आ है। वे बेघरबार हो जाएंगे और उनक संपि उनसे िछन जाएगी। उ ह पयावरणीय असंतुलन का भी सामना करना पड़ेगा जो क खुलेआम खनन काय से पैदा होने वाला एक अिनवाय नतीजा है। हां ये सच है क सन् 1991 से पहले भी जब उदारीकरण क शु आत नह ई थी, भारत म भयानक सामािजक-आ थक असमानता थी। देश के कु छ इलाके और कु छ समािजक समूह साफतौर पर अ य क तुलना म कम गरीब थे। ले कन बाजार आधा रत सुधार ने इन असामनता को और बढ़ाने का काम ही कया। इन दशक म जो रा य िजतने गरीब थे उनक उतनी कम तर ई जब क जो रा य पहले से ही अ छी ि थित म थे उनक यादा तर ई। पूरे न बे के दशक म िबहार क िवकास दर महज 2.69 फ सदी, यू.पी. क िवकास दर 3.58 फ सदी और उड़ीसा क 3.25 फ सदी बनी रही। दूसरी तरफ गुजरात 9.57 फ सदी, महारा 8.01 फ सदी और तिमलनाडु 6.22 फ सदी क दर से तर करता रहा। कु ल िमलाकर कहा जाए तो जो रा य देश के दि ण और पि मी िह से म थे उनक तर यादा ई जब क जो रा य उ र और पूव इलाके म थे उनक िवकास दर कम रही। इस या म िवशाल आबादी वाले रा य उ र देश और िबहार सबसे नीचे रहे। सन् 1993 म इन दोन रा य म देश के 41.7 फ सदी गरीब रहते थे जब क सन् 2000 म यह आंकड़ा बढ़कर 42.5 फ सदी हो गया।45 ये बात साफतौर पर सामने आई क कसी भी रा य का आ थक दशन उसके मानव संसाधन और बुिनयादी ढांचे पर शु म कए गए िनवेश पर पूरी तरह आधा रत है। िजन रा य म अ छे कू ल और अ पताल थे और जहां यादा कु शल और व थ लोग रहते थे वे अमूमन वही रा य थे जहां अ छी सड़क, िबजली क अ छी व था और अ छा शासन भी था।46 वाभािवक तौर पर इ ह रा य म िनवेश क त होता गया। आ थक सुधार के पूव के वष म क ीय सरकार अ सर ऐसी जगह पर उ ोग-धंधे लगाने को ाथिमकता देती थी िज ह ”िपछड़ा“ माना जाता था। ले कन िनजी उ िमय को ऐसी कोई बा यता नह थी। वे वह अपना िनवेश करते थे जहां उ ह यादा मुनाफे क संभावना दखती थी। इसका नतीजा यह आ क देश के दि णी और पि मी रा य ने उदारीकरण के युग म िनवेश को आक षत करने म कामयाबी हािसल कर ली। ले कन ऐसा नह है क िनवेश हािसल करने वाले रा य म पूरी आबादी को इससे फायदा हो गया। सबसे यादा समृ माने जाने वाले रा य म भी पूरी आबादी को इसका फायदा नह िमला। कनाटक और आं देश क राजधानी बंगलौर और हैदराबाद मशः साॅ टवेयर उफान के युग म िनवेश हािसल करने म सबसे ऊपर रहे ले कन इ ही रा य के सुदरू वत इलाके इसम ब त पीछे छू ट गए। सन् 1994 से 2000 तक ामीण कनाटक म ित ि उपभोग क दर 9.5 फ सदी सलाना के िहसाब से बढ़ी जब क कनाटक के ही शहरी े म यह दर 26.5 फ सदी सलाना के दर से बढ़ रही थी। आं देश के िलए यही उपभोग वृि दर ामीण इलाक के िलए महज 2.8 फ सदी सलाना थी तो शहरी इलाक के िलए 18.5 फ सदी। अगर पूरे देश क बात कर तो देश के सुदरू वत इलाक म सलाना उपभोग क वृि दर 8.7 फ सदी थी जब क शहर म यह दर 16.6 फ सदी थी।47 जैसा क अथशा ी टी.एन. ीिनवासन ने इन ि थितय पर ट पणी क है उसके मुतािबक इन िवषमता का मतलब है क अगर भारत म कोई गरीब है तो इसक यादा संभावना है क वह ामीण इलाके म रहता हो, अनुसूिचत जाित, जनजाित या कसी अ य समािजक प से वंिचत समूह से ता लुक रखता हो, यादा कु पोिषत, कमजोर या खराब वा य रखता हो। इसक संभावना यादा है क वह अिशि त हो, कम िशि त हो और म बाजार के िहसाब से कम कु शल हो। इसक भी संभावना है क वह कु छ खास रा य से (मसलन िबहार, म य देश, राज थान और उ र देश या फर उड़ीसा) से ता लुक रखता हो...।48 इन िवषमता का एक नतीजा ये आ है क गरीब इलाक से अपे ाकृ त समृ इलाक क तरफ पलायन म तेजी आई है। एक व था क यादातर भारतीय अपने ज म के थान पर ही रहते थे, काम करते थे और वह अपना आखरी व भी िबताते थे। ले कन अब वे अपने जीवनयापन के िलए लंबी दूरी तक या ाएं करते ह। उड़ीसा के मजदूर कनाटक के कु ग िजले म काॅफ बागान म काम करने के िलए 1000 मील क दूरी तय कर काम करने जाते ह। पंजाब और ह रयाणा के यादातर गे ं के खेत म िबहार और झारखंड के मजदूर के ारा काम होता है। ले कन शहर क तरफ भी ब त भारी पलायन आ है। उदाहरण के िलए द ली म काम करने वाले ब त सारे िम ी उड़ीसा से आते ह जब क मुंबई के ब त सारे टै सीचालक यू.पी. से आते ह। िसफ िश पी या िम ी और अकु शल मजदूर ही नह बि क दूसरे पेशे के लोग भी बड़ी तादाद म पलायन करते ह। उदाहरण के िलए िबहार म िशि त डाॅ टर और इं जीिनयर ने बड़े पैमाने पर दूसरी जगह पर पलायन कया।49 समकालीन भारत म आ थक िवकास क वजह से साफतौर पर वग य और े ीय असामनता पैदा ई है। नोबेल पुर कार िवजेता अथशा ी अम य सेन ने इस पर चंता जािहर करते ए िलखा है क जैस-े जैसे यह असमानता बढ़ेगी हंद ु तान का आधा िह सा एक तरफ कै लीफो नया के समान दखेगा तो दूसरी तरफ आधा िह सा सहारा इलाके के अ क देश जैसा।50 वैसे भी पहले से ही हमारे यहां आ थक समृि के साथ गरीबी और तकनीक िवकास के साथ-साथ मानवीय म का अवमू यन एक सचाई क तरह मौजूद रहा है। भारत म जीवन का िवरोधाभास उस व साफतौर पर आ जब िसतंबर 2001 म धानमं ी ने उड़ीसा के ामीण से बातचीत क । नई द ली म अपने आवास से धानमं ी ने उप ह संचार के मा यम से उड़ीसा के काशीपुर के आ दवािसय से बातचीत क िजनके कई संबंधी आम के िछलके खाने क वजह से मर गए थे। उनक फसल खराब हो गई थी। सरकार के मुिखया ने अपने देश के नाग रक से बात करते ए कहा क ”यह ब त दुभा य क बात है क आधुिनक दुिनया म भी लोग जहरीले पदाथ को खाने पर मजबूर हो रहे ह।“ धानमं ी वीिडयोफोन पर अपने देशवािसय से बात तो कर रहे थे, ले कन फर भी वे इस ि थित म नह थे क उन लोग तक सुचा प से खा पदाथ प च ं ा पाएं।51 IX सन् 1950 म जो आ थक िवकास क या अपनाई गई थी उस पर ापक आम सहमित थी। हालां क उस समय भी उसके कु छ आलोचक ज र थे ले कन उनक सं या ब त ही कम थी और उनका कोई समािजक आधार नह था। जब क न बे के दशक म अपनाई गई आ थक िवकास क नीित के ब त सारे आलोचक थे। वे राजनीितक तं के भीतर भी थे और बाहर भी। समकालीन भारत म जो आ थक िवकास पर बहस हो रही ह उसे करने वाले मूलतः दो वैचा रक ुव से ता लुक रखते ह। तंभकार टी.एन. िननान के श द म एक ुव ”सुधारवादी“ खेमे का है तो दूसरा ”लोकलुभावनवादी“ खेमे का।52 सुधारवा दय क मांग है क बाजार क शि य को मु कया जाए, राजक य सहायता म कटौती क जाए, बाधा पैदा करने वाले बा यकारी म कानून क समाि क जाए, पए क पूण प रवतनीयता क इजाजत दी जाए और अथ व था से रा य के ह त ेप को पूण प से हटा दया जाए। कु छ तो यहां तक चाहते ह क वा य सेवाएं और िश ा को िनजी हाथ म सौप दया जाए। दूसरी तरफ लोकलुभावनवा दय क मांग है क िवदेशी िनवेश पर पाबंदी लगाई जाए, मु य-मु य उ ोग के रा ीयकरण को िनरं तर कया जाए और िमक और छोटे उ िमय के िहत क र ा क जाए। इसके साथ ही उनक ये भी मांग है क रा य भूिम सुधार को लागू करे , ामीण गरीबी के उ मूलन के िलए योजनाएं लागू क जाएं और ामीण-शहरी गरीब के िलए स ती दर पर भोजन, आवास और ऊजा क ज रत को पूरा कया जाए। इन दो समूह के बीच चलने वाली बहस काफ जोरदार है और ये िविभ मंच पर चलते रहते ह। ये बहस ेस, संसद, टेलीिवजन टू िडयो और सड़क पर चलती रहती ह। िवरोधाभास यह है क राजनीितक दल जब स ा म होते ह तो वे आ थक सुधार के प म होते ह जब क जब वे िवप म होते ह तो इसक मुखालफत करते ह। सन् 1998 से लेकर 2004 तक बीजेपी स ा म थी तो उसने अथ व था को मु करने और सरकारी उप म म िविनवेश लाने क दशा मे जोरशोर से काम कया। ले कन इन नीितय का िवप ी कां ेस ने जमकर िवरोध कया, िजसने मूल प से सन् 1991 म बाजार आधा रत आ थक नीितय क शु आत क थी। अपने हाल के इितहास को भूलते ए या खा रज करते ए कां ेस ने सन् 2000 म उदार आ थक नीितय और सि सडी कम करने के िखलाफ रा ापी हड़ताल भी क ।53 स ाधारी बीजेपी ने साल 2004 का चुनाव ‘इं िडया शाइ नंग’ नाम के एक खुशनुमा नारे के साथ लड़ा और बाजार आधा रत िवकास के साथ सभी के िलए समृि लाने का वादा कया। कां ेस ने आम आदमी का नारा देकर उस दावे का िवरोध कया। हालां क चुनाव जीतने के बाद कां ेस-नेतृ व वाली सरकार ने आ थक सुधार के मूल णेता डाॅ. मनमोहन संह को धानमं ी पद के िलए चुन िलया। उसके बाद उ ह ने आ थक सुधार के दो मश र समथक को िव मं ी और योजना आयोग के उपा य पद पर िनयु कर दया। अब आलोचना करने क बारी बीजेपी क थी। अब उ ह ने पुराने रा वादी िवचार वदेशी को जोर-शोर से उछालना शु कर दया और दावा कया क सरकार क आ थक नीितयां देश क सं भुता और वतं ता को नजरअंदाज कर रही है। सबसे उ सुकतापूण वहार तो मा सवादी क युिन ट पाट का होता है, जब वो स ा म या स ा से बाहर रहती है। द ली म सीपीएम के ब त सारे बुि जीवी जो मश र जवाहरलाल नेह िव िव ालय से जुड़े ए ह, वे अ सर लोकलुभावन नीितय क वकालत करते ह। वे सि सडी म कटौती कए जाने का िवरोध करते ह, स म सरकारी उप म के िविनवेश का िवरोध करते ह और िवदेशी पूंजी िनवेश का िवरोध करते ह। जब कभी भी सावजिनक े क कोई कं पनी या उप म को बेचा जाता है तो सीपीएम का मजदूर संघ उसके िवरोध म हड़ताल या बंद का आयोजन करता है। जब क पि म बंगाल म उसी सीपीएम के मु यमं ी स य प से देशी और िवदेशी पूंजीपितय से िनवेश क गुहार लगाते ह। उ ह ने अ यिधक उ पंथी काम के िलए अपनी पाट के ेड यूिनयन क आलोचना क है और मुख साॅ टवेयर उ ोग म बंद पर पाबंदी लगा दी है। उ ह ने तो एक बार इतना तक कह दया था क उनका शासन इस बात से े रत है क या तो ”सुधार करो या िवलु हो जाओ!“ अ पसं यक सरकार और गठबंधन राजनीित के इस युग म राजनीित म कु छ लेनदेन क बात अिनवाय हो गई है। सुधारवादी और लोकलुभावनवा दय के बीच साझी जमीन तलाशने क या आव यक हो गई है। इसी तरह के एक समझौते म सन् 2005 म रोजगार गारं टी योजना लागू करने का फै सला कया गया, िजसम रा य के िलए यह ज री बना दया गया क वह ज रतमंद लोग को रोजगार मुहय ै ा कराए। इस योजना के तहत सरकार को ज रतमंद लोग को िम ी और जल संर ण, सड़क िनमाण और अ य इसी तरह के काम म रोजगार देना था। रोजगार गांरटी योजना के िलए वामपंथी अथशाि ाय ने जोरशोर से आवाज उठाई थी जो सोचते थे क इस योजना से ामीण गरीब को ब मू य संबल िमल पाएगा और देश के सुदरू वत इलाक म भी बुिनयादी ढांचा तैयार कया जा सके गा। ले कन बाजारवादी अथशाि ाय ारा इसका िवरोध कया गया िजनक राय म यह अथ व था पर एक गैरज री बोझ थी और इससे ाचार को बढ़ावा िमलेगा। उ मीद के मुतािबक ही संसद ारा पा रत कया गया रोजगार गारं टी योजना को सुधारवा दय ने अितवादी करार दया जब क लोकलुभावनवा दय ने इसका समथन कया।54 लाइसस-कोटा-परिमट राज को ख म कए जाने क वजह से ाचार क ब त सारी िखड़ कयां बंद हो गई ह। ले कन फर भी िनजीकरण क या ने ाचार क कु छ नई िखड़ कयां भी खोली ह। जब कोई सरकारी े का कारखाना बेचा जाता है तो वहां कसी खास दावेदार के प म फै सला लेने क संभावना ज र होती है िजसक एवज म पैसा वसूला जाता है। मह वपूण बात ये है क रा य के पास अभी भी ये शि है क वो जमीन का अिध हण कर सके और उसे कसी को आवं टत कर सके । अतीत क तरह ही मौजूदा व म भी स ते दर पर जमीन अिध हण कर उसे बाजार दर से कम पर कसी खास उ मी को आवं टत कर दया जाता है और इस तरह स ा का दु पयोग बद तूर जारी है।55 शायद आ थक सुधार के बाद के युग म सबसे कु यात ाचार का मामला महारा म एक िबजली घर क थापना का ही है िजसे एक अमे रक कं पनी एनराॅन थािपत करने वाली थी। (हालां क उसके बाद से उससे भी बड़े-बड़े मामले सामने आ चुके ह)। जून 1992 म महारा क कां ेस सरकार ने एनराॅन के साथ एक करार पर द तखत कया िजसके मुतािबक सरकार ने एनराॅन को उसके िनवेश पर 16 फ सदी सलाना क दर से मुनाफे का वादा कया। ले कन उस करार क शत कसी तरह ेस के हाथ लग ग और उस प रयोजना के िवरोध म एक जनांदोलन भड़क उठा। िवप ी िशवसेना भी उस िवरोध म शािमल हो गई। उस प रयोजना को ता कािलक प से रोक दया गया ले कन जब सन् 1995 म िशवसेना स ा म आई तो उसने अपना ख बदल िलया और एनराॅन के साथ वाता करने लगी। फर से एक बार िवरोध शु हो गया और इस बार कां ेस पाट उस िवरोध के समथन म आ खड़ी ई। एनराॅन क प रयोजना कभी भी जमीन पर उतर नह पाई। इसक एक वजह तो रा य म इसके िवरोध म चल रहा दशन था और दूसरी वजह ये थी क एनराॅन अमे रका म भी संकट का सामना कर रही थी। आिखरकार कं पनी को दवािलया घोिषत कर दया गया। ले कन जब यह िववाद अपने चरम पर था तो भारत म एनराॅन के मुख ने कहा क कं पनी ने ” चार“ पर दो करोड़ डाॅलर खच कए ह िजसे ये माना गया क (जो लगभग स य ही था) ऐसा कं पनी ने बतौर घूस खच कए थे। इससे अंदाज लगाया जा सकता है क जब िसफ बातचीत के दौरान इतनी बड़ी रकम घूस के तौर पर दे दी गई तो जब प रयोजना वाकई शु हो जाती तो कतनी बड़ी रकम इधर से उधर होती।56 X भारतीय अथ व था के बढ़ते आकार ने इसक िवदेश नीित म कु छ साफतौर पर दखने वाले प रवतन को प रलि त कया है। इसम से एक है अमे रका के साथ इसक बढ़ती िम ता। जैसा क पीछे हमने इस पु तक म देखा है क दोन देश के बीच कभी भी आमतौर पर सौहादपूण संबंध नह रहे ह। शीतयु के काल म धीरे -धीरे अमे रका, भारत के पड़ोिसय के नजदीक चला गया था जो भारत से श ुतापूण संबंध रखते थे, जब क भारत ब त हद तक अमे रका क िवरोधी महाशि के नजदीक चला गया। सन् 1991 के बाद अमे रका के िलए सोिवयत संघ का खतरा तो ख म हो गया, ले कन भारत के िलए पा क तान का संकट बरकरार रहा। ऐसा न बे के दशक के अंत म ही हो पाया क अमे रका ने दोनो देश को बराबर तव ो देनी शु क या उनसे बराबर क दूरी थािपत कर ली। इ सव सदी के शु आती साल म अमे रका का पलड़ा भारत क तरफ झुकता तीत आ। इसक वजह मु यतः आ थक थ । अमे रक उ पाद के िलए भारत ब त बड़ा बाजार था। (सन् 1990 म भारत-अमे रक ापार महज 5.3 अरब डाॅलर के बराबर था जो क दशक के आखरी तक ितगुणा हो गया)। सन् 2000 म अमे रक रा पित िबल लंटन ने भारत क या ा क और उसके छह साल बाद रा पित बुश ने। इन या ा ने इस बात क त दीक क क दोन देश के ख म कस तरह के मौिलक प रवतन आए ह। य क जैसा क िवदेश नीित के िवशेष टीफे न कोहेन ने कहा क एक तरफ दशक तक शीतयु के काल म अमे रका ने भारत को एक ”मह वहीन यादे“ के प म देखा था, तो दूसरी तरफ बीसव सदी के अंत होते-होते अब भारत उसके िलए ” वाभािवक िम “ बन गया है।57 अपनी भारत या ा क पूव सं या पर वाॅ शंगटन के एिशया सोसाइटी म दए गए अपने भाषण म जाॅज ड यू बुश ने भारत को एक ”वैि क नेता“, ”रणनीितक साझीदार“ और एक ”अ छे िम “ क सं ा दी।58 भारत को एक वाभािवक िम के प म िचि त कया जाना अमे रक कां ेस और वाइट हाउस के िलए पटागन क नीितय के ऊपर एक िनणया मक जीत थी। जैसा क पूव सीनेटर लैरी ेसलर ने इं िगत कया क वाॅ शंगटन के सै य जनरल पा क तान को िसफ इसिलए पसंद नह करते थे क वे उसे हिथयार बेचते थे, ”बि क इसिलए भी क वे एक लोकतं क तुलना म तानाशाह से करार करने म सहज महसूस करते थे। जब कोई पटागन का अिधकारी पा क तान जाता तो वह एक सै य जनरल से िमलकर सारी बात वि थत कर लेता। ले कन दूसरी तरफ अगर उसे भारत जाना पड़ता तो उसे धानमं ी, संसद, अदालत और खुदा न करे ेस से भी बात करनी होती।“59 दूसरी तरफ जहां तक भारत सरकार का संबंध था तो उसे शीतयु के ख म होने के मह व का देर से पता चला। सन् 1998 म कया गया परमाणु परी ण कु छ अथ म देश क वतं िवदेश नीित को जारी रखने का ही एक यास था। हालां क जब अमे रका परमाणु परी ण पर अपनी आपि य को लेकर कु छ नरम आ और उसने भारत क परमाणु मता को वीकार कर िलया तो भारत सरकार ने गंभीरता से अमे रका के साथ अपने संबंध को सुधारने का यास शु कर दया। वैसे भी एक- ुवीय हो चुक दुिनया म ये समझदारी क ही बात थी क दुिनया के सबसे ताकतवर मु क के साथ संबंध को सुधारा जाए। अब भारतीय नेता दोन देश को जोड़ने वाली ”साझा मू य “ क बात करने लगे जो इन दो ”महान लोकतं “ को आपस म जोड़ता था। दूसरी तरफ दोन देश के आपसी आ थक िहत भी काम कर रहे थे, य क साॅ टवेयर उ ोग के िलए अमे रका सबसे बड़ा बाजार था। यहां तक क साल 2001 म दोन देश के संबंध इतने नजदीक हो गए क बीजेपी के िवदेश मं ी ने अमे रका को अफगािन तान म सैिनक मदद देने तक क पेशकश कर दी। हालां क इस ताव को धानमं ी ने खा रज कर दया ले कन इससे यह साफतौर पर झलककर सामने आया क दोन देश के राजनीितक ित ान कतने नजदीक आ गए थे।60 जैसा क आ थक नीितय म देखने को िमला यहां भी देश क दोन मुख पा टयां स ा म और स ा से बाहर अलग-अलग वहार करती दख । जब कां ेस िवप म थी तो उसने बीजेपी के अमे रका के नजदीक जाने क नीितय क यह कहकर आलोचना क थी क वह नेह काल से चली आ रही देश क ”गुट-िनरपे नीित“ से दूर होती जा रही है। ले कन सन् 2004 म जब कां ेस स ा म आई तो इसने काफ तेजी से अमे रका से कारोबारी संबंध सुधारने क दशा म काम कया। इसने अमे रका के साथ परमाणु सार पर साझा ख अपनाया और परमाणु तकनीक पर अमे रक सहायता हािसल करने क कोिशश क । हाल म भारत और अमे रका के नजदीक आने क घटना ऐितहािसक झान के िब कु ल िवपरीत है। उसी तरह से भारत और चीन के बीच बढ़ता सामंज य भी साफ दखता है। यहां भी संबंध म आ रहे इस प रवतन का मु य वाहक अथ व था ही है। साल 2002 म भारत और चीन के बीच का ापार करीब 5 अरब अमे रक डाॅलर के बराबर था (एक दशक पहले तक लगभग यह शू य के बराबर था)। भारत क दुकान म चीनी इलै ाॅिनक समान बड़ी मा ा म दखने लगे थे। उसी तरह भारतीय दवाएं और काॅ मे ट स उ पाद चीनी दुकान म दख रहे थे। इस बात ने भी संबंध सुधारने म मदद क क चीन ने पा क तान के साथ ब त ही नजदीक का संबंध दशाने से परहेज कया। उदाहरण के िलए 1999 के कारिगल संघष के दौरान चीन िनरपे ही बना रहा। जब क उस तुलना म अगर हम सन् 1971 और 1965 म ए भारत-पाक यु को याद कर तो चीन ने खुलकर इ लामाबाद का समथन कया था।61 जुलाई 2003 म धानमं ी वाजपेयी ने चीन म एक स ाह िबताया। बीज ग म उ ह ने एक समझौते पर द तखत कया िजसके मुतािबक भारत ने ित बत पर चीन के अिधकार को मा यता दे दी (िजसे चीन ने 1950 म जीता था)। ित बत को चीन का एक अिभ अंग मान िलया गया। बदले म चीन ने िस म पर भारत के अिधकार को मा यता दे दी (िजसे भारत म 1974 म शािमल कया गया था)। शंघाई म वाजपेयी ने आ थक मामल पर अपना यान क त कया और भारतीय साॅ टवेयर और चीनी हाडवेयर उ ोग के गठबंधन का आ वान कया। ऐसा लगा क पहले के ये दोन श ुतापूण ख रखने वाले देश अब ”संबंध क नई सड़क“ पर आगे बढ़ रहे ह और एक ”सहयोगा मक साझेदारी“ क दशा म कदम रख रहे ह।62 उसके दो साल बाद चीनी धानमं ी वेन िजयावाओ ने भारत का दौरा कया। उस दौरे क मु य बात ये थी क उ ह ने राजधानी द ली का दौरा करने से पहले बंगलौर का दौरा कया। उनके साथ आए सौ सद य के िश मंडल म यादातर कारोबारी लोग थे और उनक अिधकांश बैठक इं िडयन चै बर आॅफ काॅमस के साथ ई। बंगलौर म दए अपने भाषण म िजयावाओ ने वाजपेयी के उस व को दोहराते ए भारतीय साॅ टवेयर और चीनी हाडवेयर उ ोग के गठबंधन क वकालत क और कहा क इ सव सदी एक ”एिशयाई सदी“ होगी। एक टेलीिवजन सा ा कता से बात करते ए चीनी राजदूत ने ट पणी क क ”उनके मुतािबक कारोबार क बात उनके िलए सीमा िववाद से यादा मह वपूण है।“63 XI सन् 2004 म भारतीय अथ व था का दशन अमे रक रा पित चुनाव म एक बहस का मु ा बन गया। यह एक आ यजनक बात थी ले कन उससे भी आ यजनक बात ये थी क भारतीय क गरीबी नह बि क उनक समृि पर बहस क जा रही थी। चुनाव चार के दौरान दए गए अपने कई भाषण म डेमो े टक पाट के उ मीदवार जाॅन के री ने अमे रक जनता को इस बात का भय दखाया क अगर जाॅज बुश फर से जीत गए तो यादा से यादा नौक रयां पूव देश क तरफ चली जाएंगी। के री ने मतदाता से वादा कया क अगर वे चुनाव जीत जाते ह तो उनका शासन ऐसी संर णवादी नीितयां अि तयार करे गा क अमे रक नौक रयां ”बंगलौर क तरफ“ नह जा पाएंगी। ऐसा पहली बार हो रहा था क एक अमे रक रा पित पद का उ मीदवार कसी भारतीय शहर का नाम लेकर उसे अमे रक िहत के िखलाफ बता रहा था। दूसरे कई अमे रक कै री से पहले ही इस तरह के चार म लगे ए थे। साल 2002 म लो रडा के एक कं यूटर ो ामर ने अमे रक कां ेस जाकर ”आउटसो सग“ ख म करने क गुहार क । उसी साल यूजस सीनेट क एक मिहला सद य ने एक िवधेयक पेश कया िजसम सरकारी ठे क को िवदेशी कं पिनय को न देने क मांग क गई। लो रडा के उस कं यूटर ो ामर क तरह ही उसक मु य िशकायत भारतीय कं पिनय और भारतीय पेशेवर के िखलाफ थी। ये राजनीित अपने उन अमे रक ो ामर के दद को अिभ ि दे रहे थे िजनक नौक रयां भारतीय कं पनी और भारतीय इं जीिनयर क वजह से जा चुक थ ।64 दसंबर 2003 म भावशाली पि का िबजनेस वीक ने एक आवरण कथा कािशत क िजसका शीषक था - भारत का उदय। उस लेख म बताया गया क अब बंगलौर म पूरे िसिलकाॅन वैली से भी यादा इं जीिनयर कायरत ह। वे इं जीिनयर यादातर अमे रक कं पिनय के िलए काम कर रहे थे िजनम जनरल इलेि क जैसी िवशालकाय कं पनी भी शािमल थी, िजसक ज टल इं जीिनय रं ग सम या को भारतीय इं जीिनयर सुलझा रहे थे। इसके साथ ही वे के नसास कसान के िलए भी काम कर रहे थे िजनका मकसद अपना टै स रटन भरवाना था। िबजनेस वीक ने ट पणी क क ”इस तरह क तकनीक छलांग भारत के िलए तो अ छी है“ ले कन ”ब त सारे अमे र कय के िलए भयानक है।“ िवदेशी िवक प ारा िजन थानीय कमचा रय क छटनी क जा रही है उनका जीवन ”बुरी तरह भािवत“ होगा, उनम से ब त कम ही नई नौक रयां हािसल कर पाएंगे या फर उ ह उनके िपछली नौकरी क तरह वेतन शायद ही िमल पाएगा। ”इसम कोई शक नह क रोजगार के े म अमे रका म जो तूफान आकार ले रहा है उसके क म भारत ही है।“ अमे रक ांत क िवधाियकाएं आउटसो सग पर पाबंदी लगाने के दबाव म थ । इं िडयाना जैसे ांत क कु छ िवधाियकाएं इसके दबाव म भी आ गइं िजसने भारतीय कं पिनय के सरकारी ठे के लेने पर पाबंदी लगा दी।65 यहां ये बात रे खां कत करने लायक है क इस तरह क चंताएं पूरे पि मी जगत म क जा रही ह और वे िसफ अमे रका तक ही सीिमत नह है। जब ि टश रे लवे ने अपने टाइम टेबल से संबंिधत पूछताछ को भारत आउटसोस कया तो वहां भी इसका िवरोध आ। हालां क कु छ लोग ने इसक शा ीय याय से भी तुलना क िजसम सा ा य क पूव जा उससे अपने अतीत क पीड़ा का बदला ले रही थी, सन् 2006 क ग मय म ांसीसी और बेि जयन राजनीित ने उनक सबसे बड़ी इ पात कं पनी आसलर क िब पर चंता जािहर क । आसलर को िम ल टील नाम क एक कं पनी खरीद रही थी िजसका मािलक एक भारतीय था। हालां क वो िब भली भांित संप हो गई ले कन आम-जनमानस का पूवा ह और राजक य स ा ने इसे रोकने क भरपूर कोिशश क । ऐसा कहा गया क कं पनी के नए खरीददार सही तरीके से कं पनी क ”सं कृ ित“ और उसके कमचा रय के िहत क देखभाल नह कर पाएंगे। भारत के आ थक उदय पर कु छ ट पणीकार बदहवासी म ट पणी करते दखे तो कु छ म शंसा-भाव भी था। अ ैल 2004 म यूजवीक ने अपने पाठक को सूिचत कया क भारत अब एक गरीब, बौि क प से अनिभ और तीसरी दुिनया का देश नह रहा, बि क यह अब ”कारोबार करने के िलए एक अ छी जगह“ के प म उभरकर आ गया है और अमरी कय और अमे रक पूंजी के िलए ”एक िनवेश यो य साझीदार“ के प म सामने आ गया है।66 दो साल बाद रा पित बुश क भारत या ा को रे खां कत करते ए उसी पि का ने भारत को ”एिशया का दूसरा पावरहाउस“ बताया और इसक तारीफ क । यूजवीक ने दावा कया क ”भारत म ि ही सव है।“ एक तरफ भारत म े िडट काड उ ोग 35 फ सदी सलाना क दर से बढ़ोतरी कर रहा है तो िनजी उपभोग जीडीपी का 67 फ सदी तक प च ं गया है। ऐसे म ”सां यिवद इस त वीर को पूरी तरह से नह देख पा रहे ह क भारत म या हो रहा है। कम से कम शहरी े म भारतीय उ साह से लबरे ज ह। भारतीय कारोबारी अपने भिव य को लेकर ब त ही आशाि वत ह। भारतीय िडजाइनर और कलाकार अपने भाव को पूरी दुिनया म फै लाने क सोच रहे ह... ऐसा लगता है मानो लाख -करोड़ लोग ने अचानक अपने अंदर छु पी ई संभावना को पहचान िलया है।“67 साल 2005 म कािशत एक मश र और ब प ठत पु तक म यूयाॅक टाइ स के तंभकार थाॅमस डमैन ने िलखा क ”बीस बरस पहले भारत को सपेर , गरीब और मदर टेरेसा का देश माना जाता था। आज इसक त वीर बदल गई है। अब इसे दमागदार लोग और कं यूटर के जादूगर का देश भी कहा जाता है।“68 उसी साल छपी एक दूसरी कताब म कोलंिबया यूनीव सटी के अथशा ी जेफरी जा स ने ”गरीबी क ि थित से भारत के ऐितहािसक पलायन“ को रे खां कत कया। उ ह ने इस बात का भी िज कया क कै से अंतरा ीय आ थक व था म मह व हािसल करने के बाद भारत और चीन इ सव सदी क ”वैि क राजनीित और समाज को पुनप रभािषत“ करगे।69 भारत-चीन क इस जोड़ी क चचा अ सर क जाने लगी थी और इस बात को वीकार कया जा रहा था क चीन इस या का ”अि म द ता“ है।70 हालां क कु छ रणनीितक ा याकार ने इस बात क चचा ज र क क भारत भले ही ”एिशया का नया शेर“ है ले कन समय के साथ यह सबसे बड़ा नायक बनकर उभर सकता है। भारत क लोकतांि क परं परा और इसक युवा आबादी इस बात का संकेत दे रही है क भले ही चीन ”अब से लेकर सन् 2040 तक िवजेता क तरह दखे“ ले कन इस शता दी के अगले उ राध म भारत तेजी से र तार पकड़ेगा। अमे रका, इ लड, ांस और अ य दूसरे दि ण-पूव एिशयाई देश सभी भारत से अ छा संबंध बनाने क कोिशश कर रहे थे। जैसा क ”सभी देश भारत क नजदीक हािसल करने क होड़ म लगे ए ह, भारत अपने आपको नव-कौ ट य या खुद ही सव प र भूिमका म पा सकता है।“71 इस संबंध म भिव यवािणयां ब त तेजी से और ब त बड़ी सं या म क जा रही ह क भारतीय लोग अमे रक और यूरोपीय लोग क नौक रयां खा जाएंगे या फर ये क भारत और चीन नई शता दी क महाशि बन जाएंग।े चाहे ये भिव यवािणयां भय या बदहवासी या फर आ य और शंसा के भाव से क जा रही ह , ये बात रे खां कत करने लायक है क कम से कम इस तरह क भिव यवाणी क तो जा रही है! य क आज़ाद भारत के इितहास म अिधकांश समय भारत अपने बारे म कु छ अलग ही बात सुनता आ रहा है। हरे क सां दाियक दंग के बाद ये कहा जा रहा था क भारत कई टु कड़ म बंट जाएगा। हरे क बार मानसून के ठने के बाद ये सुनने म आता था क भारत म भुखमरी और अकाल का साया पड़ जाएगा। और हरे क बार जब कसी बड़े नेता क मृ यु या ह या होती थी तो ये कहा जाता था क भारत ज द ही लोकतं को यागकर तानाशाही के चंगुल म फं स जाएगा। हालां क पहले क इस तरह क भिव यवािणयां कई तरह के छु पे ए इराद से े रत रहती थ । उनम से कु छेक भिव यवािणय म वािजब चंता होती थी तो कु छेक दया या अपमान करने के इराद से क जाती थी। उन भिव यवािणय से पढ़े-िलखे भारतीय म गु सा और लाचारगी का भाव पनपता था। हालां क हाल म क गई सकारा मक भिव यवािणय ने भारतीय म आ म- शंसा के भाव को उफान पर ला दया है। भारतीय अखबार और पि काएं अब लोबल चै स (िव िवजेता) और आॅन वे टु नंबर वन (नंबर एक बनने क दशा म अ सर) जैसी सु खयां लगाने लगी ह। द ली के एक तंभकार भारत के नंबर एक बनने के ित इतने आ त थे क उ ह ने इस बात पर चंता जािहर कर दी क भारत अपने पूववत महाशि य ारा क गई गलितय को दोहरा सकता है। उ ह ने भारतीय ापा रक कं पिनय से आ ह कया क िजस तरह पि मी जगत अपने बुलंदी के दन म उपिनवेश का शोषण करता था उस तरह वे न कर बि क, ”वे दूसरे देश के साथ एक दो ताना और ेमपूण संबंध िवकिसत करने क कोिशश कर।“ उनका कहना था क ”मह वपूण बात ये है क भारत को कल क दुिनया म एक सा ा यवादी ू र देश क तरह नह दखना चािहए।“ इस बात को पहले ही मान िलया गया था क भारत वाकई ही एक सा ा यवादी देश बनने क दशा म अ सर है।72 हालां क भारत के पतन के बारे म क गई पुरानी भिव यवािणयां वाकई ही बढ़ाचढ़ाकर क गई थी। य क हमारे पूवज ारा बनाया गया संिवधान एक जनतांि क रा -रा य म सां कृ ितक िविवधता को बढ़ावा देने और उसे सुिनि त करने क भरपूर वकालत करता है। हालां क ये भी सच है क भारत के िव शि के प म त काल उदय होने क भिव यवाणी भी समय से पहले क भिव यवाणी है। नई अथ व था क चकाच ध भरी कामयाबी के बावजूद देश का एक बड़ा िह सा अभी भी गरीबी और वंचना क जद म कराह रहा है। िसफ एक उ े यपरक राजक य ह त ेप ही इस असंतुलन को सही कर सकता है और जैसा क मौजूदा शासन का हाल है वह इतना और रणशील है क एक उ े य के साथ काम करने म असमथ है। इसिलए पहले क भिव यवािणयां भी इस मायने म गलत थ क भारत का पतन हो जाएगा और अभी क जा रही भिव यवािणयां भी अितरं िजत लगती ह क भारत ज द ही िव क महाशि बन जाएगा। 13 मनोरं जन हम ये देखना होगा क हमारी फ म रा ीय जीवन के तानेबाने से जुड़ी ई ह ... और वे भारत क वा तिवकता को सही तरीके से गढ़े और िचि त कर। वी. शांताराम, फ म िनदशक, 1940 कम से कम भारतीय संगीत म कोई पा क तान नह है। डी.पी. मुखज , समाजशा ी, 1945 I इस पु तक के िपछले अ याय म आजाद भारत के नाग रक के प र म और उनके संघष को खंगालने क कोिशश क गई है। ले कन उस दौरान उ ह ने कस तरह से अपना मनोरं जन कया, ये जानना भी ज री है। जब भी वे अपने काम से फा रग होते, संघष म नह उलझे रहते, या फर पा रवा रक उलझन से कु छ देर को मु होते थे तो वे अपना समय कै से िबताते थे? इन सवाल का एक ही संि जवाब है - उनम से यादातर लोग िसनेमा देखकर अपना समय िबताते थे। भारतीय के िलए फ चर फ म समय िबताने का सबसे लोकि य साधन थ और अभी भी ह, जो जाित, वग, े , धम, लंग और भाषायी इन तमाम समािजक संघष और सीमा से परे ह िजनक गहन चचा इस कताब म क गई है। सन् 1895 म सबसे पहले यूिमरे दस ने दुिनया क पहली फ म का िनमाण पे रस म कया था। उसके बाद कु छ साहसी भारतीय फोटो ाफर (फोटो ाफर या छायाकार ) ने पूना रे सेज 98 और ेन अराइ वंग एट बाॅ बे टेशन नाम क फ म बनाई और द शत क । ले कन भारत म पहली फ चर फ म को बनाने का ेय दादासाहेब फा के को जाता है, िज ह ने सन् 1913 म पहली फ म बनाई। वे पेशे से एक मु क थे जो पो टर और कै लडर छापने का काम करते थे। फा के , ईसा मसीह के जीवन पर बनी फ म से ब त भािवत थे और उ ह ने पुराण म व णत राजा ह र ं के जीवन पर फ म बनाई। वह एक मूक फ म थी। उसके अठारह साल बाद पहली बोलती ई फ म बनाई गई िजसका नाम आलम आरा था। इसके िनदशक अदिशर ईरानी थे। बीस और तीस के दशक म भारतीय फ म के सामने अमे रका और यूरोप म बनी फ म एक बड़ी चुनौती थ । ले कन दूसरे िव यु के खा मे के बाद भारत म बनने वाली फ म क सं या म नाटक य बढ़ोतरी दज क गई। सन् 1945 म भारत म 99 फ चर फ म बनाई ग जब क उसके दो साल बाद, यानी आजादी िमलने के साल इसक सं या 250 तक प च ं गई। इनम से दो ितहाई फ म के िनमाता पहली बार इस धंधे म पैसा लगा रहे थे, यानी वे वचर कै िपटिल ट थे।1 (यानी ये लोग इस धंधे के भावी फायद को लेकर अपनी पूंजी लगा रहे थे, य क इस उ ोग म िव ीय सहारे के िलए कोई और बंध न था।) शु आती दौर क कु छ फ म भि या ेम- संग पर बनाई ग जब क अ य कई फ म उस समय चल रहे सामािजक-राजनीितक आंदोलन से े रत थ । तीस के दशक म बनी फ म अछू त क या एक ा ण पु ष और अछू त क या के ेम पर आधा रत थी। दोन िव यु के बीच के दौर म बनने वाली फ म देशभि क भावना से ओत ोत थ । उनके संवाद और गीत म देश के पुन नमाण के िलए आ वान का भाव िपरोया गया था। उन फ म के िनदशक और अिभनेता रा ीय आंदोलन से भािवत थे ले कन रा ीय आंदोलन पर इन फ म का कोई असर नह था। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है क फ म अछू त क या के िनमाता महा मा गांधी को अपनी फ म देखने के िलए राजी नह कर पाए, िज ह ने जंदगी भर छू आछू त के िवरोध म लड़ाई लड़ी थी (गांधीजी ने अपने पूरे जीवन म िसफ एक ही फ म देखी थी, बि क वो भी उ ह ने पूरी नह देखी। उस फ म का नाम रामरा य था)।2 उसी तरह जवाहरलाल नेह , व लभभाई पटेल या दूसरे शु आती नेता का भी ऐसा कोई रकाॅड उपल ध नह है क वे कभी फ म देखने गए ह । जहां कु छ रा वादी नेता ने फ म को महज नजरअंदाज भर कया, वह कई दूसरे नेता ने तो उसक बढ़-चढ़कर आलोचना भी क । भारतीय वतं ता आंदोलन म हमेशा से एक शु तावादी झान रहा था, िजसने लोकि य फ म के रं ग-िबरं गे प रधान , ेम कहािनय और नाच-गाने को वीकार करने म िहच कचाहट दखाई थी। आजादी िमलने के बाद इनम से कु छ शु तावा दय ने सरकार म ऊंचे ओहदे संभाले और उ ह ने फ म उ ोग क आलोचना क । िसतंबर 1950 म राज थान के मु यमं ी ने फ म के ”दु भाव“ क आलोचना क और गव से कहा क उ ह ने अपने जीवन म िसफ एक ही फ म देखी है। तीन साल बाद म ास के मु यमं ी ने िशकायत थी क से स और ह या पर क त फ म भारत के युवा को कर रही है। उ ह ने फ म िनमाता से ” फ म से से स अपील कम करने“ और ”धा मक िवषय पर रं गीन फ म बनाने“ क अपील क । उ ह ने कहा क ”अगर हमारे युवा हर घड़ी इसी िवषय (से स) पर सोचते रहे तो हम दूसरे े म कै से तर कर पाएंगे?“ उ ह ने खासतौर पर ”कम पैसा कमाने वाले लोग से अपील क क वे िसनेमा न देख। उ ह ने कहा क वे ऐसा इसिलए नह कह रहे क वे इस कारोबार को नापसंद करते ह, बि क इसिलए क गरीब लोग अपने पैसे का दूसरे काय म सदुपयोग कर सकते ह। अमीर लोग िसनेमा देखने जा सकते ह और अपने पैसे क बबादी को बदा त कर सकते ह!“3 सचाई तो ये थी क इस तरह क भावनाएं िसफ राजनीितक वग तक सीिमत नह थी। दसंबर 1952 म कलक ा िव िव ालय के संिडके ट ारा ग ठत एक सिमित ने पाया क परी ा म अनु ीण होने वाले छा क सं या म बढ़ोतरी क मु य वजह छा का िसनेमा देखने म व यादा िबताना था।4 दो साल बाद धानमं ी को एक ापन भेजा गया, िजसम कहा गया क फ म क वजह से ”देश का नैितक वा य“ खतरे म पड़ गया है। उ ह ”अपराध और सामािजक अ व था फै लाने का मुख कारण माना गया“।5 उस मांगप पर 13,000 गृहिणय ने द तखत कए िजनक बात को संसद तक लीलावती मुंशी ने प च ं ाया जो खुद एक यात राजनेता के .एम. मुंशी क प ी थ । नवंबर 1954 म रा यसभा म बोलते ए ीमती मुंशी ने तक दया क ”िसनेमा म वो ताकत है क वो या तो कसी पीढ़ी और देश को सही दशा दे सकती है या उसे बबाद कर सकती है।“ उ ह ने िसनेमा के दु प रणाम पर आशंका जताते ए कहा क फ म म अपराध और से स को िजस तरीके से िचि त कया जा रहा है वह युवा भारतीय को इस बात के िलए ो सािहत कर रहा है क वे वा तिवक जीवन म भी उसे उसी तरह दोहराएं। वह फ म से खासतौर पर ”इस बात के िलए चंितत थी क उनम लड़ कय के अंग- दशन को गैर-ज री ढंग से दखाया जाता है ता क भीड़ को उ ेिजत कया जा सके ।“ उनक बात का जवाब अपने जमाने के महान अिभनेता पृ वीराज कपूर ने दया िज ह ने कहा क एक वतं समाज म कला को दबाया नह जा सकता। उ ह ने कहा क एक कलाकार के दृि कोण से ”धूप और छाया साथ-साथ चलती है“।6 इन आपि य को दूर करने के िलए एक ससर बोड का गठन कया गया, जो हर फ म को माणप देने से पहले देखता था। िजन दृ य म यौन-उ ेजना पैदा करने क आशंकाएं होती थ , उसे काट दया जाता था जब क हंसा से भरपूर फ म को ”िसफ वय क के िलए“ का माणप दया जाता था। इसके बावजूद आजादी के बाद काफ तेजी से फ म उ ोग का िवकास आ। सन् 1961 तक ितवष करीब 300 फ म बनाई जाने लग और उसे देशभर के 4,500 िसनेमाघर म दखाया जाने लगा। सन् 1990 तक िसनेमाघर क सं या करीब दोगुनी हो गई थी और तीन गुना यादा फ म बनाई जाने लगी थ । पचास के दशक म बंबई शहर भारतीय फ म उ ोग क वजह से जाना जाने लगा था। इनम सबसे मश र फ म हंदी क थ , जो पूरे देश म देखी जाती थ , ले कन दूसरी भाषा क फ म भी काफ तेजी से बन रही थ । िमसाल के तौर पर, सन् 1992 म हंदी म 189 फ म बनाई गइं जब क तिमल म 180, तेलुगु म 153, क ड़ म 92, मलयालम म 90, बंगाली म 42 और मराठी म 25 फ म का िनमाण आ।7 सन् 1980 तक भारत ने सबसे यादा फ म बनाने के मामले म अमे रका को पीछे छोड़ दया। अब यहां फ म देखने जाना मनोरं जन का अब तक का सबसे लोकि य साधन बन चुका था। सन् 1997 म यानी आजादी के पचास साल बाद एक आंकलन के मुतािबक भारत म ित दन फ म देखने वाले लोग क सं या 1 करोड़ 20 लाख आंक गई थी, जो संयु रा संघ के कई सद य देश क आबादी से भी यादा थी! फ म उ ोग के िवकास का भारत के शहरी प रदृ य पर साफतौर पर असर पड़ा है। छोटे-छोटे शहर म भी बड़ी सं या म िसनेमा हाॅल खुल गए ह, जब क बड़े शहर के भूगोल पर वे जगह-जगह च पां दखते ह। उससे भी यादा रोचक ह फ मी पो टर, जो कई आकार और रं ग म पाए जाते ह। कु छ तो इतने छोटे होते ह क उसे सड़क के कनारे कसी दुकान पर आसानी से िचपकाया जा सकता है, तो कई दूसरे इतने बड़े होते ह क उ ह सड़क कनारे कसी िवशाल बोड पर लगाना पड़ता है। एक बड़ी बजट क फ म के िलए करीब 70,000 पो टर बनाए जाते ह, िजसे जहां भी खाली जगह िमलती है िचपका दया जाता है। ये पो टर फ म के द शत हो जाने और उसके इितहास बन जाने के बाद भी उसक गौरवगाथा का बखान करते रहते ह।8 II ”एक औसत हंदी फ म क साम ी तयशुदा ही होती है। उसम तड़क-भड़क होती है (जो पूरब के लोग को पसंद है), बोलचाल क भाषा म छह-सात गीत होते ह, एकल या समूह म नाच-गान होता है जो िजतना िवरोधाभासी उ ेजना िलए हो उतना ही बेहतर माना जाता है। इन दृ य म अ छी लड़ कयां, बुरी लड़ कयां, अ छे लड़के , बुरे लड़के , रोमांस (ले कन आमतौर पर िबना चुंबन दृ य के ) आंस,ू हा य, लड़ाई, ित पधा, नाटक यता, ऐसे पा िजनका अि त व सामािजक शू य म रहता है, ऐसे मकान जो टू िडयो से बाहर पाए ही नह जाते और कु लू-मनाली, ऊटी, क मीर, लंदन, पे रस, हांगकांग और टो कयो के भ लोके शन होते ह... उदाहरण के िलए कसी भी दो हंदी फ म को उठा लीिजए... आपको ऊपर व णत चीज म से कम से कम दो तो िमल ही जाएंगी।“9 उपयु कथन भारत के मश र फ म िनमाता स यजीत रे का है। वैसे रे क अपनी फ म म कोई नृ य का दृ य नह होता था। उनम गीत भी कम होते थे। वे अपने दशक को अपने करदार के घर तक ले जाते थे। वे दखाते थे क उनके पा कै से पहनतेओढ़ते ह और कस तरह से खाते-पीते ह। उनक फ म म जो च र काम करते थे वे वा तिवक जंदगी क सचाइय को बारीक से दशाते ह। फर भी जहां एक तरफ स यजीत रे क फ म का अपना थान है (बेशक, काफ ऊंचा थान है) वह दूसरी तरफ पाॅपुलर िसनेमा का भी अपना थान है। रे इन फ म म दखाए जा रहे समाज को ”कृ ि म और अि त विवहीन समाज“ और एक िब कु ल ही ”नकली समाज“ के तौर पर खा रज कर सकते ह ले कन देखा जाए तो इ ह फ म म िचि त अवा तिवक समाज क वजह से इन फ म ने जनमानस को आक षत भी कया। और िजन लोग ने इस तरह क सबसे यादा लोकि य फ म बना वे इस बारे म अ छी तरह जानते थे। स र के दशक के एक कामयाब फ म िनदशक मनमोहन देसाई ने अपनी फ म के बारे म कहा था, ”म चाहता ं क लोग मेरी फ म को देखते व अपनी तकलीफ भूल जाएं। म उ ह एक ऐसे व लोक म ले जाना चाहता ं जहां कोई गरीबी नह है, कोई िभखारी नह है, जहां क मत हमेशा लोग पर मेहरबान रहती है और ई र हमेशा अपने भ क मदद के िलए खड़ा रहता है।“10 आजाद भारत म कसान और मजदूर कु छ उ ह वजह से िसनेमा देखने जाते थे िजस वजह से उ ीसव सदी के इं लड का नविशि त कामकाजी वग अमीर और मश र लोग के बारे म कहािनयां पढ़ा करता था। जैसा क जाॅज िग संग के उप यास का एक करदार ट पणी करता है क ”कामकाजी पु ष और मिहला को ऐसी कोई भी पठनीय साम ी अपनी तरफ आक षत नह कर सकती जो उनक रोजमरा के जंदगी क तरह ही हो। वे और खासकर मिहलाएं इस दुिनया के सबसे बड़े आदशवादी जीव ह... कामकाजी वग को ऐसी कसी चीज म िच नह है जो उनके दैिनक जीवन को ही दशाते ह ।“11 िग संग ने िलखा क िसफ हा य और नाटक यता ही ि टश कामकाजी वग को पसंद आता था। ऐसा ही कु छ मामला भारत म भी है जहां हा य और नाटक यता का उपयु तरीके से वदेशीकरण कर दया गया है। हालां क कु छ समसामियक िवषय ज र भारतीय संदभ से बाहर अटपटे लगते ह जैसे बेटे का अपनी मां के ित अतीव समपण, सास का अपनी ब से तनाव त संबंध और जाित-प रवार के दायर से बाहर जाकर अपने जीवनसाथी को चुनने म आने वाली दु ा रयां या उनका गौरवगान आ द। फर भारतीय फ म म एक ”खलनायक“ या ”खलनाियका“ क ीय भूिमका ज र अदा करता है जो कसी हाॅलीवुड क फ म से अलग है। भारतीय फ म म एक खलनायक या खलनाियका ज र होती है, िजसके बरअ स नायक या नाियका इतने पिव और च र वान लगते ह क उसके बारे म उस हद तक कोई सोच भी नह सकता।12 एक मश र फ म िनदशक ने अपनी तुित क ” कसान के कसान“ के प म ा या क ।13 वाभािवक प से ये कसान ऐसे लोके शन पर होते थे िजसके बारे म कोई कसान क पना भी नह कर सकता। कभी-कभी इन फ म म पौरािणक अतीत को दशाया जाता था, जहां इं सान घोड़े पर उड़कर देवलोक प च ं जाता था। कई दूसरी फ म म धरती क ऐसी जगह के बारे म दखाया जाता था जहां इं सान प च ं ही नह सकता। अतीत म और अब भी भारतीय फ म का फ मांकन िवदेश के भ थान पर कया जाता रहा है। उनक शू टंग ांसीसी रिवएरा, ि व जरलड म आ स क सुंदरवा दय और दि ण अ का के खूबसूरत समु तट पर क जाती है। फ म के करदार ऐसे कपड़े पहनते ह जो भारत म नह पहने जाते और वे ऐसी कार पर चढ़ते ह, जो भारत म कह नह दखती। कु ल िमलाकर, ”इससे एक ऐसे अितवादी क पनालोक का सृजन होता था, जहां इि छत व तुएं नीदरल स के ूिलप फू ल के रं ग-िबरं गे खेत से लेकर आकषक टेलीफोन तक हो सकती ह और िजससे दशक दूसरी दुिनया म उपल ध जीवनशैली क जूठन चाटता तीत होता है।“14 ले कन जहां भारतीय फ म िघसीिपटी िवषयव तु से अलग कु छ मौिलक दखती ह वो है इनका संगीत। पारं प रक भारतीय नाटक म भी कसी न कसी तरह के गीत ज र होते थे। इस तरीके को भारतीय फ म म भी अपनाया गया, िजसम हरे क म करीब आधे दजन गाने ज र होते ह। ये गाने पा व गायक ारा गवाए जाते ह और पद पर नायक या नाियका महज उसके बोल के साथ अपने ह ठ िहलाते ह। यह एक ऐितहािसक संयोग था या यूं कह क ऐसा संयोग था, िजसे िसफ इितहास ने ही संभव बनाया क ये ेम और िवरह के गाने अपने जमाने के कु छ मश र किवय और शायर ारा िलखे गए। आजादी के व और शायद आजादी से सौ बरस पहले भी किवता क मु य भाषा उदू थी। बंटवारे से पहले और बाद भी ब त सारे मुि लम और हंद ू लेखक ने बंबई फ म उ ोग म अपना ठौर पाया। जैसा क उनके नाम से ही प है - सु तानपुरी, जयपुरी, लुिधयानवी, आजमी, बदांयुनी, भोपाली - ये नाम उ र भारत के शहर के नाम पर थे जहां पर समय के साथ एक कौमी जुबान के तौर पर उदू का प र कृ त प से िवकास आ था। इसे हंद ू और मुसलमान दोन ही बोलते थे। फ मी गान के इतने लोकि य होने क एक ज री वजह उनके बोल भी थे। वे बड़े रे शमी अ फाज म िलखे गए थे, उनम श द क बाजीगरी थी, िजनके कई-कई मतलब िनकलते थे और वे ऐितहािसकता और राजनीितक अथ से ओत ोत थे। उन गीत म ऐसा संगीत उड़ेला गया था जो उनसे कम आकषक कतई नह था। उन गीत क धुन शा ीय और लोकसंगीत से ली गई थ ले कन उनका तुितकरण ब त हद तक और योगा मक तरीके से पि मी संगीतकार के काम से भािवत था। िसतार और तबले क संगत बड़े सामंज यपूण तरीके से वायिलन और से सोफोन के साथ क जाती थी। इस िवषय पर काम करने वाले एक अ याथ ने िलखा क ” यूजन संगीत के लोकि य होने से ब त पहले ही बंबई के फ म टू िडयो म ित दन इनका दशन कया जाता था।“ यह गांगेय मैदानी इलाक के मधुर लोकसंगीत से लेकर पुतगाली फे डो, िड सीलड ट प और इ लंगटने क डू डल का एक गजब का िम ण था... िजसने संपूण प से हंद ु तानी शा ीय राग को पुनप रभािषत करके रख दया।15 ले कन परं परावा दय ने इस पर ज र अपनी नाक-भौ िसकोड़ी। उ ह ने फ मी गीत को भारतीय शा ीय गीत और लोकसंगीत के ” तरहीन“ और यहां तक क ”िवकृ त“ प के तौर पर प रभािषत कया। ले कन जैसा क अशरफ अजीज ने कहा है क न तो यह संगीत शा ीय ही था और न ही लोकसंगीत ही। बि क यह तो संगीत का एक नया इलाका था जो िसनेमाई कथानक के िहसाब से ज री था और उसी के अनु प इसे ढाला गया था। ”यह एक नई या थी जो संगीत के एक नए प म सामने आई 16 थी।“ कहा जा सकता है क यह संगीत का एक ऐसा प था िजसे इसके पूववत प क तुलना म ापक समाज ने गहन प से पसंद कया। जैसा क एक महान शा ीय गायक ने िशकायत भी क क ” फ म के गीत कलक ा क उ वग य मिहला और पेशावर के तांगेवाल क जुबान पर एकसाथ चढ़ गए थे।“17 फ म इितहासकार नसरीन मु ी कबीर ने िलखा है, ”भारतीय दशक फ म म करदार के जमावड़े और अपेि त संवाद के सामने िबछ-से जाते थे।“ य क वे जानते ह और उ मीद भी करते ह क ”इन पुरानी कहािनय “ को अ छे दखने वाले ”िसतार और छह-आठ अ छे गान के बाद फर से जीवन दया जा सकता है।“ ये दशक कथानक म ”दोहराव वीकार कर सकते ह“ ले कन वे ऐसी फ म को ”खा रज कर देते ह िजसके गीत म कोई मौिलकता न हो“।18 III चालीस से अ सी के दशक तक दो क म के भारतीय फ म देखते थे। उनम से एक सभी समूह के युवा पु ष थे तो दूसरी तरफ वे लोग थे जो सप रवार फ म देखने जाते थे। उ र भारत म काम करने वाले एक मानवशा ी ने पाया क ”ब त सारे अिववािहत पु ष फ मी सं कृ ित के गहन उपभो ा ह।“ वे इसिलए इन फ म को पसंद करते थे क फ म देखने से जो भी मनोरं जन उनको हािसल होता था वह उनके िलए पा रवा रक जीवन के तनाव से कु छ समय के िलए मु होने का अ छा बहाना देता था। िसनेमा हाॅल म वे िसगरे ट पी सकते थे (जो घर म व जत था) दो त के साथ हंसीमजाक और म ती कर सकते थे। हालां क युवितयां अके ले कभी-कभार ही फ म देखने जाती थ ले कन वय क पु ष अपनी प ी और माता-िपता को साथ ले जाया करते थे। ये दोन समूह अलग-अलग क म क फ म देखना पसंद करते थे। भारतीय युवा दशक ”देह उघाडू ़ होते अिनयंि त नृ य और मारधाड़ वाली फ म “ को पसंद करते थे जब क पा रवा रक लोग ऐसी फ म देखते थे िजसम जीवन के सुख-दुख का िच ण होता था।19 ले कन फ म का शौक दि ण भारत म और भी बल था। यहां पु ष दशक ने अपने फै न- लब बना रखे थे, जो कसी खास मश र ह ती के ित सम पत आ करता था और उसी क फ म देखता था। मसलन, तिमलनाडु के शहर मदुरई म इस तरह के कम से कम 500 फै न- लब थे। इसके यादातर सद य बीस साल के या उससे ऊपर के थे। उनम दज , स जी वाले, र शे वाले और छा सब शािमल थे। लब क गितिविधय म अपने पसंदीदा फ मी िसतारे का चार करना, उसक फ म का पो टर िचपकाना, उसक फ म का टकट खरीदना और सावजिनक और िनजी जगह पर उनक तारीफ म गीत या किवताएं गाना शािमल था। कभी-कभी लब क गितिविधय म अपने अिभनेता के नाम पर र दान िशिवर का आयोजन या आपदा के समय चंदा उगाहने जैसे जनसेवा के काय भी जुड़ जाते थे।20 िपछले अ याय म हम तिमलनाडु के एम.जी. रामचं न और आं देश के एन.टी. रामाराव का प रचय हािसल कर चुके ह जो अपने अिभनय क ताकत क बदौलत अपने-अपने रा य के मु यमं ी बन गए। ऐसी ही लोकि यता क ड़ फ म टार राजकु मार क भी थी हालां क उ ह ने अपनी इस लोकि यता का राजनीितक फायदा नह उठाया। भारत के इस िह से म फ म भाषायी उपरा वाद को मजबूती से रखने का साधन थ , ऐसे म फ मी िसतार को भी बेपनाह मुह बत िमली। दि ण के लोग को हंदी के वच व से अपनी भाषा पर खतरा महसूस हो रहा था। अपनी भाषा को बचाने क कोिशश म आमलोग ने अपने फ मी िसतार म उ मीद क एक करण देखी थी, जो उ ह क जुबान म उ ह क तरह बात करता था। इन फ म म इन िसतार ने मानवीय जीवन के जीवन-मृ यु, ेम और धोखा, अमीरी और गरीबी जैसे िवषय का बखूबी िच ण कया था। उन फ म के संवाद के मुहावरे और लोकोि यां आमलोग के दैिनक जीवन से िलए गए थे। कु ल िमलाकर वा तिवक प से और पद पर भी एनटीआर, एमजीआर, राजकु मार और उनके शंसक एक ही भाषा बोलते थे। दूसरी तरफ हंदी प ी म फ म के ित दीवानगी आमलोग के सामािजक पहचान से जुड़ी ई नह थी ( य क उनक भाषा कसी अ य भाषा क तुलना म यादा लोग ारा बोली जाती थी और इस पर खतरे जैसी कोई बात नह थी)। चूं क उनका भाव े ब त बड़ा था इसीिलए हंदी फ म के िसतारे अगर ब त गहरे नह तो िवराट आकषण के वामी ज र थे। िन य ही सवकािलक प से सबसे लोकि य हंदी अिभनेता अिमताभ ब न ही ह (म यहां िसफ भारत क ही बात नह कर रहा, बि क पूरी दूिनया क बात कर रहा ।ं बीबीसी ारा सन् 2001 म कराए गए एक आॅनलाइन सव ण म अिमताभ को दुिनया का सबसे लोकि य अिभनेता चुना गया था)। अिमताभ का ज म सन् 1942 म इलाहाबाद म एक िस हंदी किव के घर आ था। कु छ समय तक काॅरपोरे ट म काम करने के बाद अिमताभ ने फ म म वेश कया। वह ब त लंबे कद के थे और थोड़े सांवले भी थे। ये दोन बात उनके पूववत फ मी िसतार क तुलना म िवपरीत क थ । हालां क उ ह ने ब त ज द ही अपने भावशाली हावभाव और अपनी लाजवाब आवाज के दम पर इन बाधा को पार कर िलया। स र के दशक म ब न का िसतारा तेजी से चढ़ा जब देश राजनीितक प से भयंकर िनराशा के वातावरण म डू बा आ था। उस वातावरण म देश क व था को न सलवादी जैसे धुर-वामपंिथय और िबहार आंदोलन के नेता जय काश नारायण जैसे लोग से चुनौती िमल रही थी। फ मी पद पर अिमताभ क भूिमका हालात के िहसाब से िब कु ल उपयु थी। उ ह ने ”एं ी यंग मैन“ क भूिमका िनभाई जो व था से लड़कर उससे जीत हािसल करता है। एक पूंजीवादी सेठ को चुनौती देता आ एक आंदोलनकारी मजदूर, अपने अिधका रय के िखलाफ सीना ताने खड़ा एक ईमानदार पुिलस अिधकारी और यहां तक क अिमताभ ने ऐसे मा फया सरगना क भी भूिमका अदा क , जो दल से अ छा इं सान होता था।21 सन् 1982 म फ मी सेट पर ई एक दुघटना म अिमताभ ब न को अ पताल म भत होना पड़ा। उनके वा य लाभ के िलए लाख -करोड़ हाथ दुआ म उठ खड़े ए, जो कबूल भी ई। तीन साल के बाद अपने बचपन के दो त राजीव गांधी के आ ह पर उ ह ने इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बन गए। उस व ेस ने 22 सवाल उछाला था क - इस एं ी यंग मैन को कौन हरा सकता है? ये फ म उ ोग के िलए एक तरह से संयोग ही आ क उसके बाद वे और राजीव गांधी अलग-अलग हो गए। अिमताभ लोकसभा से इ तीफा देकर फ मी पद पर लौट आए। जैसे-जैसे उनक उ बढ़ती गई उनक भूिमका बदलती गई है। वह वाकई एक हरफनमौला अिभनेता ह। उ के छठे दशक म िजस तरह वे एक स त िपता क भूिमका अदा कर सकते ह, उसी तरह ही एक खास पुिलस वाले क भी (जैसा क उ ह ने सन् 2005 म बंटी और बबली म कया था)। नई सह ा दी क शु आत म वे एक बार फर से अपनी सबसे लोकि य भूिमका म उस समय नजर आए जब उ ह ने कौन बनेगा करोड़पित म मेजबान क भूिमका िनभाई। यह पि मी देश म चल रहे काय म वां स टु बी ए िमिलनेयर? का भारतीय सं करण था। यह काय म ब त ही कामयाब रहा य क इसम उदारीकरण के बाद के भारत म लोग को तुरत-फु रत अमीर बनाने के सपने को खूबसूरती के साथ बेचा गया था। ले कन इसके इतने कामयाब होने क एक वजह ये भी थी क इसम अिमताभ जैसी मश र ह ती मेजबान क भूिमका म थी। अिमताभ वाकई जहीन थे, वे उतने ही भ और तेज-तरार थे और खास बात ये क वे गजब के ि भाषी भी थे। यह एक ऐसा गुण था जो उनके िपता के गुण से िब कु ल मेल खाता था, जो एक मश र हंदी किव होने के साथ-साथ अं ेजी के ोफे सर भी थे। अिमताभ के साठव ज म दन पर उनको दए गए एक शुभकामना संदश े म कहा गया क कै से उनके लंबे क रयर ने हंद ु तान क ”पीि़ढय क भावना को भािवत कया“।23 शायद ऐसा भाव पैदा करने वाली एकमा दूसरी शि सयत गाियका लता मंगेशकर ह। लता के िपता दीनानाथ मंगेशकर भी एक मश र गायक, अिभनेता और गीतकार थे। सन् 1942 म जब लता महज 13 साल क थ तो उनके िसर से उनके िपता का साया उठ गया, िजसके बाद उ ह अपने प रवार क िज मेदारी भी उठानी पड़ी। ले कन लता ने अपने संगीत का एक अ छा खासा िह सा अपने िपता से ही सीखा था। अपने प रवार म पांच भाई-बहन म सबसे बड़ी लता ज द ही अपने प रवार के िलए कमाने का ज रया बन ग । शु म उ ह ने मराठी फ म के िलए काम कया, ले कन ज द ही वे यादा लोकि य और आ थक प से यादा आकषक हंदी िसनेमा क तरफ मुड़ ग । एक पा वगाियका के तौर पर लता मंगेशकर का पहला गीत सन् 1947 म रकाॅड कया गया। ले कन दशक के ख म होते-होते वह भारत क सबसे मश र गाियका बन ग । साथ ही वह हंदी फ म क सबसे यादा पसंदीदा गाियका भी बन ग य क कोई भी िनमाता-िनदशक उनक आवाज के िबना अपनी फ म क क पना नह कर सकता था। अपने पांच दशक के लंबे गायन क रयर म लता ने 5000 से यादा गीत गाए ह।24 लता मंगेशकर से पहले यादातर गाियका क आवाज भारी आ करती थी। ले कन लता ने अपने गायन म अ भुत ऊंचाई हािसल क । कु छ लोग को उनक आवाज भले ही खनकदार तीत ई हो ले कन अ य ब त ने उसे कोमल नारी व का उ तम प माना। ब त ज द यह आवाज हंद ु तान क सबसे मश र आवाज बन गई। यह वो, ”आवाज बन गई िजसे सुनकर द ली म सड़क कनारे का दुकानदार अपना कारोबार करता, हाइवे पर लंबी दूरी तक चलने वाले क- ाइवर उसे सुनकर हजार कलोमीटर क दूरी तय कर लेते, ल ाख म सेना का जवान सरहद क रखवाली करता और चमकदमक म जीने वाले सं ांत वग के लोग शानदार होटल म खाना खाते।“25 लता क आवाज ने वग और राजनीित के दायरे को पार कर िलया। रा वादी जवाहरलाल नेह भी लता के शंसक थे य क उ ह ने सन् 1962 म चीनी हमले के व शहीद क याद म एक िस गीत - ऐ मेरे वतन के लोग ... गाया था। ब त बाद क रपंथी हंदव ू ादी नेता बाल ठाकरे ने भी लता क तारीफ म कसीदे काढ़े और कद म छोटी सी दखने वाली लता को मराठी नारी व का एक शानदार उदाहरण करार दया। IV फ म उ ोग क एक बड़ी खािसयत इसका एक लाजवाब वैि क च र है। यहां कसी भी तरह का भेदभाव देखने को नह िमला। पारसी और य दी अिभनेता ने हंद,ू मुि लम और ईसाई अिभनेता के साथ िमलकर काम कया। फ म उ ोग के कु छ महान िनदशक बंगाल और दि ण भारत के थे। सवकािलक कामयाब फ म म शोले (1975) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके िनदशक एक संधी थे जब क इसके गीतकार और एक मुख अिभनेता पंजाबी थे। दूसरे मुख पु ष कलाकार मशः उ र देश, गुजरात और उ र-पि म सीमा ांत से थे। (एक दूसरे कलाकार िज ह अंितम घड़ी म फ म म नह िलया गया वे िस म के थे।) दो मुख ी कलाकार म से एक तिमलनाडु क तो दूसरी म य देश क एक बंगाली मूल क अिभने ी थी। फ म के संगीतकार ि पुरा के रहने वाले एक बंगाली थे।26 ऐसा नह है क िसफ बंबई फ म उ ोग ही सामािजक तौर पर समावेशकारी था। म ास म तिमल िनदशक एस.एस. वासन के फ म टू िडयो म, ”मेकअप िडपाटमट का मुख एक बंगाली था जो बाद म टू िडयो के िलए इतने बड़े कद का हो गया क उसने टू िडयो छोड़ दया। उसके बाद उस काम का िज मा एक मराठीभाषी ने संभाला िजसक मदद के िलए धाड़-वाड़ का एक क ड़, एक तेलुगु, एक म ासी भारतीय ईसाई, एक आं ल-बम मूल का आदमी और आमतौर पर थानीय तिमल भी थे।“ जैसा क वासन के पटकथा लेखक म से एक ने याद करते ए कहा क ”इस रा ीय च र के मेकअप िवभाग के लोग का समूह ढेर सारे सामि य और थानीय प से िन मत लेप क मदद से कसी भी शरीफ आदमी को लाल रं ग म पोतकर एक कु प दै य क श ल दे सकता था!“27 सबसे बड़ी बात ये क फ म उ ोग ने भारत के सबसे बड़े और असुरि त मानिसकता म जी रहे अ पसं यक समुदाय मुसलमान का दल खोलकर वागत कया। फ म उ ोग के कु छ बेहतरीन गीतकार और पटकथा लेखक म मुि लम समुदाय के लोग थे। फ म जगत के कु छ बेहतरीन पु ष गायक भी इसी समुदाय के थे। इसी तरह कु छ शीष िनदशक और उससे भी आगे कु छ चोटी के िसतारे इसी समुदाय से सामने आए। आजादी के कु छ ही साल के बाद बंबई क एक पि का ने अपने पाठक से जब उनके सबसे ि य अिभनेता-अिभने ी के बारे म रायशुमारी ली तो एक मुि लम अिभनेता को सबसे यादा मत िमला जब क दूसरे थान पर एक मुि लम अिभने ी रही।28 मजे क बात ये थी क दोन ने ही परदे के िलए गैर-मुि लम नाम अपनाए थे। यूसुफ खान ने अपना नाम बदलकर हंद ू नाम दलीप कु मार रखा था तो फाितमा रशीद ने अपना नाम बदलकर नरिगस रख िलया (फू ल के नाम पर) जो एक तरह का िनरपे नाम था। जैसे-जैसे मुि लम अिभनेता और अिभने ी फ म उ ोग म थािपत होते गए, उ ह इस तरह के छर् ◌ंनाम रखने क ज रत महसूस नह ई। पचास और साठ के दशक क एक महान अिभने ी वहीदा रहमान थी। उसके ब त समय बाद न बे के दशक म हंदी फ म के चोटी के तीन अिभनेता मुसलमान ही थे िजनका एक ही उपनाम - खान था। उप यासकार मुकुल के शवन द ली म िबताए अपने बचपन के बारे म िलखते ह क कू ल और घर म वे कभी भी कसी मुसलमान से नह िमले। वे आगे िलखते ह क ”िसफ एक ही जगह ऐसी थी जहां आप मुसमलमान से िमलने के बारे म िनि त हो सकते थे और वो जगह थी फ म।“29 खास बात यह थी क फ म क िवषयव तु भी उनके योगदान और उपि थित को द शत करती थी। य क बंबई फ म उ ोग म इतने सारे मुि लम पटकथा लेखक और गीतकार थे क वहां क हंदी खािलस हंद ु तानी जुबान थी और वह आजाद भारत म सरकार ारा ो सािहत क जा रही शु , सं कृ तिन और औपचा रक हंदी से िब कु ल अलग थी। वह बोलचाल क हंद ु तानी भाषा थी िजसे ये लेखक बोलते थे और िजसका िवकास हंदी-उदू श द के मेल से आ था जो पूरे देश क दय थली म बोली जाती थी।30 दूसरी तरफ, यादातर फ म म मुि लम च र अव य होते थे इसिलए उनका नकारा मक िच ण नह होता था या ”शायद ही कभी होता था। वे ईमानदार दो त, देशभ िसपाही, अ छे पुिलस वाले, अि़डयल पठान और दो ताना ख रखने वाले चाचा-ताऊ क भूिमका म होते थे।“31 इसके बावजूद एक िहच कचाहट बनी रही और वो थी हंद ू और मुि लम च र के बीच ेम संबंध के फ मांकन क । इस िहच कचाहट को आंिशक प से सन् 1995 म बनी फ म बाॅ बे म तोड़ा गया िजसम एक हंद ू लड़के का एक मुि लम लड़क के साथ ेम दखाया गया। हालां क इसका उ टा उतना सच नह था। कसी भी फ म म ये दखाने क िह मत नह क गई क एक मुि लम पु ष एक हंद ू मिहला के साथ िववाह कर रहा है। भारतीय फ म जगत म मुसलमान ने एक स मानजनक थान हािसल कया है। मलयाली फ म के मुख अिभनेता ममूटी इस पर ट पणी करते ए कहते ह क ”म इस पेशे म करीब ढाई दशक से ं और मुझे एक भी ऐसा वाके या याद नह है क मेरी मुि लम पहचान कभी मेरे पेशे म आड़े आई हो।“32 ले कन या आजाद भारत म हम जीवन के दूसरे े म भी िनि त प से ऐसा ही कह सकते ह? V एक आलोचक ने िलखा है क भारतीय क जंदगी िजस ”तनाव, ष े और गरीबी“ से त थी, उसम लोकि य फ म ने उ ह उससे कु छ पल के िलए पलायन करने का ”एक खूबसूरत बहाना दे दया िजसक देश को ज रत भी थी“।33 हालां क यादातर फ म अपने दशक को एक व लोक म ही ले जाती थी ले कन उनम थोड़ी-ब त वा तिवकता भी ज र होती थी। आजादी के बाद के शु आती साल म खासकर तीन फ म िनमाता ने इस लोकलुभावन वृित से अलग होकर फ म का िनमाण कया। इनम से एक थे िबमल राय िजनक फ म दो बीघा जमीन (1953) म बड़ी संवेदनशीलता के साथ ामीण इलाके म रहने वाले गरीब क तकलीफ का िच ण कया गया। दूसरे फ मकार थे महबूब खान िजनक फ म मदर इं िडया (1957) म एक नए रा के ज म क कहानी को एक ओजपूण तेजि वनी मां के च र के साथ बुना गया। तीसरे उ लेखनीय फ मकार थे गु द िजनक फ म म जीवन के अंधेरे प क खोज करने क कोिशश क गई, खासकर ऐसे प क िजसका अनुभव एक कलाकार इस ू र भौितकवादी समाज म करता है। हालां क भारत म ”वैकि पक धारा“ के ितिनिध फ मकार महान बंगाली फ म िनदशक स यजीत रे (1921-92) ही थे। उनके िपता और दादा भी लेखक थे और स यजीत रे खुद भी महान ितभा के वामी थे। वह बंगाली के िस लघुकथा लेखक भी थे और उ ह भारतीय और पि मी शा ीय संगीत का भी ान था। ब त साल तक उ ह ने एक कलाकार और िडजाइनर के प म जीवनयापन कया था। सन् 1955 म बनी उनक पहली फ म पाथेर पांचाली तीन फ म क शं◌ृखला म पहली थी जो एक छोटे से लड़के अपू के जीवन पर आधा रत थी। इसम उसके बचपन से लेकर उसके वय क होने तक का िच ण कया गया था। इस या म काफ संवेदनशीलता और कु शलता के साथ बंगाल के आंत रक इलाक म हो रहे सामािजक प रवतन का िच ण कया गया है। अगले तीन दशक तक लगभग हरे क साल वह एक-एक फ म बनाते रहे िजसम एक अपवाद को छोड़कर सभी क पृ भूिम बंगाल ही थी। उनक ब त सारी फ म रव नाथ टैगोर के उप यास पर आधा रत थी िजनक रा वाद के ित अ िच और स दयबोध क प रक पना से रे ब त भािवत थे। सन् 1992 म उ ह लाइफ टाइम अचीवमट के िलए आॅ कर पुर कार से नवाजा गया। उसी साल उ ह भारत का सबसे बड़ा नाग रक स मान भारत र भी दया गया। रे ने आ यजनक प से िविवध िवषय पर फ म बना । सन् 1958 म बनी उनक फ म जलसाघर संगीत क मिहमा पर बनाई गई फ म थी, जब क सन् 1963 म बनी उनक फ म महानगर म उनके अपने ही शहर कलक ा का िच ण कया गया है। सन् 1966 म बनी फ म नायक म उ ह ने एक अिभनेता, उसक कला और उसके दशक वग को सवागीण प से खोजने क कोिशश क है जब क सन् 1970 म बनी उनक फ म अर येर दन राि म शहरी म यमवग क दुिनया से अलग जंगल म रहने वाले आ दवासी फ म के क म ह। उनक अ य फ म बगैर राजनीितक होते ए राजनीितक िवषय पर बनाई गई ह। उनक एक फ म सन् 1905-06 के वीिडश आंदोलन को क म रखकर बनाई गई, तो दूसरी साठ के दशक के अंत म उभरने वाले न सल आंदोलन पर। उ ह ने ब के जीवन पर क त कु छ लाजवाब फ म भी बनाई जो उनके दादाजी क िलखी कहािनय पर आधा रत थी। उ ह ने कु छ जासूसी फ म भी बनाई जो उनके अपने ही उप यास पर आधा रत थी। उनक फ म म मिहलाएं अ सर सश और क ीय भूिमका म होती ह। वे ितभाशाली होती ह, उनम कला िवषय का बोध होता है और सबसे बड़ी बात क वो आ मिनभर होती ह।34 स यजीत रे अपने गृह रा य बंगाल म एक िवराट कद क शि सयत के प म जाने जाते है। उनक चचा अखबार -पि का म होती थी और लोग बस -रे लगाि़डय म भी उनक फ म क चचा कया करते थे। िवदेश म भी उनक िनरं तर चचा होती रहती थी। उनक फ म कान और अ य दूसरे फ म समारोह म भी द शत क जाती थ और उनक फ म क तारीफ अ करा कु रोसावा और उन जैसे दूसरे लोग भी कया करते थे। ये बात अलग थी क भारत के अंदर उनक आलोचना भी ई, जब फ म अिभने ी नरिगस ने संसद म उनक ये कहते ए आलोचना क क वे पि मी देश म तारीफ पाने के िलए भारत क गरीबी का िच ण करते ह। यह एक ह का और खीझ पैदा करने वाला आरोप ज र था और शायद रे क हंदी फ म के बारे म दए गए बयान क ित या म लगाया गया था। रे के मश र समकालीन म दो बंगाली शि सयत का नाम अहम है। वे थे ऋितक घटक (1925-76) और मृणाल सेन। दोन ही बंगाल के क युिन ट आंदोलन से काफ भािवत थे और उनक फ म अ सर तीखे प से राजनीितक होती थी। उन फ म म कसान आंदोलन, देश का बंटवारा और सन् 1943 म आया बंगाल का भयानक अकाल मुख प से िचि त आ है। उसक अगली पीढ़ी के िवल ण और मौिलक फ म िनमाता ए याम बेनेगल (ज म 1934) और अडू र गोपालकृ णन (ज म 1941) िजनक फ म ने जाित था और और भारतीय म यमवग के दखावे और से स िवषय के ित भी ता क भावना म सुधार पर जोर दया।35 इन फ म को कभी-कभी ”कला िसनेमा“ तो कभी ”समानांतर िसनेमा“ भी कहा जाता था। रे , घटक और बंगाल के इन िनदशक ारा बनाई गई फ म म एक बारीक तरीके का इ तेमाल कया जाता था। उनम सामािजक वा तिवकता पर यान क त कया जाता था जो उ ह बंबई क फामूला फ म के पलायनवादी व लोक से अलग कर देती थी। हालां क बाॅ स आॅ फस पर ब त कम कला फ म ही कामयाब हो पा ले कन उ ह समी क से भरपूर सराहना िमली और उ ह ने फ म समारोह म कई पुर कार जीते। उन फ म का जीवन ब त लंबा होता था, वे ब त बाद म भी लोग ारा देखी जाती थी और देखी जाती ह। उ ह अ सर काॅलेज म छा के फ म- लब म देश और िवदेश म दखाया जाता है। VI िसनेमा के अलावा भारतीय ने अपने तकलीफ और तनाव के ण म दूसरे ”सजीव मनोरं जन“ के साधन का भी भरपूर आनंद उठाया। इ ह म से एक नाटक भी है। भारतीय उपमहा ीप म शा ीय सं कृ त नाटक क एक समृ परं परा थी। इसके अलावा हरे क े म भी लोकनाटक का अपना एक प था िजसके संवाद सामा यतः गीत और नृ य के साथ गुंथे होते थे। बंगाल म जा ा, महारा म ना और कनाटक म य गान के प म िस इन ना प को कामयाबी से आधुिनक समय म ढाल िलया गया। उन नाटक के प रधान पारं प रक ही बने रहे ले कन नाटक क िवषयव तु समकालीन बहस से संबंिधत थी। चाहे यह नारी मुि का िवषय हो, जाित था म सुधार का िवषय हो या फर आ थक िवकास और पयावरणीय संतुलन म संघष का िवषय हो - इन सभी िवषय पर नाटक का मंचन कया जाता रहा। भाषायी आधार पर रा य के गठन ने े ीय नाटक को नए तरीके से ो सािहत कया। अब उनके पास एक ”घरे ल“ू दशक वग था या यूं कह क तीन या चार करोड़ ऐसे लोग थे जो उसी भाषा म बोलते थे, िजसम नाटक का मंचन कया जाता था। भाषायी रा य के दायरे म नए समूह और कई नए आंदोलन पनप आए ले कन उनक िनगाह बाहरी दुिनया पर भी टक ई थ । इ ह समूह म से एक समूह का नाम िननासम् था िजसक थापना सन् 1949 म ई थी। इसक थापना उ र कनाटक के एक गांव मे सुपारी उ पादन करने वाले कसान के .वी. सुव ा ने क थी। सुव ा ने मैसूर िव िव ालय म अपनी पढ़ाई क थी जहां वह अपने िश क किव कु वे पू (के .वी. पुट पा) से इसके िलए े रत ए क कृ िष जीवन को कला से जोड़ा जाए। अपने घर हेगो डु लौटने के बाद उ ह ने सबसे पहले एक नाटक मंडली क थापना क । उसके बाद समय के साथ उ ह ने एक अखबार, काशन सं थान, एक फ म- लब, एक ना िव ालय और फर एक रे पेटरी कं पनी (लघु नाटक को द शत करने वाली कं पनी) क थापना भी क । अपनी थापना के पचास साल के बाद िननासम् ने काफ तर क है िजसे अब सुव ा के बेटे के .वी. अ र चला रहे ह जो खुद रा ीय ना िव ालय द ली और ली स िव िव ालय से ातक ह। िननासम् ”सं कृ ित िशिवर “ का आयोजन करता है िजसम कसान और कलाकार दुिनयाभर के िवशेष से बातचीत करते ह। ले कन उनक मु य गितिविध िथएटर ही होती है। िननासम् एक पूण ामा कू ल भी चलाता है िजसम से ब त सारे ातक फर उनके घुमंतू नाटक कं पनी म शािमल हो जाते ह। हरे क साल हेगो डु म होने वाले वा षक सं कृ ित िशिवर म एक सभागार म तीन नाटक का थम-मंचन कया जाता है। उस सभागार का नाम िस क ड़ लेखक और ब मुखी ितभा के धनी िव ान िशवाराम कारं थ के नाम पर रखा गया है। सभी नाटक का मंचन थानीय भाषा म कया जाता है। इसम एक मौिलक क ड़ नाटक होता है, दूसरा कसी भी भारतीय भाषा के नाटक का क ड़ अनुवाद होता है और तीसरा कसी पि मी शा ीय नाटक का अनुवाद होता है। इस तरह से उदाहरण के िलए साल म एक के बाद एक गांव के लोग िगरीश कनाड, मोहन राके श और एंटन चेखव के नाटक का एक साथ आनंद उठा पाते ह। यह आयोजन िसफ हेगो डु तक सीिमत नह रहता। जब नाटक का थम-मंचन हो जाता है तो फर िननासम् रे पेटरी कं पनी उसे रा य के अलग-अलग शहर और गांव म मंचन के िलए ले जाती है।36 औसतन कसी साल म िननासम् क रे पेटरी करीब 150 नाटक का मंचन करती है िजसे करीब 3 लाख लोग देखते ह, िजसम यादातर लोग गांव और छोटे शहर के होते ह। इस तरह ”हम देखते ह क जो कसान दन म सुपारी, धान और ग े क खेती करते ह वे रात को सोफो लीज, शे सपीयर, मोिलयर और इ सन के नाटक का आनंद ले रहे होते ह।“37 दूसरे महान योगवादी िज ह ने कामयाबीपूवक लोकनाटक को शा ीय नाटक के साथ ढाला है वे ह िनदशक हबीब तनवीर। हबीब चालीस के दशक म उ सुधारवादी इं िडयन पीप स िथएटर एसोिसएशन से िनकले थे िज ह ने बाद म लंदन के राॅयल अके डमी आॅफ ामे टक आट म पढ़ाई क । उसके बाद वे अपने गृह देश छ ीसगढ़ लौट आए जहां उ ह ने थानीय गायक और कलाकार के साथ शानदार नाटक क शं◌ृखला तुत क । इन नाटक म गीत और नृ य का योग हा य प म ामीण सं ांत और रा य के ाचार पर कटा करने के िलए कया जाता था। उनक नाटक कं पनी म मु यतः थानीय लोग ही काम करते थे जो थानीय जुबान बोलते थे। ले कन फर भी अपने कौशल से उ ह छ ीसगढ़ के बाहर भी अपने िनदशक के िवचार को फै लाने म कोई द त नह ई।38 सुव ा को एक ” गितशील“ नाटककार कहा जा सकता है जब क तनवीर को एक ”आंदोलनकारी“। दोन म से ही कसी ने भी अपने आपको कसी राजनीितक पाट या आंदोलन के साथ कभी खुलकर नह जोड़ा। दूसरे नाटक समूह खुलकर कसी न कसी राजनैितक िवचारधारा या दल का चार करते थे। उनम जन ना मंडली शािमल है जो आं देश के न सली समूह से ब त नजदीक से जुड़ी ई है। मंडली का सबसे मश र चेहरा है जनकिव गदर जो कभी इं जीिनय रं ग पृ भूिम के छा रहे थे। गदर का ज म एक दिलत प रवार म आ था वह िपछले तीस साल से वामधारा क राजनीित म स य रहे है। सन् 1971 म उ ह ने हैदराबाद के एक र शाचालक पर एक गीत क रचना क । उसके बाद से उ ह ने कई गीत क रचना क है िजसम गरीब क सहनशीलता और उनके शोषक क ू रता के बारे म बताया गया है। इन गीत म पुिलस क यातना के िशकार लोग के बारे म िच ण होता है या फर समृ शाली लोग के जीवन के बरअ स क ठन म करने वाले कसान क तकलीफ का वणन होता है। गदर कहते ह क ”इन गीत म मनु य, उनक तकलीफ और उसक या ा ही जीवन है।“ गदर अ सर भूिमगत रहते ह। पुिलस उ ह पसंद नह करती और अ सर उ ह जेल म डाल देती है। ले कन वे कसान के बीच अित लोकि य ह और उनका ि व दंतकथा के नायक जैसा िवराट है। उनक याित आं देश से बाहर भी है। इसे इस बात से समझा जा सकता है क जब उ ह ने बंगलौर म अपनी तुित दी थी तो उ ह सुनने के िलए करीब 20,000 लोग जमा हो गए थे।39 VII आधुिनक भारत म मनोरं जन का सबसे उ तम प शा ीय संगीत है िजसका दशन और वण मु यतः दो तरीक से कया जाता है। इनम से एक है हंद ु तानी शैली और दूसरी है कनाटक शैली। पारं प रक प से इन शा ीय संगीत का िवकास राजदरबार और मं दर म आ था िजसे महाराजा और नवाब ने य दया था। ि टश राज के दौरान भी इन राजा-महाराजा ने संगीत को अपने दरबार म य देना जारी रखा ले कन फर बाद म िनरपे क म के कला संर क भी सामने आने लगे थे। ये बंबई, म ास और कलक ा म रहने वाले सेठ और पेशेवर लोग थे िज ह ने इसे ो सािहत करना शु कया था।40 भारत के सामािजक इितहास म ापक प से प रलि त होने वाले प रवतन िजस गायक-संगीत के क रयर म झलकते ह िन य ही वो एम.एस. सु बाल मी ह। सु बाल मी का ज म सन् 1916 म मं दर और दरबार से संबंिधत संगीतकार के एक प रवार म आ था। भिव य क संभावना को देखते ए एम.एस. (िजस नाम से उ ह जाना जाता था) को उनक संगीत मां म ास ले आ । सु बाल मी क शानदार आवाज, दंतकथा जैसे उनके स दय से िब कु ल मेल खाती थी। वह ज द ही म ास के संगीत जगत म सबसे मश र नाम बन ग । सन् 1940 म उ ह ने टी. सदािशवन नाम के एक उ मी से िववाह कर िलया िज ह ने उनके क रयर का बड़े कौशल के साथ बंधन कया। चालीस के दशक म ही एम.एस. ने कु छ फ म म भी काम कया िजसम मीरा नाम क फ म मुख है िजसम उ ह ने म यकाल क महान गाियका मीरा क भूिमका अदा क । सु बाल मी ने शा ीय संगीत का गहन िश ण िलया था और उ ह ने इसे काफ मेहनत से अपने समय के गु से सीखा था। ले कन इसके अलावा उ ह ने अपने गायन मंडली के िव तार के िलए भी काफ मेहनत कया। यह उनका भजन गायन ही था िजसक बदौलत उ ह ने महा मा गांधी का यान आक षत कया था। उनके दूसरे और शायद उससे भी बड़े शंसक जवाहरलाल नेह थे जो द ली के लाजा िसनेमा म मीरा के ीिमयर पर उपि थत ए थे और ल मी को ”गीत क रानी“ क सं ा दी थी। उनके एक शंसक और िम सी. राजगोपालाचारी भी थे िज ह ने भारत के गवनर-जनरल और म ास के मु यमं ी का पद संभाला था। हालां क इतने मह वपूण ि य ारा क गई तारीफ सु बाल मी के िलए ज र मददगार रही होगी ले कन संगीत के े म महानता का उनका दावा अ य वतं वजह से था। उनक गाियक म उ लेखनीय िविवधता थी, साथ ही उनका एक गजब का स मोहक ि व भी था। शा ीय और लोकगीत क उनक ब त सी रकाॅ डग ने उ ह पूरे भारत म िस कर दया। वह खुद भी महानगरीय ोता क तुलना म अ य जगह के ोता के िलए गाने के ित ब त इ छु क रहती थ और उ ह ने कई समाजसेवी काय हेतु चंदा जुटाने के िलए भी गायन कया था। एक िव ान ने सन् 1944 से लेकर 1987 के बीच इस तरह के समाजसेवी काय के िलए सु बाल मी ारा गाए गए 244 गायन क सूची पेश क है। छोटे-छोटे शहर और सावजिनक उ े य दोन ही उनक चंता और लोकि यता को जािहर करते ह। उदाहरण के िलए जमशेदपुर म उ ह ने एक मिहला समूह के िलए गाया, बंबई म हंद ु तानी शैली क गाियका के सरबाई के रकर के िलए, हासन म एक अ पताल के िलए, म ास म िल टल िस टस आॅफ द पूअर नाम क एक ईसाई समाजसेवी सं था के िलए, जाफना म रामकृ ण िमशन (एक हंद ू समाजसेवी सं था), ि ची म सावजिनक े के कारखाने के िमक के िलए और तंजौर म महा मा गांधी के नाम पर बन रहे एक टीबी सैिनटो रयम के िलए उ ह ने गाया।41 अगर भारत के हरे क िह स म शा ीय संगीत को ले जाने का ेय सु बाल मी को जाता है तो दुिनया के हरे क िह से म भारतीय संगीत को ले जाने का ेय िन य ही िसतारवादक रिवशंकर को जाता है। उनका ज म सन् 1920 म बनारस म आ था और वे िस नतक उदय शंकर के भाई थे। एक कशोर के प म वे अपने भाई क मंडली म शािमल हो गए और उनके साथ यूरोप क या ा क । फर उ ह संगीतकार अ लाउ ीन खान के अधीन िश ण के िलए भेजा गया। अ लाउ ीन खान अपने जमाने के एक मश र अनुशासनवादी थे, िजनके साथ सात साल तक रहकर रिवशंकर अपनी पीढ़ी के दो उभरते िसतार म से एक बन गए। दूसरा िसतारा था उनके गु का बेटा सरोदवादक अली अकबर खान। आजादी के व तक रिवशंकर एक समारोह कलाकार के प म पूरी तरह थािपत हो चुके थे। अमूमन वह एकल संगीत ही पेश करते थे ले कन अली अकबर खान के साथ िमलकर उ ह ने युगल संगीत या जुगलबंदी को भी लोकि यता दलाई। यह संगीत का ऐसा प था जो पहले के शा ीय वा संगीत के िलए अनजाना था। सु बाल मी क तरह उ ह ने अपने आपको िवशु शा ीय प तक ही सीिमत नह रखा। रिवशंकर ने एक नृ य-नाटक का िनमाण कया जो जवाहरलाल नेह के िड कवरी आॅफ इं िडया पर आधा रत था और उ ह ने स यजीत रे क कई फ म के िलए संगीत भी रचा। सन् 1956 म रिवशंकर अपने संगीत का दशन करने िवदेश गए जो उसके बाद उनका वा षक दौरा बन गया। सन् 1961 म यूयाॅक म उ ह ने एक संगीत- तुित दी िजसके बारे म शहर के अखबार ने िलखा क ”इसने वहां संगीत सुनने का एक नया माहौल रच दया।“ दूसरे अखबार ने िलखा क ”यह संगीत का एक रह यवाद था जो धा मकता और दाशिनक परं परा से ओत ोत था।“ अब तो रिवशंकर पि मी संगीतकार के साथ संगत करने लगे थे िजनम जाॅन काॅ ेन, य दी मेनुिहन, एं े ेिवन जैसे संगीत के मम थे और वे उनके साथ रकाॅ डग भी करने लगे थे। उनक िसि , नाटक य प से तब बढ़ गई जब बीटल जाॅज हे रसन ने उनसे संगीत का ान िलया और उ ह अपना ”गु “ कहने लगे। सन् 1967 म रिवशंकर ने कै िलफो नया को अपना नया ठकाना बना िलया। अब वे एक घुमंतू शि सयत बन गए िजनक उपि थित अ सर मोनटेरी और अ य जगह पर होने वाले संगीत समारोह म होती। उ ह ने सन् 1970 के िस बंगलादेश संगीत समारोह म अ णी भूिमका िनभाई। उ ह ने अपने नए ोता के साथ बि़ढया तालमेल थािपत कया। वे अपनी बेहतरीन अं ेजी से लोग को हरे क धुन से प रिचत कराते और वैकि पक औपचा रक राग का ह के धुन से खयाल रखते। (भारतीय ोता लगातार चार घंटे तक एक ही राग सुन सकते थे) उ ह ने अपनी परं परा को पि मी दुिनया के िलए और भी ा बना दया और युवा भारतीय के िलए रा ता साफ कर दया क वे अपने संगीत को ऐसी जगह पर ले जाएं जहां इसे पहले कभी नह सुना गया। न बे के दशक म वे भारत लौटे और नई द ली को अपना ठकाना बनाया ले कन पि म से उ ह ने अपना नाता नह तोड़ा। उ के नौव दशक म वे अभी भी चु त-दु त ह और कसी संगीत-सं या म अभी भी ढाई घंटे से यादा तक तुित दे सकते ह।42 एम.एस. सु बाल मी और रिवशंकर आव यक प से अपनी पीढ़ी के सबसे महान संगीत नह ह ले कन वे सबसे मश र इसिलए हो गए क वे वाकई महान ि व वाले थे। उनका ि व ब त आकषक था य क उनके लंबे क रयर म ापक सामािजक प रवतन ए। वे अपनी ाचीन कला के शानदार चारक और वाहक थे िज ह ने इसे नए जमाने के साथ सामंज य िबठाने म मदद क और एक ाकु ल और अ सर िनमम होती दुिनया म िसि के िशखर को छु आ। उ ह ने अपने संगीत के िलए ोता और समथक क एक िवशाल सं या खड़ी क और इस तरह देखा जाए तो लंबे समय तक अपने बाद क पीढ़ी के संगीतकार -गायक के िलए मददगार बन गए।43 VIII शहरी औ ोिगक समाज के िलए मनोरं जन का सबसे खास प िन य ही खेलितयोिगता का आनंद उठाना है। भारत म पुराने पारं प रक खेल जैसे खो-खो और कब ी के साथ सभी तरह के आधुिनक खेल खेले और देखे जाते ह। ले कन उपलि धय के िहसाब से दो खेल खास उ लेखनीय है - िबिलय स और हाॅक । िबिलय स म भारत ने कई िव चैि पयन पैदा कए ह जब क हाॅक म भारतीय टीम सन् 1928 से लेकर 1956 तक अपराजेय थी। इसने उसम लगातार छह ओलि पक वण पदक हािसल कए। जहां तक दशक वग क बात है तो देश म दो खेल मह वपूण ह। एक है के ट और दूसरा फु टबाॅल। पि मी देश क तरह ही फु टबाॅल कामकाजी वग के बीच काफ लोकि य रहा है। देश के बड़े औ ोिगक क बंबई, द ली और बंगलौर सभी शहर म स य फु टबाॅल लीग ह। यहां िविभ लब के बीच मैच होता रहता है, िजसे औ ौिगक घराने ायोिजत करते ह। यह खेल गोआ, के रल और पंजाब म भी काफ खेला और देखा जाता है। हालां क भारतीय फु टबाॅल क राजधानी कलक ा (अब कोलकाता) ही है। यहां खेल और राजनीितक ितयोिगता साथ-साथ चलती है। यहां तीन मुख टीम ह िजसम से एक है मोह मडन पो टग जो पारं प रक प से मुसलमान का ितिनिध व करता है। दूसरी है मोहन बागान जो क बंगाली भ लोक ारा थािपत और सम थत है और तीसरा है ई ट बंगाल। ई ट बंगाल को रा य के दूसरे िह स के ापक लोग का समथन ा है। ये और अ य टीम एक दूसरे के साथ कलक ा मैदान म खेलती ह जो शहर के दय थली म एक िवशाल मैदान है जहां हरी घास क चादर िबछी रहती है। तीस के दशक से लेकर अ सी के दशक तक शायद फु टबाॅल कलक ा म सबसे च चत खेल था। इसक चचा राजनीित और धम से भी यादा होती थी। शहर के मुख फु टबाॅल लब म हजार सद य थे िजनक भावनाएं अपने टीम से यूरोपीय फु टबाॅल लब के सद य से कमतर नह थी। मैच के दौरान या बाद म हंसा क घटना असामा य बात नह थी। हालां क सन् 1982 के िव कप के बाद से इस खेल म आमजन क दलच पी घटने लगी। यह पहला िव कप था िजसका सजीव सारण भारत म कया गया था। इसने खेल के थानीय नायक और महान अंतरा ीय नायक के बीच के खालीपन को अ वि थत कर दया। कलक ा के लोग अब अपने लब से दूर रहने लगे। खेल क दीवानगी के ित िगरावट का यह दौर जारी है और बीस साल बाद दलच पी के िलहाज से आम बंगािलय के बीच फु टबाॅल के ट के बाद दूसरे थान पर पहं◌ुच गया है। जैसा कलक ा म आ वही शेष भारत का भी हाल है। के ट एक ऐसा खेल है िजसम शारी रक गठन या चु ती-दु ती से यादा कलाइय का इ तेमाल मायने रखता है। छोटे कद का और मजबूत होना हमेशा इस खेल म नुकसानदेह नह होता। इस तरह भारतीय िखलाड़ी इस खेल म दुिनया के बेहतरीन िखलाि़डय के साथ होड़ ले सकते ह। इसक धीमी र तार और खेल का अबािधत ढांचा भी भारतीय के िलए मुफ द बैठता है। यह उ ह समूह म खेलने, आपस म बातचीत करने, एक दूसरे से उकसावा भरा मजाक करने क भी स िलयत देता है और ो सािहत करता है। सन् 1983 म भारत ने पहली बार के ट िव कप जीता था।(उसके बाद से भारत 2011 म भी के ट िव कप जीत चुका है।) उस जीत के साथ एक संयोग ये आ क उप ह टेलीिवजन का ापक सार आ िजसने इस खेल को छोटे-छोटे शहर और कामकाजी वग के घर तक प च ं ा दया। अ सी के दशक म और उसके बाद भी के ट ने धीरे -धीरे िवराट लोकि यता हािसल कर ली। दो भारतीय ब लेबाज सुनील गाव कर और सिचन तदुलकर ने ब लेबाजी का िव रकाॅड तोड़ दया। किपलदेव एक समय ऐसे गदबाज थे िज ह ने टे ट के ट म सबसे यादा िवकट ली थ । व बीतने के साथ-साथ खेल का सामािजक आधार फै लता ही गया है। यादा से यादा िखलाड़ी छोटे शहर से आने लगे और मिहलाएं खासकर बड़ी तादाद म इस खेल को देखने लगी ह। अगर लोकि य अपील के संदभ म नई शता दी क शु आत तक के ट ने फ म क बराबरी हािसल कर ली। कु छ के टर फ मी िसतार जैसे ही अमीर और उतने ही लोकि य थे। वे टीवी सेट पर सव ापी हो गए थे। या तो वे के ट खेल रहे होते थे या फर टू थपे ट से लेकर महंगी कार तक का िव ापन कर रहे होते थे। के ट के पीछे जो भावनाएं काम कर रही थ वो अिधकांशतः रा वादी भावनाएं थ । खेल म दो ितपि य को अमूमन नापसंद कया जाता था या कई बार घृणा के तर तक देखा जाता था। उनम से एक टीम थी पुराने सा ा यवादी देश इं लड क टीम और दूसरी टीम थी उपमहा ीप का नया ित ं ी पा क तान क टीम। कसी भी टीम पर िवजय का मतलब था क िखलाि़डय को पुर कार व प एक मोटी रकम िमलती, शानदार सावजिनक वागत होता और उ ह धानमं ी से सा ा कार का मौका िमलता। बाबरी मि जद िव वंस, कारिगल यु और क मीर म आतंकवाद के बाद से भारत और पा क तान के बीच के ट मैच अब यादा तीखे प से खेला जाने लगा है। अब ऐसा िसफ िखलाि़डय के बीच ही नह खेला जाता बि क उन लोग के दमाग म भी खेला जाता है जो इसे देखते ह और इसका समथन करते ह। भारत-पाक के ट मैच का दशक वग 30 करोड़ क सं या पार कर गया है िजनम से यादातर लोग के िलए यह मैच गोलीबारी के िबना एक यु जैसा ही होता है। इस ित पधा का एक खास कु प चेहरा है भारतीय मुसलमान पर इस खेल के मा यम से लगाया जाने वाला आरोप, िज ह देश के हंद ू क रपंथी पा क तान का समथक करार दे देते ह। उदाहरण के िलए सन् 2003 म जब भारत ने पा क तान को िव कप मैच म हराया था तो बंगलौर के लोग झूमते ए सड़क पर िनकल आए - ”वे आितशबाजी छोड़ रहे थे, झूम रहे थे, िच ला रहे थे और भारत माता क जय बोल रहे थे।“ जब क अहमदाबाद म िवजय जुलूस एक सां दाियक दंगे म त दील हो गया जहां ज मनाते लोग ने आरोप लगाया क कु छ मुि लम छा ने भारत का िवके ट िगरने पर खुशी मनाई थी।44 अगले साल आमचुनाव म के ट का एक दूसरा प सामने आया। चुनाव चार के समय भारतीय टीम पा क तान म खेल रही थी। वह वहां मैच जीत रही थी, जहां उस टीम का एक मुख िखलाड़ी उ र देश से आने वाला एक मुसलमान मोह मद कै फ था। यू.पी. से लोकसभा के िलए 80 सांसद चुनकर जाते थे ले कन वहां क िवशाल मुि लम आबादी से बीजेपी को नग य समथन िमलता था। बीजेपी जैसी पाट के िलए जो अपनी हंद ू क रपंथी छिव से मुि पाना चाहती थी, के ट क यह जीत कसी ई रीय वरदान से कम नह थी। उ र देश म दए गए अपने भाषण म धानमं ी अटल िबहारी वाजपेयी ने मुसलमान क ये कहकर तारीफ क क ”उनके एक बेटे ने के ट मैच के दौरान महान काम कया है।“ उ ह ने कहा क ”ई र ही जानता है क भिव य म वह कतना बड़ा आदमी बनेगा।“ उ ह ने मुसलमान से अपनी पाट के प म मतदान करने क अपील क । उ ह ने मुसलमान से आ ह कया क वे बीजेपी पर भरोसा कर और दावा कया क ”वे ऐसा इसिलए कर य क बीजेपी ही उ ह सुर ा देने क ि थित म ह।“ ले कन आिखरकार मुसलमान ने वाजपेयी क पाट को समथन नह दया िजसे बाद म स ा से हाथ धोना पड़ा। ले कन ये बात क भारत के धानमं ी ने चुनाव चार के दौरान एक के टर के नाम का सहारा िलया, इस बात का सबूत थी क भारत और भारतीय ारा इस खेल को कतना असाधारण मह व दया जा रहा था।45 IX मनोरं जन के इन िविवध प को अपने िवकास म रे िडयो और हाल के साल म टेलीिवजन के ापक सार से काफ मदद िमली है। भारत म सन् बीस के दशक म पहली सारण कं पनी क शु आत ई थी। उसके तुरंत बाद इसक जगह रा य िनयंि त आॅल इं िडया रे िडयो ने ले ली िजसने दशक तक इस मा यम पर एकािधकार बनाए रखा। आॅल इं िडया रे िडयो के अधीन दूरदराज म फै ले सारण क का एक िवशाल तं था जो पूरे उपमहा ीप म अपनी सेवाएं देता था। िसफ कु छ सुदरू वत जंगल, रे िग तान और पहाड़ी इलाके ही इसक जद से बाहर थे। रे िडयो को लेकर रा य के उ मीद क अिभ ि एक अ णी रा वादी राजनेता ारा ई िजसने कहा क ”इसका उ े य मनोरं जन दान करना नह बि क ऐसे काय म का सारण करना भी है जो लोग को ानवान बना सक और गांववाल क आ मा को जा त कर सके “।46 यादातर रे िडयो टेशन का सारण सूय दय के व ही ाथना या देशभि गीत के साथ शु हो जाता था और म यराि म यह मौसम क रपोट के साथ बंद होता था। उन काय म म शा ीय, फ म और लोकसंगीत होते थे, कहािनयां, नाटक, समाचार बुले टन, मिहला , ब और ामीण ोता के िलए समाचार होते थे। वा य और खेती करने के तरीक पर भी काय म सा रत कए जाते थे। यह एक िमि त तुित थी िजसम ोता को ये स िलयत होती थी क वे अपनी िच और ज रत के िहसाब से काय म को सुन सक। आजादी िमलने के साल यानी सन् 1947 म भारतीय रे िडयो उ ोग महज 3000 रे िडयो सेट का िनमाण करता था। सन् 1951 म यह सं या बढ़कर 60,000 हो गई और सन् 1956 म यह बढ़कर 150,000 हो गई। सन् 1962 तक आॅल इं िडया रे िडयो तीस टेशन से अपना सारण करता था और इसका सकल सालाना सारण एक लाख घंट का होता था। एक दशक बाद पूरे देश म लोग करीब डेढ़ करोड़ रे िडयो सेट का उपयोग कर रहे थे। इनम से िन य ही ब त सारे सेट एक से यादा ि य ारा सुने जा रहे थे।47 आजादी के एक दशक बाद देश के सूचना- सारण मं ी डाॅ. बी.वी. के सकर थे, जो भारतीय शा ीय सं कृ ित म गहन िच रखने वाले िव ान थे। सन् 1953 म दए गए अपने एक भाषण म उ ह ने कहा क शा ीय संगीत के बुरे दन चल रहे ह और उ र भारत म यह िवलु होने क कगार पर है। उसका आम जनता से संपक टू ट गया है। इसम जनता क कोई गलती नह है बि क ऐसा ऐितहािसक प रि थितय क वजह से आ है। अतीत म राजा-महाराजा और सरदार ने इसे य दया था। वह ो साहन अब लगभग ख म हो गया है। िपछले 150 साल तक हम ि टश शासन के अधीन थे जो न तो हंद ु तानी संगीत समझते थे, न ही उसे बढ़ावा देते थे... संगीतकार और आॅल इं िडया रे िडयो के सामने मु य सम या शा ीय संगीत के साथ आम जनता के संपक को जंदा करने क है। हम उ ह अपने पारं प रक संगीत से प रिचत करवाना होगा और उनका जुड़ाव इसके साथ बढ़ाना होगा।48 हालां क सन् तीस के दशक से ही आॅल इं िडया रे िडयो अपने टाफ के तौर पर शा ीय संगीतकार क िनयुि कर रहा था। अपनी उ , यो यता और अनुभव के िहसाब से कलाकार को िविभ ेणीय म रखा जाता था। उ ह उनके घर के नजदीक के टेशन म िनयुि यां दी जाती थ । उनसे काय म के बारे म सलाह और लगातार होने वाले गायन म िह सा लेने क उ मीद क जाती थी। सन् 50 के दशक के अंत तक करीब 10,000 संगीत रा य के वेतनभोगी थे। कनाटक और हंद ु तानी दोन शैली के गायक को रे िडयो टेशन म रखा जा रहा था िजनम से कु छ अपने समय के महानतम गायक थे। उनम अली अकबर खान, िबि म लाह खान, मि लकाजुन मंसूर और इमानी शंकर शा ी जैसे नाम शािमल थे। आॅल इं िडया रे िडयो के यादातर टेशन दन म कई-कई घंटे तक शा ीय संगीत का सारण करते थे। शिनवार क रात को िति त ”रा ीय काय म“ का सारण कया जाता था जब एक ही गायक पूरे न बे िमनट तक गाता था। हरे क साल आॅल इं िडया रे िडयो एक रे िडयो संगीत स मेलन का आयोजन करवाता था जो एक लाइव संगीत समारोह होता था। इसक रकाॅ डग को महीने भर तक रे िडयो पर सा रत कया जाता था और इसका एक तरह से ज मनाया जाता था। शा ीय संगीत से ेम के साथ ही डाॅ. बी.वी. के सकर को फ म और फ मी संगीत के ित एक खास नापसंदगी भी थी। उनके कायकाल के शु आती कु छ साल तक रे िडयो पर लोकि य फ मी संगीत पर पाबंदी ही लगा दी गई। सौभा य से फर बाद म इस फै सले म थोड़ी ढील दी गई और आॅल इं िडया रे िडयो ने एक नए टेशन िविवध भारती क शु आत क जो पूरी तरह से फ मी गीत के ित सम पत था। यह सारण जबद त तरीके से लोकि य रहा और लाख लोग इसके दीवाने हो गए। इसे िव ापन भी िमलने लगे और ज द ही यह काय म आ थक प से आ मिनभर हो गया।49 िनि य ही ऐसा लगता है क आॅल इं िडया रे िडयो के िबना भारतीय शा ीय संगीत पुराने व से िमल रहे सामंती य के अभाव का असर नह झेल पाता। रजवाड़ क समाि का वाकई इस पर बुरा असर होने वाला था। इसके साथ ही आॅल इं िडया रे िडयो ने रा ीय एक करण क भूिमका का भी बखूबी िनवाह कया। इसने लोकि य जनसं कृ ित को उ रा ीय सं कृ ित के साथ भी जोड़ने म मदद क । इसने अलग-अलग े को रा से जोड़ने म मदद क । आॅल इं िडया रे िडयो का सबसे कम आकषक िह सा इसका समाचार बुले टन था। यह रा ीय से लेकर अंतरा ीय तक सभी घटना क सूचना देता था, ले कन जो पाट स ा म होती थी उसी के िहसाब से वह खबर बताता था। वह सरकारी चार इसके तुितकरण को भी नह सुधार पाया। समाचार एक ही अंदाज म लगभग नीरस प म सा रत कए जाते थे। यह उसक एक बड़ी कमजोरी थी। सन् स र के दशक क शु आत से टेलीिवजन ने मनोरं जन के साधन के तौर पर (और सरकारी चार के साधन के तौर पर भी!) रे िडयो का थान लेना शु कर दया। यूं कहा जाए क बाद का उ े य ही क बंद ु म यादा था जो शु से हावी रहा। सरकार संचािलत दूरदशन ने सरकार क उपलि धय पर अपना सारा यान क त कर दया और जनता से कहा जाता रहा क वे यादा अनाज और इ पात का उ पादन कर। हालां क अ सी के दशक तक चैनल ने अपने आपको सरकार ारा ायोिजत करवाने क बजाय बाजार ारा ायोिजत करवाने का सुख भी खोज िलया था। इसम रामायण और महाभारत जैसे धारावािहक ब त ही अ णी सािबत ए िजसने लाख -करोड़ो लोग को टेलीिवजन सेट तक ख चकर लाने म कामयाबी हािसल क और लाखोकरोड़ो का िव ापन भी लाए। उसके बाद सोप-ओपेरा (पा रवा रक धारावािहक िजसके बीच-बीच म साबुन, िडटजट आ द उ पाद के िव ापन आते ह ) क शु आत ई िजसम पा रवा रक कहािनय को पचास या उससे भी यादा क त म दखाया जाने लगा (इसम एक शु आती धारावािहक रमेश िस पी का बुिनयाद था िजसम बंटवारे के बाद लाहौर से आए एक शरणाथ प रवार क कहानी को दखाया गया)। एक तरफ दशक का मनोरं जन हो रहा था तो दूसरी तरफ राजक य खजाने म पैसा आ रहा था। सन् 1975-85 के बीच महज दस साल म दूरदशन का राज व साठ गुणा बढ़ गया।50 न बे के दशक म दृ य वायु तरं ग को िनजी िखलाि़डय के िलए खोल दया गया। शहर म कई एफएम टेशन पनप आए। ले कन इस उदारीकरण म मु य फायदा टीवी चैनल को आ। इनका आ यजनक गित से िवकास आ और भारत क सभी भाषा म टीवी चैनल क कतार लग गई। सन् 2000 तक भारत म 70 से यादा टीवी चैनल शु हो चुके थे िजसम से कु छ खास मु पर मसलन खेल, कारोबार, फ म या समाचार पर क त थे। कु छ अपने रवैये म ब त ही समावेशी थे और उ ह ने ऊपर के सभी िवषय को और कु छ अ य िवषय को भी अपने म समेट िलया था। यह एक गलाकाट ित पधा का बाजार था िजसम नए िखलाि़डय के िलए कु बान होने क दर ब त ही यादा थी और कमचा रय को तोड़ने क वृित उससे भी यादा। उपभो ा िवक प को लेकर उहापोह म थे, जहां एक जमाने म उ ह एकमा रा य िनयंि त चैनल से संतोष करना पड़ता था वह अब चकाच ध भरे िवक प क भरमार थी। X फ म आलोचक िचदानंद दासगु ा ने एक बार कहा था क ”भारत का पोपुलर िसनेमा... िसनेमा क अंतरा ीय भाषा म नह बोलता... बि क थानीय बोिलय म बोलता है जो क दुिनया के अिधकांश देश के िलए अबूझ है।“51 दासगु ा शायद यहां स यजीत रे के िम और जीवनीकार के प म बात कर रहे ह और बंगाल के बारे म भी बात कर रहे ह िजनके कलाबोध का तर देश के दूसरे िह स के कलाबोध के तर से अलग (और उ तर भी) रहा है। हक कत तो यह थी क ब त शु आत से ही भारतीय फ म ने ऐसे दशक का यान भी अपनी तरफ ख चना शु कर दया था जो भारतीय नह थे। इस दशा म एक अ णी फ मकार थे राजकपूर जो भारत के सबसे मश र फ मी प रवार से आते थे (उनके िपता पृ वीराज कपूर एक मश र िसनेमा और मंच कलाकार थे। उनके दो भाई शिश और श मी कपूर मश र फ मी िसतारे रहे। वह परं परा उनके दो बेट और उनके ब ारा लगातार जारी है)। राज कपूर भारत के चाल चै लीन थे िज ह ने अपने ही ारा िनदिशत फ म के मा यम से एक लंबी दूरी तय क ।52 उ ह ने अपूव स दय क मि लका नरिगस के साथ एक यादगार फ मी पारी खेली िजनके साथ वे स ह बार फ मी पद पर नजर आए। जब दोन एक फ म के ीिमयर के िसलिसले म कलक ा गए तो ”उनके आॅटो ाफ के िलए छोटे-छोटे ब म होड़ लग गई“।53 उससे भी आ य क बात ये थी क उसी तरह का उनका वागत सोिवयत संघ म भी आ। जब उ ह ने सन् 1954 और 56 म सोिवयत संघ क या ा क तो जार के जमाने के पुराने व र सेनानी भी उनसे हाथ िमलाने के िलए कतारब दखे। गभवती मिहला ने उनसे कहा क अगर उनको बेटा आ तो वे उसका नाम राज और अगर बेटी ई तो उसका नाम नरिगस रखगी।54 राज कपूर क पहली उ लेखनीय फ म आवारा थी जो सन् 1951 के आिखर म द शत ई थी। इसम राज कपूर ने एक ऐसे म तमौला लड़के क भूिमका िनभाई थी जो पा रवा रक प रि थितय क वजह से अपराध क दुिनया म चला जाता है। एक अं ेजी अखबार के समी क ने फ म क आलोचना करते ए िलखा क फ म म ”जबरन नकलीपन घुसेड़ा गया“ और ”लगातार मशीनी भाव“ डाला गया िजसने ”िवषयव तु क वा तिवकता को िछ -िभ कर दया और फ म को उसके सबसे आव यक गुण से वंिचत कर दया“।55 ले कन जनता के बीच यह फ म बेतहाशा लोकि य ई और ऐसा िसफ भारत म ही नह था। जब फ म के पटकथा लेखक ने सोिवयत संघ क या ा क तो उ ह ने पाया क सारे के सारे बड इसी फ म क धुन बजा रहे थे। सी, यू े नी और जा जयाई युवा आवारा फ म के गीत पर िथरक रहे थे और उसे समूह म गा रहे थे। कई ऐसे भी लड़के िमले िज ह ने दावा कया क उ ह ने यह फ म बीस या तीस बार देखी है। सोिवयत िसनेमा के पूरे इितहास म कसी भी फ म को इतनी लोकि यता नह िमली थी और कसी भी फ म या मंचीय िसतारे को इतने कम समय म इतनी िसि हािसल नह ई थी।56 हंदी फ म अ का, म य-पूव और दि ण-पूव एिशयाई देश म भी लोकि य रही ह। मलय गांव म काम करने वाले एक मानवशा ी को अपने उ र-दाता को हरे क स ाह िनकट के एक िसनेमा हाॅल म इसिलए ले जाना पड़ता था िजसे वहां के लोग ”सामा यतः हंदी“ कहते थे।57 और जापान म तिमल फ म टार रजनीकांत तो जबद त प से लोकि य रहे ह। हंदी फ म क लोकि यता उन देश म ब त आ य क बात नह है जो भारत क ही िव तृत सं कृ ित का िह सा ह। पा क तान क या ा कर रहे एक अमे रक पयटक ने पाया क सावजिनक बस और घर के भीतर िजस संगीत के बजने क सबसे यादा संभावना होती है वह हंदी फ म संगीत ही है। नई-नई द शत ई हंदी फ म के नकली कै सेट और नकली सीडी क पा क तान म भरमार है िजस पर पा क तानी सरकार ने वहां के घरे लू फ म उ ोग को संर ण देने के िलए पाबंदी लगा रखी है।58 उससे भी पि म अफगािन तान म सभी कार के संगीत पर तालीबान ने पाबंदी लगा रखी है। ले कन जब वहां तालीबानी िनजाम ख म हो गया तो ऐसी खबर आ क वहां सबसे तेजी से पनपने वाले धंध म या तो उन हजाम का धंधा था जो दाढ़ी काटने के काम म लगे थे या फर उन वडर का जो भारतीय फ म टार क त वीर बेच रहे थे। लता मंगेशकर और मोह मद रफ के गाने एक बार फर से काबुल के घर क रौनक बन गए। उससे भी बड़ी िह मत क बात ये थी क प रवा रक रीित रवाज और परं परा का उ लंघन करके लोग अपनी पसंद से जीवनसाथी भी चुनने लगे। काबुल क एक अदालत म इस तरह के मुकदम क भरमार हो गई िजसम इस तरह के जोड़ ने ये मांग क क उ ह उनके प रवार क इजाजत के बगैर शादी करने दी जाए।59 हाल के दन म हंदी फ म ने पि मी यूरोप और उ र अमे रका म भी अपना बाजार बना िलया है िजसके उपभो ा मु य प से समृ भारतीय अ वासी ह िजनक सं या वहां अ छी-खासी हो गई है। साल 2000 म इं लड म शीष बीस द शत फ म म से चार हंदी फ म शािमल थी।60 तीन साल के बाद टाइम पि का म छपी खबर के मुतािबक पूरी दुिनया म भारतीय फ म के दशक हाॅलीवुड फ म के दशक से यादा हो गए ह। इनक सं या करीब 3.6 अरब हो गई जो हाॅलीवुड फ म से एक अरब यादा थी।61 िवदेश म बढ़ते इस दशक वग और भारत म भी दशक के िमजाज म आ रहे प रवतन क वजह से फ म म करदार और िवषयव तु बदलते जा रहे थे। पि मी प रधान अब फ म म आम बात हो गई थी और ” ेम िववाह“ वीकाय हो गए थे। अब खलनाियका क ज रत महसूस नह क जा रही थी य क नाियका के िलए अब पिव और आव यक प से कौमाय धारण करना ज री नह रह गया था। वह खुद ही आ मिनभर हो गई थी। वह अब लड़ सकती थी और दूसर को उकसा सकती थी। फ म म धन का खुला दशन कया जा रहा था। अतीत क फ म म भले ही नायक समृ प रवार से आता हो या अ छी नौकरी म हो, फर भी वह वंिचत और गरीब के साथ अपनी पहचान जोड़ता था। ले कन अब फ म ”अमीर क पाट “ बन गई थी िजसे ”दूर से देखने के िलए दशक को आमंि त कया जाता था“।62 सह ा दी के पहले साल म लंदन के टु साड मोम सं हालय म अिमताभ ब न क एक मू त लगाई गई। यह मू त मोम क बनी थी। यह उससे भी बड़ा स मान था िजसम बीबीसी के एक आॅन लाइन सव ण म अिमताभ को ”शता दी का नायक“ चुना गया था। उस सव ण म बड़ी तादाद म उ साही भारतीय ने अिमताभ के प म मतदान कर दया था। फर भी यह ब न नह बि क कु छ युवा भारतीय थे जो इस वै ीकृ त जमाने म फ म उ ोग के चेहर के तौर पर उभर रहे थे। उसम से एक थी पूव िमस व ड ऐ या राॅय िजसे जूिलया राॅब स ने ”दुिनया क सबसे खूबसूरत औरत“ कहा था। ऐ या राॅय क त वीर टाइम पि का के कवर पृ पर छपी, उ ह अंतरा ीय फ म जूरी म शािमल कया गया और कई हाॅलीवुड िनदशक ने उ ह अपने साथ काम करने का ताव दया। दूसरे िसतारे थे अिभनेता शाह ख खान जो अपनी पीढ़ी के सबसे कामयाब फ मी अिभनेता थे। यूरोप और उ र अमे रका म उनक तुित जबद त कामयाब ई और भारतीय (मूल के लोग), इरानी, अफगानी, अरब और बड़ी सं या म काॅकेिशयन मूल के लोग उ ह सुनने के िलए हजार क तादाद म उमड़ पड़े। अंतरा ीय तर पर एक और भारतीय िजसने अपनी छाप छोड़ी वो थे संगीतकार ए.आर. रहमान। रहमान बचपन से ही असाधारण ितभा के धनी थे। जब वे कशोराव था म ही थे तभी उ ह ने अपनी पहली फ म का संगीत तैयार कया था। रहमान ने हंदी फ म उ ोग क तरफ ख करने से पहले तिमल िसनेमा म अपना नाम कमाया। उनका िश ण (उनके संगीतकार िपता ारा) मूलतः शा ीय कनाटक शैली म आ था िजसका उ ह ने दुिनया के दूसरे िह स के वा यं और लय के साथ मेल कर अ भुत बना दया। सन् 2002 म रहमान को एं यू लाॅयड वेबर क तरफ से उनक फ म बंबई ी स का संगीत तैयार करने का आमं ण िमला। वे ट एंड और ोडवे के िलए िमली उस कामयाबी के बाद रहमान को जे.आर.आर. तोल कन क पु तक के थम फ मांकन लाॅड आॅफ रं स म सह-संगीतकार बनने का आमं ण िमला। उस फ म का बजट 2 करोड़ 70 लाख प ड था िजसका दसवां िह सा तो उसके संगीतकार को िमला। फर सन् 2004 म रहमान को ब मघम संफनी आॅरके ा को संचािलत करने के िलए आमंि त कया गया िजसके पहले संचालक सर एडवड एलगर रहे थे।63 िन य ही रहमान को िमली इस आ यजनक कामयाबी से एस.एस. वासन ब त खुश ए होते। वासन भी रहमान क तरह एक तिमल ही थे और ब त पहले सन् 1955 म उ ह ने द ली म शु तावादी ोता से ाथना क थी क वे ” फ म जगत के लोग “ के ित अपना पूवा ह याग द। उ ह ने तक दया क ”मनबहलाव और मनोरं जन उसी तरह मह वपूण ह जैसे भोजन, व और आवास।“ अगर ”सावजिनक े के लोग जनता क भलाई के िलए काम करते ह तो वा तिवकता यही है क मनोरं जन जगत के लोग भी जनता क खुशी के िलए ही काम करते ह।“64 उस समय उस व के दोन िह से वाकई सही थे य क जवाहरलाल नेह और बी.आर. अंबेडकर जैसे सावजिनक े म स य ि व जनता क भलाई के िलए ही काम कर रहे थे। ले कन पचास साल के बाद उस कथन का िसफ दूसरा िह सा सच लग रहा है। जहां एक तरफ सावजिनक े के ि अपने िनजी वाथ के िलए काम कर रहे ह वह देश के ”मनोरं जन जगत के लोग“ िजसम गायक, संगीतकार और अिभनेता को िगना जा सकता ह, वे लगातार आमजन के मनोरं जन के िलए काम कर रहे थे। इनम मिहला और पु ष दोन ही शािमल ह जो लगातार प रप होते जा रहे जनमानस के िलए क पनाशील होकर काम कर रहे ह। उपसंहार कु छ बात है क ह ती िमटती नह हमारी...! आने वाले समय म िसख समुदाय के लोग अपना अलग रा य थािपत करने क कोिशश करगे। मुझे लगता है क वे ऐसा ज र करगे और उसी दन से भारत के खंड-खंड होने क शु आत हो जाएगी। उसी या से उस प रक पना के व त होने क शु आत होगी क भारत एक एक कृ त देश है, जब क सचाई यह है क वह यूरोप क तरह ही एक िविवधता से भरा आ उपमहा ीप भर है। यहां का एक पंजाबी कसी म ासी से उतना ही अलग है िजतना क कोई काॅटलड का िनवासी इटली वाल से। अं ेज ने इसे एक करने क ब त कोिशश क ले कन कोई ठोस नतीजा नह िनकला। कोई भी ि ब त सारे रा के एक महादेश को िमलाकर एक रा का िनमाण नह कर सकता। जनरल सर लाउड औिचनलेक, भारत के पूव कमांडर-इन-चीफ, 1948 जब तक स का िवघटन नह होता तब तक भारत म क यूिन म के आने का खतरा बरकरार है। सर ांिसस टकर, भारत के पूव सेना य , 1950 जैसे-जैसे साल बीतते जा रहे ह, ऐसा लगता है क भारत म ि टश शासन एिजनकोट क लड़ाई क तरह ब त पुरानी घटना हो गई है। मैलकम मुगे रज, सारक और लेखक, 1964 इं दरा गांधी क अं येि के समय जो लोग भारत के भिव य के ित आशंका जािहर कर रहे थे उनम से ब त कम लोग ने भिव यवाणी क होगी क उनक मृ यु के महज दस साल बाद सोिवयत संघ िबखरकर इितहास बन जाएगा। राॅिबन जेफरी, इितहासकार, 2000 I फरवरी 1959 के अंक म अमे रका क िति त मानेजाने वाली पि का द अटलां टक मंथली ने पा क तान के बारे म एक अह ता रत लेख कािशत कया। उस समय जनरल अयूब खान ने सैिनक त तापलट करके पा क तान क स ा पर क जा कर िलया था। उस संवाददाता ने िलखा क पा क तान म ”राजनीित “ कह नह दख रहे थे। वे सावजिनक जीवन से गायब हो गए थे और उनका नाम लेना भी मानो गुनाह हो गया था। लोग के जहन से मानो राजनीित भी गायब हो गई थी। अब लोग समाजवाद बनाम मु अथ व था और वाम बनाम दि ण क बहस म दलच पी लेते नजर नह आ रहे थे। ऐसा लग रहा था क संसदीय लोकतं क तरह ही ये िववाद कु छ ऐसी व तु हो िजसे पि म से ब ले आया गया हो और उससे काम चलाया जा रहा हो। अटलां टक पि का के संवाददाता के मुतािबक ”पा क तान के कसान ने सरकार म प रवतन का वागत कया य क वे शांित चाहते थे“। उ ह ने देखा क देश म कानूनव था बहाल क जा रही है और कालाबाजारी और त कर को उनक सही जगह पर भेजा जा रहा है। उसने िलखा क ”पा क तान के गरीब-गुरबे वहां क सेना के पहले से ही आभारी ह य क कसी गरीब देश म सरकार क कामयाबी इस बात से मापी जाती है क उसके शासनकाल म ग और चावल क क मत कतनी ह, जो उस संवाददाता के मुतािबक अयूब के स ा संभालने के बाद कम हो गई थ ।“ हालां क ेस के िवदेशी संवाददाता चीज के सरलीकरण से तिनक भी नह िहच कचाते भले ही वह उनका उस देश का पहला त काल दौरा ही य न हो। यहां अटलां टक मंथली का संवाददाता कु छ वैसा ही करता तीत होता है। पा क तान म उसने जो कु छ भी देखा या देखते ए सोचा उसे उसने एक सामा य रपोट के तौर पर सामने रख दया। उसने िलखा क ”एिशया और अ का के ब त सारे नव- वतं देश ने ि टश संसदीय तं क नकल क कोिशश क है। यह योग सूडान, पा क तान और बमा म नाकामयाब हो गया है जब क वह व था भारत और ीलंका म ब त ही दबाव म है। पा क तान का सैिनक शासन के साथ योग एिशया और अ का म ब त ही दलच पी के साथ देखा जाएगा।“ चालीस साल के बाद अटलां टक मंथली ने पा क तान क ि थित पर एक दूसरी रपोट कािशत क । इस अविध म पा क तान सै य तानाशाही से लोकतं और फर से सै य शासन का अनुभव कर चुका था। उसका िवखंडन भी हो गया था और देश का पूव िह सा बंगलादेश नाम के एक सं भु रा य के प म आजाद हो चुका था। इसने तीन लड़ाइयां लड़ी थ , िजसम हरे क सेना के जनरल ारा शु क गई थी। ये वही सेना के जनरल थे िजनसे जनता ने ये उ मीद क थी क वे मु क म अमन-चैन ले आएंगे। अटलां टक मंथली क यह खबर राॅबट डी. के लन ारा ह ता रत थी जो न लीय यु और रा -रा य के िवखंिडत होने क या के घूमंतू िवशेष थे। के लन ने पा क तान क ब त ही नकारा मक त वीर पेश क । उ ह ने वहां ा अराजकता, न लीय संघष (िशया बनाम सु ी, मुहािजर बनाम संधी, बलूच बनाम पंजाबी आ द), आ थक िवषमता, िजहा दय का िश ण और ओसामा िबन लादेन के भारी भाव क िव तृत चचा क । के लन ने एक पा क तानी बुि जीवी को उ धृत कया िजसने कहा क - ”हमने खुद को अपने संदभ म कभी भी ा याियत नह कया। हमने िसफ हंद ु तान के बरअ स ही अपने आपको देखने क कोिशश क । यही हमारा दुभा य है।“ उस संवाददाता क राय म ”पा क तान का हाल िवखंडन क तरफ जाते ए युगो लािवया जैसा हो सकता है ले कन एक ऐसे युगो लािवया जैसा िजसके पास परमाणु हिथयार भी होगा।“ यूगो लािवया क तरह ही ”पा क तान अराजकता और अता ककता का क बन गया था जो क साफ दख रहा था।“ के लन ने िन कष िनकाला क ”पा क तान म सैिनक और लोकतांि क दोन ही सरकार नाकामयाब हो गई ह जब क भारत म पचास साल से िबना कसी त ता पलट के लोकतं बद तूर कायम है।“1 के लन ने िनि त ही चालीस साल पहले पा क तान के बारे म अपनी ही पि का ारा दी गई थापना को नह पढ़ा था। ले कन जो बात आ यजनक है वो ये क उसी पि का म भारत का अलग ही िच ण कया गया था। सन् 1959 म अटलां टक मंथली ने भारत म लोकतं क खराब ि थित पर चंता जािहर करते ए िलखा क इससे अ छा यहां पर सैिनक शासन ही होता। ले कन सन् 1999 म उसी पि का क राय म यह लोकतं ही था िजसने भारत को संकट से उबारा। उसके दो साल बाद यूयाॅक का वीन टावर आतंक हमले का िशकार बन गया। जैसे-जैसे पि मी देश ारा अफगािन तान और इराक म लोकतं थोपने का यास नाकामयाब होता गया, भारत के अपने अंदर से लोकतं को िवकिसत करने के यास को फर से सराहना िमलने लगी। जब अ ैल 2004 म भारत म चौदहवां आमचुनाव करवाया गया तो पा क तािनय ने भी भारत और पा क तान के इस फक क सराहना क । कराची के तंभकार अयाज अमीर ने िलखा क ”भारत म चुनाव करवाया जा रहा है और दुिनया इसे उ सुकतावश शंसाभाव से देख रही है।“ आिमर ने आगे िलखा क - ”पा क तान फर से एक अिधनायकवादी व था के चंगुल म चला गया है, ले कन दुिनया उसे बीमार िनगाह से देख रही है। या हम इतने बहरे हो गए ह क ये तुलनाएं भी हम नह दखत ? हम कब सबक सीखगे? हम कब सबक सीखगे क ये भारत का आकार, उसक आबादी, उसका पयटन उ ोग या उसका सूचना तकनीक उ ोग नह बि क उसका जंदा लोकतं है िजसक वजह से हम इतने बौने दखते ह।“2 II भारत म साल 2004 म ए चुनाव म करीब 40 करोड़ भारतीय ने अपने मतािधकार का योग कया। ऐसा आमतौर पर माना जा रहा था क स ाधारी गठबंधन आराम से चुनाव जीत जाएगा, िजसका नेतृ व बीजेपी कर रही थी। उसक संभािवत जीत से ये अंदश े ा जताया जा रहा था क ” हंद ु व“ का एजडा फर से उभरकर सामने आ जाएगा। ले कन जब चुनाव का नतीजा सामने आया तो पता चला क कां ेस क अगुवाई म यूपीए ने चुनाव सव णकता को िनराश करते ए चुनाव जीत िलया और स ा म आ गई। उस चुनाव नतीजे को कई तरह से िव ेिषत कया गया। कसी ने कहा क यह धमिनरपे ता क जीत है, तो कसी ने कहा क यह अमीर के िखलाफ आम आदमी का िव ोह है। कसी ने इसे आम जनता के मन म नेह -गांधी प रवार क िनरं तर पकड़ के प म भी प रभािषत कया। हालां क िव इितहास के ापक प र े य म मह वपूण ये नह था क लोग ने कस तरीके से मतदान कया था बि क मह वपूण यह था क उ ह ने फर से मतदान म िह सा िलया था। सन् 1952 से लेकर जब पहले चुनाव को, ”इितहास का सबसे बड़ा दाव“ कहा गया था, तभी से भारतीय लोकतं क कई ांजिलयां िलखी जा चुक ह। ऐसा बार-बार कहा गया क एक गरीब, िविवधता से भरपूर और बंटा आ देश ता कक प से लंबे समय तक वतं और िन प चुनाव नह करवा सकता। ले कन फर भी भारत ऐसा करवाने म कामयाब रहा। भारत के पहले आमचुनाव म सकल मतदान 46 फ सदी से भी कम रहा था। ले कन य - य साल बीतते गए मतदान का ितशत बढ़ता गया। साठ के दशक के बाद से हरे क पांच म से तीन भारतीय मतदाता ने मतदान म िह सा िलया। िवधानसभा चुनाव म तो मतदान का ितशत और भी यादा रहा। जब इन आंकड़ को अलग-अलग कया जाता है तो वे लोकतं क गहरी जड़ जमाने क तरफ इशारा करते ह। पहले आम चुनाव म चालीस फ सदी से भी कम मिहला मतदाता ने मतदान म िह सा िलया था ले कन 1998 तक यह सं या 60 फ सदी के करीब हो गई थी। इसके अलावा जैसे क सव ण ने दखाया क वे अब वतं तापूवक अपने मतािधकार का योग करने लगी थ । इसका मतलब यह था क उनके मतदान म उनके पित या िपता का भाव कम होता जा रहा था। इसके अलावा दिलत और आ दवािसय के मतदान का ितशत भी काफ बढ़ा था जो समाज म दिलत और हािशये के लोग थे। खासकर, उ र भारत म दिलत समुदाय के लोग ऊंची जाितय क तुलना म बढ़-चढ़कर मतदान म िह सा ले रहे थे। जैसा क राजनीितक िव ेषक योग यादव कहते ह क ”भारत आज क तारीख म शायद दुिनया का इकलौता लोकतं है जहां िनचली जाितय का मतदान म िह सा समृ वग से कह यादा है।“3 भारतीय का मतदान ेम आं देश-महारा क सीमा पर बसे कु छ गांव के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। दरअसल उन गांववाल को दोन रा य के शासन ारा मतदाता पहचान प दे दया गया और गांववाले भी दोन ही रा य के चुनाव म इसका इ तेमाल करने से नह चूके।4 यह िबहार के कसान के संदभ म भी उतने ही साफ तरीके से दखता है जहां लोग माओवा दय क धमक के बावजूद मतदान करने से िहचकते नह ह। चुनाव को माओवादी, बुजुआ वग के दखावे के तौर पर खा रज करते रहे ह और जो लोग राजनीितक दल के प म चार करते ह वे उसका मुंह काला कर देते ह। वे मतदाता को धमक देते ह क अगर उ ह ने मतदान करने क जुरत क तो उनके हाथ और पैर काट डाले जाएंग।े फर भी जैसा क क ीय िबहार म काम करने वाले एक मानवशा ी ने पाया क ”चुनाव बिह कार का कु ल िमलाकर मतदाता पर नग य भाव आ है“। इसके उलट ”िजन गांव म साल से माओवादी स य रहते थे वहां चुनाव का दन तो मानो योहार सरीखा हो जाता था। मिहलाएं रं ग-िबरं गे लाल-पीले प रधान म, बाल म तेल और ि लप लगाकर मतदान क क तरफ छोटे-छोटे समूह म जाती ह।“5 उसी तरह उ र-पूव रा य म जहां कई इलाक म भारतीय रा य क स ा नग य जैसी रहती है या िब कु ल ही नह रहती, वहां भी िव ोही संगठन गांव वाल को मतदान करने से रोक नह पाते। जैसा क चुनाव आयोग ने ं यपूवक कहा क ”देश क अखंडता को कायम रखने म चुनाव आयोग का एक छोटा सा योगदान ये है क इन इलाक का देश के साथ कम से कम एक दन के िलए यानी चुनाव के दन के िलए एक करण ज र हो जाता है।“6 भारत म चुनाव का कतना वदेशीकरण हो गया है यह इस बात से प रलि त होता है क इसक गहराई और प च ं ब त यादा हो गई है। भारतीय समाज के सभी चुनाव म िजस तरह जुनून, आनंद और उ साह दखता है वह इस बात क त दीक करता है। चुनावी काटू न का एक समृ अिभलेखागार अब उपल ध है िजसम संभािवत नेता ारा कए गए आसमानी वाद और उनके ारा कसी पाट के टकट को हािसल करने के िलए कए गए यास (हाथ-पैर मारे जाने) और अ य बात को िचि त कया गया है।7 हालां क कई अ य मौक पर यह हा य मजाक उड़ाने क बजाय भ ही होता है। उदाहरण के िलए भोपाल के व वसायी मोहनलाल का मामला लीिजए। उ ह ने पांच अलग-अलग धानमंि य के िखलाफ चुनाव लड़ा। अपने िसर पर एक लकड़ी का मुकुट और अपने ही ारा बनाई गई एक फू ल क माला पहनकर वह अपने चुनाव े म घूमा करते और लोग का दरवाजा खटखटाते। िबना कसी अपवाद के वह हरे क चुनाव म जमानत खोते रहे और इस तरह उ ह ने अपने वयंभू उपनाम धरतीपकड़ को च रताथ कर दया। धरतीपकड़ का मतलब था जो जमीन पर लेट सकता है और िवन है! मोहनलाल ने कहा क ”चुनाव लड़ने का उनका फै सला इस िवचार से े रत था क लोकतं पर सबका समान प से अिधकार है।“8 चुनाव येक ि को भारत का अिभ अंग होने का अहसास दलाता है ये बात गोआ के अनुभव से भी सािबत ई। जब सन् 1961 म गोआ म सै य कारवाई कर भारत म एक कृ त या फर से एक कृ त कर िलया गया तो पि मी ेस म इस बारे म काफ हो ह ला मचा था। ले कन जहां एक तरफ चार सौ साल के पुतगाली शासन म गोआवािसय को कभी भी अपना शासक चुनने क इजाजत नह दी गई वह नई द ली के शासन तले आने के महज कु छेक साल के भीतर ही उ ह इसक इजाजत दे दी गई। राजनीित िव ानी बिड ट एंडसन ने बड़े ही प प से भारत क गोआ नीित क इं डोनेिशया क ई ट ितमोर नीित से तुलना क है और दोन के बीच गजब का िवरोधाभास दखाया है। ई ट ितमोर भी एक दूसरा पुतगाली उपिनवेश था िजसे ”सश रा वा दय “ ने मु कराया थाः सन् 1960 म नेह ने िबना र क एक बूंद बहाए ए अपनी सेना को गोआ भेजा था। ले कन वह एक मानवीय वृि के और एक चुने ए लोकतांि क नेता थे। उ ह ने गोआवािसय को उनक अपनी वाय सरकार दान क और भारतीय राजनीित म भागीदारी के िलए ो सािहत कया। ले कन दूसरे मामल क तरह ही जनरल सुहात , नेह से िवपरीत ुव पर खड़े थे।9 मतदाता क िवशाल सं या को देखते ए ये आसानी से कहा जा सकता है क शायद भारतीय चुनाव म िजतने मतदाता ने मतदान म िह सा िलया है उतना कसी भी लोकतं म नह िलया है। इस संदभ म भारत क कामयाबी उस समय बेिमसाल दखती है जब इसक तुलना इसके महान पड़ोसी चीन से होती है। वह देश भारत से िवशाल है ले कन भारत क तुलना म धम और न ल के आधार पर कम बंटा आ है। इसके अलावा वहां गरीबी भी कम है। ले कन फर भी वहां आजतक एक भी चुनाव नह करवाया गया है। दूसरे मामल म भी चीन, भारत क तुलना म ब त कम खुला आ है। वहां सूचना के मु वाह पर कठोर तरीके से रोक लगी ई है। सन् 2006 म जब सच इं जन गूगल ने चीन म अपना काय शु कया तो उसे रा य क पाबं दय को मानने के िलए बा य होना पड़ा। यहां तक क लोग क आवाजाही भी रा य ारा िनयंि त क जाती है। अमूमन कसी को अपना आवास थान बदलना होता है तो इसके िलए रा य क इजाजत ज री होती है। दूसरी तरफ भारत म ेस िब कु ल आजाद है, वह कु छ भी छाप सकता है। लोग जो भी चाह बोल सकते ह और जहां चाहे रह सकते ह या देश के कसी भी िह से म या ा कर सकते ह। िव ान के बीच होने वाली बहस म भारत और चीन क तुलना ब त दन से हो रही है। ब त तेजी से जुड़ती जा रही दुिनया म यह आमजन के बीच होने वाली बहस का भी एक सव ापी मु ा हो गया है। इस तुलना म चीन भले ही आ थक प से बाजी मार ले जाए ले कन राजनीितक प से वह बहस हार जाता है। भारत के लोग अपने पड़ोस म लोकतं -शू यता क ि थित को उजागर करने म आनंद का कोई मौका नह छोड़ते। कई बार ऐसा परो प से कया जाता है तो कई बार ये आनंद सरे आम मनाया जाता है। सन् 2006 के व ड इकोनाॅिमक फोरम पर एक खास दशनी दखाने को कहा गया तो भारतीय िश मंडल अपने देश क इस खािसयत को रे खां कत करने से नह चूका। चाहे वह भाषण म हो या मु त प म या पच पर उ ह ने अपने देश को ”दुिनया के सबसे तेज र तार से िवकास करते लोकतं “ म शुमार कया। िजस चीज को लोकतं का ”हाडवेयर“ कहा जाता है, अगर उसक बात क जाए तो भारतीय क आ म शंसा वाकई सही लगती है। भारत के लोग अिभ ि और आवाजाही के वतं ता का भरपूर आनंद उठाते ह और उनके पास मतदान का अिधकार भी है। ले कन जब हम लोकतं के ”साॅ टवेयर“ क बात करते ह तो त वीर उतनी खुशनुमा नजर नह आती। भारत क यादातर राजनीितक पा टयां पा रवा रक जागीर बनकर रह गई ह। यादातर राजनेता ह और वे आपरािधक पृ भूिम से आते ह। बीते साल म लोकतं म मह वपूण भूिमका िनभाने वाले कई सं थान रण का िशकार ए ह। सही मायन म वतं मानिसकता के नौकरशाह क सं या म वाकई कमी आई है। साथ ही पूण प से िन प माने जाने वाले यायाधीश क सं या म भी कमी आई है। तो या हंद ु तान वाकई एक आदश लोकतं है या एक छ भर है? जब कभी यह सवाल सामने आता है तो म इसका जवाब हंदी फ म के महान हा य अिभनेता जाॅनी वाकर के कालजयी संवाद म खोजता ।ं एक फ म म जहां वह सह-अिभनेता क भूिमका म ह, वे हरे क सवाल का जवाब कु छ यूं देते ह - ”बाॅस फ टी- फ टी“! जब उनसे उसक ेिमका के साथ शादी करने या फर उनक इि छत नौकरी पाने का कया जाता है तो वह फर कहते ह - बाॅस संभावना तो इसक भी फ टी- फ टी है यानी पचास फ सदी कामयाबी क और पचास फ सदी नाकामयाबी क ! तो फर या भारत वाकई एक लोकतं है? इसका जवाब वह है - फ टी- फ टी! यह यादातर उस समय लोकतं होता है जब चुनाव करवाए जाते ह या अिभ ि और आवाजाही क वतं ता क बात आती है। ले कन यह उस समय लोकतं नह होता है जब राजनेता और राजनीितक सं था के सुचा प से काय करने क बात आती है। फर भी अगर भारत िसफ पचास फ सदी भी लोकतं है तो यह बात उसक परं परा , इितहास और इसके पारं प रक ान को देखते ए काफ लगती है। हक कत तो यह है क अपने अनुभव क सहायता से भारत अपने इितहास और उस पारं प रक ान का पुनलखन कर रहा है। इस संदभ म साल 2004 के चुनाव पर सुनील िखलनानी ने ये ट पणी क क यह चुनाव मानव इितहास म कह भी और कभी भी करवाया जाने वाला सबसे बड़ा लोकतांि क चुनाव है। प है क कोई 2500 साल पहले एथक पहाि़डय म जो लोकतं का िवचार पनपा था, उसने एक लंबी या ा तय कर ली है और आज इसम राजनीितक प रयोजना और अनुभव का एक ाकु ल दशन सामने दख रहा है। लोकतांि क िवचार के घुमंतू च र ने यह सुिनि त कर दया है क पि मी राजनीितक िवचार का इितहास िसफ उनके ही ऐितहािसक अनुभव के दायरे म सुसंगत तरीके से नह िलखे जा सकते।10 III आधुिनक भारत के इितहास ने पि मी अनुभव के आधार पर बने लोकतांि क िस ांत को संशोिधत कर दया है। इतना ही नह इसने पि मी अनुभव से िनकलने वाले रा वाद के िवचार का भी खुलेआम ितरोध कया है। इस िवषय पर अपने जीवन भर के अनुभव को समेटते ए िलखे गए एक लेख म आईजेया ब लन इस बात क पहचान करते ह क ” कसी समाज क जातीय चेतना या कम से कम इसके आ याि मक नेता के मन पर लगे घाव“ उस देश म रा वादी भावना के ज म के िलए ”आव यक“ प रि थित मुहय ै ा करवाते हं◌।ै इस िवचार को एक राजनैितक आंदोलन म फलीभूत होने के िलए ”एक और प रि थित“ क आव यकता होती है। वह प रि थित ये है क उस खास समाज के ”कु छ सबसे यादा संवेदनशील लोग के दमाग म एक रा क अवधारणा ज र होनी चािहए। भले ही वह अवधारणा एक छोटे से ुण के प म ही य न हो, वह कु छ ए यब करने वाले कारक मसलन भाषा, न लीय उ पि या एक साझा इितहास (का पिनक या वा तिवक) से संचािलत होने चािहए।“ उसी लेख म बाद म ब लन 19व और 20व सदी क शु आत म ”आ यजनक प से यूरोप क त“ राजनीितक चंतन पर ट पणी करते ह ”िजसम एिशया और अ का के लोग या तो जा के तौर पर देखे जाते ह या फर यूरोपीय लोग ारा सताए गए ि य के तौर पर। शायद ही कभी उ ह उनके वाभािवक प म ऐसे लोग क तरह देखा जाता है िजनका अपना इितहास रहा हो या िजनक अपनी एक अलग सं कृ ित रही हो। उ ह उनके अतीत, वतमान और भिव य के साथ देखा ही नह जाता और उ ह उनके वा तिवक च र या प रि थितय के िहसाब से देखा ही नह जाता।“11 पि मी दुिनया म ए हरे क कामयाब रा वादी आंदोलन के पीछे एक खास एक वकारी कारक मौजूद रहा है। एक ऐसा धागा जो उसके सद य को बांधकर रखता था चाहे वो एक साझी भाषा हो, साझा धा मक िव ास हो, साझी जमीन हो या साझा दु मन हो। कभी-कभी ये सारे कारक एकसाथ भी मौजूद रहते थे। इस तरह ि टश रा वैसे लोग से बना था जो उस ठं डे ीप पर एक साथ रहते थे, जो यादातर ोटे टट थे और जो ांस को पसंद नह करते थे। जब क ांस के संदभ म रा वादी कारक के प म यह उनक भाषा थी जो धम के साथ जुड़ी ई थी। अमे रका के संदभ म एक साझी भाषा, अिधकांशतः एक साझा मू य और उसके साथ उसका सा ा यवादी देश के ित श ुता का भाव था जो उसक रा वाद का मुख आधार था। जहां तक छोटे-छोटे पूव यूरोपीय देश जैसे पोलड, चेक गणरा य, िलथुआिनया आ द म रा ीयता का है, तो उनक आबादी एक साझी भाषा के ारा जुड़ी ई है, अिधकांशतः वे एक ही िव ास प ित को मानते आए ह और उनका अपने जमन और सी शोषक के वच व का एक कटु इितहास रहा है।12 देखा जाए तो इन उदाहरण (और कु छ अ य उदाहरण के ) के उलट भारतीय रा म कसी एक भाषा या कसी एक धा मक िव ास का वच व नह है। य िप भारत के यादातर नाग रक हंद ू ह ले कन भारत एक ” हंद“ू रा नह है। इसका संिवधान लोग के बीच आ था के आधार पर भेदभाव नह करता। उससे भी मह वपूण बात यह है क यहां कोई भी रा वादी आंदोलन उस आधार पर नह पनपा। जैसा क मुकुल के सवन ने िव ेषण कया है क भारतीय रा ीय कां ेस अपनी उ पि के समय से ही एक तरह से िमथक य ”नूह क नाव“ (िमथक म व णत आ दपु ष नूह क नाव िजसने लय के व सभी को शरण दी थी।) जैसी रही है िजसने हरे क भारतीय के िलए अपने दरवाजे खोल रखे ह।13 गांधी का राजनीितक काय म भारत के दो मुख धा मक समुदाय हंद ु और मसुलमान के आपसी सहयोग और सम वय पर आधा रत था। हालां क आिखरकार उनके काय और उनके उदाहरण मु क के बंटवारे को नह रोक सके ले कन उनक नाकामयाबी ने उनके उ रािधका रय के इस िन य को और भी दृढ़ कर दया क मु क को एक से युलर गणरा य बनाना है। जवाहरलाल नेह और उनके सहयोिगय के िलए हंद ु तान कु छ भी हो सकता था ले कन यह एक ” हंद ू पा क तान“ नह हो सकता था। भारतीय लोकतं क तरह ही भारतीय धमिनरपे ता एक ऐसा िवषय है जो कामयाबी और नाकामयाबी क एक िमलीजुली कहानी है। कसी का अ पसं यक धा मक समूह का होना कारोबार या कसी पेशे क तर क राह म कोई बाधा नह है। भारत का सबसे अमीर उ ोगपित एक मुसलमान है। कु छ सबसे यादा मश र फ मी िसतारे मुसलमान है्। सन् 2007 म देश के रा पित पद पर एक मुसलमान, धानमं ी पद पर एक िसख और स ाधारी पाट के नेता के तौर पर इटली म ज मी एक कै थोिलक मिहला पदासीन है। देश के ब त सारे मुख वक ल और डाॅ टर ईसाई और पारसी ह। ले कन दूसरी तरफ समय-समय पर होने वाले धा मक दंग का भी दुखद इितहास रहा है। इनम से कु छ सबसे वीभ स दंग म (जैसा क द ली म सन् 1984 म और गुजरात म सन् 2002 म आ) अ पसं यक ने जीवन और संपि क भारी ित उठाई है। ले कन फर भी यादातर अ पसं यक देश के लोकतांि क और से युलर आदश म अपना यक न रखते आए ह। ब त ही कम सं या म भारतीय मुसलमान आतंकवादी या क रपंथी संगठन म शािमल ए ह। अपने देश के अ य िनवािसय क तुलना म मुसलमान इस बात म यादा यक न रखते ह क उनके िवचार और उनके मत का अपना मह व है। एक हािलया सव ण बताता है क सभी वग के भारतीय म जहां िसफ 69 फ सदी लोकतांि क आदश म यक न रखते ह वह मुसलमान म ऐसा मानने वाल क सं या 72 फ सदी है। और चुनाव म मतदान के समय मुसलमान क भागीदारी पहले से यादा ई है।14 एक गरीब समाज म लोकतंि क णाली का िनमाण करना हमेशा से एक क ठन काय रहा है। दूसरी तरफ एक बंटे ए देश म से युल र म को प लिवत करना और भी क ठन काम था। भारत क सरहद पर एक इ लािमक रा य का िनमाण तो उन हंद ु के िलए एक उकसावा ही था जो खुद ही अपनी आ था को रा य के साथ िवलय कर देना चाहते थे। एक नाग रक से यादा एक इितहासकार के प म मेरा अपना िवचार यह है क जब तक पा क तान अि त व म है भारत म हंद ू क रपंथ अि त व म रहेगा। ि थरता के दौर म या एक मजबूत राजनीितक नेतृ व के दौर म ऐसी ताकत हािशए पर रहगी या सुर ा मक रहगी। ले कन प रवतन क घड़ी म या राजनैितक नेतृ व के अिन य क हालत म ये ताकत भावशाली और मुखर हो जाएंगी। भारतीय गणरा य म धम क ब लता इसके आधारभूत ढांच म एक मुख तंभ रहा है। एक दूसरा तंभ था गणरा य का ब भाषी च र होना। यहां फर से इसका उ े य और इसका यास आजादी से पहले से कया जा रहा था। सन् बीस के दशक म गांधी ने ांतीय कां ेस कमे टय का भाषा के आधार पर पुनगठन कया था। पाट ने वादा कया था क आजादी िमलते ही भाषायी आधार पर ांत का पुनगठन कया जाएगा। हालां क सन् 1947 म आजादी िमलने के तुरंत बाद उस वादे को पूरा नह कया जा सका य क पा क तान के िनमाण ने देश के बा कनीकरण (खंड-खंड हो जाने) का खतरा पेश कर दया था। हालां क भाषायी रा य के गठन के िलए हो रहे लोकि य आंदोलन को देखते ए सरकार इस मांग को मानने के िलए ज र मजबूर हो गई। देश म भाषायी रा य को वजूद म आए पचास साल से ऊपर हो चुके ह। इस अविध म उ ह ने भारतीय एकता को और गहरा और मजबूत ही कया है। हरे क रा य म एक साझी भाषा ने शासिनक एकता और स मता का आधार िन मत कया है। इसके अलावा इसने सां कृ ितक सृजना मकता जैसे फ म, नाटक, उप यास और किवता के हजार फू ल भी िखलाएं ह। बावजूद इसके कसी का अपनी भाषा के ित ेम क वजह से उसका एक ापक रा ीय पहचान के साथ शायद ही कभी टकराव आ हो। भारत म ए तीन मुख अलगाववादी आंदोलन जैसे नागालड (पचास के दशक म), पंजाब (अ सी के दशक म) और क मीर (न बे के दशक म) अपने धा मक और े ीय अलगाव के साथ मुखर रहे ह न क भाषा के । जब क देश के शेष भाग के िलए यह एक िब कु ल संभव बि क आदश रहा है क एक ही साथ क ड़, मलयाली, आं , तिमल, बंगाली, उि़डया, गुजराती और यक नन हंदी भाषी भी रहा जाए और साथ ही भारतीय भी। ये बात क भारत म एकता और ब लता एक दूसरे से अिवभा य ह वह देश क मु ा ारा सिच प से अिभ होती है। पए के एक तरफ रा िपता महा मा गांधी क त वीर होती है जब क दूसरी तरफ संसद भवन का िच होता है। पए का िच यानी 5, 10, 50, 100 इ या द हंदी और अं ेजी के श द म छपे होते ह (जो दो आिधका रक भाषाएं ह)। वे छोटे-छोटे आकार म संघ क दूसरी भाषा म भी छपे होते ह। इस तरह से भारतीय पए पर 17 तरह क अलग-अलग िलिपय का ितिनिध व होता है। हरे क भाषा और हरे क िलिप के साथ एक िविश सं कृ ित और एक े ीय अिभ ि सामने आती है जो एक एक कृ त भारत क प रक पना के साथ-साथ वजूद म रहती है। कु छ पि मी े क अमूमन अमे रक े क क राय थी क इस तरह से भाषा का घालमेल भारत के िलए अिहतकारी होगा। उनके अपने देश के अनुभव के आधार पर जहां सारे अ वािसय के िलए अं ेजी भाषा सबको बांधकर रखने वाली ताकत थी, उ ह ने सोचा क एक इकलौती भाषा चाहे वो हंदी हो या अं ेजी-सम भारतवािसय के ारा बोली जानी चािहए। उनक राय म भाषायी सूब का गठन एक भारी गलती थी। इस तरह सन् 1970 म छपी अपनी कताब म अपने कायकाल के अंत म भारत म वाॅ शंगटन पो ट के ितिनिध बनाड नाॅिसटर ने िनराशापूण तरीके से िलखा क ”यह एक म का देश है िजसक कोई एक आवाज नह है“। उसने आगे िलखा क भाषायी ांत का गठन ”रा य को एक दूसरे से बांटकर रख देगा और फर वह देश म िवखंडन क वृि “ को बढ़ावा देगा। नाॅिसटर ने िलखा क ”अपने ज म के समय से ही भारतीय रा पहचान और अलगवादी वृि य से जूझ रहा है और यह िनरं तर भाषायी म को बढ़ावा ही देगा और भारतीय रा य क एकता पर सवािलया िनशान लगा देगा“।15 एक रा -रा य को अि त व म रहने के िलए आव यक प से एक साझी भाषा को अपनाना होगा यह िवचार सोिवयत तानाशाह जोसेफ टािलन का भी था िजस पर वे और अमे रक उदारवादी एकमत थे। टािलन ने जोर दया क ”एक सामा य भाषा के िबना एक रा ीय समुदाय का अि त व म होना असंभव है“ और कहा क ”ऐसा कोई भी देश नह है जो एक समय कई भाषा म बोलता हो“।16 इस िव ास का आधार सोिवयत संघ क वह भाषा नीित थी िजसके मुतािबक सी भाषा सीखने को अिनवाय कर दया गया था। जैसा क टािलन ने खुद ही कहा क ” यास ये था क ये सुिनि त कया जा सके क सोिवयत संघ के सभी नाग रक कमोवेश एक ही भाषा म अिभ ि कर... और जािहरन वो भाषा सी थी“।17 बनाड नाॅिसटर क तरह ही टािलन भी भारतीय रा -रा य के भिव य को लेकर चंितत थे जो भाषायी िविवधता क नीित को बढ़ावा दे रहा था। जब क हक कत ये थी क इसका उ टा ही आ। भाषायी िविवधता क नीित को जारी रखने से भारत म घरे लू अलगाववाद क वृि कमजोर पड़ गई। इसे समझने के िलए भारत के पड़ोसी देश के साथ इसक तुलना मददगार हो सकती है। सन् 1956 म जब भारत म भाषायी आधार पर ांत का गठन कया जा रहा था, उसी साल ीलंका क संसद ने संहला भाषा को वहां क एकमा आिधका रक भाषा के तौर पर मा यता दे दी। उ े य ये था क संहला को देश के सभी कू ल , काॅलेज , सावजिनक ितयोगी परी ा और अदालत म कामकाज क भाषा बना दया जाए। ले कन इससे सबसे यादा आहत तिमल-भाषी अ पसं यक थे जो देश के उ र-पूव िह से म रहते थे और उनक भावनाएं उनके ितिनिधय ारा ीलंका क संसद म जोरदार ढंग से भी ई। एक तिमल सांसद ने कहा क ”जब आप हम हमारी भाषा से वंिचत करते ह तो आप हम हर चीज से वंिचत कर देते ह।“ दूसरे सांसद ने कहा, ”आप एक बंटे ए ीलंका क उ मीद कर रहे ह। आप ड रए मत, म आपको भरोसा दलाता ं क आप एक बंटा आ ीलंका ही पाएंगे।“ ीलंकाई संसद के वामपंथी सद य, जो खुद ही संहला भाषी थे, ने भिव यवाणी क क ”अगर सरकार ने अपना इरादा नह बदला और इस िवधेयक को पा रत होने से नह रोका तो इस छोटे से एक कृ त देश म दो खून से लथपथ देश पैदा हो जाएंगे“।18 और ये संयोग नह था क ऐसा कु छ ही दन म हो भी गया। सन् 1971 म एक बड़ा देश दो टु कड़ म बंटकर दो देश बन गया। दि ण एिशया म दो मंझोले आकार के देश का ज म हो गया। ले कन िजस देश का िवभाजन आ था वह ीलंका नह बि क पा क तान था। ले कन वजह हक कत म भाषा ही थी। य क उसी तरह से पा क तान के सं थापक ने सोचा था क उनके देश म एक ही धम और एक ही भाषा होनी चािहए। पूव पा क तान क राजधानी ढाका म दए गए अपने पहले भाषण म मोह मद अली िज ा ने अपने ोता को इस बात के िलए चेताया था क आज न कल उ ह उदू को वीकार करना ही होगा। िज ा ने अपने बंगाली ोता से कहा था क ”वे उ ह प प से कह देना चाहते ह क पा क तान क राजभाषा उदू होने वाली है और कोई भाषा नह । जो कोई भी उ ह गुमराह करने क कोिशश कर रहा है वे पा क तान के दु मन ह। कसी एक राजभाषा के अभाव म कोई भी रा य मजबूती से एक नह रह सकता और सुचा प से काम नह कर सकता।“19 पचास के दशक म जब पा क तानी सरकार ने आंदोलनकारी छा पर उदू भाषा जबरन थोपनी चाही तो हंसक दंगे भड़क उठे । भाषा के आधार पर भेदभाव क भावना उनम पहले से ही थी और आिखरकार उसक प रणित एक वतं बंगलादेश रा के िनमाण के प म सामने आई। पा क तान का ज म धम के आधार पर आ था ले कन उसका बंटवारा भाषा के आधार पर आ। दूसरी तरफ दो दशक से भी यादा समय से एक र रं िजत गृहयु ीलंका म जारी है। उसम लड़ने वाले आंिशक प से े और आ था के आधार पर लड़ रहे ह ले कन उनम लड़ाई क मु य वजह भाषा ही है। इन सभी उदाहरण से एक ही सबक सीखा जा सकता है और वो ये क जहां कह भी ”एक भाषा थोपने क कोिशश क जाएगी वहां दो रा का ज म हो जाएगा“। अगर हंदी को पूरे भारत पर थोपने क कोिशश क जाती तो उसका सबक कु छ इस तरह होता - ”एक भाषा और भारत का बीस टु कड़ म िवखंडन“। ये त य क भारत के लोग कई भाषाएं बोलते ह और कई धम को मानते ह, इसने पि म के कु छ अकादिमक और वतं े क क िनगाह म भारत को एक अ वाभािवक रा बना दया। सचाई तो यह है क ब त सारे भारतीय भी ऐसा ही सोचते ह। उसी तरह से यूरोपीय अनुभव के आधार पर उ ह ने सोचा क आजाद भारत को अि त व म बने रहने और उसे तर करने के िलए कसी न कसी बंधन या ब त सारे बंधन क ज रत है िजसके नीचे यहां क िविवधता को ढक दया जाए। जैसा क यूरोप म आ वो मजबूत धागा धम या भाषा या दोन ही हो सकते थे। इसी तरह का रा वाद एक जमाने म जनसंघ के ारा चा रत कया जा रहा था और अब उसे और भी महीन तरीके से बीजेपी के ारा चा रत- सा रत कया जा रहा है। इसका एक िसरा गहरे अतीत तक चला जाता है जो हंद ु के िलए एक साझी ”आय िवरासत“ (हालां क ये बात एक िमथक ही ह) क खोज करता है और आ ांता ारा ( यादातर मुि लम आ ांता) उनके सामूिहक शोषण क कहानी ढ़ूंढ़ता है िजसका कह कह राणा ताप और िशवाजी जैसे कु छ हंद ू सरदार ारा ितरोध भी कया गया था। मूल जनसंघ का एक लोकि य नारा था - ” हंदी, हंद,ू हंद ु तानी“। यास यह था क सभी देशवािसय पर एक ही भाषा थोपकर या उ ह ऐसा करने के िलए राजी कर और एक ही तरह के ई र क आराधना करने को कहकर भारतीय रा वाद को यादा से यादा वाभािवक बनाया जाए। ले कन समय के साथ एक ही भाषा लागू करने के यास को छोड़ दया गया। ले कन ब सं यक समाज क इ छा को थोपने क भावना बनी रही। इसका प रणाम यह आ, जैसा क हमने इस पु तक म देखा है, क देश म ापक संघष ए, हंसा ई, दंगे ए और मौत । खासकर 2002 म ए गुजरात दंग के बाद से िजसे क ीय सरकार ने नजरअंदाज कया या एक हद तक उसके िलए अपनी सहमित दान कर दी, फर से एक बार धमिनरपे और लोकतांि क भारत के बारे म आशंकाएं जताई जाने लग । इस तरह अपने िव िव ालय के िलए मश र शहर अलीगढ़ म दए अपने भाषण म लेिखका अ ं धती राॅय ने बीजेपी शासन क ”फासीवादी“ शासन तक से तुलना कर दी। वा तव म उ ह ने नई द ली क सरकार क कारवाइय क ा या करते ए महज एक पैरा ाफ म यारह बार ”फासीवाद“ श द का योग कया।20 यहां एक बार फर से भारतीय घटनाएं और भारत के अनुभव के संदभ को यूरोपीय इितहास से उधार लेकर लापरवाही पूवक िव ेिषत कया जा रहा था। बीजेपी को ”फासीवादी“ कहने का मतलब था क इटली और जमनी के मूल फासीवा दय के गंभीर और बबरतापूण अपराध को कम करके आंकना। यह एक त य है क बीजेपी के ब त सारे नेता कई मामल म आरोपी ह ले कन पूरी पाट को फासीवादी कहना एक तो बीजेपी क ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने जैसा है और दूसरी भारतीय जनता के लोकतांि क परं परा को कम करके आंकने जैसा भी है। रे खां कत करने वाली बात यह भी है क बीजेपी अब खुलकर भाषायी ब लता को बढ़ावा दे रही है। अब इसके नेता िसफ हंदी प ी से ही नह आते बि क इसने अपना भाव दि णी रा य म भी बढ़ा िलया है। और कम से कम यह पाट धा मक ब लता को ऊपरी तौर पर समथन देने के िलए ज र बा य है। पाट के एक महासिचव मुि लम समुदाय से है। इसे अगर तीका मक ितिनिध व भी मान िलया जाए तो वे और उनक पाट िजस िवचारधारा को बढ़ावा देती ह उसे वे ”सकारा मक धमिनरपे ता“ कहते ह। यहां पर जो बात रे खां कत करने लायक है वो ये क पाट ारा एक क रपंथी नीित पर नरम रवैया अपनाया गया है। वो नरम रवैया ये है क भले ही बंद कमरे म बीजेपी के कु छ नेता एक हंद ू रा क आकां ा पालते ह ले कन जनता के बीच इस मु े को ा बनाने के िलए वे भारतीय संिवधान के से युलर आदश को मानना ज री समझने लगे ह। अंत म अपने तमाम यास के बावजूद बीजेपी भारतीय राजनीित के लोकतांि क ढांचे को छेड़ने म कामयाब नह हो पाई। इसका उदाहरण ये था क अ ं धती राॅय के भाषण को महीने भर भी नह बीते थे क बीजेपी चुनाव हार गई और उसे स ा से हाथ धोना पड़ा। इसके नेता स ा से बाहर हो गए और उ ह ने िवजेता को स ा स प दी। या दुिनया क कसी फासीवादी सरकार ने कभी इतने आराम से स ा का ह तांतरण कया है? एक तानाशाही वृि क नेता ारा करवाया गया सन् 1977 का चुनाव और लोकतांि क कया के ित लापरवाह एक राजनीितक दल ारा करवाया गया सन् 2004 का आमचुनाव इस बात का सबूत है क हंद ु तान क सरजमीन म लोकतं क जडं◌़े कतनी गहरी हो गई है। इस संदभ म देख तो देश सौभा यशाली था क उसके सं थापक ने संिवधान का िनमाण करते व काफ साहस से काम िलया था और वे तब तक जीिवत भी रहे जबतक क उ ह ने उस काम को एक अंजाम तक नह प चा दया। ब त कम देश के पास जवाहरलाल नेह , व लभभाई पटेल और भीमराव अंबेडकर जैसी िन ा और थािपत ितभा वाले नेता ए ह जो एक साथ िमलकर काम भी कर रहे थे और पया समय तक जीिवत भी रहे। आजादी िमलने के कु छ ही साल के बाद पटेल क मृ यु हो गई और अंबेडकर ने अपने पद से इ तीफा दे दया। ले कन उस समय तक एक ने सफलतापूवक देश का राजनीितक एक करण देख िलया था तो दूसरे ने लोकतांि क संिवधान का िनमाण। िसफ नेह जीिवत रहे ले कन उ ह ने कु छ लाजवाब नेता को अपने साथ बनाए रखा। उदाहरण के िलए कु छ तो उनक ही पाट के नेता थे जैसे मोरारजी देसाई और के . कामराज तो कु छ िवप के क ावर नेता थे जैसे जे.बी. कृ पलानी और सी. राजगोपालचारी। जवाहरलाल नेह तीन बार धानमं ी पद पर रहे। यह संयोग दि ण एिशया म उनसे तुलना के लायक उनके कसी समकालीन को नसीब नह आ। उदाहरण के िलए बमा से अं ेज के िवदा होने क पूव सं या पर ही आंग सांग क ह या कर दी गई तो दूसरी तरफ पा क तान के आजाद होने के कु छ ही दन बाद िज ा क मृ यु हो गई। बंगलादेश क आजादी के कु छ ही साल के भीतर शेख मुजीब क ह या कर दी गई तो नेपाल के लोकतांि क नेता बी.पी. कोईराला को धानमं ी बनने के साल भर के भीतर ही बखा त कर दया गया। उ ह नेपाली राजशाही ने बखा त कर दया और जेल म डाल दया। इस बात का अब महज अंदाज ही लगाया जा सकता है क अगर नेह क तरह ही वे लोग भी लंबे समय तक स ा म रहते तो या करते या उनके साथ भी नेह क तरह ही बुि मान और दूरदश सहयोगी होते तो वे या कर पाते।21 हां, ये सही है क भारत के राजनीितक शासकवग क गुणव ा म तेजी से और चंताजनक प से िगरावट आई है। सन् 2003 म छपी एक कताब म राजनीितक िस ांतकार तापभानु मेहता ने िनराशा कट करते ए िलखा क ” कस तरह भारत के राजनीितक वग म ाचार, औसत कािबिलयत, अनुशासनहीनता, घूसखोरी और अनैितकता ा हो गई है“। मेहता ने आगे िलखा क ”भारतीय रा यतं म वैध और अवैध, व था और अराजकता और रा य और अपरािधकता के बीच क रे खा दन ब दन कमजोर होती जा रही है“।22 हालां क ऐसा नह है क जवाहरलाल नेह और इं दरा गांधी के बीच या फर अंबेडकर और मुलायम संह यादव के बीच जो नैितक और बौि क अंतर है वो अ ाहम लंकन और जाॅज ड यू बुश के बीच के फक से यादा है। दरअसल, यह शायद लोकतं के वभाव म है क दूरदश नेता कभी-कभार ही पैदा होते ह और एक बार जब वे चीज को वि थत करके चले जाते ह तो औसत दज के नेता भी उसे कसी तरह संचािलत कर लेते ह! भारत के मामले म व था का वह छोटा सा पौधा देश के सं थापक िपतृपु ष ारा रोपा गया था जो उसके वय क होने तक सौभा य से जीिवत भी रहे (और उसे मजबूत बनाने म वाकई कड़ी मेहनत क )। जो लोग उनके बाद आए उ ह ने भले ही लोकतं के उस पेड़ िहलाने और कमजोर करने क कोिशश क ले कन वे उसे जड़ से उखाड़ नह पाए या बबाद नह कर पाए। IV भारतीय रा ीयता एक साझी भाषा, साझा धम या न लीय पहचान पर आधा रत नह थी। शायद कु छ लोग यहां यूरोपीय सा ा यवाद के प म एक साझा दु मन क तरफ ज र इशारा कर सकते ह। ले कन सम या तब आती है जब हम भारत के आजादी क लड़ाई म यु तौर-तरीक पर िवचार करते ह। इितहासकार माइकल हाॅवड दावा करते ह क ”सही मायन म कोई भी रा ... यु के िबना ज म नह ले सकता... िव पटल पर कोई भी जाग क समुदाय अपने आपको कसी सश संघष या उसके खतरे के िबना वतं प से थािपत नह कर सकता“।23 यहां फर से भारत एक अपवाद के प म सामने आता है। ये सही है क ि टश शासन के िखलाफ ए आंदोलन ने सबसे पहले उपमहा ीप के िविभ इलाक के ी-पु ष को एक सामा य और साझे उ े य के िलए े रत कया। हालां क उनका (समय के साथ कामयाब) आजादी का आंदोलन हंसक आंदोलन नह बन सका बि क यह मु य प से अ हंसक ही रहा। िव पटल पर भारत िबना कसी सश संघष या उसक आशंका के एक वतं रा तौर पर उभरकर सामने आया। गांधी और उनके सहयोिगय को कसी सश संघष क बजाय आजादी क लड़ाई के दौरान उनके ारा कए गए शांितपूण आंदोलन के िलए काफ शंसा िमली। हालां क उनक इस बात के िलए भी तारीफ क जानी चािहए क अं ेज के चले जाने के बाद भी उ ह ने उन सा ा यवादी िवरासत को सहेजकर रखा जो नवजात रा के िलए फायदेमंद हो सकते थे। सा ा यवा दय क इस बात के िलए अ सर आलोचना क जाती थी क वे एक तरफ तो अपने देश म लोकतं को बढ़ावा दे रहे थे दूसरी तरफ उपिनवेश को इससे वंिचत कर रहे थे। आिखरकार जब अं ेज ने भारत छोड़ दया तो ऐसी उ मीद क गई क भारत के लोग महानगरीय परं परा , संसदीय व था और सरकार क कै िबनट णाली को बरकरार रखगे ले कन उससे भी ता ुब क बात ये थी क भारत ने सबसे मुख सा ा यवादी परं परा नौकरशाही को भी बरकरार रखा। ि टश भारत म सरकार म सबसे मह वपूण लोग भारतीय िसिवल सेवा (आईसीएस) के सद य थे। वे देश के अंद नी िह स म शांित व था बहाल करते थे और कर वसूलते थे जब क सिचवालय म वे नीित िनमाण के काम म मदद करते थे और सरकारी तं को सुचा बनाए रखते थे। कु छ अपवाद को छोड़कर उनम से यादातर लोग यो य और िन ावान होते थे।24 आईसीएस म अं ेज क ब सं या थी ले कन उनम भारतीय अिधकारी भी अ छी-खासी सं या म थे। जब देश को आजादी हािसल हो गई तो नई सरकार को तय करना था क भारतीय नौकरशाही का या कया जाए। िजन रा वादी नेता ने जेल काटी थी उनका कहना था क इन अिधका रय को बखा त कर दया जाए या उ ह उनका उिचत थान दखा दया जाए। ले कन गृहमं ी व लभभाई पटेल क राय अलग थी। उनका मानना था क इन अिधका रय को िमलने वाली सुिवधाएं और उनको िमलने वाला वेतन बरकरार रखा जाए और उ ह बड़े ओहद पर बहाल कया जाना चािहए। इस िवषय पर अ टू बर 1949 म संिवधान सभा म एक गमागम बहस भी ई। सभा के कु छ सद य ने िशकायत क क आईसीएस अिधका रय म अभी भी ”शासक वग क मानिसकता ा “ है। उ ह ने अपने तौर-तरीके नह बदले ह, न ही ”नई प रि थितय के िहसाब से अपने आपको ढालने क कोिशश क है“। एक दूसरे रा वादी नेता ने कहा क ”आईसीएस अिधकारी ये महसूस ही नह करते क वे इसी देश के अिभ अंग ह।“ इन आईसीएस अिधका रय ने कई बार खुद व लभभाई पटेल को भी जेल भेजा था। बावजूद इसके उनके मन म इन अिधका रय के ित शंसाभाव ही पैदा आ। वे जानते थे क इन अिधका रय के िबना ि टेन का इतना बड़ा सा ा य संभव ही नह हो पाता। वे समझ गए थे क एक आधुिनक वतं रा रा य के ज टल ढांचे को इस तरह के अिधका रय क स त आव यकता है। जैसा क उ ह ने संिवधान सभा के सद य को याद दलाया क नए संिवधान को ”ऐसी सेवा के तं के बदौलत ही चलाया जा सकता है जो पूरे देश को एक रख सके “। उ ह ने आईसीएस अिधका रय क यो यता क तारीफ क साथ ही उनके सेवाभाव क भी सराहना क । जैसा क पटेल ने कहा क ”इन अिधका रय ने त कालीन सरकार और बाद म मौजूदा सरकार क बड़ी यो यतापूवक और बड़ी िन ा के साथ सेवा क है“। पटेल प तौर पर मानते थे क ”ये लोग रा ीय एकता के भावशाली उपकरण ह। अगर उ ह हटा दया गया तो म पूरे देश म िसवाय अराजकता के कु छ नह देख रहा।“25 आजादी के बाद के उन कु छ भयानक प से क ठन साल म इन आईसीएस अिधका रय ने पटेल क उनम जािहर क गई आ था को सही सािबत करके दखाया। उ ह ने रजवाड़ का देश म िवलय करवाकर देश के एक करण, शरणा थय के पुनवास और पहले आमचुनाव क योजना और उसके संचालन का दु ह काम करके दखा दया। दूसरे जो काम उनको स पे गए वे यादा उबाऊ ले कन दूरगामी असर वाले थे। वे काम थे िजल म कानून- व था बहाल करना, सिचवालय म मंि य के साथ काम करना और अकाल राहत क देखरे ख करना। सन् 1950 म पटेल ने आईसीएस णाली पर ही आधा रत एक नई सेवा आईएएस यानी भारतीय शासिनक सेवा का उ ाटन कया। इसका नाम सा ा यवादी अनुभव क वजह से थोड़ा बदल दया गया। सन् 2007 म भारत सरकार के अधीन करीब 5000 आईएएस काम कर रहे ह। ि टश शासनकाल के दन क तरह ही आईएएस को मदद देने के िलए अ य दूसरी ”अिखल भारतीय सेवाएं“ मसलन पुिलस, वन, राज व और क टम सेवाएं भी ह। इन अिधका रय को कसी खास रा य म काम करने के िलए भेजा जाता ह जहां वे अपने कायकाल का कम से कम आधा समय तीत करते ह। फर वे आधा कायकाल क क सेवा म पूरा करते ह। कर वसूली और कानून व था के इं तजाम जैसे पुराने काय के साथ उ ह कई अ य िज मेदा रयां भी स प दी गई ह। उनम से एक काम चुनाव करवाना और िवकास काय क देखरे ख करना भी है। अपने पूरे कायकाल के दौरान एक औसत आईएएस भी कम से कम अलग-अलग और िविवध िवषय का ऊपरी ान तो हािसल कर ही लेता ह। वह अपराध िव ान, संचाई बंधन, मृदा व जल बंधन और ाथिमक वा य सेवा का ान हािसल कर लेता है। आईएएस अपने पूववत आईसीएस क तरह ही एक ”सं ांत“ कै डर है। इस ऊंची नौकरशाही म वेश पाने के िलए क ठन ित पधा होती है। सन् 1996 म इस परी ा म 120,712 उ मीदवार बैठे थे िजसम से महज 738 को अंितम प से चुना गया। उनक यो यता और ितभा वाकई काफ ऊंची होती है। हालां क उनम अब ाचार के बढ़ते मामल क भी िशकायत आने लगी है साथ ही ब त आसानी से वे अपने राजनीितक आका के सामने झुकने लगे ह। हालां क ये सच है क अगर शायद आईएएस को एक झटके म ख म कर दया जाए तो देश म अराजकता नह आ जाएगी ले कन ये भी सच है आईएएस आॅ फसर ने देश क एकता को कायम रखने म ब त बड़ी भूिमका अदा क है।26 संकट क घड़ी म वे चुनौती के सामने डटकर खड़े हो जाते ह। उदाहरण के िलए सन् 2004 म सूनामी के बाद तिमलनाडु के आईएएस आॅ फसर को राहत और पुनवास काय के िलए काफ सराहना िमली। एक आईसीएस आॅ फसर सुकमार सेन ने ही भारत म पहले आमचुनाव करवाने क आधारिशला रखी थी और तब से आईएएस अिधकारी ही उस तं को लगातार चला रहे ह। रा य के मु य चुनाव अिधकारी इसी सेवा से िलए जाते ह। िजल म किन अिधकारी चुनाव क देखरे ख करते ह। म यम तर के अिधकारी चुनाव म पयवे क का काम करते ह जो चुनाव या के उ लंघन क रपोट आयोग को देते ह। अमूमन िसिवल सेवा के अिधकारी रा य और जनता के बीच पुल का काम करते ह। अपने काम के दौरान ये शासक जीवन के सभी े के हजार लोग से िमलते ह। एक लोकतं म रहते और काम करते ए वे इस बात के िलए बा य होते ह क लोग या सोचते ह और उनक या मांग है। उस िहसाब से देख तो शायद उनका वतमान काय उनके पूववत आईसीएस अिधका रय से यादा क ठन है। एक दूसरी सा ा यवादी सं था िजसने उतनी ही मह वपूण भूिमका अदा क है वो भारतीय सेना है। हालां क इसक ित ा को सन् 1962 म ए भारत-चीन यु के समय गहरा ध ा लगा था, ले कन इसने पा क तान के साथ ई कई लड़ाइय म अपनी खोई ित ा हािसल कर ली है। ीलंका म तिमल िव ोिहय के ित िमली नाकामयाबी से इसे थोड़ा ध ा ज र लगा ले कन एक दशक के भीतर ही इसने कारिगल से घुसपै ठय को भगाकर अपने आपको फर से सािबत कर दया। हालां क दु मन के साथ लड़ने म इसक ित ा म उतार-चढ़ाव होता आया है ले कन शांितकाल म देश म कानून- व था बहाल करने म इसे काफ ित ा िमली है। सां दाियक दंग के व महज वद म सेना के जवान क उपि थित ही दंगाइय को भगाने के िलए काफ होती है। जब कभी भी ाकृ ितक आपदा आती है तो वे तकलीफ म पड़े लोग को राहत प च ं ाने म सबसे आगे होते ह। जब कभी भी कह बाढ़, अकाल, च वात या भूकंप आता है, यह सेना ही होती है जो सबसे पहले घटना थल पर प च ं ती ह और सबसे स म और िव सनीय होती है। भारतीय सेना पूण प से एक पेशेवर और गैर-सां दाियक सं था है। यह गैरराजनीितक भी है। आजादी िमलने के तुरंत बाद ही जवाहरलाल नेह ने सेना के उ ािधका रय से साफ कह दया था क रा य के सभी छोटे-बड़े मामल म उ ह चुने ए नेता के अधीन काम करना होगा। अं ेज से स ा ह तांतरण के समय सेना मुख अभी भी एक ि टश जनरल था िजसने आदेश दया था क झंडो ोलन समारोह के समय जनता को दूर रखा जाए जो वतं ता दवस के अवसर पर होने वाला था। धानमं ी के प म नेह ने उस आदेश को िनर त कर दया। नेह ने उस जनरल को िलखा क हालां क म अपने भारतीय और ि टश उ ािधका रय के िवचार और उनक चंता पर यान देने के िलए हमेशा इ छु क रहता ,ं ले कन मुझे लगता है क इस मामले म गंभीर गलितयां ई ह। िजस भी नीित को लागू करना है चाहे वह सेना हो या कह और... भारत सरकार के िवचार और उसक नीित हमेशा सव प र होनी चािहए। अगर कोई ि उस नीित को लागू करने म असमथ है तो भारतीय सेना म या भारतीय सरकार के ढांचे म उसक कोई जगह नह है। मुझे लगता है क इस समय यह बात पूरी तरह साफ हो जानी चािहए।27 साल भर बाद अब व लभभाई पटेल क बारी थी क वे ि टश जनरल को उसक सही ि थित बता द। जब सरकार ने िनजाम के िखलाफ सेना भेजने का फै सला कया तो सेना मुख जनरल राॅय बुचर ने सरकार को चेतावनी दी क ऐसा करने से पा क तान को अमृतसर पर हमला करने का बहाना िमल सकता है। पटेल ने बुचर से कहा क अगर वे हैदराबाद कारवाई का िवरोध करते ह तो वे इ तीफा देने के िलए आजाद ह। उसके बाद जनरल सही रा ते पर आ गया और आदेश के मुतािबक सेना को हैदराबाद भेज दया।28 कु छ ही दन के बाद बुचर सेवािनवृ हो गए और उनक जगह कमांडर इन चीफ जनरल के .एम. क रय पा ने ले ली। क रय पा उस पद पर िनयु होने वाले पहले भारतीय थे। अपने कायकाल के शु म क रय पा ने खुद को सेना संबंिधत मसल पर ही क त रखा ले कन जैसे-जैसे अपने काय म वे रमते गए उ ह ने दूसरे मसल जैसे भारत ारा चुने गए आ थक िवकास के माॅडल पर भी राय देने लगे। सन् 1952 म नेह ने क रय पा को प िलखा क वे ेस के सामने कम से कम उपि थत ह और कसी भी सूरत म अपने आपको सुरि त िवषय तक ही सीिमत रख। उ ह ने उस प के साथ अपने एक कै िबनेट सहयोगी का प भी भेज दया िजसम क रय पा क ये कहकर िशकायत क गई थी क ”वे पूरे देश म अ यिधक भाषण और ेस काॅ स कर रहे ह“ िजससे ये अवधारणा बन रही है क ”वे एक राजनीितक या अध-राजनीितक ि क भूिमका अदा कर रहे ह“।29 ऐसा लगता है क वह संदश े क रय पा तक सही तरीके से प च ं गया य क जब जनवरी 1953 म वे अपने पद से सेवािनवृत ए तो अपने िवदाई भाषण म उ ह ने ”सेना का आ नान कया क वे राजनीित को ापक तरीके से काम करने द“। उ ह ने कहा क सेना का काम ”राजनीित म ह त ेप करना नह बि क चुनी ई सरकार को सम पत िन ा दान करना है“।30 हालां क नेह जानते थे क जनरल एक मुंहफट वृित का ि ह िजस पर यह यक न नह कया जा सकता क वह अपनी ही सलाह का पालन करे गा। इसिलए क रय पा को सेवािनवृित के महज तीन महीन के भीतर आॅ ेिलया का उ ायु बनाकर भेज दया गया। सरकार के इस फै सले से जनरल क रय पा पूरी तरह खुश नह थे य क जैसा क उ ह ने धानमं ी से कहा, ”पता नह कतने व के िलए आप मुझे अपने घर से दूर दुिनया के दूसरे छोर पर भेज रहे ह। ऐसा करके म लोग से लगातार संपक म नह रह पाऊंगा।“ नेह ने जनरल को सां वना देते ए कहा क एक िखलाड़ी के प म वह इस पद के िलए िब कु ल यो य ह क एक ऐसे देश म राजदूत बनकर जाएं जो खेलकू द म ब त आगे ह। ले कन जािहर सी बात है क उनको वहां भेजे जाने का वा तिवक उ े य यह था क उ ह देश से िजतना दूर से हो सके , भेज दया जाए।31 सेना के पहले भारतीय मुख के प म क रय पा ने गजब भाव कायम कया था। ले कन य - य दन बीतते गए उनका भाव कम होता गया। जब वे आॅ ेिलया से वापस हंद ु तान आए तो लोग उ ह भूल चुके थे। ले कन नेह क दूरद शता तब सही सािबत ई जब समय-समय पर जनरल ने कु छ वैसे ही आशं कत करने वाले बयान दए। सन् 1958 म क रय पा ने पा क तान क या ा क , जहां अिवभािजत भारत म उनके साथ काम करने वाले जनरल ने त ता पलटकर सैिनक शासन थािपत कर दया था। क रय पा ने सावजिनक प से उनक शंसा क और कहा क ”अपने मादरे वतन क अराजकतापूण ि थित क वजह से देशभ जनरल को ऐसा फै सला करना पड़ा ता क अपने देश को िवनाश से बचाया जा सके ।“32 उसके दस साल बाद क रय पा ने इं िडयन ए स ेस को एक लेख भेजा िजसम उ ह ने इस बात क वकालत क क पि म बंगाल म उथल-पुथल को देखते ए वहां पांच साल के िलए रा पित शासन लगा देना चािहए। उनक यह बात संिवधान क आ मा और उसके िनदश के िब कु ल उलट थी। सौभा यवश अखबार के संपादक ने वह लेख क रय पा को यह कहते ए लौटा दया क ”इस प रि थित म इसे छापना आपके िलए और हमारे िलए भी असुिवधाजनक होगा।“33 उन शु आती दन म जो नजीर थािपत कर दी गई वो अभी तक कायम है। जैसा क लेि टनट जनरल जे.एस. अरोड़ा िलखते ह क ”नेह ने कु छ ब त ही अ छी परं पराएं बना दी थ ,“ िजसने यह सुिनि त कर दया क ”सेना म राजनीित लगभग नह के बराबर है“। अरोड़ा ट पणी करते है क ”सेना कसी भी तरह से एक राजनीितक ाणी नह है और खासकर सेना के अिधकारी को तो इस धरती का सबसे बड़ा गैर-राजनीितक ि होना चािहए।“34 यह भी एक गजब का त य है क अभी तक कसी भी सेना अिधकारी ने चुनाव नह लड़ा है। अरोड़ा खुद ही बंगलादेश मुि सं ाम म एक रा ीय नायक बनकर उभरे थे, ले कन न तो उ ह ने और न ही कसी अ य अिधकारी ने जंग के मैदान म अ जत इस यश को राजनीितक फायदे के िलए इ तेमाल कया। अगर उ ह ने अपनी सेवािनवृित के बाद सावजिनक पद संभाला भी तो ऐसा उ ह ने सरकार के यौते पर कया। क रय पा क तरह कु छ ने देश से बाहर राजदूत का पद संभाला तो अ य दूसर ने देश म ही रा य के रा यपाल का पद संभाला। भारतीय सेना भी नौकरशाही क तरह ही एक ि टशकालीन सं था है िजसका कामयाबीपूवक वदेशीकरण कर दया या है। यही बात अं ेजी भाषा के बारे म भी कही जा सकती है। अं ेज के शासनकाल म बुि जीवी वग और पेशेवर तबका एक दूसरे के साथ अं ेजी म संवाद करता था। उसी तरह रा वादी आंदोलन म लगा सं ांतवग भी करता था। पटेल, बोस, नेह , गांधी और अंबेडकर सभी अपनी मातृभाषा और अं ेजी दोन म ही िलखते थे। अपने े के अलावा कसी दूसरे े म जाकर काम करने के िलए अं ेजी एक ज री भाषा थी। इस तरह एक अिखल-भारतीय ि टश िवरोधी चेतना का ज म ऐसे िवचारक और आंदोलनका रय ारा आ जो अं ेजी म िलखते थे। आजादी िमलने के बाद अं ेजी के सबसे बल प धर म से एक सी. राजगोपालाचारी थे। उ ह ने िलखा क ”कु छ खास सांयोिगक वजह और उ े य से ि टश शासक अपने पीछे अं ेजी भाषा क िवपुल संपदा छोड़कर गए ह।“ ले कन एक बार जब यह हमारे पास आ ही गई है तो कोई कारण नह बनता क हम इसे छोड़ द। य क ”अं ेजी अब हमारी है और हम ऐसी कोई ज रत नह है क इसे हम अं ेज के साथ इं लड भेज द।“ उ ह ने बड़े हा य के साथ इसम एक चीज और जोड़ी क भारतीय परं परा के मुतािबक दुिनया क सभी भाषा का ज म देवी सर वती से आ है। इस तरह से ”अं ेजी अपनी उ पि के िहसाब से हम ही से ता लुक रखती है, य क इसक ज मदाता सर वती ह और इसिलए भी क इसे हमने कसी से हािसल भी कया है।“35 दूसरी तरफ कु छ ब त ही भावशाली रा वादी नेता ऐसे भी थे िजनका मानना था क अं ेजी को अं ेज के साथ ही भारत से िवदा कर देना चािहए। नेह के शासनकाल म अं ेजी के थान पर हंदी को अंत ांतीय संवाद क भाषा बनाने के िलए भारी यास कया गया। ले कन अं ेजी का योग सरकार और सरकार के बाहर भी लगातार होता रहा। सन् 1961 म भारत क या ा करते ए कनाडा के लेखक जाॅज वुडकाॅक ने पाया क ”भारत क िविच ता , इसके अनेक कार के रीित रवाज , भौगोिलक प रदृ य और लोग के शारी रक गठन के बावजूद यह एक ऐसा परदेश था जहां क भाषा आस-पड़ोस म कसी न कसी के ारा ज र समझ ली जाती थी और जहां पर अं ेजी उ ारण के साथ बोलने का मतलब था क कसी अलग समुदाय से कोई अपने जैसा ि आ गया हो या दो ि य क अ थायी शादी ई हो िजसम ेम और घृणा समान गहनता के साथ उपि थत हो।“36 नेह क मृ यु के बाद अं ेजी को हटाने क कोिशश फर से तेज हो गई। दि ण के रा य के बार बार आ ह के बावजूद 26 जनवरी 1965 को हंदी अंत ांतीय संवाद क एकमा आिधका रक भाषा बना दी गई। जैसा क हमने इस कताब के िपछले अ याय म देखा है, इसके िवरोध म इतना भारी और आ ामक िवरोध आ क यह फै सला महज एक पखवाड़े म ही वापस ले िलया गया। इस तरह अं ेजी क सरकार, उ अदालत और उ िश ा क भाषा बद तूर बनी रही। बीते साल म अं ेजी ने अिखल भारतीय सं ांत वग क भाषा के प म अपनी ि थित को गहरा, मजबूत और सुिनि त बना िलया है। आजाद भारत म सा ा यवा दय क भाषा अब शि , ित ा और िनजी और सामािजक गित क भाषा बन गई है। जैसा क इितहासकार सवप ली गोपाल ने िव ेषण कया है क ”अं ेजी का ान सभी े म ऊंची नौकरी हािसल करने क सीढ़ी बन गई है। यह हैिसयत और समृि दशन का एक ज री ज रया बन गई है और उन सभी के िलए आव यक बन गई है जो िवदेश जाना चाहते ह। इसका मतलब है क आजादी के बाद से इसके अ ययन का एक ापक उ साह जगा है।“ ले कन जैसा क गोपाल िलखते ह क ”अं ेजी को इस देश क इकलौती गैर- े ीय भाषा के तौर पर भी ा याियत कया जा सकता है। यह िसफ शासिनक संदभ म ही नह बि क उससे आगे भी एक संपक भाषा का थान ले चुक है। यह कभी-कभार उभरकर सामने आते े वाद को भी रोकने का काम करती है।“37 राजाजी और नेह जैसे नेता ने भांप िलया था क अं ेजी को बनाए रखने से देश म रा ीय एकता मजबूत ही होगी और यह वै ािनक गित को भी बढ़ावा देगी। ऐसा इसने कया भी ले कन उससे भी यादा अनपेि त इसक भूिमका आ थक िवकास म रही िजसक कभी क पना नह क गई थी। य क भारत म साॅ टवेयर उ ोग के आ यजनक तर के पीछे भारतीय इं जीिनयर का अं ेजी म द होना एक मुख कारण था। V कहा जा सकता है क भारत 50 फ सदी लोकतांि क और 80 फ सदी एक कृ त देश है। क मीर और उ र-पूव के कु छ िह से िव ोिहय के भाव म ह जो देश से अपनी राजनैितक आजादी चाहते ह। क ीय भारत के जंगली इलाक के कु छ िजले माओवादी ांितका रय के भाव म ह। हालां क ये इलाके खासे बड़े ह ले कन ये पूरे देश के े फल का महज एक चौथाई से भी कम है। देश के अ सी फ सदी िह स म चुनी ई सरकार का अबाध शासन चलता है और उनक वैधता असं द ध है। इन सारे इलाक म भारत के नाग रक रहने, अ ययन करने, नौकरी करने या कसी कारोबार म िनवेश करने के िलए िब कु ल वतं है। भारत का आ थक एक करण इसके राजनैितक एक करण का प रणाम है। वे पर पर एक दूसरे से जुड़े ए ह। देश म िजतना अिधक व तु , पूंजी, और लोग क आवाजाही होगी उतना ही यह मानिसकता जड़ जमाएगी क आिखरकार यह देश एक एक कृ त देश है। आजादी के पहले दशक म यह काम सावजिनक े ने कया था क लोग म एकता क भावना को बढ़ावा दया जाए। िभलाई के िवशाल टील कारखान जैसे उ ोग म आं देश के लोग ने पंजािबय और गुजराितय के साथ कं धे से कं धा िमलाकर काम कया था। उ ह ने एक दूसरे क जुबान, रीित- रवाज और ंजन को वीकार कया था। उ ह ने इस बात को रे खां कत कया था क वे एक ही देश के िनवासी ह। जैसा क मानवशा ी जोनाथन पैरी ट पणी करते ह क ”एक एक कृ त रा क नेह वादी प रक पना म िभलाई और इसके टील के कारखाने िजतने इितहास के पथ दशक थे उतने ही वे इस बात को रे खां कत करते थे क वे इ पात पैदा करने के साथ-साथ एक नए क म के समाज का िनमाण भी कर रहे ह।“ वह कोिशश िब कु ल नाकामयाब नह गई। य क िभलाई म काम करने वाले लोग के ब क पहली पीढ़ी म, िजनका ज म और पालन-पोषण िभलाई म आ था, ांतीय भावनाएं कमजोर पड़ गई थ और, ”एक सामूिहक देशभि और एक यादा वैि क सां कृ ितक जीवनशैली िवकिसत हो गई थी।“38 हालां क हाल के साल म कु छ अनजाने ही रा ीय एक करण को बढ़ाने का काम िनजी े ने भी कया है। तिमलनाडु आधा रत कं पनी ह रयाणा म अपना सीमट कारखाना लगाती है और असम म पैदा ए और पढ़े ए डाॅ टर बंबई म अपना लीिनक खोलते ह। हैदराबाद के सूचना तकनीक उ ोग म काम करने वाले ब त सारे इं जीिनयर िबहार से आते ह। ऐसा नह है क लोग का ये पलायन िसफ पेशेवर तबक तक ही सीिमत है। बंगलौर म उ र देश के नाई और राज थान के बढ़ई काम कर रहे ह। हालां क इतना ज र कहा जा सकता है क पलायन क ये कहानी समान प से हर जगह नह है। जहां एक तरफ आ थक िवकास के दौर म ”उफान मारते“ शहर यादा से यादा वैि क होते जा रहे ह वह आ थक प से िपछड़े रा य यादा से यादा ांतवाद के चंगुल म फं सते जा रहे ह। VI राजनीितक और आ थक त व के अलावा सां कृ ितक कारक ने भी रा ीय एकता म योगदान दया है। इसम सबसे मुख भूिमका हंदी फ म क है। यह भारतीय जनता के िलए मानो एक जुनून जैसा है। सभी उ , लंग, जाित, धम और भाषायी समूह के भारतीय समान प से इसके दीवाने ह। गीतकार जावेद अ तर कहते ह क ”भारतीय संघ म पहले िजन ांत को मा यता िमली थी उनम से हरे क ांत क अपनी एक िविश सं कृ ित, परं परा और तौर-तरीका है। गुजरात म आप एक तरह क सं कृ ित देखते ह तो पंजाब म दूसरे तरह क । यही बात बंगाल, उड़ीसा, राज थान और के रल पर भी लागू होती है।“ उसके बाद अ तर आगे जोड़ते ह क ”इसके अलावा भारतीय संघ म एक और सूबा है िजसका नाम हंदी िसनेमा है।“39 यह एक च काने वाला दृि कोण है जो िव तृत ा या क मांग करता है। एक अलग ांत के प म हंदी िसनेमा ऐसे धारक या सं हक के प म सामने आता है जो दूसरे रा य क बेहतरीन रचना मक बात (सां कृ ितक संदभ म) को अपनी तरफ ख च लेता है। इस तरह इसके अिभनेता, संगीतकार, तकनीिशयन और िनदशक भारत के हर िह से से आते ह। यह अलग-अलग े के बेहतरीन सां कृ ितक तौर-तरीक को अपनी तरफ ख चता है। इस तरह एक ही गीत म पंजाबी लोकसंगीत भांगड़ा और इसका शा ीय तिमल समक भरतना म भी पाया जा सकता है। हरे क जगह से सां कृ ितक त व को लेकर हंदी फ म उसे एक संि उ पाद के प म ढालती है और फर उसे संघ के दूसरे रा य म शंसा पाने के िलए भेज देती ह। भारत म सबसे यादा पसंद कए जाने वाले लोग फ मी िसतारे ही ह। ऐसा नह है क िसनेमा भारतीय जनता को नायक का एक संसारलोक ही तुत करती है, बि क वह उ ह एक साझी भाषा और िवमश करने के िलए एक साझा संसार भी देती है। कायालय , घर , कू ल , काॅलेज और सड़क पर फ मी गीत क पंि यां और उनके संवाद का धड़ ले से योग कया जाता है। य क भारतीय संघ का एक और रा य हंदी िसनेमा अपनी अलग जुबान बोलता है - एक ऐसी जुबान जो अ य सूब के हंद ु तािनय को आसानी से समझ म आती है। उपयु पैरा ाफ के आखरी वा य का एक वा तिवक और सांकेितक अथ भी ह। हंदी िसनेमा दशक के सामने ढेर सारी ऐसी सामािजक प रि थितयां और कठोर नैितक सामने रखती है जो पूरी जनता को एक साथ झकझोरते ह। ले कन बीतते व के साथ इसने हंदी भाषा को ऐसे लोग के िलए भी यादा ा और सहज बना दया है जो इसे पहले नह समझते थे या नह बोलते थे। जब हंदी को क सरकार ारा ताकत के बल पर थोपने क कोिशश क गई थी तो इसका िवरोध दि ण और पूव रा य के लोग ने कया था। ले कन जब इसे िसनेमा और टेलीिवजन के ारा धीरे -धीरे लोग के दल तक ले जाया गया तो इसे उ ह लोग ने वीकार कर िलया। बंगलौर और हैदराबाद म हंदी उन लोग के बीच संवाद क एक पसंदीदा भाषा बन गई है जो एक दूसरे क भाषा नह समझते ह। आिखरकार, उ रपूव म आतंकवा दय ारा हंदी फ म , डीवीडी और वीिडयो पर पाबंदी का उदाहरण दया जा सकता है जो अपने तरीके से सािबत करता है क हंदी िसनेमा ने देश के एक करण म कतनी बड़ी भूिमका अदा क है। सन् 1888 म जाॅन ेचे ने िलखा था क कभी वह क पना म भी नह सोच पाया क पंजाब और म ास कभी एक राजनीितक ईकाई के अधीन आ पाएंगे।। ले कन सन् 1947 म ऐसा आ और ऐसा ब त सारे अ य ांत के साथ आ िजसे ेचे ”िविश रा “ मानता था। सन् 1947 म यह एकता भले ही राजनीितक ही रही हो ले कन आने वाले दशक ने सािबत कर दया क ये एकता अब आ थक, सां कृ ितक और भावना मक भी हो गई है। हालां क ये भी सच है क शायद ब त सारे क मीरी और नगा समुदाय के लोग अभी भी अपने आपको अलग महसूस करते ह। और शायद ये भी सच है क ब त सारे ांितकारी इस बात म यक न रखते ह क भारत ब त सारी रा ीयता का देश है। ले कन अिधसं य ऐसे लोग भी ह जो वैधािनक तौर पर भारत के नाग रक ह वे अपने को उसी प म देखना पसंद भी करते ह। देश क आबादी का कोई अ सी फ सदी िह सा जो करीब अ सी फ सदी भूभाग पर िनवास करता है, साफतौर पर महसूस करता है क वो एक एक कृ त रा के िह से है। VII आजाद भारत को यूरोप के अतीत और इसके भिव य के तौर पर भी प रभािषत कया जा सकता है। यह यूरोप का अतीत इस मायने म है क इसने आधुिनकता, औ ोगीकरण और शहरीकरण के संघष को और भी यादा तीखे प म तुत कया है। यह यूरोप का भिव य इस मायने म है क इसने एक ब भाषी, ब धा मक और ब न लीय राजनीितक-आ थक ईकाई बनने क यूरोप क उस कोिशश को पचास साल पहले हािसल कर िलया िजसे यूरोप ने हाल म हािसल कया है। या फर भारत क तुलना संयु रा य अमे रका से क जा सकती है िजसे सच ही ”दुिनया का पहला ब न लीय लोकतं “ कहा जाता है।40 अमे रका से करीब दो शता दी बाद पैदा आ भारतीय गणरा य बड़े आराम के साथ दुिनया के िवशालतम और ब न लीय लोकतं के प म कायम है। हालां क िजन तरीक से इसने अपने घटक न ल के बीच के संबंध को िनयिमत और संचािलत कया है वे थोड़े अलग क म के रहे ह। य क जैसा क सैमुअल हं टंगडन ने हाल म तक दया है क अमे रक रा एक ”पंथ सं कृ ित“ क िवरासत रही है िजसके ”क ीय त व “ म ”ईसाई धम, ोटे टट मू य और नैितकता, काय सं कृ ित, अं ेजी भाषा, कानून, याय व था और सरकारी शासन के सीमा क ि टश परं परा और यूरोपीय कला, सािह य, दशन और सगीत रहे ह“। हक कत म ”अमे रका का िनमाण एक ोटे टट समाज के तौर पर उसी तरह आ जैसे कु छ वजह से पा क तान और इजराइल का ज म मुि लम और य दी रा के तौर पर बीसव सदी म आ।“ अमे रका वा तव म अ वािसय का एक देश है। अमे रका के इितहास म यादातर समय जो भी नया समूह वहां आता गया वह मुख सं कृ ित म घुलता-िमलता गया। हं टंगडन िलखते ह क ”पूरे अमे रक इितहास म जो लोग ‘वेत मूल के एं लो-से सन’ ोटे टट नह थे वे अमे रका के एं लो- ोटे टट सं कृ ित और राजनीितक मू य को अपनाकर अमे रक बनते रहे ह।“ हालां क बाद म आने वाले नए समूह ने अपनी िविश पहचान को बचाकर रखने क कोिशश क है। उसम सबसे बड़े िह पेिनक समुदाय के लोग ह जो अपने खास इलाक म रहते ह, अपने तरह का खाना खाते ह, अपना अलग संगीत सुनते ह, अपने अलग िव ास को मानते ह और सबसे बड़ी बात ये क अपनी अलग भाषा भी बोलते ह। हं टंगडन चंता करते ए िलखते ह क अगर ”इन समुदाय को तेजी से मु यधारा म नह लाया गया तो वे पूरी तरह से अमे रका को ि भाषी और ि -सां कृ ितक देश के प म बांट कर रख दगे“। अमे रका म सं कृ ितय के घुलने-िमलने के पुराने माॅडल को ”मे टंग पाॅट“ यानी स यता क योगशाला का माॅडल कहा जाता है। अलग-अलग समूह ने अपने-अपने सं कृ ित क िविश ताएं अमे रका नाम के उस बड़ी कड़ाही म उढे़ल दी और फर एक समान, एक ही वाद के पेय पदाथ को पी गए। ले कन अब ऐसा लग रहा है क समाज और रा उस मे टंग पाॅट के थान पर एक ”सलाद क कटोरी“ बनता जा रहा है िजसम हरे क समुदाय अलग-अलग खड़ा होना चाहता है और अपने तरीके से अिभ और वहार करना चाहता है। हालां क हं टंगडन खुद ही इस सलाद क कटोरी वाली अवधारणा के ित ब त उ साही नह दखते। य क उनके िलए अमे रका हमेशा से, ”एक ऐसा समाज रहा है िजसम एकमा सव ा सं कृ ित हावी रही है।“ वह िव ेषण करते ह क अमे रक अपनी सं कृ ित से उस व सबसे यादा जुड़ाव महसूस करते ह जब उनका रा खतरे म होता है। यु से िसफ रा ीय एकता ही मजबूत नह होती बि क सां कृ ितक एकता भी मजबूत होती है। मौिलक अमे रक सं कृ ित अमे रका के मूल िनवािसय , ि टश सा ा यवा दय और दि णी रा य से लड़ाई के नतीजे म िन मत ई थी। यूयाॅक म घटी 9/11 क घटना ने एक बार फर से देशभि और रा ीय एकता को मजबूती दान कया। इस बात से चंितत होकर क ये ऊजा ितरोिहत हो सकती है हं टंगडन उस सं कृ ित क तरफ पूरी तरह से मुड़ने का आ ह करते ह जो क ”उनके िवचार म उनके देश क एकता और शि के िलए िज मेवार है।“41 दलच प बात ये है क हं टंगडन के िवचार आॅ ेिलया के धानमं ी जाॅन हाॅवड के हािलया बयान से मेल खाते ह। उस देश म भी एक के बाद एक कई समुदाय अ वासी के प म आते गए ह िजनम शु आत म यादातर सं या यूरोपीय लोग क ही थी। ले कन अब उनम उ लेखनीय प से एिशयाई अ वािसय क सं या काफ है। हाॅवड आॅ ेिलया म कई सं कृ ितय के साथ-साथ रहने क संभावना को खा रज कर रहे ह। वे कहते ह, ” कसी भी देश म एक मुख सं कृ ित का होना ज री है। हमारी सं कृ ित एं ल -से सन है - हमारी भाषा, हमारा सािह य और हमारी सं थाएं एं ल -से शन ह।“42 िन य ही हं टंगडन-हाॅवड का तक भारतीय इितहास के छा के िलए अजनबी तक नह है। ऐसा भारत म राजनीितक िवचारक एम.एस. गोलवलकर और राजनीितक पाट जनसंघ और बीजेपी पहले से कहते रहे ह। वे तक देते ह क भारत म आव यक प से एक ” मुख सं कृ ित“ होनी चािहए और वह सं कृ ित ” हंद ू सं कृ ित“ है। ले कन इन िवचार को भारतीय रा के सं थापक ने वीकार नह कया और न ही उ ह ने िज ह ने भारतीय संिवधान िलखा या आजाद भारत के शु आती दौर म सरकार का नेतृ व कया। इस तरह से भारत एक मे टंग पाॅट या ”स यता के तरल िम ण“ क बजाय सलाद क एक कटोरी बन गया। और भारत म ऐसा थायी प से आ है। यहां धम और भाषा क िविवधताएं कायम रही है। यूं कह क ये ऐसी िविवधताएं ह िजसे देखकर हं टंगडन या हाॅवड िन य ही कहते क ये कसी रा या रा ीय एकता के अि त व के िब कु ल िवपरीत है। इस व था ने अपने आपको पा क तान या इजरायल बनने से भी रोके रखा है जहां एक खास आ था मानने वाले या खास जुबान बोलने वाले लोग को तरजीह दी जाती है। VIII एक एक कृ त भारत क प रक पना क बारे म सबसे भावशाली िवचार जो अभी तक मेरी िनगाह से गुजरे ह वो जीविव ानी जे.बी.एस. हे डेन के अ कािशत प से ह। अपने देश ि टेन म हे डेन को खासी िस हािसल थी और थोड़ा-ब त उनका शरारती ि व भी था। सन् 1956 म जब वे साठ पार कर चुके थे तो उ ह ने यूनीव सटी काॅलेज लंदन से इ तीफा दे दया और कलक ा म बसने का फै सला कया। वे भारतीय सांि यक सं थान (इं िडयन टे टि टकल इं ि ट ूट) म बतौर िश क शािमल हो गए और भारत क नाग रकता ले ली। वे भारतीय कपड़े पहनने लगे और भारतीय खान के शौक न हो गए। उ होने पूरे देश का िव तृत दौरा भी कया िजस दौरान उ ह ने वै ािनक और आम जनता से गहन बातचीत क ।43 हे डेन के भारत आने के पांच साल बाद एक अमे रक िव ान लेखक ने उनक ा या एक ”िव नाग रक“ के प म क । हे डेन ने जवाब दया क इसम कोई शक नह क म कु छ मायन म एक िव नाग रक ।ं ले कन म थाॅमस जेफरसन क तरह ही इस बात म यक न करता ं क कसी भी नाग रक का मु य कत ये होना चािहए क वह अपनी सरकार को तकलीफ देता रहे। अब चूं क दुिनया म कोई भी िव सरकार नह है इसिलए म ऐसा नह कर सकता... दूसरी तरफ म भारत सरकार के िलए एक परे शानी का सबब बन सकता ,ं बि क ।ं भारत सरकार अपनी आलोचना को खासी जगह देती है ले कन वह इस पर ब त धीमी ित या करती है। म भारत का नाग रक होकर भी काफ गव महसूस करता ं जो अमे रका, सोिवयत संघ या चीन ही नह बि क यूरोप से भी यादा िविवधता वाला मु क है। इस तरह यह एक संभा िव सं था का बेहतर माॅडल है। हो सकता है क यह कभी टू ट भी जाए ले कन यह एक लाजवाब योग है। इसिलए म चाहता ं क मुझे भारत के नाग रक के तौर पर ही जाना जाए।44 दूसरे अवसर पर हे डेन ने एक ”मु िव क सबसे नजदीक प के “ प म ा या क । उनके एक अमे रक िम ने इसका िवरोध करते ए कहा क ”उ ह तो ये पता था क भारत म धूत लोग क खासी सं या है और यहां काफ ऐसे गरीब लोग ह िजनम सोचने-समझने क मता नह है और जो बड़े अ िचपूण क म के हीन और अनाकषक लोग ह।“45 इस पर हे डेन ने जवाब दया क शायद दुिनया के कसी भी िह से से यादा कोई ि भारत म धूत होने के िलए आजाद है। जैसे क जे. गू ड के दन म अमे रका म होता था (मेरे िवचार म)। अमे रका म आज क तुलना म तब यादा आंत रक वतं ता थी। दूसरे देश के ”अ िचकर मातहत “ क अपनी एक सीमा है। कलक ा म दंग और उथल-पुथल के समय लोग ाम रोक देते ह और पुिलस के िनयम को मानने से इं कार कर देते ह। वे िजस तरह से ऐसा करते ह उससे जेफरसन ज र खुश होते। म नह मानता क उनक गितिविधयां ब त मजबूत होती ह। ले कन मु ा वो सवाल नह है।46 उस घटना के चालीस साल बाद िजसे हे डेन ने एक ”शानदार योग“ कहा था उसे एक कामयाबी या एक अ छी कामयाबी ज र कहा जा सकता है। ये सही है क देश के कु छ िह स म (जािहर तौर पर बड़े िह से म) गरीबी अभी भी मौजूद है ले कन इस बात से अब आ त आ जा सकता है क भारत सहारा इलाक के अ क देश जैसे भारी अकाल से नह गुजरे गा। ये भी सच है क देश म कई जगह अलगाववादी आंदोलन चल रहे ह, ले कन इस बात क कोई आशंका नह है क भारत यूगो लािवया क तरह भाई-भाई म लड़कर दजन टु कड़ म बंट जाएगा। ये भी सच है क भारत म कई बार रा य अपनी शि य का दु पयोग करता है ले कन ऐसा कोई भी नह सोचता क भारत का हाल उसके पड़ोसी पा क तान जैसा हो जाएगा जहां सेना का मुख अ सर सरकार का मुख भी होता है। एक आधुिनक देश के प म भारत िब कु ल एक अलग क म का देश है। यह उपल ध वैकि पक व था से अलग अपने आप म िब कु ल अनूठा है। यह एं लो-से सन उदारवाद, ांसीसी गणरा यवाद, क युिन ट नाि तकतावाद और इ लामी पुरातनवाद से िब कु ल अलग है। सन् 1971 म बंगलादेश संकट के समय जब भारत ने अपने आपको एक ही साथ क युिन ट चीन, इ लािमक पा क तान और उदारवादी अमे रका के िखलाफ पाया तो एक भारतीय कू टनियक ने अपने देश क अनूठी ि थित को कु छ यूं दज कया भारत को पि म म चंता क िनगाह से देखा जाता है य क यह सा ा यवाद के िखलाफ है और य क इसने ”तीसरी दुिनया“ का ”आिव कार“ कया है। भारत को तीसरी दुिनया म शक क िनगाह से देखा जाता है य क वह लोकतं और मानवािधकार आ द का िहमायती है। मुि लम दुिनया हमसे खार खाए बैठी है य क हम धमिनरपे ह। क युिन ट देश भारत को अपमान क िनगाह से देखते ह और एक संभािवत खतरा के तौर पर भी देखते ह य क हमने गित के अपने मु य उ े य के प म सा यवाद को खा रज कर दया है। िन य ही तब हम ई र के प म ह। ले कन या ई र भी हमारी तरफ है?47 िजस लेखक क पंि य से इस कताब क शु आत ई है उसने भी सोचा था क वाकई ई र भारत के प म ही है। उ ीसव सदी के मश र शायर िमजा गािलब ने ऐसा ही सोचा था। उनके चार तरफ लड़ाइयां और खूनखराबा जारी था ले कन कयामत का दन अभी भी नह आया था। गािलब ने बनारस म एक बुजुग संत से पूछा क िवनाश का आखरी घंटा य नह बजता? ”आखरी लय का सू कसके हाथ म है? गािलब को कु छ यूं जवाब िमला ेत के शधारी उस बूढ़े संत ने काशी क तरफ इशारा कया और मंद-मंद मु कु राते ए कहा सृजनकता को यह िवशालकाय भवन ब त पसंद है, िजसक वजह से जंदगी म इतने रं ग है, वह इसे ख म नह होने देगा और िगरने नह देगा“। जािहर तौर पर गािलब और उनसे उस समय बात करने वाला ि भारत क चचा एक स यता के प म कर रहा था। ले कन आज के भारत के संदभ म, एक रा रा य के संदभ म बात करते ए यह बात यान रखनी चािहए क इसका भिव य कसी ई र के हाथ म नह बि क मनु य के संसा रक काय के हाथ म है। जब तक भारत का संिवधान एक मा यता से आगे संशोिधत नह कया जाता, जब तक देश म िनरं तर और िन प ढंग से चुनाव करवाए जाते रहगे, जब तक ापक तौर पर धमिनरपे ता कायम रहेगी, जब तक यहां के लोग अपनी पसंदीदा भाषा म िलखते और बोलते रहगे, जब तक यहां एक संयु बाजार रहेगा, जब तक यहां एक स म नौकरशाही, सेना और हंदी फ म को देखा जाता रहेगा और उनके गीत गुनगुनाए जाते रहगे... हंद ु तान का वजूद कायम रहेगा। आभार एक भारतीय नाग रक के प म करीब पांच दशक म मेरे सामने ये खोजने के ब त सारे मौके आए क भारत कई बार दुिनया का सबसे यादा उ सुकता पैदा करने वाला देश है। हालां क ऐसा भारत के आधुिनक इितहास पर काम करते व ही मुझे अहसास आ क यह देश हमेशा से दलच प रहा है। मेरे दो त पीटर ाॅस ने मुझे इस बात के िलए उकसाया क म आजाद भारत पर कताब िलखूं। और ये वे िन वाथ अिभलेखकम और पु तकालय म काम करने वाले लोग थे िज ह ने मेरी इस या ा को जीवट प से रोमांचक और अनपेि त नतीजे का गवाह बना दया। म सबसे यादा ध यवाद नेह मेमो रयल यूिजयम एंड लाइ ेरी के कमचा रय को देना चाहता ं जहां आधुिनक भारत पर िनजी कागजात -द तावेज , पि का , माइ ो फ म और पु तक का िवपुल सं ह है। स ाह तक मेरे साथ ी जीवनचंद और पांडुिलिप िवभाग के ी राउतेला मेरे साथी के तौर पर काम करते रहे। वे एक िवशाल अंधेरे गिलयारे से एक काशमान पठन क तक फाइल लाते रहे जहां बैठकर म काम करता था। बाहर मु य िवभाग म लाइ ेरी के कमचारी ब त ही उदार और सहयोगा मक ख वाले थे। उन पांडुिलिपय को ा करने म मुझे लाइ ेरी के उपिनदेशक डाॅ. एन. बालाकृ णन और उनक िव सनीय सहयोगी दीपा भटनागर का भी िवशेष सहयोग िमला। मेरे काम म मह व के दृि कोण से दूसरा थान और उससे भी यादा मश र ि टश लाइ ेरी लंदन का है जो शोध सामि य का िवशाल भंडार है। यहां म ओ ड इं िडया आॅ फस लाइ ेरी एंड रकाॅ स म काम करता था िजसे उस व ”ओ रयंटल एंड इं िडया आॅ फस कले शंस“ (अब यह एिशयन एंड अ कन टडीज के नाम से जाना जाता है) कहा जाता था। इसका जो भी नाम हो यह वाकई काम करने के िलए एक अ छी जगह है। इसके त पर और स म कमचारी, दूसरे सं ह के साथ इसका नजदीक जुड़ाव और सबसे बड़ी बात क यहां दुिनया के दूसरे िव ान से िमलने-जुलने का इ ेफाकन मौका इसे लाजबाव बना देता है। दूसरे अ य पु तकालय और अिभलेखागार जहां से मने इस पु तक के िलए सामि यां ली ह उनम नेशनल आरकाइव आॅफ इं िडया, नई द ली; द सटर फाॅर साउथ एिशयन टडीज, कै ि ज; द यूनीव सटी आॅफ कै लीफो नया, बकले; टेनफोड यूनीव सटी; काॅरनेल यूनीव सटी; यूनीव सटी आॅफ िमशीगन; अ ा आरबर; द यूनीव सटी आॅफ जाॅ जया, एथस; स हाउस, यू टन; इं िडया इं टरनेशनल सटर, नई द ली; द नेशनल लाइ ेरी आॅफ काॅटलड, एिडनबग; इ पी रयल वार यूिजयम, लंदन; ओ लो यूनीव सटी; द म ास इं टी ूट आॅफ डेवलपमट टडीज चे ै; टाटा टील, जमशेदपुर; और लाल बहादुर रा ीय शासिनक सं थान, मसूरी मुख है। मेरे िवशेष ध यवाद का पा बंगलौर का सटर फाॅर एजुकेशन एंड डाॅ यूमटेशन भी है िजनके अखबारी कतरन के वृहत भंडार का मने ापक उपयोग कया है। िनजी कागजात और प -पि का के अलावा इस पु तक को िलखने म दूसरे नएपुराने पु तक और पच से भी खासी मदद ली गई है। इनम से ब त सारी सामि यां मुझे मेरे गृहशहर बंगलौर म नह िमल पाई (जो िव ान का एक बड़ा क है ले कन दुभा यवश ऐसा मानिवक िवषय के बारे म नह है)। इसम से काफ सारी सामि यां कई ात और अ ात कताब क दुकान से खरीदी गई। म खासकर ीिमयर बुक शाॅप, बंगलौर; द िसले ट बुकशाॅप, बंगलौर; भु बुकसेलर, गुड़गांव; द यू एंड सैकंड हडबुक शाॅप, मुंबई; और मनोहर बुकसेलर, नई द ली का आभारी ं जहां से मने िवपुल साम ी हािसल क । उतनी ही मददगार मुंबई, द ली के वे अनाम कताब िव े ता भी थे जो लोरा फाउं टेन और द ली के द रयागंज म पट रय पर कताबे बेचते ह। िपछले दो दशक म एक इितहासकार के प म मने वहां से इतनी यादा साम ी अपने काम के िलए हािसल क है िजसका वणन नह कया जा सकता। यहां पर मने िजन त वीर का इ तेमाल कया है वो मु यतः चार सं ह से िलए गए ह। वे सं ह ह ेस इनफाॅमशन यूरो, नेह मेमो रयल यूिजयम एंड लाइ ेरी और हंद ू व आनंद बाजार पि का काशन समूह। म इन सं थान को और अपनी प ी सुजाता को ध यवाद देता ं और िजसने मुझे इन त वीर के आखरी चुनाव म ब त मदद क । अनेक कार से सहायता करने के िलए म िच मय अ ण; कांित वाजपेयी; सुहास बािलगा; ि मनी बनज ; नुपूर बसु; िमलसट बेनेट; टली िडज; िवजय चं ;ू ुित देबी; कनक मिण दीि त; जफर फतेहाली; अिमताभ घोष, मेरे माता-िपता एस.आर.डी और िवशाला ी गुहा; सुि या गुहा; वजाहत हबीबु ला; राजन हष; रािधका हजबगर, ेवर हाॅरवुड; ेयस जयिस हा; राॅिबन जेफरी; भगवान जोश; नशरीन मु ी कबीर; देवेश कपूर; मुकुल के सवान; सौ या के सवान; नयन योत लािहड़ी; िनमला ल मण; एडवड लूस; लूसी लक; रघु मेनन; मेरी माउं ट; राजदीप मुखज ; ां शु मुखज ; अिनल नौ रया; नंदन नीलेकणी; मोहनदास पाई; ीराम पंचू; शांत पंिजयार; शेखर पाठक; ीनाथ राघवन; िन य रामकृ णन; रमेश रामनाथन; जयराम रमेश; मेरा भतीजा का तक रामकु मार; महेश रं गराजन; अनुराधा राॅय; तीथकर राॅय; जाॅन राॅयल; पी. सा नाथ; संजीव सेठ; राजदीप सरदेसाई; ज पा राजेश शाह; राजभूषण शंद;े के . िशवरामकृ णन; अर वंद सु यन; आर. सुदशन; नं दनी सुंदर; एम.वी. व प; िशखा ि वेदी; िस ाथ वरदराजन; ए.आर. ंकटचलपित; राज वोरा; एमी व डमैन और ांिसस वीन का आभार करता ।ं कु छ िम का िवशेष िज करना ज री है िज ह ने ि गत और पेशेगत मामल म लंबे समय से मदद क है। ये अ छे लोग है कु न आडवाणी, आं े बेटले, के शव देसीराजू, गोपाल गांधी, डेिवड िगलमोर, इयान जैक, संजीव जैन और सुनील िखलनानी। आं े और डेिवड ने इस पु तक पर लंबी ट पिणयां भी मुहय ै ा करा । म अपने िम कृ णा राज क याद को नह भूल सकता जो पतीस साल तक इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली के संपादक रहे थे। यह एक ऐसी पि का है िजसका जीवन इस गणरा य के जीवन से गहरे जुड़ा आ है, िजसके गवाह इस पु तक म यु कई नोट है। म अपने संपादक मैि मलन के रचड िमलनर और इको/हापरकाॅ लंस के डैन हैलपन को उनके ो साहन, सहयोग, आलोचना और िझड़ कय के िलए आभार कट करता ।ं म वादा करता ं क म अगली कताब पर तेजी से काम क ं गा! सच तो यह है क मेरे एजट िगल को रज के िबना यह कताब संभव ही नह हो पाती। एकािधक मौक पर मने सोचा था क म लंबी छु ी ले लूं या इस कताब को ही िलखना छोड़ दू।ं हरे क मौक पर िगल ने मुझे फर से िलखने के िलए मनाया। वे मुझे बताते रहे क इसे कै से जारी रखा जाए और आिखर म कै से संप कया जाए। जैसा क इस कताब के समपण म िलखा गया है क मेरा सबसे बड़ा ऋण उन दलच प और कभी-कभार उ ेिजत कर देने वाले भारतीय के ित है िजनके साथ मुझे रहने का सौभा य िमला है। िच 1. आम चुनाव के प रणाम क घोषणा का इं तजार करते ए आॅल इं िडया रे िडयो के बाहर खड़े नाग रक। नई द ली, 1967 2. बाॅ बे म दीवार पर लगे पो टर, 1970, जनता के दो मु य जुनून फ म और चुनाव के संयोजन को दशा रहे ह 3. अमे रक रा पित रचड िन सन के साथ इं दरा गांधी, िन सन उ ह स त नापसंद करते थे, वाॅ शंगटन, 1971 4. इं दरा गांधी के क र िवरोधी, समाजवादी और सामािजक कायकता जय काश नारायण 5. अपने पसंदीदा बेटे संजय गांधी के साथ इं दरा गांधी, 1975 6. िबग मदर/ यू पीकः इमरजसी के दौरान ए ‘लोकतं ा’ स मेलन म भाग लेत इं दरा गांधी 7. सी.एन. अ ादुरई, पैदाइशी व ा, िज ह ने भारत क पहली सफल रीजनल पाट , िवड़ मु े ा कड़घम बनाई 8. अनुयायी महान फ मी ह ती एमजी. रामचं न, जो बाद म तिमलनाडु के मु यमं ाी बने अ ादुरई के 9. लंदन म सुिशि त वक ल योित बसु (बाएं) जो बाद म सा यवादी बनकर पि म बंगाल के मु यमं ाी बने, राइटस िब डंग, कलक ा, 1977। बसु 23 साल तक अपने पद पर बने रहे और इनक पाट क युिन ट पाट आॅफ इं िडया (मा सवादी) लंबे समय तक स ा म रही 10. काटू िन ट से जनो ेजक नेता बने बाल ठाकरे , िजसक पाट िशव सेना नाटक य प से महारा क स ा म आई। िशव सेना के कै डर मुसलमान पर ए िसलिसलेवार हमल के िलए िज मेदार ह 11. स त माने जाने वाले मोरारजी देसाई के चेहरे पर दुलभ हंसी, 1977। चार दशक तक कां ेस क सेवा करने के बाद वे 1977 म आपातकाल हटने पर भारत के पहले गैर कां ेसी धानमं ाी बने 12. 15 अग त, वतं ाता दवस के अवसर पर तीन सेना क सलामी लेत धानमं ाी इं दरा गांधी। साल 1980; बेटे क मौत का दुख उनके चेहरे पर साफ नजर आ रहा है 13. मई, 1984 म, वण मं दर, अमृतसर। सेना के हमले से कु छ ही समय पहले क त वीर। िसख आतंकवा दय ारा क जा रही कलाबंदी साफ नजर आ रही है 14. राजीव गांधी, अपने प रवार से धानमं ाी बनने वाले तीसरे सद य, वह पहले ऐसे सद य थे, जो इस पद के िलए दल से तैयार नह थे 15. भारतीय िसपाही 1999 म कारिगल यु के दौरान एक मह वपूण चोटी पर ितरं गा फहराते ए 16. म य देश, महे र सन् 2000, बांध िनमाण के िव जनांदोलन 17. जनसंघ और भाजपा के अ णी राजनेता और अ छे व ा अटल िबहारी वाजपेयी, िवप म गुजारे गए सफल दशक के प रणाम व प पूरे पांच वष तक भारत के धानमं ाी रह पाए 18. उ र देश क मु यमं ाी और दिलत नेता मायावती अपना ज म दन मनाते ए। उनके साथ उनके राजनीितक गु कांशी राम (दाएं) दखाई दे रहे ह 19. मिणपुर म भारतीय फौज क नृशंसता का िवरोध करती मिहलाएं, जुलाई, 2004 20. क मीर म मुि लम अलगाववादी, 2000 21. जाित आर ण के िवरोध म खुद को जलाते ए एक युवक, नई द ली, 1990 22. गुजरात दंग के दौरान हंद ू भीड़, 2002 23. मनमोहन देसाई क फ म अमर अकबर एंथोनी (1977) म अिमताभ ब न, यह तीन भाइय क कहानी है जो बचपन म िबछड़ जाते हं◌ै और हंद,ू मुि लम और ईसाई के प म बड़े होते ह। यक नन आिखर म वे तीन िमल जाते ह 24. महान शा ाीय गाियका एम.एस. सु बाल मी (1916-2004) म ास क एक पि का के कवर पर। वे कसी प रचय क मोहताज नह ह भारत के मुख और अितवादी आंदोलन, 1947-2007 भारत के रा य, 2007 संदभ 1 नेह के बाद उथल-पुथल का दौर 1. वी.के . नरिस हन, कामराजः ए टडी (बंगलौरः मेयस इं डमाक, 1967), डंकन बी. फोरे टर, “कामराजः ए टडी इन परकोलेशन आॅफ टाइल” माॅडन एिशयन टडीज, खंड-4, नंबर-1, 1970; जे. एंथनी लुकास, “मीट कु मार वामी कामराज”, इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 22 मई, 1966। 2. यह िववरण माइकल ीचर क पु तक, स सेशन इन इं िडयाः ए टडी इन िडसीजन मे कं ग, (लंदनः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1966) अ याय 2 और 3 पर आधा रत है। ले कन इसके िलए टेनली कोचनेक क , द कां ेस पाट आॅफ इं िडयाः द डायनािम स आॅफ वन पाट डेमो े सी ( ंसटनः ंसटन यूनीव सटी ेस, 1968) पृ. 88एफ भी देख। 3. देख ीचर क स सेशन, पृ. 115-17। 4. द गा जयन, 3 जून, 1964 (संपादक य) एमएसएस यूरो एफ158/1045 क कतरने, ओआईओसी। 5. पै क क टले, “ए ेरोज थ”, पुनमु त चुने ए लेख, द बेडसाइड गा जयन 13◌ः ए िसले शन ाॅम ‘द गा जयन’ 1963-64 (लंदनः काॅिल स, 1964), पृ. 200-03। 6. चा स पाउसे को जे.एच. ह न का िलखा प , 29 मई 1964, बाॅ स-2, पाउसे पेपस,सीएसएएस। 7. एम.आरम, पीस इन नागालडः एट ईयर टोरी, 1964-72 (नई द लीः आन ड हीनेमेन (इं िडया), 1974) पृ. 2038◌ः ए पाॅल हेयर और हरबट एच लूमबग संपा दत ए सच फाॅर पीस एंड जि टसः र ले शन आॅफ माइकल काॅट (लंदनः रै स काॅ लं स, 1980), अ याय-11 (नागालड पीस िमशन)। 8. जे. जे. संह को नारायण का िलखा प , कोिहमा, दनांक-11 िसतंबर 1964, जे.जे. संह पेपस, एनएमएमएल। 9. देख वी.के . नूह ारा संकिलत द नगा ाॅिनकल (नई द लीः रीजसी पि लके शंस, 2002) पृ. 274एफएफ। 10. 27 नवंबर 1964 को डाॅ. भाभा के भाषण को लोकसभा िडबे स म िव तृत प से उ धृत कया गया। 11. लोकसभा िडबे स, 27 नवंबर और 11 दसंबर, 1964। कछवाई और शा ी दोन ने हंदी म भाषण दया। 12. देख के .एस. रामनाथन क द िबग चज (म ासः हेिगनबाॅथ स, 1967), अ याय-6। 13. ए.एस. रमण, “ए मी टंग िवथ सी.एन. अ ादुरई” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 26 िसतंबर 1965। 14. देख राॅबट डी कं ग क नेह एंड द ल वेज पाॅिल ट स आॅफ इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1997); मोहन राम क हंदी अग ट इं िडयाः द मी नंग आॅफ डीएमके (नई द लीः रचना काशन, 1968)। 15. यह िववरण मु यतः हंद ू अखबार क रपोट पर आधा रत है जो 27 जनवरी से 15 फरवरी, 1965 के बीच छपे थे। 28 फरवरी, 1965 के इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया पर “ल वैज राइ स इन म ास” पर चार प क त वीर भी देख। 16. इ रक ेसी, आॅड मैन इनः माई ईयस इन द इं िडयन पुिलस (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1981) पृ. 209-27। 17. देख, मोरारजी देसाई, “नेशनल यूिनटीः ू हंदी” करं ट, 30 जनवरी 1965। 18. देख िसले टेड पीिचस आॅफ लालबहादुर शा ी (नई द लीः पि लके शन िडिवजन, 1974), पृ. 119-22। 19. लोकसभा िडबे स, 18 फरवरी 1965। 20. अले जडर को घोष का प , 3 माच 1965, फाइल-60, होरे स अले जडर पेपस, स हाउस, यू टन। 21. सर मो रस जे स, पा क तान ाॅिनकल (लंदनः ह ट एंड कं पनी, 1993), पृ. 123-6; जी.एस. भागव, आ टर नेह ः इं िडयाज यू इमेज (बंबईः अलाईड पि लके शस, 1966), पृ. 260-3, 276, 439-41। क छ म यु िवराम का समझौता दोन देश के संबंिधत मं लय के अिधका रय ारा ह ता रत कया गया। दोन ही संयोग से मुसलमान थे और चचेरे भाई भी थे िजसम से एक ने हंद ु तान म रहने का फै सला कया था। 22. फाइल 60 म 24 मई, 1965 को भेजा गया प । होरे स अले जडर पेपस, स हाउस, यू टन। 23. जे स, पा क तान ाॅिनकल, पृ. 128-31। 24. अग त 1965 म िलखा गया ज मू-क मीर के त कालीन मु य सिचव का प नयनतारा सहगल और ई. एन मंगत राय; क पु तक रलेशनिशपः ए स ै ट ाॅम ए काॅर प ड स म (नई द लीः किल फाॅर वुमैन, 1994), पृ. 134-9। 25. दु मनी का यह िववरण मु यतः ि यान लाउघले के ए िह ी आॅफ द पा क तान आम ः वाॅस एंड इं सरे शंस (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999) पर आधा रत है। पृ. 68-72, 84-5, 102-6; एयर चीफ माशल, पी.सी. लाल क माई ईयस िवथ द आईएएफ (नई द लीः लसर, 1987) पृ. 126-34; लेि टनट जनरल हरब श संह, इन द लाइन आॅफ ूटीः ए सो जर रमे बस (नई द लीः लसर, 2000) पृ. 334-53। 26. संह, इन द लाइन आॅफ ूटी पृ. 353। 27. लाल, माई ईयस, पृ. 134। 28. देख सी.पी. ीवा तव क लालबहादुर शा ीः ए लाइफ आॅफ थ इन पाॅिल ट स (नई द ली आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1995) पृ. 273-75। 29. देख भागव क आ टर नेह पृ. 300-303। 30. हरबट फे डमैन, ाॅम ाइिसस टु ाइिससः पा क तान, 1962-69 (लंदनः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1972) पृ. 146। 31. जाॅन े जर, “ कै न िवन क मीर?” रीडस डाइजे ट, जनवरी 1966। 32. जैसा क के .एस. वाजपेयी ने मुझे कहा जो उस व कराची म भारतीय; काउं िसल जनरल थे। 33. ले. जनरल जहान दाद खान, पा क तान लीडरिशप चैलजेस (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999) पृ. 51। 34. फै डमैन म उ धृत, ाइिसस टु ाइिसस, पृ. 139-40। 35. लाउघले के ए िह ी म उ धृत, पृ. 71। 36. एक िव तृत िव ेषण के िलए ेमनाथ बजाज का क मीर पर अनाम नोट देख। दनांक-24 अ टू बर 1965, स जे ट फाइल-46 सी, राजगोपालाचारी पेपस, चौथी क त, एनएमएमएल। 37. अलेि टयर लै ब, क मीरः ए िडसपुटेड लीगेसी 1846-1890 (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1992) पृ. 263। 38. नयनतारा सहगल, “ हाट इं िडया फाइ स फाॅर” इ ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 3 अ टू बर 1965; अनाम, द फाइट फाॅर पीस (नई द लीः हाड एंड अलाई (इं िडया), 1966) िवशेषकर, पृ. 260एफएफ। 39. ट.वी. कु ही कृ णन, “च नान एंड द ब ड िडके ड” (बंबईः सोमैया पि लके शन, 1971), पृ. 99-115; आर डी धान, “िडवेकल टु रवाईवलः वाई. वी. च नान एज िडफस िमिन टर” (हैदराबादः ओ रयंट ल गमैन, 1999), पृ. 182-7, 207-12, 238-42 40. जय काश नारायण को शा ी का प , 21 जुलाई 1965 ( हंदी म) स जे ट फाइल-28, एनएमएमएल। ानंद पेपस, 41. वह भाषण डी.आर. मानके कर के लालबहादुरः ए पाॅिल टकल बायो ाफ म पुन तुत कया गया है (बंबईः पाॅपुलर काशन, 1965), उपखंड-3। नेह के िवपरीत शा ी एक िन ावान हंद ू थे। ले कन जब एक सा ा कता ने उनके उनक आ था के बारे म सवाल कया तो उनका कहना था क कसी सावजिनक प से उसक आ था के बारे म नह चचा करनी चािहए। सा ा कार इ ेटेड वीकली आॅफ इं िडया म, 18 अ टू बर 1964। 42. संह, पोटट आॅफ लालबहादुर शा ी, पृ. 87-88। 43. नई रणनीित के िनमाण पर एक मह वपूण प रचचा वी. िशवरामन के सं मरण -“िबटर वीटः गवनमट आॅफ इं िडया इन ांिजशन (नई द लीः आशीष पि ल शंग हाउस, 1987) िवशेषकर अ याय-11 यानी “ ीन रवो यूशन” देख। 44. जाॅन पी लीिवस, इं िडयाज पाॅिल टकल इकोनाॅमीः गवनस एंड रफाॅम ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1995) अ याय-4; िग स बोकु रे ट, नो ं स अटै ड? इं िडयाज पाॅिलिसजी एंड फोरे न एड, 1947-66 ( द लीः मनोहरः 2003), अ याय-15। 45. ीवा तव, लालबहादुर शा ी, अ याय-31। 46. शा ीज ला ट जन , लाइफ, 21 जनवरी 1966। 47. डी. नाॅरमन संपा दत इं दरा गांधीः लेटस टु एन अमे रकन ड,1950-84 म 13 माच 1965 को डोरे थे नाॅरमन को िलखा प (सेन िडयारोः हरकोड ेस जोवेनोिवच), 1985, पृ. 111। 48. ए.सी. नाि बयार को िलखा िवजयल मी पंिडत का प । 31 जुलाई 1964 और 26 जनवरी 1966 के प । इसक ितयां पुपुल जयकर पेपस म है जो रािधका हजबेरगर के पास ह। 49. आनंद मोहन, इं दरा गांधीः ए पसनल एंड पाॅिल टकल बायो ाफ ( यूयाॅकः िमरे िडथ ेस, 1967), पृ.20-37। 50. सी.डी. देशमुख को नेह का प , 16 अ ैल 1956, स जे ट फाइल 67, सीडी देशमुख, पेपस, एनएमएमएल। 51. “ए फटफु ल इ ोवाइजेशन”, 22 जनवरी 1966। 52. िनमल िनवेदन, िमजोरम, द डैगर ि गेड (नई द लीः लसर, 1980), खासकर पृ. 30-51। 53. सजल नाग, कं टे टंग मा जनेिलटीः एथिनिसटी, इनसरजसी एंड सब-नेशनिल म इन नाॅथ-ई ट इं िडया (नई द लीः मनोहरः 2002), पृ. 217-24, और “ ाइ स, रै स, फे माइन, टेट एंड द नेशन”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 24 माच 2001, थाॅट क रपो स भी देख (नई द ली) 2 अ ैल 1966 और 7 व 14 अ टू बर 1967। 54. आई.ए. बोमैन को भेजा गया अह ता एफ229/62, ओआईओसी। रत और अ दनां कत प , डाक-ितिथ 13 माच 1966, एमएसएस यूरो 55. मरजोरी साइ स को भेजा गया जय काश नारायण का प , 24 फरवरी 1966, जे.जे संह पेपस म ितिलिप, एनएमएमएल, नारायण, नगालड म शांित का यास (द े ट फाॅर पीस इन नगालड) (वाराणसी, सव सेवा संघ, 1966)। 56. एसएसएस यूरो एफ 158/239 क कतरन, ओआईओसी। 57. आई.ए. बोमैन को िलखा गाई वंट का प , 16 िसतंबर 1966, एसएसएस यूरो एफ229/24, ओआईओसी 58. िनमल िनबेडन, नगालडः द नाइट आॅफ द गु र लाज (नई द लीः लसर, 1983), पृ. 137-45। 59. स जे ट फाइल 136, डी पी िम ा पेपस, तीसरी और चौथी क त, एनएमएमएल; नं दनी सुंदर, सबआ टन एंड सोव सः एन ए ोपाॅिलिजकल िह ी आॅफ ब तर, 1954-96 ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1997) अ याय-7। 60. संह, इन द लाइन आॅफ ूटी, पृ. 357। 61. एमएसएस 158/295 क कतरन देख। नए पंजाब और ह रयाणा के गठन को माच 1966 म मंजूरी दी गई। ले कन यह फै सला नंवंबर म ही अमल म लाया जा सका जब रा य का सीमांकन हो गया। देख हंद ु तान टाइ स, 2 नवंबर 1966। 62. देख सी सु यम हड आॅफ डेि टनीः मेमोयस, खंड-2; द ीन रवो यूशन (बंबईः भारती; िव ा भवन, 1995), अ याय-11 और अ य। 63. ीमती गांधी के अमे रका दौरे का बणन के अ बास के “इं दरा गांधीः रटन आॅफ द रे ड रोज” ( द लीः हंद पाॅकेट बु स, 1966), पृ. 147-57 पर कया गया है। 64. चे टर बाउ स, ोिमसेज टु क पः माई ईयस इन पि लक लाइफ, 1941-69 (नई द लीः बी.आई पि लके शन, 1972), पृ. 525, हाॅवड बी के फर क चे टर बाउ सः यू डीलर इन द को ड वास (नई द लीः ि टस हाॅल इं िडया, 1994) भी देख, पृ. 280। 65. अनाम, “इं िडयाज फु ड ाइिसस 1965-67” फाइल-7, बाॅ स-32, थाॅमस जे. काॅनबग फाइ स, डीन र क पेपस, यूनीव सटी आॅफ जाॅ जया, एथस। 66. ओरिवले मैन ारा रा पित जाॅनसन को दया गया मेमोरडम, 19 जुलाई 1966, फाइल-6, बाॅ स-32, थाॅमस जे. काॅनबग फाइ स, डीन र क पेपस, यूनीव सटी आॅफ जाॅ जया, एथस। 67. 1966 के मु ा के इस अवमू यन का िववरण रा ल मुखज के “इं िडयाज एबोटड िल लाइजेशन-1966” पर आधा रत है। पेिस फक अफे यस, खंड-73, नंबर-3, 2000। कु लदीप नायर के िबटवीन द लाइ स (बंबईः अलाइड पि लशर, 1969), अ याय-3 से भी सहयोग। 68. जय काश नारायण को इं दरा गांधी का प , 7 जून 1966, जे.जे. संह पेपस म ितिलिप। एनएमएमएल। 69. थाॅट, 11 जून 1966। 70. इं दरा गांधी को जय काश नारायण का प , 23 जून 1966, सव दय आ म, शोकोदेउरा (गया) जे.जे. संह पेपस म ितिलिप, एनएमएमएल। 71. जय काश नारायण को इं दरा गांधी का प , 6 जुलाई 1966, जे जे संह पेपस म ितिलिप, एनएमएमएल। 72. थाॅट, 15 अ टू बर 1966। 73. हंद ु तान टाइ स, 31 अ टू बर-5 नबंवर 1966। 74. हंद ु तान टाइ स म छपी खबर, 5 और 6 नवंबर 1966। 75. हंद ु तान टाइ स, 7 नवंबर 1966, थाॅट, 12 नवंबर 1966। 76. “इं िडय स िबक मंग इन जंगली हो टाइल टु वे ट” िसडनी माॅ नग हेरा ड, 13 दसंबर 1965। 77. रोना ड सीगल, द ाइिसस आॅफ इं िडया (हरम सवथः पं◌ेगुइन, 1965) पृ. 171, 227, 255-7, 272, 30910। 78. इयान बोमैन को िलखा उसुला बे स का प , 25 मई 1966 एमएसएस यूरो एफ229/24, ओआईओसी 79. पाॅल इरिलच, द पाॅपुलेशन ब ब ( यूयाॅकः बेलटाइन बु स, 1968) भूिमका। 80. िविलयम एंड पाॅल पेडाॅक, फे माइन -1975! अमे रकाज िडसीजनः एंड कं पनी, 1968) पृ. 60-1, 217-8। िवल सरवाइव? (बो टनः िल टल ाउन 81. एस मुलगाओकर, “द ि मे ट िसचुएशन इन नाइनटीन ईयस,” हंद ु तान टाइ स, 3 नवंबर 1966। 2 वाम क तरफ झुकाव 1. सोल ड यू. सडस, “इं िडयाः ए यूज कं ी आॅन द वज आॅफ कोले स”, यूएस यूज एंड व ड रपोट, 28 नवंबर 1966। 2. नेिवल मै सवेल, “इं िडयाज िडसइं टे े टंग डेमो े सी”, तीन क त म, द टाइ स, 26 और 27 जनवरी और 10 फरवरी 1967। 3. देख योगेश अटल क लोकल क युिनटीज एंड नेशनल पाॅिल ट स ( द लीः नेशनल, 1971); ए.एम.शाह संपा दत द ास स आॅफ डेमो े सी (नई द लीः परमानट लैक, 2007)। 4. ई.पी.ड यू. डा को टा, “द इं िडयन जनलर इले शंस, 1967◌ः द 1967। ए गैलप पोल िवथ एनलीिसस (नई द लीः इं िडयन इं ि ट चर आॅफ इं िडयन वो टंग इं टेशंसः जनवरी ूट आॅफ पि लक ओिपिनयन) 5. थाॅट, 4 माच 1967। 6. एमजीआर और डीएमके पर ये पैरा ाफ राॅबट एल.हाड ेव और एंथनी सी. नेधाथ के लेख “ फ स एंड पाॅिल टकल कं ससनेशन इन तिमलनाडु ” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 11 जनवरी 1975; पर आधा रत ह। इसके अलावा ये एन. बालाकृ णन क “द िह ी आॅफ द िवड़ मुने ा कड़घम, 1949-77” कू ल आॅफ िह टो रकल टडीज, मदुरई कामराज यूनीव सटी, 1985 के एक अ कािशत पीएचडी शोधप के खासकर पृ. 278-86 पर भी आधा रत है। 7. नर सु म यम्, एथनीिसटी एंड पोपिल ट मोबलाइजेशनः पाॅिल टकल पाट ज, िसटीजंस एंड डेमो े सी इन साउथ इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 204-10; सागर अहलूवािलया, अ ा-द टे पे ट एंड द सी (नई द लीः यंग एिशया पि लके शन, 1969), पृ. 51-7, 82-4। 8. योित बसु, मे वाजः ए पाॅिल टकल आॅटोबायो ाफ (कलक ाः नेशलन बुक एजसी, 1999), पृ. 195-209। 9. भबानी सेनगु ा, क युिन म इन इं िडयन पाॅिल ट स ( यूयाॅकः कोलंिबया यूनीव सटी ेस, 1972)। 10. मारकस एफ. डा, रे िडकल पाॅिल ट स इन वे ट बंगाल (कि ज, मासः एमआईटी ेस, 1971), अ याय-6। 11. देख रबी रे क द न सलाइ स एंड देयर आइिडयोलाॅजी (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1992)। 12. मेन ीम, 8 जुलाई 1967, डा के रै िडकल पाॅिल ट स म उ धृत, पृ. 171। 13. शांता िस हा, माओई ट इन आं देश (नई द लीः ान पि ल शंग हाउस, 1989), अ याय-4-7; सुमंत बनज , इन द वेक आॅफ न सलबाड़ी, ए िह ी आॅफ द न सलाइट मूवमट इन इं िडया (कलक ाः सुवणरे खा, 1980) अ याय-5। 14. देख स जे ट फाइल 3, धमवीर पेपस, एनएमएमएल क कतरन। 15. शंकर घोष, द िडसइनहै रटेड टेटः ए टडी आॅफ वे ट बंगाल, 1967-70 (कलक ाः ओ रयंट ल गमैन, 1971), अ याय-3। 16. एमएसएस यूरो एफ 158/456 ओआईओसी क कतरन। 17. घोष, द िडसइनहै रटेड टेट, पृ. 248एफएफ। 18. देख स जे ट फाइल 99, पीएन ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 19. देख आईबी क रपोट, स जे ट फाइल 212, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 20. देख रं जीत गु ा, द 157-9 आ द। मसन एजडाः माओई ट ोटे ट एंड टेरर ( द लीः वडि मथ, 2004), पृ. 105,110-11, 21. इं दर मलहो ा, “न सलाइ स पुट िसटी इन फ यर आॅफ बाॅम स”,गा जयन, 19 अग त 1970। 22. आरोप क एक लंबी फे ह र त के िलए देख एस.एन ि वेदी क “द ओि़डसा अफे यस एंड द सीबीआई इन ायरी” (नई द लीः िनजीतौर पर कािशत, 1965)। 23. सुनीत घोष, उड़ीसा इन टरमाॅइल (भुवने रः बुकलड इं टरनेशनल, 1991), पृ. 149-57; सुखदेव नंदा, कोलीशन पाॅिल ट स इन ओि़डसा (नई द लीः ट लग पि लशस, 1979), पृ. 70-7। 24. पेशल ांच रपोट िजस पर “टाॅप सी े ट” िलखा आ है। 26 फरवरी 1967, स जे ट फाइल-25, डी.पी. िम ा पेपस, दूसरी क त, एनएमएमएल। 25. कामराज को िम ा का प , 21 जून 1967, वही। 26. देख आर.सी.वी.पी. नोरो हा क ए टेल टो ड बाई एन इिडयट (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1976), अ याय-8। 27. ेमशंकर झा, “तेलंगानाः ल वेज इज नोट इनफ” इ ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 3 अग त 1969। 28. एस.के . चौबे, िहल पाॅिल ट स इन नाॅथ-ई ट इं िडया (बंबईः ओ रयंट ल गमैन, 1973), अ याय-7 और 8। 29. देख स जे ट फाइल 142 के प और नोट, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 30. दीपांकर गु ा, ने टिव म इन मे ोपोिलसः द िशवसेना इन बंबई ( द लीः मनोहर, 1982), पृ. 39-40, 82-83 इ या द। वैभव पुरंदरे , द सेना टोरी, (मुंबई, िबजनेस पि लके शंस, 1999), पृ. 22-4, 42-4। 31. थाॅट, 11 फरवरी 1967। 32. देख स जे ट फाइल 128 के नोट, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 33. थाॅट, 16 माच, 6 जुलाई एंड 19 अ टू बर 1968, डेली टेली ाफ 27 जून 1968। 34. देख एमएसएस यूरो एफ158/239, ओआईओसी क कतरने। 35. देख फाइल 61 के प और द तावेज। अले जडर पेपस, स हाउस, यू टन। 36. थाॅट, 7 जून 1968। 37. ए.जी.नूरानी, “हाउ डज ए राइट िबगीन एंड ेड?” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 9 नवंबर 1969; असगर अली इं जीिनयर संपा दत “क युनल राइ स इन पो ट-इं िडपडस इं िडया” के दूसरे सं करण (हैदराबादः ओ रयंट लां◌ैगमैन, 1991) म एन.सी स सेना, “नेचर एंड ओ रिजन आॅफ क युनल राइ स इन इं िडया”; फक ीन अली अहमद को िलखा के .डी. मालवीय; का प , 30 माच 1967, स जे ट फाइल 128, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 38. इं जीिनयर क कताब म घन याम शाह, “द 1969 क युनल राइ स इन अहमदाबादः ए के स टडी”◌ः कां ेसी सांसद के एक समूह ारा अहमदाबाद दंग पर िबना शीषक क एक रपोट, 7 अ टू बर 1969, स जे ट फाइल 142, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 39. खुशवंत संह, “ल नग िजयो ाफ ू मडर” इ स ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 31 मई 1970। 40. थाॅट का संपादक य, 2 माच 1968; एस.ई. हसेिनन क इं िडयन मुि ल सः चेलजेज एंड आॅप यूिनटी भी देख ((बंबईः लालवानी पि ल शंग हाउस, 1968)। 41. यह िववरण िव ुत सरकार संपा दत पी.एन. ह सरः अवर टाइ स एंड द मैन (नई द लीः अलाइड पि लशस, 1989), ो. एं े बे टले से एक बातचीत, द ली, फरवरी 2005 और पीएन ह सर पेपस, एनएमएमएल क साम ी। 42. कै थरीन क, इं दराः ए लाइफ आॅफ इं दरा नेह गांधी (लंदनः हापरकाॅ लंस, 2001), पृ. 314। 43. स जे ट फाइल 198, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल म 21 जनवरी 1968 का एक नोट। 44. एस.एस. धवन का भाषण, लंदन, माच 1969, स जे ट फाइल 197, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल म ितिलिप। 45. इं दर म हो ा, इं दरा गांधीः ए पसनल एक पाॅिल टकल बायो ाफ (लंदनः हाॅडर एंड टाघटन, 1989) पृ. 108एफ। 46. द ईयस आॅफ चैलजः िसले टेड पीचेज आॅफ इं दरा गांधी, जनवरी 1966-अग त 1969 (दूसरा सं करणः नई द ली, पि लके शन िडिवजन, 1985), पृ. 25-8, 34-9, 172-4, 268-9। 47. थाॅट, 8 और 29 माच 1969। 48. उमा वासुदव े , इं दरा गांधीः रवो यूशन इन र ेन ( द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1974) पृ. 502। 49. मलहो ा, इं दरा गांधी, पृ. 116। 50. थाॅट, 23 दसंबर 1967, मोरारजी देसाई, द टोरी आॅफ माई लाइफ खंड-2 ( द लीः मैि मलन इं िडया, 1974) पृ. 243एफ। 51. यह भाषण ए मोइन जैदी के द ेट अपहेवेल 1969-72 म पुन तुत क गई है (नई द लीः ओ रयंटेिलया इं िडया, 1972) पृ. 103-6। 52. थाॅट, 19 जुलाई 16 अग त 1969। 53. िव तृत िववरण के िलए देख स जे ट फाइल 153, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 54. ेवर ि बग, इं दरा गांधीः ोफाइल इन करे ज ( द लीः िवकास पि लके शंस, 1972) अ याय-7। 55. जैदी क कताब द ेट अपहेवल म इं दरा गांधी को िलखा एस. िनज लंग पा का प 11 नवंबर 1969, पृ. 231। 56. सुकुमार मुरलीधरन और रिव शमा, “ए कां ेसमैन ाॅम एनेदर एजः एस िनज लंग पा, 1902-2000”, ं टलाइन, 1 िसतंबर 2000। 57. भाषण का मसौदा, स जे ट फाइल 143, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 58. िन(िखल) च( वत ), “ संिडके ट एट वाॅटरलू” मेन ीम 16 अग त 1969। 59. नयनतारा सहगल, इं दरा गांधीः हर रोड टु पावर ( यूयाॅकः े ड रक उं गर, 1982), पृ. 53। 60. 16 िसतंबर 1967 का पी.एन. ह सर के नोट, स जे ट फाइल 118, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 61. स जे ट फाइल 121, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल; राज पुरी, इं िडया 1969◌ः ए ाइिसस आॅफ का शंस ( द लीः िनजीतौर पर कािशत, 1971), पृ. 67-73। 62. देख स जे ट फाइल 145, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल के प । 63. ि वी पस पर संसदी; और याियक ह त ेप का यह िववरण डी.आर मानके कर क ए सेशन टु इ स टं सशनः द टोरी आॅफ इं िडयन ंसेज ( द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1974), अ याय-18, 20। 64. िव तृत िववरण के िलए देख एम.एस. रं धावा क ए िह ी आॅफ ए ीक चर इन इं िडया, खंड-4, 1947-81 (नई द लीः इं िडयन काउं िसल फाॅर ए ीक चर रसच, 1986) अ याय-30 से 32 तक। 65. डाॅन टायलर, “ दस यूज सर ाइ जंग थ आॅफ िमसेज गांधी”, इव नंग टडड, 21 अग त 1969 66. यूयाॅक टाइ स, 26 जनवरी 1970। 67. “इज इं िडया ै कं ग अप?” थाॅट का संपादक ; 4 जनवरी 1967। 68. “द मी नंग आॅफ न सलबाड़ी” थाॅट, 17 जून 1967। 69. कै थलीन गफ, “द इं िडयन रवो यूशनरी पोटिशयल” मंथली र ,ू फरवरी 1969 (यह पेिस फक अफे यस के शीतकालीन सं करण म मूल प से कािशत एक लेख पर आधा रत था, 1968-9)। 70. लेसे और िलजा बग, फे स टु फे सः फािस म एंड रवो यूशंस इन इं िडया, अनुवाद नारमन कु र टन (बकलेः रै पा स ेस, 1971), पृ. 23-4, 28, 31, 56, 125, 162, 209, 210। 3 िवजय क तैयारी 1. थाॅट, 22 नवंबर 1969। 2. देख सन् 1971 का इले शन मेिनफे टो (बंबईः अवेक इं िडया पि लके शन, 1971)। 3. मीनू मसानी को राजाजी का प , 2 जनवरी 1971, स जे ट फाइल 142, सी. राजगोपालाचारी, पेपस, चौथी क त, एनएमएमएल। 4. डोरोथी नाॅरमन को इं दरा गांधी का प , 23 अ ैल 1971। यह प डी. नाॅरमन संपा दत इं दरा गांधीः लेटस टु ए अमे रकन ड, 1950-84 म संकिलत है ( यूयाॅक हरकोट ेस जोवनोिवच, 1985) पृ. 132। 5. थाॅट, 20 मई 1972। 6. “ए पेशल काॅर प डट”, “मे कं ग आॅफ फ थ लोकसभा” थाॅट, 20 माच 1971। 7. खुशवंत संह, इं दरा गांधी, इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 14 माच 1971। 8. देखे डी.आर. मानके कर क ए सेशन टु इ स टं शनः द टोरी आॅफ इं िडयन हाउस, 1974), अ याय-21। ंसेज ( द लीः िवकास पि ल शंग 9. एस.पी. वमा और इकबाल नारायण संपा दत फोथ जनरल इले शन इन इं िडया, खंड-2 म डी.एन. धनगरे , “अबन रल िडफरसेज इन इले शन वाॅयलस” (बंबईः ओ रयंट ल गमैन, 1970)। 10. यह खंड भारत के चुनाव आयोग क ारा जारी क गई रपोट आॅन द फ थ जनरल इले शन इन इं िडया, 1971-72 (नई द लीः मैनेजर आॅफ पि लके शंस, 1973) पर आधा रत है। अ य जगह से भी कु छ साम ी ली गई है। उस व चुनाव आयु का नाम एस.पी. सेन वमा दज कया गया है। उस रपोट म भूिमका ही नह बि क लेख का मु य भाग भी उसी तरह िलखा गया है जैसे उनके पहले और महान पूववत सुकुमार सेन ने िलखी थी। 11. यह और इसका अगला पैरा ाफ मु यतः हरबट फे डमैन क द इं ड एंड द िबग नंगः द पा क तान 1969-71 (लंदनः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1975 पर आधा रत है) अ याय-7 से 9 तक। इसके अलावा डी.आर मानके कर क पाक काॅलोिनयिल म इन ई ट बंगाल (बंबईः सोमैया पि लके शंस, 1971) भी देख। 12. ले. जनरल ए.ए.के . िनयाजी, मुंतिसर मामून क पु तक द व (ढाकाः सोमोय; काशन, 2000), पृ. 159। ट जनर स एंड द िल ेशन वाॅर आॅफ बंगलादेश 13. आर.के . दासगु ा, रवो ट इन ई ट बंगाल (कलक ाः जी.सी. रे , 1971), पृ. 4, 7, 9 21, 24-5, 29, 39, 52, 61 इ या द। पूव पा क तान म पंजाबी कु लीन ारा सा ा यवादी शोषण के िलए एंथनीमासकर स िलिखत द रे प आॅफ बंगलादेश (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1971) भी देख। 14. अनाम ि य अ याय-6। ारा सं िहत च मदीद क रपोट, बंगलादेश डाॅ यूम स, (म ासः द बीएनके ेस, 1972) 15. योित सेनगु ा, िह ी आॅफ डम मूवमट इन बंगलादेश, 1943-73 (कलक ाः नया काश, 1974) पृ. 31416, 325-6। िजस मेजर ने ये घोषणा क उसका नाम िजया-उर-रहमान था जो बाद म बंगलादेश का रा पित बना। 16. 2 जुलाई 1971 का टेड िडपाटमट का टेली ाम। रोईदाद खान ारा संकिलत द अमे रकन पेपस, सीके ट एंड कं फडिसयल इं िडया-पा क तान-बंगलादेश डाॅ यूम स 1965-73 (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 613-15। 17. मेजर-जनरल हक म अरशद कु रै शी, द 1971 इं डो-पाक वासः ए सो जस नैरे टव (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002) पृ. 60-71। यहां िजन वा य का उ रण है वह वैसा है कसी भारती; सेना के कमांडर ने सन् 1957 म नगालड के बारे म कहा हो। 18. वेनर एडम, “पा क ता स ओपन वुं स” वाॅ शंगटन पो ट, 6 जून 1971, यूयाॅक टाइ स म छपी खबर, 25 जून 1971, व ड बक टीम रपोट, स जे ट फाइल 171, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त एनएमएमएल। 19. अनाम, बंगलादेश डाॅ यूमट, अ याय-7। 20. रणवीर समादार संपा दत र यूजी एंड द टेटः ैि टस आॅफ असाइलम एंड के यर इन इं िडया, 1947-2000 म के .सी. साहा, “द जीनोसाइड आॅफ 1971 एंड द र यूजी इन ल स इन द ई ट” (नई द लीः सेज पि लके शन, 2003) 21. इकबार अखुंड, मे वाज आॅफ ए बाई टडरः ए लाइफ इन िड लोमेसी (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1997) पृ. 201। 22. राॅ क 25 प क गु रपोट िजसका नाम था- ेट आॅफ ए िमलीटरी अटैक ओर इन फल ेशन कै पेन बाई पा क तान”, जनवरी 1971, स जे ट फाइल 220 म ितिलिप, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 23. ह सर को िलखा धर का प , 18 अ ैल 1971, वही। 24. देख स जे ट फाइल 169 क रपोट, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 25. एस. एस. एजाजु ीन संपा दत, “द हाइट हाउस एंड पा क तानः सी े ट िड लासीफाइड डाॅ यूम स, 196974” म यह प फर से छापा गया है। (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002), पृ. 129-30 26. “ रकाॅ स आॅफ पीएमस् कं वरसेसंस िवथ क संजर” 7 जुलाई 1971, स जे ट फाइल 225, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 27. रचड िन सन को इं दरा गांधी का प , 7 अग त 1971, स जे ट फाइल 220, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल म ितिलिप। 28. देख लुईस ि मथ संपा दत फाॅरेन रलेशंस आॅफ द यूनाईटेड टे स, 1969-76, खंड-11, साउथ एिशया ाइिसस (वाॅ शंगटन डीसीः िडपाटमट आॅफ टेट, 2005) पृ. 28, 34, 164, 167, 288-9, 303, 316, 324, 557 इ या द। देख एजाजु ीन िलिखत द हाइट हाउस के पृ. 242-6, 258-62 के द तावेज। 29. स र के दशक क शु आत म महाशि य के साथ भारत के बदलते ए संबंध पर एक ापक प र े ; ा करने के िलए देख टी.वी. कु ीकृ णन के द अन डली सः इं िडया एंड अमे रका (नई द लीः इं िडयन बुक कं पनी, 1974; शिश थ र, रीजंस आॅफ टेटः पाॅिल टकल डेवलपमट इन इं िडया एंड इं िडयाज फाॅरेन पाॅिलिसज अंडर इं दरा गांधी, 1966-77 (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1982) और लंडा रे िसयोपी, सोिवयत पाॅिलसीज टु व स साउथ एिशया संस 1970 (कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1994) 30. यह पैरा ाफ स जे ट फाइल 163, 225 ओर 229, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल के प और द तावेज पर आधा रत है। 31. टाॅप सी े ट नो स आॅफ 5 जून 1971, स जे ट फाइल 89, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 32. िवदेश मं ी और सोिवयत िवदेश मं ी ए.ए. ोिमको के बीच बातचीत का िववरण, 7 जून 1971, स जे ट फाइल 203 पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 33. उस संिध का मसौदा ए.अ पादुरई संपा दत िसले ट डाॅ यूम स आॅन इं िडयाज फाॅरेन पाॅिलसीज एंड रलेशंस, 1947-72 म पुन तुत कया गया है। खंड-2, ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस) 1985, पृ. 136-40। 34. इं दरा गांधी, इं िडयाः द पीचेज एंड रे िमिनससेज आॅफ इं दरा गांधी ाइम िमिन टर आॅफ इं िडया (लंदनः हाॅडर एंड टाॅघटन, 1975, पाॅ-162-64। 35, देख एजाजु ीन क द हाइट हाउस, पृ. 313, 336-39। 36. राॅबट जै शन, साउथ एिशयन ाइिससः इं िडया-पा क तान-बंगलादेश (लंदनः चेटो एंड वंडस, 1975) पृ. 102। 37. एजाजु ीन के द हाइट हाउस म 23 नवंबर का प , पृ. 364-65। 38. जै शन, साउथ एिशयन ाइिसस, पृ. 106-7; ेन लाउघले, ए िह ी आॅफ द पा क तान आम ः वास एंड इ सरे शंस (कराचीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस), पृ. 148-9। 39. बी.जी. वग ज, एन इं ड टु कं ं टेशनः र च रं ग द सब-कं टनट (नई द लीः 1972) पृ. 35-50। 40. लाउघले, ए िह ी आॅफ द पा क तान आम , पृ. 222। 41. ले. जनरल ए.ए.के . िनयाजी, द िब ेयल आॅफ ई ट पा क तान ( द लीः मनोहर, 1998), पृ. 132। 42. वही, पृ. 114। 43. डी.आर. मानके कर, पा क तान क स टु साइज (नई द लीः इं िडयन बुक कं पनी, 1972), पृ. 54-63 44. जै सन, साउथ एिशयन ाइिसस पृ. 137-8। 45. िनयाजी के “िब ेयल” म उ धृत टेली ाम, पृ. 180। 46. देख एजाजु ीन क द हाइट हाउस, पृ. 447, 449-50। 47. िनयाजी, िब ेयल, पृ. 187। 48. लोकसभा िडबे स, 16 दसंबर 1971। 49. उस व म सरहद से यादा दूर नह रहता था। जैसे ही यहया का भाषण शु आ मने भी उसे सुना। भाषण देने से पहले उ ह ने खासी मा ा म ि ह क पी रखी थी (जैसा क कु छ पा क तानी िववरण म भी दज है) । 50. एयर चीफ माशल, पी.सी. लाल, माई ईयस िवथ द आईएएफ (नई द लीः लसर इं टरनेशनल, 1986), पृ. 321। 51. ि मथ, फोरे न रलेशंस, पृ. 439, 499, 594, 612, 674 इ या द। जो प चार यु के बाद ीमती गांधी और िन सन के बीच आ उसे भी एजाजु ीन ने द हाइट हाउस म पुन तुत कया है। पृ. 476-80। 52. टाइम, 3 जनवरी 1972; जे स रे टन, “इं िडयाज िव टरी ए इ फ फाॅर माॅ को” यूयाॅक टाइ स, अ दनां कत (शायद 20 दसंबर 1971) स जे ट फाइल 217 म कतरने। पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 53. थाॅट, 29 जनवरी 1972। 54. सी.एम. नईम के ऐ ब यूइटीज आॅफ हे रटेजः फ शन एंड पोलेिम स (कराचीः िसटी ेस, 1999) पृ.139 पर उ धृत। 55. देख “इं िडया आ टर बंगलादेशः ए िस पोिजयम” गांधी माग, खंड-16, नंबर-2, 1972। 56. कै रोल ाइटमैन संपा दत िबटिवन सः काॅर पो डस आॅफ हानह एरट एंड मैरी मेकाथीर्, 1949-75 ( यूयाॅकः हरक ट ेस एंड कं पनी, 1995) पृ. 303। 57. अटल िबहारी वाजपेयी, थाॅट म उ धृत, 20 मई 1972। 58. रं जीत राॅय, द एगोनी आॅफ वे ट बंगालः ए टडी इन यूिनयन टेट रलेशंस तीसरा सं करण, (कलक ाः यू एज पि लशस, 1973), पृ. 3-4, सजल बसु, वे ट बंगाल-द वायोलट ईयस (कलक ाः ाची पि लके शंस,1974), पृ. 78। 59. “मेसेज टु िमसेज गांधी ाॅम सर एलेस डगलस-होम” 20 माच 1972, स जे ट फाइल 179, पी.एनह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 60. जैसा क आई.जी. पटेल को िलखे प म एस.आर. सेन ने उ धृत कया है। प फाइल 225, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। दनांक 2 माच 1972, स जे ट 61. स जे ट फाइल 236 म िबना शीषक का नोट, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 62. पी.एन. ह सर को स ाद जहीर का प , 23 माच 1972, स जे ट फाइल 243, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। मजहर अली खान उ छा आंदोलनकारी और बड़े लेखक ता रक अली के िपता थे। 63. ए.राघवन, “फाइव डेज दैट च ड िह टरी”, ि लज 8 जुलाई 1972। 64. 12 माच 1972 को धर ारा िलखा गया नोट, स जे ट फाइल 235, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 65. िशमला समझौते का मसौदा अ पादुरई क कताब िसले ट डाॅ यूमट म पुन तुत क गई है। पृ. 443-45। 66. भाषण का मजमून स जे ट फाइल 93, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल म पाया जा सकता है। 67. नोट, वही। 4 ित ं ी 1. देख इं दरा गांधी, इं िडयाः द पीचीज एंड रे मिनससेज आॅफ इं दरा गांधी ाइम िमिन टर आॅफ इं िडया (लंदनः हाॅडर एंड टाघटन, 1975) पृ. 215-16। 2. जैसा क 16 अग त 1972 के द हंद◌ू म दज आ। 3. धम कु मार संपा दत द कै ि ज इकोनाॅिमक िह ी आॅफ इं िडया, खंड-2 म ए. वै नाथन िलिखत “द इं िडयन इकोनाॅमी संस इं िडपडस” (1947-70) (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1983)। 4. इस पैरा ाफ म ामीण भारत पर कए गए कई िवशत अ ययन का संि प तुत कया गया है। इन अ ययन म शािमल है-जी पाथसारथी क “ए साउथ इं िडयन िवलेज आ टर टू िडके स” इकोनाॅिमक वीकली, 12 जनवरी 1963, कु मुदनी दांडक े र और वैजयंती भाटे, “सोिशयो-इकोनाॅिमक चज ू रं ग ी फाइव ईयर ला स” अथ िवजनाना, खंड-17, नंबर-4, 1975; टम पी बेिलस-ि मथ और सुधीर वनमाली संपा दत अंडर ट डंग ीन रवो यूशनः ए े रयन चज एंड डेवलपमट ला नंग इन साउथ एिशया म राॅबट ड यू. ेडनाॅक िलिखत “ए ी लचरल डेवलपमट इन तिमलनाडु ः टू िडके स आॅफ लड यूज चजेज एट िवलेज लेवेल” (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1984)। 5. ये िववरण आमतौर पर इन òोत से िलए गए ह- एम.एल दांतवाला, पाॅवट इन इं िडयाः देन एंड नाउ (म ासः मैि मलन इं िडया, 1971); और वािडलाल दागली संपा दत ट टी फाइव ईयस आॅफ इं िडपडस-ए सव आॅफ इं िडयन इकोनाॅमी म एम.मुखज , एन.भ ाचाया और जी.एस. चटज . “पाॅवट इन इं िडयाः मेजरमट एिमिलयोरे शन” (बंबईः बोरा एंड कं पनी, 1973)। दांडक े र-रथ अ ययन सबसे पहले जनवरी 1971 म इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली म कािशत आ था। 6. एस.सी. दुबे संपा दत इं िडया संस इं िडपडसः सोशल रपोट इन इं िडया, 1947-72 म जे.पी. नायक िलिखत “एजुकेशन” (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1977); जगमोहन संपा दत वटी फाइव ईयस आॅफ इं िडयन इं िडपडस म अमरीक संह, वटी फाइव ईयस आॅफ इं िडयन एजुकेशन; एन असेसमट (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस 1973)। 7. “इं िडयन इकोनाॅिमक परफोरमसः ए े ववक फाॅर ए ो ेिसव सोसाइटी” (1973) जगदीश एन. भगवती के एसे इन डेवलपमट इकोनाॅिम स म पुनमु त (कै ि ज-मासः एमआईटी ेस, 1985)। 8. अनाम, “म मी नोज बे ट” थाॅट, 2 अ टू बर 1971। 9. थाॅट, 5 मई 1971; डी.आर. राजगोपाल, “संजय गांधी” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 11 जुलाई 1971। 10. 2 फरवरी 1971 के प , इं दरा गांधी काॅरे प डस, पी.एन. ह सर पेपस, एनएमएमएल। 11. द करं ट, 28 जुलाई 1973। 12. द टार, 12 अग त 1973, स जे ट फाइल 93 म कतरने, पी एन ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 13. 29 जून 1971 को जारी कया गया नोट, òोत- वह 14. देख स जे ट फाइल 242 और 243 के नोट और प चार, पी एन ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 15. अगर कह दूसरे जगह नह कािशत आ है तो यह िववरण “ टेटस आॅफ वीमैन इन इं िडया” (नई द लीः इं िडयन काउं िसल आॅफ सोशल सा स रसच, 1974) पर आधा रत है। इसम से जहां कभी भी आंकड़ का इ तेमाल आ है उनम से यादातर 1971 के भारत क जनगणना से िलए गए ह। 16. डी.आर. गाडिगल, “वीमैन इन द व कग फोस इन इं िडया” (लंदनः एिशया पि ल शंग हाउस, 1965); बीना अ वाल, “वीमैन, पाॅवट एंड ए ीक चर ोथ इन इं िडया” जनरल आॅप पीजट टडीज, खंड-13, नंबर-2, 1985-6। 17. राधा कु मार, द िह ी आॅफ डू इंगः एन इल ेटेड अकाउं ट आॅफ मूवमट फाॅर वुमै स राइ स एंड फे िमिन म इन इं िडया, 1860-1990 (नई द लीः कली फाॅर वुमैन, 1993), अ याय-6। 18. यादा िववरण के िलए देख पी.जी. के पािण र और सी.आर. सोमण, “हे थ टेटस आॅफ के रला” (ि व मः सटर फाॅर डेवलपमट टडीज, 1984)। 19. रोना ड जे ह रं ग, “एबोिलशन आॅफ लड लाॅ ड म इन के रलाः ए रिडि यूशन आॅफ ि िवलेज” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, र ू आॅफ ए ीक चर, जून 1980; पी राधाकृ णन, “लड रफाम एंड चजेज इन लड िस टमः टडी आॅफ ए के रला िवलेज” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, र ू आॅफ ए ीक चर, िसतंबर 1982 20. देख लोकसभा िडबे स, 30 नवंबर 1971 21. जि टस के .एस. हेगड़े, “पसपेि टव आॅफ द इं िडयन कं ि ट ूशन” राज सार मेमो रयल ले चर, भारती; िव ाभवन, बंबई, माच 1972, स जे ट फाइल 220 म ितिलिप, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 22. देख जय काश नारायण को िलखा गया इं दरा गांधी का प , 9 जून 1973. जेपी का जवाब 27 जून 1973, दोन ही जय काश नारायण पेपस, एनएमएमएल म। 23. ए.जी. नूरानी, “ ाइिसस इन इं िडयाज जुिडिशयरी”, इि ट, जनवरी 1974। 24. इं दर म हो ा, “इं दरा गांधीः ए पसनल एंड पाॅिल टकल बायो ाफ ” (लंदनः हाॅडर एंड टाघटन, 1989), पृ. 152-3 इ या द। 25. थाॅट, 1 जनवरी 1972। 26. थाॅट, 8 जुलाई 1972। 27. द करं ट, 8 जुलाई 1972; थाॅट, 23 िसतंबर 1972। 28. इन वाता का िववरण उपल ध नह है ले कन कु छ आकलन क इन बातचीत म या आ होगा वह स जे ट फाइल 183 और 235, पी.एन. ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल म देखा जा सकता है। 29. 70 के दशक क शु आत म नगालड क घटना का यह िववरण कोिहमा से िनकलने वाली सा ािहक िस टजंस वाॅयस पर आधा रत ह। इसके अंक बाॅ स-ट प्, पाउसे पेपस, सीएसएएस म उपल ध है। 30. थाॅट, 2 माच 1974। 31. देख अिजत भ ाचाया क अन फिन ड रवो यूशनः ए पाॅिल टकल बायो ाफ आॅफ जय काश नारायण (नई द लीः पा एंड कं पनी, 2004) पृ. 193। 32. शु के तीन पैरा ाफ घन याम शाह के तीन क त म िलखे लेख रवो यूशन, रफाॅम ओर ोटे ट?” से िलए गए ह। यह लेख िबहार आंदोलन पर इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली म तीन क त म छपा एक अ ययन है। 33. इं दरा गांधी और जय काश नारायण के बीच आ प चार जो सामि य के िहसाब से काफ समृ है और दोन ही प के जीवनीकार ारा अभी तक कायदे से इ तेमाल म नह लाया गया है, वह जय काश नारायण पेपस, एनएमएमएल म उपल ध है। जेपी और नेह के बीच का प चार िजसको भी कायदे से अ ययन नह कया गया है वह भी इन सं ह म जहां-तहां है। साथ ही वह ानंद पेपस म भी है, एनएमएमएल। 34. भ ाचाज के अन फिन ड रवो यूशन म उ धृत, पृ. 205-6। 35. स जे ट फाइल 272, क रपोट देख। जय काश पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 36. एवरीमैन वीकली म छपा भाषण। मूल भाषण का अं ेजी अनुवाद, 22 जून 1974। 37. देख राॅबट जे. िल टन, रवो यूशनरी इमोटिलटीः माओ से तुंग एंड क चर रवो यूशन (पगुइनः हम सवथ,1967)। म जानबूझकर यह तुलना मक िव ेषण पेश कर रहा ं यह जानते ए क मा सवादी कहगे क माओ क तुलना म जेपी एक नरम सुधारवादी थे जब क गांधीवादी कहगे क अ हंसा के पुजारी क तुलना ऐसे आदमी से कै से क जा सकती है जो इतनी मौत का एक साथ िज मेवार रहा हो। 38. अनाम, रे लवे “ ाइक इन र ो पे ट” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 18 जनवरी 1975। 39. एस िनहाल संह, इं दराज इं िडयाः ए पाॅिल टकल नोटबुक (बंबईः निचके ता पि लके शन, 1978), पृ. 215-16। 40. जाॅज परकोिवच, इं िडयाज यूि लयर बाॅ बः द इमपै ट आॅन लोबल ोिल फरे शन (बकलेः यूनीव सटी आॅफ कै िलफो नया ेस, 1999), पृ. 170-80; थाॅट, 25 मई 1974, होरीस अले जडर को िलखा पा क तान के त कालीन िवदेशमं ी अजीज अहमद का प , 15 जून 1974, अले जड पेपस, स हाउस, यू टन। 41. ये पैरा ाफ ीमती गांधी और जेपी के बीचे ए प चार पर आधा रत ह। जय काश नारायण पेपस, तीसरी क त एनएमएमएल। 42. भ ाचाज , अन फिन ड रवो यूशन, पृ. 211, एवरीमै स वीकली, 21 िसतंबर 1974। 43. देख आचाय राममू त और जेपी के बीच आ प चार, स जे ट फाइल 273, जय काश नारायण पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 44 14 अ टू बर 1974 के प , स जे ट फाइल 277, जय काश नारायण पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। पा टल के प के जवाब म अगर जेपी ने कोई जवाब भी दया था तो वह अनुपल ध है। पा टल का वह प उनके महाराि यन नेता अंबेडकर क उस चंता क याद दलाता था िजसके बारे म उ ह ने संिवधान सभा म चेतावनी दी थी। 45. भ ाचाज , अन फिन ड रवो यूशन, पृ. 216-17। 46. एवरीमै स वीकली, 16 और 23 नवंबर 1974। 47. देख बी.एस. दास क द िस म सागा (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1983)। 48. जेपी को िम टर शाह का प , 18 जुलाई 1974, अडू नी, कू रनूल िजला, आं जय काश नारायण पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। देश, स जे ट फाइल 273, 49. देख स जे ट फाइल 272 म दया गया व , जय काश नारायण पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 50. पहले के िवचार को जानने के िलए देख एवरीमै स वीकली, 1974-5, बाद के िवचार को जानने के िलए देख उसी अविध का इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया। 51. कै थरीन क, इं दराः लाइफ आॅफ इं दरा नेह गांधी (लंदनः हापरकाॅ लंस, 2001), पृ. 368, टोफर एं यू और वािसली िम ोिखन क , “द व ड वाज गोइं ग आवर वेः द के जीबी एंड द बैटल फाॅर द व ड” ( यूयाॅकः बेिसक बु स, 2005), पृ. 222-3। 52. अगर इसका िज कह नही आ है तो यह िववरण इं िडयन ए स ेस के रपो स पर आधा रत है। 1 फरवरी से 21 माच 1975। 53. “द साउथ पोजेज ए ाॅ लम फाॅर जेपी” एवरीमै स वीकली, 4 मई 1975। 54. न े िवले आॅि टन, व कग द डेमो े टक कं ि ट यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 314-16। ूशनः द इं िडयन ए सपी रयंस (नई द लीः आॅ सफोड 55. इं िडयन ए स ेस, 20 माच 1975। 56. अगर इसका िज कह नह जून 1975। आ है तो यह िववरण इं िडयन ए स ेस के रपोटŻस पर आधा रत है। 10 से 28 57. शांत भूषण, द के स दैट शूक इं िडया (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1978), पृ. 98। 58. वही, पृ. 94। 59. डाॅम मो रस क पु तक इं दरा गांधी म उ धृत (बाॅ टन, िल टल ाउन एंड कं पनी, 1980), पृ. 220। 60. डेिनयल ले टफ , “इं दरा गांधी के स रिविजटेड” अना दनां कत िववरण, स जे ट फाइल 225, पी.एन ह सर पेपस, तीसरी क त, एनएमएमएल। 5 संकट म लौह मिहला 1. इं दरा गांधी, डेमो े सी एंड िडसी लीनः पीिचज आॅफ ीमती इं दरा गांधी (नई द लीः सूचना एवं सारण मं लय, 1975) पृ. 1-2। 2. पुपुल जयकर क पु तक इं दरा गांधीः एन इं टमेट बायो ाफ म पुन तुत क गई है। ( यूयाॅकः पेि थयन बु स, 1993), पृ. 202-3। 3. के .आर. मलकानी, द िमडनाईट नाॅक (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1978) पृ. 37। 4. गांधीः डेमो े सी एंड िडसी लीन, पृ. 18, 19, 61 आ द। इस कताब म आपातकाल के पहले तीन महीन म धानमं ी ारा दए गए 11 सा ा कार का िज है। ऐसा लगता है क कभी कोई धानमं ी ेस के ित इतना आक षत नह रहा होगा। 5. देख डी.वी. गांधी संकिलत एरा आॅफ िडिसि लनः डाॅ यूम स आॅन कं टे परे री रयिलटी (नई द लीः समाचार भारती, 1976) पृ. 254। 6. इं दरा गांधीः कं सोिलडे टंग नेशनल गे सः पीचीज आॅफ ीमती इं दरा गांधी (नई द लीः सूचना एवं सारण मं लय, 1976) पृ. 29. यह भाषण मूलतः हंदी मे दया गया था, यहां मने उसका आिधका रक अनुवाद तुत कया है। 7. जो ई डर, “ रपोट आॅन िविजट टु इं िडया, अग त 11-12, 1975”, फाइल-78, होरे स अले जड पेपस, हाउस, यू टन। स 8. एस.के . डे को शारदा साद, 16 िसतंबर 1975, वही। 9. पी.एन. धर, इं दरा गांधी, द इमरजसी एंड इं िडयन डेमो े सी (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2000) पृ. 307-11। 10. शेख अ दु ला को जय काश नारायण का प , 23 िसतंबर 1975, एम.जी. देवासहायम के इं िडयाज सैकंड डम-एन अनटो ड सागा (नई द लीः िस ाथ पि लके शन, 2004), पृ. 351-4। 11. जेपी क जेल से रहाई क प रि थितय को जानने के िलए देख वह पु तक िजसका िज ऊपर आ है। अ याय-29-30। 12. के . गंगाधरन, पी.जे. कोशी और सी.एन. राधाकृ णन क पु तक द इन िजशनः रवीलेशन िबफोर द शाह कमीशन (नई द लीः पाथ पि लशस, 1978), पृ. 260 के टेबल देख। 13. 14 जनवरी 1976 के नोट, इमरजसी फाइल म। ह रदेव शमा पेपस, एनएमएमएल। 14. वै रयर एि वन को िलखा इं दरा गांधी का प , 14 जनवरी 1963, वह प एि वन प रवार के पास िशलांग म है। 15. देख वेद मेहता क पोटट आॅफ इं िडया ( यूयाॅकः फे रर, 16. न े वेल आि टन, “व कग ए डेमो े टक कं ि ट यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 319-24। ाॅस एंड िगराॅ स, 1970), पृ. 545-46। ूशनः द इं िडयन ए सपी रयंस (नई द लीः आॅ सफोड 17. वही, पृ. 334-41। 18. यूयाॅक टाइ स, 30 अ ैल 1976। 19. न े वेल आि टन, व कग ए डेमो े टक कं ि ट ूशन पृ. 373-4, इसके अलावा ननी पालक वाला क कताब “ रशे पंग द कं ि ट ूशन” भी देख जो इले ेटेड वीकली आॅफ इं िडया म 4 जुलाई 1976 को छपी थी। 20. इं दरा गांधी के साथ मुलाकात पर नोट। 1 सफदरजंग रोड, 14 माच 1976। एमएसएस यूरो एफ 236/269, ओआईओसी। 21. देख ितबंिधत सामि य का िव तृित िववरण, सजल बसु संपा दत, अंडर ाउं ड िलटरे चर, इमरजसी (कलक ाः िमनवा एसोिशयेट, 1978), पृ. 102-14। 22. काश आनंद, ए िह ी आॅफ द यून (नई द लीः द यून ू रं ग इं िडयन ट) 1986, पृ. 165-6। 23. पडरे ल मूल को िलखा रामकृ ण शमा का प , 25 नवंबर1975, एमएसएस यूरो एफ23036, ओआईओसी। 24. गा जयन म छपी रपोट, 2 अग त 1976। 25. जाॅन दयाल और अजय बोस, द शाह कमीशन िबगी स (नई द लीः ओ रयंट ल गमैन, 1978), पृ. 208; माइकल हडरसन, ए सपेरीमट िवथ अन थः इं िडया अंडर इमरजसी ( द लीः मैि मलन इं िडया, 1977), पृ. 89। 26. जी.एस. भागव, “द ेस इन इं िडयाः एन ओवर ू (नई द लीः नेशनल बुक ट, 2005), पृ. 53 इ या द। 27. दयाल एंड बोस, शाह कमीशन, पृ. 280-93; हडरसन, ए सपे रमट िवथ अन थ, पृ. 89। 28. देख के .के . िबड़ला क इं दरा गांधीः रे िमिनसस (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1987), पृ. 50-51। 29. भागव, द ेस इन इं िडया, पृ. 65-6। 30. वेद मेहता क कताब द यू इं िडया (हरम सवथ, पं◌ेगुइन, 1978), पृ. 63-4 म उ धृत। 31. संडे टाइ स म जोनाथन डंबलेबी क रपोट। अिमया राव और बी जी राव संपा दत द ेस शी कु ड नोट ि नपः इमरजसी इन इं िडया एज रपोटड बाई फाॅरेन ेस (बंबईः पोपुलर काशन, 1977), पृ. 20-21। 32. इं दर म हो ा, इं दरा गांधीः ए पसनल एंड पाॅिल टकल बायो ाफ (लंदनः हाॅडर एंड टाघटन, 1989) पृ. 182। 33 यूयाॅक टाइ स म छपी जे. एंथनी लुका स क रपोट, राव एंड राव संपा दत द ेस शी कु ड नोट ि नप म पुन तुत, पृ. 186-98। 34. देख बसु, अंडर ाउं ड िलटरे चर, पृ. 7-11। 35. पी.जी. मावलंकर, नो सर’◌ः एन इनिडपडट एमपी पी स 1979), पृ. 20-5, 29-30 आ द। ू रं ग द इमरजसी (अहमदाबाद, सिन ा काशन, 36. द इकोनाॅिम ट, 24 जनवरी 1976। यह िन य ही एक अितरं जना है और भूिमगत समाचारप स या समाचार ारा दी गई खबर पर आधा रत है। 37. स या समाचार, 20 िसतंबर 1976, ‘इमरजसी फाइल’ म। ह रदेव शमा पेपस, एनएमएमएल। 38. सुगाता ीिनवासराजू ारा अनु दत और अपने अनुवाद के सबूत के प म पुन तुत िच. ीिनवासराजू क फोनी स एंड फोर अदर माईम लेज (बंगलौरः नवकनाटका पि लके शंस, 2005)। 39. देख बसु, अंडर ाउं ड िलटरे चर, पृ. 27, 29, 65; हडरसन, ए सपे रमट िवथ अन थ, पृ. 21। 40. जाॅज फना डीज क गितिविधय पर आधा रत ये पैरा ाफ सी.जी.के . रे ी िलिखत बडौदा डाइनामाइट कं सिपरे सीः द राइट टु रबेल पर आधा रत है (नई द लीः िवजन बुक, 1977)। इसके अलावा इसम इमरजसी फाइल, ह रदेव शमा पेपस, एनएमएमएल और ेहलता रे ी क ‘ए ि जन डायरी’ (मैसूरः कनाटका टेट यूमन राई स कमेटी, 1977) से भी मदद ली गई है। 41. हडरसन, ए सपे रमट िवथ अन थ, पृ. 27। 42. मुझे खेद है क म इस कहानी के िलए कोई संि संदभ नह दे पा रहा ।ं मुझे याद नह है क मने इसे पहले कहां पढ़ा या सुना था। इसे मने कसी दो त के मुंह से सुना था जो कृ पलानी को जानता था या कसी अखबार म उनक ांजिल म पढ़ा था, मुझे याद नह आ रहा। दुख क बात ये है क ब त सारे उ लेखनीय ि व क तरह ही कृ पलानी का भी अभी तक कोई जीवनीकार सामने नह आया है। 43. ‘द इमरजसीः ए नीडेड शाॅक’ टाइम, 27 अ टू बर 1975। 44. िसडनी माॅ नग हेरा ड, 1 िसतंबर 1976। 45. 3 और 14 जुलाई को द टाइ स म छपी िच यां। 46. ‘इं दरा गांधीज ईयर आॅफ फे योर’ आॅ जवर का संपादक य, 27 जून 1975। 47. इस कताब को िलखते व संजय गांधी क एक मा ा जीवनी जो उपल ध थी वो थी िवनोद मेहता क द संजय टोरीः ाॅम आनंद भवन टु अमेठी (बंबईः जयको 1978)। 48. यह सा ा कार अपने पूण प म उमा वासुदव े क पु तक टू फे सेज आॅफ इं दरा गांधी (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1977) म पुन तुत क गई है। पृ. 193-208। वासुदव े िज ह ने वो सा ा कार िलया था वो उस समय सज क संपादक थ । 49. वही, पृ. 108-10, धर, इं दरा गांधी, पृ. 325-9। 50. इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 25 जनवरी 1976। 51. इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 15 अग त, 14 अ टू बर, 7 और 14 नवंबर 1976। 52. दयाल एंड बोस, शाह कमीशन, पृ. 189, 229; मेहता, द संजय टोरी, पृ. 139। 53. जनादन ठाकु र, आॅल द ाइम िमिन टस मैन (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1977), पृ. 57; स य संह, ‘ ली जंग द ाउन ंस’, संडे पायोनीयर, 25 जून 2000, मेहता, द संजय टोरी, पृ. 87, 97, 165। 54. मेहता, ‘द संजय टोरी’ पृ. 81। 55. देख ए मा ताल , ‘अनसेट लंग मेमोरीजः नैरे ट स आॅफ इं िडयाज ‘इमरजसी’ ( द लीः परमानट लैक, 2003), पृ. 80-2, 98 और पृ. 148 के बाद न शा। 56. जगमोहन, ‘आईजलड आॅफ थ’ (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1978) पृ. 9-10, 182-3 57. मेहता, ‘ द संजय टोरी’; जनादन ठाकु र, ‘आॅल द ाईम िमिन टस मैन’ ओर उमा वासुदव े , ‘टु फे सेज’ इन सभी कताब म इन चाटु कार और उनके कारनाम का िज है। 58 ए मा ताल , ‘अनसेट लंग मेमोरीज’, पृ. 140। 59. तुकमान गेट क इस घटना का ये िववरण मु य प से जाॅन दयाल और अजाॅय बोस क कताब फाॅर रीजंस आॅफ टेटः देलही अंडर इमरजसी ( द लीः एस.एस. पि लके शंस, 1977) अ याय-2 पर आधा रत है। ले कन इसके अलावा मेहता क द संजय टोरी भी देख। पृ. 90-95। इं दर मोहन, तुकमान गेट, संजय गांधी एंड ितहाड़ जेल, पीयूसीएल बुले टन, खंड-5, नंबर-8, अग त 1985। दयाल, बोस और मेहता िलखते ह क जगमोहन का तुकमान गेट खाली कराने का इरादा इस बात से े रत था क उस इलाके म मुसलमान रहते थे - वह उ ह पा क तान के पांचव तंभ के प म देखते थे। हालां क जगमोहन का अपना िववरण उनक कताब आइसलड आॅफ थ, पृ. 144-9 म दज है। 60. मोह मद युनूस, पस स, पैसंस एंड पाॅिल ट स (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1980), पृ. 251-2। 61. स या समाचार, 12 जून 1976, ‘इमरजसी फाइ स’, ह रदेव शमा पेपस, एनएमएमएल। 62. इस मु े पर एक िवशत सािह या उपल ध है िजसके बारे म यह छोटा सा लेख याय नह कर पा रहा है। इस मु े क ज टलता क एक झलक पाने के िलए पढ़ वीण िवसा रया क , पाॅपुलेशन पाॅिलसीज, सेिमनार, माच 2002। 63. इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 15 अग त 1976। 64. मेहता, द संजय टोरी, पृ. 112। 65. वही, पृ. 117-19; ताल , अनसेट लंग मेमोरीज, पृ. 80-2,98,140,150-1। 66. ली आई. ले शंजर, ‘द इमरजसी इन एन इं िडयन िवलेज’, एिशयन सव, खंड-17, नंबर-7, जुलाई 1977। 67. स या समाचार, 26 िसतंबर 1976; लोक संघष सिमित क यूज बुले टन, 23 नवंबर 1976, दोन ही इमरजसी फाइल, ह रदेव शमा पेपस, एनएमएमएल। 68. बसु, अंडर ाउं ड िलटरे चर, पृ. 36, गंगाधरण, इं िजशन, पृ. 130-3। 69. द लोकस लािसकस इस िवचार का मु य òोत उनके अपने ही पूव सिचव पी.एन. धर ारा िलिखत इमरजसी पर एक कताब है। हालां क उस तक क छाया ीमती गांधी क लगभग हरे क जीवनी पर है। देख धर क इं दरा गांधी और जयकर, म हो ा, मोरे स और वासुदव े क पु तक िजनका िज ऊपर कया गया है। 70. द टाइ स, 26 अग त 1976। 71. जाॅन ि ग, “ ट िवथ िडपो ट म”, पे टेटर, 21 अग त 1976। 72. देख ीमती गांधी और अले जडर के बीच आ प चार, फाइल-78, होरे स अले जडर पेपस, यू टन। स हाउस, 73. राव एंड राव संपा दत ‘द ेस शी कु ड नोट ि नप म लेिवन का लेख पुन कािशत कया गया है। पृ. 124-31, 268-76। 74. धर, इं दरा गांधी, पृ. 344। 75. हडरसन, ए सपेरीमट िवथ अन थ पृ. 153; कु लदीप नायर, द जजमटः इनसाइड टोरी आॅफ इमरजसी इन इं िडया (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1977) पृ. 55। 76. ए.एम. रोजथल, ‘फादर एंड डाउटरः ए रमे बरस’ यूयाॅक टाइ स, 1 नवंबर 1984। 77. देख जवाहरलाल नेह क ि ल पसेज आॅफ व ड िह ी (1934◌ः चौथा सं करणः लंदन, लंडसे, म ड, 1949)। 6 कां ेसी साये से बाहर 1. एस. देवीदास िप लई संपा दत द इन े िडबल इले शंसय 1977◌ः ए लो-बाई- लो डाॅ यूमट एज रपोटड इन द इं िडयन ए स ेस (बंबईः पोपुलर काशन, 1977), पृ. 19-22, 37-38, 43। 2. वही, पृ. 74-76, 107-11। 3. इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 6 माच 1977। 4. अिजत भ ाचाज , ‘अन फिन ड रवो यूशनः ए पाॅिल टकल बायो ाफ आॅफ जय काश नारायण (नई द लीः पा एंड कं पनी, 2004) पृ. 282-3। 5. िप लई संपा दत द इन े िडबल इले शंस; पृ. 196, 198237, 244-5, 247। 6. इं दर म हो ा, ‘द कै पेन दैट वाज’ इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 20 माच 1977; जावेद आलम, डोिमिनयन एंड िडसटः पीज स एंड पाॅिल ट स (कलक ाः मं दरा, 1985), पृ. 63, 65, 98, 168-9। 7. िप लई संपा दत ‘द इन े िडबल इले शंस; क रपो स पृ 419-22। 8. एस.एल.एम. चंड, द पाॅपुलर अपसज एंड द फाॅल आॅफ कां ेस (चंडीगढ़ः अिभषेक पि लके शन, 1977) 9. देख िथयोडोर पी. राइट जूिनयर, मुि ल स एंड द 1977 इं िडयन इले शनः ए वाॅटरशेड?’ एिशयन सव, खंड-17, नबंर 12, दसंबर 1977। 10. फोरी नेह को इं दरा गांधी का िलखा प , 17 अ ैल 1977, पुपुल जयकर पेपस म ितिलिप, मुंबई। 11. ‘एिडटस पेज’ म खुशवंत संह का लेखन, इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 27 माच 1977। 12. जनादन ठाकु र, आॅल द जनता मैन (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1979) पृ. 148। 13. देख िह मत। 30 जून 1978। 14. यूयाॅक टाइ स, 22 माच 1977, वाॅ शंगटन पो ट, 19 अ ैल 1977। दोन ही बलदेव राजनायर क “इं िडया एंड द सुपरपावसः डेिवएशन ओर काॅि टनुएशन इन फाॅरेन पाॅिलसीज?” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली म उ धृत कए गए ह। 15. अिजत भ ाचाय क ‘जनताज फाॅरेन पाॅिलसीज’, िह मत, 30 जून 1977। 16. काटर क या ा पर अखबारी कतरने। फाइल 77, होरीस अले जडर पेपस, स हाउस, यू टन। 17. 7 नवंबर 1977 म द टाइ स क खबर। 18. जैसा क 21 फरवरी 1999 के यू इं िडयन ए स ेस म फर से याद कया गया है - “ नेन िजया काॅ लीमटेड वाजपेयी।” 19. देख िह मत क रपोट, 4 नवंबर 1977। 20. िह मत, 20 जनवरी 1978। 21. के .ए. अ बास, जनता इन ए जाम? (बंबईः जैको पि ल शंग हाउस, 1978) पृ. 84। 22. अिजत राॅय, ‘वे ट बंगालः नोट ए िनगे टव वोट’ इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 2 जुलाई 1977 23. सुनील सेनगु ा, ‘वे ट बंगाल लड रफाम एंड ए े रयन सीन’ इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, र ू आॅफ ए ीक चर, जून 1981। अतुल कोहली, द टेट एंड पावट इन इं िडयाः द पाॅिल ट स आॅफ रफाॅम (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1987)। 24. नर सु यन, एथिनिसटी एंड पाॅपुिल ट माॅबलाइजेशनः पाॅिल टकल पाट ज, िस टजंस एंड डेमो े सी इन साउथ इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 283-6; के मोहनदास, ‘एमजीआरः द मैन एंड द िमथ (बंगलौरः पथर पि लशस, 1992), पृ. 11-2, 33-4। 25. द गा जयन, 12 नवंबर 1977। 26. डी.डी. ठाकु र, ‘माई लाइफ एंड ईयस इन क मीरी पाॅिल ट स’ ( द लीः कोणाक पि लशस, 2005), पृ. 277। 27. शमीम अहमद शमीम, ‘क मीर’ सेिमनार, अ ैल 1978। मीर कािसम क माई लाइफ एंड टाइ स (नई द लीः अलाइड पि लशस, 1992) भी देख पृ. 154-5। 28. िग बट ए टने, इं िडयाज च जंग रल सीन, 1963-79 ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1982)। 29. आॅपरे शन लड का एक बि़ढया िच ण मा टन दूनबाॅस और के .एन. नायर संपा दत रसोसज, इं ि ट ूशंस एंड ेटेजीजः आॅपरे शन लड एंड इं िडयन डेयर ग (नई द लीः सेज पि लके शंस, 1990); शांित जाॅज, आॅपरे शन लडः एन ए ेजल आॅफ करं ट इं िडयन डेयरी पाॅिलसीज ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1985) म कया गया है। 30. आशुतोष वा णेय, डेमो े सी, डेवलपमट एंड द कं ीसाइडः अबन- रल यूनीव सटी ेस, 1998) अ याय-4। गल इन इं िडया (कै ि जः कै ि ज 31. देख वही, साथ ही अशोक िम क ट स आॅफ ेड एंड लास रलेशंस (लंदनः क कै स, 1977)। 32. नीरजा चौधरी, ‘शाप नंग द बैटल लाइं स’ िह मत, 23 माच 1979; हैरी ड यू. लेयर, ‘राइ जंग कु ल स एंड बैकवाड लासेज इन िबहारः सोिशल चज इन द लेट सेवटीज’, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 12 जनवरी 1980। 33. क पना शमा, “िबहार-द अनगवनबुल टेट?” और राजीव शंकर, “वाय; िबहार रमे स पूअर?” दोन लेख िह मत म छपे, 6 अ टू बर 1978। 34. सि दानंद, “िबहास ए सपी रयंस”, सेिमनार, नवंबर 1979। 35. अ ण िस हा, “ लास वार, नोट ‘ए ोिसटीज’ एंग ट ह रजंस” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 10 दसंबर 1977; वीण सेठ, “इन द कं ीसाइड”, सेिमनार, नवंबर 1979। 36. अ याचार िवरोध सिमित, “द मराठवाड़ा राइ सः ए रपोट”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 12 मई 1979। 37. ओवेन एम. लंच, “राइ टंग एज रे शनल ए शनः एन इं ट ेटेशन आॅफ अ ैल 1978 राइ स इन आगरा” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 नवंबर 1981। 38. पुपुल जयकर, इं दरा गांधीः एन इं टीमेट बायो ाफ ( यूयाॅकः पिथयन बु स, 1993), पृ. 253-4, 263-4। 39. मधु िलिमये, जनता पाट ए सपे रमटः एन इनसाईडर अकांउट आॅफ अपोजीशन पाॅिल ट स खंड-1, ( द लीः बी.आर. पि ल शंग काॅरपोरे शन, 1994), पृ. 451। 40. यूयाॅक टाइ स, 30 अ टू बर 1977। 41. देख िह मत, 10 माच, 1978 42. जे स मटर, “ ै मे टक ो ेिस स इन रीजनल पाॅिल ट सः द के स आॅफ देवराज अस”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, वा षकांक, फरवरी 1980। 43. रमेश चं न, “द बैटल फाॅर िचकमगलूर” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 5 नवंबर 1978। 44. न े िवल आॅि टन, व कग द डेमो े टक कं ि ट ेस, 1999), पृ. 463-4। ूशनः द इं िडयन ए सपी रयंस ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी 45. जनता पाट म कलह और उसम िवखंडन का यह िववरण अ ण गांधी क कताब द मोरारजी पेपसः फाॅल आॅफ जनता गवनमट (नई द लीः िवजन बु स, 1983); िलमये, जनता पाट ए सपे रमट, खंड-2; टेरस जे.बायस, “चरण संह 1902-87◌ः एन असेसमट” जनल आॅफ पीजट टडीज, खंड-15, नंबर-2, 1987-8; और पूरे 1978-9 म सा ािहक िह मत के अंक पर आधा रत है। 46. 16 अ टू बर 1979 के ओिपनयन म छपा संपादक य। 47. फोरी नेह को इं दरा गांधी का प , 17 अ ैल 1977, जयकर पेपस, मुंबई। अपने ारा िलखी बायो ाफ म (जयकर, इं दरा गांधी, पृ. 303) इस प का िज करती ह ले कन अंितम मह वपूण पंि को छोर देती है। 48. िह मत, 20 जुलाई 1979। 49. जग वेश चं , वरिड ट आॅन जनता (नई द लीः मे ोपाॅिल टन बुक कं पनी, 1979), पृ. 26, 96; ठाकु र, आॅल द जनता मैन, पृ. 148-50। 50 िह मत, 6 जनवरी और 10 फरवरी के अंक, 1978। 51. शरद कारखािनस, गांधी म उ धृत, मोरारजी पेपस, पृ. 97-8। 52. आॅि टन, व कग द डेमो े टक कं ि ट ूशनस, पृ. 403-4। 53. इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 6 माच 1977। 54. यह िववरण आॅि टन के व कग द डेमो े टक कं ि ट ूशंस पर आधा रत है पृ. 409-30। ले कन सोली सोराबजी का “ रपेय रं ग द कं ि ट ूशनः द जाॅब रमस, िह मत, 23 माच 1979 भी देख। 55. राधा कु मार, द िह ी आॅफ डू इंगः एन इल ेटेड अकाउं ट आॅफ मूवम स फाॅर वीमै स राइट एंड, फे िमिन म इन इं िडया, 1860-1990 (नई द लीः कली फाॅर वीमैन, 1993), खासकर अ याय-6 ओर 8; छाया दतार, वे जंग चजः वुमैन टोबेको वकस इन िनपानी आॅगनाइज (नई द लीः कली फाॅर वीमैन, 1989) 56. यादा जानकारी के िलए देख रामचं गुहा क कताब हाउ मच शुड ए पसन कं यूम? इं वायरटिल म इन इं िडया एंड द यूनाईटेड टे स (बकलेः यूनीव सटी आॅफ कै लीफो नया ेस) अ याय-2, द इं िडयन रोड टु स टेनेिबिलटी। 57. िपछले तीन दशक म मेरे अलग-अलग लोग से बीतचीत पर यह िववरण आधा रत है। दुभा यवश आधुिनक नाग रक वतं ता से संबंिधत आंदोलन पर कोई भी इितहास या अ ययन उपल ध नह है। मसलन, कलक ा आधा रत पीप स यूिनयन फाॅर िसिवल िलबट और पीप स यूिनयन फाॅर डेमो े टक राइ स; बंबई आधा रत कमेटी फाॅर द ोटे शन आॅफ डेमो े टक राइ स या फर हैदराबाद आधा रत आं देश िसिवल िलबट ज कमेटी। हालां क नेशनल लाॅ कू ल बंगलौर के डाॅ. सीताराम ककराला अतंम व णत समूह पर एक कताब िलख रहे ह जो अंितम चरण म है ( कताब के िलए जाते समय, अब शायद पूरी हो गई होगी)। 58. अिनल सदगोपाल और याम बहादुर “न ” संपा दत, संघष और िनमाण, शंकर गुहा िनयोगी और उनके नए भारत का सपना ( द लीः राजकमल काशन, 1993) िनयोगी क ह या एक ह यारे ने कर दी िजसे संभवतः थानीय; उ ोगपितय ने भाड़े पर बुलाया था। 59. राॅिबन जेफरी, इं िडयाज यूजपेपर रवो यूशनः कै प टिल म, पाॅिल ट स एंड द इं िडयन लै वज ेस, 1977-99 (लंदनः सी.ह ट एंड कं पनी, 2000)। 7 संकट म लोकतं 1. वाॅ टर “शेवाज, “टू पाट डेमो े सीः फे स ए टे ट रन”, गा जयन 14 मई 1977। 2. यूयाॅक टाइ स क कतरने, 4 अ ैल 1977, एस.के . डे, को िलखा गया प , 17 जून 1977, दोन ही टे ट, एमएसएस577/81, होरे स अले जडर पेपस, स हाउस, यू टन। 3. इं दरा गांधी को िलखा होरे स अले जडर का प , 8 अ ैल 1977, वही। 4. सीट और मत ितशत पर ये आंकड़े जनरल आॅफ इं िडयन कू ल आॅफ पाॅिल टकल इकोनाॅमी, खंड-15, नंबर-1 और 2, 2003 के अित र ांक से िलए गए ह। यह उसके एक िवशेष अंक का िह सा है िजसका नाम “पाॅिल टकल पाट ज एंड इले शंस इन इं िडयन टेटः 1990-2003” है। इसका संपादन सुहास पलिसकर और योग यादव ने कया है। 5. भास जोशी, “एंड नोट इवेन ए डाॅग बा ड” तहलका, 2 जुलाई 2005, इं िडया टु ड,े 1-15 जनवरी 1980। 6. देख मा वयन जो स, चांसेजः एन आॅटोबायो ाफ (लंदनः वस , 1987) पृ. 271। 7. मोईन शक र, “इले शन पाट िशपेशन आॅफ माइनाॅ रटीज एंड इं िडयन पाॅिल टकल िस टम” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, वा षक अंक, फरवरी 1980। 8. निलनी संह, “इले शन एज दे रीयली आर”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 24 मई 1980। 9. बशी ीन अहमद, स एंड आॅ शंस” सेिमनार, अ ैल 1980। 10. बाॅबी हैरीपेरसाध के साथ सा ा कार का टाइपि ट, 31 मई 1980, जयकर पेपस, मुंबई। 11. इं िडया टु ड,े 16-31 मई 1980। 12 द हंद◌ू, 24 जून 1980। 13. द यून, 27 अ टू बर 1980, पुपुल जयकर पेपस मुंबई म ितिलिप। 14. इं िडया टु ड,े 16-31 अग त 1980। 15. एम.वी. कामथ, “वाय राजीव गांधी?” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 31 मई 1981। 16. इं िडया टु ड,े 1-15 दसंबर 1981। 17. भारत के उ सव पर यह पैरा ाफ एमएसएस यूरो215/232 ओआईओसी क कतरन और प चार पर आधा रत है। 18. रजनी ब शी, द लौह हौलः द बंबई टे सटाइल वकस ाइक (बंबईः िब ड डाॅ यूमटेशन सटर, 1986); मीना मेनन एंड नीरा अदरकर, वन हं ड े ईयस, वन हन ड े वाॅइसेजः द िमल वकस आॅफ िगरगांवः एन. ओरल िह ी (कलक ाः सीगल बु स, 2004) दरअसल उस हड़ताल ने शहर के कपड़ा उ ोग को ख म ही कर दया य क यादातर ईकाइयां मािलकान या सरकार ारा बीमार घोिषत कर दी गई। इन िमल क जमीन मुंबई शहर म काफ िववाद क िवषय बनी ई है य क आम लोग उस पर या तो हाउ संग ोजे ट क बात कर रहे ह या पाक बनाने क । जब िब डर लोग उसे रहाइसी अपाटमट या शाॅ पंग माॅल म त दील कर देना चाहते ह। 19. जन िमडल, इं िडया वे स (हैदराबादः संगम बु स, 1984)। 20. महा ेता देवी, “कं े ट लेबर ओर ब डेड लेबर?” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 6 जून 1981 21. डेरील डी” म टे, “इन संथाल परगना िवथ िशबू सोरे न” इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 8 अ ैल 1979; झारखंड मूवमट, दो खंड म, टाइ स आॅफ इं िडया, 13 और 14 माच 1979। झारखंड आंदोलन के ापक प र े य को जानने के िलए देख सजल बसु क पु तक, झारखंड मूवमटः एथिनिसटी एंड क चर आॅफ साइलस, (िशमलाः इं िडयन इं टी ूट आॅफ एडवां ड टडी, 1984); सुसान बी.सी. देवाले, िडसकोस आॅफ एथिनिसटीः क चर एंड ोटे ट इन झारखंड (नई द लीः सेज पि लके शन, 1992); िनमल सेनगु ा संपा दत, झारखंडः फोथ व ड डायनािम स ( द लीः आॅथस िग ड, 1982)। 22. देख नेशनेिलटी े न इन इं िडयाः सेिमनार पेपस (हैदराबादः आं शंकर गुहा िनयोगी का “छ ीसगढ़ एंड द नेशनल े न”। 23. ब टल लंटनर, लड आॅफ जाडेः ए जन जगह पर। देश रे िडकल टु ड स यूिनयन, 1982) म ूः इनसरजट बमा (बकाॅकः हाइट लोटस, 1990), पृ. 83-4 और अ य 24. ‘ रपोट आॅफ ए फै ट फाइं डंग टीम’ लु गम लुथुई और नं दता ह सर संपा दत नगालड फाइ सः ए े न आॅफ यूमैन राइ स म चै टर 21 (नई द लीः लसर इं टरनेशनल, 1984)। 25. पी. सा नाथ के साथ िनजी बातचीत जो उस समय आं देश क राजनीित पर उस समय िनगाह रख रहे थे। 26. टाइ स आॅफ इं िडया, 30- माच 1982, संडे 16 जनवरी 1983। 27. देख एनटीआर के साथ सा ा कार, संडे म, 12 दसंबर 1982। 28. टाइ स आॅफ इं िडया, 10 जनवरी 1983। 29. एम रामचं राव, ‘एनटीआर-िवि टम आॅफ िहज आउन क र मा?’ जनता, 24 अ ैल 1983। 30. इं िडयन ए स ेस, 15 िसतंबर 1983। 31. मैरन वीनर, संस आॅफ द साॅइलः माइ ेशन एंड एथिनक कं ि ल ट इन इं िडया ( ंसटनः ंसटन यूनीव सटी ेस, 1978), अ याय-3; अलका शमा, इमी ेशन एंड असम पाॅिल ट स’ ( द लीः अजंता बु स, 1999); अ नं दता दासगु ा, डेिनयल एंड रे िज टसः िसलहट पाट शन र यूजीज इन आसाम’, क टे परे री साउथ एिशया, खंड-10, नंबर-3, 2001। 32. अमलदु गुहा, ‘िल टल नेशनिल म ट ड शाविन टः अस स एंटी फोरे नर अपसज, 1979-80’, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, वा षक अंक, अ टू बर 1980। 33. संजीव ब आ, इं िडया अग ट इटसे फः असम एंड द पाॅिल ट स आॅफ नेशनेिलटी ( फलाडेि फयाः यूनीव सटी आॅफ पिसलवेिनया ेस, 1999), िवशेषकर अ याय-5; ‘नेशनिलटी े न इन इं िडया’ म ितलो मा िम ा, ‘असम एंड द नेशनल े न’; उदयन िम ा, द पेरीफे री ाइ स बैकः चैलजेज टु द नेशन टेट इन असम एंड नगालड (िशमलाः इं िडयन इं टी ूट आॅफ एडवां ड टडीज, 2000) अ याय-4 और 5। 34. चैतन; कलबाग, ‘द नाॅथ-ई ट, इं िडयाज बंगलादेश?’ इं िडया टु ड◌े, 1-15 मई 1980। 35. इकोनाॅिमक टाइ स, 3 नवंबर 1980। 36. 30 जुलाई 1980 के टाइ स आॅफ इं िडया म उ धृत। 37. देख टी.एस. मू त क असम, द िड फक ट ईयसः ए टडी आॅफ पाॅिल टकल डेवलपमट इन 1979-83 (नई द लीः िहमालयन बु स, 1983)। 38. देवीद , ‘असम एिजटेशनः इट इज नोट द एंड आॅफ द टनेल’ द फाइनै शल ए स ेस, 8 अ टू बर 1980। 39. िसख के राजनैितक इितहास पर एक ापक दृि कोण डालनेवाली मह वपूण कताब पाॅल वैलेस और सुर चोपड़ा संपा दत पाॅिल टकल डायनािम स आॅफ पंजाब (अमृतसरः गु नानकदेव यूनीव सटी ेस, 1981) है। 40. आनंदपुर सािहब ताव के कई प उपल ध ह। मने यहां जो ताव तुत कया है वो संत हरचरण संह ल गोवाल ारा स यािपत है जो हाइट पेपर आॅन द पंजाब एिजटेशन (नई द लीः गवनमट आॅफ इं िडया ेस, 1984), पृ. 67-90 पर मौजूद है। 41. पंजाब िववाद पर यह िववरण िन िलिखत पु तक और लेख पर आधा रत है - राॅिबन जेफरी, ‘ हाटस हैप नंग टु इं िडयाः पंजाब एथिनक कं ि ल ट एंड द टे ट फाॅर फे डरिलजम’, दूसरा सं करण, (ब संग टोकः मैि मलन, 1994); चांद जोशी, भंडरावालेः िमथ एंड रयिलटी (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1984); अनूप चंद कपूर,’ द पंजाब ाइिसस, ( द लीः एस. चांद एंड कं पनी, 1985); राम नारायण कु मार, द िसख अनरे ट एंड द इं िडयन टेट ( द लीः अजंता पि लशस, 1997), माक टु ली एंड सतीश जैकब, अमृतसरः िमसेज गांधीज ला ट बैटल (लंदनः पैन बु स, 1985); स तंदर संह, खािल तानः एन अके डिमक एनिलिसस (नई द लीः अमर काशन, 1982); मा टन ई मैरी और आर काॅट एपलबै संपा दत फं डामटिल म एंड द टेट म हरजोत ओबराय, “िसख फं डामेटिल मः ांसले टंग िह ी इनटु ए योरी” (िशकागोः यूनीव सटी आॅफ िशकागो, 1996); हमीश टेलफोड, ‘द पाॅिल टकल इकोनाॅमी आॅफ पंजाबः ए टंग पेश फाॅर िसख िमिलटसी’ एिशयन सव, खंड-32, नंबर-11, नवंबर 1992। 42. भंडरावाले के भाषण का िव ेषण देख माक जुएरजसमेयर क ‘द लाॅिजक आॅफ रलीिजयस वाय लेसः द के स आॅप द पंजाब’ कं ी यूशन टु इं िडयन सोिशयोलाॅजी, यू सीरीज, खंड-22, नंबर-1, 1988। 43. पाॅल वेलेस क ‘ रिलिजयस एंड एथिनक पाॅिल ट सः पाॅिल टकल मोबीलाइजेशन इन पंजाब म उ धृत आयशा कागल, िसन आर के ल और एम.एस.ए. राव संपा दत डोिमनस एंड टेट पावर इन इं िडयाः िड लाइन आॅफ ए सोशल आॅडर, खंड-2 ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस 1990), पृ. 451। 44. देख इं िडया टु डे म भंडरावाले का ोफाइल, 1-15 अ टू बर 1981; मरी जे. लीफ, साॅ ग आॅफ होपः द ीन रवो यूशन इन पंजाब िवलेज ( यू ंि वकः गर यूनीव सटी ेस, 1984), अ याय-7, ‘ रलीजन’ 45. एमएसएस यूरो एफ230/36 क कतरन, ओआईओसी। 46. इं िडयन ए स ेस, 21 िसतंबर 1981। 47. टु ली और जैकब का यवरिड स’, अमृतसर, पृ. 71, और जोशी, भंडरावाल◌े, पृ. 90। 48. अकािलय पर यादा अितवादी होने के िलए पड़ रहे दबाव के िलए एक दृि परक लेख है गोपाल संह िलिखत - सोिशयो-इकोनाॅिमक बेस आॅफ पंजाब ाइिसस’ इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 7 जनवरी 1984। 49. संडे म मधु जैन के साथ सा ा कार, 4 िसतंबर 1983, रा जंदर पुरी, “ रमे ब रं ग 1984”, नेशनल र ,ू नवंबर 2003। 50. एनी वाॅिगयर-चटज िह टाॅयर पाॅिल टक डु पंदजाब दे 1947 ए नाॅस यू रस (पे रसः एल हरमेटन, 2001), पृ. 158एफ। 51. अकालत त के मह व को जानने के िलए पढ़े मदनजीत कौर क द गो डन टे पलः पा ट एंड ेजट (अमृतसरः गु नानकदेव यूनीव सटी ेस, 1983), पृ. 268-70। 52. वैलेस एंड चोपड़ा, पाॅिल टकल डायनािम स आॅफ पंजाब म पाॅल वेलेस, “ रजीयस एंड से युलर पाॅिल ट स इन पंजाबः द िसख डाईले मा इन क पी टंग पाॅिल टकल िस टम”। 53. एम.जे. अकबर, राइट आ टर राइटः रपो स आॅन का ट एंड क युनल वायलस इन इं िडया (नई द लीः पगुइन इं िडया, 1988)। 54. अ युत या िनग, “ पे टर आॅफ का ट वार” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 माच 1981; दीप कु मार बोस, “सोशल मोिबिलटी एंड का ट वायोलसः ए टडी आॅफ गुजरात राइ स” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 18 अ ैल 1981। 55. असगर अली इं जीिनयर ारा संपा दत क युनल राइ स इन पो ट-इं िडपडस इं िडया (दूसरा सं करणः हैदराबाद, संगम बु स 1991) पृ. 95 म मोइन शक र का “एन एनािल टकल ू आॅफ क युनल वायोलस” म उ धृत। 56. इन दंग का अलग-अलग अ ययन अकबर के राइ स आ टर राइ स, इं जीिनयर के क युनल राइ स, नाग रक वतं ता समूह के अ ययन और उन साल म इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली म छपे लेख म कया गया है। 57. इन िवषय का वणन करने वाले िन िलिखत पैरा ाफ मेरे अपने अ ययन पर आधा रत ह। ले कन इसके िलए असगर अली इं जीिनयर क “एन एनािल टकल टडी आॅफ मेरठ राइ स” पीयूसीएल बुले टन, खंड-3, नंबर-1, जनवरी 1983 भी देख। 58. जाॅज मै यू, “पाॅिल टसाइजेशन आॅफ रलीजनः क वरसन टु इ लाम इन तिमलनाडु ” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 19 जून 1982। 59. देख एम.जे. अकबर क “इं िडयाः द सीज िवदीन (हरम सवथ, पं◌ेगुइन बु स, 1985), पृ. 197एफएफ। 60. देख बलराज पुरी, “ इज ले ग िवथ नेशनल इं टरे ट?” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 11 फरवरी 1984। 61. लेि टनट जनरल के .एस. बरार, आॅपरे शन लू टारः द ई टोरी (नई द लीः यूबीएस पि लशस, 1987), पृ. 35-7। चूं क बरार ने उस आॅपरे शन का नेतृ व कया था और सारे प कार को वहां से हटा दया गया था इसिलए उस िवषय पर मेरे लेखन म बरार क कताब एक मह वपूण òोत है। हालां क इसके साथ टु ली और जैकब क कताब अमृतसर को भी पढ़ना चािहए जो क च मदीद और उस घटना म बच गए लोग के साथ सा ा कार पर आधा रत है। 62. बरार, आॅपरे शन लू टार, पृ. 91। 63. वही, पृ. 126-7। 64. पटवंत संह और हर जी मिलक संपा दत पंजाब द फे टल िमसकै लकु लेशंस म ले जनरल जे.एस. अरोड़ा “इफ खािल तान क स, द िस स िवल बी द लूजस” (नई द लीः पटवंत संह, 1985), पृ. 133। 65. जे.एस. ेवाल, “द िस स आॅफ पंजाब”, दूसरा सं करण (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 227। 66. शहनाज अंकलेस रया, “फाॅल आउट आॅफ आम ए शनः ए फ ड रपोट” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 जुलाई 1984। 67. अमृता बसु और अतुल कोहली संपा दत क युिनटी कं ि ल ट एंड द टेट इन इं िडया म टेन िवडमैम का “द राइज एंड फाॅल आॅफ डेमो े सी इन क मीर, 1975-89” ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1988); बी.के . नेह , “नाइस गायज फिनश सैकंड” (नई द लीः वाइ कं ग, 1997), पृ. 627-41। 68. द वीक, 26 अग त 1984। 69. एना सेलर को इं दरा गांधी का प , 20 अ टू बर 1984, जयकर पेपस म ितिलिप, मुंबई। 70, वही, पुपुल जयकर, “31 अ टू बर”। 71. द ली म ए िसख िवरोधी दंग पर यह िववरण मु यतः दो पु तक पर आधा रत है िज ह लािसक का दजा हािसल हो गया है - अनाम, आर द िग टी? रपोट आॅफ ए वाॅइंट इन ाइरी इनटु द काउज एंड इ पै ट आॅफ द राइ स इन देलही ाॅम 31 अ टू बर टु 10 नवंबर ( द लीः पीयूडीआर एंड पीयूसीएल, 1984); उमा च वत एंड नं दता ह सर द दे ही राइ सः ी डेज इन द लाइफ आॅफ ए नेशन (नई द लीः लसर इं टरनेशनल, 1987)। इस िववरण म मने उन दो त और सहयोिगय क बातचीत को भी दज कया है जो उस दंगे के बाद राहत काय म लगे थे। 72. “द वायोलट आॅ टरमैथ”, इं िडया टु ड◌े, 30 नवंबर 1984। 73. “इं दरा गांधीज िब े ट” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 3 नवंबर 1984। 74. डेिनयल सुदरलड, “इं िडया सीन फे संग एरा आॅफ अनसटटी”, यूयाॅक टाइ स, 1 नवंबर 1984; हेनरी िवट, “यूएस फ यस एसेिसनेशन मे ंग के ओस इन इं िडया, राइवलरी इन साउथ एिशया”, द सन, 1 नवंबर 1984। 8 यह बेटा भी कम नह 1. टाइ स आॅफ इं िडया, 4 अ टू बर 1984 2. टाइ स आॅफ इं िडया, 14 दसंबर 1984 3. फु ल िबदवई, “ हाट का ड द ेसर िब डअप” टाइ स आॅफ इं िडया, 26 दसंबर 1984 4. राधा रामाशेषन, “ ो फट अग ट से टी” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 22-29 दसंबर 1984; इं िडयन ए स ेस, 5 दसंबर 1984। भोपाल गैस कांड बड़ा ही यातनादायक भाव पड़ा और उसका भाव अभी भी है। पीि़डत के प रवारजन ने सरकार पर वा य सुिवधा मुहय ै ा करवाने म ढलाई का आरोप लगाया। पीि़डत ने यूिनयन काबाइड पर ब त ही कम मुआवजा देने का आरोप लगाया। 5. ह र जय संह, इं िडया आ टर इं दराः द टबुलट ईयस(1984-89), (नई द लीः अलाइड पि लशस, 1989), पृ.-19-20; िबजनेस इं िडया, 17-30 दसंबर 1984। 6. हरीश खरे , “द टेट गोज मैको” सेिमनार, जनवरी 1985। 7. मिणशंकर अ यर, रमे ब रं ग राजीव (कलक ाः पा एंड कं पनी, 1992), पृ. 53। 8. हरीश पुरी, “पंजाबः इले शन एंड आ टर” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 5 अ टू बर 1985; इं िडया टु ड,े 15 िसतंबर और 15 अ टू बर 1985। 9. इं िडया टु ड◌े, 15 िसतंबर 1985, 15 जनवरी 1986, संड,े 29 दसंबर, 4 जनवरी 1986। 10. देख लालचुंगनुंगा, िमजोरमः पाॅिल ट स आॅफ रजनिल म एंड नेशनल इं टी ेशन (नई द लीः रलायंस पि ल शंग हाउस, 2002), एपिड स-डी; रपोट इन संड,े 20 से 26 जुलाई 1986। 11. “िमजोरमः े ट फाॅर पीस” इं िडया टु डे 31 जुलाई 1986। 12. एस.एस. िगल, द डायने टी ए पाॅिल टकल बायो ाफ आॅफ द ीिमयम द लीः हापरकाॅ लंस इं िडया, 1996), पृ. 394-95। लंग फै िमली आॅफ माॅडन इं िडया (नई 13. िबजनेस इं िडया, दसंबर 31, 1984-जनवरी 13 1985। 14. शुभ त भ ाचाय, “राजीव गांधीज िड कवरी आॅफ इं िडया” संड,े 22 से-28 िसतंबर 1985। 15. देख सन् 1981 का िमनल अपील नंबर 103 का फै सला िजसका फै सला 23 अ ैल 1985 को आ। (मोह मद अहमद खान बनाम शाहबानो और अ य), सु ीम कोट के सेज, (1985), 2 एससीसी, पृ. 556-74। 16. तो ी डाॅ टर, शाहबानो, “ ीफ लोरी”, इ ंट, मई 1986। 17. एिलस जैकब संपा दत एनुअल सव आॅफ इं िडयन लाॅ, खंड-21 म देिखए डेिनयल ले टफ क “मुि लम लाॅ” (नई द लीः द इं िडयन लाॅ इं ि ट ूट, 1985)। 18. लोकसभा िडबे स, 23 अग त 1985। 19. रतु सरीन, “शाहबानोः द गल एंड द सरडर” संडे 1-7 दसंबर 1985। 20. 19 दसंबर 1985, द टे समैन का संपादक य। 21. इं िडयन ए स ेस, 21 दसंबर 1985 22 वसुधा धागमवार, “आ टर द शाहबानो जजमट- प्”, टाइ स आॅफ इं िडया 11 फरवरी 1986। 23. देख ए स वीकली, 29 माच-4 अ ैल 1986 का अंक। 24. आर.डी. धान, व कग िवद राजीव गांधी (नई द ली हापर काॅ लंस इं िडया, 1995)। 25. पीटर वैन डर वीर, गाॅ स आॅन अथः द मैनेजमट आॅफ रलीिजयस ए सपी रयंस एंड आईड टटी इन ए नाॅथ इं िडयन िपिलि मेज सटर (लंदनः द एथलाॅन ेस, 1988) खासकर अ याय-1 और “गाॅड म ट बी िल ेटेडः ए हंद ू िल ेशन मूवमट इन अयो या” माॅडन एिशयन टडीज, खंड-21, नंबर-2, 1987। अयो या के जुड़वा शहर फै जाबाद के नाम पर िजला का नाम है। िजस अिधकारी ने यह फै सला दया वह तकनीक तौर पर फै जाबाद का िडि ट जज था। 26. संडे म सैफु ीन चौधरी का उ रण, 9-15 माच 1986। 27. देख नीरजा चौधरी का द टे समैन म लेख, 20 अ ैल और 1 मई 1986। इसे ए.जी. नूरानी संपा दत द बाबरी मि जद े ंस, खंड-1 म पुन तुत कया गया है (नई द लीः तूिलका बु स, 2003), पृ. 260-6। 28. इं जीत बधवार, “ हंदज ु ः िमिलटट रवाविल म” इं िडया टु ड,े 31 मई 1986। 29. बनारस के संत रामशरण दास, मई 1989 का लेखन िजसका उ रण मंजरी काटजू क पु तक िव एंड इं िडयन पाॅिल ट स म आ है (हैदराबादः ओ रयंट ल गमैन, 2003) पृ. 73। हंद ू प रषद 30. इं िडया टु ड,े 15 माच 1986, संडे 25-31 जनवरी 1987। 31. देख रजनी ब शी का “द राजपूत रवाइवल”, इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया 1 नवंबर 1987। 32. यह आंकड़ा डेिवड पेज और िविलयम ाउले क सेटेलाइट आॅवर साउथ एिशयाः ोडका टंग, क चर एंड द पि लक इं टरे ट (नई द लीः सेज पि लके शंस, 2001), पृ. 56। 33. अर वंद राजगोपाल, पाॅिल ट स आ टर टेलीिवजनः रिजिसयस नेशनिल म एंड द रशे पंग आॅफ द इं िडयन पि लक (कै ि ज, कै ि ज यूनीव सटी ेस, 2001), पृ. 84। 34. शैवंती िननान, ू द मैिजक वंडोः टेलीिवजन एंड चज इन इं िडया (नई द लीः पं◌ेगुइन इं िडया, 1995) पृ. 68। 35. फिलप लुजेनडाॅफ, “रामायणः द वीिडयो”, ामा र ू खंड-34, नंबर-2, 1990, पृ. 128। 36. राॅिबन जेफरी, “मीिडया रवो यूशन एंड ‘ हंद ू पाॅिल ट स’ इन नाॅथ इं िडया” 1982-99 िहमाल, जुलाई 2001, वा य पर जोर दया गया है।) 37. फाइनं◌ेिशयल ए स ेस म सा ा कार, इसका िज सुि य रायचौधरी के “ टेट एंड िबजनेस इन इं िडयाः द पाॅिल टकल इकोनाॅमी आॅफ िल लाइजेशन, 1984-89” म आ है। यह िडपाटमट आॅफ पाॅिल ट स, ंसटन यूनीव सटी का एक अ कािशत पीएच.डी शोधप है। पृ. 100-1 इसके अलावा टे ली ए कोचक क “रे गुलेशन एंड िल लाइजेशन इन इं िडया” एिशयन सव, खंड-26, नंबर-12, 1986 भी देख। 38. एच.के . परांजपे, “ यू लप फाॅर ओ ड! ए पाॅिल टकल वीकली, 7 िसतंबर 1985। टक आॅफ “द यू इकोनाॅिमक पाॅिलसी”, इकोनाॅिमक एंड 39. रपो स इन इं िडया टु ड,े 15 माच और 15 अ ैल 1985। 40. टी.एन. िननान, “राईज आॅफ द िमिडल लास”, इं िडया टु ड,े 31 दसंबर 1985। इसके अलावा “द राइ जंग ए लुएंस आॅफ द िमिडल लास” संडे 29 अ टू बर-1 नवंबर 1986 भी देख। 41. राॅय चौधरी, “ टेट एंड िबजनेस इन इं िडया”, पृ. 73, 122। 42. टी.एन. िननान एंड जग ाथ दुबासी, “धी भाई अंबानीः द सुपर टायकू न”, इं िडया टु ड◌े, 30 जून 1985; टी.एन. िननान, “ रलांयस अंडर ेसर” इं िडया टु ड,े 15 अग त 1986; पेरेज चं ा, “ रलांयसः द मैन िबहाइं ड द लीजड”, िबजनेस इं िडया, 17-30 जून 1985, परं जाॅय; गुहा ठकु राता, “द टू फे सेज आॅफ धी भाई अंबानी”, सेिमनार, जनवरी 2003। 43. “ ोनी कै प टिल म”, संडे 2-8 अ टू बर 1988; ती ता सीतलवाड़, “पवार पाॅिल ट स एंड मनी” िबजनेस इं िडया, 10-23 जुलाई 1989; संकषण ठाकु र, “हाउ कर ट इज भजनलाल?”, संडे 21-27 जुलाई 1985। 44. इं नील बनज , “द यू महाराजाज” संडे 17-23 अ ैल 1988। 45 नीरज गोपाल जयाल, “डेमो े सी एंड द टेटः वेलफे यर, से युल र म एंड डेवलपमट इन कं टे पररी इं िडया” ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999), पृ. 46एफएफ; द रे ड आॅफ कालाहांडी, संडे 19-25 जनवरी 1986। 46. आर. जग ाथन, “वेलकम टु हाड टाइ स”, संडे 6-12 िसतंबर 1987। 47. एम.वी. नादकण , फारमस मुवमट इन इं िडया (नई द लीः अलाइड पि लशस 1987); पेशल इशू आॅन “ यू फारमस मुवमट आॅन इं िडया”, जनल आॅफ पीजट टडीज, खंड-21, नंबर-2, 1993-4। 48. िवजय नायक एंड शैलजा साद, “आॅन लेव स आॅफ िल वंग आॅफ शे इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 जुलाई 1984। ू ड का ट एंड शे ू ड ाइ स” 49. टंका बी. सु बा, एथिनसीटी, टेट एंड डेवलपमटः ए के स टडी आॅफ द गोरखालड मूवमट इन दा ज लंग (नई द लीः हर-आनंद पि लके शन, 1992); “पीस इन द एं ी िह स?” संडे 24-30 जुलाई 1988। 50. संडे 27 अग त-2 िसतंबर 1989; इं िडया टु ड,े 15 िसतंबर 1989; िबजनेस इं िडया, 26 जून-9 जुलाई 1989। 51. संडे 25-31 जनवरी 1987 और 28 अग त-3 िसतंबर 1988। 52. शेखर गु ा, “पंजाब इ स ीिम टः का लंग द शाॅ स” इं िडया टु ड,े 28 फरवरी 1986। 53. देख 30 अ ैल 1986 और 15 िसतंबर 1988 का इं िडया टु ड;े संडे 3-9 जनवरी 1986। पंजाब म अ सी और न बे के दशक म पुिलस ारा मानवािधकार के हनन क घटना को िव तृत तौर पर रामनारायण कु मार क पु तक र ू ड टु एसेजः द इनसरजसी एंड यूमैन राइ स इन पंजाब (काठमांडूः साउथ एिशया फोरम फाॅर यूमैन राइ स, 2003) म दज कया गया है। 54. संडे म रपोट, 19-25 मई 1985; 19-25 जुलाई 1987 और 20-26 माच और 1-7 जून 1988; इं िडया टु डे म 15 जून और 31 दसंबर 1986। 55. शेखर गु ा और िविपन मु ल, “आॅपरे शन लैक थंडरः ए ामै टक स सेस”, इं िडया टु ड,े 15 जून 1988। 56. इं िडया टु डे म सा ा कार, 30 नवंबर 1986। 57. अमृता बसु और अतुल कोहली संपा दत पु तक “क युिनटी कं ि ल ट एंड द टेट इन इं िडया” म टेन िवडमैम, “द राइज एंड फाॅल आॅफ डेमो े सी इन ज मू एंड क मीर, 1975-89” ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1988), पृ. 167। 58. संडे 9-15 जुलाई 1989। 59. इसके िलए देख अ य कताब के अलावा ए जयर म िव सन क ीलंकन तिमल नेशनिल मः इ स आॅ रिजन एंड डेवलपमट इन द नाइनटी स एंड वटीएथ सचुरी (लंदनः सी. ह ट एंड कं पनी, 2000); शंकरण कृ ण, पो टकाॅलोिनयल इनसे यु रटीजः इं िडया, ीलंका एंड द े न आॅफ नेशन ड ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2000)। 60. शेखर गु ा, “आॅपरे शन पवनः इन ए रश टु व श”, इं िडया टु ड,े 31 जनवरी 1988। 61. ले. जनरल एस.सी. सरदेशपांड,े असाइनमट जाफना (नई द लीः लसर, 1992) भूिमका। 62. कृ णा, पो टकाॅलोिनयल इनिस यु र टज, पृ. 154 और अ य ा।◌े 63. देख िगल क “डायने टी”, पृ. 464-7। 64. देख 15 जून 1989 के इं िडया टु डे क रपोट। 65. संडे 12-18 जुलाई 1987 आवरण कथा “द अगली इं िडयन”। 66. देख संडे क रपोट, 28 िसतंबर-4 अ टू बर 1988। 67. िनलांजन मुखोपा याय, द िडमोिलशनः इं िडया एट द ाॅसरोड (नई द लीः हापर-काॅ लंस इं िडया, 1994), पृ. 260-2; टोफर जे लो, द हंद ू नेशनिल ट मूवमट एंड इं िडयन पाॅिल ट स, 1925-1990 (नई द लीः पं◌ेगुइन इं िडया, 1999), पृ. 383एफएफ। 68. देख पीप स यूिनयन फाॅर डेमो े टक राइ स, भागलपुर राइ स (नई द लीः पीयूडीआर, 1990)। 69. िच सु यम, बोफोसः द टोरी िबहाइं ड द यूज (नई द लीः वाइ कं ग, 1993)। 70. इं िडया टु ड,े 31 माच, 15 अ टू बर 1988, संडे 30 अ टू बर-5 नवंबर 1988। 71. इस िडफे मेशन िबल क चचा एम.वी. देसाई क “द इं िडयन मीिडया” म क गई है जो माशल एमबाॅटम और फिलप ओडेनबग संपा दत इं िडया ी फं ग 1989 (बौ डरः वे ट ू ेस, 1989) म शािमल क गई है। 72. इं िडया टु ड,े 15 जनवरी 1989। 73. संडे 12-18 माच 1989। 74. इं नील बनज , “मेरा डायने टी महान” संडे 1-7 अ टू बर 1989। 75. देख इं िडया टु ड,े 31 अ टू बर 1989, संडे 12-18 नवंबर 1989। 76. वीर सांघवी, ए वोट फाॅर कां ेस, संडे 3-9 दसंबर 1989। 77. संडे 16-22 जून 1985। 78. के वल वमा, “द पाॅिल ट स आॅफ वी पी संह”, संडे 19-25 अ ैल 1987 79. टी.एस. मू त, आसाम द िड फक ट ईयसः ए टडी आॅफ पाॅिल टकल डेवलपमट इन 1979-83 (नई द लीः िहमालयन बु स, 1983) पृ. टप् । 80. ले. जनरल के .एस. बरार, आॅपरे शन लू टारः द ई टोरी (नई द लीः यूबीएस पि लशस, 1987), पृ4 9 हक क लड़ाई 1. एम.एन ीिनवास, “का ट इन माॅडन इं िडया”, इं िडयन साइं स कां ेस, कलक ा 1957 क कायवाही म मानवशा और पुरात वशा खंड म अ य ी; भाषण। खंड-2, पृ. 123-42। 2. उनक वाता पर ई ेस ित या का वणन एम.एन. ीिनवास क कताब “का ट इन माॅडन इं िडया एंड अदर एसेस” (बंबईः एिशया पि ल शंग हाउस, 1962) म कया गया है देख भूिमका। 3. एं े बे टले, सोसाइटी एंड पाॅिल ट स इन माॅडन इं िडया (लंदनः द एथलान ेस, 1991), का ट एंड काॅलोिनयल ल, द हंद,ू 4 माच 2002। 4. साठ और स र के दशक म िपछड़ी जाितय का राजनीितक उभाड़ टोफर जेफरलोे क पु तक इं िडयाज साइलट रवो यूशनः राइज आॅफ द लो का स इन नाॅथ इं िडयन पाॅिल ट स ( द लीः परमानट लैक, 2003)। इसके अलावा डी.एल. सेठ क कताब “से युलराइजेशन आॅफ का ट एंड मे कं ग आॅफ यू िमिडल लास” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 21-28 अग त 1999। 5. रपोट आॅफ बैकवाड लासेज कमीशन ( द लीः कं ोलर आॅफ पि लके शन, 1980), खंड-1, पृ. 57। 6. एं े बे टले, “िडि यू टव जि टस एंड इं ि ट ूशनल वेलबीइं ग” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, िवशेषांक, माच 1991; धम कु मार, ‘अ फरमे टव िडबेट इन इं िडया’ एिशयन सव, खंड-32, नंबर-3, माच 1992; मुिश ल हसन और नराईक नाकाजाटो संपा दत द अन फिन ड एजडाः नेशन िब डंग इन साउथ एिशया म नो रयो क डो, ‘द बैकवाड लासेज मुवमट एंड रजवशन इन तिमलनाडु एंड उ र देशः ए क पेरे टव पसपेि टव’ ( द लीः मनोहर, 2001)। 7. जेफरलोे क पु तक “इं िडयाज साइलट रवो यूशन, पृ. 345-7। 8. देख पर जाॅय; गुहा ठकु राता और शंकर रघुरमन क ‘ए टाइम आॅफ कोलीशंसः िडवाइडेड वी टड (नई द लीः सेज पि लके शंस, 2004)। 9. सुर मिलक संकिलत, सु ीम कोट मंडल कमीशन के स, 1992 (लखनऊः ई टन बुक कं पनी, 1992), पृ. 180, 196, 379, 387, 412, 424 आ द। 10. ‘इन सच आॅफ द मसीहा’ संडे 31 अग त-6 िसतंबर 1988। 11. जेफरलो, इं िडयाज साइलट रवो यूशन, अ याय-11। 12. घन याम शाह संपा दत, दिल स एंड द टेट (नई द लीः कं से ट पि ल शंग कं पनी, 2002)। 13. कांशीराम और बीएसपी के उद; पर यह िववरण िन िलिखत òोत पर आधा रत है - सुधा पाई, दिलत एससन एंड द अन फिन ड डेमो े टक रवो यूशनः द ब जन समाज पाट इन उ र देश (नई द लीः सेज पि लके शन, 2002); कं चन चं ा, “वाय एथिनक पाट ज स सीडः पे ोनेज एंड एथिनक हेडकाउं ट इन इं िडया” (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 2004) अ याय-8। 14. ब ी नारायण, “हीरोज, िह ीज एंड बु ले स”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 13 अ टू बर 2001। 15. पाई, दिलत एसशन, पृ. 95-7; िशखा ि वेदी, मायावती, मालिवका संह ारा संपा दत मिहला राजनीित जीवन पर एक संभा लेखसं ह। के 16. जे स कै म न, एन इं िडयन समर (लंदनः मैि मलन, 1974), पृ. 122। 17. एं े बै टले, “द से ू ड का सः एन इं टर-रीजनल पसपेि टव” जनरल आॅफ इं िडयन कू ल आॅफ पाॅिल टकल इकोनाॅमी, खंड-12, नंबर 3 और 4, 2000। 18. यूगो गो रं ग, अनटचेबुल िस टजंसः दिलत मूवमट एंड डेमो े टाइजेशन इन तिमलनाडु (नई द लीः सेज पि लके शन, 2005) पृ. 112। 19. मरण परांत अंबेडकर का राजनीितक मह व एक गंभीर राजनीितक ा या का इं तजार कर रहा है। वह समकालीन दिलत समाज म कस तरह मह वपूण है इसक एक झलक पाने के िलए देख चं भान साद क दिलत डायरी, 1999-2003 (चे ैः नवायना पि ल शंग, 2004); फना ड को, यो सना मैकवान एंड सुगुना रामनाथन क जन टु डमः दिलत नैरे ट स (कोलकाताः सा या, 2004)। 20. देख एस. िव नाथन के ारा तैयार क गई और सं िहत रपोट दिल स इन िविडयन लड (चे ैः नवायना; पि ल शंग 2005)। इसके अलावा ह का यंगीसावा क ए सचुरी आॅफ चजः का ट एंड इ रगेटेड लड आॅफ तिमलनाडु 1860-1970 (नई द लीः मनोहर, 1996) भी देख अ याय-7। 21. यूिनयन फाॅर डेमो े टक राइ स, झ झर दिलत लाइन चंगः द पाॅिल ट स आॅफ काउ ोटे शन इन ह रयाणा (नई द लीः पीयूडीआर, 2003)। 22 माक जुएरगसमेयर, रलीजन एज सोशल िवजनः द मूवम स अग ट अनटचेिबिलटी इन वटीएथ सचुरी पंजाब (बकलेः यूनीव सटी आॅफ कै िलफो नया ेस, 1982); हरीश के .पुरी, “से ू ड का स इन िसख क युिनटीः ए िह टो रकल पसपेि टव”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 जून 2003। 23. हरीश के पुरी संपा दत दिलत इन रीजनल कं टे ट म र क राम, “िलिम स आॅफ अनटचौिबिलटीः दिलत एसस स एंड का ट वायालस इन पंजाब” (जयपुरः रावत पि लके शंस, 2004); सुरदर एस. जोधका और काश लुईस, “का ट टसंस इन पंजाबः तलहन एंड बीय ड” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 12 जुलाई 2003। 24. शिश भूषण संह, “िलिम स टु पाॅवरः न सिल म एंड का ट रलेशंस इन साउथ िबहार िवलेज” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 16 जुलाई 2005। 25. मुकुल, “द अनटचेबुल जटः इवरीडे लाइफ आॅफ मुशहस इन नाॅथ िबहार”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 4 दसंबर 1999 26. बेला भा टया, “द न सलाइट मूवमट इन स ल िबहार” अ कािशत पीएच.डी शोधप , फै क टी आॅफ सोशल एंड पाॅिल टकल टडीज, कै ि ज यूनीव सटी, 2000। इसके अलावा देख भा टया का ही - “द न सलाइट मूवमट आॅफ स ल िबहार” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 9 अ ैल 2005। 27. देख लेबर फाइल, खंड-4, नंबर-5 और 6, 1998, पृ. 39। 28. भा टया, “द न सलाइट मुवमट” (शोधप ), पृ. 134, 87 (मेरे ारा कया गया अनुवाद)। 29. सी.पी. सुर न, “आॅन द रन िवथ द रणवीर सेना”, संडे टाइ स आॅफ इं िडया, 29 फरवरी 1999। 30. देख 14 नवंबर 2005 का द हंद◌ू। 31. पीप स यूिनयन फाॅर डेमो े टक राइ स, सतपुरा क घाटीः पीप स पीयूडीआर, 1992)। गल इन होशंगाबाद (नई द लीः 32. देख रा ल क “द भी सः ए पीपुल अंडर ेट”, यूमन के प, खंड-8, नंबर-9 िसतंबर 2001; इसके अलावा भूदानः ए िडनोटीफाइड एंड नोमेिडक ाइ स राइ स ए शन ुप यूजलेटर के कई अंक। 33. देख अिमता बािव कर क इन द बैली आॅफ द रवरः आ दवासी बैट स ओवर ‘डेवलपमट’ इन द नमदा वैली (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1995); जीन ज े , मीरा सै सन और स यजीत संह संपा दत द डैम एंड द नेशन (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1998)। 34. इं िडया टु ड,े 31 दसंबर 1999। 35. मनोज जोशी, द लाॅ ट रबेिलयनः क मीर इन द नाइनटीज (नई द लीः पं◌ेगुइन बु स, 1999), अ याय-1 और 2 इसके अलावा तवलीन संह क “क मीरः ए ेजेटी आॅफ एरस” (नई द लीः वाइ कं ग, 1995) भी देख। 36. सुिमत गु ा, “द राइज एंड राइज आॅफ टेर र म इन क मीर” टेली ाफ, कलक ा, 21 अ ैल 1990। 37. िव टो रया कोफ ड, “क मीर इन कं ि ल ट (लंदनः आई.बी. ू रस 1999) पृ. 147। 38. ये सु खयां अलग-2 खबर से ली गई ह जो क बंगलौर के सटर फाॅर एजुकेशन एंड डाॅ यूमटेशन से ली गई ह। 39. द टेली ाफ, कोलकाता, 27 मई 1990; जोशी, द लाॅ ट रबेिलयन, पृ. 72-3। 40. देख एमेने टी इं टरनेशनल क अजट रपोट, सन् 1991 क नंबर-102 और 108, बंगलौर के सटर फाॅर एजुकेशन एंड डाॅ यूमटेशन म ितिलिप। 41. असगर अली इं जीिनयर संपा दत से युलर ाउन आॅन फायरः द क मीर ाॅ लम ( द लीः अजंता पि लके शंस) म वी.एम. तारकुं डे और अ य, ‘ रपोट आॅन क मीर िसचुएशन’ पृ. 210-23। 42. इसके िलए देख चंदना भ ाचाया क एथिनिसटी एंड आॅटोनाॅमी मूवमटः के स आॅफ बोडो-खचा रस आॅफ असाम (नई द लीः िवकास पि ल शंग हाउस, 1996); सुधीर जैकब जाज, ‘द बोडो मूवमट इन असामः अनरे ट टु एकोड’ एिशयन सव, खंड-34, नंबर-10, अ टू बर 1994। 43. संजय हजा रका, जस आॅफ द नाइटः टे स एंड वार एंड पीस ाॅम इं िडयाज नाॅथ-ई ट (नई द लीः पं◌ेगुइन बु स, 1995) पृ. 167-226। इसके अलावा संजीव ब आ क ‘द टेट एंड सेपेरे ट ट िमिलटसी इन असामः िव नंग ए बैटल एंड लू जंग द वार?’ एिशयन सव, खंड-34, नंबर-10, अ टू बर 1994 44. अनं दता दासगु ा, ि पुराज ुटल कु ल दे सैक, िहमाल, दसंबर 2001। 45. भगत ओईनाम, “पैटन आॅफ एथिनक कि ल ट इन द नाॅथ-ई टः ए टडी आॅन मिनपुर” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 24 मई 2003; यू ए िशमरे , “सोिशयो-पोिल टकल अनरे ट इन द रीजन का ड नाॅथ-ई ट इं िडया” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 16 अ टू बर 2004। 46. ये उ रण मोईवा के सा ा कार से िलए गए ह जो टाइ स आॅफ इं िडया 2 माच 2005 और द हंद ू 29 अ ैल 2005 को छपे थे। 47. देख जे.बी. लामा क “नगा पीसः िवल द फै शन फाॅल इन?” द टे समैन 18 मई 1999। 48. सीमा सैन, मिनपुर, ब नग एंगर, द वीक 1 जुलाई 2001। 49. आर.के . रं जन संह, “ र यूजी ाॅ लम इन मिणपुरः ए माॅल ग ं वोलके नो” ास ट आॅ शंस, नवंबर- दसंबर 1996; दीपक के संह, “ टेटलेश चकमाज इन अ णाचल देशः ाॅम ‘ रजे टेड पीपुल’◌ः टु ‘अनवांटेड माइ स” सोशल साइं स रसच जनरल, खंड-9, नंबर-1, 2001; वा टर फनाडीज, “आईएमडीटी ए ट एंड इिम ेशन इन नाॅथ ई टरन इं िडया” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 23 जुलाई 2005 50. वेद मारवाह क कताब अनिसिवल वाॅसः पैथोलाॅजी आॅफ टेर र म इन इं िडया म रसांग कस ग का उ रण (नई द लीः हापरकाॅ लंस, 1995), पृ. 295। 51. एन लोक संह, “वीमैन, फै िमली, सोसाइटी एंड पाॅिल ट स इन मिणपुर (1970-2000) ” कं टे पररी इं िडया, खंड-1, नंबर-4, 2002। 52. पीप स यूिनयन फाॅर डेमो े टक राइ स, वाय द आ सपा म ट गो (नई द लीः पीयूडीआर, 2005), टेली ाफ, कोलकाता म मु यपृ क त वीर, 16 जुलाई 2004; सुशांता तालुकदार, मिणपुर आॅन फायर, ं टलाइन, 10 िसतंबर 2004। 53. िनमला गणपित, “िबिलयंथ बेबी पुट ूः हेल” यू इं िडयन ए स ेस, 12 मई 2000। 54. मह के . ेमी, द िम संग गल चाइ ड, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 26 मई 2001; पी.एनमारी भ , “आॅन द ेल आॅफ ‘िम संग’ इं िडयन फ मेल” (दो खंड म) इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 21 एंड 28 दसंबर 2002। 55. रव कौर, “अ ौस रीजन मै रजेजः पाॅवट , फ मेल माइ ेशन एंड द से स रे िशयो” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 19 जून 2004; ेम चौधरी, “ ाइिसस आॅफ मेसकु लीिनटी इन ह रयाणाः द अनमै रड, द अनइं लाॅइड एंड द ए ड” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 3 दसंबर 2005। 56. देिखए ीत र तोगी क कताब “िसगिन फकस आॅफ जडर रलेटेड डेवलपमट इं िडके टसः एन एनािलिसस आॅफ इं िडयन टे स” इं िडयन जनरल आॅफ जेनडर टडीज, खंड-11, नंबर-3, 2004। 57. हालां क इसका काशन एक दशक पहले आ था ले कन फर भी राधा कु मार क ए िह ी आॅफ डू इंगः एन इल ेटेड अकाउं ट आॅफ मूवम स फाॅर वीमै स राईट एंड फे िमिन म इन इं िडया, 1860-90 (नई द लीः कली फाॅर वुमैन) इस िवषय पर इकलौती सबसे बेहतरीन पु तक है। ले कन साथ ही 30 साल से यादा पुरानी मानुषी पि का और कली फाॅर वुमैन पि ल शंग हाउस क सौ से यादा कािशत कताब भी इस मायने म काफ मददगार है जो कानून, पयावरण, सामािजक ितरोध और अथ व था जैसे िविवध िवषय पर कािशत ए ह। 58. 30 अग त 2005 के यू इं िडयन ए स ेस म उ धृत। इसके अलावा बीना अ वाल क “ए फ ड आॅफ व स आॅनः जडर एंड ल स राईट इन साउथ एिशया” (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1994); आशा नायर-बसु क “आॅफ फादस एंड संस” द टेली ाफ, कोलकाता, 11 अ टू बर 2005 का लेख भी उ लेखनीय है। 59. अनाम, “ए लू ंट फाॅर िमजोरम” ास ट आॅ शंस, मानसून 1999; सुदी ा भ ाचाय, हाउ टु बी थट न टाईम लक , द टेली ाफ, कोलकाता, 30 जून 1999; िनितन गोखले, “मेघना नायडू इन आईजाॅल” तहलका 9 अ टू बर 2004। 60. सवजीत संह, “आॅपरे शन लैक थंडरः एन आई िवटनेस अकाउं ट आॅफ टेर र म इन पंजाब” (नई द लीः सेज पि लके शन, 2002), खासकर अ याय-22-30। 61. देख ए े बािगयर-चटज क “ ेन इन पंजाब गवनसः एन असेसमट आॅफ द बादल गवनमट (1997-99)”; इं टरनेशनल जनरल आॅफ पंजाब टडीज, खंड-7, नंबर-1, 2000। 62. देख “द डायनािमक िस स” आउटलुक 29 माच 1999 क आवरण कथा। 63. संह, आॅपरे शन लैक थंडर, पृ. 338। 10 दंगे 1. गु गोलवलकर, “टोटल ोिहिबशन आॅफ काउ लाउटर”, िहतवाद, 26 अ टू बर 1952, मूल वा य पर जोर दया गया है। 2. डेिवड लडन संपा दत “मे कं ग इं िडया हंदःू रलीजन, क युिनटी एंड द पाॅिल टकल डेमो े सी इन इं िडया, दूसरे सं करण म रचड एच डेिवस, “द आइकाॅनो ाफ आॅफ रामाज चै रयट” ( द लीः आॅ सफोड यूिनव सटी ेस, 1996)। 3. वही, पृ. 46। 4. टोफर जेफरलाॅ, द हंद ू नेशनिल ट मूवमट एंड इं िडयन पाॅिल ट स, 1925-1990 के दशक तक (नई द लीः पं◌ेगुइन इं िडया, 1999), पृ. 420-22। 5. देख पाॅल ास क द ोड सन आॅफ हंद-ू मुि लम वायोलस इन कं टे पररी इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2003) पृ. 110-23। 6. देख मंजरी काटजू क िव हंद ू प रषद एंड इं िडयन पाॅिल ट स (हैदराबादः ओ रयंट ल गमैन, 2003), पृ. 65। 7. माधव गोडबोले, अन फिन ड इ नं सः रकले शंस एंड र ले शंस आॅफ ए िसिवल सवट (हैदराबाद, ओ रयंट ल गमैन, 1996), पृ. 344-53। 8. देख पी.वी. नरिस हा राव, अयो याः 6 दसंबर 1992 नई द ली, (वाइ कं ग, 2006), पृ. 99-100। 9. गोडबोले, अन फिन ड इ नं स, पृ. 363। 10. संडे म उ धृत, 6 से 12 दसंबर 1992। 11. बाबरी मि जद िव वंस का यह िववरण मु यतः दलीप अव थी क “ए नेशंस शेम”, इं िडया टु ड,े 31 दसंबर 1992 पर आधा रत है। इसके अलावा ह रं दर बवेजा क “टु डे 10 ईयस एगोः हाट रयली हैपे ड” एिशयन एज 6 दसंबर 2002 भी उ लेखनीय है। 12. यह बातचीत संडे 13-19 दसंबर 1992 म दज है। 13. के .आर. मलकानी, द पाॅिल ट स आॅफ अयो या एंड हंद-ू मुि ल स रलेशंस (नई द लीः हरआनंद पि लके शंस, 1993) पृ. 3-4 पर आधा रत है। 14. ंकटेश रामकृ णन क “द रे कं ग यू” ं टलाइन, 1 जनवरी 1993 म उ धृत। 15. िजत बजाज संपा दत अयो या एंड द यूचर इं िडया म अ ण शौरी, “द ब कं ग टेट” (म ासः सटर फाॅर पाॅिलसीज टडीज, 1993), पृ. 47-70। 16. िसन आर के ल, इं िडयाज पाॅिल टकल इकोनाॅमी, 1947-2004◌ः द ेजुअल रवो यूशन दूसरा सं करण, (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी 2005), पृ. 714-15। 17. ब डी आॅ टरमाथ, इं िडया टु ड,े 31 दसंबर 1992। 18. दलीप पडगांवकर संपा दत वेन बंबई ब ड म लेरस फनाडीज एंड नरे श फनाडीज का “द वंटर आॅफ िडसक टे ट” ( द लीः यूबीएसपीडी, 1993), पृ. 12-41। 19. सुजाता पटेल और एिलस टानर संपा दत बंबईः मेटाफर फाॅर माॅडन इं िडया म क पना शमा, “ ोिनकल आॅफ राइ स फोरटो ड”, ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999) पृ. 277। 20. मराठी से अनु दत और वैभव पुरंदरे क कताब द सेना टोरी म उ धृत (मुंबईः िबजनेस पि लके शंस, 1999), पृ. 369। 21 पडगांवकर क पु तक वेन बंबई ब ड म लेरस फनाडीज और नरे श फनाडीज क “ए िसटी िवथ वाॅर िवथ इटसे फ”, पृ. 42-104; शमा, ोिनकल, पृ. 278-86। 22. बेहराम कं े टर, “बंबई हैज लाॅ ट इ स कै रे टर” आ टरनून िडसपैच एंड कू रयर, 10 जनवरी 1993, िबजीबी म पुनमु त, वेन बंबई वाॅज बम डः बे ट आॅफ 1992-3 (बंबईः ओ रयाना बु स, 2004)। 23. लाइज मैकेन क कताब िडवाइन इं टर ाइजः गु ज एंड द हंद ू नेशनल मूवमट (िशकागोः यूनीव सटी आॅफ िशकागो ेस, 1996) पृ. 315। 24. अशोक मेहता, द पाॅिल टकल माइं ड आॅफ इं िडया (बंबई, सोशिल ट पाट , 1952), पृ. 38। 25. ताया एंड मौ रस िजन कन, “द इं िडयन जेनरल इले शंस” द व ड टु ड◌े, खंड-8, नंबर-5,मई 1952। 26. सुसान होयबर और लाॅयड आई. डो फ, “द स नंबर-6, जून 1980। ट यूचर आॅफ इं िडयन पाॅिल ट स” एिशयन सव, खंड-20, 27. देख पीटर गाॅ सचाक क िबयाॅ ड हंद ू एंड मुि लमः म टीपुल आड टटीज इन नैरे ट स ाॅम िवलेज इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस 2001)। 28. वेलुचे नारायण राव संपा दत और अनु दत वेट एथ सचुरी तेलुगु पोइ ीः एन एंथोलाॅजी म खादर मोहीउ ीन, बथमाक” (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002), पृ. 221-7। 29. डी.आर. गोयल, रा ीय वयंसेवक संघ, दूसरा सं करण (नई द लीः राधाकृ ण काशन, 2000), पृ. 17-18, उस िवचारधारा के पूण प से जाने के िलए पढ़े वयं आरएसएस मुख एम.एस. गोलवलकर क बंच आॅफ थाॅ स (बंगलौस िव म काशन, 1966)। 30. सन् 1947 से आरएसएस के िवकास पर देख तपन बसु क खाक शाॅ स एंड सेफरन लै सः ए टक आॅफ द हंद ू राइट (हैदराबादः ओ रयंट ल गमैन, 1993); थाॅमस बो म हंसन क द सेफराॅन वेवः डेमो े सी एंड हंद ू नेशनिल म इन इं िडया ( द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999); ल; कानूनगो, “ हंद ु वा इं ी इं टू ए ‘ हंद ू ो वंस’◌ः अल ईयर आॅफ आरएसएस इन उड़ीसा” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 2 अग त 2003; नं दनी सुंदर, “टी चंग टु हेटः आरएसएस पेडागोिगकल ो ाम”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 17 अ ैल 2004। 31. देख थाॅमस लोम हानसेन, अबन वायोलस इन इं िडयाः आईडटीटी पाॅिल ट स, “मुंबई” एंड द पो टकाॅलोिनयल िसटी ( द लीः परमानट लैक, 2001) पृ. 85। 32. नीरजा चौधरी, “सोिनया टे स ए पाॅिल टकल िडप एट द कुं भ” यू इं िडयन ए स ेस, 20 जनवरी 2001। 33. इस अंितम घटना के िलए देख द टेली ाफ (कोलकाता) 25 जनवरी 1999। 34. बाद के पर देख पी.एन. मारी भ और ए.जे. ांिसस जेिवयर क “रोल आॅफ रलीजन इन फ टलीटी िड लाइनः द के स आॅफ इं िडयन मुि ल स”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टल वीकली, 29 जनवरी 2005। 35. देख आशीष शमा क “लू जंग दयर रलीजन”, ए स ेस मैगजीन, 9 जुलाई 2000। 36. यह पैरा ाफ अ य òोत के अलावा अ िलिखत कताब पर आधा रत है - एम.के .ए. िस ीक , मुि लम इन इं िडयाः दयर सोशल ोफाइल एंड ो ल स (नई द लीः इं टी ूट आॅफ आॅ जेि टव टडीज, 1998); अबूसलेम शरीफ, “आॅन द मा ज सः मुि ल स इन ए टेट आॅफ सोिशयो-इकोनाॅिमक िड लाइन”, टाइ स आॅफ इं िडया, 22 अ टू बर 2004; योग िसकं द, “लेसंस आॅफ द पा टः मदरसा एजुकेशन इन साउथ एिशया” िहमाल, खंड-4, नंबर-11, नवंबर 2001 और “काउं ट रं ग फं डामटिल मः द बैन आॅन िसमी, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 6 अ टू बर 2001; अजुमंद आरा, “मदरसा एंड मे कं ग आॅफ मुि लम आईडटीटी इन इं िडया”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 3 जनवरी 2004। 37. नवनीता च ा बेहरे ा, टेट, आईड टडी एंड वायोलसः ज मू-क मीर एंड ल ाख (नई द लीः मनोहर, 2000), पृ. 179। 38. सोिनया ज बार, ‘ि प रट आॅफ लेस,’ “इन िसिवल लाइं स 5◌ः यू राइ टंग ाॅम इं िडया (नई द लीः इं िडयाइं क, 2000), पृ. 28-9। 39. देख द टेली ाफ (कोलकाता) क रपोट, 1 अ ैल 1990; ं टलाइन, 14-27 अ ैल 1990, इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 17 जून 1990, टाइ स आॅफ इं िडया, 11 फरवरी 1991, इसके अलावा अले जडर एवस क “ए िडपाचर ाॅम िह ीः क मीरी पंिड स, 1990-2001”, कं टे पररी साउथ एिशया, खंड-11, नंबर-1, 2002 भी देख। 40. देख वीण वामी “द ना दमाग आउटरे ज” ं टलाइन, 15 अ ैल 2003। 41. यह पैरा ाफ हसन अ बास क पा क ता स ि ट इनटु इ स ीिम मः अ लाह, द आम एंड अमे रकाज वार आॅन टेरर (अम क, यूयाॅकः एम.ई. शाप, 2005), अ याय-9 और 10; ता रक अली का उ रण उनके द लैश आॅफ फं डामटिल मः ू से स, िजहाद एंड माॅड नटी (लंदनः वस , 2002) पृ. 196 पर आधा रत है। 42. यो गंदर िसकं द, “च जंग कोस आॅफ क मीर एंड पाॅिल टकल वीकली, 20 जनवरी 2001। गलः ाॅम नेशलन िल ेशन टु इ लािम ट िजहाद” इकोनाॅिमक 43. एस. ठाकु र संपा दत ग स एंड यलो रोजेजः एसेस आॅन द कारिगल वाॅर म पामेला कां टेबल, “िसलेि टव थ” (नई द लीः हापरकाॅ लंस, 1999), पृ. 52, हा फज मोह मद सईद का सा ा कार आिमर मीर के ारा, आउटलुक, 23 जुलाई 2001। 44. देख अिनल नौ रया, “द िड शन आॅफ ए िह टो रक पाट ” मेन ीम, 17 अग त 2002; वीन वामी, “द कल ग आॅफ लोन”, ं टलाइन, 21 जून 2002। 45. टाइ स आॅफ इं िडया क खबर, 24 जनवरी 1990; जोशुआ हैमर, “ ीनगर िडसपैच”, यू रपि लक, 12 नवंबर 2001। 46. पाॅल वेलेस और रामा य राय संपा दत इं िडयाज 1999 इले शंस एंड वटीएथ सचुरी पाॅिल ट स म रीता चैधुरी- बले, “िडफ रं ग र पांस टु द पा लयामटरी एंड अस बली इले शंस इन क मीस रीजंस एंड टेटसोशाइटल रलेशंस” (नई द लीः सेज पि लके शंस, 2003)। 47. भु घाटे, क मीरः द डट वार” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 26 जनवरी 2002। 48. जलील, “आई हैव सीन माई कं ी डाई” द टेली ाफ (कोलकाता), 26 मई 2002। 49. जे स बुचन, “क मीर” ा टा, नंबर-57, ंग 1997, पृ. 66। 50. देख ए.जी. नूरानी संपा दत द बाबरी मि जद े न खंड-2, (नई द लीः तूिलका बु स, 2003), पृ. 197। 51. िस ाथ वरदराजन संपा दत गुजरातः द मी टंग आॅफ ए ेजेडी म देख योित पुनवाणी, “द कारनेज एट गोधरा” (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2002)। 52. आशुतोष वा णेय, एथिनक काॅि ल ट एंड िसिवल लाइफः हंदज ू एंड मुि ल स इन इं िडया (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002), खासकर पृ. 229-30, 240-1, 275-7; रामचं गुहा और जोनाथन पेरी संपा दत इं ि ट ूशंस एंड इनइ िल टजः एसेस फाॅर एं े बे टले म जैन ीमैन, “घेटोआईजेशन एंड क यूनल पाॅिल ट सः द डायनािम स आॅफ इन लूजन एंड ए स लूजन इन द हंद ु व लड के प” (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस 1999), उ दत चौधरी, “गुजरातः द राइ स एंड द लाजर िड लाइन” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 2-9 नवंबर 2002। 53. वरदराजन संपा दत गुजरात म नं दनी सुंदर, “ए लाइसस टु कलः पैट से आॅफ वायोलस इन गुजरात”; अ युत या िनक एंड सुिच सेठ, “द शे पंग आॅफ माॅडन गुजरातः लुरली ट, हंद ु वा एंड िबयाॅ ड’ (नई द लीः पगुइन बु स, 2005) अ याय-11, आशीष च वत क रपोट टेली ाफ (कोलकाता) म 18 मई 2002। 54. बेला भा टया, ए टेप बैक इन साबरकांथा, सेिमनार, मई 2002। 55. आनंद सूनदास, ‘गुजरा स िच न आॅफ ए लेसर गाॅड’ द टेली ाफ (कोलकाता) 13 माच 2002; “गुजरात िवलेजस सेट ट स फाॅर मुि ल स टु कम होम”, यू इं िडयन ए स ेस, 6 मई 2002। 56. देख वरदराजन क गुजरात, पृ. 22, नर मोदी के बार म गहन जानकारी के िलए देख संकषण ठाकु र क ‘द मैन कु ड बी ाइम-िमिन टर’ मै स व ड, दसंबर 2002। 57. ं टलाइन, 1 जनवरी 1993, 13 से 19 दसंबर 1992; इं िडया टु ड,े 31 दसंबर 1992। 58. माइकल एस से रल, ‘इं िडयाः होली वार’ टाइम 21 दसंबर 1992। 59. द टाइ स, 7 और 8 दसंबर 1992। 60. योफरी मोरहाउस, ाॅिनकल आॅफ ए डेथ फोरटो ड, द गा जयन 10 माच 2001। 61. पाॅल आर. ास, द पाॅिल ट स आॅफ इं िडया संस इं िडपडस, दूसरा सं करण (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1994) पृ. 353-4, 365-6, 348-9। 11 राजनैितक वग 1. अनाम, आ टर नेह , इकोिमक वीकली, िवशेष अंक, जुलाई, 1958। 2. जब हंद ू के एक तंभ म मने उस लेख का िज कया तो संवाददाता ने पूछा क वह अनाम लेखक कौन हो सकता है? एक ि ने िजसने पहली बार उस लेख को पढ़ा था उसका कहना था वह अनाम लेखक नेह ही थे जब क दूसरे का कहना था (जो क मेरा भी िवचार था) क संभवतः वह लेखक पडरे ल मून थे जो एक सेवािनवृत आईसीएस आॅ फसर थे और आजादी के एक दशक बाद भी भारती; सेवा म रहे थे। वे सेवािनवृत होकर आॅल सोल काॅलेज, आॅ सफोड चले गए। 3. देख एम.पी. संह और रे खा स सेना क इं िडया एट द पाॅ सः पा लयामटरी इले शंस इन द फे डेरल फे ज (हैदराबादः ओ रयंट ल गमैन, 2003)। 4. ई. ीधरन, कोलीसन ग स एंड द बीजेपीज ए सपसन, 1989-2004, काॅमनवे थ एंड काॅ े टव पाॅिल ट स, खंड-43, नंबर-2, 2005। 5. देख रशीद कदवई क सोिनयाः ए बायो ाफ (नई द लीः वाइ कं ग पगुइन, 2003)। 6. हरीश खरे , “ रलो डंग द फै िमली मै स,” सेिमनार, जून 2003। 7. ई ीधरन, “इले टोरल कोलीशंस इन 2004 जनलर इले शंसः योरी एंड एवीडस” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 18 दसंबर 2004। 8. पाट तं म प रवतन पर ये पैरा ाफ अ िलिखत òोत पर आधा रत ह - जोया हसन संपा दत पाट ज एंड पाट पाॅिल ट स इन इं िडया म ई. ीधरण, “ ै गमटेशन आॅफ इं िडयन पाट िस टम, 1952-99◌ः सेवन क पी टंग ए स लानेशंस” (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002); महेश रं गराजन, “कां ेस इन ाइिसस,” सेिमनार, जनवरी 2003; एम.जे. अकबर, “ ाॅप एंड ाॅपोजीशन,” एिशयन एज, 13 जुलाई 2003; के .एन. ब शी और एफ.िसया पी संपा दत इं िडयाः 1947-97◌ः फ टी ईयस आॅफ इं िडपडस म गुजे पा लोरा, द ाइिसस आॅफ 1989-92◌ः सम र ले शंस, (रोमः इं ि ट 2002)। ूटो इटेिलयानो पर आई” अ का ई आई’ ओ रयंट 9. राॅिबन जेफरी, “‘नो पाट डोिमने ट’◌ः इं िडयाज यू पाॅिल टकल िस टम”, िहमाल, माच 2002, पृ. 41। 10. ये अ ययन सनील जैन क ‘वोट वाजपेयी’ िबजनेस टडड म संि 2004। पम कए गए है। 16 फरवरी 11. कावेरी िववाद का यह िववरण एस गुहान क द कावेरी रवर वाॅटर िड यूटः टु व स कं िसिलएशन (म ास, ं टलाइन, 1993), रामा वामी आर. अ यर, वाॅटर, पसपेि टव इशूज, कं सनस (नई द लीः सेज पि लके शन, 2003) ,अ याय-3। 12. रामा वामी आर. अ यर, पंजाब वाटर इ ोि लयो, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली 31 जुलाई 2004; स यपाल डांग, अम रं दर संह एंड रवर वाॅटर िडसपुट, मेन ीम 4 िसतंबर 2004। 13. देख डी. बंधोपा याय, शैला के घोष और बु देव घोष क “िडपडसी वसज आॅटोनाॅमीः आईड टटी ाइिसस आॅफ इं िडयाज पंचाय स”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 20 िसतंबर 2003। 14. अिधक िववरण के िलए देख माही पाल क ‘पंचायती राज एंड रल गवनसः ए सपी रयंस आॅफ ए िडके ड’ इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 10 जनवरी 2004। 15. देख टी.एम. थाॅमस इसहाक और रचड ड यू. क क लोकल डेमो े सी एंड डेवलपमटः पीप स कै पेन फाॅर िडस लाइ ड ला नंग इन के रला (नई द ली, ले टवड बु स, 2000); जोस चाथुकुलम और एम. एस. जाॅन क “फाइव ईयस आॅफ पा टिसपेटरी गवनमट इन के रलाः रे टो रक एंड रयिलटी” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 7 दसंबर 2002। 16. रि म शमा, के रलाज िडस लाइजेशनः आइिडया इन ैि टस, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली 6 िसतंबर 2003; णब वधन और दलीप मुखज , “पावट एलेिवएशन एफ स आॅफ पंचायत इन वे ट बंगाल”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 फरवरी 2004; ए रड एंगेलशन रड, पोए टक आॅफ िवलेज पाॅिल ट सः द मे कं ग आॅफ वे ट बंगाल रल क युिन म (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2003); अिम व मुखज संपा दत िडस लाइजेशनः पंचाय स इन द नाइनटीज म िनमल मुखज और डी.बंधोपा याय, यू हाॅ रजंस फाॅर वे ट बंगाल पंचाय स’ (नई द ली; िवकास पि ल शंग हाउस, 1994)। 17. इन सवाल पर ब त सारे अकादिमक काम सामने आ रहे ह। देख इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली 24 फरवरी 2001 के िवशेषांक म नीरजा गोपाल जयाल, िब णु एन महापा और सुधा पाई का लेख-डेमो े सी एंड सोशल कै िपटल’; एस सुमित और वी सुदरसन, ‘ हाट डज द यू पंचायत िस टम गारं टीः ए के स टडी आॅफ पापाप ी’ इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली , 20 अग त 2005। 18. देख नेह के दृि कोण क आलोचना, जसवंत संह क ‘िडफ डंग इं िडया’ (बंगलौर, मैि मलन इं िडया, 1999) पृ. 29, 39,42-3, 57-8। 19. टीफन पी. कोहेन, इं िडयाः इम जग पावर (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2001), पृ. 144-5। 20. अनुपम ीवा तव, इं िडयाज ोइं ग िमसाइल ए बीशंसः एसे संग द टे कल एंड सव, खंड-40, नंबर-2, 2000। ेटेिजक डाईमशंस, एिशयन 21. जाॅज पारकोिवच, इं िडयाज यूि लयर ब बः द इ पै ट आॅन लोबल ोली फरे शन (बकलेः यूनीव सटी आॅफ कै लीफो नया ेस1999), पृ. 364-76। 22. वही, पृ. 412। 23. राज चग पा के वैप स आॅफ पीसः द सी े ट टोरी आॅफ इं िडयाज े ट टु बी ए यूि लयर पावर (नई द लीः हापरकाॅ लंस इं िडया, 2000), पृ. 51-2। 24. देख पाॅल आर डेटमैन, इं िडया चजेज कोसः गो डन जुबली टु िमलेिनयम (वे टपोट कोनः ेजर, 2001) पृ. 41। 25. यूजलाइन (कराची) म कािशत सा ा कार, जून 1998। 26. भूिम चकमा, ‘टु वड पोखरन- प्ः ए स ले नंग इं िडयाज यूि लराइजेशन ोसेस’, माॅडन एिशयन टडीज, खंड-39, नंबर-1, 2005। 27. भारत क परमाणु मह वाकां ा और सन् 1998 के परमाणु परी ण के बीच क कड़ी को जानने के िलए देख िहलेरी साइनाॅट क , द काउजेज एंड कांस सेज आॅफ साउथ एिशयाज यूि लयर टे स, एडे फ पेपस, 332, (लंदनः इं टरनेशनल इं ि ट ूट आॅफ ेटेिजक टडीज, 1999); अशोक कपूर, पोखरन एंड िबयाॅ डः इं िडयाज यू लीयर िवहैिवयर (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी, 2001)। भारत के परमाणु परी ण क आलोचना म कहे गए तक एम.वी. रम ा और सी. राममनोहर रे ी संपा दत ि जनस आॅफ यूि लयर ी स (हैदराबाद, ओ रयंट ल गमैन, 2003) म मौजूद है। 28. देख 1 माच 1999 के इं िडया टु डे क आवरण कथा। 29. पा क तान ने य और कै से कारिगल अिभयान शु कया इसके िलए देख हसन अ बास क , पा क ता स ि ट इनटू इ ीिम मः अ लाह, द आम एंड अमे रका वार आॅन टेरर (अरम क, यूयाॅकः एम.ई. शाप, 2005), पृ. 169-74; ओवेन बे ेट जाॅ स, पा क तानः आई आॅफ द टोम (नई द लीः वाइ कं ग, 2002) पृ. 87एफएफ; एजाज अहमद क , “द मेनी रो स टु कारिगल, ं टलाइन”, 16 जुलाई 1999। 30. वीण वामी, द कारिगल वार, संशोिधत सं करण, (नई द लीः ले टवड बु स, 2000), पृ. 10-11। 31. एस. ठाकु र संपा दत ग स एंड यलो रोजेजः एसेस आॅन द कारिगल वाॅर म रा ल बेदी, ‘िड मल फे योर’ (नई द लीः हापरकाॅिल स इं िडया, 1999), पृ. 142। 32. कारिगल वार क मु य घटनाएं नोट 30-31 ओर; सृंजाॅय चौधरी क िड पैचेस ाॅम कारिगल (पं◌ेगुइन बु स, 2000) म क गई है। 33. अ बास, पा क तान ि जुलाई 2004। ट इन टु इ ीिम म, पृ. 174; इं िडया टु ड◌े के साथ नवाज शरीफ का सा ा कार, 26 34. देख एिशयन एज क खबर, 4 जुलाई 1999; द टेली ाफ (कोलकाता) 9 जुलाई 1999, द हंद,ू 19 जुलाई 1999। 35. द एिशयन एज, 6 जुलाई 1999, द हंद,ू 4 जुलाई 1999। 36. सरबजीत पांढेर, ि प रट आॅफ नेशनिल म इकिल सेज मेमोरीज आॅफ (आॅपरे शन) लू टार’ द हंद◌ू, 16 जून 1999। 37. आम जाॅब सीकस गो बरसक, द हंद◌ू, 18 जुलाई 1999। 38. उवशी बुटािलया संपा दत पी कं ग पीसः वुमै स वाॅइसेस ाॅम क मीर म सोिनया ज बार, “ लड साॅइलः छ ी संगपुरा एंड आ टर” (नई द लीः कली फाॅर वुमैन, 2002) पृ. 226एफ। 39. छ ी संगपुरा नरसंहार को अंजाम देनेवाल के बारे म कु छ िववाद है। इस तक के बारे म क ह यारे भारत ारा िनयु कए गए थे ता क पा क तान के ऊपर आरोप मढ़ा जा सके देिखए पंकज िम ा क पु तक टे पेटेशन आॅफ द वे टः हाउ टु बी माॅडन इन इं िडया, पा क तान एंड बीयाॅ ड (लंदन; िपकाडोर, 2006), पृ. 197एफ; इसके िवपरीत िवचार जानने के िलए क ह यारे पा क तान से आए थे, पढ़े निलनी राजन संपा दत ैि ट संग जनिल मः वै यू, कं े स, इि लके शंस म वीन वामी क “आयरन वे सः रपो टग सब-काॅि टनटल वाॅरफे यर इन इं िडया” (नई द ली, सेज पि लके शंस, 2005)। हालां क मेरी अपनी राय यह है क वे ह यारे वतं आतंकवादी थे और इसका आधार वो बयान है जो उस नरसंहार म बचनेवाले लोग ने दए थे। उनका कहना था क ह यारे पंजाबी और उदू दोन ही बोल रहे थे। हालां क उदू भारत के उ र देश के ब त सारे मुसलमान ारा बोली जाती है, जो पंजाबी नह जानते ह या ना ही वे पंजाबी बोल सकते ह िज ह ने कू ल म उदू क पढ़ाई क हो। ऐसा िवभाजन के पहले होता था। ले कन ऐसे लोग अब स र साल से ऊपर के हो चुके ह गे जो ऊंची पहाि़डय पर चढ़कर नरसंहार करने नह आए ह गे। दूसरी तरफ ऐसे लाख पा क तानी पंजाबी है जो पंजाबी और उनक रा भाषा उदू साथ-साथ बोलते ह। जैसा क इस कताब म पहले भी साफ-साफ आया है क भारतीय रा य ने ज मू-क मीर म भले ही ब त बड़े-2 अपराध कए ह ले कन िसख नरसंहार उनम से नह लगता है। 40. देख अटल िबहारी वाजपेयी, “ यू जंग ाॅम कु मारकोम”, द हंद,ू 2 जनवरी 2001। 41. मुख आतंक हमल क सूची जानने के िलए देख इं िडयन ए स ेस, 7 अ ैल 2005। 42. िहमाल साउथ एिशयन, जून 2002; माइकल े पाॅन, “नो इजी एि ज स” इं िडया टु ड,े 10 जून 2002। 43. देख हंद ु तान टाइ स, 19 मई 2002। 44. जे स माइकल लंगदोह, “ ाॅिनकल आॅफ एन इं पोिसबल इले शनः द इले शन कमीशन एंड 2002 ज मू एंड क मीर असबली इले शंस (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2004), पृ. 129, 141-2, 149-50, 180-1 45. रे खा चौधरी और नाग राव, क मीर इले शन 2002◌ः इि लके शंस फाॅर पाॅिल ट स आॅफ सेपेरे ट म, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 4 जनवरी 2003। 46. टाइ स आॅफ इं िडया म उ धृत, 26 िसतंबर 2004। 47. हंद ु तान टाइ स, 20 जून 2003। 48. हंद ु तान टाइ स, 30 जनवरी 2005, द यू संडे ए स ेस, 30 जनवरी 2005। 49. द हंद,ू 17 मई 2005। 50. मुजिमल जलील, इं िडयन ए स ेस, 8 अ ैल 2005। 51. देखे हस गथ और सी राइट िम स संपा दत ाॅम मै स वेबरः एसेस इन सोिशयोलाॅजी म पाॅिल ट स एज ए वोके शन ( यूयाॅकः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1946)। 52. भारत म ाचार के बारे म सामा य जानकारी के िलए देख िशव िव नाथन और हरीश सेठी संपा दत फाॅल लेः ोिनक स आॅफ कर शन (नई द ली, बनयान बु स, 1998)। 53. बी.एस. नागराज, “ मोक न रजो स” इं िडयन पाॅिल टकल र ,ू जुलाई 2003। 54. पीटर रोना ड डीसूजा, “डेमो े सीज इनक विनयंट फै ट” सेिमनार, नवंबर, 2004; ेमशंकर झा, “क प इट पाॅल-यूशन ” हंद ु तान टाइ स, 2 जनवरी 2006; टाइ स आॅफ इं िडया क खबर (बंगलौर सं करण) 21 जनवरी 2006। 55. संडे 2-9 माच 1985। 56. रीितका खेरा, “माॅिनट रं ग िडस लोजस” सेिमनार, फरवरी 2004. राजनीित के अपराधीकरण का यह िववरण ो. ि लोचन शा ी क सूचना पर भी आधा रत है जो एसोिशयेशन आॅफ डेमो े टक रफा स के सं थापक सद य रहे ह। इसी समूह ने सु ीम कोट म अपराधीकरण पर रोक लगाने के िलए मूल जनिहत यािचका दायर क थी। 57. सैमुअल पाॅल और एम िववेकानंद, “हो डंग ए िमरर टु द यू लोकसभा” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 6 नवंबर 2004। 58. िबहार के कु यात अपराधी से नेता बने शहाबु ीन के बारे म ापक जानकारी के िलए देखं◌े, सबा नकबी भौिमक क “द साहब आॅफ सीवानः द टेल आॅफ ए इं िडयन गाॅड फादरय”। यह फ ट ूफः द पं◌ेगुइन बुक आॅफ यू राइ टंग ाॅम इं िडया, खंड-1 (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2005) म शािमल है। 59. सी.जे. फु लर और वेरोिनक बेनी संपा दत द एवरीडे टेट एंड सोसाइटी इन इं िडया म ए र ड एंगेलसन रड, “टाॅ कं ग डट अबाउट पाॅिल ट सः ए ू ाॅम ए बंगाली िवलेज” (नई द ली, सोशल साइं स ेस, 2000), पृ. 116-18। 60. इं टरनेशनल हेरा ड यून क खबर, 19 नवंबर 2004। 61. जाॅज लुईस बाॅ स, द टोटल लाइ ेरी नाॅन- फ शन 1922-86, संपादक-इिलयट वीनबगर, अनुवादक ई टर एलेन, िजल लेिवन और इिलयट वीनबगर (लंदन, पं◌ेगुइन बु स, 2001), पृ. 309; आर.ड यू. साउथन, वे टन सोसाइटी एंड द चच इन द िमिडल एजेज (हरम सवथ, पं◌ेगुइन बु स, 1970), पृ. 154। 62. इस संबंध म देख अिखल गु ा क “ लड बाउं डरीजः कर शन एंड द लोकल टेट” मूलतः अमे रकन इथनोलाॅिज ट म कािशत और जोया हसन संपा दत पाॅिल ट स एंड द टेट इन इं िडया म पुनमु त (नई द ली, सेज पि लके शन, 2000); इटालो पेरेडो संपा दत मोर ल आॅफ लेिज टमेसीः िवटवीन एजसी एंड िस टम म जोनाथन पैरी, “द ाइिसस आॅफ कर शन” और “आइिडया आॅफ इं िडया” (आॅ सफोडः बघान बु स, 2000)। 63. देख आशीष खेतान क टट एट द टाॅप, तहलका, 23 अ ैल 2005। 64. पी.एस. अ पू, द आॅल इं िडया स वसेजः िड लाइन, िडबेसमट एंड िडकं वीकली, 26 फरवरी 2005। शन, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल 65. भारत के धानमं ी को िलखा एम.एन बुच का प , 15 माच 2003 (म ी बुच का आभारी ं क उ ह ने मुझे उस प क एक ित भेजी)। 66. देख अ नं दता दासगु ा, “ि पुराज ुटल कु ल दे सेक”, िहमाल, दसंबर 2001। 67. जैसा क ास ट आॅ शंस, फरवरी 1997 म आ। 68. हरीश खरे , “वो टंग द पेरीफे री आउट”, द हंद◌ू, 20 माच 2004। 69. एं े बै टले, द एि ज यू टव एंड द यूिडिशयरी, द हंद,ू 8 मई 2001। 70. यायपािलका पर क त यह पैरा ाफ एस.पी. साठे के बेहतरीन काम - जुिडिशयल एि टिव म इन इं िडयाः ांस े संग बाॅडस एंड इनफो सग िलिम स; पर आधा रत है। दूसरा सं करण (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002)। मदुरई का उदाहरण यू इं िडयन ए स ेस, 23 िसतंबर 2003 से िलया गया है। 71. एम.पी. संह संपा दत लोकसभा इले शंस 1989 - 1991’, इं िडयन पाॅिल ट स इन द नाइनटीज म एम पी संह, टु गवन ओर नोट टु गोवनः द डाइले मा आॅफ द यू इं िडयन पाट िस टम, 1989-91” ( द ली, क लंगा पि लके शंस, 1992) पृ. 202। 12 समृि का दौर 1. करं ट म उ धृत, 22 िसतंबर 1954। 2. “द व ड दस वीक”, माइजइं िडया, 23 जनवरी 1955; “टु व स टोटिलटे रयिन म” माइजइं िडया, 8 मई 1955; ए फे टल इकोनाॅिमक पाॅिलसी, माइजइं िडया, 8 नवंबर 1953। 3. जगदीश भगवती और प ◌ ां देसाई, इं िडयाः लािनग फाॅर इं ड ीअिलजेशनः इं ड ीअिलजेशन एंड ेड पाॅिलसीज संस 1951 (लंदन, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1970)। 4. जे.आर.डी. टाटा, फाितमा जका रया ारा सा ा कार, टाइ स आॅफ इं िडया 12 जुलाई 1981। 5. देख दानी रोि क और अर वंद सु यम, ाॅम हंद ू ोथ टु ोडि टिवटी सजः द िम ी आॅफ इं िडयन ोथ ांिजशन (नेशनल यूरो आॅफ अ लाइड इकोनाॅिमक रसच, वाॅ शंगटन, माचत 2004)। 6. ए ी ओ. ू एगर संपा दत इकोनाॅिमक पाॅिलसी रफाम एंड द इं िडयन इकोनाॅमी म ए ी ओ. ू एगर और सािजद िचनाॅय, द इं िडयन इकोनाॅमी इन लोबर काॅ टे ट, (नई द लीः आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002) आ थक सुधार से पहले भारती; अथ व था के बारे म एक ऊपरी जानकारी के िलए देख िवमल जालान संपा दत द इं िडयन इकोनाॅमीः ाॅ लम एंड ो पे स (नई द ली, वाइ कं ग, 1992) 7. अर वंद पनाि या, “ ोथ एंड रफाॅम जून 2004। ू रं ग एटीज एंड नाइनटीज” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 19 8. अशोक वी. देसाई, माई इकोनाॅिमक अफे यर (नई द ली, िवले ई टन, 1993), कौिशक बसु, यूचर परफे ट? हंद ु तान टाइ स, 5 मई 2005। 9. डेिनस जे. इनकारनेशन, िडसलाॅ जंग म टीनेशन सः इं िडयाज यूयाॅक, काॅरनेल यूनीव सटी ेस, 1989), पृ. 214-15, 225। ेटेजी इन क पेरे टव पसपेि टव (इथाका, 10. नागेश कु मार, इं िडयन साॅ टवेयर इं ड ी डेवलपमटः इं टरनेशनल एंड नेशनल पसपेि टव, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 10 नव बर 2001; परदोस नाथ और अिम व हाजरा, काॅि फ ेशन आॅफ इं िडयन साॅ टवेयर इं ड ी, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 23 फरवरी 2002; इं यो रं ग आईटी रमस इं िडयन टेरीटरी, यू इं िडयन ए स ेस, 3 जनवरी 2004। 11. ु एगर के इकोनाॅिमक पाॅिलसी रफाॅ स म अ ा ली. से सेिनयन, “बंगलौरः द िसिलकाॅन वैली आॅफ एिशया?” पृ. 175। 12. राज चग पा और मािलनी गोयल, “हाउसक पस टु द व ड” इं िडया टु ड,े 18 नवंबर 2002; आउटसो सग टु इं िडया, द इकोनाॅिम ट, 5 मई 2001 13. स रता राय, ेयस आउटसोसड टु इं िडया और यूएस क स आउटसोस होमवक टु इं िडया, मूलतः यूयाॅक टाइ स म कािशत और एिशयन एज म पुनमु त, 14 जून 2004 11 िसतंबर 2005। 14. शंकर अ यर, मेड इन इं िडया, इं िडया टु ड◌े, 1 दसंबर 2003। 15. आर नागराज, फोरे न डाइरे ट इनवे टमट इन इं िडया इन द नाइनटीजः पाॅिल टकल वीकली, 26 अ ैल 2003। स एंड इशूज, इकोनाॅिमक एंड 16. अर वंद िवरमानी, इं िडयाज ए सटनल रफा सः मोडे ट लोबलाइजेशन, िसि फकं ट गे स, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 9 अग त 2003। 17. यह पैरा ाफ हरीश दामोदरन ारा िलखी जा रही कताब पर आधा रत है जो आजाद भारत म सामािजक इितहास पर काम कर रहे ह। ापार के 18. ई ीधरण,द ोथ एंड से टो रयल क पोिजशन आॅफ इं िडयाज िमिडल लासः इ स इ पै ट आॅन पाॅिल ट स आॅफ इकोनाॅिमक िल लाइजेशन” इं िडया र ,ू खंड-3, नंबर-4, 2004। 19. देख िविलयम मजारे ला क शोवे लंग मोकः एडवरटाइ जंग एंड लोबलाइजेशन इन कं टे पररी इं िडया (डरहम, एन.सीः ूक यूनीव सटी ेस, 2003), पृ. 74-76, 240, 258 आ द। 20. फिलपो ओसेला और के लोिलन ओसेला, “सोशल मोबिलटी इन के रलाः माॅड नटी एंड आईडटीटी इन काॅि ल ट (लंदनः लूटो ेस, 2000), पृ. 127। 21. देख “पाॅवट रड शन इन द नाइनटी” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली का िवशेषांक 25-31 जनवरी 2003; के सुंदरम और सुरेश डी. तदुलकर, पाॅवट इन इं िडया इन द नाइनटीजः एन एनािलिसस आॅफ चजेज इन 15 मेजर टे स, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 5 अ ैल 2003; एंगस डीटन संपा दत द ेट इं िडयन पाॅवट िडबेट (नई द लीः मैि मलन इं िडया, 2005)। 22. ये श द उप यासकार एडु आड गेिलएनो के ह, िज ह ने लै टन अमे रक शहर के बारे म वैसा ही िलखा था जो भारतीय प र े य म भी िब कु ल ही उपयु ह। “द अदर वाल”, यू इं टरनेशनिल ट, नवंबर 1989। 23. फु टलूज लेबर पर सेिमनार का िवशेषांक, नवंबर 2003; सुि य रायचौधरी, “लेबर एि टिव म एंड वुमैन इन द अनआॅगनाइ ड से टरः गारमट ए सपोट इं ड ी इन बंगलौर”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 मई-4 जून 2005; और थोड़ी िवशद जानकारी के िलए देख अजीत के घोष क द इ लाॅयमट चैलज इन इं िडया, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 27 नवंबर 2004। 24. पी.के . जोशी, अशोक गुलाटी, ताप एस िबरथल और ल मी ितवारी, ए ीक चर डाईवस फके शन इन साउथ एिशयाः पैट स, िडटरिमन स एंड पाॅिलसी इं ि लके शंस”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 12 जून 2004; एम.एस. संधु, “ ू ट एंड वेिजटेबल ोसे संग इं ड ी इन इं िडयाः एन अ ेजल आॅफ द पो ट रफाॅम पी रयड”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 9 जुलाई 2005। 25. रमेश चंद, “िवदर इं िडयाज फू ड पाॅिलसीजः ाॅम फू ट िस यु रटी टु फू ड िड ाइवेसन”, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली 12 माच 2005; जीन ज े , ेइंग फाॅर फू ड िस यु रटी, द हंद,ू 27 अ टू बर 2003; मधुरा वामीनाथन, वीक नंग वेलफे यरः द पि लक िडि यूशन आॅफ फू ड इन इं िडया (नई द ली, ले टवड बु स, 2000); सेतु काहकोिनयन और एंथनी ला यी संपा दत इं ि ट ूशंस, इं स ट स एंड इकोनाॅिमक रफाॅम इन इं िडया म अशोक गुलाटी, सेतु काहकोिनयन और दीप शमा, द फू ड काॅरपोरे शन आॅफ इं िडयाः स सेसेज एंड फे योर इन इन फु ड ेन माक टंग” (नई द ली, सेज पि लके शंस, 2000) और खासकर पी.सा नाथ क एवरीबडी ल स ए गुड ाउटः टोरीज ाॅम इं िडयाज पूअरे ट िडि स (नई द लीः पं◌ेगुइन इं िडया, 1996)। 26. पी.साईनाथ, “ े स रे डड े फाॅर वाॅटर इन टीएन” टाइ स आॅफ इं िडया, 14 मई 1993; सौ या िशवकु मार एंड ए रक करबट, ाउट, स टेनस एंड लाइवली डः “अकाल” सव इन राज थान, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 17 जनवरी 2004। 27. वे रयर एि वन, मा रया मडर एंड सुसाइड (बंबई, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1943)। 28. कसान आ मह या पर पी.सा नाथ ने हंद◌ू अखबार म एक लंबी श नखला िलखी है, िजनम से हरे क का िज करना यहां संभव नह है ले कन हां, उ ह आसानी से हंद ू अखबार के वेबसाइट www.thehindunet.com पर देखा जा सकता है। इसके अलावा आर. देशपांडे और नागेश भु क “‘फाॅ स िडस ेस’◌ः ूफ िबयाॅ ड े न” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 29 अ टू बर 2005 भी देख; तहलका का कृ िष संकट पर िवशेषांक, 6 माच 2004। 29. मैरन वीनर, द चाइ ड एंड द टेट इन इं िडया ( ंसटन, ंसटन यूिनव सटी ेस, 1990)। 30. जीन ज े और अपरािजता गोयल, “ यूचर आॅफ िमड-डे मी स” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 1 नवंबर 2003। 31. सुचेता महाजन, एमवीएफ इं िडया - एजुकेशन एज इ पाॅवरमट, मेन ीम, 16 अग त 2003; कमिण बनज , थम ए सपी रयंस, सेमीनार, फरवरी 2005। 32. देख “द ोब टीम” पि लक रपोट आॅन बेिसक एजुकेशन इन इं िडया (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999) अ याय-9। 33. िवमला रामचं न, “द बे ट आॅफ टाइ स, द व ट आॅफ टाइ स”, सेिमनार, अ ैल 2004। 34. सुभ ा मेनन, नो लेस टु गोः टोरीज आॅफ होप एंड िड पेयर इन इं िडयाज ए लंग हे थ से टर (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2004)। 35. जो जाॅनसन, द रोड टु इन, फनांिसयल टाइ स, 13/14 अग त 2005। 36. पामेला फिलपोज, “इं िडया इज सी रयसली िसक” यू इं िडयन ए स ेस, 24 जनवरी 2006। 37. अजन डे हान और अमरे श दूबे, “पाॅवट , िडसपे रटीज ओर द डेवलपमट आॅफ अंडरडेवलपमट इन ओड़ीसा” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 28 मई - 4 जून 2005; संजय कु मार, “आ दवासीज आॅफ साउथ उड़ीसाः इ डयो रं ग पाॅवट ” इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 27 अ टू बर 2001; जीन ज े , “नो मोर लाइफलाइनः पाॅिल टकल इकोनाॅमी आॅफ हंगर इन उड़ीसा, टाइ स आॅफ इं िडया, 17 िसतंबर 2001 38. मीना मेनन, “द बैटल फाॅर बाॅ साइट इन उड़ीसा” द हंद◌ू, 20 अ ैल 2005। 39. अनाम, द गल अग ट बाॅ साइट माइ नंग इन उड़ीसा (बंगलौरः पीप स यूिनयन फाॅर िसिवल िलबट ज, 2003); अनाम, हाउ र ग? हाउ राइट? 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अलख एन. शमा, ए े रयन रलेशंस एंड सोिशयो-इकोनाॅिमक चज इन िबहार, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 5 माच 2005। 50. 20 फरवरी 2006 के इं िडया टु डे म अम य सेन के सा ा कार म उ धृत। 51. 20 िसतंबर 2001 के टे समैन क रपोट। 52. टी.एन. िननान, “िबग ोथ, िबगर िडबे स”, सेिमनार, जनवरी 2006। 53. ु एगर के इकोनाॅिमक पाॅिलसी रफाम म देख नौशाद फो स, “डू इंग िबजनेस इन इं िडयाः हाट हैज िल लाइजेशन च ड?” पृ. 131। 54. रोजगार ईजीएस गारं टी योजना क बहस पर देख जीन ज े क “भोपाल क वेशन आॅन द राइट टु वकः ीफ रपोट एंड पसनल आॅ जवशंस, सोशल ए शन, खंड-54, नंबर-2, 2004; रं कू मुरगई और मा टन रे वेिलयन, “इ लाॅयमट गारं टी इन रल इं िडयाः हाट वुड इट काॅ ट एंड हाउ मच वुड इट र ूज पाॅवट ? इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 30 जुलाई 2005। 55. उदारीकरण और ाचार के बीच संबंध को जानने के िलए देख राॅब जेि क स क , डेमो े टक पाॅिल ट स एंड इकोनाॅिमक रफाॅ स इन इं िडया (कै ि ज, कै ि ज यूनीव सटी ेस1999), पृ. 87, 90, 93-4, 99, 102-3। 56. देख अभय मेहता क पाॅवर लेः ए टडी आॅफ द एनराॅन ोजे ट (हैदराबाद, ओ रयंट ल गमैन, 2000)। 57. टीफन पी.कोहेन, इं िडयाः इम जग पाॅवर (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2001), पृ. गअ, 285-92। 58. यूज बुले टन आॅन सीएनएन/आईबीएन, 22 फरवरी 2006। 59. लैरी स े लर, “शन पा क तान, फे वर इं िडया” यूयाॅक टाइ स म थम कािशत और फर द एिशयन एज म पुनमु त 23 माच 2005। 60. देख सी. राजामोहन, ाॅ संग द बीकाॅनः द शे पंग आॅफ इं िडयाज फाॅरेन पाॅिलसी (नई द ली, वाइ कं ग, 2003) अ याय-4; ोव टाॅलबाॅट, इनगे जंग इं िडया (नई द ली, वाइ कं ग-पं◌ेगुइन, 2005)। 61. जयराम रमेश, “मे कं ग से स आॅफ िचिनि डयाः र ले शन आॅन इं िडया एंड चाइना, (नई द ली, इं िडया रसच ेस, 2005)। 62. देख ं टलाइन क आवरण कथा, 18 जुलाई 2003। 63. एिशयन एज क खबर, 11 अ ैल 2005; एनडीटीवी क खबर 9 अ ैल 2005। 64. डेिनयल एच. पंक, द यू फे स आॅफ द िसिलकाॅन एज. वायड, फरवरी 2002 (www-wiredcom/wired/archive/12-02/india_pr-html) 65. मनजीत कृ पलानी और पेटे इनगा डयो, द राइज आॅफ इं िडया, िबजनेस वीक, 8 दसंबर 2003 (wwwbusinessweek-com/magazine/content/03_49/b3861001_mz001-html) 66. राॅन मौ रयो और सुदीप मजूमदार, “एन इं िडयन चैि पयन”, यूजवीक, 12 अ ैल 2004। 67. फरीद जका रया, इं िडया राइ जंग, यूजवीक, 6 माच, 2006। 68. थाॅमस डमैन, द व ड इज लैटः ए ीफ िह ी आॅफ द लो लाई ड व ड इन वटी फ ट सचुरी, (लंदन, एलेन लेन, 2005) पृ. 459। 69. जेफरी डी. सै स, द एंड आॅफ पाॅवट ः हाउ वी कै न मेक इट है पेन इन आॅवर लाइफटाइम (लंदन, पं◌ेगुइन बु स, 2005), पृ. 185-7। 70. द इकोनाॅिम ट, 5 माच 2005; राॅजर कोहेन, “ए यू एिशयाज रोअर इज हड”, इं टरनेशलन हेरा ड कािशत और एिशयन एज म पुनमु त, 19 अ ैल 2005। यून म 71. लाइड े टोिवच, ी िबिलयन यू कै िपटिल टः द ेट िश ट आॅफ वे थ एंड पाॅवर टु द ई ट ( यूयाॅकः बेिसक बु स, 2005), पृ. 101-5, 232-5। 72. भरत झुनझुनवाला, “गैद रं ग टाॅम आॅफ इं िडयन इ पे रयिल म” यू इं िडयन ए स ेस 10 अग त 2005। 13 मनोरं जन 1. भारतीय फ म उ ोग के उपयोगी इितहास म ए रक बन और एस. कृ णा वामी क इं िडयन फ म दूसरा सं करण ( यूयाॅक आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1980); बी.डी. गग क , सो मेनी िसनेमाजः द मोशन िप चर इन इं िडया (बंबई, इिमनस िडजाइन, 1996) आ द मुख है। चूं क यह अ याय ि गत उपलि धय से यादा सामािजक इितहास से संबंिधत है इसिलए महान अिभनेता , िनदशक , गायक और भारतीय िसनेमा के महान संगीतकार -गीतकार के बारे म चचा करने क यह उपयु जगह नह है। इसके िलए पाठक को आशीष रा या य और पाॅल िवलेमन ारा संपा दत इनसाइ लोपीिडया आॅफ इं िडयन िसनेमा, दूसरा सं करण (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999) देखनी चािहए। 2. जैसा क अमृत गांगर और वीरचंद धमसे क कताब, इं िडयन िसनेमाः ए िवजुलअल वाॅइज म दावा कया गया है (नई द ली, पि लके शन िडिवजन, 1998) पृ. 90। 3. द करं ट, 27 िसतंबर 1950; द हंद,ू 6 अग त 1953। 4. द करं ट, 24 दसंबर 1952। 5. गग, सो मेनी िसनेमाज, पृ. 151। 6. रा यसभा िडबे स, 26 नवंबर और 10 दसंबर 1954; द करं ट, 24 दसंबर 1954। 7. सुजाता पटेल और एिलस थाॅनर संपा दत बंबईः मोजेइक आॅफ माॅडन क चर म अमृत गांगर, “ फ स ाॅम द िसटी आॅफ ी स” (बंबई, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस,1995)। 8. देख रजनी मजूमदार, द बंबई फ म पो टर, सेिमनार, मई 2003। 9. स यजीत रे , अवर फ स, दयर फ स (कलक ा, ओ रयंट ल गमैन, 1976), पृ. 90-1। 10. पीटर मैनुएल क कै सेट क चरः पाॅपुलर यूिजक एंड टे ोलाॅजी इन नाॅथ इं िडया म मनमोहन देसाई का उ रण, (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1993), पृ. 45। 11. जाॅज िग संग, यू गब ीट (1891, लंदन म पुनमु तः जे.एम. डट, 1997), पृ. 354। 12. भारतीय फ म के कथानक के च र पर बेहतरीन लेखन नसरीन मु ी कबीर क बाॅलीवुडः द इं िडयन िसनेमा टोरी (लंदनः चैनल 4 बु स, 2001) म सामने आया है। इसके अलावा प ा शाह क इं िडयन फ म (बंबई, द मोशन िप चर सोसाइटी आॅफ इं िडया, 1950); अगेहानंदा भारती क , “एं ोपाॅलोजी आॅफ हंदी फ स” (दो क त म) इल ेटेड वीकली आॅफ इं िडया, 30 जनवरी और 6 फरवरी 1977 भी देख। 13. राॅबट एल हाड ेव और एंथनी सी. िनधाथ क “ फ म एंड पाॅिल टकल कं ससनेस इन तिमलनाडु ” म एस.एस. वासन का उ रण, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 11 जनवरी 1975। 14. बी.जी. वग ज क टु मोरोज इं िडयाः एनेदर ी ट िवद डेि टनी (नई द लीः वाइ कं ग, 2006) म मुकुल के सवन, “एन अंडर ेजुएट िह ी आॅफ हंदी िसनेमा”, पृ. 323। 15. नरे श फनाडीज, “ रमे ब रं ग एंथनी गो साल स, सेिमनार, नवंबर 2004; इसके अलावा वनराज भा टया क ‘ फ म यूिजक’, सेिमनार, दसंबर 1961; मैनुअल, कै सेट क चर, अ याय-3 भी देख। 16. अशरफ अजीज, लाइट आॅफ द यूनीवसः एसेस आॅन हंद ु तानी फ म यूिजक (नई द लीः ी एसेस, कलेि टव 2003), पृ. गअपप-गअपप। 17. एच.वाय. शारदा साद के “ये कौन आज आया सवेरे-सवेरे” द एिशयन एज, 18 मई 2005 म, बड़े गुलाम अली खान साहब का उ रण। 18. नशरीन मु् ी कबीर, “ लेबैक टाइमः ए ीफ िह ी आॅफ बाॅलीवुड फ म सां स”, फ म कमट, मई-जून 2002, पृ-41। हंदी फ म संगीत के लोकि य गीतकार , संगीतकार और गायक के बारे म जानने के िलए पढ़ मािनक ेमचंद क य टरडेज मेलाॅडी, टु डज े मेमो रस (मुंबईः झरना बु स, 2003)। 19. टीव डेरने मूवीज, मै कु िलिनटी एंड माॅड नटीः एन एं ोपाॅलाॅजी आॅफ मै स फ म गोइं ग इन इं िडया (वे टपोट, काॅनः ीनवुड ेस, 2000) चै टर 2 इसके अलावा देख नर पंजवानी क “ए माॅल टाॅन गोज टु द मूवीज” हंदी, खंड-2, नंबर-2 2001। 20. रै चेल डाॅयर और टोफर िप े संपा दत लेजर एंड द नेशनः द िह ी, पाॅिल ट स एंड कं यू पशन आॅफ पि लक क चर इन इं िडया (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2000) म सारा िडके , िसनेमा एंड द अबन पूअर इन साउथ इं िडया (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1993) और “अपो जंग फे सेजः फ म टार फै नलब एंड द कं शन आॅफ लास आईड टटीज इन साउथ इं िडया”। 21. ब न के कै रयर पर देख इं टर आिलया, िचदानंद दासगु ा, द पटेड फे सः टडीज इन इं िडयाज पाॅपुलर िसनेमा (नई द लीः रोली बु स, 1991) पृ. 239एफएफ; अशोक बकर, बाॅलीवुड (नई द लीः पं◌ेगुइन बु स, 2001), पृ. 67-77। 22. संडे 24 फरवरी से 2 माच 1985 तक का अंक। 23. कावेरी वामजई, “ए लीजड ट स 60” इं िडया टु ड,े 21 अ टू बर 2002। 24. लता के जीवन पर आधा रत ये िववरण हरीश िभमानी के इन सच आॅफ लता मंगेशकर (नई द लीः इं डस, 1995); पुनीता भ क “द लता लीजड”, फ मफे यर, 1-15 जून 1987 पर आधा रत ह। 25. गग क सो मेनी िसनेमाज म सुनील सेठी का िज , पृ. 192। 26. अनुपमा चोपड़ा, शोलेः द मे कं ग आॅफ ए लािसक (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2000) पृ. 29 और अ य ा। 27. अशोक िम ण, माई ईयस िवद बाॅसः एट जेिमनी टु िडयो (हैदराबाद, ओ रयंट ल गमैन, 2002) पृ. 16-17। 28. द करं ट, 3 िसतंबर 1952। 29. मुकुल के सवन, “िसने ा नाॅन!” आउटलुक, 18 अग त 1997। 30. जोया हसन संपा दत फो जग आईडटीटीजः जडर, क युिनटीज एंड द टेट म देख मुकुल के सवन क “उदू, अवध एंड द तवायफः द इ लािमके ट स आॅफ हंदी िसनेमा” (नई द लीः कली फाॅर वुमैन1994) 31. फ ट ूफः द पं◌ेगुइन बुक आॅफ यू राइ टंग ाॅम इं िडया म जेरी िप टो, “द वीमैन, (नई द ली, पं◌ेगुइन बु स, 2005), पृ. 49-50। कु ड नोट के यर”, खंड-1 32. शाहजहां मैडमपेट “पोटट आॅफ रिलिजयस मुि लम एज ए से युलर आईकन” म ममूटी का उ रण। अ कािशत द तावेज जो इसके लेखक से मुझे देखने को िमला। 33. ब ी बेन, फाॅलीवुड लैशबैकः ए कले शन आॅफ मूवी मेमोरीज (नई द ली, इं डस, 1993), पृ. 267। 34. रे पर ए ब त सारे अ ययन म संभवत सबसे बेहतरीन एं यू राॅिब सन क स यजीत रे ः द इनर आई (लंदन, एं े ूश, 1989); और िचदानंद दासगु ा क द िसनेमा आॅफ स यजीत रे , दूसरा सं करण (नई द ली, एनबीटी, 2001) है। 35. इन िनदशक के काय पर येवेस थोराट क कताब द िसनेमाज आॅफ इं िडया (1896-2000) (नई द ली, मैि मलन इं िडया, 2000) म चचा क गई है। 36. यह िववरण तम भ च के “िननासमः ए क चरल अ टरने टव” जो उनक कताब िथएटर एंड द व ड के 14वं◌े अ याय म है (नई द ली, मनोहर, 1990); िननासम के बारे म कई खबर और मेरे िनजी हेगु डु मण पर आधा रत है। 37. एच.वाई. शारदा साद, ‘सुबाना’, द एिशयन एज, 19 अ टू बर 2005। 38. सुध वा देशपांड,े हबीब तनवीरः अपसाइड-डाउन िमडास, इकोनाॅिमक एंड पाॅिल टकल वीकली, 13 िसतंबर 2003। 39. गदर का जीवन और उनके काम वकटराव क आगामी पु् तक का िवषय है। राव के अ य ब त सारे लेख म से देख िवशेषकर “राइ टंग ओरलीः िडकाॅलोनाइजेशन ाॅम िबलो”, पोजीशंस, खंड-7, नंबर-1, 1999। 40. बाॅनी सी. वाडे क द यूिजक इन इं िडयाः द लािसकल ैिडशंस (1979, संशोिधत सं करण, द ली, मनोहर, 2001); द मोहन नादकण , द ेट मा टसः ोफाइल इन हंद ु तानी लािसकल यूिजक (नई द ली, हापर काॅिल स, 1999), लुडिवग पे च, द इल ेटेड क पेिनयन टु साउथ इं िडयन लािसकल यूिजक (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1999)। 41. देख इं दरा मेनन, द म ास ाॅटटः वुमैन इन कनाटक यूिजक (नई द ली, रोली बु स, 1999), पृ. 173-8। सु बाल मी क सबसे ताजा जीवनी टी.जे. जाॅज ने एमएसः ए लाइफ इन यूिजक के नाम से िलखी है (नई द ली, हापरकाॅ लंस, 2004) यहां मने संगीत के िव ान के शव देसीराजू के एमएस पर अ कािशत लेख से भी मदद ली है। 42. अभी तक रिवशंकर क कोई जीवनी उपल ध नह है। मने यहां जो भी िलखा है वह उनके अपनी ही आ मकथा राग माला (िग डफोडः जेनेिसस पि लके शन, 1997), संगीत ेिमय के साथ बातचीत, और मेरे िपछले तीस साल से रिवशंकर के सुनने के अनुभव पर आधा रत है। 43. इन कलाकार पर यादा जानकारी के िलए इ छु क पाठक को कु मार मुखज क द लाॅ ट व ड आॅफ हंद ु तानी यूिजक (नई द लीः पं◌ेगुइन इं िडया, 2006) पढ़ने क सलाह दी जाती है जो एक िव ान संगीत ारा िलखी गई इस िवषय पर समृ पु तक है। 44. टाइ स आॅफ इं िडया (बंगलौर) 3 माच 2003; द एिशयन एज, 3 माच 2003। 45. इस पैरा ाफ म दए गए तक को िव तारपूवक रामचं गुहा क ए काॅनर आॅफ फाॅरेन फ डः द इं िडयन िह ी आॅफ ि टश पोट (लंदन, िपकाडोर, 2002) म चचा क गई है। इसके अलावा देख रचड कै शमैन क पै स, लेयस एंड द ाॅडः द फे नोमेनन आॅफ इं िडयन के ट (बंबई, ओ रयंट ल गमैन, 1980)। 46. पाॅन थंगामनी क कताब िह ी आॅफ ाॅडका टंग इन इं िडयाः िवथ पेशल रफरस टु तिमलनाडु , 1924-54 म सी. राजगोपालाचारी का िज (चै ेः पो ैया, पाथीपगम, 2000) पृ. 104-05। 47. देख मेहरा मसानी क ाॅडका टंग एंड द पीपल (नई द ली, एनबीटी, 1976) इसके अलावा डेिवड िलिलव ड क ांसिमटस एंड क चरः द काॅलोिनयल स आॅफ इं िडयन ाॅडका टंग साउथ एिशया रसच, खंड-10. नंबर-1 1990 भी देख। 48. द हंद,ू 19 जुलाई 1953। 49. के रोल ए ेकेन रज संपा दत “कं यू मंग माॅड नटीः पि लक क चर इन साउथ एिशयन व ड” म डेिवड िलिलिव ड, “अपाॅन द सबडोिमनटः एडिमिन े टंग यूिजक आॅन आॅल इं िडया रे िडयो” (िमिनयापोिलस, यूनीव सटी आॅफ िमिनयापोिलस, 1995)। 50. रतु सरीन, दूरदशनः द मनी मशीन, संडे 18-24 अग त 1985। 51. िहर यमय कारलेकर संपा दत “इनिडपडट इं िडयाः द फ ट फ टी ईयस” म िचदानंद दासगु ा, “िसनेमाः द अन टाॅपेबुल चै रयट” ( द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 1998) पृ. 442। 52. देख िवमल दशानायके और मालती सहाय क “राज कपूर एंड इं िडयनाइजेशन आॅफ चेि लन”। यह पचा यूमर इन िसनेमाः ई ट एंड वे ट” नाम के एक िस पोिसयम म पेश कया गया था, वाईक क , हवाई, 29 नवंबर-3 दसंबर 1986। 53. द करं ट, 28 िसतंबर 1955 54. ब ी बेन, राज कपूरः द फे बुलस शोमैन (नई द लीः इं डस, 1995), पृ. 88। 55. टाइ स आॅफ इं िडया, 5 जनवरी 1952। 56. के .ए. अ बास, आई एम नोट एन आइसलडः एन ए सपे रमट इन आॅटोबायो ाफ (नई द ली, िवकास पि ल शंग हाउस, 1977) पृ. 372। 57. येल यूनीव सटी के ो. जे स सी. काॅट के साथ िनजी बातचीत। 58. टीफन आ टर, अमृतसर टु लाहौरः ाॅ संग द बाॅडर िबटवीन इं िडया एंड पा क तान (नई द लीः पं◌ेगुइन बु स, 2000), पृ. 132-3, 136, 172-3, 178। 59. “बाउ ड आॅवर बाई बाॅलीवुड” गा जयन वीकली, 27 मई -5 जून 2005। 60. मूव आॅवर एलए, हेयर क स बंबई, द टाइ स 22 जून 2000। 61. टाइम, 27 अ टू बर 2003, इसके अलावा र मंदर कौर और अजय जे. िस हा क , बाॅलीवुडः पाॅपुलर इं िडयन िसनेमा ूः ए ांसनेशनल लस (नई द ली, सेज पि लके शन, 2005) के लेख भी देख। 62. सुध वा देशपांड,े हंदी फ सः द राइज आॅफ द कं युमेबुल हीरो” िहमाल, साउथ एिशयन, अग त 2001। 63. टाइ स आॅफ इं िडया, 25 फरवरी 2004। 64. आर.एम. रे संपा दत फ म सेिमनार रपोट 1955 (नई द ली, संगीत नाटक अकादमी, 1955) म एस.एस. वासन “ फ म ोड शन इन इं िडया टु ड”े पृ. 33-5। उपसंहार कु छ बात है क ह ती िमटती नह हमारी... 1. राॅबट डी क लन, “द लाॅ लेश ं टयर”, अटलां टक मंथली, िसतंबर 1999। 2. अयाज अमीर, द यूटी आॅफ डेमो े सी, पहले डाॅन म कािशत फर द एिशयन एज म पुन कािशत, 17 मई 2004। 3. निसन आर के ल, जोया हसन, राजीव भागव और बलवीर अरोड़ा संपा दत ांसफाॅ मग इं िडयाः सोशल एंड पाॅिल टकल डायनािम स आॅफ डेमो े सी म योग यादव, “अंडर ट डंग द सैकंड डेमो े टक अपसजः “ स आॅफ ब जन पा टिशपेशन इन इले टोरल पाॅिल ट स इन द नाइनटीज” (नई द ली, आॅ सफोड यूनीव सटी ेस, 2002) पृ. 133। 4. डे न हेरा ड क रपोट, 10 अ टू बर 2004। 5. बेला भा टया, “द न सलाइट मूवमट इन स ल िबहार”, अ कािशत पीएच.डी शोधप , फै क टी आॅफ पाॅिल टकल एंड सोशल टडीज, कै ि ज यूनीव सटी, 2000, पृ. 114-20। 6. जे.एम. लंगदोह, टाइ स आॅफ इं िडया, 3 दसंबर 2003। 7. देख कले टेव व स आॅफ आर.के . ल मण जो पगुइन इं िडया के ारा कािशत क गई है। ल मण भारत के सबसे यादा मश र काटू िन ट ह िज ह ने िविवध िवषय पर मौिलक काटू न बनाए ह। ले कन उनके अलावा ब त सारे दूसरे ितभाशाली काटू िन ट भी ह िज ह ने राजनीित ं य म महारत हािसल क है और उस पर अपना काटू न बनाया है। 8. द टेली ाफ (कोलकाता) म ांजिल, 2 जनवरी 2003। 9. बिड ट एंडरसन, द पे टर आॅफ कं प रजंस (लंदनः वस , 1998) पृ. 132। 10. सुनील िखलनानी, “डेमो े सी एंड नेशनिल म इन इं िडया” काॅलेज डे ांस म दया गया 2005, पृ. 2। ा यान 30 मई 11. अपने अग ट द करं टः एसेज इन द िह ी आॅफ आइिडया म इसाह ब लन, नेशनिल मः पा ट नेगले ट एंड जट पाॅवर (1979) संपादक - हेनरी हाड (लंदन, िपमिलको, 1997), पृ. 346-7, 353-4। 12. आधुिनक रा ीयता के इितहास पर िजतना िलखा गया उससे एक अ छा-खासा पु तकालय तैयार हो जाएगा। ासंिगक काय का एक लेखा-जोखा जानने के िलए देख - अन ट गेलनर क नेशंस एंड नेशनिल म (आॅ सफोड, बेिसल लैकवेल,1983); बिड ट एंडरसन क इमैिज ड क युिनटीजः र ले शंस आॅन द आॅ र जंस एंड ेड आॅफ नेशनिल म (लंदन, वस , 1983); एंथनी डी. ि मथ क द एथिनक आॅ रिजन आॅफ नेशंस (आॅ सफोड, बेिसल लैकिवल, 1986); िलहा ीनफ ड क नेशनिल मः फाइव रोड टु माॅडिनटी (कै ि ज. मासः हावड यूनीव सटी ेस1992); ए रक हाॅ सबाॅन क नेशंस एंड नेशनिल म संस 1780 (कै ि जः कै ि ज यूनीव सटी ेस, 1993); टाॅम नेन क फे स आॅफ नेशनिल मः जानुस रिविजटेड (लंदन, वस , 1997)। इसके अलावा देख हंस काॅन क लािसक कृ ित नेशनिल मः इ स मी नंग एंड िह ी ( ंसटनः वैन नाॅ ड, 1955)। 13. मुकुल के सवन क से युलर काॅमन सस (नई द ली, पं◌ेगुइन इं िडया, 2001)। 14. देख जावीद आलम, वाॅ स डेमो े सी? (नई द ली, ओ रयंट ल गमैन, 2004)। 15. बनाड डी. नाॅयस टर, साॅ ट टेटः ए यूजपेपरमै स ाॅिनकल इन इं िडया ( यूयाॅकः हापर एंड रो 1970), पृ. 119-23। 16. जोसेफ टािलन, माि स म एंड द नेशनल े न (लंदन, मा टन लाॅरस, 1936) पृ. 5-6। 17. रोना ड ि गर स ी और टेरी मा टन संपा दत ए टेट आॅफ नेशंसः ए पायर एंड नेशन िब डंग इन द एज आॅफ लेिनन एंड टािलन म पीटर ए. ि ल टेन क कताब नेशन िब डंग ओर सी फके शन? आॅि लगेटरी रिशयन इं शन इन द सोिवयत नाॅन-रिशयन कू स. 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Published in Penguin Books by Penguin Random House India 2017 This collection published 2007 यह हंदी सं करण पहली बार 2012 म कािशत कॉपीराइट © रामचं गुहा 2012 The moral right of the author has been asserted ISBN: 978-0-143-06845-7 e-ISBN: 978-9-385-99031-1 This digital edition published in 2016. यह पु तक इस शत पर िव य क जा रही है क काशक क िलिखत पूवानुमित के िबना इसका ावसाियक अथवा अ य कसी भी प म उपयोग नह कया जा सकता । इ ह पुनः कािशत कर िव य या कराए पर नह दया जा सकता है तथा िज दबंद अथवा कसी भी अ य प म पाठक के मा य इसका प रचालन नह कया जा सकता | ये सभी शत पु तक के ख़रीदार पर भी लागू ह गी | इस संदभ म सभी काशनािधकार सुरि त ह |
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